एबीपी न्यूज के रिपोर्टर और एंकर अपनी मूर्खता का मुजाहिरा कर रहे हैं!

Shishir Soni : जिस तरह से @ABPNewsHindi के रिपोर्टर एंकर #AmritsarTrainAccident के बहाने अपनी मूर्खता का मुजाहिरा कर रहा है वो पत्रकारिता के लिए बड़ा कलंक है। सवाल ऐसे उठाया जा रहा है जैसे नवजोत कौर ने लोगों को पटरी पर खड़ा कर कटवा दिया। सवाल डीएम एसपी के सस्पेंशन का उठना चाहिए। निश्चिततौर पे ये आरामतलब नौकरशाह होंगे जिन्हें उनके क्षेत्र में एक जगह पर इतनी भीड़ जमा होने की जानकारी नहीं मिली। जानकारी मिली होती तो कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रशासनिक मंजूरी ली गयी या नहीं उन्हें ये भी पता होता। Continue reading

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अभिसार शर्मा की भी एबीपी न्यूज ने छुट्टी कर दी

पुण्य प्रसून बाजपेयी के बाद अभिसार शर्मा की भी एबीपी न्यूज ने छुट्टी कर दी. इसकी पुष्टि खुद अभिसार ने की है. मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े करने वाले शोज के चलते एबीपी न्यूज प्रबंधन अपने दो वरिष्ठ पत्रकारों पुण्य प्रसून और अभिसार से खौफजदा था. आरोप है कि सत्ता के शीर्षस्थ लोगों के इशारे पर एबीपी न्यूज प्रबंधन ने पहले पुण्य प्रसून और अब अभिसार को अपने यहां से अलग कर दिया है. Continue reading

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चित्रा त्रिपाठी और एबीपी न्यूज चैनल के नाम पर कुछ ठग लोग जमकर उगाही कर रहे

पटना : ये हैरत की बात नहीं तो और क्या है कि मीडिया समाज के अंदर छिपे गुनाहगारों को सामने लाती है लेकिन उसी मीडिया के नाम पर अब ठगी का काम जोरों पर जारी है। देश के नामचीन चैनल एबीपी न्यूज चैनल और वहां कार्यरत एक वरिष्ठ पत्रकार के नाम पर बेहद शातिर ढंग से ठगी का खेल जारी है। Continue reading

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आउटलुक ने तो एबीपी समूह की कह के ले ली!

Braj Mohan Singh : OUTLOOK has shown real guts to publish this letter after 600-700 journalists were sacked in a very unethical manner @telegraph. In fact, how many did show this courage to highlight the plight of journalists? How many press clubs decided to take out protest rallies? And in which cities?

Entire media & media fraternity are facing similar situation in english and language papers. Future looks gloomy as cash flow has stopped pouring, bad management and unethical practices have ruined many lives. Be ready for bloodbath and unholy handshakes in media houses in 2017. Its gonna be hell.

पत्रकार ब्रज मोहन सिंह की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आया एक पठनीय कमेंट यूं है जो आउटलुक समूह की पोल खोलता है…

Sekar Narayanan : Will Outlook have the same guts to publish/interview sacked staff (including journalists) of Marie Claire, People and other magazines shut down by them. Veey wasy to shoot from someone else’s shoulder.


दरअसल आउटलुक ने एबीपी ग्रुप से निकाले गए पत्रकार बिश्वजीत की उस लंबी खुली चिट्ठी का प्रकाशन किया है जो उनने फेसबुक पर पोस्ट किया था… चिट्ठी मूलत: अंग्रेजी में है जिसका हिंदी रूपांतरण नीचे दिया जा रहा है…. पढ़िए क्या लिखा बिश्वजीत ने अपने लेटर में-

मैंने ABP ग्रुप के 700 अन्य कर्मचारियों की तरह दबाव में आकर टेलीग्राफ से रिज़ाइन कर दिया है. मेरे अलावा 17 जिलों में कार्यरत 22 अन्य पत्रकारों ने टेलीग्राफ से इस्तीफ़ा दिया है. ABP ने मुझे इस्तीफ़ा लिखने का भी मौका नहीं दिया, पर मेरा साइन ज़रूर लिया. कंपनी ने इतने कर्मचारियों के निकाले जाने के बारे में कुछ भी मेंशन नहीं किया. जब मैं साइन कर रहा था तो मुझे कोई लिखित आश्वासन नहीं दिया गया कि मेरे Package का क्या होगा और मेरा बकाया मुझे मिलेगा कि नहीं. मेरे सीनियर ने इस पर Countersigned किया, पर जैसा कि मेरे कॉन्ट्रैक्ट में लिखा था कि मुझे निकाले जाने की वजह बताई जाएगी, वो नहीं बताई गई. जॉब से रिज़ाइन करने का दबाव मुझ पर इस महीने की शुरुआत से ही दिया जाने लगा था. हालांकि मेरा कार्यभार 1 मार्च को खत्म होगा, पर ऑफिस के कंप्यूटर से मेरा एक्सेस हटा दिया गया, ताकि मुझे पता चल जाये कि मैं वहां के लिए अब बिलकुल बेकार हूं.

इतना ही नहीं, मुझे अपना स्वाइप कार्ड जमा करने को कहा गया. साथ ही मुझे ये कहा गया कि अगर मैं उनकी बात नहीं मानूंगा, तो मेरा बकाया नहीं दिया जाएगा. अब मुझे अपने ही ऑफिस में बाहरी बन कर रहना पड़ता है, मुझे HR टीम से मिलने के लिए फ़ोन करके अपॉइंटमेंट लेना होता है. मुझे सालों तक यहां अपनी कर्तव्यनिष्ठा का ये फ़ल नसीब हुआ है. मुझसे ऐसी कंपनी पर विश्वास करने को कहा जाता है, जिसे अपनी फाइनेंशियल क्राइसिस से लड़ने के बजाय अपने Staffs को निकाल फेंकने में समझदारी लगी. हमें कोई सम्मानजनक विदाई भी नहीं मिली, बल्कि किसी आम ऑडियंस की तरह एक लिस्ट पकड़ा दी गई, जिसमें बाहर जाने वालों का नाम लिखा था. शायद इसके पीछे भी कोई कारण रहा होगा कि हमारी कोई मदद न कर सके.

हम कभी उनकी उस पवित्र जगह तक नहीं पहुंच पाए, जहां हमारे ये उपदेवता हमें पहुंचाना चाहते थे. इस जगह पर जो सबसे बड़ा पुजारी है, वो किसी हत्यारे जैसा बर्ताव करता है. पर असल बात ये है कि उन्हें पता ही नहीं कि तलवार उन पर भी लटक रही है. जो पहले निडरता से किसी मुद्दे की बात करते थे, अब बड़ी मुश्किल से अपने बॉस से बात कर पाते हैं. अगर प्रोफेशनलिज्म का मतलब उनके लिए इस बात से है कि चुपचाप उनकी बात मान ली जाए, तो उन्हें मेमने और भेड़ के बच्चों की चरवाही शुरू कर देनी चाहिए. उन्हें मेरी कोई ज़रूरत नहीं होनी चाहिए. उनके लिए सबसे आसान है मोदी, ट्रंप और ममता पर आरोप लगाना कि वो मीडिया को कण्ट्रोल करने की कोशिश में लगे हैं. ये डर और चुप्पी बड़ी ख़तरनाक है. मैं अपना सिस्टम लॉक होने की वजह से अपने Colleagues को विदाई की ख़बर भी न दे पाया. मैं सबसे मिलकर जाना चाहता था, पर वहां की चुप्पी ने मुझे खाली लौटा दिया. रिसेप्शन वाली लड़की ने Good Bye ज़रूर कहा.

हमारे समुदाय के Leaders की कायरता भी मीडिया Owners की तानाशाही बढ़ाने की ज़िम्मेवार है. रिटायरमेंट से कुछ दिन पहले ही निकाले गये ऐसे ही एक पत्रकार ने जब कहा कि हम क्या कर सकते हैं, तो मुझे उनकी कायरता का एहसास हो गया. क्या एक ऐसा आदमी, जो अपने करियर की समाप्ति पर खड़ा हो, ऐसा जवाब दे सकता है?

कोलकाता प्रेस क्लब ने भी पत्रकारों पर होने वाले हमले के खिलाफ़ मोर्चा निकाला और कई प्रेस मीटिंग्स कैंसिल कर दीं, पर इतने व्यापक पैमाने पर हुए टर्मिनेशन के विरोध में मैंने प्रेस क्लब को कभी विरोध करते नहीं देखा. मुझे अपने 30 साल के करियर में ऐसा कभी देखने को नहीं मिला कि प्रेस क्लब ने किसी मीडिया मुग़ल के खिलाफ़ आवाज़ उठाई हो.

लोकतंत्र के कई रक्षक अपने मालिक की थपथपी पाने के लिए उनके विरोधियों पर भौंकते रहे हैं. पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि वो अपने क्रूर और निर्दयी मालिकों पर भौंके हों. हां, इतना ज़रूर होता है कि मालिक बदलने के बजाय, वो शाम होते ही अपना शोक को दारु से दूर करने की कोशिश ज़रूर करते हैं. अगर हम इनको ऐसे ही फॉलो करते रहे, तो ऐसी दोगली प्रजाति वालों की और चाटुकारों की संख्या बढ़ती जाएगी और मालिकों का विरोध होना बंद हो जायेगा. मेरी तो कॉलर में जंग लग चुकी है और हड्डियां कमज़ोर हो चुकी है. पर विश्वास है कि मेरे युवा दोस्त एक दिन ज़रूर अपने मालिकों के खिलाफ़ भौंकेंगे और काटेंगे भी.

-बिश्वजीत रॉय

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दी टेलीग्राफ से इस्तीफे के बाद पत्रकार विश्वजीत ने लंबा खत लिख एबीपी समूह की पोल खोल दी

आनंद बाजार पत्रिका समूह यानि एबीपी समूह के अंग्रेजी अखबार का नाम दी टेलीग्राफ है. यहां से हटने के बाद पत्रकार विश्‍वजीत रॉय ने एक लंबा पत्र लिखा है. इस पत्र में उन्होंने दिल की बात लिखी है. उन्होंने 700 मीडियाकर्मियों की आनंद बाजार पत्रिका समूह से छंटनी का जिक्र किया है. साथ ही इस बहाने अंदरखाने चले घटनाक्रम का जिक्र कर कंपनी की नीतियों पर प्रश्नचिन्ह लगाया है. पूरा पत्र इस प्रकार है…

Finally I resigned from The Telegraph, albeit under duress like 700 odd fired journalists and non-journalists in the ABP Group. Twenty journalists including 17 district correspondents in TT Bengal reporting have lost their jobs in this round.

The ABP management did not allow me to write my resignation letter but got me signed on a one line format that had no mention of the company’s current culling of its workforce. Instead, it pretended that I left out of my free will. Neither had I received a written assurance on the details of the ‘special package’ and statutory dues when I had to sign another format about payments. One of editorial bosses countersigned the latter as I asked for a promissory note from the management. My HR handler told that the company would not commit formally to an individual (even if the job contract was between the company and me as individual) but no reason was offered. I had to insist for the photocopies of the two papers. The pressure on me to put in my resignation at the earliest was aimed at accomplishing the management’s mission by this month.

Although I would be released on March 1, my access to the office computer system was deactivated even before I tendered my resignation. It was meant to make me feel completely unwanted.

Also I was asked to surrender my entry swipe card. The arm-twisting tactics was evident as I was told that the processing of my dues would not begin unless I comply with. I became an outsider effectively on the very day. Now I would have to call or meet HR/accounts or editorial nodal men and meet them at the reception, if they want, to get my dues cleared. So I am at the mercy of the management to receive the fruits of its benevolence after serving the house for20 plus years.

I am told to trust the company which did not think twice before humiliating and firing 700 odd men and women in the name of financial crisis but never bother to explain or discuss with the staffs on ways to overcome it. It did not bother to offer us an honorable exit or an amicable separation except a unilateral but informal assurance of a soothing package. Instead, a piece of paper handed over to the victims revealed the Orwellian absurdity of the world of ABP’s HR mandarins. It offered us help from career counselors, psychiatrists and tax consultants except an audience with the top guns or some exchange of parting messages, not even the corporate niceties like the exit interviews.

Like Kafka’s Castle, we never reached the sanctum sanctorum of the media empire unless the presiding demigods wanted us to do so. Their high priests who are now manning the castle watchtowers are trying their best to behave like compassionate killers. But they may not know when and how the axe will fall on them. Those in the newsroom carried the defiant note by Columbia Journalism Review in the wake of America becoming the Trumpland or mocked Modi and Mamta for their megalomania, hardly showed the same courage of conviction when they were asked to change tunes from time and time as it suited the super bosses. If professionalism is the convenient euphemism for their meek submission, I expected them to protect the lambs they had shepherded so far, if not the perpetual prodigals like me. But sadly, that did not happen. Perhaps it’s easy to defy Trump, Modi or Mamta than taking on the behemoths inside media empires that goaded us to bask under the vainglory of independent journalism only under their strict control.

The all pervasive fear and deafening silence down the line is more alarming. I could not bid adieu digitally to my younger colleagues in the reporting since my access to internal system was locked. I thought of taking leave of everybody in person. But the silence and indifference was chilling as none met my eyes. It was the girl at the reception who said: ‘good bye sir’. There was some personal touch. And, I felt like crying. For the humiliation heaped on me at the fag end of my career, for the loneliness I suffered for my defiance, above all, for the shame of my inability to fight back.

The cowardice of my community leaders before the media owners is even more depressing. Despite the concerted attacks on journalists and non-journalists livelihoods across the country by the media barons they are keeping mum. “What can we do!” a Kolkata Press club office-bearer who himself has suffered termination just before his retirement told me when I asked him to call a meeting covering all the affected houses. If his reply was typical of a man who had resigned to his fate and wanted to reap the benefits out of losses at the end of his career, the deafening silence of community elders and bodies in Kolkata and elsewhere will surely invite further onslaughts on young men and women in the profession in a short time. If the latter is behaving like proverbial ostriches at the time of sandstorm, it the older jackasses with rubber spines are to be blamed more.

Kolkata Press club has managed to hold protest meetings and marches against ruling party or police attacks on journalists at different times despite the opposition and sabotage by the cronies of the rulers of the day, both at the state and centre. But I don’t remember any protest meet, let alone a march, against the media Mughals in my 30 plus years in the profession.

Many watchdogs of democracy bark at the perceived or real intruders, often expecting pats from its masters. But unlike the real canines they never bark at or bite the abusive and cruel masters. They are better at drowning their grief in the drinks after sundown while networking for change of masters. But the problem is that the masters are far and fewer now while our tribe has a baby boom. Pedigrees are rare and most of us are mongrels hardly having any taker. Mongrels are doomed if we follow the assorted asslickers who are relishing lairs of shit for good life, usually licking political and corporate masters by turn. My collar is rusted and my bones are weary. Hope someday some young canines will take up the barking and if needed, biting too.

BISWAJIT ROY

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मीडिया में छंटनी : एक-एक कर सबका नंबर आने वाला है, हक के लिए हुंकार भरें मीडियाकर्मी!

सुना है कि एबीपी ग्रुप ने 700 मीडियाकर्मियों से इस्तीफा लिखवा लिया है। दैनिक भास्कर में भी पुराने कर्मचारियों से इस्तीफा लिखवाया जा रहा है। दमन का यह खेल पूरे मीडिया जगत में चल रहा है। मजीठिया वेज बोर्ड की वजह से प्रिंट मीडिया में कुछ ज्यादा ही कहर बरपाया जा रहा है। चाहे राष्ट्रीय सहारा हो, दैनिक जागरण हो, हिन्दुस्तान हो या फिर अमर उजाला लगभग सभी समाचार पत्रों में कर्मचारियों में आतंक का माहौल बना दिया गया है।

दूसरों की लड़ाई लड़ने का दम भरने वाले मीडियाकर्मी अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ पा रहे हैं। सहमे हुए हैं। डरे हुए हैं। जो मीडियाकर्मी आगे बढ़कर कुछ साहस दिखाते हैं, उन्हें प्रबंधन का निशाना बना दिया जा रहा है। अखबार मालिकानों और प्रबंधनों ने चाटुकार, दलाल, बेगैरत और जमीर बेच चुके कर्मचारियों को अपना मुखबिर बना रखा है। मजीठिया न देना पड़े, इसलिए पुराने कर्मचारियों का टारगेट बनाया जा रहा है। दमन के इस खेल में सभी मीडियाकर्मी शांत होकर अपना भारी नुकसान कर रहे हैं। यह सोचकर कि ‘मैं तो बचा हूं, रहूंगा, खुश हो रहे हैं। यह नहीं समझ रहे हैं कि जल्द ही उनका भी नंबर आने वाला है।

दरअसल अखबार मालिकान किसी भी हालत में मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन और एरियर देना नहीं चाहते। यही वजह है कि पुराने कर्मचारियों पर गाज गिर रही है। मालिकान किसी भी तरह से रेगुलर कर्मचारियों को निकालकर कांटेक्ट बेस पर कर्मचारी रखने की नीति बना रहे हैं। इसलिए जो कर्मचारी यह सोच रहे हैं कि वह बच जाएंगे, वह भारी भूल कर रहे हैं। कर्मचारियों को लामबंद होकर इस दमन के खिलाफ आवाज उठानी होगी। कर्मचारियों को यह समझना होगा कि यदि सबने मिलकर यह लड़ाई लड़ ली तो मजीठिया भी मिलेगा और नौकरी भी और ऐसे ही डरते रहे तो न नौकरी बचेगी और न ही पैसा मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट में अखबार मालिकों को खिलाफ अवमानना का केस चल रहा है। ये लोग कब तक बचेंगे।

हम लोग हर हाल में जीतेंगे पर जो लोग कमजोर बने हुए हैं उन्हें तो मालिकान और प्रबंधन डरा-धमकाकर भगा ही देंगे। रोज बड़े स्तर पर कर्मचारी निकाले जा रहे हैं। एक-एक कर सबका नंबर आने वाला है। राष्ट्रीय सहारा सहारा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब मुकुल राजवंशी और उत्पल कौशिक को निकाला गया तो। कर्मचारी प्रबंधन का खुलकर विरोध न कर पाएं। यही वजह रही कि देहरादून में अरुण श्रीवास्तव को निकाल दिया गया। कुछ दिन बाद में हक की लड़ाई की अगुआई कर रहे 21 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया। हाल ही में 25 कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया है। इनका 17 महीने का बकाया वेतन संस्था पर है। न तो उनका पैसा दिया जा रहा है और न ही नौकरी पर लिया जा रहा है। जरा-जरा की बात पर पूरे दिन शोर मचाने वाले टीवी चैनल, व प्रिंट मीडिया में अपने बीच में सताये जा रहे साथियों के लिए कोई जगह नहीं है। अब समय आ गया है कि मीडियाकर्मी संगठित होकर अपने दमन के खिलाफ हुंकार भरें। यदि अब भी चुप रहे तो अपने तो दुर्गति करोगे ही साथ ही में अपने बच्चों से भी निगाह नहीं मिला पाओगे।

राष्ट्रीय सहारा और दैनिक जागरण समेत कई अखबारों से बर्खास्त किए गए कर्मचारी बेरोजगार होकर भी प्रिंट मीडियाकर्मियों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। अंदर काम कर रहे कर्मचारियों को यह समझना होगा कि थोड़ा बहुत भय मालिकानों और प्रबंधनों में यदि है तो वह इस लड़ाई का ही है। कर्मचारियों में तालमेल का अभाव, नौकरी जाने का डर, लालच और चाटुकारिता का फायदा  उठाकर मालिकान और प्रबंधन कर्मचारियों का उत्पीड़न कर रहे हैं। सभी लामबंद होकर लड़ लिए तो मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन भी मिलेगा और एरियर भी। यदि इसी तरह से डरते रहे।

एक-दूसरे से दूरियां बनाते रहे तो न तो पैसा मिलेगा और न ही नौकरी बचेगी। एक-एक कर सभी को निशाना बना दिया जाएगा। जब जागोगे तो समय निकल चुका होगा। जब उठोगे प्रबंधन उठने लायक नहीं छोड़ेगा। यह समझ लो कि मजीठिया की लड़ाई ऐसी लड़ाई है जो मीडियाकर्मियों की जिंदगी बदल कर रख देगी। इसे सब मिलकर मजबूती से लड़ें। सुप्रीम कार्ट का आदेश है तब भी डर रहे हो। यह जान लो कि मजीठिया मांगने पर जो साथी बर्खास्त किए गए हैं वे सभी ससम्मान अंदर जाएंगे तथा मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से पूरा वेतन और एरियर पाएंगे। इन कर्मचारियों का बाद में मालिकान और प्रबंधन भी कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। जो कर्मचारी अंदर बैठकर सेटिंग में लगे हैं, उनकी सबसे अधिक दुर्गति होगी। सोचे जो 700 कर्मचारी एबीपी समूह ने निकाले हैं। जो दैनिक भास्कर या अन्य अखबारों से निकाले जा रहे हैं। वे सभी हमारे ही बीच के हैं। क्या उनकी जरूरतें किसी से कम हैं। सोचो, जिस दिन आप निकाले जाओगे और आपके बीच के दूसरे कर्मचारी मूकदर्शक बने रहेंगे तो उनके बारे में आपकी क्या सोच होगी ?

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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आज तक, एबीपी न्यूज और एनडीटीवी को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का नोटिस

नई दिल्ली : सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने याकूब मेमन की फांसी कवरेज पर कड़ी आपत्ति जताते हुए तीन न्यूज चैनलों को कार्रवाई के नोटिस जारी कर दिए हैं। सरकार को फांसी से संबंधित समाचारों को प्रस्तुत करने के तरीके पर गंभीर आपत्ति है।

सरकार ने आज तक, एबीपी न्यूज, एनडीटीवी को मुंबई बम धमाके के दोषी याकूब पर उसकी फांसी के दिन कुछ विशेष कंटेंट दिखाकर न्यायपालिका और राष्ट्रपति का अनादर करने का आरोप लगाया है और उनके अलग-अलग शो कॉज नोटिस भेजे हैं। मंत्रालय को सबसे ज्यादा आपत्ति आज तक और एबीपी न्यूज पर छोटा शकील से फोन पर बातचीत दिखाने को लेकर है। उस इंटरव्यू में छोटा शकील ने याकूब मेमन को बेगुनाह बताया है। 

अब चैनलों को 15 दिनों में अपना जवाब भेजना है। इस जवाब की समीक्षा गृह, रक्षा और विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की एक इंटर मिनिस्टीरियल कमेटी करेगी और आगे की कार्रवाई पर चैनलों के संबंध में फैसला लेगी।

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एबीपी के अनोखे शो ‘प्रेस कांफ्रेस’ में गूंजा केजरीवाल का ‘ठुल्ला’

एबीपी न्यूज ने नया शो प्रेस कांफ्रेंस ने शुरू किया है जो हर शनिवार रात 8 बजे, रविवार सुबह 10 बजे और रात में 8 बजे प्रसारित किया जाता है. एबीपी न्यूज के पहले शो में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शिरकत की और खुलकर सारे सवालों का जवाब दिया. ये देश का इकलौता पहला शो है जिसमें 12 वरिष्ठ पत्रकार शामिल हैं जो हर गेस्ट से ये सवाल करेंगे. प्रेस कांफ्रेंस शो के एंकर वरिष्ठ पत्रकार दिबांग हैं.

पहले इंटरव्यू ‘शो’ में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ‘ठुल्ला’ शब्द पर माफी मांगी। वह कहते हैं, प्रधानमंत्री दिल्ली सरकार को ठीक से काम नहीं करने दे रहे हैं, एलजी साहब और पुलिस कमिश्नर बस्सी साहब हैं अच्छे इंसान। उनसे कोई विवाद नहीं। उनपर ऊपर से प्रेशर बनाया जाता है। प्रधानमंत्री जी दिल्ली पुलिस का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, ठुल्ला कहने पर मुझ पर एफआईआर दर्ज करवाया गया लेकिन सुषमा स्वराज वसुंधरा राजे, शिवराज के खिलाफ क्यों नहीं हुई दर्ज एफआईआऱ ? वह वादा करते हैं कि पांच साल में दिल्ली में वैट आसान हो जाएगा। उन्होंने ने माना कि उनसे दो गलतियां हुई हैं। वह कहते हैं कि बीजेपी को दिल्ली में केन्द्र सरकार के साथ अपने रवैये का खामियाजा बिहार में भुगतना पड़ेगा। उन्होंने खुद बिहार चुनाव में प्रचार के बारे में अभी कोई निर्णय नहीं लिया है। इंटरव्यू में उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री बनने का शौक नहीं है।

अपने इस अनोखे शो को लेकर ‘एबीपी न्यूज’ लिखता है- ” ठुल्ला शब्द का मतलब होता है निठल्ला. ये अपमानजनक शब्द है. अरविंद केजरीवाल के द्वारा ठुल्ला शब्द इस्तेमाल करने के बाद ये शब्द  ट्विटर, फेसबुक से लेकर व्हॉट्सएप पर चर्चा का विषय बन गया है. लोगों ने ‘ठुल्ला’ को लेकर कमेंट करने शुरू किए तो पुलिसकर्मियों ने भी उसे काउंटर करना शुरू कर दिया. इसी मामले को लेकर कई पुलिसवाले केजरीवाल के खिलाफ कोर्ट भी पहुंच गये हैं.

”केजरीवाल ने ठुल्ला शब्द का इस्तेमाल करके चौतरफा निशाना साधने की कोशिश की है . दिल्ली में मीनाक्षी की हत्या के बाद जनता दिल्ली सरकार और पुलिस पर उंगुली उठा रही थी . केजरीवाल ने इस शब्द का इस्तेमाल करके ये जताने की कोशिश की है पुलिस कुछ नहीं कर रही है यानि दिल्ली की पुलिस निठल्ली है. केजरीवाल पर जनता सवाल नहीं उठाए इसीलिए उन्होंने ये कहकर गेंद पुलिस के पाले में डालने की कोशिश की. ठुल्ला शब्द के बाद केजरीवाल की काफी निंदा होने लगी. कैसे एक मुख्यमंत्री इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं . केजरीवाल को इस शब्द के जरिए जो संदेश देना था वो संदेश दिल्ली में नहीं पूरे देश में फैल चुकी है.”

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एबीपी न्यूज के एडिटर इन चीफ शाजी जमां अपने चैनल में न्याय क्यों नहीं कर रहे?

: कानाफूसी : एबीपी न्यूज चैनल से खबर है कि पीसीआर में कार्यरत एक वरिष्ठ महिला मीडियाकर्मी को इन दिनों न्याय की तलाश है. एडिटर इन चीफ शाजी जमां को सब कुछ पता है. लेकिन पीड़िता को न्याय नहीं मिल पा रहा. हुआ ये कि पीसीआर में कार्यरत वरिष्ठ महिला मीडियाकर्मी ने एक रोज अपने फेसबुक पेज पर बिना किसी का नाम लिए यह लिख दिया कि ‘एंकर ने कितना घटिया सवाल पूछा’.

बस, इतना लिखते ही एबीपी न्यूज चैनल की एंकर महोदय इस स्टेटस के नीचे कमेंट बाक्स में अपनी भड़ास निकालने लगीं. सूत्रों का कहना है कि एंकर ने वाकई बहुत घटिया सवाल पूछा था और इस तरह के सवाल का कल्पना कम से कम एबीपी न्यूज के एंकर से तो नहीं की जा सकती थी. फेसबुक पर विवाद बढ़ता देख बाद में आफिस के लोगों ने बीच-बचाव कर एंकर का कमेंट और महिला मीडियाकर्मी का स्टेटस हटवाया व दोनों को शांत कराया. लेकिन इसके बाद बौखलाई एंकर ने एक ग्रुप मेल भेज दिया ढेर सारे लोगों को जिसमें महिला मीडियाकर्मी पर कई तरह के आरोप लांछन लगाए गए थे.

इसे देख पीसीआर की महिला मीडियाकर्मी गुस्सा हो गईं और पुलिस में कंप्लेन कराने को तत्पर हो गईं. तब चैनल के सीनियर्स, जिसमें शाजी जमां भी शामिल हैं, ने महिला मीडियाकर्मी को शांत कराया और आफिस के अंदर ही कमेटी बनाकर पूरे मामले की जांच कराने और न्याय दिलाने का आश्वासन दिया. पर कई हफ्ते बीत गए, अब तक न तो आंतरिक जांच कमेटी बनी और न ही कोई कार्रवाई हुई. ऐसे में लोग कहने लगे हैं कि मीडिया के मसलों पर बढ़ चढ़ कर जांच कराने और न्याय दिलाने वाले शाजी जमां अपने चैनल के आंतरिक विवाद में न्याय दिलाने को क्यों तत्पर नहीं हो पा रहे हैं?

कानाफूसी कैटगरी की खबरें सुनी सुनाई बातों पर आधारित होती है. कृपया इस पर यकीन करने से पहले अपने स्तर पर तथ्यों को जांच ले. जिस किसी को उपरोक्त बातों में कोई गल्ती / असहमति नजर आती है तो वह अपनी बात नीचे कमेंट बाक्स के जरिए कह सकता है.

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ABP न्यूज ने ‘तर्क’ से जिताया मोदी को

पाठकों की राय को दरकिनार कर ABP न्यूज ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साल 2014 का व्यक्ति विशेष बना डाला। ABP न्यूज ने अपनी वेबसाइट ABP live पर साल 2014 के व्यक्ति विशेष का पोल करवाया। इस पोल में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बुरी तरह पछाड़ दिया। मगर, ABP न्यूज ने निम्न तर्क देते हुए अरविंद केजरीवाल को हरा दिया।

”दर्शकों की राय में अरविंद केजरीवाल व्यक्ति विशेष हैं. लेकिन देश को पिछले 30 साल में पहली बार 2014 में पूर्ण बहुमत की सरकार नरेंद्र मोदी ने दी है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ABP न्यूज के 2014 के व्यक्ति विशेष हैं।”

लगता है कि ABP न्यूज ने अपनी छवि को बचाने के लिए इस तरह का हथकंडा अपनाया है। कहीं, उस पर आम आदमी पार्टी का पक्षपाती होने का आरोप न लग जाए। इस पोल में अरविंद केजरीवाल को 52.63 फीसदी मत मिले, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 34.12 फीसदी। इस तरह लोगों की पसंद में केजरीवाल आगे रहे।

Kulwant Happy
sharma.kulwant84@gmail.com

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एबीपी का पंजाबी चैनल बंद हुआ, 200 बेरोजगार हुए, प्रदर्शन किया, पर ‘एबीपी न्यूज’ पर दस सकेंड की भी खबर नहीं चली

एक के बाद एक पंजाबी चैनलों के बंद होने के पीछे किसका हाथ? एबीपी चैनल सांझा ने दफ्तर बंद किया और 200 के करीब कर्मियों की छुट्टी की। उन्हें यह कहकर इस्तीफे देने का आदेश दिया कि पंजाब में केबल नेटर्वक उनका चैनल चलाने के लिए तैयार नहीं है। अगर पंजाब सरकार या केबल नेटर्वक किसी चैनल को जबरदस्ती रोकते हैं तो जिस मीडिया कंपनी का राष्ट्रीय स्तर का चैनल हो और वह अपना चैनल बंद करवाने वाले केबल नेटर्वक या सरकार के खिलाफ एक भी खबर तक न चलाए तो इस बात का क्या अर्थ निकलता है। ‘एबीपी सांझा’ बंद हुआ लेकिन एबीपी न्यूज़ (राष्ट्रीय चैनल) ने 10 सेंकड तक की भी कोई न्यूज़ नहीं चलाई। क्या विरोध केवल सरकार के खिलाफ होना चाहिए, कंपनी के खिलाफ नहीं जिसने अपनी मर्जी से प्रोजेक्ट शुरू किया और अचानक ही घाटे का सौदा बताकर बंद कर दिया।

पिछले दो दिन से पंजाब के मीडिया में हाहाकार मचा हुआ है। कारण एबीपी न्यूज के पंजाबी चैनल ‘एबीपी सांझा’ को शुरू होने से पहले अचानक बंद करने का एलान कर दिया गया और 200 के करीब मीडियाकर्मी व अन्य कर्मचारी सड़क पर आ गए। पंजाब में यह पहली घटना नहीं है इससे पहले ‘डे एंड नाइट’ न्यूज़ के बंद होने के कारण भी 200 से ज्यादा लोगों को अपना रोज़गार गवाना पड़ा था। पंजाब की अकाली-भाजपा सरकार पर केबल नेटवर्क को कंट्रोल करने का आरोप लगता है। इससे पहले भी जी-पंजाबी, पंजाब टुडे, साडा चैनल, परलस पंजाबी, पीबीसी न्यूज़ चैनल, स्टैंडर्ड टीवी, चैनल नंबर-1 व अन्य कुछ पंजाबी टीवी प्रोजेक्टस हैं जो केबल पर एक खास कंपनी का कब्जा होने के कारण चल नहीं पाए।

वैसे तो यह केवल पंजाब का ही मामला ही नहीं बल्कि देश में कई ऐसे प्रदेश हैं जहां पर केबल नेटर्वक पर सियासी पार्टियों ने कब्जे जमा रखे हैं। जिस पार्टी की भी सरकार आती है उसी का केबल नेटर्वक पर कंट्रोल हो जाता है और टीवी चैनल सरकार के खिलाफ़ चलते हैं उन्हें केबल पर चलने नहीं दिया जाता। ताज़ा घटना घटते ही जो मीडियाकर्मी बेरोजगार हुए उन्होंने कैंडल मार्च कर और प्रेस कांफ्रेंस कर पंजाब सरकार को आरोपी ठहराया। यह मुद्दा काफी समय से गरमाता रहा है और जब भी कभी पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल या उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल से इस बारे में पूछा जाता तो वे साफ तौर पर कहते कि यह दो कम्पनियों के बीच का मामला है सरकार का इसमें कोई दखल नहीं है। सरकार का इस मामले में कितना दखल है या कितना नहीं, इसके बारे में सरकार व विपक्ष की अपनी-अपनी दलीलें हो सकती हैं। लेकिन मैं समझता हूं कि पंजाब में जिस तरह का सिलसिला चल रहा है, वह लोकतंत्र का हनन है। मीडिया को लोकतंत्र का स्तंभ कहा जाता है। लेकिन अगर मीडिया को ही काम नहीं दिया जाएगा तो अच्छी लोकतांत्रिक प्रणाली कैसे चल सकती है।

ऐसे रुझान से तीन बड़े नुकसान हो रहे हैं पहला पंजाबी चैनलों की मार्किट अगर विकसित नहीं होती तो पंजाबी में काम करने वाले मीडियाकर्मी व पत्रकार पीछे रह जायेंगे। इससे भाषा का भी नुकसान होगा और कोई भी व्यक्ति या कंपनी पंजाबी में काम नहीं करेगी। केबल को माफिया की तरह चलाने का सिलसिला पंजाब में कांग्रेस के राज में शुरू हुआ जब पंजाब टुडे को सरकारी चैनल की तरह चलाया गया और तत्कालीन विपक्षी अकाली-भाजपा को मीडिया से ब्लैकआउट कर दिया गया। सत्ता में आते ही अकाली दल से जुडेÞ लोगों ने केबल पर अपना कंट्रोल किया। जैसे कांग्रेस की सरकार में केबल चल रही थी उसी तरह अब चल रही है केवल चेहरे बदल गए हैं।

मैं समझता हूं कि पंजाब में अकाली दल की सरकार है। यह वो पार्टी है जिसने पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत के लिए कुर्बानियां दी हैं। इस पार्टी का एक संघर्षमयी इतिहास रहा है। अगर उसके राज में कोई ऐसा काम हो रहा हो जिससे मातृभाषा पंजाबी का नुकसान होता हो तो यह गंभीर चिंतन का विषय होना चाहिए। प्रदेश सरकार के लिए भी और अकाली दल के नेतृत्व के लिए भी। केन्द्र में सरकार रहते हुए कांग्रेस ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे केबल नेटर्वक पर एक खास कंपनी का दबदबा रोका जा सके और मीडिया स्वतंत्र तौर पर काम कर सके। जब कांग्रेस सत्ता में थी तो वह केबल चला रही थी अब अकाली सत्ता में है तो अब वो चला रहे हैं मसला सिर्फ इतना है कि जो विपक्ष में होता है वो ‘फ्रीडम आॅफ स्पीच’ की बात करता है। इसके साथ-साथ लोगों के रोजगार का मसला भी जुड़ा हुआ है। पिछले 10 सालों में पंजाबी के कई चैनल बंद होने के कारण हजारों मीडियाकर्मी बेरोजगार हो चुके हैं और यह सिलसिला जारी है। इससे भी दुखदायक बात यह है कि अब शायद ही कोई बड़ी कम्पनी पंजाबी चैनल शुरू करने की सोचे। मैं इस हालात के लिए सरकार को क्लीन चिट नहीं दे रहा हूं बल्कि मैं तो कहूंगा कि पंजाब के मुख्यमंत्री को इस मुद्दे पर गंभीर संज्ञान लेना चाहिए और कोई ऐसा रास्ता निकालना चाहिए जिससे टीवी चैनल स्वतंत्रता से काम कर सकें।

सरकार के साथ-साथ एक और बात यहां करना चाहता हूं वह यह कि केबल माफिया की जब भी हम बात करते हैं तो सबसे पहले निशाना सरकार पर जाता है, सरकार के खिलाफ ही रोष प्रदर्शन शुरू होते हैं। लेकिन पंजाब में जो कुछ हुआ है उसमें एक पहलू ऐसा है जिस पर मीडिया में चर्चा नहीं हुई। मिसाल के तौर पर एबीपी चैनल सांझा ने जब दफ्तर बंद किया और 200 के करीब कर्मियों की छुट्टी की और उन्हें यह कहकर इस्तीफे देने का आदेश दिया कि पंजाब में केबल नेटर्वक उनका चैनल चलाने के लिए तैयार नहीं है। अगर पंजाब सरकार या केबल नेटर्वक किसी चैनल को जबरदस्ती रोकते हैं तो जिस मीडिया कंपनी का राष्ट्रीय स्तर का चैनल हो और वह अपना चैनल बंद करवाने वाले केबल नेटर्वक या सरकार के खिलाफ एक भी खबर तक न चलाए तो इस बात का क्या अर्थ निकलता है। ‘एबीपी सांझा’ बंद हुआ लेकिन एबीपी न्यूज़ (राष्ट्रीय चैनल) ने 10 सेंकड तक की भी कोई न्यूज़ नहीं चलाई। क्या विरोध केवल सरकार के खिलाफ होना चाहिए, कंपनी के खिलाफ नहीं जिसने अपनी मर्जी से प्रोजेक्ट शुरू किया और अचानक ही घाटे का सौदा बताकर बंद कर दिया। यह भी पहली बार नहीं हुआ है पंजाब में जब जी-पंजाबी को केबल नेटर्वक से आफ एयर किया गया तो जी न्यूज़ नेटर्वक ने एसी कोई मुहिम सरकार के खिलाफ़ नहीं चलाई। आखिर कुछ तो दाल में काला है। असल में कार्पोरेट मीडिया के चैनल जिस तरह की पत्रकारिता कर रहे हैं और जो हालात देश में पत्रकारिता के बन गए हैं केबल माफिया की उपज उसी में से होती है। यह किसी एक राज्य या एक राजनीतिक पार्टी का मसला नहीं है। बल्कि यह पूरे सिस्टम की गिरावट दर्शाता है। पंजाब में जब डे एंड नाइट न्यूज चैनल ने छंटनी की तो तब भी किसी टीवी चैनल ने इस मुद्दे को प्रमुखता नहीं दी।

मीडिया को केन्द्र सरकार पर दबाव डालना चाहिए कि वह कोई ऐसा सिस्टम तैयार करे जिससे राजनीतिक पार्टियां या सरकारों का मीडिया पर कंट्रोल न हो। मीडिया जब दूसरे मुद्दों पर सरकारों के खिलाफ मुहिम चला सकता है तो पत्रकारों या निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए क्यों नहीं। लेकिन सवाल यह है कि कार्पोरेट मीडिया ऐसा क्यों नहीं कर रहा। इसके पीछे क्या हित छिपे हैं। कुछ भी हो, फिलहाल यही कहा जा सकता है कि सियासी पाटियों और कार्पोरेट मीडिया के इस दौर में पत्रकार और पत्रकारिता मनफ़ी हो रही है।

लेखक खुशहाल लाली ‘सत्य स्वदेश’ के प्रधान संपादक हैं.

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क्या एबीपी न्यूज अपनी चलाई सनसनियों पर एक बार भी नजर डालने को तैयार है?

Sheetal P Singh : लम्बे समय तक पेड मीडिया और चिबिल्ले चैनल इस कथित बाबा की गप्पों को UPA2 की हैसियत बिगाड़ने के लिये राष्ट्रीय ख़बर बनाते रहे। अब कोई अपनी ही चलाई सनसनियों पर एक बार भी नज़र डालने को तैयार नहीं है… और यह ढोंगी बाबा तो खैर टैक्सपेयर की कमाई से Zplus कैटगरी का हो ही गया!

Sanjeev : बाबा रामदेव को ऐसा क्या मिल गया, जो अपनी ही कही बातों को भूल गए…

Kunal k Verma : एबीपी न्यूज को जरूर एक बार बाबा रामदेव से पूछना चाहिए कि अब उनका इन मुद्दों पर क्या रिएक्शन है… उन दिनों तो एबीपी न्यूज ने रामदेव के कथन को ऐसे चलाया जैसे बाबा कोई बड़ी ब्रेकिंग न्यूज दे रहे हों… कम से कम इन न्यूज चैनलों को अपनी चलाई खबरों का कभी-कभार तो फालोअप कर लेना चाहिए… पर ये पेड और कार्पोरेट न्यूज चैनल ऐसा कहां करने वाले… इन्हें तो अपना टर्नओवर बढ़ाने से फुर्सत नहीं… अगर एबीपी न्यूज में थोड़ी भी शरम हया बाकी है तो वह बाबा रामदेव की इन मुद्दों पर चुप्पी की असलियत उजागर करेगा…

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट संजीव व कुणाल के फेसबुक वॉल से.

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शिअद-भाजपा सरकार ने केबल माफिया से मिलकर नहीं लांच होने दिया एबीपी ग्रुप का पंजाबी न्यूज चैनल, विरोध में प्रदर्शन

: ब्लैकआउट के जरिए ‘एबीपी सांझा न्यूज’ चैनल बंद कराने वाले बादल सरकार और केबल माफिया के खिलाफ मीडियाकर्मियों का प्रदर्शन : पंजाब में मीडिया की हालत बहुत खराब है. केबल माफिया का काला साम्राज्य इस कदर फैला और मजबूत है कि अगर कोई नया चैनल सत्ता-प्रशासन के खिलाफ पत्रकारिता करता है तो उसे पूरी तरह ब्लैकआउट कर दिया जाता है जिसके कारण चैनल की पहुंच आम लोगों तक नहीं हो पाती. यही कारण है कि आनंद बाजार पत्रिका समूह के नए आने वाले पंजाबी न्यूज चैनल ‘एबीपी सांझा न्यूज’ को लांच से पहले ही बंद करना पड़ा. इस चैनल के कर्मियों को तीन महीने की सेलरी देकर चैनल बंद किए जाने की सूचना दी गई.

इस कारण करीब 200 कर्मचारियों को बेरोजगार होना पड़ा है जिसमें करीब 100 लोग संपादकीय विभाग के हैं. पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी की मिली जुली सरकार है. इस सरकार की केबल माफिया से मिलीभगत है. इसी कारण किसी स्वतंत्र आवाज को यहां दबा दिया जाता है. इस तानाशाही के खिलाफ सैकड़ों मीडियाकर्मियों ने प्रदर्शन किया और पंजाब के बादल सरकार की निंदा की. इस प्रदर्शन की कुछ तस्वीरें और हिंदुस्तान टाइम्स में छपी खबर की रिपोर्ट यहां दिया जा रहा है…

Channel closure: Protest held against Badal govt, cable ‘mafia’

Chandigarh : Sacked employees of ABP Sanjha News, a Punjabi channel of the Anandabazar Patrika group that closed down on Wednesday after non-access to the cable network in Punjab, held a protest march in Sector 17 here on Thursday against what they termed the “cable network mafia” of the state. The channel management had reportedly cited the virtual blackout of the channel by Fastway Transmissions Private Limited, which covers around 75% of the cable network in Punjab, as the prime reason for closure. The channel’s content was mostly available on video-sharing websites like YouTube but could never be aired at large. The group runs leading channels including ABP News in Hindi.

On Wednesday, the group’s human resources head Satyakki Bhattacharjee had gathered staff at the Sanjha office in SAS Nagar and announced the pack-up. He had also announced three months’ salary for staff to be let off, and added that even if they ran the channel on the digital, direct-to-home (DTH) network, they won’t be able to sustain it. This had left 200 employees, including 100 in the editorial operations, jobless. Many of them gathered in Sector 17 on Thursday and alleged that the SAD-BJP government was hand in glove with the cable mafia and “wants to gag every independent voice in the state”. Holding placards, the around 150 protesters raised slogans of ‘Down with Badal sarkar’ and against the cable mafia, gathered at Sector 17 Plaza. The sacked employees have now formed a Journalist Action Committee to organise Punjab-wide protests against the cable mafia and the Parkash Singh Badal-led government.

“We shouldn’t forget that those who are today shutting down one after another news channel, also aspire to gag every critical voice, be it even in the form of newspapers or magazines,” said Punjab and Haryana high court lawyer Rajwinder Bains who was also part of the protest. Another high court lawyer, Navkiran Singh, said if the political establishment of the state was allowed to go on like this, “soon there will be no independent media voice to report atrocities by the police and the State”.

Under similar circumstances, another private channel, Day and Night News, had had to severely scale down its operations last year. It was alleged then too that the state government was patronising a certain news channel and protecting its turf by virtually blanking out potential competitors on cable TV. Congress leader Sukhpal Singh Khaira was also present to express solidarity and said such moves were destroying the future of many young journalists. “The Badal family wants that the people of the state watch only those channels that it owns,” he remarked.

Among those who addressed the gathering were documentary filmmaker and journalist Daljit Ami, Aam Aadmi Party (AAP) leaders Manjeet Singh and Rajeev Godara, and NGO Students for Society’s (SFS) representative Arshdeep Kaur. “This closure must be seen as a dark sign of a bleak future,” said Arshdeep. Journalists from some other media organisations that were purported victims of the cable mafia addressed the protesters too.

Even ABP’s HR head Bhattacharjee wrote on social networking website Twitter on Wednesday: “Very Sad And Very Angry At The Same Time. Death of Journalism in Punjab. courtesy local system (sic)”. At the colure announcement, sources had told HT on Wenesday, Bhattacharya had said the top management of the group from Delhi had even approached the SAD-BJP regime for help but nothing had come of that. (साभार- हिंदुस्तान टाइम्स)

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एबीपी का पंजाबी चैनल लांच होने से पहले ही बंद, 200 मीडियाकर्मी बेरोजगार

एबीपी (आनंद बाजार पत्रिका) वालों ने 200 मीडियाकर्मियों के पाट पर लात मारने का काम किया है. एबीपी की तरफ से पंजाबी चैनल ‘एबीपी सांझा’ लांच करने की तैयारी कई वर्षों से चल रही थी. इसके लिए करीब 200 लोगों को भर्ती किया गया. अब सूचना आ रही है कि प्रबंधन ने चैनल को बंद करने का फैसला ले लिया है और सभी कर्मियों को घर जाने को बोल दिया है. यह चैनल मोहाली से लांच किया जाने वाला था. ABP सांझा नाम से आने वाले चैनल के प्रबंधन ने सभी कर्मचारियों को अपने यहां से बाहर निकाल दिया है.

उल्लेखनीय है कि एबीपी यानि आनंद बाजार पत्रिका समूह देश का बड़ा मीडिया हाउस है और इसी ग्रुप का एक नेशनल हिंदी न्यूज है एबीपी न्यूज नाम से. इस बड़े और गंभीर किस्म के मीडिया हाउस की इस सतही-ओछी हरकत से मीडियाकर्मियों में रोष है. पिछले कुछ समय से कई चैनलों के बंद होने का दौर चल रहा है. पी7न्यूज नामक चैनल देखते ही देखते धराशाई हो गया. भास्कर न्यूज नामक चैनल भी लांच होने से पहले बंद होने की स्थिति में है. अब एबीपी के पंजाबी चैनल के बंद होने से सैकड़ों लोग बेरोजगार हो गए हैं.

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