इस पत्रकार की नौकरी तो हमेशा लड़कियों ने ही ली! पढ़िए क्या-क्या घटित हुआ

Abhishek Srivastava

ये जो #MeToo वाला ट्रेंड चल रहा है, थोड़ा विचलित करता है। लगे हाथ सोचा कुछ फर्स्‍ट हैंड कहानियां कह दी जाएं। पहली कहानी यूएनआइ समाचार एजेंसी की- वर्ष 2003। एक दिन एक एक बालिका संपादक के कमरे से निकल कर न्‍यूज़रूम में आई। पता चला इनटर्न है। उसे मेरे सुपुर्द कर दिया गया खबर सिखाने के लिए। चार दिन सिखाया, फिर वे नदारद हो गईं। Continue reading

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मोदी सरकार में पीएम से लेकर मंत्री तक अपना काम छोड़ दूसरे का भार हलका करने में जुटा है!

Abhishek Srivastava : अपना काम तो सभी करते हैं। बड़ाई इसमें है कि आप दूसरे का काम करें। वो भी पूरे निस्‍वार्थ भाव से। यह सरकार मुझे इसीलिए इतनी पसंद है। बंधुत्‍व और सहयोग की भावना यहां भयंकरतम रूप में दिखती है। अब देखिए जेटलीजी को। होंगे वकील, लेकिन कानून मंत्री थोड़े हैं। फिर भी एलजी बनाम दिल्‍ली सरकार के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कानूनी व्‍याख्‍या कर दिए। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का बोझ कम हुआ, तो वे अफ़वाहों पर लगाम लगाने के लिए वॉट्सएप के इस्‍तेमाल पर ज्ञान देकर संचार मंत्री मनोज सिन्‍हा को हलका कर दिए। लगे हाथ सिन्‍हाजी वोडाफोन और आइडिया के विलय में जुट गए। Continue reading

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कासगंज : एक बंटे हुए समाज को मीडिया की एकतरफा रिपोर्टिंग ने और बांट दिया है

Abhishek Srivastava : कल रात तक अपनी समझ पर बीस परसेंट शंका थी। आज साफ हो गयी जब मृतक नौजवान चंदन के एक अनन्य मित्र ने भारी मन और भरी आंखों से बताया, “भैया, आप नहीं जानते यूपी का हाल। जब से मोदीजी ने नेतानगरी को एक फुलटाइम काम कहा है, यहां की हर गली में हर लौंडा मोदी बनने की इच्छा पाल बैठा है। कासगंज के हर मोहल्ले से एक मोदी निकल रहा है।”

यह युवा भाजपा का समर्थक है, चंदन जैसे लड़कों का बौद्धिक संरक्षक और बीटेक पास है। अंग्रेज़ी बोलता है। मॉडर्न है। चंदन को शहीद मानता है लेकिन इस शहादत के पीछे हर लड़के के मन में पनपी नेता बनने को ख्वाहिश को ज़िम्मेदार मानता है। ये लड़का आजतक की कवरेज को सही मानता है लेकिन ABP News को दुश्मन। आज इसी तरह के लोगों ने पंकज झा का जीना हराम किया हुआ है और पूरे पुलिस बल और आरएएफ के सामने ABP की ओबी वैन को उठा लिया और बोनट खोल दिया।

ठीक यही स्थिति मुसलमान इलाके में है। वहां एबीपी को गले लगाया जा रहा है लेकिन आजतक के खिलाफ मन में द्वेष है। आजतक की समझदारी थी कि उसने अपनी वैन हिन्दू मोहल्ले में पार्क की थी वरना उनके रिपोर्टर का हाल भी मुस्लिम लड़के पंकज झा जैसा कर देते। कुल मिला कर एक बंटे हुए समाज को मीडिया की एकतरफा रिपोर्टिंग ने और बांट दिया है। ऐसे में कासगंज हमें दोहरे खतरे के प्रति आगाह करता है।

पहला, राजनीतिक महत्वाकांक्षा पाले भाजपा समर्थक बेरोजगार लड़के भाजपा के लिए भस्मासुर हैं जबकि बिल्कुल इसी स्थिति में जो मुसलमान युवा हैं, वे अपनी ही कौम के लिए भस्मासुर साबित होंगे। दूसरे, टीआरपी और स्वामिभक्ति के चक्कर में लगे टीवी चैनल सच के अलावा बाकी सब रिपोर्ट करने के चक्कर में अपना ही गला घोंट लेंगे। अपने ऊपर हमले की सूरत में रिपोर्टर बेचारा अभिव्यक्ति की आज़ादी चिल्लाएगा और जनता मौज लेगी।

कासगंज गए वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव की जमीनी रिपोर्ट का एक अंश.

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योगी का आना हिंदुओं में लिबरल स्‍पेस का जाना है!

Abhishek Srivastava : अब योगी के बारे में कुछ बातें। मैं मानता हूं कि योगी आदित्‍यनाथ भाजपा के लिए बिलकुल सही चुनाव हैं। योगी को चुनकर भाजपा ने जनादेश को सम्‍मान दिया है। भाजपा के राजनीतिक एजेंडे के लिहाज से भी यह उपयुक्‍त चुनाव है। तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं योगी के चयन को लेकर आ रही हैं। कई जगह पढ़ा कि कुछ लोगों के मुताबिक वे भाजपा के लिए भस्‍मासुर साबित होंगे। ऐसे लोग योगी को जानने का दावा करते हैं। मुझे लगता है अभी वह वक्‍त नहीं आया कि हम योगी की तरफ़ खड़े होकर उनके चुनाव का विश्‍लेषण करें।

मेरा मानना है कि अब भी मोदी, आरएसएस और भाजपा की ओर खड़े रह कर ही योगी पर बात होनी चाहिए। जो लोग मोदी को जानते हैं, वे यह चूक न करें कि भस्‍मासुर वाली बात मोदी खुद समझ नहीं रहे होंगे। आखिर मोदी जैसा ताकतवर नेता अपने लिए भस्‍मासुर को क्‍यों खड़ा करेगा भला? मामला यह है ही नहीं। जबरन दोनों के बीच अंतर्विरोध को दिखाकर खामख़याली न पालिए। फि़लहाल, मोदी, योगी, संघ और भाजपा के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं है। हां, आखिरी वक्‍त में मनोज सिन्‍हा का नाम क्‍यों और कैसे कटा, उस पर बात बेशक की जानी चाहिए।

मोदीजी का तात्‍कालिक एजेंडा यह है कि 2019 तक अबकी मिले हिंदू वोटों को कंसोलिडेट रखा जाए और कोई नुकसान न होने पाए। केशव मौर्या और शर्मा इसमें सहायक होंगे। दीर्घकालिक एजेंडा मेरी समझ से दक्षिणपंथी राजनीति का एक लंबा खिलाड़ी तैयार करना है जो 2024 में मोदीजी का उपयुक्‍त उत्‍तराधिकारी बन सके। मोदीजी जानते हैं कि वे बालासाहेब ठाकरे नहीं हो सकते। अगर वैसा बनने की कोशिश करेंगे तो जो इमारत खड़ी कर रहे हैं वह उनके बाद ढह जाएगी। योगी इस लिहाज से मोदी के सक्‍सेसर हैं और योगी खुद इस बात को समझते होंगे।

इसीलिए योगी गरम दिमाग से कोई काम नहीं करेंगे, मुझे भरोसा है। वे मोदी के विकास और न्‍यू इंडिया के आड़े कम से कम 2019 तक नहीं आएंगे क्‍योंकि इसी में उनकी भी भलाई है। हां, योगी के सामने एक चुनौती अवश्‍य होगी- गोरखनाथ मठ की समावेशी परंपरा के साथ हिंदुत्‍व की राजनीति का संतुलन बैठाना। मुझे लगता है कि अगर योगी का सामाजिक काम पहले की तरह चलता रहा, तो वे बड़ी आसानी से एक राज्‍य के प्रमुख के बतौर और एक मठ के महंत के बतौर अपनी दो अलहदा भूमिकाओं को खे ले जाएंगे। मुझे फिलहाल कहीं कोई लोचा नज़र नहीं आ रहा है योगी के चुनाव में। यह नरम हिंदू वोटरों को कट्टर हिंदुत्‍व समर्थक बनाकर एकजुट करने का एजेंडा है। योगी का आना हिंदुओं में लिबरल स्‍पेस का जाना है। असल लड़ाई यहां है। बशर्ते कोई लड़ सके।

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Akhilesh Singh योगी ..मोदी-2.0 होंगे…जैसे मोदी ..अटल-2.0 हुए थे …और वैसा ही गुणात्मक कंटिनुअम भी होगा …

विभांशु केशव इस मुद्दे पर लड़ेंगे तो जो कट्टर हो चुके हैं वो और कट्टर होते जायेंगे और फेसबुक व्हाट्स एप पर दौड़ने वाले मन्त्रों के सहारे दूसरों को भी कट्टर बनाते जायेंगे। केंद्र से लेकर राज्य सरकारों ने जो वादे किए हैं उन पर लड़ाई हो सकती है तब शायद जनता भी साथ खड़ी हो। जनता और कुछ विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त युवाओं के वैचारिक स्तर का पता लगा लेना चाहिये

Abhishek Srivastava फ़ोन पर बात करेंगे। यहाँ समझाने में बहुत लिखना पड़ेगा।

Majid Ali Khan अभिषेक जी क्या हिंदुत्व की संतृप्ति के लिए अहमदाबाद को दोहराए जाने की संभावना उत्तर प्रदेश में कहीं नज़र आ रही है या नहीं कुछ रौशनी डालें, यानी मुसलमानों का कुछ दिन खुलकर कत्लेआम हो और हिंदुत्ववादी वोटर संतुष्ट हो जाए और अपने आप को विजयी समझ कर शांति से रहता रहे

Abhishek Srivastava कुछ भी हो सकता है होने को तो, लेकिन हमें ऐसा लगता नहीं है कि कुछ दुर्दांत होगा। मने लगने का मामला है। अगर ज़रूरत लगेगी उन्हें तो उसे वे पूरी करेंगे। चूंकि ऐसा कुछ किये बगैर ही प्रचंड बहुमत है, तो हिन्दू वोटर आलरेडी संतुष्ट है। योगी के cm बनने से अब वो चैन की नींद सोयेगा की रामराज आ गया।

Poojāditya Nāth मुझे लगता है कि बाबा को साल भर में निपटा दिया जाएगा। मतलब राजनीतिक अंत हो जाएगा ताकि ये ज़्यादा फड़फड़ाए नहीं।

Abhishek Srivastava बाबा कौन है अगर आप समझते हैं तो ऐसा नहीं कहेंगे।

Akhilesh Pratap Singh सही है….लेकिन योगी के आने से पहले हिंदुओं में लिबरल स्पेस का घटना शुरू हो चुका है और केवल गोरखनाथ मठ की छवि की बात करें तो उसकी कथित लिबरल छवि की पोल अवैद्यनाथ के जमाने में ही खुल चुकी थी….बाकी ” समाजसेवी और शिक्षा प्रेमी ” तो मुख्तार अंसारी भी हैं और रघुराज प्रताप सिंह भी…..यह बात बिल्कुल सही है कि मोदी और योगी में अंतर्विरोध खोजना बेमतलब है……

Abhishek Srivastava मामला मठ की छवि का उतना नहीं है जितना मठ की परंपरा और छवि के बीच टकराव का है। हम मठ की परंपरा पर ज़ोर दें तो छवि बिगाड़ने वालों को नंगा कर सकते हैं, साथ ही हिंदू लिबरल स्‍पेस को भी बचा सकते हैं। दिक्‍कत यह है कि इस एंगिल से बात करने को कोई तैयार नहीं।

Akhilesh Pratap Singh अब कहां परंपरा…अब तो हिंदू का मतलब बीजेपी-आरएसएस समर्थक कमोबेश मान लिया गया है…यही बिल्ला हटाए न हट रहा….जबकि हिंदू वह है नहीं, जिसका ढोल पीट रहे हैं सब लोग…बहुत विनम्रता और धीरज की जरूरत है मनाने के लिए और मानने के लिए….लेकिन शोर इतना है और हर तरफ से शोर है कि हिंदू के बारे में बात करना बीजेपी के बारे में बात करना मान लिया जा रहा है…..डेडली साउंड मिक्सिंग

Abhishek Srivastava यह बिल्‍ला हटाने के लिए काम कौन कर रहा है? एक नाम गिनवाइए। दरअसल बुनियादी लड़ाई यहां है जहां से आप संघ को नाथ सकते हैं, लेकिन हमारे यहां लड़ने वालों को हिंदू और धर्म से ही परहेज है तो अल्‍ला खैर करे।

Akhilesh Pratap Singh लड़ने वालों को हिंदू और धर्म से परहेज है … 🙂

Abhishek Srivastava मजाक नहीं कर रहे, सीरियस हैं। क्‍यों नहीं कोई जाकर बताता जनता को कि हिंदू नाम की चिडि़या वेदों में नहीं है। कहीं नहीं है। जो है सनातन है। इनके हिंदुत्‍व के बरक्‍स सनातन धर्म को खड़ा करिए फिर देखिए कैसी हवा निकलती है।

Akhilesh Pratap Singh मजाक नहीं कर रहा….आप ठीक कह रहे हैं…लेकिन यह ऐसा प्रोजेकट है, जिसके लिए अपार धीरज की जरूरत है…चुनावी चिंता के पार जाने वाली नजर की…गांधी…गांधी…गांधी

Jaya Nigam योगी, मोदी के सक्सेसर हैं, 2024 के लिये, यह कैसे ?

Abhishek Srivastava वो ऐसे कि ऐसे के पीछे ऐसा ही होता है।

Shashank Dwivedi मनोज सिन्हा का पत्ता क्यों कटा?

Abhishek Srivastava राजनाथ सिंह से पूछिए

K Kumar योगी से योगी उनके समर्थक रोटी कपड़ा और मकान से पहले मंदिर की उम्मीद कर रहे हैं दादा। ऐसे में यदि योगी मोदी की राजनीति करेंगे तो उनका बेस खिसकेगा और योगी, योगी की राजनीति करते हैं तो मोदी धराशायी हो सकते हैं। बस अपना एक यह भी थीसिस है।

अभिषेक श्रीवास्तव का लिखा यह भी पढ़ सकते हैं….

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अनुशासन के मामले में लखनऊ का सचिवालय अब गोरखनाथ मठ की फ्रेंचाइज़ी बन जाएगा : अभिषेक श्रीवास्तव

Abhishek Srivastava : ‘उत्‍सव के नाम पर उपद्रव नहीं होना चाहिए’ – बतौर भावी मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ का यह पहला निर्देश प्रशासन के लिए आया है। रामगोपाल वर्मा की फिल्‍म ‘रक्‍तचरित्र-1’ का आखिरी सीक्‍वेंस याद करिए जब मुख्‍यमंत्री बनने के बाद रवि ने सभी बाहुबलियों को अपने घर खाने पर बुलाकर ज्ञान दिया था कि जंगल का राजा केवल एक होता है और राजा चूंकि वो है, इसलिए बाकी जानवर अब हुंकारना बंद कर दें। इस हिसाब से सोचिए तो उम्‍मीद बनती है कि अगला निर्देश मुख्‍यमंत्री पद पर शपथ ग्रहण के बाद उन लोगों के लिए आएगा जो प्रशासन को अपनी जेब में रखने का शौक पालते हैं यानी गुंडे, बदमाश और माफिया।

उत्‍तर प्रदेश नाम के जंगल में अब पशुता केंद्रीकृत होगी। इससे आम आदमी को थो़ड़ा राहत बेशक़ मिलेगी। गुजरात के सूरत में कुछ साल रहकर आया मेरा साला कल बता रहा था कि वहां अपराध, छिनैती, गुंडई बिलकुल गायब है और जनता चैन से रहती है। अपने काम से काम रखती है। यूपी की राजनीतिक सत्‍ता में धर्म और बाहुबल का यह विलय यूपी को गुजरात बनाएगा। यह एक भी मुसलमान को टिकट दिए बगैर केवल हिंदू वोटों से बहुमत की सरकार बनाने का स्‍वाभाविक विस्‍तार है। योगी अगर कुछ न करें, तो भी उनका नाम और चेहरा काफ़ी होगा। अनुशासन के मामले में लखनऊ का सचिवालय अब गोरखनाथ मठ की फ्रेंचाइज़ी बन जाएगा।

योगी एक साथ तीन चीज़ों की नुमाइंदगी करेंगे- राज्‍य के राजपूत-भूमिहार नेतृत्‍व बहुल धार्मिक मठों की; मज़बूत स्‍टेट की; और वर्ण व्‍यवस्‍था के मुताबिक रक्षक-धर्म की (आंतरिक और बाहरी खतरों से)। सवाल है कि विरोधी दल इस स्थिति से कैसे निपटेंगे? अगर जनता को ताकतवर स्‍टेट, योद्धा जाति से आने वाला सिपहसालार और धार्मिक मठों का रहनुमा तीनों चीज़ें एक पैकेज डील में मिल रही हैं, तो जनता स्‍टेट को कमज़ोर करने वालों को चारा क्‍यों डालेगी? कांग्रेस, सपा, बसपा, वाम, लिबरल, नागरिक समाज, एनजीओ, समाजवादी- किसी के पास इस फॉर्मूले की काट हो तो बताए।

तेजतर्रार पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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अखिलेश यादव को चेग्‍वारा बताने वाले ‘सोशलिस्‍ट फैक्‍टर’ के संपादक फ्रैंक हुजूर का अब क्या होगा!

Abhishek Srivastava : पेड़े कटहर ओठे तेल…! अभी मुख्‍यमंत्री तय हुआ नहीं और जनता सेटिंग-गेटिंग में जुट गई। लखनऊ में मार मची है पत्रकारों की। कोई मनोज सिन्‍हा की उम्‍मीद में डेरा डाले हैं तो कोई राजनाथ रामबदन का बगलगीर होने की फि़राक़ में है। किसी को ज़मीन छ़ुड़वानी है, किसी को ज़मीन लिखवानी है, किसी को विज्ञापन लेना है, किसी को ठेका चाहिए, कोई गैस एजेंसी और पेट्रोल पंप का मारा है तो कोई अपने स्‍कूल की मान्‍यता के लिए छटपटा रहा है।

सबसे मज़ेदार हालत उन पत्रकारों-संपादकों की है जो साइकिल से चल रहे थे और मुलायम समाजवाद का झंडा ढो रहे थे। समाजवाद पार्ट टू में इन सब ने अखिलेश का दाम थाम लिया था। लगातार अपनी पत्र-पत्रिकाओं से गठबंधन की जीत की मुनादी करते रहे लेकिन कोई दवा काम न आई। अब ये सभी अपने पुराने संघी रिश्‍तों को खंगाल रहे हैं। शुक्रवार की नमाज़ सोमवार की शिव चर्चा में बदल गई है। बहनजी के इर्द-गिर्द तो वैसे भी पत्रकार कम ही रहते हैं। उनके लाभार्थी भी शायद मीडिया में खोजे न मिलें। फिर भी जिन्‍होंने उनकी जीत की भविष्‍यवाणी की थी, वे सबसे अक्‍खड़ निकले। सब ईवीएम पर लपटे हुए हैं और किसी ने भी अपना ईमान नहीं बेचा है। एक यही अच्‍छी बात है।

एक और अच्‍छी बात यह है कि कुछ मित्रों ने लाभ तो लिया यूपी सरकार से लेकिन मंच पर बैठाया केंद्र सरकार के लोगों को, इसलिए वे पांच साल और आराम से काटेंगे। अपने मीडिया में छोटे-छोटे हेमंत तिवारी बहुत भरे पड़े हैं जो हर जगह एडजस्‍ट कर लेते हैं। जाति नहीं तो क्षेत्र ही सही, कोई भी वाद हो। फिलहाल मुझे गुलाबी कोट वाले फ्रैंक हुजूर की याद आ रही है। मुलायम को फिदेल और अखिलेश को चे ग्‍वारा बताने वाले सोशलिस्‍ट फैक्‍टर का क्‍या हुआ भाई? लखनऊ से कोई ख़बर दे।

मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार है….

अजात अभिषेक : हुजूर फर्जी डाटा के भरोसे अखिलेश को कोर्ट में बेइज्जत कराने वाले थे लेकिन शायद किसी समझदार आदमी ने सही समय पर अखिलेश को ऐसा करने से रोक दिया।

Vishnu Narayan : ई फैक्टर त बम्मई तक पहुंच जाता है…

Majid Ali Khan : अब फुर्सत में बिल्लियों से खेलेंगे हुज़ूर भाई

Abhishek Srivastava : बिल्‍ली शेर की मौसी है और शेरवा का राज आ गया है। वो भी फटकने नहीं देगी फ्रैंक यादव को।

Majid Ali Khan : फ्रैंक भाई ने बहुत सारी बिल्लियां पाली हुई थी, मैं गया हूं उनके रिहाइश पर दिलकुशा कालोनी में

Abhishek Srivastava : अब सारी बिल्लियां अपने भांजे के यहां भाग जाएंगी कालिदास मार्ग

नवनीत चतुर्वेदी : वाह, अभिषेक जी गजब लिखहड़ है आप, एक ठो यशभारती देना चाहिए आपको, कसम से हम दे देते यदि देना हाथ में होता तो। लिखते रहिये..

Abhishek Srivastava : आप खाली बात करते हैं महराज। यश भारती तो दूर, अपने प्रोग्राम में एक बार भी नहीं बुलाए जो आपके हाथ में है। महीने का कुछ खर्चा ही निकाल देते इसी बहाने।

Manoj Pandey : यशभारती लायक बता कर नई सरकार को ईशारा किया जा रहा है अभिषेक भाई…..नवनीत जी चिन्हावत हवे…

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बीईए जैसी संस्‍थाओं को अब भंग कर दिया जाना चाहिए

Abhishek Srivastava : 14 सितंबर को समाचार चैनलों पर दो दिलचस्‍प हेडलाइनें चल रही थीं। एक में बताया जा रहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस को गोवा के मसले पर ‘फटकार’ दिया है। संवैधानिक व्‍यवस्‍था कहती है कि राज्‍यपाल सबसे पहले सबसे बड़ी पार्टी को बुलाएगा सरकार बनाने के लिए। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस की याचिका पर उससे पूछा है कि उसने अपनी लिस्‍ट राज्‍यपाल को पहले क्‍यों नहीं दी। सब इसे सुप्रीम कोर्ट की ‘’डांट’ या ‘फटकार’ बताकर चला रहे थे। आजतक पर रिपोर्टर अहमद अज़ीम ने डांट-फटकार की कोई बात नहीं कही, लेकिन ऐंकर सईद लगातार ‘डांट-फटकार’ बोले जा रहे थे।

दूसरी हेडलाइन यह है कि कोयम्‍बटूर में संघ की बैठक में तय होगा उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री का नाम। संविधान कहता है कि चुना हुआ विधायक दल अपने नेता का चयन करेगा। समाचार चैनल इसे भी भूल गए हैं। पूरे उत्‍साह से बताया जा रहा है कि मोहनजी भागवत कोयम्‍बटूर में तय करेंगे कि कौन होगा विधायक दल का नेता और मुख्‍यमंत्री। अब यह बताने की कोई ज़रूरत नहीं कि भागवतजी कौन हैं। चैनलों ने उन्‍हें जनता का बाइ डिफॉल्‍ट प्रधान प्रतिनिधि मान लिया है।

टीवी के एक संपादक होते थे एन.के. सिंह। अपनी मेज़ पर वे हमेशा संविधान की एक प्रति रखते थे। इंटरव्‍यू में पत्रकारों से संविधान से जुड़े सवाल करते थे। वे आजकल ब्रॉडकास्‍ट एडिटर्स असोसिएशन (बीईए) के महासचिव बताए जाते हैं। टीवी चैनलों को संवैधानिक मूल्‍यों के दायरे में खबर दिखाना और असंवैधानिक खबरों से परहेज़ करना वे नहीं सिखा पाए। बीईए ने 31.08.2013 को आखिरी प्रेस रिलीज़ जारी की थी। ऐसी संस्‍थाओं को अब भंग कर दिया जाना चाहिए।

मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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2009 में कांग्रेस जीती थी तो बीजेपी के बड़े नेताओं ने EVM का रोना रोया था, देखें सुबूत

Abhishek Srivastava : सबसे ऊपर बीजेपी के प्रवक्ता जी वी एल नरसिम्हा राव हैं जिन्हें आप दिन रात टीवी पर देखते हैं। नीचे एक किताब का कवर है जो इन्होंने लिखी है और उस किताब की भूमिका लालकृष्ण आडवाणी ने, जो अब मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा हैं पार्टी में।

जीवीएल नरसिम्हा राव की यह पुस्तक, ‘Democracy at Risk/Can We Trust Our Electronic Voting Machines?’ 2010 में प्रकाशित हुई थी जिसमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन द्वारा की जाने वाली धोखाधड़ी का खुलासा किया गया है। इसकी प्रस्तावना एलके आडवाणी ने लिखी है और इन दोनों विद्वानों ने मांग की है कि दुनिया के तमाम विकसित देशों की ही तरह EVM से मतदान बंद कराया जाय या इसके साथ अमेरिका की तरह Voter Verified Paper Audit Trail (VVPAT) प्रणाली की व्यवस्था की जाय।

इसलिए बीजेपी प्रेमी मित्रों, ये मत समझियेगा कि केवल बीजेपी के जीतने पर ही EVM का रोना रोया जाता है। 2009 में कांग्रेस जीती थी तो इतने बड़े राष्ट्रवादी नेताओं को किताब लिखनी पड़ गयी थी। इनसे उखड़ा कुछ नहीं, ये अलग बात है। ज़ाहिर है, अब मायावती भी क्या कर लेंगी! कहने का मतलब केवल इतना है कि ईवीएम को लेकर चिंताएं सुस्थापित हैं, स्वीकार्य हैं और कतई भाजपा विरोधी नहीं हैं।

जो कोई EVM पर सवाल उठा रहा है उसे लोकतंत्र की चिंता है। बीजेपी को 2010 में लोकतंत्र की चिंता थी। आज मायावती को है। मज़ा ये कि सत्ता में पहुँचते ही सबके लिए EVM ठीक हो जाता है। शायद इसीलिए EVM कभी ठीक नहीं हो पाता और मज़ाक बन कर रह जाता है।

(पुस्तक की सूचना Anand Swaroop Verma से प्राप्त मेल के सौजन्य से)

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आजमगढ़ में एक गाँव है तमौली। नेताजी मुलायम सिंह यादव का गोद लिया गाँव है सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत। यहाँ 90 फीसदी यादव हैं और 10 फीसदी दलित। यहां एक भी यादव वोट छिटकता नहीं है, सब सपा को जाता है। आँख बंद कर के। हम लोग जब गाँव गए थे, तब वहां एक यज्ञ चल रहा था। नेताजी के कुनबे में अमन कायम करने के लिए भी यहाँ यज्ञ हुआ था।

थोड़ी देर पहले ग्राम प्रधान से मेरी बात हुई। बता रहे थे कि ज़बरदस्त भितरघात हुआ है। कुल 300 दलित वोट में से 150 भाजपा को गए और 200 यादव वोट भी कमल के फूल पर चले गए। प्रधान बता रहे थे कि बगल के गाँव मुल्लापुर में भी 200 वोटों का खेल हुआ है। उनके मुताबिक हर गाँव में 200 वोट मैनेज किये गए हैं। सहारनपुर, देवबंद आदि से भी ऐसी खबरें हैं।

EVM में गड़बड़ी की बात हम लोग लंबे समय से करते रहे हैं, लेकिन हमारा सवाल हमेशा हास्यास्पद हो जाता है क्योंकि उधर से पूछ लिया जाता है- यूपी में गड़बड़ी हुई तो पंजाब में क्या? लोकसभा में गड़बड़ थी तो दिल्ली का क्या? EVM पर सेलेक्टिव विमर्श हारने वाले पक्ष को हास्यास्पद बना देता है। बावजूद इसके शिकायतें हैं और धीरे-धीरे आ भी रही हैं। लोकसभा चुनाव में भी कई बूथों से गड़बड़ी की शिकायत आयी थी, लेकिन उन पर किसी ने ठोस संज्ञान नहीं लिया। बनारस में तीन लाख बोगस वोट निकले थे लेकिन अरविन्द केजरीवाल की कुव्वत नहीं थी कि वे राजनारायण जैसा साहस दिखाते।

हार-जीत के सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण के साथ ज़रूरी यह भी है कि अलग-अलग बूथों से आ रही शिकायतों को डॉक्यूमेंट किया जाए। Pavan Geeta Dahat बता रहे थे कि महाराष्ट्र के चुनाव में भी ऐसी गड़बड़ियों को लेकर कुछ मुक़दमे कायम हैं। अगर यूपी के लिए इस काम की ज़िम्मेदारी कोई समूह या संगठन ले सके, तो अलग-अलग मामलों को मिला कर एक जनहित याचिका की शक्ल दी जा सकती है।

पत्रकार संदिग्ध मामलों को जुटाएं, सामाजिक संगठन PIL बनाएं और सरोकारी अधिवक्ता मुकदमा अपने हाथ में लें, तो शायद कुछ सार्थक बात बने वरना ठोस साक्ष्य होते हुए भी EVM का रोना रोने वाले खिसियानी बिल्ली करार दिए जाएंगे और लोकतंत्र के मशीनी कुंड में ऐसे ही जनादेश की आहुति जारी रहेगी।

मीडिया एनालिस्ट अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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सिद्धार्थ वरदराजन की वेबसाइट दि वायर पर ‘जन की बात’ कर रहे विनोद दुआ

एक जमाने में विनोद दुआ का नाम चलता था। उनकी चुनावी रेल को एक दिन न देखिए तो लगता था ज़रूरी ख़ुराक छूट गई। उनकी सधी हुई भाषा, दो शब्‍दों के बीच का मौन, मीठा तंज और सहज विश्‍लेषण भारत में टीवी के इतिहास की विरल परिघटनाओं में से एक कहा जा सकता है। आज उनकी सांस उखड़ रही है, तंज गायब है, ओढ़ी हुई गंभीरता उनकी बात का वज़न कम कर रही है। सिद्धार्थ वरदराजन की वेबसाइट दि वायर पर मंगलवार से शुरू हुआ उनका वीडियो कार्यक्रम जन की बात दो दिन में ही हांफने लगा है।

‘जन की बात’ पर आगे बढ़ने से पहले हमें यह जानना बहुत ज़रूरी है कि दि वायर के जनवादी इंजन में किसका तेल फुंक रहा है। उसी से कंटेंट की दिशा भी तय होगी। दि वायर जिस कॉरपोरेट दबाव से मुक्‍त पत्रकारिता का दम भर रहा है, सबसे पहले उस पर सवाल उठाना बहुत ज़रूरी है। बेशक इस वेबसाइट में किसी कारोबारी खानदान का निवेश सीधा नहीं है, लेकिन इसे 1.95 करोड़ का अनुदान देने वाला इंडिपेंडेंट एंड पब्लिक स्पिरिटेड मीडिया फाउंडेशन उन्‍हीं कारोबारी घरानों से पैसे लेता है जो दाएं या बाएं से दूसरे संस्‍थानों में निवेश करते आए हैं।

आमिर खान, अज़ीम प्रेमजी, साइरस गुज्‍दर, किरण मजूमदार शॉ, लाल फैमिली फाउंडेशन, मणिपाल समूह, पिरामल एंटरप्राइजेज, पिरोजशा गोदरेज फाउंडेशन, क्‍वालिटी इनवेस्‍टमेंट, विदिति इनवेस्‍टमेंट, जनता की जासूसी करने वाले आधार कार्ड के सर्वेसर्वा रहे नंदन नीलकेणि की पत्‍नी रोहिणी नीलकेणि, विदिति इनवेस्‍टमेंट कुछ ऐसे नाम हैं जो फाउंडेशन को पैसा देते हैं। फाउंडेशन इसके बदले में जनता से जुड़े अच्‍छे कामों के लिए मीडिया संस्‍थानों को अनुदान देता है।

जब से कॉरपोरेट सोशल रेस्‍पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के मद में आय की एक निश्चित रकम सामाजिक कार्यो में लगाने की अनिवार्यता कारोबारी घरानों को हो गई है, तब से एक खेल ने तेजी पकड़ी है। आम तौर से सभी कारोबारी घराने अपने नाम से एक फाउंडेशन या धर्मार्थ संस्‍था खोल चुके हैं। अगर आप एनडीटीवी को ध्‍यान से देखते हों तो उसके रेवेन्‍यू मॉडल में ऐसे घरानों के सीएसआर का एक बड़ा हिस्‍सा लिप्‍त है। टोयोटा से लेकर वेदांता और पिरामल तक सारे घराने समाजसेवा के नाम पर मीडिया में पैसे लगा रहे हैं।

दि वायर भी वहीं से पैसे ले रहा है और उसके दम पर कॉरपोरेट दबाव से मुक्‍त पत्रकारिता का दावा कर रहा है। दावे की सच्‍चाई ‘जन की बात’ के पहले एपिसोड में ही खुल जाती है जब कुल नौ मिनट के एपिसोड में सिद्धार्थ वरदराजन पूरा एक मिनट एफसीआरए के मुद्दे पर खर्च करते हैं। एफसीआरए यानी एनजीओ को मिलने वाले विदेशी अनुदानों को नियंत्रित करने वाला भारतीय कानून। चूंकि इस कार्यक्रम में तीन वक्‍ता थे- विनोद दुआ, एमके वेणु और सिद्धार्थ, तो हर के खाते में औसतन तीन मिनट आते हैं। अपने तीन मिनट में से एक मिनट यानी एक तिहाई एफसीआरए पर खर्च करना सवाल खड़ा करता है क्‍योंकि इस देश के 70 फीसदी गरीब-गुरबा ‘जन’ का इस मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं है।

विनोद दुआ ने पहले एपिसोड में सिद्धार्थ से सवाल किया था कि मीडिया किन मुद्दों को छोड़ दे रहा है। सिद्धार्थ ने 2014 से गिनवाना शुरू किया तो उन्‍हें दो बातें याद आईं। पहला अमित शाह के खिलाफ़ तुलसी प्रजापति और कौसर बी की हत्‍या में संलिप्‍तता वाला मुकदमा और उसके बाद एफसीआरए। अफ़सोस कि वे बस्‍तर और छत्‍तीसगढ़ को भूल गए जहां नंदिनी सुंदर समेत कई एक्टिविस्‍टों पर फर्जी मुकदमे लादे गए, सरेआम पुतले जलाए गए और मीडिया ने चूं तक नहीं की। उन्‍हें विदर्भ और मराठवाड़ा के किसान नहीं याद आए। उन्‍हें श्रम कानूनों में बदलाव की याद नहीं आई जिसे मीडिया ब्‍लैकआउट कर चुका है। उन्‍हें मथुरा का जघन्‍य गोलीकांड याद नहीं आया जिसे समाजवाद के नाम पर मीडिया पचा गया। उन्‍हें याद आया तो एफसीआरए। इसे एजेंडा सेटिंग न कहें तो और क्‍या कहा जाए?

दूसरे एपिसोड में दैनिक जागरण के एग्जिट पोल के बहाने फिर से मीडिया पर बात हुई। उसके अलावा राजनीति के अपराधीकरण पर बात की गई। ये दोनों ही विषय कारोबारी घरानों के हितों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। ठीक एक दिन पहले बुधवार को सिद्धार्थ ने इस प्रकरण पर अपनी वेबसाइट पर एक स्‍टोरी की थी जिसमें इकनॉमिक टाइम्‍स की पत्रकार रोहिणी सिंह के हवाले से बताया था कि 12 फरवरी को लखनऊ में हुई अमित शाह की प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में देवेंद्र कुमार नाम का वह व्‍यक्ति भाजपा नेताओं के साथ मौजूद था, जिसकी कंपनी रिसर्च एंड डेवलपमेंट इनीशिएटिव पर जागरण का एग्जिट पोल कराने का कथित आरोप है।

सिद्धार्थ ने लिखित स्‍टोरी में देवेंद्र कुमार के अरुण जेटली और वसुंधरा राजे से करीबी रिश्‍ते गिनाए थे। सवाल उठता है कि वीडियो में वे इस बात को क्‍यों दबा गए। उन्‍होंने आखिर इस बात को क्‍यों नहीं कबूला कि उनकी जिस स्‍टोरी पर चुनाव आयोग ने संज्ञान लेकर जागरण के खिलाफ एफआइआर की, उसी स्‍टोरी के आधार पर एक गलत कंपनी के खिलाफ भी एफआइआर कर दी गई जिसे बाद में स्‍टोरी में दुरुस्‍त किया गया।

क्‍या लिखने की बातें और होती हैं, कहने की बातें और?

पहले एपिसोड में एमके वेणु नोटबंदी पर बात कर रहे थे। उसमें कुछ भी नया नहीं था। वही सब जो बीते डेढ़ महीनों में बार-बार दुहराया गया है। विनोद दुआ भी इसमें कोई नया आयाम नहीं जोड़ पाए। अंत में वे फैज़ अहमद फैज़ की रचना सुनवाकर चल दिए। बस एक चूक हो गई उनसे।

क्‍या फैज़ जनकवि हैं, जैसा कि दुआ ने कहा? फैज़ को जनकवि कहने की गुस्‍ताखी कैसे कोई कर सकता है? इससे भी बड़ा ब्‍लंडर ये हुआ कि मंगलवार यानी 14 फरवरी को प्रसारित प्रोग्राम की इस पहली कड़ी में विनोद दुआ ने कह डाला कि आज फैज़ की सालगिरह है। सालगिरह एक दिन पहले थी। जाहिर है, प्रोग्राम की रिकॉर्डिंग सोमवार को हुई रही होगी तो उसके हिसाब से उन्‍होंने कहा होगा, लेकिन प्रसारण तो मंगलवार को हुआ!

अच्‍छा हुआ कि दूसरी कड़ी में विनोद दुआ ने गीत नहीं बजाया। बात सीधे खत्‍म हो गई। वैसे एक बात समझ में नहीं आई। विनोद दुआ ने शशिकला पर जो सवाल उठाया, उसका मतलब क्‍या था। वे कह रहे थे कि शशिकला मुख्‍यमंत्री क्‍यों बनेंगी? क्‍या सिर्फ इसलिए कि वे जयललिता की केयरटेकर थीं? मुझे नहीं याद है कि उन्‍होंने प्रतिभा पाटील के राष्‍ट्रपति बनने पर या राबड़ी देवी के मुख्‍यमंत्री बनने पर यह सवाल खड़ा किया था या नहीं। हो सकता है ईमानदारी से किया रहा हो।

शशिकला को मुख्‍यमंत्री आखिर कौन नहीं देखना चाहता था? ज़ाहिर है, केंद्र सरकार और बीजेपी। इसमें विनोद दुआ और दि वायर पार्टी क्‍यों बन रहा है? अगर आपकी दलील कुछ और है तो समझ में आता है वरना लोकतंत्र में जन प्रतिनिधि होने के लिए न तो जनरल नॉलेज दुरुस्‍त होना जरूरी होता है और न ही यह ज़रूरी है कि आपने पहले से चुनाव जीता हो। मनमोहन सिंह को याद कर लीजिए। अरुण जेटली पर तो कभी सवाल नहीं किया गया कि वे अमृतसर से चुनाव हार कर भी क्‍यों देश की तकदीर के नियंता बने बैठे हैं। फिर शशिकला को तो अभी चुनाव में जाना था। हो सकता है वे बम्‍पर मतों से जीत कर आतीं।

‘जन की बात’ अगर ऐसे ही चला तो नहीं चल पाएगा। सिद्धार्थ वरदराजन को संपादकीय लाइन तय करनी होगी और लिबरल एनजीओवादियों के पक्ष वाली एजेंडा सेटिंग छोड़नी होगी। विनोद दुआ वैसे भी अब बुजुर्ग हो चले हैं। इस उम्र में उनकी बाईं हथेली पर रची लाल मेंहदी अच्‍छी नहीं लगती। इस आखिरी ठिकाने पर उन्‍हें अगर भद्द नहीं पिटवानी है तो एनडीटीवी के दौर वाले तेवर को बहाल करें, वरना उनका यह कार्यक्रम एक बार जन के नाम पर धोखा साबित होगा।

उन्‍हें भूलना नहीं चाहिए कि उनके टीवी करियर की शुरुआत दूरदर्शन के जिस जिस कार्यक्रम से हुई थी, उसमें भी जन जुड़ा था। अब जन इतना मूर्ख नहीं रहा कि उसे कोई भी चरा ले जाए। जन बदल चुका है। उम्‍मीद है कि तीसरे एपिसोड में कार्यक्रम थोड़ा पटरी पर आ जाए। विनोद दुआ से अब भी हमारे जैसे अनुजों को उम्‍मीदें हैं, क्‍योंकि बात कहने का सलीका तो उन्‍हें ही आता है। उन्‍हें अपने मुरीदों का खयाल रखना चाहिए।

लेखक अभिषेक श्रीवास्तव चर्चित मीडिया विश्लेषक और सोशल एक्टिविस्ट हैं.

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पुण्य प्रसून वैसे तो ऐसे ही हैं, लेकिन कभी-कभी चुपचाप अपना काम कर जाते हैं

Abhishek Srivastava : महीनों बाद आज घंटे भर के लिए टीवी खोला तो देखा, चारों ओर जंग का माहौल है। इस बीच दस बजे पुण्‍य प्रसून हाथ मलते हुए अवतरित हुए तो मीर की याद के साथ। उनके पीछे परदे पर लिखा था, ”आगे-आगे देखिए होता है क्‍या…।” जंग के माहौल के बीच इश्‍क़ की बात करना गुनाह है, लेकिन उन्‍होंने संदर्भ-प्रसंग सहित मीर के इस मशहूर शेर की न सिर्फ व्‍याख्‍या की, बल्कि महेश भट्ट के जन्‍मदिन पर जाते-जाते ज़ख्‍म का गीत भी सुना दिया- तुम आए तो आया मुझे याद…!

क्‍या? ”लव इन दि टाइम ऑफ कॉलरा”! मार्खेज़! गली या चांद नहीं। प्रसून वैसे तो ऐसे ही हैं, लेकिन कभी-कभी चुपचाप अपना काम कर जाते हैं। पत्रकार जैसे भी हों, आदमी ज़हीन जान पड़ते हैं। सॉरी, ज़हीन नहीं… जहीन! जाहिर है, जाहिर है।

मीडिया विश्लेषक और एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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अनुराग कश्यप इस समाज को ज्‍यादा विद्रूप, जघन्‍य, असंवेदी, हिंसक, असहिष्‍णु और मनोविकारी बनाने के लिए याद किए जाएंगे

Abhishek Srivastava : Raman Raghav 2.0 को अगर उसके दार्शनिक आयाम में समझना हो, तो Slavoj Žižek को पढि़ए। इसे अगर आप कमर्शियल सिनेमा मानकर देखने जा रहे हों तो बीच के मद्धम दृश्‍यों में सोने के लिए तैयार रहिए। इस फिल्‍म में रमन का किरदार Badlapur (film) में लियाक़ के किरदार का एक्‍सटेंशन है। लोकप्रियता के लिहाज से भले ही इसे साइको-थ्रिलर का नाम दिया जा रहा हो, लेकिन यह बुनियादी तौर पर एक राजनीतिक फिल्‍म है जो एक आदतन अपराधी को हमारे समाज में मौजूद तमाम किस्‍म के अपराधियों के ऊपर प्रतिष्‍ठापित करती है। इस हद तक, कि फिल्‍म के अंत में रमन बोधिसत्‍व की भूमिका में आ जाता है- बोधिसत्‍व यानी निर्वाण का वह चरण जहां आपका कुकर्म कोई बुरी छाप नहीं छोड़ता, बल्कि आप दूसरे के कुकर्मों से उनको बरी करने की सलाहियत हासिल कर लेते हैं।

नैतिकता के स्‍तर पर देखें तो यह फिल्‍म बेहद अनै‍तिक और विद्रूप है- Anurag Kashyap की उधार और खिचड़ी शैली की एक विशिष्‍ट फिल्‍म, जिसमें अपराध के संगीनतर होते जाने के साथ उसका बोध खत्‍म होता जाता है। हर संगीन अपराध एक बीथोवन की सिम्‍फनी-सा सहज गुज़र जाता है। दो लोगों का क़त्‍ल करते हुए मुर्गा-चावल खाना और डकार मार के झटके में तीसरा क़त्‍ल कर देना अनुराग के ही बस की बात है। फिल्‍म निर्माण की दृष्टि से यह थोड़ा हटकर बेशक है, लेकिन एक अतीत के वास्‍तविक पात्र पर केंद्रित होने के नाते बायोपिक जैसी बनकर रह जाती है।

मुझे लगता है कि आज से बीस साल बाद इस समाज में हर किस्‍म की हिंसा के प्रति लोगों के पत्‍थरदिल होते जाने की वजहें जब खोजी जाएंगी, तब अनुराग कश्‍यप की फिल्‍में शोध का विषय होंगी। अनुराग बेहतर फिल्‍मकार होंगे, लेकिन फिल्‍मों का अगर थोड़ा भी असर समाज पर पड़ता होगा तो वे इस समाज को और ज्‍यादा विद्रूप, जघन्‍य, असंवेदी, हिंसक, असहिष्‍णु और मनोविकारी बनाने के लिए इतिहास में याद किए जाएंगे।

फिल्म और मीडिया समीक्षक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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