कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर हिन्दुस्तान टाईम्स से वसूली किए जाने पर लगी रोक हटायी

टर्मिनेट कर्मचारी पुरुषोत्तम सिंह के मामले में शोभना भरतिया को लगा तगड़ा झटका, एडवोकेट उमेश शर्मा ने लगातार दो दिन की थी जोरदार बहस….  जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में हिन्दुस्तान टाईम्स की मालकिन शोभना भरतिया को एक बार फिर मंगलवार १९ /२/२०१८ को दिल्ली उच्च न्यायलय में मुंह की खानी पड़ी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मजीठिया वेज बोर्ड मामले से जुड़े वसूली मामले में लगायी गयी रोक को हटा लिया। इससे हिन्दुस्तान प्रबंधन से मजीठिया वेज बोर्ड मामले में लगाये गये १७ (१) के मामले में वसूली का रास्ता साफ हो गया है।

१७ (१) का यह क्लेम हिन्दुस्तान टाईम्स दिल्ली से जबरन टर्मिनेट किये गये डिप्टी मैनेजर पुरुषोत्तम सिंह ने लगाया था जिस पर कंपनी को बकाया देने के लिये नोटिस गयी तो हिन्दुस्तान प्रबंधन ने उस नोटिस पर स्टे ले लिया। लगभग तीन साल तक चली लंबी लड़ाई के बाद आखिर दिल्ली हाईकोर्ट ने नोटिस पर लगी रोक को हटा लिया है। पुरुषोत्तम सिंह का मामला जाने माने एडवोकेट उमेश शर्मा ने रखा। उन्होंने लगातार दो दिन तक बहस किया और यह रोक हटवा लिया।

बताते हैं कि हिन्दुस्तान टाईम्स दिल्ली में डिप्टी मैनेजर पद पर कार्यरत पुरुषोत्तम सिंह को वर्ष २०१५ में कंपनी ने टर्मिनेट कर दिया। उसके बाद उन्होंने  एडवोकेट उमेश शर्मा से मिलकर अपने टर्मिनेशन के खिलाफ एक केस लगवाया। पुरुषोत्तम सिंह ने २०१५ में ही दिल्ली सेंट्रल के डिप्टी लेबर कमिश्नर लल्लन सिंह के यहां १७(१)का केस लगाया जिस पर पदाधिकारी ने २१ लाख की रिकवरी का नोटिस भेजा। उसके बाद कंपनी दिल्ली हाईकोर्ट गयी और वहां दिल्ली हाईकोर्ट की जज सुनीता गुप्ता ने इस नोटिस पर एकतरफा कारवाई करते हुये रोक लगा दिया।

इस मामले में पुरुषोत्तम सिंह ने देश भर के मीडियाकर्मियों की तरफ से माननीय सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा से अपना पक्ष रखने का अनुरोध किया। लगभग तीन साल तक चले इस केस में १९ फरवरी को दिल्ली हाईकोर्ट में उमेश शर्मा ने पुरुषोत्तम सिंह का पक्ष जोरदार तरीके से रखा। न्यायाधीश विनोद गोयल के सामने हमेशा की तरह हिन्दुस्तान प्रबंधन नई तारीख लेने के प्रयास में जुटा लेकिन उमेश शर्मा ने विद्वान न्यायाधीश से निवेदन किया कि इस बहस को लगातार जारी रखा जाये क्योंकि नोटिस पर स्टे देना पूरी तरह गलत है। मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट सबकुछ क्लीयर कर चुका है।

इसके बाद विद्वान न्यायाधीश ने सुनवाई अगले दिन भी जारी रखने का आदेश दिया। २० फरवरी को फिर दिल्ली हाईकोर्ट में बहस हुयी और उसके बाद न्यायाधीश विनोद गोयल ने नोटिस पर लगी रोक हटा लिया। यानि अब हिन्दुस्तान प्रबंधन के खिलाफ आरआरसी जारी होने का रास्ता साफ हो गया है। इस मामले में पुरुषोत्तम सिंह ने हिन्दुस्तान टाईम्स की मालकिन शोभना भरतिया और एचआर डायरेक्टर शरद सक्सेना को पार्टी बनाया था। पुरुषोत्तम सिंह को मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे देश भर के मीडियाकर्मियों ने बधाई दी है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
९३२२४११३३५

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मजीठिया वेज बोर्ड के लिए अब जो क्लेम करेगा, वह हार हाल में जीतेगा : एडवोकेट उमेश शर्मा

सुप्रीम कोर्ट के टाइम बाउण्ड के निर्णय का स्वागत… जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट में देश भर के मीडियाकर्मियों का केस लड़ रहे जाने-माने एडवोकेट उमेश शर्मा ने 13 अक्टूबर को सुप्रीमकोर्ट द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड मामले को श्रम न्यायालय और कामगार विभाग द्वारा टाइम बाउंड करने के निर्णय का स्वागत किया है और कहा है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में क्लेम लगाने वाले मीडियाकर्मियों की हर हाल में जीत तय है, वह एक निश्चित समय के भीतर। इससे एक बार फिर साबित हो गया है कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ उनको ही मिलेगा जो वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17(1) के तहत क्लेम लगाएंगे।

एडवोकेट उमेश शर्मा ने कहा कि माननीय सुप्रीमकोर्ट का आदेश साफ संकेत देता है कि मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने का दो रास्ता है। एक तो ये कि मालिक अपने आप वेज बोर्ड की सिफारिशों को ईमानदारी से लागू कर दें जो कि असंभव है। ऐसे में दूसरा और आखिरी रास्ता बचता है 17 (1) का क्लेम लगाना। उमेश शर्मा ने साफ कहा है कि जो भी मीडियाकर्मी क्लेम लगाएंगे, उनकी जीत तय है।

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उमेश शर्मा ने कहा कि मैं शुरू से ही इस मामले को टाइम बाउंड कराने और इस बाबत एक कमेटी बनाने पर जोर दे दे रहा था। आपको बता दें कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जस्टिस माजीठिया वेज बोर्ड मामले में अहम फैसला सुनाते हुए देश के सभी राज्यों के श्रम विभाग एवं श्रम अदालतों को निर्देश दिया कि वे अखबार कर्मचारियों के मजीठिया संबंधी बकाये सहित सभी मामलों को छह महीने के अंदर निपटाएं।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई एवं नवीन सिन्हा की पीठ ने ये निर्देश अभिषेक राजा बनाम संजय गुप्ता/दैनिक जागरण (केस नंबर 187/2017) मामले की सुनवाई करते हुए दिए। गौरतलब है कि मजीठिया के अवमानना मामले में 19 जून 2017 के फैसले में इस बात का जिक्र नहीं था जिसे लेकर अभिषेक राजा ने सुप्रीम कोर्ट से इस पर स्पष्टीकरण की गुहार लगाई थी। एडवोकेट उमेश शर्मा ने सभी मीडियाकर्मियों से मजीठिया वेज बोर्ड मामले में क्लेम लगाने का निवेदन किया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर ये है :

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एडवोकेट उमेश शर्मा ने मजीठिया के लिए नया क्लेम लगाने वालों के लिए नया फार्मेट जारी किया

अखबार और न्यूज एजेंसियों के मीडियाकर्मियों के वेतन भत्ते प्रमोशन से जुड़े मामले से संबंधित जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा ने माननीय सुप्रीमकोर्ट के १९ जून २०१७ को आये फैसले के बाद उन पत्रकारों तथा गैर-पत्रकारों के लिये एक नया फार्मेट जारी किया है जिन्होंने अभी तक कामगार आयुक्त कार्यालय में अपने बकाये राशि और वेतन वृद्धि के लिये क्लेम नहीं लगाया है।

इस नये फार्मेट को सिर्फ वही पत्रकार और गैर पत्रकार भरेंगे जिन्होने पहले कामगार आयुक्त कार्यालय या सहायक कामगार आयुक्त कार्यालय में क्लेम नहीं लगाया है। १७ (१) के इस फार्मेट में १९ जून २०१७ को आये सुप्रीमकोर्ट के फैसले को समाहित करते हुये कई नये प्वाईेंट जोड़े गये हैं। जिन पत्रकारों और गैर पत्रकारों ने एडवोकेट उमेश शर्मा का पुराना फार्मेट वाला आवेदन पत्र कामगार विभाग में जमा कराया है उनको ये नया आवेदन पत्र नहीं जमा करना है। ये सिर्फ नये क्लैमकर्ताओं के लिये उमेश शर्मा ने जारी किया है। आप को बता दें कि एडवोकेट उमेश शर्मा ने देश भर के पत्रकारों और गैर-पत्रकारों की लड़ाई माननीय सुप्रीमकोर्ट में लड़ी है।

Sample draft of the Majithia Application

BEFORE THE LABOUR COMMISSIONER/DEPUTY LABOUR COMMISSIONER/ASSISTANT LABOUR COMMISSIONER,DISTRICT ( Name of the district and address of the office)
In the matter of:
NAME & ADDRESS OF THE CLAIMANT:
Name
Present Post
Date of Employment
Address
Category of the post as per Majithia Award
NAME & ADDRESS OF THE MANAGEMENT:
Category of management as per Majithia award
APPLICATION UNDER SECTION 17 (1) OF THE WORKING JOURNALISTS ACT FOR ISSUANCE OF RECOVERY CERTIFICATE AGAINST THE STATUTORY DUES OF THE CLAIMANT.

Respectfully submitted as under:

1. The management named above is a newspaper establishment, the employees of the establishment are entitled to the benefits of the Majithia Wage Board notification w.e.f. 11/11/11 as notified by the Central Government. The details of the category of the management under the said wage board award is given above and the details of the post of the claimant employee as covered under the said Award is also given above.
2. That Majithia Wage Board was constituted by the Central Government under Section 10 of the WJ Act and the report of the same was accepted by the Central Government and notified on 11/11/2011 under Section 12 of the said Act hence the said award has a statutory force and the claimant is entitled to the benefits as granted under the said award. The said Award has subsequently been upheld by the Supreme Court of India and specific directions for implementation of the same has been issued hence no dispute in this regard can be raised by the employer as the same would amount to contempt of court.
4. The management along with several other newspapers challenged the Majithia Notification before Supreme Court of India instead of implementing the same. The Honble Supreme Court of India finally dismissed the petitions filed against Majithia Notification and issued specific directions for the release of the benefits of Majithia Wage Board notification vide its orders dated 7/2/2014 within a period of one year w.e.f. 7/2/2014 along with arrears, the operative part of the directions of Supreme Court are reproduced here under for ready reference and compliance:

    71) Accordingly, we hold that the recommendations of the Boards are valid in law, based on genuine and acceptable considerations and there is no valid ground for interference under Article 32 of the Constitution of India.
    72) Consequently, all the writ petitions are dismissed with no order as to costs.
    73) In view of our conclusion and dismissal of all the writ petitions, the wages as revised/determined shall be payable from 11.11.2011 when the Government of India notified the recommendations of the Majithia Wage Boards. All the arrears up to March, 2014 shall be paid to all eligible persons in four equal installments within a period of one year from today and continue to pay the revised wages from April, 2014 onward.
    74) In view of the disposal of the writ petitions, the contempt petition is closed.

5.The management named above did not implement the aforesaid wage board notification and started extracting the signatures of the employees on pre-typed formats forcibly on threats of their jobs and started claiming that the recommendations of the wage board are not applicable on it. The aforesaid act of the management is in gross violation of Section 13 of the Working Journalists (C&S) and Misc. Provisions Act, 1955 as the working journalists are entitled to wages at rates not less than those specified in order. The provisions of Section 13 of the Act are very clear and are being reproduced for ready reference and compliance:

    13. Working Journalists entitled to wages at rates not less than those specified in the order.
    On the coming into operation of an order of the Central Government under Sec.12 every working journalist shall be entitled to be paid by his employer wages in the rate which shall, in no case, be less than the rate of wages specified in the order.

6. That the Working Journalists Act further protects the interest of the employees under Section 16 of the said Act by stating that any declaration, agreement etc which is inconsistent with the Act shall have no effect hence any claim being made by the employer regarding the declarations extracted by the employees is illegal on the face of it . The said provisions are reproduced here under for ready reference:

    16. Effect of laws and agreements inconsistent with this Act. (1) The provisions of this Act shall have effect notwithstanding anything inconsistent therewith contained in any other law or in the terms of any award, agreement or contract of service, whether made before or after the commencement of this Act :
    Provided that where under any such award, agreement, contact of service or otherwise a newspaper employee is entitled to benefits in respect of any matter which are more favorable to him than those to which he would be entitled under this Act, the newspaper employee shall continue to be entitled to the more favorable benefits in respect of that matter, notwithstanding that he receives benefits in respect of other matters under this Act.
    (2) Nothing contained in this Act shall be construed to preclude any newspaper employee from entering into an agreement with an employer for granting him rights or privileges in respect of any matter which are more favorable to him that those to which he would be entitled under this Act.

7. That the Supreme Court has considered all the contentions as raised before it in bunch of Contempt of court petitions and vide its orders dated 19/6/2017 reaffirmed that the newspaper establishments are under obligation to pay the Majithia Wage Board Award the remedy under Section 17 of the Working Journalists and Other Newspaper Employees (Conditions of Service) and Miscellaneous Provisions Act, 1955 is prescribed and the employees claimant the said benefits can seek the same by filing such applications, hence the present application.

8. That the details of the claims of the employee is as under:
Sr No. Salary period Salary paid Salary as per Majithia Award Difference/ Dues

Total Total dues

9. That the management is liable to pay the aforesaid benefits to the employee but is withholding the same illegally hence liable to pay interest on the same @ 24 % from the date of entitlement till the date of realization .

10. That the management be also restrained from victimizing the employee during the pendency of the present claim as contemplated under Section 16 of the said Act as there is a complete restriction on the action of the management . The said provision of law is reproduced here under for ready reference:

    16-A. Employer not to dismiss, discharge, etc., newspaper employee.- No employer in relation to a newspaper establishment shall, by reason of his liability for payment of wages to newspaper employees at the rates specified in an order of the Central Government under Sec. 12 or under Sec. 12 read with Sec. 13-AA or Sec. 13-DD, dismiss, discharge or retrench any newspaper employee.

11. It is therefore prayed that the management named above be directed to pay the dues as detailed above failing which a recovery certificate be issued in favour of the claimant.
Applicant
Name
Post
Address
Contact No.

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मजीठिया का लाभ लेने के लिए यह प्रक्रिया अपनाएं

सैकड़ों मीडियाकर्मियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ने वाले एडवोकेट उमेश शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने के लिए एक दिशा-निर्देश जारी किया है जिसे फालो करके कोई भी मीडियाकर्मी मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पा सकते है.

कृपया नीचे दी गई तस्वीर पर लिखी बातों को गौर से पढ़ें और इनका सावधानी से पालन करें…

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मजीठिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले पर एडवोकेट उमेश शर्मा की ये है टिप्पणी

Umesh Sharma
Advocate, Supreme Court


Analysing the order passed by the Supreme Court in the contempt petitions filed by employees against the newspaper establishments, it is evident that the core issue of wilful contempt, deliberate non-compliance of the directions issued by Supreme Court on 7/2/2014 and subsequent acts done by the newspaper establishments in discouraging the employees from claiming money to wage board benefits has escaped the attention of Supreme Court.

Going into the background of the matter, it is evident that all the newspaper establishments have challenged the Majithai Wage Board award as notified by the Central government directly before the Supreme Court in a writ petition under Article 32 of the Constitution of India. Supreme Court heard the aforesaid writ petitions at length and finally wide its orders of 7/2/2014, dismissed all the writ petition thereby upholding the notification of the Central Government.

The Supreme Court further issued time-bound directions for implementation of the said award and payment of the benefits due under the aforesaid award to the employees within one year in four equal quarterly installments. Supreme Court further issued directions for payment of the benefits of midget wage board with effect from first of April 2014. The operative part of the historic order is as under:

71) Accordingly, we hold that the recommendations of the Boards are valid in law, based on genuine and acceptable considerations and there is no valid ground for interference under Article 32 of the Constitution of India.

72) Consequently, all the writ petitions are dismissed with no order as to costs.

73) In view of our conclusion and dismissal of all the writ petitions, the wages as revised/determined shall be payable from 11.11.2011 when the Government of India notified the recommendations of the Majithia Wage Boards. All the arrears up to March 2014 shall be paid to all eligible persons in four equal installments within a period of one year from today and continue to pay the revised wages from April 2014 onwards.

74) In view of the disposal of the writ petitions, the contempt petition is closed.

It was for the first time that Supreme Court has upheld the legality of any Wage Board Award and issued specific directions for the implementation of the same. The legal effect of the same is that the award merged in the orders of the court. As was expected, none of the newspaper establishments complied with the aforesaid directions issued by Supreme Court and resorted to dishonest and myriad devices to overreach the specific time-bound directions issued by the Supreme Court. Not all but a handful of newspaper employees on the basis of the orders of Supreme Court demanded their benefits under the aforesaid order.

As expected, the newspaper establishments refused to release the benefits despite very clear and specific directions of Supreme Court and more clear notification issued by the Central government which categorizes the newspaper establishment on the basis of its gross revenue and places the employees on the basis of their duties and posts in particular category. Most of the employees demanding the aforesaid benefits were either denied the said benefits or harassed, victimized for their such demands. Instances of large-scale transfer, termination, discharge took place in various newspapers establishments for obvious reasons of discouraging the employees from claiming their rights under the wage board award.

Since the wage board award was upheld by the Supreme Court and specific directions were issued by the Supreme Court for implementation of the wage board award, the non-compliance of the aforesaid orders and non-implementation of the award clearly amounted to contempt of the orders of Supreme Court dated 7/2/2014 in Writ Petition No. ( C) 246 of 2011. A large number of employees, unions, representative of employees approached the honorable Supreme Court against the employers claiming that the employers have committed contempt of court by not implementing the orders of the court and by not granting the benefits accrued to them under the wage board award.

In total around 82 such petitions involving thousands of employees were filed and taken on board for hearing by the Supreme Court. The hearing in such matters commenced and the Supreme Court passed various interlocutory orders seeking compliance or non-compliance of the orders. As expected, most of the newspaper establishments resorted to twisting of facts, misrepresentations and raising frivolous legal objections before the court and the matter drifted from the core issue of deliberate, willful and intentional non-compliance of the orders of Honorable Supreme Court to some legal issues such as payment of VDA, entitlement of contractual employees, extraction of signatures on clause 20 (j) of the Majithia Wage Board Award besides several other related issues.

Since these issues were mainly raised on behalf of the employees, the employers got the golden opportunity to create controversy on the understanding of the wage board and proper implementation thereby creating an alibi of dispute and non-entitlement of the employees besides various other fake issues of serious losses, incapacity to pay the wage board recommendations etc. With the advancement of arguments on these issues the employees were very happy about arguments by their counsels on these issues and became very hopeful that Supreme Court is going to hold all these issues in their favor.

The emphasis also drifted away from the main and core issue of deliberate non-implementation of the orders on the fancy arguments presented by some of the counsels on behalf of the employees. The courts have limited powers under contempt of court jurisdiction, the raising of such unrelated issues was a strategic mistake on the part of the counsels for employees which opportunity was grabbed by the team of lawyers deputed by the newspaper establishments to defend themselves.

At one stage of the matter, the judges were very aggressive and particular to get their orders implemented however in the absence of any specified machinery and due to the raising of unrelated issues, the courts drifted away from the intention of seeking the compliance of the orders through labor authorities. Earlier labor commissioners, as well as the Chief Secretaries of the respective states, were directed to file reports with regard to the implementation of the orders.

After some time the said process was found to be ineffective by the Supreme Court hence dropped. The main reason for dropping the said procedure is the raising of various legal issues from the side of the employees which suited the teleological concept of justice and the judges also got drifted with the same. It is a matter of record that in some of the reports submitted by the labor authorities before Supreme Court, it was reflected on the records that some of the establishments have not implemented the aforesaid orders of Supreme Court. It was a clear case of contempt however the Supreme Court lost sight of the aforesaid facts once detailed arguments on several legal issues were raised on behalf of the employees.

After prolonged hearings, the Supreme Court finally reserved the matters on 3rd of May 2017 for orders and finally pronounced the same on 19th of June 2017. The court wide its orders held that the employers are not guilty of deliberate contempt. The court however delved upon the various issues as raised on behalf of the employees and recorded positive findings on the same. The court upheld that the signatures on any declaration accepting the pay scales benefits lower than the multitier wage board are not binding on the employees and will have no legal effect.

The court also held that the contractual employees have not been separately categorized under the Majithia Wage Board Award hence there is nothing on record to show that they are not entitled to the benefits of midget wage board. The court also recorded of the finding of grant of VDA to the contractual employees. The court mainly discussed the provisions of the Working Journalists Act, 1955 and upheld that various provisions of the aforesaid act are enough protection for the rights of the employees.

The court emphasized that the entire mechanism as provided under the aforesaid Act can be invoked by the employees for claiming their benefits. While discussing the provisions of section 17 of the aforesaid Act, the court has observed that the said section takes care of the claims of the employees. It is however painful that court has not made any qualifying determination with regard to the machinery provided under section 17 (1) of the said Act and section 17 (2) of the said Act because both these remedies are very distinct from each other.

A plain and simple reading of the provisions of section 17 (1) of the said Act would say that the employee has a right to claim its due under the act before the labor authorities who would recover the same by issuing a recovery certificate. The impact of the aforesaid provision is wide, as it gives sweeping powers to the labor Commissioner to recover the dues of the employees. A further construction of the aforesaid section would clarify that section 17 one of the Act specifically empowers the labor Commissioner to issue a recovery certificate for the dues of the employees.

As the dues under the Majithia Wage Board Award are statutory dues based on the classification of the newspaper establishment and classification of the employee based upon the nature of his duties, to my understanding, the same can be recovered reliably by issuance of a recovery certificate by the labour authorities despite any dispute being raised by the newspaper establishment because any such dispute raised by the newspaper establishment in this regard is liable to be treated as a sham or fake dispute as the claim of the employees based upon the statutory wage board which was intimately upheld by the Supreme Court.

Having ignored a discussion on this crucial provision and non-issuance of any specific direction by the Supreme Court, the field is open for the employers to create a dispute in every claim thereby making the aforesaid provision ineffective. It is worthwhile to mention that during the last three years, several recovery certificates have been issued by the labor commissioners on the basis of the claims filed by the employees.

So far as section 17 (2) of the Act is concerned, the same contemplates adjudication of the claim of the employee by the labor court. The said machinery is the most effective mechanism for determining the dues of the employees however given the prolonged period of adjudication and complexities of the adjudication process, ultimately the same proves to be ineffective and the employees remains at the receiving and by filing such claims. Another painful aspect of this matter is that Pandora of litigation by the resourceful employers is launched in the process of adjudication by the labor court and even after the final adjudication, the matter drags before the High Courts, then to the Supreme Court on various Perry Farrell issues.

The observations made by the Supreme Court in its orders dated 19th of June 2017 regarding the availability of the machinery for enforcement of the orders under section 17 two of the said aActare nothing but an attempted to wash off its hands despite clear and recorded violation done by some of the establishments in non-implementing and ignoring the orders of Supreme Court.

On general evaluation of the aforesaid judgement dated 19th of June 2017 by the Supreme Court it also shows the ineffectiveness and limitations of the Indian legal system in balancing the equities between the haves and the have-nots. The Supreme Court has written a very positive judgement but it only reaffirms and reiterates the various provisions available to the employees and painfully drifts away from the core issue of deliberate, intentional nonimplementation of the wage board award and the directions issued by the Supreme Court on seventh of February 2014. The core issue of contempt being pushed in the background, the discussion as done by the Supreme Court remains only an academic exercise which does not grant any relief to the employees of the newspaper establishments.

Coming to the point of implementation of the award of Majithia Wage Baord and the directions of the Supreme Court issued on 7/2/2014, the machinery as described under section 17 (1) and 17 (2) of the working journalists act is the only remedy now available to the employees. The issue of contempt therefore can be held to have been decided against the employees as the Supreme Court has specifically observed that there is no wilful violation of the order hence there is no contempt committed by the employers. Now the employees have the remedy to invoke the aforesaid provisions of section 17 (1) as well as 17 (2) as the case may be. This needs to be done in very planned and united manner by the employees.

A simple reading of section 17 (1) of the said act would show that even the union or any person authorised on behalf of the employee can file an application before the labour authorities for recovery of the dues of the employees. A construction of this provision would be that any union can file the claim application on behalf of employees of the establishment and ask the labour authorities to issue a recovery certificate against their dues.

The process for recovery of the said dues or for filing of such applications as suggested by be earlier is that the employee would prepare a chart of all its dues on the basis of its entitlement under the Majithia Wage Board Award. The said chart needs to be very specific showing various columns of the receipts made by the employees and the dues accruing under the Award and the balance dues to be recovered under the recovery certificate.

The same needs to be prepared meticulously giving the entire details thereby leaving no scope for any dispute on the such amount. The application under section 17 (1) of the Working Journalists Act can be filed before the labour authorities and followed by the unions if the employees are not in a position to make the said application.

The employees themselves can approach the High Court for giving a time bound direction for disposal of their applications by the labour authorities. In the event of the application is being referred by the labour authorities to the labour court for adjudication under the industrial disputes machinery, the entire process is liable to be delayed inordinately however in the absence of any other specific remedy, the same is the only remedy available to the employees now. All the unions, leaders need to formulate a clear strategy in this regard.

So far as the dispute of fitment and gross revenue of r newspaper establishments is concerned, no dispute on the same can be upheld before the labour court as the Majithia Wage Board Award has specifically defined about the nature of duties and the fitment of a particular employee, the claimant employee can very well produce evidence of his duties wide various records, emails, office orders etc and claim the benefits of a particular post.

Any dispute regarding the fitment of the newspaper establishment in a particular category based on its revenue will not stand as the declaration done by the said newspaper establishments before the Registrar of newspapers, income tax authorities, DAVP and other statutory authorities will disclose the gross revenue receipts of the said newspaper establishment. The employees or the union needs to proceed very careful in this matter by preparing a clear draft of the claim application supported by documents in evidence and someone all the documents in this regard before the labour authorities.

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मजीठिया मामले के निपटारे को सुप्रीम कोर्ट द्वारा कमेटी बनाए जाने की उम्मीद : एडवोकेट उमेश शर्मा

मजीठिया मामले में तीन मई को आरपार की उम्मीद…. देश भर के मीडियाकर्मियों के लिये माननीय सुप्रीमकोर्ट में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे एडवोकट उमेश शर्मा का मानना है कि अखबार मालिकों के खिलाफ चल रही अवमानना मामले की यह लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है और तीन मई को इस मामले में आरपार होने की उम्मीद है। यह पूछे जाने पर कि इस लड़ाई का निष्कर्ष क्या निकलने की उम्मीद है, एडवोकेट उमेश शर्मा का कहना है कि लड़ाई मीडियाकर्मी ही जीतेंगे लेकिन जहां तक मुझे लग रहा है, सुप्रीमकोर्ट इस मामले में एक कमेटी बना सकती है।

यह कमेटी अखबार मालिकों से साफ कहेगी कि आप कर्मचारियों की लिस्ट और इनकम टैक्स विभाग में जमा कराया गया अपना 2007 से 2010 तक की बैलेंसशीट लेकर आईये। यह कमेटी फाईनल कर देगी कि आपने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू किया या नहीं। यह कमेटी दस्तावेज देखकर तुरंत बता देगी कि अखबार मालिकों ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ कर्मचारियों को दिया है या नहीं। इससे काफी कुछ साफ हो जायेगा।

लीगल इशूज के मामले पर उमेश शर्मा ने कहा कि मैं बार बार कहता हूं कि लीगल इशूज कोई गंभीर मुद्दा नहीं हैं। इसके जरिये कुछ लोग सिर्फ भ्रम फैला रहे हैं और अखबार मालिक भी सुप्रीमकोर्ट को भ्रमित कर रहे हैं। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्री शर्मा ने कहा कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले का सही निराकरण कमेटी बनाकर ही हो सकता है और कमेटी बनी तो हम केस जीत भी जायेंगे। नहीं तो, लीगल इश्यू में फसेंगे तो फंसते ही जायेंगे।

उमेश शर्मा कहते हैं- अरे भाई साफ बताईये, हम अ्वमानना की सुनवाई में गये हैं तो इसमें लीगल इश्यू कहां से आ गया। लीगल इश्यू के ज्यादा चक्कर में पड़ेंगे तो हमें जिन्दगी भर लेबर कोर्ट का चक्कर ही काटना पड़ेगा। मैं आज भी अपने इस बात पर कायम हूं। लीगल इश्यू जो फ्रेम हुये हैं, सुप्रीम कोर्ट अगर सुनवाई के बाद यह बोल दे कि २० जे का मामला विवादित है और ये हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता तो हम इस पर कुछ नहीं कर सकते हैं।

दूसरी चीज अगर सुप्रीम कोर्ट यह बोल दे कि कंटेंप्ट के तहत यह स्पष्ट नहीं हो रहा कि मालिकों ने जान बूझ कर अवमानना की है, तो हो गया ना सबको नुकसान। इसका तरीका यह है कि पहले जांच कमेटी बनाने पर जोर दिया जाता फिर जांच कमेटी के सामने २० जे व अन्य समस्याओं के बारे में तथ्य इकट्ठा कर सुप्रीम कोर्ट के सामने लाया जाये तो सुप्रीमकोर्ट भी इसे गंभीरता से लेती। मैं फिर कह रहा हूं कमेटी बनाना ही एक मात्र उचित विकल्प होगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
९३२२४११३३५

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माई लॉर्ड ने वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना में तिहाड़ भेजा पर मीडिया मालिकों के लिए शुभ मुहुर्त का इंतजार!

…सहारा का होटल न खरीद पाने वाले चेन्नई के एक वरिष्ठ पत्रकार को सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का दोषी मान कर आनन-फानन में जेल भेज दिया… यह वरिष्ठ पत्रकार गिड़गिड़ाता रहा लेकिन जज नहीं पसीजे… पर मीडिया मालिक तो खुद एक बार सुप्रीम कोर्ट के सामने उपस्थित तक नहीं हुए और कोर्ट को चकरघिन्नी की तरह हिलाडुला कर, कोर्ट से समय पर समय लेकर अघोषित रूप से ललकारने में लगे हैं कि जेल भेज सको तो जरा भेज कर दिखाओ….

सवाल है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अवमानना पर अवमानना कर रहे मीडिया मालिकों के सिर पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कर रखी है अच्छी खासी कृपा… आखिर इन्हें जेल भेजने के लिए क्यों नहीं निकल पा रहा शुभ मुहुर्त और क्यों नहीं जग पा रहे सुप्रीम कोर्ट के जज साहिब लोग… एक वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना के मामले में लालची आदि बताते हुए जितनी तेजी से जेल भेजा गया, उतनी तेजी आखिर महा लालची मीडिया मालिकों के प्रकरण में क्यों नहीं दिखती… सवाल तो अब उठेंगे सुप्रीम कोर्ट पर भी क्योंकि पीड़ित मीडियाकर्मियों के सिर से उपर पानी बहने लगा है… 

पहले जानिए वरिष्ठ पत्रकार का प्रकरण जिसे सहारा के न्यूयार्क स्थित होटल को खरीदने के वादे से मुकरने पर जजों ने लानत-मलानत करते हुए आनन-फानन में जेल भेज दिया, उस पत्रकार के लाख गिड़गिड़ाने, कांपने, रोने और दस लाख रुपये तक जुर्माना भरने की अपील के बावजूद…

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एडवोकेट उमेश शर्मा की पत्नी एडवोकेट सुनीता भारद्वाज पर दिल्ली में दिनदहाड़े प्राणघातक हमला

भ्रष्ट बिल्डर-पुलिस गठजोड़ ने मिल-जुल कर कराया हमला… बाराखंभा रोड के न्यू दिल्ली हाउस में है उमेश और सुनीता का आफिस… इसी बिल्डिंग के बिल्डर से सुविधाओं को लेकर चल रहा था विवाद.. पुलिस से गठजोड़ करके बिल्डर ने एडवोकेट सुनीता भारद्वाज पर जानलेवा हमला करा दिया… अपने आफिस में जाने के दौरान किया गया हमला… कपड़े फाड़ डाले और सिर पर गहरा वार किया…

लहूलुहान सुनीता भारद्वाज बाराखंभा रोड थाने में हैं मौजूद… दिल्ली पुलिस लगातार कर रही है असहयोग… केंद्र सरकार के अधीन दिल्ली पुलिस का निकृष्टतम रूप आया सामने…. आरोपियों को अरेस्ट करने की बजाय पीड़ित को ही दे रही दिल्ली पुलिस नसीहत….

इस प्रकरण के बारे में भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने फेसबुक पर जो लिखा है, वह इस प्रकार है…

सुप्रीम कोर्ट के वकील Umesh Sharma की पत्नी सुनीता भारद्वाज पर हुआ जानलेवा हमला.. सुनीता जी भी हैं दिल्ली हाईकोर्ट की बड़ी वकील… बाराखंभा रोड स्थित न्यू दिल्ली हाउस बिल्डिंग के आफिस में घुसते समय हुआ हमला.. इस बिल्डिंग के बिल्डर से सुविधाओं को लेकर चल रहा है विवाद… दिल्ली की भ्रष्ट पुलिस मिली हुई है अपराधी बिल्डर से… आरोपी हमलावरों को पकड़ने की बजाय दिल्ली पुलिस पीड़िता एडवोकेट सुनीता शर्मा को दे रही है नसीहत… दिल्ली में मीडिया के साथी जो भी मौजूद हों, कृपया बाराखंभा रोड थाने पहुंच कर पीड़िता का बयान रिकार्ड करें-करवाएं और एडवोकेट उमेश शर्मा से संपर्क कर डिटेल लें.. उमेश जी का मोबाइल नंबर 9868235388 है..  इस मामले को गृह मंत्री राजनाथ सिंह के संज्ञान में लाने का भी प्रयास किया जाए क्योंकि दिल्ली के दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस के करीब स्थित न्यू दिल्ली हाउस बिल्डिंग में दिनदहाड़े एक जानी मानी सीनियर महिला वकील पर हमला किया जाना भयावह है… इसके बाद दिल्ली पुलिस का जो रवैया है, वह कतई जनपक्षधर नहीं है बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि बिल्डर ने पूरी प्लानिंग के साथ दिल्ली पुलिस को मिलाकर हमले की कार्यवाही को अंजाम दिलाया है… दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है.. इस पुलिस बल का यूं करप्ट होते जाना भाजपा और मोदी सरकार पर दाग के समान है…

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मजीठिया मामले में सुप्रीम कोर्ट में इस वकील के पाला बदलने से हर कोई अचरज में

पहले मीडियाकर्मियों के पक्ष में खड़ा होता था, इस बार मीडिया मालिकों के पक्ष में खड़ा हो गया… कभी सुप्रीम कोर्ट में महाधिवक्ता रह चुके कांग्रेस के मोहन पराशरन के खिलाफ जल्द ही बार एसोसिएशन में शिकायत की जायेगी. शिकायत करेंगे मजीठिया वेज बोर्ड मामले में देश भर के मीडिया कर्मियों की तरफ से सुप्रीमकोर्ट में केस लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा.

एडवोकेट मोहन पराशरन पर आरोप है कि वे मजीठिया वेज बोर्ड मामले में पहले मीडियाकर्मियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में मीडिया मालिकों के खिलाफ केस लड़ रहे थे. लेकिन पिछली तारीख पर वे पाला बदल लिए और मीडियाकर्मियों का साथ छोड़ कर अखबार मालिकों की तरफ से केस लड़ने लगे। एडवोकेट उमेश शर्मा के मुताबिक यह कुकृत्य अधिवक्ता अधिनियम १९६२ का उल्लंघन है और वे मोहन पराशरन के खिलाफ तथ्य इकट्ठा कर बार में शिकायत करेंगे। मोहन पराशरन के पाला बदलने से मीडियाकर्मी भी अचरज में थे.

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
9322411335

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मजीठिया वेज बोर्ड : सुप्रीम कोर्ट में मीडिया मालिकों की चाल होने लगी कामयाब, अगली डेट 10 जनवरी को

लीगल इश्यू के दावपेंच में पूरे मामले को लंबा खींचने की रणनीति में सफल दोते दिख रहे मीडिया मालिकों के वकील : जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में बुधवार को लीगल इश्यू पर माननीय सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुयी। इस सुनवाई में पहले से ही घोषित एक रणनीति के तहत तय किया गया कि मीडियाकर्मियों की तरफ से सिर्फ एक एडवोकेट श्री कोलीन ही बहस करेंगे और बाकी एडवोकेट उमेश शर्मा, परमानंद पांडेय आदि चुप रहेंगे। बहस के दौरान लीगल इश्यू के मुद्दे को मीडिया मालिकों की ओर से खड़ी एडवोकेट की भारी भरकम टीम ने हाईजैक कर लिया। यह सत्यता स्वीकार किया है माननीय सुप्रीमकोर्ट में मीडियाकर्मियों की तरफ से लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने।

उमेश शर्मा ने बुधवार को हुयी सुनवाई के बारे में बताया कि वही हो रहा है जिसके बारे में उन्हें आशंका थी। मैंने पहले ही बता दिया था कि लीगल इश्यू की डफली बजेगी तो खतरा है, मालिकों के वकील पूरे मामले को लंबा कानूनी दांवपेंच तर्क-कुतर्क में उलझा देंगे, जिसकी शुरुआत हो चुकी है। उमेश शर्मा ने साफ कहा कि मैं लगातार कह रहा हूं कि पहले टाईमबांड कमेटी बनाने पर जोर देना चाहिये जिसको तीन या 6 महीने में अपनी रिपोर्ट देनी हो। कल की सुनवाई के पहले सभी में यही तय हुआ था। ये कमेटी सभी अखबार मालिकों को बुलाती और उनको कहती कि आप अपनी बैलेंससीट और कर्मचारियों को दी जा रही सेलरी का डिटेल लेकर आईये। अगर नहीं लेकर आते हैं या गलत रिपोर्ट लेकर आते हैं तो ये कमेटी सुप्रीमकोर्ट को रिपोर्ट दे देगी। बजाय टाइमबांड कमेटी बनाने की मांग करने के, अब हर ओर लीगल इश्यू की डफली बजायी जा रही है जो हम सभी को खतरे की ओर ले जा रही है।

एडवोकेट उमेश शर्मा ने कहा कि बुधवार की सुनवाई जैसे ही शुरू हुयी, मीडिया मालिकों की ओर से सीनियर एडवोकेट अनिल दिवान ने कहा कि आज ये जो इश्यू मीडियाकर्मियों के वकील लोग बोल रहे हैं, इनका जिक्र तो कंटेम्ट में कहीं किसी रूप में है ही नहीं। उसके बाद इनाडू की तरफ से आये गोपाल सुब्रमण्यम ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उन्हें ४ सप्ताह का समय दिया जाये। वे पता करेंगे कि इनाडु मैनेजमेंट वेज बोर्ड की सिफारिश पूरी तरह क्यों नहीं लागू कर पाया है। इसके बाद माननीय सुप्रीमकोर्ट ने अगली डेट 10 जनवरी की देदी। आगे 10 जनवरी को क्या होगा, इस पर उमेश शर्मा कहते हैं अभी लीगल इश्यू पर बहस होगी जिसमें अगर तय हो गया कि कोर्ट को पावर नहीं है तो मालिकों को बचने का एक बहाना मिल जायेगा। तो क्या सबका केस खारिज हो जायेगा, इस पर उमेश शर्मा कहते हैं- नहीं, हमारा केस खारिज नहीं होगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई में जब लीगल इश्यू की डफली बजने लगेगी तो कमेटी की बात पीछे रह जायेगी : एडवोकेट उमेश शर्मा

सुप्रीमकोर्ट के जाने माने एडवोकेट उमेश शर्मा जब अपने चिर-परिचित अंदाज में सुप्रीम कोर्ट में बहस करते हैं तो अखबार मालिकों की घिग्घी बंध जाती है। मीडियाकर्मियों के पक्ष में पालेकर वेज बोर्ड, बछावत वेज बोर्ड, मणिसाना वेज बोर्ड और अब जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे उमेश शर्मा को लेबर लॉ का काफी अनुभव है। साफगोई से हर बात कहने वाले मृदुभाषी उमेश शर्मा ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर देश भर में मीडियाकर्मियों के लिये एक आंदोलन खड़ा किया। हमेशा बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले उमेश शर्मा से आठ नवंबर को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई और उसके बाद आये आर्डर पर बात किया मुंबई के निर्भीक पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह ने। प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश…

– 8 नवंबर को मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई के बाद आये आर्डर को आप किस रूप में लेते हैं?
-ये आर्डर उस तरह से नहीं है जो बहस हुयी थी. सुनवाई के दौरान जिस तरह से जज साहब लोगों ने कहा कि हम एक मानीटरिंग कमेटी बनायेंगे, वो इस आर्डर में तो नहीं है। यह बात स्पष्ट है कि लेबर कमिश्नर की रिपोर्ट मंगा कर मजीठिया लागू कराने का विचार अब त्याग दिया गया है। कमेटी के बारे में उन्होंने बोला था और आर्डर में हल्का सा इंडिकेट भी किया है लेकिन अगली डेट पर जब लीगल इश्यू की डफली बजने लगेगी तो कमेटी की बात पीछे रह जायेगी।

-लीगल इश्यू वाले मुद्दे को आप कितना सही मानते हैं क्योकि कई बार आप बोल चुके हैं कि लीगल इश्यू की नाव चलेगी तो डूबने का खतरा है?
-मैं आज भी अपने इस बात पर कायम हूं। लीगल इश्यू जो फ्रेम हुये हैं, सुप्रीम कोर्ट अगर सुनवाई के बाद यह बोल दे कि २० जे का मामला विवादित है और ये हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता तो हम इस पर कुछ नहीं कर सकते हैं। दूसरी चीज अगर सुप्रीम कोर्ट यह बोल दे कि कंंटेंप्ट के तहत हमारे अधिकार क्षेत्र में कमेटी बनाना नहीं है, अगर सुप्रीम कोर्ट यह भी बोल दे कि यह स्पष्ठ नहीं हो रहा कि मालिको ने जान बूझ कर अवमानना की है तो हो गया ना सबको नुकसान। इसका तरीका यह है कि पहले जांच कमेटी बनाने पर जोर दिया जाता फिर जांच कमेटी के सामने २० जे व अन्य समस्याओं के बारे में तथ्य इकट्ठा कर सुप्रीम कोर्ट के सामने लाया जाये तो सुप्रीमकोर्ट भी इसे गंभीरता से लेती।

-जो रिपोर्ट भेजी गयी है राज्यों के लेबर कमिश्नरों द्वारा आप उससे कितने संतुष्ट हैं?
-ये रिपोर्ट पूरी तरह फेक है। सुप्रीमकोर्ट को इसे तोड़ना चाहिये। इस रिपोर्ट की एक कमेटी बनाकर इसकी जांच करानी चाहिये। झूठ बोलने वाले कमिश्नरों को जेल भेजना चाहिये सीधा। ये हमेशा कोर्ट को गुमराह करते हैं।

-ये लेबर कमिश्नर का सुनवाई के दौरान प्रयास यही रहता है १७ (१) के पूरे मामले को १७ (२) में भेज दिया जाये। आप भी हमेशा विरोध करते हैं कि १७ (१) का मामला १७(२) में नहीं जा सकता है. 
-बिल्कुल सही बात है कि १७ (१) का मामला १७ (२) में भेजना पूरी तरह गलत है। ऐसा एक्ट में कहीं नहीं है। एक तो १७ (१) के मामले का ये लोग सही तरीके से कंडक्ट नहीं कर रहे हैं और इसे मिस यूज कर रहे हैं। अगर यूज करते तो मध्यप्रदेश की तरह सभी राज्यों के लेबर कमिश्नर अखबार प्रबंधन के खिलाफ रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करते। मिस यूज ये कर रहे हैं कि १७ (१) के अप्लीकेशन को ये लोग १७(२) में भेजकर पीछा छुड़ा लेते हैं जबकि उन्हें १७(१) के एप्लीकेशन को १७(२) में भेजने का प्रावधान ही नहीं है। अब इन्होंने पीछा छुड़ा लिया और अब आप लड़ते रहिये।

-अवमानना के मामले में जिन अखबारों के बारे में सुप्रीमकोर्ट में रिपोर्ट भी चली गयी है कि इन अखबारों के प्रबंधन ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं किया और कुछ अखबारों के मालिकों के खिलाफ आरसी भी कट गयी है फिर उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला क्यों नहीं बनता है?
-इस मामले को मैने ८ नवंबर की सुनवाई में रखा था लेकिन जज साहब इस पर कुछ अटक गये। मैने यही कहा कि जिनकी रिपोर्ट में आ गया है कि इन्होंने वेज बोर्ड नहीं लागू किया उनके खिलाफ तो सीधे सीधे मामला बनता है तो जज साहब ने पूछा कि क्या बनता है, तब मैंने कहा कि सर अवमानना का मामला बनता है।

-जिन मीडियाकर्मियों ने भी जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर मांगा उनका ट्रांसफर टर्मिनेशन कर दिया जाता है। इसका क्या उपाय है क्योंकि ये काफी गंभीर मामला है?
-ये कमेटी में तय हो जायेगा। कमेटी जब बनेगी तब इस मामले को कमेटी गंभीरता से देख लेगी। एक तो दिक्कत ये है जितने भी लेबर कमिश्नर होते हैं वे बहुत ज्यादा मजीठिया वेज बोर्ड या वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के बारे में नहीं जानते हैं। तुर्रा यह है कि एक तो वे करना नहीं चाहते दूसरा उनको आता नहीं और वे सक्षम भी नहीं हैं। उनको सौ पेज की बैलेंसशीट दे दीजिये, बेचारे घबड़ा जाते हैं। सर्कुलेशन फीगर तक इनको नहीं पता रहता है।

-कई जगह के अखबार मालिक अपना 2007 से 2010 तक की बैलेंसशीट नहीं दे रहे हैं। इस पर आप क्या कहेंगे?
-ये चीजें कमेटी तय करेगी। एसआईटी तो हमने नाम दे दिया। अब सोचिये जांच कमेटी अगर कहेगी कि आप २००७ से १० तक की बैलेंससीट लेकर आईये, अगर वे नहीं लेकर आयेंगे तो कमेटी सीधे सुप्रीमकोर्ट को रिपोर्ट भेज देगी। सुप्रीमकोर्ट कहेगी कि तुम कमेटी की बात भी नहीं मान रहा है तो आ जाओ कंटेम्प्ट में। वो तभी सीधा होंगे। अभी क्या है लेबर कमिश्नरों के उपर अखबार मालिक दबाव डलवाते हैं। कमेटी एक रिटायर जज के नेतृत्व में होगी जो कि इन बातों को अच्छी तरह से समझ सकती है। आखिर मजीठिया वेज बोर्ड भी तो ऐसे ही रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में काम कर रहा था और सारी बातों को सुन परख कर ही तो अवार्ड दिया है. समिति भी इसी तर्ज पर काम कर सकती है.

-लीगल इश्यू की सुनवाई के दौरान और कौन कौन से मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिये?
-नहीं, लीगल इश्यू पर अभी बहस कराना खतरनाक है। एक उदाहरण देता हूं।  २० जे पर अगर सुप्रीमकोर्ट बोल दे कि कर्मचारियों ने साईन किया है तो हम क्या कर सकते हैं तो हो गया ना सबका नुकसान। इसलिये मैं कह रहा हूं कमेटी बनवा लीजिये। कमेटी से चर्चा कर लीजिये और फिर सुप्रीम कोर्ट में बहस करा लीजिये, लीगल इश्यू पर तो अपना पक्ष मजबूत होगा। अभी तो कई फैक्ट आये नहीं है। गोल गोल घुमाया जा रहा है। अगर खिलाफ गया तो क्या करेंगे आप।

-आप मीडियाकर्मियों के पक्ष में पहले भी कई वेज बोर्ड के लिये भी लड़े हैं। आपकी लेबर लॉ पर अच्छी पकड़ है। दूसरे वेज बोर्ड से जस्टिस मजिठिया वेज बोर्ड को आप कैसे अलग मानते हैं?
-जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड इन सबों में सबसे बेहतर पोजिशन में हैं। इसको सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है और अपने आदेश दिनांक ७/२/२०१४ में स्पष्ट रूप से निर्देश दे कर लागू करने को कहा है और पहली बार अवमानना में इतना समय देकर हर तरह से इसे लागू करने में लगा है। इसके पहले के वेज बोर्ड बहुत सारे संस्थानों ने लागू किया था और कहीं कहीं ग्रेड और फिटमेंट को लेकर ज्यादा विवाद था। कोई कंपोजर था तो उसको दूसरा कोई काम दिया जाता था। वो विवाद था बाकी इसे लोगों ने लगभग लागू कर दिया था। बछावत के बाद तो सही तरीके से लागू ही नहीं हुआ कोई वेज बोर्ड।

-अखबार मालिक आखिर जेल कब जायेंगे?
-अभी टाईम लगेगा लेकिन अगर लीगल इश्यू का कोई पेंच फंस गया तो सारे के सारे बच जायेंगे। अगर कमेटी बनाकर मामला चला तो कोई ना कोई जरूर फंसेगा, जैसे पिछली सुनवाई में इनाडु के मालिक फंस रहे थे। इनाडु के बारे में लिखा है कि इन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं किया है मगर लीगल इश्यू को लेकर इतना दायें बायें हो गया कि इस ओर से जज का ध्यान हट गया। 

-इस मामले में सभी मीडियाकर्मियों की मंजिल एक है फिर आप और कोलिन सर और परमानंद पांडे जी एक साथ बैठकर मुद्दे क्यों नहीं तय कर लेते हैं कि किस मुद्दे पर बहस सुप्रीम कोर्ट में करना है?
-मुझे कोई प्राब्लम नहीं है। कई बार लोगोें ने काफी प्रयास भी किया। मैं तो हमेशा तैयार रहता हूं ताकि आमने-सामने बैठकर बात किया जाये।

शशिकांत सिंह 
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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मजीठिया वेज बोर्ड : सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी बनाने का निर्देश दिया

सही दिशा में जा रही है जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई :  देश भर के मीडियाकर्मियों के वेतन एरियर तथा प्रमोशन से जुड़े जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट ने एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम यानी एसआईटी बनाने का निर्देश दिया है। इस एसआईटी को लीड करेंगे हाईकोर्ट के एक रिटायर जज। आखिर ये एसआईटी के गठन के बाद जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई किस दिशा में जा रही है? देश भर के मीडियाकर्मियों में इस बात को लेकर सवाल उठ रहा है। तमाम शंकाओं के समाधान के लिए मैंने इस मामले में पत्रकारों की तरफ से लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा और परमानंद पांडे जी से बात की।

सवाल पहला यही था कि इस एसआईटी के मायने क्या हैं और हमारी लड़ाई किस दिशा में जा रही है। सवाल ये भी था कि पहले राज्यों के चीफ सेक्रेटरी को तलब किया गया फिर लेबर कमिश्नरों को बुलाया गया और अब जबकि राजस्थान जैसे प्रदेशों के लेबर कमिश्नरों का सुप्रीमकोर्ट में आना बाकी है, इस गति को विराम देकर एसआईटी बनाने का आदेश देना कितना सही कदम होगा। इस पर एडवोकेट उमेश शर्मा कहते हैं कि यह बिलकुल सही कदम है। वे कहते हैं 8 नवंबर को खुद सुप्रीम कोर्ट के जज रंजन गोगोई सर ने सुनवाई के दौरान माना कि लेबर कमिश्नर गोल मोल जवाब ला रहे हैं। तेलंगाना के लेबर कमिश्नर को फटकार भी सुप्रीमकोर्ट में लगाई गयी। उमेश शर्मा कहते हैं खुद सुनवाई में रंजन गोगोई जी ने साफ़ कह दिया कि अखबार मालिकों को अपने कर्मचारियों को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देना ही पड़ेगा। वे इस मामले को लंबा नहीं खींच सकते। उमेश शर्मा से जब लीगल इश्यू पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने एक बार फिर दोहराया बिना एसआईटी गठन हुए लीगल इश्यू पर बहस करना घातक होगा और ऐसा करने से बचना चाहिए।

एसआईटी के गठन का स्वरूप क्या होना चाहिए, इस पर उमेश शर्मा कहते हैं कि ऑर्डर आने दीजिये। इस एसआईटी को हाईकोर्ट के रिटायर जज लीड करेंगे। इस एसआईटी में सेन्ट्रल लेबर कमिश्नर और राज्यों के चीफ सेक्रेटरी मेंबर होंगे और उनका दायित्व होगा कि वे सुप्रीमकोर्ट के आदेश का पालन कराएं, ऐसी हमें उम्मीद है और उनकी जिम्मेदारी फिक्स होगी। उमेश शर्मा कहते हैं कि मैं बार बार आग्रह करता हूँ कि देश भर की तमाम पत्रकार यूनियन और पत्रकारों का नेता बनने वाले यूनियन पदाधिकारी सामने आयें और पत्रकारों के अधिकार के लिए जहाँ जहाँ जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू नहीं है, वहां लागू कराने के लिए पहल करें। इसमें कर्मचारियों के साईन की जरूरत भी नहीं है। उमेश शर्मा ने आईएफ़डब्लूजे से भी आग्रह किया है कि आपकी नेशनल यूनियन है, आप देश भर में पत्रकारों की इस लड़ाई के लिए सामने आइये। इस एसआईटी के गठन के बाद मीडियाकर्मियों के लिए क्या फायदा होगा, इस पर उमेश शर्मा कहते हैं कि देश भर के जितने भी मजीठिया वेज बोर्ड के मामले होंगे सब एसआईटी की देखरेख में होगा। एसआईटी सुप्रीमकोर्ट के सर्विलांस में होगा।

इस मुद्दे पर हमने एडवोकेट परमानंद पांडे जो आईएफडब्लूजे के सेक्रेटरी जनरल भी हैं और खुद सुप्रीमकोर्ट में मीडियाकर्मियों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे हैं, से सवाल जवाब का सिलसिला चलाया। एसआईटी के गठन के सवाल पर परमानंद पांडे का कहना है एसआईटी के गठन का निर्णय बिलकुल सही निर्णय है। परमानंद पांडे कहते हैं बहुत अच्छी सुनवाई चल रही है। अभी आप ऑर्डर आने दीजिये फिर देखिएगा। पिछले ऑर्डर से अगला ऑर्डर बेहतर होगा। एसआईटी के गठन पर परमानंद पांडे कहते हैं एसआईटी का गठन एक सही निर्णय है। सुप्रीमकोर्ट के पास बहुत केस रहते हैं। इस एसआईटी के पास सिर्फ एक केस होगा और वो होगा मीडियाकर्मियों को न्याय दिलाने के लिए। हम एसआईटी में ट्रांसफर और टर्मिनेशन के मुद्दे को भी रख सकते हैं। वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 16 (ए) के तहत हम इस मामले को एसआईटी के समक्ष लाएंगे। अखबार मालिकों को अदालत की अवमानना के मामले में दोषी क्यों नहीं अब तक माना गया है, इस पर परमानंद पांडे कहते हैं इसमें सबसे बड़ी दिक्कत है बड़े अखबारों ने अपने कर्मचारियों से 20 जे पर साइन करा लिया है। 20 जे का अखबार मालिक दुरूपयोग कर रहे हैं। 20 जे पर सुप्रीमकोर्ट का कोई सटीक निर्णय आये बिना हम ऐसा नहीं कर सकते और जिन अखबारों ने 20 जे पर साइन नहीं कराया उनमें एकाक को छोड़ दें तो वे छोटी मछलियां हैं। लेकिन यकीन मानिये कोई भी अखबार मालिक 20 जे की आड़ में बच नहीं सकता।

आप की नजर में एसआईटी का स्वरूप क्या होना चाहिए, इस पर परमानंद पांडे कहते हैं देश भर के मीडिया कर्मियों की कॉमन शिकायत आ रही है कि लेबर विभाग उन्हें सहयोग नहीं कर रहा है और गलत रिपोर्ट सुप्रीमकोर्ट को भेजी जा रही है। इस मामले को सुप्रीमकोर्ट ने गंभीरता से लिया है और एसआईटी बनाने का आदेश दिया जो काबिले तारीफ़ कदम है। एसआईटी के स्वरूप पर ऑर्डर के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। परमानंद पांडे ने देश भर के मीडियाकर्मियों को आश्वस्त किया है कि आपको जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ जरूर मिलेगा, ये सुप्रीमकोर्ट भी कह चुका है।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335

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मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट में कल हुई सुनवाई का विवरण जानिए एडवोकेट उमेश शर्मा से

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में देश भर के मीडियाकर्मियों की तरफ से सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने अपने फेसबुक वॉल पर मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई का ब्यौरा साझा किया है, पढ़िए आप भी…

ADVOCATE UMESH SHARMA

दिनांक 8/11/2016 को  हुए जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुनवाई का विस्तृत ब्योरा पेश है… वास्तविकता के आधार पर लिख रहा हूं जो कि न्यायालय के आदेश में इंगित नहीं भी हो सकता है… न्यायालय इस बात से आहत और विवश दिख रही थी कि उसके द्वारा आदेशित किए जाने के बावजूद लेबर कमिश्नर मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने सम्बंधित रिपोर्ट को गोल मोल कर रहें हैं। 

न्यायाधीश महोदय ने कहा कि अब हम इस तरह की मॉनीटरिंग नहीं कर पाएंगे और मुख्य सचिव को ही जिम्मेवार मानते हुए कार्यवाही निर्देशित करेंगे। एडवोकेट श्री कोलिन द्वारा अपने रिपोर्ट का कुछ हिस्सा न्यायालय के सामने रखा गया और बताया गया कि कुछ संस्थानों में स्थाई कर्मचारी दर्शाये ही नहीं गए हैं जिन पर मजीठिया लागू किया जा सकता है, वहां सिर्फ तदस्थ एवं ठेका कर्मचारी हैं जो मजीठिया से बाहर हैं।

मैंने (उमेश शर्मा) ने कहा कि लेबर कमिश्नर की रिपोर्ट में जहाँ भी यह आ गया है कि कुछ संस्थानों ने मजीठिया लागू नहीं किया गया है, उन पर तो सीधा सीधा न्यायालय के अवमानना का मामला बनता है और उनको अवमानना का दोषी मान कर कार्यवाही की जाये। एडवोकेट श्री परमानन्द पांडेय ने यह मुद्दा उठाया कि जहाँ भी कर्मचारी मजीठिया का मुद्दा उठाते हैं वहां उनको निकाल दिया गया है या स्थानांतरित कर दिया गया है जो गैरकानूनी है और इस पर किसी लेबर कमिश्नर ने कोई कार्यवाही नहीं की है। श्री कॉलिन द्वारा अन्य भी कई सुझाव दिए गए जिनका विस्तार से उल्लेख करना यहाँ आवश्यक नहीं है. 

न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि किसी सेवानिवृत न्यायाधीश की एक कमेटी बनाई जाये जो इन सब पर विस्तृत कार्यवाही करे और उसकी रिपोर्ट पर ही सुप्रीम कोर्ट आगे कार्यवाही करे.

ऐसा हो सकता है कि न्यायालय अपने अगले आदेश में कोई समिति बनाने की प्रक्रिया बताये।

मैं अपने पूर्व अनुभव के अनुसार यह बात पिछली सुनवाई के बाद श्री परमानन्द पांडेय, पुरुषोत्तम जी, शशि कान्त सिंह को बता चुका हूँ और मैं इस बात की अनुमोदन भी करता हूँ और सभी साथी अधिवक्तागणों से अनुरोध करता हूँ कि हम सब न्यायाधीश के नेतृत्व में मानीटरिंग कमेटी बनाए जाने की बात पर न्यायालय को अपना सहयोग दें. उसमें यह बात मुख्य रूप से होनी चाहिए कि समिति सभी संस्थानों से उनके कर्मचारियों के वेतनमान का विवरण मांगे और सब कुछ साफ हो जायेगा कि किसको क्या मिल रहा है और क्या मिलना चाहिए था। यह सब समयबद्ध हो और उसके अनुसंशा पर सुप्रीम कोर्ट आदेश पारित करे और अवमानना तय करे।

मेरे विचार में लीगल इश्यूज वाली नाव अगर इसके पहले चल पड़ी तो जरूर डूबेगी। यह मेरे सीमित कानूनी ज्ञान से मेरा व्यक्तिगत विचार है। एक बात और स्पष्ठ है कि प्रबंधकों को राहत की सांस अानी शुरू हो गयी है क्योंकि उनकी तरफ से कोई नामचीन अधिवक्ता जो पहले न्यायालय के समक्ष खड़े रहते थे, वो इस सुनवाई में नहीं थे सिवाय श्री पी पी राव के जो कि अगली सुनवाई में लीगल इश्यूज का जवाब देंगे. 

लेखक एडवोेकेट उमेश शर्मा सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के जाने माने वकील हैं.

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22 साल पहले भी उमेश शर्मा कटवा चुके हैं अखबार मालिक की आरसी

देश भर के मीडियाकर्मियों के अधिकार से जुड़े मजीठिया वेज बोर्ड मामले की माननीय सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा 22 साल पहले भी एक समाचार पत्र के मालिक की आरसी कटवा चुके हैं। ये मामला 1994 का है और अखबार का नाम था संडे मेल। संडे मेल अखबार में 300 से 400 कर्मचारियों का पैसा फंस गया था और इसका मालिक अचानक कार्यालय का तालाबंद कर लापता हो गया था। मालिक का नाम संजय डालमिया था। पैसा फंसने के बाद कुछ मीडियाकर्मी सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा के पास पहुंचे।

उमेश शर्मा ने तब इस केस को हैंडल किया और उस समय ट्रिब्यूनल में जाकर ना सिर्फ अखबार मालिक के खिलाफ आरसी जारी करवाया बल्कि 300 से 400 कर्मचारियों का पैसा भी दिलवाया। उस समय इस अखबार के मालिकान पर प्रत्येक कर्मचारी का आठ से दस हजार रुपये बकाया था जो उस समय के लिहाज से एक ठीकठाक एमाउंट हुआ करता था। एडवोकेट उमेश शर्मा ने एक बड़ी महिला पत्रकार को भी उसका बकाया आरसी कटवाकर सन्डे मेल से दिलवाया था। ये महिला पत्रकार अब टेलीविजन न्यूज़ का जाना माना नाम हैं। उस समय इस अखबार के मालिक की गाड़ी का गुस्साए कर्मचारियों ने कांच तक तोड़ डाला था।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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ट्रांसफर-टर्मिनेशन से कानूनी बचाव के लिए एडवोकेट उमेश शर्मा ने जारी किया फार्मेट

इसे सभी लोग अपने अनुसार सुधार / संशोधित कर संबंधित श्रम अधिकारी को दें….

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट में देश भर के पत्रकारों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने आज एक और फार्मेट जारी किया है। जिन मीडिया कर्मियों ने मजीठिया वेज बोर्ड के तहत प्रबंधन के खिलाफ लेबर विभाग में 17 (1) का क्लेम लगाया है, वे सभी लोग इस फार्मेट को भरकर तत्काल अपने-अपने लेबर विभाग में जमा करा दें। इस फार्मेट के बाद अगर आपका प्रबंधन आपका ट्रांसफर या टर्मिनेशन या सस्पेंशन करता है तो आगे की कानूनी लड़ाई में यह काम आयेगा। यही नहीं, इससे मीडियाकर्मियों का प्रबंधन द्वारा किये जा रहे उत्पीड़न पर भी काफी हद तक रोक लगेगी।

दोस्तों, आप सबसे एक बात और शेयर करूँगा। उमेश सर पिछले कई माह से मेरे कहने पर उन साथियों की मदद भी करते आ रहे हैं जो उनके क्लाइंट नहीं हैं। उमेश शर्मा सर ने नि:शुल्क कई साथियों को 17 (1) का भी क्लेम फार्मेट दिया जिसे बाद में देश भर के पत्रकारों ने भरा और अब भी उसी 17(1) के फार्मेट पर क्लेम किया जा रहा है। आप सबसे निवेदन है कि आप सब उनका सम्मान करते हुए अगर कुछ उनसे जानना पूछना बताना है तो उन्हें सीधे फोन करने की जगह उन्हें उनकी मेल आईडी LegalHelpLineindia@gmail.com पर मेल कर दिया करें। फिलहाल आप सब अभी तो उत्पीड़न या ट्रांसफर टर्मिनेशन रोकने के लिए तुरंत इस फार्मेट को भर कर लेबर विभाग में जमा करें और उसकी प्रति सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को भी जरूर भेजें। उमेश शर्मा सर द्वारा दिया गया नया फार्मेट ये है…

To ……………………..

Date……………………

Sub: Protest against harassment by the officials of the management-violation of the orders of Supreme Court of India and violation of Section 16 A of the WJ Act.

Sir,

I am constrained to protest against the illegal, unconstitutional and vindictive acts of the officials of the management in threatening and intimidating me just  because I have asserted my rights and filed the application under Section 17(1 ) of the Working Journalist Act for claiming my benefits under Majithia Wage Board Award. Earlier I had filed the CCP No. 129/2015 before the Supreme Court of India against the act of non-compliance of the directions issued by the Supreme Court of India in WP (C) No. 246/1011 on 7/2/2014.

Now, the  officials of the management  has started threatening and coercing me to withdraw the proceedings  and have  warned me that if I do not withdraw my CCP and the application under Section 17 (1) of the WJ Act, they will force me to resign from my services. I am being gunned down for my forthright stand in asserting my legal rights.

The abovesaid act of the officials of the management is illegal on the face of it as it is prohibited under Section 16 of the WJ Act . The said act is also contempt of the Supreme Court as the said officials are trying to overreach the proceedings pending before the Supreme Court by intimidating me under the threat of my services. I shall be forced to file Contempt of Court proceedings against the  officials of the management making them personally liable  before the Supreme Court besides invoking the powers contemplated under Section 16 A of the WJ Act if the threats being extended by the said officials is not withdrawn and I am allowed to perform my duties properly.

I once again request you to release the benefits arising out of the Majithia Wage Board to me in terms of the directions issued by the Supreme Court in its orders dated 7/2/2014 in WP (C) No. 246/2011.

Yours
………………
…………….
………………

Copy forwarded for information and action to:

Registrar, Supreme Court of India w.r.t. CCP No. 129/2015 titled as “Yashwant Singh Vs Mahendra Mohan Gupta & Ors” – with a prayer to place the present letter before the Bench alongiwith the file of the CCP for directions.

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सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन और संजय गुप्ता को तलब किया

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न करने और सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानून, न्याय, संविधान तक की भावनाओं की अनदेखी करने से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने आज दैनिक जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन गुप्ता और संजय गुप्ता को अगली सुनवाई पर, जो कि 25 अक्टूबर को होगी, कोर्ट में तलब किया है. आज सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न किए जाने को लेकर सैकड़ों मीडियाकर्मियों द्वारा दायर मानहानि याचिका पर सुनवाई हुई.

कोर्ट ने आज के दिन कई प्रदेशों के लेबर कमिश्नरों को बुला रखा था. कोर्ट ने सभी लेबर कमिश्नरों से कहा कि जिन जिन मीडियाकर्मी ने क्लेम लगाया है, उसमें वे लोग रिकवरी लगाएं और संबंधित व्यक्ति को न्याय दिलाएं. कोर्ट के इस आदेश के बाद अब श्रम विभाग का रुख बेहद सख्त होने वाला है क्योंकि पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लापरवाही बरतने पर उत्तराखंड के श्रमायुक्त के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था.

सैकड़ों मीडियाकर्मियों की याचिका का प्रतिनिधित्व करते हुए एडवोकेट उमेश शर्मा ने आज सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दैनिक जागरण की किसी भी यूनिट में किसी भी व्यक्ति को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से न तो एरियर दिया गया है और न ही सेलरी दी जा रही है.

साथ ही दैनिक भास्कर समूह के बारे में भी विस्तार से बताया गया. आज सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों को कोर्ट में आने के लिए आदेश कर दिया है ताकि उनसे पूछा जा सके कि आखिर वो लोग क्यों नहीं कानून को मानते हैं. चर्चा है कि अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट भास्कर के मालिकों को तलब कर सकता है. फिलहाल इस सख्त आदेश से मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर है.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुंबई के पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह भी मौजूद थे. उन्होंने फोन करके बताया कि आज सुप्रीम कोर्ट ने जो सख्ती दिखाई है उससे वे लोग बहुत प्रसन्न है और उम्मीद करते हैं कि मालिकों की मोटी चर्बी अब पिघलेगी. सैकड़ों मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित अपने हक के लिए गाइड करने वाले पत्रकार शशिकांत सुप्रीम कोर्ट में हुई आज की सुनवाई की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं जिसे जल्द भड़ास पर प्रकाशित किया जाएगा.

अपडेटेड न्यूज (7-10-2016 को दिन में डेढ़ बजे प्रकाशित) ये है….

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जस्टिस काटजू को एक बिहारी का खुला पत्र

Mr Justice Katju

I am a lawyer hailing from Bihar and practicing in Delhi High Court, Supreme Court of India. I have been closely following your musings earlier in the courts now on social media. I am piqued to write this open letter in response to your offer to Pakistan to take Bihar alongwith Kashmir as a package deal. Sir, you have not only undermined the sovereignty of our nation but also committed the offense of Sedition attracting punishment. May I reproduce the Section of IPC dealing with Sedition for your ready reference :

“124. A . Sedition. Whoever, by words, either spoken or written, or by signs, or by visible representation, or otherwise , brings or attempts to bring into hatred or contempt, or excites or attempts to excite disaffection towards, the Government established by law in India shall be punished with imprisonment for life, to which fine may be added or with imprisonment which may extent to three years, to which fine may be added or with fine.”

Sir, having born with a silver spoon in your mouth as  your grandfather was one of the leading lawyers of country, your father and uncle being  High Court judges, you got elevated to High Court initially and then to Supreme Court. We know your lineage of Kashmiri Pandits settled in green pastures of Central India after leaving  your motherland as your forefathers choose to run away from their motherland. We Biharis never do so, ask the people who migrated to Caribbean, South Africa centuries ago, they still maintain ties with motherland. Ask any Bihari around Delhi, he still has ties with his motherland unlike your family. 

I have occasions (sic) to appear in your court and see your gimmicks which initially I respected as a lawyer but subsequently got to know your court craft and realized that your behavior as a judge in court room was highly infected with self proclamation besides being motivated.  As a judge of High Court and Supreme Court you selectively hauled up an ordinary lawyer and showed utmost respect and recognition to the heavy weights. This shows your cleaver mindset.

You were a standing counsel for the Income Tax Department in Allahabad High Court and got elevated to a High Court Judge where your uncle and father were earlier judges. Being the son of a Judge it was a cake walk for you. You never criticized or uttered a single word about the dominance of few families in Allahabad High Court till you were elevated to the Supreme Court as a Judge. Once elevated to Supreme Court, you started feeling the rot of Allahabad High Court and made observations of “Uncle judges Court”. Please do not forget your family is also a prime contributor of this rotting process at Allahabad High Court; may be your family initiated the process of rotting as your uncle, father were High Judges at Allahabad High Court paving your way of becoming a judge ultimately.

Till you served at Supreme Court you did not utter anything against the Collegiums system of elevation of judges to High Court. Where was your straight forwardness?  After your retirement from Supreme Court, you managed the seat of Chairperson of Press Council of India during the UPA regime and published reports against Bihar, Gujarat, and West Bengal which were not being ruled by Congress. With the change of the ruling party at center, you started criticizing UPA in a desperate attempt to drift towards and get some benefits from ruling NDA.

I have seen you in several parties hosted by various political leaders, but your conduct was visible to all except you hence you could not succeed in wooing the NDA leaders for any favour. You became more desperate through time and criticized Justice J. Chelameswar , a sitting Judge of Supreme Court again with the oblique motive of attracting the attention. During your entire regime of judgeship, you were not critical about the elevation of judges to High Court and Supreme Court but and happily exploited the said process for your benefit . The stand of Justice Chemlashwar is incomparable, as a sitting judge of Supreme Court he has the guts to open up his mouth and express his dissent, which you never did during your tenure as judge and made selective comments after taking your share of pie. You have throughout remained lobbying, hobnobbing for some plump post desperately and now your frustration is at peak.

You are educated in Philosophy and you claim to have written books on India Philosophy, but your miserably failed to show your wisdom of Indian Philosophy as you are in the stage of “Sanyasa” but attending late night parties, seminars to attract the attention so that you are granted some favours.

Sir, while evaluating yourself proclaimed brilliance, I have not come across any reported landmark judgment during your practice at Allahabad High Court as a lawyer, a parameter through which we evaluate and weigh  the caliber of a legal brain. Your judgments as a High Court and Supreme Court Judge only show some superficial and rudimentary knowledge of law which lack depth. One remarkable thing I have noticed in all your judgments that you mostly cited and discussed cases decided during 1950, 1970, 1990’s in your judgments which shows that you have stopped reading the law journals once you became a judge and you have been cleverly wording your judgments with some religious and social concepts which look more like a newspaper article than a well crafted judgment which most of the Judges of High Court and all judges of Supreme Court excel. 

Please do not forget that you had a tag which took you to that height otherwise you are physically tall but your thoughts are dwarfed to the extent of being mean, parochial and motivated. You also lack the guts to face the criticism and immediately go on the back foot once you are faced with a strong opposition. Your statement to handover Bihar to Pakistan from which you have detracted now shows the sickness of your mind. You have no right to insult fellow countrymen and claim that you were joking. Please be within the limits of civilized behavior. You consider yourself to be superior human being and make unsolicited comments on others. Please do not forget that your ancestors were responsible for the initiation of process of exodus of the Kashmiri Pundits’ which became acute in 1990 leading to a complete swiping of the community from Kashmir Valley, now you want Bihar to be gifted to Pakistan alongwith Kashmir. If you have guts, please announce a comeback of all Kashmiri Pundits’ to Kashmir valley under your leadership and comment on the extremist leaders of Kashmir.  Please do not forget that in your desperate bid to attract the attention, you have made an anti national statement and be ready to face the consequences. I challenge you to withstand with your statement about Bihar and face the consequences instead of retracting from the statement of shrewd arrangement of humor. Biharis can prove to be more humorous with you.

If you know Indian history properly, which you claim, I suppose you are aware that Bihar is a land where first Monarchy was founded, followed by first democracy of the world and people of Bihar are still proud to claim that the freedom movement started from Champaran. You have ill intentions of handing over Bihar to Pakistan? I bet you , if given an opportunity, we Biharis will reclaim Ghulam Kashmir from Pakistan and extricate your motherland for you which we find you are incapable to do. How can you imagine such anti national thing is a matter of great concern. Are you out to break India?

As a practicing lawyer we render advice; I advice you free of cost to desist from indulging in such desperate attempts to draw the attraction of people towards you otherwise Biharis will make your life hell as you have no immunity now after retirement as a judge.

Regards

Umesh Sharma

Advocate

fylfotumesh@gmail.com

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मजीठिया : एडवोकेट उमेश शर्मा जी ने जारी किया क्लेम फार्मेट, जो साथी बाकी हैं वो जरूर भरें

सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड मामले में देश भर के पत्रकारों का केस लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने एक मैसेज के साथ 17(1) का क्लेम फार्मेट जारी किया है। एडवोकेट उमेश शर्मा ने कहा कि देश भर के सभी साथी इस क्लेम फ़ार्म को भरकर जरूर लेबर कमिश्नर कार्यालय में जमा कर दें। ये सिर्फ वही साथी भरेंगे जिन्होंने 17(1) के तहत अब तक लेबर विभाग में क्लेम नहीं लगाया है। इस क्लेम फार्मेट को लेबर कमिश्नर के कार्यालय में भरकर जमा करना है और रिसीव कराकर एक प्रति अपने पास रखना है।

एडवोकेट उमेश शर्मा का मैसेज…

उच्चतम न्यायालय में २३ / ८ / 2016  की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आ है कि १७(१) दायर करना जरूरी है. सभी लोग निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें :

१. यह एप्लीकेशन कोई कर्मचारी अपने हस्ताक्षर द्वारा या कोई यूनियन सभी कर्मचारियों की तरफ से लगा सकती है जिस पर कर्मचारी के हस्ताक्षर जरूरी नहीं हैं। यह जरूरी है कि उस कर्मचारी को मिल रहा वेतनमान और मजीठिया वेज बोर्ड के तहत मिलने वाले वेतनमान की तालिका लगी हो जिसमें कुल बकाया स्पष्ट रूप से दिखाया गया हो।

२. कर्मचारी और यूनियन इस बात की भी शिकायत कर सकती हैं कि प्रबंधकों ने उनसे जबदस्ती 20(जे) पर दस्तखत करवाया है और इसे अमान्य समझा जाये और प्रबंधकों के खिलाफ कार्यवाही की जाये क्योंकि कर्मचारी को लाभ से वंचित रखा गया है।

३. प्रबंधन का पूरा नाम पता स्पष्ट रूप से लिखा जाये, जैसा कि आपकी नियुक्ति पत्र में दिया गया है।

४. जो लोग सेवानिवृत हो चुके हैं, त्यागपत्र दे चुके हैं, जिनकी मृत्यु हो चुकी है उनके बच्चे इस लाभ के हक़दार हैं और उनसे भी संपर्क कर उन्हें साथ लिया जाना चाहिए। ध्यान रहे कि ऐसे लोगों को प्रबंधन न तो डरा सकती है न ही उनसे कुछ जबरदस्ती लिखवा कर ले सकती है।

५. श्रम अधिकारियों द्वारा कार्यवाही नहीं करने पर उनको नोटिस दिया जाना चाहिए और उनकी शिकायत उच्च अधिकारियों को करना चाहिए।

क्लेम फार्मेट ये है….

BEFORE THE DESIGNATED AUTHORITY  UNDER THE WORKING JOURNALISTS AND OTHER NEWSPAPER EMPLOYEES (CONDITIONS OF SERVICE) AND MISCELLANEOUS PROVISIONS ACT, 1955.

SUB: ISSUANCE OF RECOVERY CERTIFICATE IN COMPLIANCE OF THE ORDERS DATED 28/4/2015, 12/1/2016, 14/3/2016, 23/8/2016  PASSED BY THE HON’BLE SUPREME COURT OF INDIA IN CCP NO. 128/2015 & 129/2015 AND WP (C) 246/2011 DATED 7/2/2014.

NAME & ADDRESS OF THE MANAGEMENT:

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—————–

Sir,

1. The management named above is a newspaper establishment,  the employees of the establishment are  entitled to the  benefits of the Majithia Wage Board notification w.e.f. 11/11/11  as notified by the Central Government .

2. The management alongwith several other newspapers challenged the Majithia Notification before Supreme Court of India instead of implementing the same. The Hon’ble Supreme Court of India finally dismissed the petitions filed against Majithia Notification and issued specific directions for the release of the benefits of Majithia Wage Board notification vide its orders dated 7/2/2014 within  a period of one year w.e.f. 7/2/2014 alongwith arrears, the operative part of the directions of Supreme Court are reproduced hereunder for ready reference and compliance:

“71) Accordingly, we hold that the recommendations of  the Boards are valid in law, based on genuine and acceptable considerations and there is no valid ground for interference under Article 32 of the Constitution of India.

72) Consequently, all the writ petitions are dismissed with no order as to costs.

73) In view of our conclusion and dismissal of all the writ petitions, the wages as revised/determined shall be payable from 11.11.2011 when the Government of India notified the recommendations of the Majithia Wage Boards. All the arrears up to March, 2014 shall be paid to all eligible persons in four equal installments within a period of one year from today and continue to pay the revised wages from April, 2014 onwards.

74) In view of the disposal of the writ petitions, the contempt petition is closed.”

3. The management named above did not implement the aforesaid wage board notification and started extracting the signatures of the employees on pre-typed formats forcibly on threats of their jobs and started claiming that the recommendations of the wage board are not applicable on it. The aforesaid act of the management is in gross violation of Section 13 of the Working Journalists (C&S) and Misc. Provisions Act, 1955 as the working journalists are entitled to wages at rates not less than those specified in order.

4. Several Contempt of Court Petition has been filed by the deprived employees and their unions which are pending before the Honb’le Supreme Court of India and the court has reiterated that the newspaper establishments are under obligation to pay the dues to the employees in terms of its directions . The court vide its orders dated 23/8/2016 has now directed the adjudication of the claim of the employees under Section 17 of the WJ Act by the labour commissioner. The operative part of the said order is reproduced hereunder for ready reference and compliance:

“We elaborate the aforesaid directions in the following manner :-

(a) In respect of such of the establishments which have been reported by the Labour Commissioner in his affidavit/report not to have implemented the recommendations of Majithia Wage Board the detailed facts which had led the Labour Commissioner to arrive at the said conclusion be laid before the Court after giving the affected party an opportunity of hearing.

(b) The management of each of the establishments will be bound under the

present order to furnish to the Labour Commissioner all such records, reports, documents and information that the Labour Commissioner deems it necessary to consider before passing apprppriate orders in terms of direction (a).

(c) The Labour Commissioner may, if he considers it necessary, in an appropriate case, himself visit the premises of an establishment to satisfy himself as to the implementation of the recommendations of the Majithia Wage Board.

(d) It will be open for each affected employee to lay before the State Government/Labour Commissioner, the details of the amount that he/she claims to be due under the recommendations of the Majithia Wage Board over and above the emoluments drawn by him.

If such a resort is made to the State Government/Labour Commissioner the

concerned authority would be fully empowered to carry out necessary adjudication and pass consequential orders in terms of Section 17 of the Act.”

6. That the scheme of the Working Journalists Act is very clear and Section 17(1) of the said Act provides mechanism for recovery of the dues from an employer. A combined reading of all these provisions make it crystal clear that the management of the newspaper establishments have no choice then to pay the benefits recommended by the Wage Board which has a statutory force and the employer cannot escape the same under any circumstances. Section 17 (1) of the Act is being reproduced hereunder for ready reference;

“17. Recovery of  money due from an employer- (1) Where any amount is due under this Act to a newspaper employee from an employer, the newspaper employee himself or any person authorized by him in writing in this behalf , or in the case of death of the employee, any member of his family may, without prejudice to any other mode of recovery, make an application to the State Government, for the recovery of the amount due to him, and if the State Government , or such authority, as the State Government may specify in this behalf , is satisfied that any amount is so due, it shall issue a certificate for that amount to the Collector, and the Collector shall proceed to recover that amount in the same manner as an arrears of land revenue.”

1.            That the claimant was not paid his dues accruing under the Wage Board Notification which ultimately merged with the directions dated 7/2/2014 passed by the Hon’ble Supreme Court quoted here. The management even did not comply with the same and remained making excuses one after the other in the meanwhile the claimant retired from the services. The disputes being created by the management are worth rejection as such disputes can not be raised under Section 17 (1) of the WJ Act as the claim of the employee is based on statutory wage boards.

2. That the dues of the claimant are due under the Majithia Wage Board and the directions dated 7/2/2014 hence the same can be recovered under Section 17 (1) of the Act hence this application.

3. That the claimant has been demanding the said dues since the notification issued by the Central Government however, the management has been making excuses one after the other and has now refused to pay the same to the claimant out rightly.  The claimant is thus entitled to the entire dues besides the interest @ 24% on the due amount with the cost of present proceedings.
4. That the management is also liable for prosecution for its act of violation of the WJ Act, the workman reserves his rights to initiated proceedings against the management in this regard besides imitating the contempt of court proceedings against the management.
5.  That the management be directed to submit entire details regarding the implementation of the wage board recommendations before the labour authorities in compliance of the orders of the Supreme Court dated 23/8/2016, stated above failing which prosecution proceedings under Section 18 of the WJ Act be initiated against the management.
6.  That the dues of the claimant detailing his entitlement under the Majithia Wag Board and the difference of the amount being paid to the claimant  are given in ANNEXURE-A.
7.  It may please be noted that the present application has been filed under Section 17 (1) of the WJ Act and the Labour Commissioner is directed to adjudicate the same in terms of the directions of the Supreme Court dated 23/8/2016 hence the same be done at the earliest. Since the employee has not preferred the application under Section 17 (2), the same can not be referred for adjudication under the misguided pressure of the management as the same would attract contempt of court against the labour commissioner.

PRAYER

It is therefore prayed that orders of Supreme Court be complied with a recovery certificate of the dues of the workman be issued and a status report to this effect be filed before the Supreme Court of India as directed.
EMPLOYEE

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मजीठिया : सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के लेबर कमिश्नर के खिलाफ जारी किया वारंट

उत्तर प्रदेश के लेबर कमिश्नर को 6 हफ्ते में दिलाना होगा मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ, 4 अक्टूबर को महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड और दिल्ली के लेबर कमिश्नर को हाजिर होने का आदेश

पत्रकारों के वेतन से संबंधित फिलवक्त देश के सर्वाधिक चर्चित आयोग मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में आज माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त कदम उठाया और उत्तराखंड के श्रम आयुक्त को आज के दिन हाजिर रहने की पूर्व सूचना के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में अनुपस्थित रहने पर कोर्ट ने वारंट जारी कर दिया है। साथ ही उत्तर प्रदेश के श्रम आयुक्त को साफ कह दिया कि 6 हफ्ते के अंदर मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश को पूरी तरह लागू कराईये। सुप्रीम कोर्ट ने लिखित रूप से तो नहीं बल्कि मौखिक रुप से यह भी कह दिया कि अगर आपने 6 सप्ताह में ऐसा नहीं किया तो जेल भेज दूंगा।

सुप्रीम कोर्ट ने आज 20जे के मुद्दे पर मौखिक रूप से कहा कि जो भी वेतन ज्यादा होगा, उसे माना जायेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कौन कर्मचारी होगा जिसे वेतन ज्यादा मिले तो वह लेने से मना कर देगा। देश भर के पत्रकारों की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने इस खबर की पुष्टि करते हुये कहा है कि आज सुप्रीम कोर्ट का फैसला काफी एतिहासिक माना जायेगा। श्रम आयुक्तों ने अपनी सफाई में कहा कि कर्मचारी हमारे पर 17(1) के तहत क्लेम नहीं कर रहे हैं। जो क्लेम कर रहे हैं हम उनके पक्ष में खुलकर हैं। श्री उमेश शर्मा ने एक बार फिर कहा है कि लोग 17 (1) के तहत श्रम आयुक्त कार्यालय में क्लेम लगायें।

सुप्रीम कोर्ट से बाहर निकलने के बाद देश भर से आये पत्रकारों को सुप्रीम कोर्ट के लॉन में उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मैं बार-बार सबसे कह रहा हूं कि 17(1) के तहत लेबर कमिश्नर के यहां क्लेम लगाईये और फिर सबसे यही बात कहूंगा कि पहले उन्हीं को श्रम विभाग वरियता देगा जिसने 17(1) के तहत क्लेम किया है। अब 4 अक्टूबर को महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड और दिल्ली के लेबर कमिश्नर को माननीय सुप्रीम कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया गया है। इन प्रदेशों के पत्रकार जल्द से जल्द 17(1) के तहत श्रम आयुक्त कार्यालय में क्लेम लगायें।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता
९३२२४११३३५

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मजीठिया : बेहद सख्त सुप्रीम कोर्ट ने यूपी समेत पांच राज्यों के सचिवों को नए एक्शन रिपोर्ट के साथ 23 अगस्त को तलब किया

मीडिया मालिकों के कदाचार और सरकारी अफसरों की नपुंसकता से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अब एक एक को देख लेने का इरादा बना लिया है. अपना रुख बहुत सख्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्यों से आई रिपोर्ट को एक साथ एक बार में नहीं देखा जा सकता और इसमें बहुत सारी बातें स्पष्ट भी नहीं है इसलिए अब यूपी समेत पांच राज्यों की समीक्षा होगी और समीक्षा के दौरान संबंधित राज्यों के सचिव सुप्रीम कोर्ट में मौजूद रहेंगे. शुरुआत में नार्थ इस्ट के पांच राज्य हैं जिनके सचिवों को अपनी नवीनतम एक्शन रिपोर्ट तैयार करके 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हाजिर रहने को कहा है.

बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद अब उन राज्यों के श्रम विभागों में हलचल शुरू हो जाएगी जहां क्लेम फाइल करने वालों को उनका वाजिब हक दिलाने की बजाय श्रम विभाग के अधिकारी मीडिया मालिकों की चमचागिरी करते हुए पूरे प्रकरण को लीपपोत कर अनिर्णय की स्थिति में डाले हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संबंधित पांच राज्यों के सचिव अपने यहां के सारे क्लेम और सारे दावों के निपटान की स्थिति लेकर 23 अगस्त को कोर्ट आएं. 23 अगस्त की सुनवाई के बाद ऐसे ही फिर अन्य पांच राज्यों के सचिवों को नवीनतम एक्शन रिपोर्ट के साथ सुप्रीम कोर्ट बुलाया जाएगा. तो, इस पूरे घटनाक्रम और सुप्रीम कोर्ट के रुख से जाहिर है कि मामला मीडियाकर्मियों के पक्ष में है और मीडिया मालिकों व उनके चाटुकार अफसरों की चालबाजी सफल नहीं होने वाली है.

भड़ास4मीडिया की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए सैकड़ों अवमानना मामलों के वकील उमेश शर्मा ने भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह को फोन पर बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने बिलकुल सही रास्ता अख्तियार किया है. अब यूपी समेत जिन पांच राज्यों के सचिवों को 23 अगस्त को बुलाया गया है वो न सिर्फ वहां सारे मामले निपटा कर और सही रिपोर्ट लेकर पहुंचेंगे बल्कि इसका असर उन दूसरे राज्यों में होगा जहां मीडिया मालिकों और सरकारी अफसरों का गठजोड़ आम मीडियाकर्मियों के क्लेम को लटकाने में जुटे हुए हैं और गोलमोल रिपोर्ट बनाकर सुप्रीम कोर्ट को बरगलाने की कुत्सित मंशा रखते हैं. आने वाले दिनों में हर राज्य के श्रम अफसरों को पूरी सख्ती दिखाते हुए मीडियाकर्मियों को उनका हक दिलाना पड़ेगा वरना संभव है सुप्रीम कोर्ट में पेशी के दौरान खड़े खड़े उन्हें जेल भेजे जाने का आदेश उच्चतम न्यायालय दे दे. एडवोकेट उमेश शर्मा ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आज के आदेश की लिखित कॉपी का इंतजार किया जा रहा है. उसके बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह का कहना है कि संविधान, सुप्रीम कोर्ट और कानून को ठेंगे पर रखने वाले देश द्रोही मीडिया मालिकों और चोरकट धूर्त अफसरों से निपट पाना कोई मामूली बात नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने पूरा मौका देने के बाद अब इन्हें सही से घेरना शुरू कर दिया है. मजीठिया वेज बोर्ड मामले की आज हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पांच-पांच राज्यों के सचिवों को नवीनतम एक्शन रिपोर्ट के साथ जो तलब करना शुरू किया है और कहा है कि अपने साथ नवीनतम एक्शन रिपोर्ट लाकर बताओ कि कितनों को न्याय मिला और कितनों को नहीं मिला तो जाहिर है कि संबंधित राज्यों के सचिव खुद सुप्रीम कोर्ट में खड़े रहेंगे और इसका मतलब हुआ कि अगर अफसरों ने तनिक भी चालाकी दिखाई और मीडियाकर्मियों को उनका हक नहीं दिला पाए तो सुप्रीम कोर्ट में खड़े खड़े ही अफसरों को कोर्ट की अवमानना में गिरफ्तार कर के जेल भेजने की आदेश सुप्रीम कोर्ट दे सकती है. इसके ठीक बाद उस मीडिया मालिक को भी अरेस्ट करने का आदेश दे सकती है जिसने अपने कर्मी को उसका हक नहीं दिया. यानि अब मीडिया मालिकों और अफसरों के जेल जाने के दिन आने वाले हैं. तो हम लोग कह सकते हैं- ”अब भी तो सुधर जाओ हरामखोरों!”

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मजीठिया केस पर Advo Umesh Sharma का वीडियो इंटरव्यू : सुप्रीम कोर्ट ने सबको दे दिया आखिरी सुनहरा मौका, अब नहीं तो कभी नहीं

प्रिंट मीडिया कर्मियों के लिए मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे अवमानना मामले में पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जो जो बातें कहीं, जो जो आदेश दिए, उसको लेकर एडवोकेट उमेश शर्मा से भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने विस्तार से बातचीत की. पूरी बातचीत से दो बातें सामने आई. एक तो ये कि अब ये आखिरी मौका सभी मीडियाकर्मियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया है कि वे अपना क्लेम यानि मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से उनका कितना वेतन और बकाया आदि बनता है, उसकी लिखित अप्लीकेशन बनाकर संबंधित इलाके के श्रम अधिकारियों / श्रम आफिसों के यहां वाद दायर करें.

इस वाद पर हर हाल में लेबर कमिश्नर को 5 जुलाई तक फैसला लेना है यानि हक दिलाना है और उसकी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को देनी है. इसलिए जो जो क्लेम दायर करेगा, उसे उसे उसका हक मिलेगा. बातचीत में यह भी बात सामने आई कि बहुत सारे साथी अपना क्लेम तैयार नहीं कर पा रहे, कितना वेतन बनेगा, कितना बकाया है, आदि सबकी गणना वह ठीक ठीक नहीं कर पा रहे, साथ ही कई अन्य कागज पत्तर फाइल नहीं कर पा रहे, इसलिए क्यों न दिल्ली में एक वर्कशाप कर दी जाए जिसमें एक ही जगह सीए, वकील, सारे कागजात, अप्लीकेशन, फारमेट आदि उपलब्ध हों और सबको भरवाकर, शिक्षित कर उनके उनके इलाके में दायर किया जाए.

साथ ही प्रदेश स्तर पर एक एक ऐसे पत्रकार को यह जिम्मेदारी दे दी जाए कि वह अपने प्रदेश में किसी भी मीडियाकर्मी साथी के साथ आ रही किसी भी दिक्कत को सोल्व करने के लिए तैयार रहें व कोई कठिनाई आए तो दिल्ली में एडवोकेश उमेश शर्मा और भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह से संपर्क करें. तो वर्कशाप की तारीख और स्थान जल्द ही घोषित कर दी जाएगी. वर्कशाप को लेकर कई बिंदुओं पर अभी फाइनल सहमति एडवोकेश उमेश शर्मा और भड़ास एडिटर यशवंत सिंह में बननी बाकी है. सब कुछ तय होते ही भड़ास पर वर्कशाप की तारीख और जगह का ऐलान कर दिया जाएगा.

इस वर्कशाप में वो सभी लोग आएं जो केस कर चुके हैं, खुल कर या छिप कर, साथ ही वो सभी नए लोग आएं जो अब सुप्रीम कोर्ट के ताजे आर्डर के आलोक में केस या क्लेम करने को इच्छुक हों. इस तरह एक जगह पर सभी लोगों की जुटान से पूरे देश में मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई को बल मिलेगा. आप एडवोकेश उमेश शर्मा से भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की बातचीत को जरूर ध्यान से सुनें और अपने साथियों को भी सुनवाएं. इंटरव्यू का लिंक नीचे है :

https://www.youtube.com/watch?v=TYK3aVTVWe0

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मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई से जुड़ी तीन जरूरी जानकारियां, प्रिंट मीडिया का हर कर्मचारी इसे पढ़े और दूसरों को पढ़ाए

पहली जानकारी ये कि सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड प्रकरण की अगली सुनवाई की तारीख तय हो चुकी है. इसी महीने यानि मार्च की चौदह तारीख को सुनवाई की जाएगी. यह जानकारी भड़ास4मीडिया की तरफ से सैकड़ों अवमानना केस दायर करने वाले एडवोकेट उमेश शर्मा ने दी.

दूसरी जानकारी भी उमेश शर्मा जी ने दी. वह यह कि जो भी मीडिया कर्मचारी अभी उच्चतम न्यायालय में खुले रूप से अथवा गुप्त रूप से अपने याचिका लगाना चाहते हैं, वो अभी भी तुरंत रूप से संपर्क कर सकते हैं. अखबार प्रबंधन से अपना हक लेने के लिए चल रही न्यायिक लड़ाई में सहभागी बनने हेतु सम्पर्क सूत्र 011-2335 5388 पर दिन के आफिस आवर में कॉल कर सकते हैं या फिर मेल आईडी legalhelplineindia@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

तीसरी सूचना ये है कि नई दिल्ली परिक्षेत्र के उस दबंग लेबर इंस्पेक्टर मनीष ठाकुर का तबादला कर लेबर मुख्यालय अटैच कर दिया गया है जिसने हिंदुस्तान टाइम्स, एचएमवीएल, जागरण, सहारा समेत दर्जनों मीडिया हाउसों के खिलाफ मजीठिया न देने पर आफिस सर्वे के बाद कोर्ट में अपने हस्ताक्षरों से केस फाइल किया था.

चर्चा है कि केजरीवाल सरकार और मीडिया घरानों के बीच कोई गुपचुप सांठगांठ हो रही है जिससे केजरीवाल सरकार के मीडिया घरानों के प्रति सख्त रुख धीरे धीरे लचीला होता जा रहा है.

कोर्ट में केस किए जाने के बाद एचटी ग्रुप घबराया हुआ हाईकोर्ट चला गया क्योंकि शोभना भरतिया समेत सभी निदेशकों को लेबर इंस्पेक्टर मनीष ठाकुर ने पार्टी बना दिया था, ताकि इन्हें इनके अपराधों की सजा मिल सके. हाईकोर्ट ने सिर्फ इतनी राहत दी कि निजी तौर पर कोर्ट में पेश होने की छूट दे दी गई. बाकी दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में अभियोग का सामना इन मीडिया हाउसों को करना होगा.

ये फैसला देने वाले जज का भी तबादला कर दिए जाने की चर्चा है. इस बारे में विस्तार से खबर जल्द ही भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित की जाएगी.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

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मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर जो लोग प्रताड़ित किए जा रहे, वे अपना डिटेल एडवोकेट उमेश शर्मा को भेजें

दिनांक 12/1/2016 को माननीय सुप्रीम कोर्ट के सामने मजीठिया मामले में सुनवाई के दौरान माननिय न्यायाधीशों ने सभी राज्य सरकारों द्वारा दिया गए स्टेटस रिपोर्ट को पत्रकारों के अधिवक्ताओं को सौंपने के लिए कहा. साथ ही मीडिया कर्मचारियों के वकीलों द्वारा कर्मियों को मैनेजमेंट द्वारा प्रताड़ित किए जाने व सादे कागजों पर दस्तखत कराने संबंधी कही गई बातों पर गौर किया. कोर्ट ने वकीलों को इस सम्बन्ध में कार्यवाही करने के आजादी दी.

अदालत ने यह कहा कि रिपोर्टों से स्पष्ट है कि सिर्फ कुछ ही अखबार संस्थानों ने कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ दिया है. अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि कुछ संस्थानों ने कर्मचारियों को दुर्भावनापूर्ण रूप से निलंबित, स्थानांतरित एवं बर्खास्त किया है. कोर्ट ने कहा कि इस बात का उल्लेख कर्मचारियों द्वारा लिखित रूप में किया जाये. अदालत ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि कुछ अख़बार मालिक कर्मचारियों से जबरदस्ती कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर ले रहे हैं. इसका उल्लेख कर्मचारी अपने वकील के जरिए सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख करें.

सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से यह तो स्पष्ट है कि अख़बार मालिकों द्वारा अपनाए गए हथकंडे अदालत के संज्ञान में हैं और अदालत इस बात पर गंभीर भी है.

ऐसे सभी कर्मचारी जो अभी तक अपना मामला अदालत के सामने नहीं ला पाये हैं, वो अब भी अदालत के सामने अपना मामला लाएं. साथ ही जिन लोगों को प्रताड़ित किया गया है या किया जा रहा है, वो सामने आकर अपनी बात अदालत को बताएं. कर्मचारी अपना नाम, पद, वेतन और मजीठिया लाभ की बकाया राशि का विवरण दे कर इस कार्यवाही की शुरुआत अभी भी कर सकते हैं.

इस बाबत सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा से संपर्क legalhelplineindia@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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दिल्ली राज्य में मीडिया मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर पड़ने लगा श्रम विभाग का चांटा

दिल्ली राज्य में कार्यरत मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड न दिए जाने को लेकर श्रम विभाग ने मीडिया हाउसों को धड़ाधड़ चांटे मारना शुरू कर दिया है. ऐसा दिल्ली की केजरीवाल सरकार की सख्ती के कारण हो रहा है. सूत्रों का कहना है कि अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने श्रम विभाग के अफसरों को साफ-साफ कह दिया है कि किसी का मुंह न देखें, कानूनन जो सही है, वही कदम उठाएं. इस प्रकार सरकार से पूरी तरह छूट मिल जाने के बाद दिल्ली राज्य के श्रम विभाग के अधिकारी फुल फार्म में आ चुके हैं. शोभना भरतिया समेत कई मीडिया मालिकों के खिलाफ क्रिमिनल प्रासीक्यूशन शुरू किया जा चुका है.

इस बारे में भड़ास4मीडिया को सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के वकील व मजीठिया वेज बोर्ड मामलों के विशेषज्ञ उमेश शर्मा ने बताया कि दिल्ली राज्य में मीडियाकर्मियों को जिस तरह फटाफट न्याय मिलने लगा है, वह बाकी राज्यों के लिए नजीर है. उमेश शर्मा के मुताबिक वे खुद दिल्ली के उन कई मीडियाकर्मियों को उनका बकाया पाने में मदद दिला रहे हैं जो मजीठिया के हिसाब से अपना बकाया तैयार लिखित में तैयार करके और इस बाबत अप्लीकेशन बनाकर ला रहे हैं. ऐसे लोगों के प्रकरण को वे श्रम विभाग ले जा रहे हैं और वहां से तुरंत संबंधित मीडिया हाउस के मालिक के खिलाफ क्रिमिनल प्रासीक्यूशन शुरू हो जा रहा है.

दिल्ली राज्य के अगर अन्य मीडियाकर्मी भी इस बारे में मदद चाहते हैं तो वकील उमेश शर्मा से संपर्क उनके मोबाइल नंबर 9868235388 के जरिए किया जा सकता है. अगर आप अपना खुद का मजीठिया के हिसाब से बकाया नहीं बना रहे तो बेहद मामूली फीस लेकर एडवोकेश उमेश शर्मा के एकाउंट विभाग की टीम समस्त कागजात तैयार कर श्रम विभाग में आगे की कार्यवाही के लिए दाखिल करा देगी. नीचे वो लिस्ट है, जिनके खिलाफ दिल्ली राज्य में श्रम विभाग ने क्रिमिनल प्रासीक्यूशन शुरू करने का आदेश जारी कर दिया है….

  1. Sobhna Bharatia & 11 other Directors/officer of HT Media Ltd (Case No. 32/1/15.
  2. Statesman Ltd (Case No. 33/1/15)
  3. Living Media (Case No. 34/1/15)
  4. DLA Media (Case No. 35/1/15)
  5. Punjab Kesri (Case No. 36/1/15)
  6. Sahara (Case No. 37/1/15)
  7. Good Morning India (Case No. 38/1/15)
  8. HT Media India Ltd (Case No. 39/1/15)
  9. Patrakar Prakashan Ltd ( Case No. 40/1/15)
  10. Amar Ujala, Rajni Maheshwari, Tanmay Maheshwari ( Case No. 41/1/15)
  11. UNI (Case No. 30/1/15)
  12. Pariwartan Bharti (Case No. 31/1/15)

एडवोकेट उमेश शर्मा का कहना है कि दिल्ली में श्रम विभाग की कार्यवाही नजीर बन जाएगी और इसका उदाहरण देकर, उल्लेख कर के दूसरे राज्यों के मीडियाकर्मी अपना हक पाने लग जाएंगे. उमेश शर्मा का मानना है कि एक बार क्रिमिनल प्रासीक्यूशन शुरू हो जाता है तो फिर मीडिया मालिकों को हर हाल में संबंधित कर्मी को वेज बोर्ड देना पड़ेगा अन्यथा मुकदमा हारकर जेल में जाना पड़ेगा या उसे चल-अचल संपत्ति की जब्ती का सामना करना पड़ सकता है. इस प्रकरण को विस्तार से जानने समझने के लिए नीचे दिए गए अंग्रेजी के अंंश को भी ध्यान से पढ़ें, जिसकी काफी कुछ बातें उपर हिंदी में दी जा चुकी हैं….

Non implementation of the recommendations of Majithia Wage Board order is going to cost very bitter to all newspapers in Delhi. Before submitting the reports of  implementation before Supreme Court of India; labour department has filed number of criminal challans against all defaulting newspaper establishments. The court of Chief  Metropolitan Magistrate, New Delhi District, Patiala House has already taken cognizance of the offense against all of them vide his order dated 21/8/2015 and issued summons  against all big names of newspaper industry. The summons have been sent to the police station for service on the accused persons and if they fail to appear before the court  after summon, bail able and non bail able warrants will be issued against them and they may be sent to Tihar. All such cases are listed on 24/9/2015 before the Court of  ACMM-II, Sh Ajay Garg, Room No. 32, Patiala House Courts, New Delhi. The details of the newspaper establishments against whom criminal prosecution has been launched are as under:

  1. Sobhna Bharatia & 11 other Directors/officer of HT Media Ltd (Case No. 32/1/15.
  2. Statesman Ltd (Case No. 33/1/15)
  3. Living Media (Case No. 34/1/15)
  4. DLA Media (Case No. 35/1/15)
  5. Punjab Kesri (Case No. 36/1/15)
  6. Sahara (Case No. 37/1/15)
  7. Good Morning India (Case No. 38/1/15)
  8. HT Media India Ltd (Case No. 39/1/15)
  9. Patrakar Prakashan Ltd ( Case No. 40/1/15)
  10. Amar Ujala, Rajni Maheshwari, Tanmay Maheshwari ( Case No. 41/1/15)
  11. UNI (Case No. 30/1/15)
  12. Pariwartan Bharti (Case No. 31/1/15)

The challans have been filed under Section 18 of the Working Journalista Act as the managements have not implemented the  orders dated 7/2/2014 passed by Supreme  Court of India in Writ Petition No. 246/20-11 whereunder the court has issued diections for granting all the benefits of Majithia Wage Board to the employees of the  newspaper with their arrears w.e.f. 11/11/11. All newspaper establishments have defaulted in complying with this order of the court which was taken very seriously by the  Supreme Court and vide its orders dated 28/4/2015, in bunch of Contempt of Court petitions, the court has issued directions to all the state governments to file affidavits  regarding the status report of implementation of the Majithia benefits. The newspaper employees of Delhi have created a brave front under the banner of Bhadash and  followed up with Delhi Government vigorously which has resulted into the filing of prosecution proceedings against all defaulting newspapers.

Its time that all claimant employees who are on the rolls of the newspaper establishments, resigned from the services, retired from the services or LRs of the employees who  died after 11/11/2011 can put up their claim U/s 17 (1)  of the Working Journalists Act immediately giving details of their entire dues. They should claim their interests on the  amount due also.  Its time all the employees show their solidarity and assemble at the court No. 32, Patiala House Courts on 24/9/2015 so that bail is not granted to the Directors, CEOs of the  said companies by the court unless they pay or deposit the dues of the employees.  All affected employees may also institute Caveat before High Court on the criminal side so that in the event of any of the accused persons approaches the High Court,  advance notice of the same is received by them and the court grants them an opportunity of hearing.

Lawyer Mr Umesh Sharma, Advocate is already pursuing the matter before Delhi Government is committed to take up the matters on nominal costs. He has constituted a team to take up the matter on behalf of all employees who are scattered and unable to get united and put up their claims. Services of Accountants have been requisitioned who will prepare the entire dues of each and every employee on very nominal costs. Contact number of Advo Umesh Sharma : 9868235388

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

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विनय बिहारी सिंह के केस से सबक लें और आप भी सेक्शन 17 (2) के तहत लेबर आफिस में आवेदन करें

विनय बिहारी सिंह के कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार हैं. इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी अखबार जनसत्ता में लंबे समय तक कार्य करने के बाद रिटायर हुए. लेकिन मालिकों ने उन्हें मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से एरियर नहीं दिया. विनय बिहारी सिंह रिटायरमेंट के बाद इंडियन एक्सप्रेस के मालिकों को लगातार मजीठिया का लाभ देने के लिये पत्र लिखते रहे. इसी क्रम में उन्होंने पहले कलकत्ता स्थित लेबर ऑफिस को लिखा परन्तु ढाक के तीन पात.

विनय बिहारी सिंह ने फ़रवरी 2015 में भड़ास4मीडिया द्वारा मालिकों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में केस लगाने के लिए किए गए आह्वान में शामिल होकर अपनी भी एक अवमानना याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाई. 28 अप्रैल 2015 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत उन्होंने तुरंत ही सेक्शन 17 (2) के तहत शिकायत इंडियन एक्सप्रेस मालिकों के खिलाफ लगा कर अपना पैसा देने हेतु रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करने की प्रार्थना की. लेबर कमिश्नर, कोलकाता ने इस पर संज्ञान लेते हुए मालिकों के खिलाफ कार्यवाही शुरू की. तब उस कार्यवाही से घबरा कर इंडियन एक्सप्रेस ने विनय बिहारी को एक चेक फटाफट दिया. शेष बकाया अगले दो सालों में अगले दो किश्तों में देने की बात कही है. साथ ही विनय बिहारी से अनुरोध किया कि वे केस वापस ले लें. लेकिन विनय बिहारी ने केस वापस लेने से यह कहते हुए मना किया कि उन्हें सारा बकाया इकट्ठे चाहिए.

इंडियन एक्सप्रेस समूह अब भी विनय बिहारी सिंह से कई तरह के लुभावने वादे कर रहा है.  लेबर कमिश्नर, कोलकाता ने अब मामला अपने सामने निपटाने के लिये इंडियन एक्सप्रेस के मालिकों को बुलाया है ताकि अग्रिम कार्यवाही की जा सके. जो लोग सेक्शन 17 (2) को लेकर अज्ञानता वश इसकी महत्ता को नहीं समझ रहे हैं उनके लिए विनय बिहारी सिंह का मामला एक जीवंत उदहारण है. अभी भी आप सेक्शन 17 (2) के तहत अपने और अपने साथियों के लिए लेबर ऑफिस में आवदेन कर सकते हैं. आवदेन पत्र यहां से डाउनलोड करें-

http://legalhelplineindia.com/letter.pdf

और अंत में… अपने-अपने प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों / मंत्रियों तक यह सन्देश पहुंचा दें कि वह सभी श्रम अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दें कि Working Journalist Act, Section 17 (2)  के अंतर्गत लगाये गए आवेदन पर तुरंत आदेश करें और Recovery Certificate जारी करें. इसमें ढिलाई करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करें. अलग से श्रम निरीक्षकों के नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत है जो कि यह तय करेगा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना हुई है या नहीं. श्रम विभाग के पास पहले से ही इस बावत क़ानूनी अधिकार है. सभी लोग श्रम विभाग में शिकायत जरूर लगाएं और इस बात को समझ लें कि सभी कर्मचारियों के दस्तखत की जरूरत नहीं है. एक ही आवेदन में सभी का नाम दिया जा सकता है. चूंकि कुछ अख़बारों के पंजीकृत ऑफिस दिल्ली में हैं इसलिए उनके सभी कर्मचारियों का दावा दिल्ली में लगाया जा सकता है, चाहे वो कहीं भी काम करते हों. इस पर बहुत ही समझदारी से आगे बढ़ने की जरूरत है. कृपया किसी क़ानूनी जानकर से मदद जरूर लें. खुद अकेले अपना जौहर न दिखाएं. यह बहुत ही उलझा हुआ क़ानूनी मामला है जिस पर आम आदमी अपना हाथ नहीं आजमा सकता है. आप चाहें तो मैं इस पर निशुल्क क़ानूनी मदद ऑनलाइन रूप में दे सकता हूं.

लेखक एडवोकेट उमेश शर्मा दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं. मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित हक दिलाने के लिए सैकड़ों मीडियाकर्मियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का केस कर चुके हैं. उनसे संपर्क legalhelplineindia@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. एडवोकेट उमेश शर्मा का पूरा पता ये है…
Adocate Umesh Sharma
Fylfot Group of Advocates
112, New Delhi House, 27, Bara Khambha Road,
Connaught Place, New Delhi – INDIA 110001.
Phone No: 9-11-2335 5388
Website: www.legalhelplineindia.com


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उच्चतम न्यायालय में 28 अप्रैल 2015 की सुनवाई के दौरान बहुत सी बातें उठीं. यह भी बताया गया कि मजीठिया का लाभ मांगने वाले कर्मचारियों को प्रबंधन द्वारा धमकाया और डराया जा रहा है. उनसे जबरदस्ती लिखवाकर लिया गया है कि वो मजीठिआ का लाभ नहीं चाहते. अदालत को यह भी बताया गया कि प्रबंधक जबरदस्ती कर्मचारियों से लिखवा कर ले रहे हैं कि उन्होंने समझौता कर लिया है और वो मजीठिया का लाभ नहीं चाहते. इसके जवाब में मालिकों की ओर से आये बड़े और नामचीन वकीलों ने जब कुछ कहना चाहा तो अदालत ने नहीं सुना. अदालत ने इन बातों को गंभीरता से लेते हुए आदेश पास किया कि सभी राज्य सरकारें मजीठिया आदेश के अनुपालन में कार्यवाही के लिए श्रम निरीक्षकों की नियुक्ति करें और तीन महीने के अंदर अदालत के सामने रिपोर्ट प्रस्तुत करें.

ऐसे में अब गेंद हम मीडियाकर्मियों के पाले में हैं. सभी कर्मचारी गण या कोई एक कर्मचारी या कोई यूनियन लेबर इंस्पेक्टर के सामने एक शिकायत लगाए जिसमे संस्थान में कार्यरत सभी कर्मचारियों की सूची लगा कर कहा जाए कि इन सभी को मजीठिया का लाभ नहीं दिया गया है. यह जरुरी नहीं है कि सभी कर्मचारी उस शिकायत पर दस्तखत करें. आप बिना किसी कर्मचारी की सहमति लिए ही, पूरी इंप्लाई सूची पेश कर लेबर इंस्पेक्टर से शिकायत कर दें कि किसी को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ नहीं दिया जा रहा है. इस तरह की कंप्लेन तुरंत करें. शिकायत का प्रारूप हम सभी के लिए दे रहे हैं जिसे डाउनलोड किया जा सकता है.

कर्मचारी या यूनियन की तरफ से इस बात की भी शिकायत कर सकते है कि प्रबंधकों ने उनसे जबदस्ती दस्तखत करवाया है और इसे अमान्य समझा जाये. साथ ही प्रबंधकों के खिलाफ कार्यवाही की जाये. इस बावत पुलिस में भी शिकायत की जा सकती है. अगर लेबर इंस्पेक्टर किसी तरह की गड़बड़ी कर रहा है तो उसके खिलाफ भी उसके उच्चाधिकारियों से शिकायत करें साथ ही आरटीआई लगाएं. जो लोग सेवानिवृत हो चुके हैं, त्यागपत्र दे चुके हैं, जिनकी मृत्यु हो चुकी है, उनके बच्चे भी इस लाभ के हक़दार हैं. उनसे भी संपर्क कर उन्हें साथ लिया जाना चाहिए ताकि सभी लोग संगठित रह सकें और प्रबंधको को एक किनारे कर सकें. शिकायत का प्रारूप पाने के लिए यहां क्लिक करें…

http://legalhelplineindia.com/letter.pdf

और अंत में… अपने-अपने प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों / मंत्रियों तक यह सन्देश पहुंचा दें कि वह सभी श्रम अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दें कि Working Journalist Act, Section 17 (2)  के अंतर्गत लगाये गए आवेदन पर तुरंत आदेश करें और Recovery Certificate जारी करें. इसमें ढिलाई करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करें. अलग से श्रम निरीक्षकों के नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत है जो कि यह तय करेगा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना हुई है या नहीं. श्रम विभाग के पास पहले से ही इस बावत क़ानूनी अधिकार है. सभी लोग श्रम विभाग में शिकायत जरूर लगाएं और इस बात को समझ लें कि सभी कर्मचारियों के दस्तखत की जरूरत नहीं है. एक ही आवेदन में सभी का नाम दिया जा सकता है. चूंकि कुछ अख़बारों के पंजीकृत ऑफिस दिल्ली में हैं इसलिए उनके सभी कर्मचारियों का दावा दिल्ली में लगाया जा सकता है, चाहे वो कहीं भी काम करते हों. इस पर बहुत ही समझदारी से आगे बढ़ने की जरूरत है. कृपया किसी क़ानूनी जानकर से मदद जरूर लें. खुद अकेले अपना जौहर न दिखाएं. यह बहुत ही उलझा हुआ क़ानूनी मामला है जिस पर आम आदमी अपना हाथ नहीं आजमा सकता है. आप चाहें तो मैं इस पर निशुल्क क़ानूनी मदद ऑनलाइन रूप में दे सकता हूं.

लेखक एडवोकेट उमेश शर्मा दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं. मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित हक दिलाने के लिए सैकड़ों मीडियाकर्मियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का केस कर चुके हैं. उनसे संपर्क legalhelplineindia@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. एडवोकेट उमेश शर्मा का पूरा पता ये है…
Adocate Umesh Sharma
Fylot Group of Advocates
112, New Delhi House, 27, Bara Khambha Road,
Connaught Place, New Delhi – INDIA 110001.
Phone No: 9-11-2335 5388
Website: www.legalhelplineindia.com

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सलमान खान अवैध बेल के खिलाफ पीआईएल : मीडिया ने की भरपूर कवरेज, देखें किसने क्या छापा और दिखाया…

Yashwant Singh : खोजी पत्रकार दीपक शर्मा इन दिनों एक जुझारू टीम के साथ मीडिया में नया, जमीनी और बड़ा प्रयोग कर रहे हैं. बिना बड़ी पूंजी के वह मिशनरी भाव से एक छोटे से कमरे के जरिए ‘इंडिया संवाद’ नामक वेबसाइट संचालित कर रहे हैं. साथ ही यूट्यूब पर इंडिया संवाद नामक चैनल चला रहे हैं. सलमान खान को अवैध तरीके से जमानत दिए जाने के खिलाफ दायर पीआईएल को लेकर आयोजित मीडिया से बातचीत के कार्यक्रम में ‘इंडिया संवाद’ की टीम पहुंची. टीम के अगुवा वरिष्ठ पत्रकार नाजिम नकवी जी थे. उन्होंने विस्तार से बातचीत मुझसे और मेरे वकील उमेश शर्मा जी से की. नाजिम नकवी ने फौरन रिपोर्ट फाइल की और संबंधित वीडियो यूट्यूब पर अपलोड करा दिया. इंडिया संवाद पर प्रकाशित खबर गूगल सर्च में टॉप पर आने लगी. आप भी पढ़िए इंडिया संवाद में क्या छपा और क्या दिखाया गया…

Journalist files PIL in apex court, challenges relief given to Salman Khan

New Delhi: Bollywood actor Salman Khan’s 5 minute bail decision has been finally challenged in the Supreme Court. A Public Interest Litigation (PIL) was on Wednesday filed in the Indian Supreme Court challenging the Bombay High Court’s verdict that suspended Salman’s five-year sentence. The PIL was filed by Yashwant Singh, a media professional, who said that the judicial system is being “manipulated” by the rich and famous. He argued that the sessions court passed the order of conviction and the order of sentencing on the same day, which is in violation of the judgement of Supreme Court.

पूरी खबर पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: http://goo.gl/1V0W2I

‘इंडिया संवाद’ टीम द्वारा तैयार वीडियो देखें : https://goo.gl/g4f0Da


समाचार एजेंसी पीटीआई की तरफ से संबंधित खबर रिलीज की गई जिसे देश के लगभग सारे अखबारों ने समस्त एडिशन में प्रमुखता से छापा. कुछ अखबारी कटिंग इस प्रकार हैं…

 


ईटीवी ने बिग ब्रेकिंग करके इस न्यूज को अपने यहां फ्लैश किया.. देखें वीडियो…

https://www.youtube.com/watch?v=YnbUxppbxnY


Yashwant Singh : सलमान खान को अवैध तरीके से जमानत देने के खिलाफ पत्रकार Yashwant Singh की तरफ से अधिवक्ता Umesh Sharma ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। याचिका डायरी नंबर 16176/2015 है।

पूरी खबर यहां है : http://goo.gl/btb3uG
पूरी याचिका यहां है : http://goo.gl/kJgpaI

याचिका पर पत्रकार यशवंत सिंह और अधिवक्ता उमेश शर्मा के बयान इन वीडियो लिंक पर क्लिक करके देख सुन सकते हैं:
1- https://goo.gl/efqsMc
2- https://goo.gl/Q0xghP
3- https://goo.gl/0lp1Vv

Yashwant Singh : कई मित्रों ने मेरे ह्वाट्सएप पर इंडिया न्यूज, ईटीवी आदि पर चली खबरों के वीडियो अपने मोबाइल से शूट कर भेजे हैं. सलमान खान को अवैध तरीके से दी गई जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका से संबंधित सूचना / खबर को सोशल मीडिया व इंटरनेट पर भी जमकर तवज्जो मिल रही है. इसके लिए आप सभी साथियों का आभार.

सलमान खान को जमानत मिलने के बाद पूरा सोशल मीडिया न्यायपालिका के खिलाफ नकारात्मक भाव से भरा हुआ था. हर कोई कोर्ट के चाल चरित्र चेहरे को कोस रहा था. उसी वक्त मुझे लगा कि कुछ करना चाहिए. सिर्फ सोच लेना ही पर्याप्त नहीं होता. सोचे हुए को कर गुजरने के लिए बहुत मेहनत करनी होती है. लेकिन जब Umesh Sharma जी जैसा तेजतर्रार वकील साथ हो तो कोई दिक्कत ही नहीं. मैंने ट्रायल कोर्ट, अपील और हाईकोर्ट के फैसले की कापी मुंबई से अरेंज की. उमेश भाई साहब ने फैसले की इन प्रतियों को पाते ही रात रात भर जागकर कठिन मेहनत से पीआईएल तैयार कर दी. इसके एवज में मेरे से इन्होंने एक पैसे भी नहीं लिए. इसे कहते हैं एक जैसे मन मिजाज वालों का मिलना. यह पूरा काम मिशनरी यानि सरोकारी भाव-भंगिमा के कारण बेहद कम समय में और बिना किसी खर्च के संभव हो पाया. यहां तक कि स्टेशनरी कागज फाइलिंग आदि के जो पैसे लगे, उसे भी उमेश जी ने ही अपनी जेब से दिया. मैंने तो सिर्फ सिग्नेचर मारा ढेर सारे कागजों पर. उमेश शर्मा जी ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर लड़ रहे सैकड़ों पत्रकारों की तरफ से दर्जनों मीडिया मालिकों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की हुई है. इस काम में भी उन्होंने भड़ास की तरफ से सिर्फ एक आवाज लगाने पर ही सपोर्ट करने / साथ देने का फैसला कर लिया था. थैंक्यू उमेश सर.

भड़ास के एडिटर यशवंत के फेसबुक वॉल से.

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सलमान खान को अवैध तरीके से जमानत दिए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर

एडवोकेट उमेश शर्मा और पत्रकार यशवंत सिंह मीडिया को जनहित याचिका के बारे में जानकारी देते हुए.


एक बड़ी खबर दिल्ली से आ रही है. सलमान खान को मिली जमानत खारिज कर उन्हें जेल भेजे जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में आज एक जनहित याचिका दायर की गई. यह याचिका चर्चित मीडिया पोर्टल Bhadas4Media.com के संपादक यशवंत सिंह की तरफ से अधिवक्ता उमेश शर्मा ने दाखिल की. याचिका डायरी नंबर 16176 / 2015 है. जनहित याचिका के माध्यम से इस बात को अदालत के सामने लाया गया है कि सेशन कोर्ट बॉम्बे ने इस मामले में पहले से निर्देशित कानून का पालन जानबूझ कर नहीं किया जिसकी वजह से सलमान खान को बेल आराम से मिल गयी और इससे भारत के पढ़े-लिखे लोग सन्न है. हर तरफ कोर्ट पर सवाल उठाए जाने लगे. सोशल मीडिया पर कोर्ट के खिलाफ नकारात्मक टिप्पणियों की बाढ़ सी आ गई.

लोग सवाल उठाने लगे कि क्या किसी अदृश्य और बड़ी राजनीतिक ताकत के इशारे पर न्यायपालिका सिर के बल पलट गई और ऐसे ऐसे कारमाने किए कि न्यायपालिका पर से लोगों का भरोसा उठ गया. यह प्रश्न मूल रूप से उठाया गया है कि क्या कानून सभी के लिए बराबर है? अगर ऐसा है तो सेशन कोर्ट के जज साहब ने एक दिन में ही दोनों आदेश क्यों पारित किया जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 1989 में ही कहा था कि ऐसे मामलों में अदालत को दोनों आदेश दो दिनों में पारित करने चाहिये. Allauddin Mian vs State of Bihar [1989 SCC (3) 5] के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया प्रावधान इस प्रकार है-

“We think as a general rule the Trial Courts should after recording the conviction adjourn the matter to a future date and call upon both the prosecu- tion as well as the defence to place the relevant material bearing on the question of sentence before it and thereafter pronounce the sentence to be imposed on the offender. In the present case, as pointed out earlier, we are afraid that tile learned Trial Judge did not attach sufficient importance to the mandatory requirement of sub-section (2) of Section 235 of the Code.”

सेशन कोर्ट के जज साहब के ऐसा करने की वजह से आर्डर की कॉपी उसी दिन उपलब्ध नहीं हो सकी और हाई कोर्ट ने इसी तर्क के आधार पर बेल दे दिया. ऐसा प्रतीत होता है कि यह साब जान बूझ कर सलमान को फायदा पंहुचाने के लिए किया गया और उनको फायदा पंहुचा भी दिया गया. सेशन कोर्ट के जज साहब शाम को सात बजे तक अपने द्वारा जान बूझ कर की गई गलती से सृजित होने वाले बेल आर्डर का इंतजार क्यों करते रहे और क्या उन्होंने ऐसा पहले कभी किया है. क्या हाई कोर्ट बिना फैसले की कॉपी के अपील सुन सकती है और सजा टाल सकती है? कोई भी अपील हाई कोर्ट के सामने बिना फैसले के कॉपी को सलंग्न किए बिना अदालत के सामने रखी ही नहीं जाती है तो इसमें ऐसा क्यों किया गया और क्या पहले ऐसा किया गया है और क्या आगे ऐसा किया जायेगा? क्या हाई कोर्ट सलमान खान के अपील को पंद्रह जुलाई को फैसले के लिये भेज सकता है और इस बात की परवाह किये बिना कि हजारों अपीलें लाइन में लगी अपने सुनवाई का इंतजार कर रहीं हैं और उनके मुलजिम जेलों में बैठे हैं. क्या अदालतें जो समानता का अधिकार दिलवाती हैं वो खुद समानता के अधिकार का हनन कर सकती हैं. जनहित याचिका के साथ सोशल मीडिया में न्यायालय के खिलाफ की गईं नकारात्मक टिप्पणियों की प्रति भी संलग्न की गई है ताकि कोर्ट आइना देख सके.

याचिका को लेकर पत्रकार यशवंत सिंह और अधिवक्ता उमेश शर्मा के बयान इन वीडियो लिंक पर क्लिक करके देख सुन सकते हैं: 1- https://goo.gl/efqsMc   xxx  2-  https://goo.gl/Q0xghP   xxx 3-  https://goo.gl/0lp1Vv    

ज्यादा जानकारी के लिए संपर्क करें:

Umesh Sharma, Adv: 09868235388; e-mail: legalhelplineindia@gmail.com

Yashwant Singh, Petitioner: 09999966466; email: yashwantdelhi@gmail.com

PRESS RELEASE

The present PIL (Diary No. 16176 / 2015) has been filed by Yashwant Singh, journalist who is concerned about the criminal justice system of India being manipulated by rich and influential persons. The petition raises an important question of equality before law being followed and practised by the courts in letter and spirit. Salman Khan, the famous film star was convicted and sentenced in 304, Part-II, 337,338 IPC read with Section 134(A) (B), 187, 181, 185 MV Act and punishment of 5 years and few months was awarded on him on 6/5/2015 by the Sessions Court Bombay. 

The Sessions Court passed the order of conviction and the order of sentencing on the same day which is in violation of judgement of Supreme Court of India which directs as under: Allauddin Mian vs State of Bihar [1989 SCC (3) 5]

“We think as a general rule the Trial Courts should after recording the conviction adjourn the matter to a future date and call upon both the prosecu- tion as well as the defence to place the relevant material bearing on the question of sentence before it and thereafter pronounce the sentence to be imposed on the offender. In the present case, as pointed out earlier, we are afraid that tile learned Trial Judge did not attach sufficient impor- tance to the mandatory requirement of sub-section (2) of Section 235 of the Code.”

High Court of Bombay entertaining the Criminal Appeal without the copy of the judgement and sentencing order in mentioning on the same day i.e. 6/5/2015 and granting a stay on surrender. Sessions court waiting for the order of the High Court till 7.30 PM in the evening in very unusual manner. Can the Session court cite any such example where it waited till 7.30 PM in the evening after sentencing the convict. It was done just because a celeberity was involved despite the fact that his guilt was established before the court and he was awarded the severiest punishment by the Sessions Court. Another irregularity is the fixing of the Criminal Appeal filed by Salman Khan for final disposal on 15 July, 2015 despite the fact that several appeals are awaiting listing and hearing since long and some of the convicts are languishing in jail for years.

This all violates the equal treatment of all before the law and is an example of hostile discrimination to the poor masses of the country who can not afford expensive lawyers and remain suffering. The rich and influential can manipulate the law for their benefit which is evident from this case.

For more details contacts

Umesh Sharma, Adv: 09868235388; e-mail: legalhelplineindia@gmail.com

Yashwant Singh, Petitioner: 9999966466; email: yashwantdelhi@gmail.com


जनहित याचिका में क्या कुछ लिखा गया है, यह जानने-पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षक पर क्लिक करें:

Yashwant Versus Salman

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मजीठिया वेज बोर्ड के लिए अब भी कोई सुप्रीम कोर्ट में केस करना चाहता है तो स्वागत है : एडवोकेट उमेश शर्मा

(File Photo Advocate Umesh Sharma)

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील उमेश शर्मा से भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने वो सवाल पूछा जिसे देश भर के कई मीडियाकर्मी आपस में एक दूसरे से पूछ रहे हैं. सवाल यह कि क्या सुप्रीम कोर्ट में कोई मीडियाकर्मी अब भी मजीठिया वेज बोर्ड का अपना हक पाने के लिए केस कर सकता है? एडवोकेट उमेश शर्मा ने बताया कि बड़े आराम से केस कर सकता है. चलते हुए केस में पार्टी बना जा सकता है, चाहें खुलकर या गोपनीय रहकर. इसके लिए वनटाइम फीस सात हजार रुपये देने होंगे.

याचिका दायर करने के लिए दिल्ली आने की भी जरूरत नहीं है. अगर खुल कर अपने नाम पता के साथ याचिका करना चाहते हैं तो आपको वकालतनामा का फार्मेट आनलाइन भेजा जाएगा जिस पर हस्ताक्षर करके आपको मेल से ही भेज देना होगा. जो गोपनीय रूप से लड़ना चाहते हैं उन्हें अथारिटी लेटर भेजा जाएगा जिस पर वह अपना डिटेल लिखकर भेज सकते हैं.  एडवोकेट उमेश शर्मा से यशवंत की बातचीत को सुनने के लिए नीचे दिए गए यूट्यूब लिंक पर क्लिक कर सकते हैं..

https://www.youtube.com/watch?v=PlqZrf-_LBY

अगर आप मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर गोपनीय तरीके से या खुलकर सुप्रीम कोर्ट में केस डालना चाहते हैं तो अपना नाम, अपने संस्थान का नाम, पद, कार्यअवधि आदि का विवरण लिखकर भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह को उनकी मेल आईडी yashwant@bhadas4media.com पर मेल कर सकते हैं. भड़ास एडिटर यशवंत आपकी मेल को एडवोकेट उमेश शर्मा के साथ गोपनीय तरीके से डिस्कस करेंगे, तदुपरांत आपको मेल के जरिए या फोन के जरिए सूचित करेंगे. आप चाहें तो सीधे एडवोकेट उमेश शर्मा से भी संपर्क कर अपना केस डाल सकते हैं. एडवोकेट उमेश शर्मा से उनकी मेल आईडी legalhelplineindia@gmail.com या उनके आफिस के फोन नंबर 011-2335 5388 या उनके निजी मोबाइल नंबर 09868235388 के जरिए संपर्क कर सकते हैं.

इसे भी पढ़ें:

मजीठिया वेज बोर्ड, 28 अप्रैल और सुप्रीम कोर्ट : क्या हुआ, क्या करें… वरिष्ठ वकील उमेश शर्मा का इंटरव्यू

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मजीठिया वेज बोर्ड, 28 अप्रैल और सुप्रीम कोर्ट : क्या हुआ, क्या करें… सुनिए वरिष्ठ वकील उमेश शर्मा की जुबानी

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील उमेश शर्मा से भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने बातचीत की. विषय था 28 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड मसले पर हुई सुनवाई. बातचीक के दौरान सुप्रीम कोर्ट में वाकई क्या क्या हुआ, इसके बारे में एडवोकेट उमेश शर्मा ने बताया. साथ ही कोर्ट के फैसले के निहितार्थ को व्याख्यायित किया. मीडियाकर्मियों को आगे क्या करना चाहिए, इसको लेकर भी चर्चा हुई.

पूरी बातचीत नीचे दिए गए यूट्यूब लिंक पर क्लिक करके देख सुन सकते हैं… इस यूट्यूब लिंक को ज्यादा से ज्यादा मीडियाकर्मियों तक शेयर करें ताकि उन्हें मजीठिया वेज बोर्ड मामले की आगे रणनीति के बारे में पता चल सके…

https://www.youtube.com/watch?v=tlJsRHR1b3w


उपरोक्त इंटरव्यू का आगे का पार्ट सुनने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें:

मजीठिया वेज बोर्ड के लिए अब भी सुप्रीम कोर्ट में केस किया जा सकता है : एडवोकेट उमेश शर्मा

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