मुलायम सिंह यादव ने अपने तीन पुराने पत्रकार मित्रों को चाय पर बुलाया

Ajai Kumar : आज “नेताजी” मुलायम सिंह ने पुराने पत्रकार मित्रों को चाय पर बुलाया। श्री वीरेंद्र सक्सेना, प्रमोद गोस्वामी और मैं। लगभग एक घंटे तक तमाम नई – पुरानी बातें हुईं। वर्तमान राजनीति पर चर्चा हुई।

नेताजी के चेहरे के उतरते चढ़ते भावों से साफ लगा कि पारिवारिक झगड़े के प्रचार से विधानसभा चुनाव में पार्टी को जबरदस्त नुकसान हुआ है। उन्हें विश्वास है, अब जल्दी ही सब कुछ ठीक हो जायेगा। उन्होंने कहा – “पार्टी का नुकसान करने वालों को भगवान सद्बुद्धि देगा”।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की एफबी वॉल से.

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मुलायम फिर ‘मुल्ला’ बनने को बेताब

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश की सियासत अब दिल की जगह दिमाग के सहारे परवान चढ़ रही हैै। सभी दलों के सूरमा ‘लक्ष्य भेदी बाण’ छोड़ रहे हैं। यही वजह है बसपा सुप्रीमों मायावती अपने दलित वोट बैंक को साधे रखने के लिये बीजेपी को दलित विरोधी और  मोदी की सरकार को पंूजीपतियों की सरकार बताते हुए कहती हैं कि यूपी में बीजेपी की हालत पतली है, इसलिये वह बसपा का ‘रिजेक्टेड मॉल’ ले रही है तो मुसलमानों को लुभाने के लिये बीजेपी को साम्प्रदायिक पार्टी करार देने की भी पूरजोर कोशिश कर रही हैं। आजमगढ़ की रैलीम में मायावती ने यूपी चुनाव जीतने के लिये बीजेपी पाकिस्तान से युद्ध करने की सीमा तक जा सकता है, जैसा बयान मुस्लिम वोटों को बसपा के पक्ष में साधने के लिये ही दिया गया था। वहीं भाजपा और सपा 30 के फेर में फंसे हैं। चुनावी बेला में हमेशा की तरह इस बार भी सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिये  अयोध्या तान छेड़ दी हैं। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह कह रहे हैं कि देश की एकता के लिये 16 के बजाये 30 जानें भी जाती तो वह पीछे नहीं हटते।

मुलायम का उक्त बयान उनकी वोट बैंक की सोची-समझी राजनीति का हिस्सा है। मुलायम यहीं नहीं रूके उन्होंने  विवादित ढांचे को मजिस्द बताते हुए कहा कि अयोध्या में मस्जिद बचाने की कार्रवाई न करते तो देश का मुसलमान कहता कि उनके धर्मस्थल की हिफाजत नहीं हो सकती  तो यहां रहने का औचित्य क्या है ? उनका विश्वास को बचाये रखना हमारा कर्तव्य था। एक तरफ तो मुलामय वोट बैंक की राजनीति करते हैं दूसरी तरफ सीना ठोंक कर कहते हैं कि अन्याय का विरोध और न्याय का साथ देना ही समाजवाद है। यह तय है कि मुलायम का यह बयान लम्बे समय तक चुनावी सुर्खिंयां बटोरता रहेगा। इस बयान के सहारे सपा-भाजपा वोटों के धु्रवीकरण की भी कोशिश करेंगे। इस बात का अहसास मुलामय का बयान आते ही होने भी लगा है। कोई कह रहा है कि मुलायम सिंह एक बार फिर मुल्ला मुलायम बनने को बेताब हो गये हैं तो किसी को लगता है कि अखिलेश सरकार की विफलताओं पर चर्चा न हो इस लिये मुलायम साम्प्रदायिक कार्ड खेल रहे हैं।

प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। मुलायम सिंह का कारसेवकों के प्रति इतना रूखा व्यवहार देखकर धर्माचार्य आग बबूला हो गये। मुलायम सिंह यादव के बयान से आक्रोशित अयोध्या में सबसे पहली प्रतिक्रिया हई। आचार्य पीठ दशरथ महल बड़ा स्थान के महंत बदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंद्रप्रसादाचार्य ने मुलायम के  बयान को गैर-जिम्मेदाराना और संवेदनहीन करार दिया। उन्होंने कहा राजनेता किसी एक समूह या संप्रदाय का नहीं होता। मुलायम सिंह का यह बयान लोकशाही को खतरे में डालने वाला है। वहीं जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य के अनुसार वोट बैंक की मजबूरी सभी दलों और नेताओं के लिए है पर इस फेर में संवेदना का ख्याल रखा जाना चाहिए।

मुलायम सिंह का यह बयान उन दिनों की याद दिला रहा है, जब उन्होंने कारसेवकों को रोकने के चक्कर में अयोध्या की परिक्रमा को ही प्रतिबंधित कर दिया था। रामवल्लभाकुंज के अधिकारी राजकुमारदास ने कहा, कारसेवक सही कर रहे थे या गलत। यह अलग बहस है पर मुलायम सिंह का कारसेवकों के बारे में ताजा बयान रामभक्तों को अपमानित करने वाला है और उन्हें इसका खामियाजा भुगतना होगा। रंगमहल के महंत रामशरण दास ने कहा, मुलायम सिंह का बयान इस तक्ष्य का द्योतक है कि कारसेवकों पर गोली राजनीतिक लाभ लेने के लिए चलवाई गई थी और ऐसे नेताओं के बारे में लोगों को नए सिरे से विचार करना होगा। नाका हनुमानगढ़ी के प्रशासक पुजारी रामदास ने कहा, मुलायम सिंह का बयान अलगाव को बढ़ावा देने वाला है और चुनाव नजदीक देखकर वे ऐसे ऊल-जुलूल बयान देकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराना चाहते हैं।

निष्काम सेवा ट्रस्ट के व्यवस्थापक रामचंद्रदास ने कहा, कुछ लोगों को अपना हित साधने के लिए कोई भी कीमत अदा करने की आदत होती है, मुलायम सिंह इन्हीं में से एक हैं। मुलायम का बयान युवा सीएम अखिलेश यादव के लिये मुश्किल पैदा कर सकता है जो विकास के नाम पर 2017 का चुनाव लड़ना चाहते थे। निश्चित तौर पर अखिलेश से भी मीडिया सवाल पूछेगी। उन्हें बताना पड़ेगा कि इस मुद्दे पर उनकी सरकार का क्या नजरिया है।

वैसे बीजेपी भी वोट बैंक की सियासत में कहीं पीछे नहीं है। बीजेपी के रणनीतिकार जिन्होंने दलित-ब्राहमण वोटरों को लुभाने के लिये पार्टी के दरवाजे खोल दिये थे को शायद अब अपनी गलती का अहसास होने लगा है। इसी लिये पार्टी के निष्ठावान नेताओं/ कार्यकर्ताओं की नाराजगी को भांप कर पार्टी का थिंक टैंक अलाप करने लगा हैं कि 30 से अधिक बाहरी (दलबदलूओं) नेताओं को टिकट नहीं दिया जायेगा। पिछले कुछ समय से जिस तरह से बीजेपी दलबदलुओ के लिये पनाहगाह बनी हुई है, उससे बीजेपी के उन नेताओं के बीच बेचैनी बढ़ना स्वभाविक है जो लम्बे समय से विधान सभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन दलबदलुओं के कारण उनकी दावेदारी कमजोर होती जा रही थी। कांग्रेस ने तो मुसलमानों और ब्राहमणों को लुभाने के लिये दिल्ली से शीला दीक्षित और गुलाम नबी आजाद को ही मैदान में उतार रखा है। कांग्रेस मुजफ्फरनगर दंगों, दादरी कांड और मथुरा-बुलंदशहर की वारदातों को उछाल कर सपा-भाजपा पर हमलावार है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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एक दिन, दो गम

अजय कुमार, लखनऊ

एक साहित्य जगत की महान विभूति थी तो दूसरा संगीत की दुनिया का सम्राट। एक कलम का उस्ताद था तो दूसरे की उंगलियों की थाप लोंगो को सम्मोहित कर लेती थी। दोनों ने एक ही दिन दुनिया से विदा ली। बात तबला सम्राट पंडित लच्छू महाराज और साहित्य की हस्ताक्षर बन गईं महाश्वेता देवी की हो रही है। भगवान भोले नाथ की नगरी वाराणसी से ताल्लुक रखने वाले लच्छू महाराज और बंगाल की सरजमी से पूरे साहित्य जगत को आईना दिखाने वाली ‘हजार चौरासी की मां’ जैसी कृतियां की लेखिका महाश्वेता देवी (90) ने भले ही देह त्याग दिया हो लेकिन साहित्य जगत और संगीत प्रेमिेयों के लिये यह हस्तियां शायद ही कभी मरेंगी। अपने चाहने वालों के बीच यह हमेशा अमर रहेंगी।

बात पहले लच्छू महाराज की। तबला को नई  बुलंदियों तक ले जाने वाले वाले 71 वर्षीय लच्छू महाराज की अचानक हदय गति रूकने से हुई मौत की खबर जिसने भी सुनी उसके मुंह से बस एक ही शब्द निकला, ’बनारस घराने का तबला शांत हो गया’। जाने-माने तबला वादक पंडित लच्छू महाराज अभिनेता गोविंदा के मामा थे। लच्छू महाराज की मौत की खबर सुनते ही ठुमरी गायिका पद्विभूषण गिरिजा देवी, पद्मभूषण पंडित छन्नू लाल मिश्र, पंडित राजन -साजन मिश्र जैसे तमाम लोग स्तब्ध रह गये।

लच्छू महाराज यों ही महान नहीं बन गये थे। सम्मान हाासिल करने के लिए इस दौर में जहां लोग एड़ी चोटी का जोर लगा देते है। वहीं फक्कड़ मिजाज पंडित लच्छू महाराज ने पद्मश्री सम्मान ठुकार दिया  था। सितार के शहंशाह बड़े गुलाम अली, भारत रत्न पंडित रविशंकर समेत देश- दुनिया के नामचीन कलाकारों के साथ संगत करने वाले पंडित लच्छू महाराज ने अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगा  वह जीवन भर ईमादारी और रियाज के बल पर आगे बढ़ने की वकालत करते रहे।वर्ष 1992 में जब केंद्र में प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली सरकार थी तब तबला वादक पंडित लच्छू महाराज को पद्मश्री सम्मान के लिए नामित किया गया था। जब अफसर के घर आने की खबर महाराज को दी गईं तब उन्होंने बैरंग वापस कर दिया, लेकिन दुख की बात है कि उनकी अंतिम यात्रा अथवा श्रद्धांजलि देने को संगीत जगत की बड़ी हस्ती तो क्या नेता – जनप्रतिनिधि और अफसर तक नहीं पहुंचे। स्विट्जरलैंड से पत्नी टीना और बेटी चंद्रा नारायणी वीजा न मिलने के चलते तो भांजे एक्टर गोंविदा मौसम खराब होने से नहीं आ सके। सिंगर दलेर मेहंदी के भाई शमशेर मेहंदी को छोड़ दुनिया भर में फैले उनके हजारों शिष्यों में से एक भी नहीं दिखे।

भाई जय नारायण महाराज से जुड़े एक वाक्ये का वर्णन करते हुए कह रहे थे, ‘एक बार मशहूर नृत्यांगना सितार देवी के साथ उनका तबला वादक नहीं आया था। संगत के लिए लच्छू महाराज मंच पर आए तब सितार देवी ने कहा था ये बच्चा बजाएगा। लेकिन जब लच्छू महाराज ने बजाना शुरू किया तो 20 मिनट का कार्यक्रम 16 घंटे तक नॉन स्टॉप चलता रहा। पैर में खून बहने से सितारा देवी ही रुकीं और लच्छू महाराज को गले लगा लिया था।’

बात हजार चौरासी की मां जैसी कृतियां देने वाली महाश्वेता देवी (90) की कि जाये तो उपेक्षितों और दबे- कुचले तबकों की आवाज उठाने वाली लेखिका महाश्वेता का भी इसी दिन खून में सक्रमण और किडनी के काम करने से बंद कर देने के कारण मौत हो गई। साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ, पद्म विभूषण और मैग्सेसे जेसे पुरस्कारों से सम्मानित ‘हजार चौरासी की मां’ के अलावा ‘अरण्य अधिकार’ आदि शामिल है। महाश्वेता की लघु कहानियों के 20 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। महाश्वेता की मौत पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा,‘ देश ने एक महान लेखक को खोया है। जबकि बंगाल ने अपनी मां को खो दिया है।’

लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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अखिलेश के साहसिक निर्णय के बाद कुनबे में युद्ध शुरू

भतीजे के दांव से बाप-चचा सब चित, सपा पर भारी अखिलेश की सोच और जातिवाद पर भारी पड़ा विकासवाद

अजय कुमार, लखनऊ

अंत भला तो सब भला। समाजवादी पार्टी में अखिलेश समर्थक यही कह रहे हैं। पहले साल बाहुबली नेता डीपी यादव को और आखिरी समय में बाहुबली अंसारी बंधुओं को ‘नो इंट्री’ का कार्ड दिखाकर अखिलेश यादव ने यह साबित कर दिया है कि अगर वह अड़ जायें तो फिर उन्हें कोई बैकफुट पर नहीं ढकेल सकता है। तीन दिनों तक चले ड्रामें के बाद सपा संसदीय बोर्ड की बैठक में अखिलेश के तेवरों को देखते हुए जब पार्टी ने मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल (कौएद) से किराना करने की घोषणा की तो उन लोगों के चेहरों पर मायूसी दिखाई दी जिन्हें लगता था कि कौएद की मदद से सपा पूरबी उत्तर प्रदेश की कुछ सीटों पर अपनी ताकत में इजाफा कर सकती है।

अखिलेश की जिद्द के आगे उनके पापा-चाचा सब बौने नजर आये। कौएद को सपा के करीब लाने मे अहम भूमिका तो चचा शिवपाल यादव गुट ने निभाई थी, लेकिन जब चचा को लगा की भतीजा अखिलेश हत्थे से उखड़ा जा रहा है तो शिवपाल ने यह कहते हुए गेंद मुलायम सिंह क पाले में गेंद डाल दी कि कौएद को साथ लाने के बारे में फैसला नेताजी मुलायम सिंह की मर्जी से लिया गया था। इसके बाद अखिलेश के तेवर तो ढीले पड़ गये, लेकिन इरादे चट्टान की तरह अडिग नजर आये। उन्हें लग रहा था कि दागी-दबंग अंसारी बंधुओं को साथ लाने से 54 प्रतिशत युवा वोटर नाराज हो सकते हैं,जो इस समय अखिलेश सरकार के विकास कार्यो से काफी प्रभावित नजर आ रहे हैं।

संसदीय समिति की बैठक से चंद घंटे पहले एक निजी न्यूज चैनल के कार्यक्रम में एक सवाल के जबाव में जब अखिलेश ने कहा कि ‘सपा में नहीं आयेंगे मुखतार जैसे लोग’ तो सीधे मैसेज सपा आलाकामन यानी संसदीय बोर्ड को गया। यही वजह थी संसदीय बोर्ड में अखिलेश के खिलाफ किसी ने मंुह खोलने की हिमाकत नहीं की। अखिलेश ने बैठक में साफ कहा आपराधिक गतिविधियों वाले नेताओं को पार्टी में लाने से विकास का मुद्दा पीछे छूट जायेगा। दो घंटे के भीतर संसदीय बौर्ड ने अखिलेश की विचारधारा को मोहर लगा दी और कुछ ही देर बाद समाजवादी पार्टी के महासचिव रामगोपाल यादव ने प्रेस कांफ्रेस करके घोषणा कर दी कि कौमी एकता दल के सपा में विलय से सीएम अखिलेश यादव नाराज थे, इस लिये इस विलय को रद्द किया कर दिया गया है। रामगोपाल के बगल में शिवपाल यादव भी बैठे थे,लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।

भतीजे के सामने बाप-चचा छोटे नहीं नजर आयें, इस लिये कौएद से दूरी बनाये जाने के साथ यह घोषणा भी कर दी गई कि कौएद को सपा के करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बलराम यादव जिनको अखिलेश ने कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया था, का मंत्री पद फिर से बहाल होगा। कौएद से सपा के दूरी बनाते ही कौएद नेता बाहुबली मुख्तार अंसारी को लखनऊ जेल से फिर शिफ्ट कर दिया गया। मुख्तार को कौएद-सपा के विलय की घोषणा होते ही लखनऊ की जेल में शिफ्ट कर दिया गया था, जिसके चलते पुलिस के कुछ बड़े अधिकारियों पर भी गाज गिरी थी।

पूरे घटनाक्रम से एक बात जरूर साफ हो गई कि समाजवादी परिवार में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है और इसे मात्र मीडिया की उपज बताकर खारिज नहीं किया जा सकता है। खासकर चचा शिवपाल यादव और भतीजे अखिलेश यादव के बीच कुछ ज्यादा ही तल्खी नजर आ रही है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव कई बार इस तल्खी को कम करने के लिये अपने हिसाब से कदम उठा चुके हैं, परंतु उनके सभी प्रयास बेकार साबित हो रहे हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि सपा परिवार में विचारों से अधिक कुर्सी की लड़ाई चल रही है।

इसका कारण भी है कि 2012 के विधान सभा चुनाव के समय जब यह बात उभर कर आ रही थी कि मुलायम सिंह सीएम बनकर यूपी की सियासत नहीं करेंगे, इसके बाद सीएम के तौर पर शिवपाल यादव के नाम की चर्चा होने लगी थी, मगर ऐन मौके पर अखिलेश की इंट्री हुई और वह बाजी मार ले गये। सियासी पिच के नये खिलाड़ी अखिलेश यादव को सीएम बनाये जाने की घोषणा जब पिता मुलायम सिंह ने की तो राजनीति की पिच के पुराने खिलाडी शिवपाल यादव और उनके समर्थकों को नेताजी का यह फैसला रास नहीं आया, लेकिन कोई कर क्या सकता था। यही वजह है कि आज भी शिवपाल यादव के कई फैसलों पर अखिलेश को तो अखिलेश के अनेक फैसलों से शिवपाल आहत होते रहते हैं।

यह पहला मौका नहीं था जब सीएम को बिना भरोसे में लिए पार्टी ने कोई फैसला ले लिया हो। हाल ही में मुलायम की छोटी बहू अर्पणा यादव को लखनऊ कैंट से विधान सभा प्रत्याशी बनाये जाने का फैसला मुलायम सिंह ने अखिलेश को विश्वास में लिये बिना अपने स्तर पर कर दिया था। इससे पहले पंचायत चुनाव के समय सीएम के करीबी सुनील यादव साजन और आनंद भदौरिया को पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया। उस वक्त भी सीएम को भरोसे में नहीं लिया गया। तब भी शिवपाल यादव ने अखिलेश की नाराजगी की चिंता किये बिना उनके दोंनों करीबियों के निष्कासन का पत्र जारी कर दिया था।

इस घटना से सीएम अखिलेश काफी नाराज हो गए और सैफई महोत्सव में भी नहीं पहुंचे। बाद में सीएम ने न सिर्फ दोनों की वापसी करवाई बल्कि एमएलसी भी बनवा दिया। इसके अलावा आरएलडी के विलय और अमर-बेनी की वापसी में भी शिवपाल यादव की सक्रिय भूमिका रही। इसने सीएम को असहज किया,यह सब तब हो रहा है जबकि आम धारणा यही है कि सपा के भीतर होने वाले फैसलों पर अंतिम मुहर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ही लगाते हैंं। इससे पहले अखिलेश की नाराजगी की चिंता किये बिना बिहार के सीएम नीतीश कुमार और लालू यादव के साथ हुए महागठबंधन पर भी मुलायम ने मुहर लगा दी थी। तब भी अखिलेश की सोच से इत्तर शिवपाल यादव इस महागठबंधन के पक्ष में खड़े थे। उस समय सपा महासचिव प्रो.रामगोपाल इस महागठबंधन के पक्ष में नहीं थे और उन्होंने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया भी व्यक्त की थी। बाद में यह फैसला  बदल भी दिया गया।

मगर अंसारी बंधुओं से हाथ मिलाने के पक्ष में नहीं होने के बाद भी प्रो0रामगोपाल यादव ने अखिलेश का साथ देने की बजाये चुप्पी ओढ़े रखी, जिसको लेकर भी सियासी मायने निकाले गये। अब तो हर तरफ एक ही चर्चा हो रही है कि समाजवादी परिवार में ऊपरी तौर पर सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश की जा रही हो, लेकिन अब यह लड़ाई सार्वजनिक हो चुकी है। इसलिये इसे छिपाया नहीं जा सकता है। जब सपा के महासचिव प्रो.रामगोपाल प्रेस कांफ्रेस में कहे,‘ इस फैसले (अंसारी बंधुओं को सपा में शामिल करना) से सीएम अखिलेश यादव नाराज थे, मगर अब नहीं हैं. कौमी एकता दल का विलय उनकी इच्छा के विपरीत हुआ था” तो हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है।

हर परिवार में कुछ न कुछ चलता है, पर सब मिलकर उसे ठीक कर लेते हैं।’ यह जुमला ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है। सपा से किसी को निकालने, किसी को गले लगाने की परिपाटी के कारण पारिवारिक रिश्तों में तनाव आता देख,संसदीय बोर्ड ने अब नेताजी के पास यह अधिकार सीमित कर दिया है कि बिना उनकी सहमति से किसी नेता को निकाला या पार्टी में शामिल नहीं किया जा सकता है। इसी के साथ सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का भी गठन नेताजी की मर्जी से ही किया जायेगा। कौएद प्रकरण से उबरने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 2012 की समाजवादी ‘क्रांति रथ यात्रा’ की तर्ज पर पूरे प्रदेश में ‘समाजवादी विकास रथ यात्रा पर निकलने वाले हैैं ताकि प्रदेश की जनता को उनकी सरकार के विकास कार्यो की जानकारी दी जा सके।

खैर, पूर्वी उत्तर प्रदेश में कौमी एकता दल से हाथ मिलाने या दूरी बनाये रखने से पार्टी को क्या फायदा होगा, यह सब तो अतीत के गर्भ में छिपा है, लेकिन इस सच्चाई को ठुकराया नहीं जा सकता है कि पूर्वांचल के कई जिलों में अंसारी बंधुओं की मजबूत पकड़ है। कौएद 2012 के विधानसभा चुनाव में भारतीय समाज पार्टी के साथ मिलकर 22-22 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। मऊ और मोहम्मदाबाद विधानसभा से पार्टी के विधायक मुख्तार अंसारी और सिगबतुल्लाह अंसारी जीत गए थे। इसके अलावा जहूराबाद, घोसी, जमानिया, गाजीपुर सदर, सैदपुर, जखनिया, जंगीपुर, बलिया सदर, फेफना, बांसडीह, चंदौली, बनारस दक्षिणी विधान सभा सीट पर कौमी एकता दल के प्रत्याशियोे को 30 से 50 हजार तक वोट मिले थे। अंसारी बंधुओं का इन सीटों पर आज भी प्रभाव है। कौएद मुस्लिमों के बीच की ही पार्टी नहीं थी। मुस्लिमों के अलावा दूसरी कई बिरादरियां भी कौएद के साथ जुड़ी है।

सपा इसी वोट बैंक को अपने पक्ष में करना चाहती थी। मगर अब विलय रद होने से पूरे इलाके में नाराजगी बढ़ सकती है। इसके विपरीत राजनैतिक पंडित इसे प्रदेशीय परिपेक्ष में देख रहे हैं। उन्हें लगता है कौएद के साथ हाल मिलाने से पूर्वांचल की कुछ सीटों पर भले ही सपा की दावेदारी मजबूत हो जाती, लेकिन प्रदेश के कई हिस्सों में इसकी निगेटिव प्रतिक्रिया भी होती। विरोधियों को सपा को घेरने का मौका हाथ लग जाता। अखिलेश की इसी सोच ने कौएद और सपा के रिश्तों की चंद घंटों में ही बलि ले ली। आज की तारीख में समाजवादी पार्टी में अखिलेश से बड़ा कोई चेहरा नहीं है। भले ही अखिलेश सरकार कानून व्यवस्था के मामले में घिरी हुई हो, परंतु अखिलेश की छवि बेदाग है। उनके ऊपर किसी तरह के भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है और छवि एक विकास पुरूष जैसी है।

बहरहाल, सपा में अंसारी बंधुओं की इंट्री पर रोक से सपाईयों को एक बार फिर जश्न मनाने का मौका मिल गया है। 2012 के चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर अखिलेश यादव ने बाहुबली डीपी यादव को पार्टी में लेने से इनकार कर दिया था। इसका मेसेज पूरे प्रदेश में गया था। अब उसी इमेज को फिर से भुनाने की तैयारी है। माफिया मुख्तार अंसारी की पार्टी को न लेकर सीएम अखिलेश यादव अपनी वही इमेज दोबारा पा सकते हैं। इससे पार्टी को फायदा हो सकता है। कौएद और सपा के विलय का पूरा प्रकरण नाटकीय अंदाजा में खत्म हो गया। रह गईं तो कुछ यादें और इसके सहारे वोट बटोरने की चाहत। अगर यह प्रकरण सामने ही नहीं आता तो शायद सपा के पक्ष में माहौल बनाना आसान नहीं होता।

अंसारी बंधुओं से दूरी बनाकर अखिलेश ने साहसिक फैसला लिया है,लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उन्हें मुस्लिम वोटों की चिंता नहीं है। यही वजह थी अंसारी बंधुओं को लेकर सपा की तरफ से मुसलमानों के बीच गलत मैसेज नहीं जाये,इसलिये अखिलेश यादव ने तुरंत अपने आवास पर रोजा इफ्तार के बहाने मुसलमानों को लुभाना शुरू कर दिया। सरकार के मंत्री अहमद हसन ने मुलायम और अखिलेश यादव को मुलसमानों का सबसे बड़ा हितैषी बताया। यह बात वह मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरूओं की मौजूदगी को भी बार-बार बताते रहे। इससे चंद घंटों पहले अखिलेश सरकार ने मुसलमानों के लिये एक साथ कई प्रस्तावों को मंजूरी देकर अपने इरादे साफ कर दिये थे।

अखिलेश कैबिनेट ने अल्पसंख्यकों के हितों के नाम पर बीपीएल अल्पसंख्यक अभिभावकों की बेटियों की शादी के लिए आर्थिक सहायता राशि दस हजार रुपये से बढ़ाकर बीस हजार रुपये कर दी। ज्यादा से ज्यादा अल्पसंख्यकों को यह सहायता मिले, इसके लिए उनकी आय सीमा को भी बढ़ा दिया गया । मदरसा शिक्षकों को समय से सैलरी और अल्पसंख्यक छात्रों की स्कॉलरशिप और उसके लिए आय सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव को भी मंजूर कर लिया गया हैं। मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों को समय से वेतन देने के लिए उत्तर प्रदेश मदरसा (शिक्षकों-कर्मचारियों का वेतन भुगतान) विधेयक 2016 के प्रारूप को कैबिनेट मंजूरी देते हुए कहा गया है कि मदरसा शिक्षकों के वेतन की पूरी रकम का भुगतान राज्य सरकार करेगी। अब तक इन्हें वेतन शासनादेश से मिलता था पर इसमें अक्सर देरी हो जाती थी। अब हर संस्था को हर महीने की 20 तारीख को बिल जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी को देना होगा। बिल मंजूर होते ही वेतन खाते में आएगा।

इसी तरह से दो लाख की वार्षिक आय वाले अल्पसंख्यक परिवार के कक्षा नौ और दस के छात्र भी स्कॉलरशिप के लिए आवेदन कर सकेंगे। अब तक केवल एक लाख रुपये आय वाले परिवार के छात्र ही आवेदन कर पाते थे। छात्रों को अब स्कालरशिप में 150 रुपये प्रतिमाह (अधिकतम दस महीने के लिए 1500 रुपये वार्षिक) और भत्ते के रूप में 750 रुपये एकमुश्त दिए जाते जाएंगे। यानी एक छात्र को कुल 2250 रुपये दिए जाएंगे।

सीएम अखिलेश यादव अपनी छवि को लेकर गंभीर हैं तो  विपक्ष अंसारी बंधुओं को सपा में शामिल किये जाने पर अखिलेश की नाराजगी और उनको बाहर का रास्ता दिखाने के प्रकरण को ड्रामेबाजी करार दे रहा है। भाजपा के प्रवक्ता विजय पाठक कहते हैं पहले डीपी यादव और अब मुख्तार अंसारी को पार्टी में शामिल नहीं किये जाने का विरोध कर रहे सीएम को यह बात भी नहीं भूलना चाहिए कि 2012 के विधान सभा चुनाव में सबसे अधिक 111 दागी उन्हीं की पार्टी के टिकट से चुनाव जीतकर माननीन बने थे। इनमें से 56 के खिलाफ तो हत्या, अपहरण जैसे गंभीर अपराध में मुकदमा चल रहा था। उन्हीं के राज में समाजवादी परिवार के संरक्षण में रामवृक्ष यादव जैसे भस्मासुर भी पैदा हुए। अनिल यादव, यादव सिंह जैसे भ्रष्ट अधिकारियों, को भी उनकी सरकार ने पाला पोसा। गायत्री प्रसाद प्रजापति जैसे भ्रष्ट नेता उनकी कैबिनेट का हिस्सा बने हुए हैं।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क ajaimayanews@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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कौन होगा यूपी भाजपा में सीएम पद का चेहरा, कई नाम खारिज तो कई नाम चर्चा में

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश फिर से चुनावी मुहाने पर खड़ा है। राजनीति के गलियारों से लेकर गॉव की चौपालों , शहरों के नुक्कड़ों तक पर हर कोई यही सवाल  पूछ रहा है कि कौन होगा यूपी का अगला सीएम। सीएम की दौड़ में कुछ पुराने चेहरे हैं तो कुछ नये चेहरों को भी सीएम पद का संभावित दावेदार समझा जा रहा है। सपा की तरफ से अखिलेश यादव और बसपा की ओर से मायावती की दावेदारी तो पक्की है ही। इसलिये सपा और बसपा में कहीं कोई उतावलापन नहीं है। चुनौती है तो भाजपा और कांग्रेस के सामने। इसमें भी बीजेपी की स्थिति काफी सोचनीय है। सीएम की कुर्सी के लिये भाजपा के संभावित दावेदारों में कई नाम शामिल हैं। दोंनो ही दलों ने अभी तक सीएम उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है।

कांग्रेस तो शायद ही सीएम उम्मीदवार के नाम की घोषणा करे, लेकिन भाजपा के बारे में कयास लगाया जा रहा है कि असम के नतीजों से उत्साहित बीजेपी आलाकमान इलाहाबाद में 12-13 जून को होने वाली कार्यसमिति की बैठक में यूपी के लिये सीएम का चेहरा सामने ला सकती है। बीजेपी की तरफ से करीब आधा दर्जन नेताओं के नाम बतौर सीएम उम्मीदवार चर्चा में हैं,लेकिन अंतिम फैसला पीएम मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को ही लेना है। इतना तय है कि भाजपा किसी विवादित छवि वाले नेता को सीएम के रूप में प्रोजेक्ट नहीं करेगी। इस बात का भी ध्यान रखा जायेगा कि सीएम की दौड़ में कोई ऐसा नेता भी आगे न किया जाये जिसके चलते एक वर्ग विशेष के वोटर बीजेपी के खिलाफ लामबंद हो जायें। हॉ, दिल्ली से सबक लेकर आलाकमान पार्टी से बाहर का कोई चेहरा सामने नहीं लायेगी।

भाजपा 14 वर्षो के अम्बे अंतराल के बाद पहली बार यूपी के विधान सभा चुनावों को लेकर उत्साहित दिखाई दे रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने से पहले तक गुटबाजी और टांग खिंचाई में जुटे प्रदेश नेताओं पर जब से दिल्ली आलाकमान की मजबूत पकड़ हुई है तब से हालात काफी बदल गये है। बीजेपी के प्रदेश नेताओं की हठधर्मी पर लगाम लगा दी गई है। सारे फैसले अब दिल्ली से लिये जा रहे हैं। बात-बात पर लड़ने वाले यूपी के नेतागण दिल्ली के फैसलों के खिलाफ चूं भी नहीं कर पाते हैं। आलाकमान प्रदेश स्तर के नेताओं की एक-एक गतिविधि पर नजर जमाये रहता है। कौन क्या कर रहा है। पल-पल की जानकारी दिल्ली पहुंच जाती है।असम क तरह यूपी में भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) विधान सभा चुनाव के लिये सियासी जमीन तैयार करने में जुटा है। बीजेपी नेताओं को इसी जमीन पर चुनावी फसल उगानी और काटनी होगी।

बात 2012 के विधान सभा चुनाव की कि जाये तो उस समय समाजवादी पार्टी को 29.13, बीएसपी को 25.91,बीजेपी को 15 और कांग्रेस को 11.65 प्रतिशत वोट मिले थे। इन वोटों के सहारे समाजवादी पार्टी 224, बसपा 80, भाजपा 47 और कांग्रेस 28 सीटों पर जीतने में सफल रही थी। दो वर्ष बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में स्थिति काफी बदल गई। मोदी लहर में सपा-बसपा और कांग्रेस सब उड़ गये। विधान सभा चुनाव के मुकाबले बीजेपी के वोट प्रतिशत में 27 प्रतिशत से अधिक का इजाफा हुआ और उसको 42.63 प्रतिशत वोट मिले। वहीं सपा के वोटों में करीब 07 प्रतिशत और बीएसपी के वोटों में 06 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई। कांग्रेस की स्थिति तो और भी बदत्तर रही। उसे 2012 के विधान सभा में मिले 11.65 प्रतिशत वोटों के मुकाबले मात्र 7.58 प्रतिशत वोटों पर ही संतोष करना पड़ा। वोट प्रतिशत में आये बदलाव  के कारण बसपा का खाता नहीं खुला वहीं समाजवादी पार्टी 05 और कांग्रेस 02 सीटों पर सिमट गई थी। बीजेपी गठबंबधन के खाते में 73 सींटे आईं जिसमें 71 बीजेपी की थीं और 02 सीटें उसकी सहयोगी अपना दल की थीं। इसी के बाद से बीजेपी के हौसले बुलंद हैं और वह यूपी में सत्ता हासिल करने का सपना देखने लगी है।

पहले तो बीजेपी आलाकमान मोदी के चेहरे को आगे करके यूपी फतह करने का मन बना रहे थे,परंतु बिहार के जख्मों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया और असम की जीत ने बीजेपी को आगे का रास्ता दिखाया। यह तय माना जा रहा है कि यूपी चुनाव में मोदी का उपयोग जरूरत से अधिक नहीं किया जायेगा। इसकी जगह स्थानीय नेताओं को महत्व दिया जायेगा। असम में सीएम का चेहरा प्रोजक्ट करके मैदान मारने और यूपी में भी इसी तर्ज पर आगे बढ़ने की बीजेपी आलाकमान की मंशा को भांप कर यूपी बीजेपी नेताओं के बीच यह चर्चा शुरू हों गई कि पार्टी किसे मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करेगी। कई नाम सामने भी आयेे हैं। मगर आलाकमान फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। उसे डर भी सता रहा है कि जिसको सीएम प्रत्याशी घोषित नहीं किया जायेगा वह विजय अभियान में रोड़ा बन सकता है। पार्टी के भीतर मौजूद तमाम तरह के सियासी समीकरण भाजपा नेतृत्व को इस मामले में आगे बढ़ने से रोक रहे हैं तो आलाकमान की बाहरी चिंता यह है कि वह चाहता है कि सीएम उम्मीदवार का चेहरा ऐसा होना चाहिए जो बसपा सुप्रीमो मायावती,सपा नेता और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से 19 न हो,लेकिन यूपी की सियासत में ऐसा कोई चेहरा दिख नहीं रहा है। यूपी में जो दमदार चेहरे से उसमे से कुछ उम्र दराज हो गये हैं तो कुछ दिल्ली की सियासत छोड़कर यूपी के दंगल में कूदने को तैयार नहीं हैं। बीजेपी की तरफ से जब सीएम का चेहरा आगे करने की बात सोची जाती है तो पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह का नाम सबसे पहले दिमाग में आता है। परंतु कल्याण सिंह के सक्रिय राजनीति से कट जाने और राजनाथ के मोदी सरकार में नंबर दो की हैसियत पर होने के कारण यूपी वापस आने की संभावनाएं बिल्कुल खत्म हो जाती हैं। मोदी सरकार के और और मंत्री कलराज मिश्र भी दिल्ली छोड़कर यूपी नहीं आना चाह रहे हैं। इसके बाद जो नाम बचते हैं उनको लेकर नेतृत्व के भीतर ही असमंजस है।

अतीत में भाजपा के यह नेता किस तरह से सिरफुटव्वल करते रहे हैं किसी से छिपा नहीं है। भाजपा के दिग्गज नेता और मोदी सरकार में मंत्री कलराज मिश्र तो 2002 में सार्वजिनक रूप से कह चुके हैं कि भाजपा के कुछ बड़े नेताओं में अब दूसरे की टांग खींचने की प्रवृत्ति काफी बढ़ गई है। ऐसी सोच रखने वाले कलराज अकेले नहीं हैं।  कौन होगा बीजेपी का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार के  सवाल पर भाजपा के कई प्रमुख नेता कहते हैं कि यूपी के चुनावी समर में भाजपा का मुकाबला बसपा नेत्री मायावती व सपा प्रमुख मुलायम सिंह और उनके पुत्र तथा मौजूदा सीएम अखिलेश यादव जैसे चेहरों से होगा, जिनका अपना जातीय वोट आधार है। भाजपा के पास इन चेहरों का जवाब यूपी में कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह कलराज मिश्र जैसे चेहरे ही हो सकते थे पर, तीनों इस समय दूसरी भूमिका छोड़कर उत्तर प्रदेश की चुनौती स्वीकर करने के लिये तब तक राजी नहीं होंगे जब तक कि आलाकमान उन पर दबाव नहीं बनायेगा (जो मुश्किल लगता है।)

बाकी जो नाम चर्चा में है उनमें उत्तर प्रदेश से संबंधित नामों में कोई ऐसा नहीं है जो अपनी छवि और पकड़ की बदौलत भाजपा की नैया पार लगा सके। स्मृति ईरानी जैसे बाहर के नेताओं का नाम भी सीएम के लिये चर्चा में है, लेकिन उन्हें आगे लाने के लिये भाजपा नेतृत्व को पहले यूपी के प्रमुख नेताओं के बीच उनके नाम पर सहमति बनानी होगी। आज की तारीख में भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में जो नाम चर्चा में हैं उसके साथ न तो मोदी जैसी उपलब्धियां जुड़ी हैं और न उसकी कोई पहचान ही हैं। ऐसे किसी नाम पर आलाकमान सहमति की मोहर लगा देता है तो संभावना इस बात की भी है कि यूपी के अन्य प्रमुख नेता कहीं हाथ पर हाथ रखकर बैठ न जाये। शायद यही वजह है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को कहना पड़ रहा है कि असम के प्रयोग को यूपी में दोहरानें के बारे में  उन्होनें अभी कुछ तय नहीं किया है। फिर भी जिन नामों की चर्चा चल रही है उनके बारे में जान लेना भी जरूरी है।

सबसे पहला नाम मौजूदा केन्द्रीय गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह का आता है। कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा घर के दरवाजें खुले रखने और लगातार संपर्क व संवाद रखने के कारण प्रदेश के कार्यकर्ताओं में राजनाथ सिंह की स्वीकार्यता है। उनमें प्रशासनिक क्षमता भी है। उनकें चेहरे को आगे करके चुनाव लड़ने से भाजपा को लाभ भी हो सकता हैं। राजनाथ के सहारे भाजपा सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट का हवाला देकर अगड़ों, अति पिछड़ों व अति दलितो को भी अपने पक्ष में मोड़ सकती है। अल्पसंख्यकों के बीच भी उनकी अ़च्छी छवि है। पर यह तभी संभव है जब राजनाथ खुद इस भूमिका के लिए तैयार हों।

केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी का भी नाम चर्चा में है,लेकिन उनका यूपी से बस इतना ही नाता है कि वह 2014 में अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ी थीं और इसके बाद स वह अमेठी में लगातार सक्रिय हैं। स्मृति पर पीएम मोदी को काफी भरोसा है। लोकसभा व राज्यसभा में कई मुद्द्ों पर उन्होंने विपक्ष पर ंजिस तरह तर्कों के साथ हमला बोला और इसके अलावा अमेठी में लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद उन्होनें जिस प्रकार से अपने निर्वाचन क्षेत्र से नाता जोड़कर रखा उससे यूपी में स्मृति ईरानी की लोकप्रियता बढ़ी हैै। लोग मान रहे हैं कि प्रदेश में मायावती जैसी नेत्री से मुकाबला करने के लिए ईरानी का प्रयोग ठीक रहेगा। इससे भाजपा महिलाओं के बीच पकड़ व पैठ बना सकेगी।

भाजपा का एक वर्ग वरूण गांधी में मुख्यमंत्री बनने की संभावना और क्षमता तलाश रहा है। एक तो गांधी परिवार की पृष्ठभूमि और दूसरे हिंदुत्व पर आक्रामक भाषा, लोगों को लगता है कि वरूण को आगे लाने से पार्टी कोे चुनाव में लाभ हो सकता है। वरूण को आगे करने से भाजपा को उस वोट का लाभ मिल सकता है जो चेहरा और माहौल देखकर वोट डालने का आदि है। पर वरूण को लेकर पार्टी के भीतर हिचकिचाहट भी है कि वह  पार्टी के साथ तालमेल बैठाकर कितना काम करेंगे। लोकसभा चुनाव के समय वरूण गांधी अन्य नेताओं से इत्तर मोदी से दूरी बनाकर चले थे,जिस पर काफी चर्चा भी हुई थी। आज भी वरूण गांधी पीएम मोदी की गुड लिस्ट में नहीं हैं।

भाजपा अगर वोंटों के ध्रवीकरण के सहारे चुनाव मैदान में उतरना चाहेगी तो मंहत आदित्यनाथ भी एक चेहरा हो सकते हैं। आदित्यनाथ की एक तो हिंदुत्ववादी छवि है। साथ ही उन्होनें पिछले कुछ वर्षो से पूर्वांचल में मल्लाह, निषाद, कोछी, कुर्मी, कुम्हार, तेली जैसी अति पिछड़ी जातियों और धानुक,पासी, वाल्मीकी जैसी तमाम अति दलित जातियों में पकड़ मजबूत की है। पर भाजपा में इस बात को लेकर असमंजस है कि उन्हें सीएम का चेहरा घोषित करने से मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण न हो जाए। यही समस्या वरूण गांधी के साथ भी है। 2009 के लोकसभा चुनाव के समय पीलीभीत में दिया गया उनका विवादित भाषण आज भी मुस्लिमों की जुबान पर रहता है।

अगर भाजपा किसी अगड़े और उसमें भी किसी ब्राहमण चेहरे को सीएम का प्रत्याशी घोषित करना चाहेगी तो डा0 दिनेश शर्मा और कलराज मिश्र का नाम सबसे आगे हो सकता है। दिनेश शर्मा दो कार्यकाल से राजंधानी के महापौर है। भाजपा के सांगठनिक ढांचे में भी कई पदों पर काम कर चुके है। इस समय पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है। आम लोगों के बीच उनकी छवि व साख ठीक-ठाक है। सरल हैं और लोगों को आसानी से उपलब्ध भी है। प्रदेश भर के कार्यकर्ताओं से भी उनका संपर्क व संवाद है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रिय लोगों में शुमार होते हैं। डॉ. दिनेश शर्मा का नाम भी बतौर भावी मुख्यमंत्री उम्मीदवार चर्चा में शमिल रहा हैं। पर, सूबे का जातीय गणित उनके लिये पूरी तरह से अनुकूल नहीं बैठ रहा है। बात कलराज मिश्र की कि जाये तो वह प्रदेश में लंबे समय तक संगठन का नेतृत्व कर चुके है। लखनऊ के विधायक रह चुके हैं। सरलता और कार्यकर्ताओं से सतत संवाद व संपर्क के कारण पार्टी कार्यकर्ताओं में लोकप्रिय भी है। उनका चेहरा आगे करके चुनाव लड़ने से भी भाजपा को फायदा हो सकता है।

लब्बोलुआब यह है कि भाजपा आलाकमान को यूपी का सीएम प्रत्यााशी घोषित करने में पहाड़ जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। उसके हाथ बंधे होंगे,लेकिन दिमाग खुला रखना होगा। प्रदेश भाजपा में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो चुनाव जीतने की कूबत भले न रखते हों लेकिन किसी को चुनाव हराने में इन्हें महारथ हासिल है। यह नजारा अतीत में कई बार देखने को मिल भी चुका है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क उनके मोबाइल नंबर 9335566111 के जरिए किया जा सकता है.

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सपा में हाई वोल्टेज ड्रामा, आजम के लिये मुश्किल होगा आगे का सफर

अजय कुमार, लखनऊ

समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता और मंत्री आजम खान की शख्सियत की व्याख्या करना हो तो यह कहा जा सकता है कि वह स्वभाव से अखड़ ,जुबान के कड़क,लेकिन ईमानदार और स्वाभिमानी नेता हैं। आजम पर अक्सर आरोप लगाते रहते हैं कि वह सियासी दुनिया में किसी की भावनाओं की कद्र नहीं करते है। दिल की जगह दिमाग से काम लेते हैं,इसी लिये उन्होंने  दोस्त से अधिक दुश्मन पाल रखे हैं। वह जिसके पीछे पड़ जाते हैं उसे किसी भी दशा में छोड़ते नहीं हैं और जिससे दोस्ती निभाते हैं उसके लिये सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। आजम खान का कोई बड़ा सियासी दुश्मन नहीं है, अगर है तो वह स्वयं अपने दुश्मन हैं।

दुश्मनों को ताउम्र याद रखना उनकी कमजोरी है। अमर सिंह इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं,जिनके लिये आजम अपने शब्दकोश से नये-नये शब्द रचते रहते हैं। आजम का कोई सियासी गुरू नहीं है।वह सपा में नेताजीं मुलायम सिंह के अलावा किसी की नहीं सुनते हैं, लेकिन जब गुस्सा जाते हैं तो मुलायम को भी खरी-खरी सुना देते हें। खासकर मुलायम का अमर प्रेम आजम को हमेशा गुस्सा दिलाता रहता है। अमर के कारण एक बार सपा से बाहर जा चुके आजम के लिये एक बार फिर अमर सिंह मुसीबत बनकर टूट पड़े हैं। विवाद की शुरूआत राज्यसभा और विधान परिषद के लिये प्रत्याशियों के चयन से हुई।

सपा प्रमुख मुलायम ने अमर सिंह को सपा के टिकट से राज्यसभा में भेजने के लिये दिल से निकालकर सपा में क्या जगह दी, आजम का पारा सांतवें आसमान पर चढ़ गया। वह यह मानने को कतई तैयार नहीं हैं कि अमर सिंह समाजवादी पार्टी की जरूरत हो सकते है,जबकि सपा के कई दिग्गज नेताओं को लगता है कि अमर के सपा से दूर चले जाने की वजह से पार्टी को विरोधियों के साथ सियासी मैनेजमेंट में काफी दिक्कतें आ रही थीं। कई मौकों पर इसकी बानगी देखने को मिल भी चुकी है।चुनावी वर्ष में मुलायम ने अमर सिंह को राज्यसभा में भेजने का निर्णय लेकर एक साथ कई तीर निशाने पर छोड़ दिये हैं।

बहरहाल, 2017 के विधान सभा चुनाव को देखते हुए नेताजी की सक्रियता को काफी अहम माना जा रहा है। वह अपने सियासी दांवपेंच से एक बार फिर यूपी में समाजवादी सरकार बनाने के लिये सभी नुस्खे अजमा रहे हैं। बिना यह सोचे समझे कि उनके ‘कदमों’ से कौन नाराज होगा और कौन खुश। ठीक वैसे ही जैसे 2012 के चुनाव प्रचार के मध्य अखिलेश को उन्होंने प्रमोट करके सपा को सियासी फायदा पहुंचाया था। उस समय भी आजम खान,प्रोफेसर राम गोपाल यादव और शिवपाल सिंह यादव जैसे नेताओं ने नेताजी के इस फैसले पर उंगली उठाई थी आज भी जब उन्होंने अमर सिंह को राज्यसभा में भेजने का निर्णय लिया तो यही उपक्रम दोहराया जा रहा है। नाराजगी का आलम यह था कि जिस बैठक में अमर सिंह को राज्यसभा में भेजने का निर्णय लिया गया, उस बैठक से बीच में ही उठकर आजम खान और प्रो0रामगोपाल यादव चले गये थे। शाम होते-होते आजम खान रामपुर के लिये रवाना हो गये तो रामगोपाल दिल्ली के लिये उड़ गये। हाल ही में सपा में वापसी करने वाले पूर्व केन्द्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा को भी अमर का राज्यसभा भेजा जाना अच्छा नहीं लगा परंतु उनके पास विरोध की कोई वजह नहीं थी। बेनी को भी राज्यसभा भेजा जा रहा है।

राज्यसभा के लिये जिन सपा नेताओं के नाम पर अंतिम मोहर लगी है, उसमें से सब के सब मुलायम के वफादारों में शामिल रह चुके हैं या फिर हैं। न तो अखिलेश यादव अपनी पंसद के किसी नेता को राज्यसभा में भेज पाये न आजम खान की पूर्व राज्यपाल अजीज कुरैशी को राज्यसभा में भेजने की इच्छा पर नेताजी ने सहमति जताई। सबसे अधिक चर्चा अमर सिंह को राज्यसभा में भेजे जाने की हो रही है। कोई इसे अमर कथा का पार्ट टू बता रहा है तो कोई इसे आजम के सपा से बाहर जाने की उलटी गिनती मान रहा है। अमर सिंह का सपा से सियासी वनवास खत्म होने को है और अपने बड़े भाई मुलायम के दिल में बसे अमर की वापसी अब तय हो गई है। आने वाले विधानसभा चुनाव और उसके बाद अमर सिंह अहम भूमिका में होंगे। बेबाकी के लिए मशहूर अमर की अहमियत मुलायम ने तब बढ़ाई जब उन्होंने अमर सिंह की तारीफ करते हुए कहा कि, अमर एक अकेले शख्स हैं जो उनके मन की बात समझ जाते हैं। दो साल पहले जब मुलायम ने अमर सिंह को जनेश्वर मिश्र पार्क के शिलान्यास समारोह में बुलाकर अपने पास बिठाया तो सपा में हलचल मच गई थी। इसके बाद तो नजदीकी बढ़ने का सिलसिला ही शुरू हो गया। मुलायम ने जब सैफई में अपना जन्मदिन मनाया तो मंच पर परिवार के बाहर से केवल अमर सिंह ही थे जिन्होंने केक खिलाया। केवल मुलायम ही नहीं शिवपाल से भी उनकी करीबी रिश्ते बने रहे। हाल में उन्होंने शिवपाल के बेटे की शादी के मौके पर दिल्ली में शानदार पार्टी दी। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भतीजा मानने वाले अमर सिंह जब अपने घर लखनऊ आते तो अक्सर सीएम व शिवपाल से जरूर मिलते थे।

बात राज्यसभा भेजने के लिये चयनित किये गये नेताओं की करें तो समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव ने राज्यसभा व विधान परिषद के लिए नाम तय करने में जातीय समीकरणों का तो पूरा खयाल रखा ही, इसके अलावा उन्होंने राज्यसभा के लिये उन्हीं नेताओं को योग्य माना जो सपा का आर्थिक तंत्र मजबूत करने की ताकत रखते हों और जिनमें जरूरत पड़ने पर विरोधियों को साधने में महारथ भी हो। पार्टी की कोशिश विधानसभा चुनावों के लिए अलग-अलग जातीय वर्गों को संदेश देने की भी है। पार्टी ने दोनों उच्च सदनों के लिए 15 प्रत्याशियों में चार ठाकुरों अमर सिंह, रेवतीरमण सिंह, अरविंद सिंह व यशवंत सिंह को शामिल किया है। इसमें यशवंत सिंह विधान परिषद के लिए हैं। पिछड़ों व अति-पिछड़ों को भी तवज्जो दी गई है। बेनी प्रसाद वर्मा का चयन उनके कुर्मी बिरादरी में अच्छी पकड़ को देखते हुए किया गया है।

बलराम यादव, जगजीवन प्रसाद, विशम्भर प्रसाद निषाद व राम सुंदर दास निषाद के जरिए पिछड़ों को साधने की कोशिश की गई है। संजय सेठ की बिरादरी का कोई खास वोट बैंक नहीं है। उनके चयन में निजी रिश्ते अहम रहे। संजय सेठ के बारे में चर्चा होती रहती है कि वह पार्टी की आर्थिक मदद करते रहते हैं। संजय सेठ की मुलायम के छोटे बेटे प्रतीक से भी अच्छी दोस्ती है। शतरुद्र प्रकाश समाजवादी आंदोलन से जुड़े रहे हैं। अल्पसंख्यक खासतौर पर शिया वर्ग से बुक्कल नवाब का चयन किया गया है। ब्राह्मण वर्ग से केवल कमलेश पाठक चुने गए हैं। जो स्थिति बन रही है, उसको देखकर तो यही लगता है कि आने वाले कुछ दिन सपा के लिये अहम हो सकते हैं। कहा यह जा रहा है कि आजम खान जिस तरह से प्रधानमंत्री और राज्यपाल के खिलाफ बेतुकी बयानबाजी कर रहे थे उससे सपा के प्रति उन लोगों का गुस्सा बढ़ रहा था जो केन्द्र में मोदी और यूपी में सपा सरकार के पक्षधर हैं। जो हालात बन रहे हैं उसके आधार पर कहा जा सकता है कि आजम के लिये सपा में आगे का सफर महंगा हो सकता है।

लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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सियासत के मामले में मोदी की स्टाइल को कॉपी कर रहे हैं नीतीश कुमार!

अजय कुमार, लखनऊ

2014 के लोकसभा चुनाव के समय गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिये जो रास्ता चुना था, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिये उसी राह पर थोड़े से फेरबदल के बाद आगे बढ़ते दिख रहे हैं। मोदी ने जहां गुजरात मॉडल को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया था, वहीं नीतीश कुमार संघ मुक्त भारत, शराब मुक्त समाज की बात कर रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय पूरे देश में मोदी और उनके गुजरात मॉडल की चर्चा छिड़ी थी, जिसका मोदी को खूब फायदा मिला था।

2019 में नीतीश कुमार मोदी की तर्ज पर ही बिहार में शराबबंदी से हो रही उनकी सरकार की वाहवाही को देशव्यापी मुद्दा बनाना चाहते हैं। 2014 में मोदी गुजरात के सोमनाथ मंदिर का काशी विश्वनाथ मंदिर और गंगा से रिश्ता जोड़ कर वाराणसी से चुनाव लड़े थे, वहीं 2019 के लिये नीतीश भी गंगा मईया, बाबा विश्वनाथ के सहारे वाराणसी को नाप रहे हैं। मोदी ने वाराणसी पहुंच कर कहा था कि मुझे मां गंगा ने बुलाया है। नीतीश भी अपनी यात्रा के दूसरे दिन मां गंगा का आशीर्वाद लेने पहुंचे, परंतु मोदी से अलग दिखने की चाह में उन्होंने इसके उलट कहा, ‘मां गंगा ने मुझे बुलाया नहीं है, खुद आशीर्वाद लेने आया हॅं।” मोदी ने जब स्वच्छ भारत अभियान चलाया तो वह जनता को बताने से नहीं भूले की महात्मा गांधी से प्रेरित होकर वह स्वच्छता अभियान को आगे बढ़ा रहे है। नीतीश ने जब बिहार में शराब बंदी कानून बनाया तो वह भी लोगों को बताने से नहीं भूले की गांधी जी शराब को देश और समाज के पतन का कारण मानते थे। मोदी वाराणसी से पूरे प्रदेश को संदेश देना चाहते थे। नीतीश भी ऐसा ही कर रहे हैं। मोदी जब वाराणसी से चुनाव लड़ने आये थे तो उन्हें यहां बसे गुजरात वोटरों पर काफी भरोसा था। वहीं नीतीश कुमार को अपनी बिरादरी के कुर्मी वोट लुभा रहे हैं। लब्बोलुआब यह है कि जनता दल युनाइटेड के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी सियासत को मोदी की शैली में आगे बढ़ा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश पहुंच कर नीतीश के तेवर काफी बदले-बदले नजर आये। यहां तक की भीड़ और उसके हौसले को देखकर मंच से यह घोषणा तक कर दी गई कि महागठबंधन यूपी में अपने दम पर चुनाव लड़ेगा, लेकिन ऐसा स्वभाविक नहीं है। पूर्वाचल के एक मात्र सम्मेलन में जुटी भीड़ को देखकर सियासत की जमीनी हकीकत नहीं पहचानी जा सकती है। नीतीश को अच्छी तरह से पता है कि पूर्वांचल में उनकी बिरादरी के कुर्मियों का अच्छा खासा वोट बैंक है। यह लोग संगठित तरीके से वोटिंग करते हैं, लेकिन पूरे प्रदेश में यह स्थिति नहीं है। पूर्वांचल में कुर्मी वोट बैंक की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इन्हीं वोटरों के चक्कर में अपना दल के सोने लाल पटेल (अब स्वर्गीय) ने पूर्वांवल में अपनी सियासी पारी खेली थी, जबकि वह मूल रूप से पूर्वांचल के बाहर के नेता थे। उनका जन्म कन्नौज में तो शिक्षा-दीक्षा कानपुर में हुई थी।

सोने लाल ने अपना राजनैतिक कैरियर पूर्वांचल से आगे बढ़ाया था। सोने लाल पटेल की मौत के बाद उनकी बेटी सुप्रिया पटेल भी पूर्वांचल से ही अपनी ताकत में इजाफा करने में जुटी हैं। कुर्मी वोटर सभी दलों के लिये काफी अहम हैं। कभी यह वोट बैंक जनसंघ का हुआ करता था। आज की तारीख में यह बिखरा हुआ है। इस समय प्रदेश में कुर्मियों का कोई ऐसा नेता भी नहीं है जिसके पीछे सभी कुर्मी एकजुट हो सकें। सपा कुर्मी वोट बैंक को बचाये रखने के लिये काफी बेचैन है। वह इन्हें खोना नहीं चाहती है। इसी लिये मुलायम अपने नाराज मित्र और सपा छोड़कर कांग्रेस में गये बेनी प्रसाद वर्मा को मना करके एक बार फिर अपने पाले में ले आये है।

नीतीश ने काफी सोच-विचार के बाद वाराणसी में अपनी पहली सभा रखी थी, ताकि जनता को उनकी ताकत का अहसास हो सके। एक तो वाराणसी में कुर्मियों की बड़ी आबादी और दूसरा बिहार से सटा जिला होने के कारण वाराणसी हमेशा बिहार के करीब रहता है। कुर्मियों के अलावा बिहारियों की भी यहां अच्छी खासी जनसख्ंया है। नीतीश ने मोदी की तरह ही सभा में हिस्सा लेने आये लोंगो से शराब बंदी के मसले पर हाथ उठाकर सहमति देने को कहा। अपने भाषण के दौरान नीतीश ने कहा कि क्या यूपी के लोग नहीं चाहते कि यहां भी शराब बंदी हो। इसके लिए उन्होंने हाथ उठवाकर हामी भरवाई। बोले, मैं किसी बात को थोपना नहीं चाहता। शराबबंदी के फायदे भी गिनवाए, कहा जो नहीं पीते वे खुश हैं, महिलाएं खुश हैं। अब एक माह की बंदी के बाद जो पीने के आदती थे, वे भी खुश रहने लगे हैं कि चलो बंद हो गई।

अपने आप को डा0 राम मनोहर लोहिया का अनुयायी बताने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जब शराब बंदी के लिये लोंगों से हाथ उठाकर सहमति मांगी तो अनायास ही अखिलेश सरकार और डा0 लोहिया के ही एक और अनुयायी सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की याद ताजा हो गईं। एक तरफ नीतीश यूपी में भी शराब बंदी की बात कर रहे हैं तो दूसरी तरफ मुलायम की पार्टी 2012 के विधान सभा चुनाव इस शर्त पर जीतकर आई थी कि अगर उसकी सरकार बनेगी तो शाम की दवा (शराब) सस्ती कर दी जायेगी। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यह कर भी दिखाया। चौथे साल में उन्होंने शराब के दामों में भारी कटौती करके पियक्कड़ो का दिल जीत लिया था।डा0लोहिया के चेलों मुलायम-नीतीश में एक विरोधाभास और है। डा0 लोहिया की सियासत जहां कांग्रेस के विरोध पर टिकी थी, वहीं नीतीश कुमार पिंछले दो वर्षो से कांग्रेस की जगह संघ मुक्त भारत की बात कर रहे हैं।

यूपी की सियासत को गरमाने आये नीतीश अपने पहले सफल दौरे से काफी खुश दिखे। वाराणसी के पिंडरा में आयोजित जनता दल युनाइटेड के कार्यकर्ता सम्मेलन में भीड़ तो खूब थी, लेकिन इसमें बिहार की भी गाड़ियों की अच्छी खासी तादात थीं। गाजियाबाद से लेकर गाजीपुर तक के वाहनों से कार्यकर्ताओं की जुटान भी। शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर हुए सम्मेलन में शहर के भी कई चेहरे थे। भीड़ का जो आलम था, वह अपने आप में बहुत कुछ कह रहा था। आमतौर पर जदयू का कोई खास अस्तित्व न तो बनारस में अब से पहले दिख रहा था, न ही आसपास के जिलों या सूबे के अन्य क्षेत्र में,लेकिन सच्चाई यह भी है कि पड़ोसी राज्य बिहार में अपना वर्चस्व रखने वाली इस पार्टी के लोगों का पूर्वाचल, खासकर बनारस से काफी जुड़ाव है। बिहार के नंबर की गाड़ियां यहां हमेशा देखने को मिल जाती हैं। नीतीश का भाषण काफी सधा हुआ था। नीतीश ने जब मोदी के खोखले वादों की बात की तब भी तालियां बटोरी और संघ का नाम लिया तब भी समर्थन मिला। 45 मिनट के भाषण में जब-जब शराबबंदी की बात आई, आधी आबादी ने दिल खोलकर तालियां बजाई। इसके साथ ही यह भी तय हो गया कि यूपी में नीतीश अपनी ताकत बढ़ाने के लिये बिहार में शराब बंदी को मजबूत हथियार बनायेंगे,लेकिन इस मुद्दे पर उन्हें मोदी सरकार को घेरना आसान नहीं होगा। गुजरात में पिछले 55 वर्षो से शराब बंदी चल रही है।  

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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यूपी में पीके ने सीएम पद के लिए राहुल, प्रियंका और शीला दीक्षित का नाम सुझाया

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश कांग्रेस में हमेशा से काबिल नेताओं की लम्बी-चौड़ी फौज रही है। कई नेताओं के नाम गिनाये जा सकते हैं जिन्होंने अपने दम से प्रदेश ही नहीं पूरे देश में अपना नाम रोशन किया। फिर भी यूपी में कांग्रेस मरणासन स्थिति में हो तो आश्चर्य होता है। 27 वर्षो से वह सत्ता से बाहर है। इन 27 वर्षो में सत्ता में वापसी के लिये कांग्रेस लगातार प्रयासरत् रही है। जब भी चुनावी बिगुल बजता है कांग्रेसी ‘सपनों की उड़ान’ भरने लगते हैं, लेकिन अंत में निराशा ही हाथ लगती है।

यूपी में असफलता का लम्बा दौर कांग्रेस का पीछा ही नहीं छोड़ रहा है, जो कांग्रेस कभी यूपी में सबसे अधिक ताकतवर हुआ करती थी आज मात्र 28 सीटों पर सिमट गई है। पिछले 27 वर्षो में न तो पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता राजीव गांधी कुछ कर पाये न ही सोनिया और राहुल गांधी का यहां सिक्का चला। प्रियंका वाड्रा गांधी ने सीधे तौर पर तो यूपी की राजनीति में दखल नहीं दिया, लेकिन मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्रों में वह जरूर जनता से संवाद स्थापित करके मां-भाई के लिये वोट मांगती नजर आती रहती थीं।

यूपी में नेताओं की दमदार फौज होने के बाद भी कांग्रेस अगर हासिये पर है तो इसकी वजह भी यही नेता हैं, जो अपने आप को पार्टी से बड़ा समझते हैं। यह नेता मौके-बेमौके अपने आचरण से संगठन की फजीहत कराते हैं। पार्टी की लाइन से हट कर बयानबाजी करते हैं। कद बड़ा होने के कारण इन नेताओं के खिलाफ आलाकमान भी कार्रवाई करने से कतराता रहता है। कांग्रेस जिस समय सत्ता से बाहर हुई उस समय बलराम सिंह यादव प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे। उनके हटने के बाद महाबीर प्रसाद को दो बार प्रदेश की कमान सौंपी गई। इसी प्रकार नारायण दत्त तिवारी को भी दो बार प्रदेश अध्यक्ष बनने का सौभाग्य मिला। सलमान खुर्शीद भी सात वर्षो तक प्रदेश अध्यक्ष रहे। इसी कड़ी मंे श्री प्रकाश जायसवाल,जगदम्बिका पाल(अब भाजपा में), डा; रीता बहुगुणा जोशी और अब निर्मल खत्री का नाम लिया जा सकता है।

महावीर प्रसाद प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने के बाद हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के राज्यपाल बने। उन्हें केन्द्रीय मंत्री बनने का भी मोका मिला। नारायण दत्त तिवारी यूपी के सीएम बने और बाद में उत्तराखंड के भी मुख्यमंत्री रहे। मुसलमानों को लुभाने के लिये सलमान खुर्शीद को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में भी जगह दी गई। इसी प्रकार श्री प्रकाश जायसवाल भले ही प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर सफल नही रहे हों, लेकिन उन्हें भी यूपीए सरकार में मंत्री बनने का मौका मिला। मौजूदा नेताओं में सलमान खुर्शीद, बेनी प्रसाद वर्मा, डा0 रीता बहुगुणा जोशी, निर्मल खत्री जैसे तमाम नेताओं का नाम लिया जा सकता है, जो अपने आप को पार्टी से बड़ा समझते हैं। इन नेताओं के अहंकार का खामियाजा पार्टी भुगत रही है। कांग्रेस में गुटबाजी और सिरफुटव्वल का यह हाल है कि यहां कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी, उपाध्यक्ष राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा गांधी तक के समाने कांग्रेसी आपस में भिड़ जाते हैं।

अपने कर्मो से मरणासन कांग्रेस को नया जीवनदान देने के लिये कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सेवा क्या ली, प्रशांत को लेकर कांग्रेसी आपस में ही झगड़ने लगे हैं, जबकि इससे बेफिक्र प्रशांत किशोऱ उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के साथ-साथ प्रियंका गांधी, शीला दीक्षित पर दांव लगाने का मन बना रहे हैं। पहले मोदी, फिर नीतीश और अब राहुल गांधी के लिए सियासी प्लान बना रहे प्रशांत किशोर यानी पीके का प्लान कुछ इस तरह का है, जिसके तहत यूपी में मायावती और अखिलेश के सामने कांग्रेस की तरफ से एक बड़ा और भरोसेमंद चेहरा होना जरूरी है। पीके को लगता है कि अगर राहुल गांधी खुद मुख्यमंत्री का चेहरा बन जाये तो इसका फायदा उसे न केवल यूपी के विधान सभा चुनाव में होगा, बल्कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस की स्थिति मजबूत होगी।

पीके की रणनीति अगड़ी जाति, मुस्लिम और पासी का समीकरण बनाने की है। बीजेपी पहले ही ओबीसी पर दांव लगा चुकी है. इसीलिए वो लगातार बड़े ब्राह्मण चेहरे पर जोर दे रहे हैं। रणनीति के तहत अगर ब्राह्मणों की कांग्रेस में घर घर वापसी होती है, आधा राजपूत मुड़ता है तो मुस्लिम भी कांग्रेस के पाले में आ सकते हैं। दरअसल, पीके यूपी चुनाव में कांग्रेस को आर-पार की लड़ाई लड़ने की सलाह दे रहे हैं और पूरी ताकत झोंकने को कह रहे हैं. इसके लिए वो बिहार की तर्ज पर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की बीजेपी की सियासत से भी निपटने को तैयार हैं। पीके के करीबी मानते हैं कि बड़ा चुनाव जीतकर ही राहुल और कांग्रेस दोबारा खोयी ताकत वापस पा सकते हैं।

पीके की सलाह पर गांधी परिवार इसी महीने फैसला सुना सकता है। अगर सीए की कुर्सी के लिये राहुल- प्रियंका पर सहमति नहीं हुई तो पीके ने शीला दीक्षित का भी नाम सुझाया है। दरअसल, पीके की सलाह है कि कांग्रेस के वो ब्राह्मण चेहरे जो पिछले 27 सालों से यूपी की सियासत में हैं, उनसे काम नहीं चलेगा।इसी लिये वह पुराने चेहरों को किनारे करके कुछ नये और दमदार चेहरे तलाश रहे हैं। पुराने चेहरों को किनारे करने के चक्कर में ही पीके कांग्रेसियों के निशाने पर चढ़े हुए हैं। वह न तो पीके को कोई तवज्जो दे रहे हैं, न ही उनकी रणनीति पर अमल कर रहे हैं। पूरे प्रदेश की बात छोड़ दी जाये राहुल और सोनिया के सियासी गढ़ अमेठी और रायबरेली में भी पीके की नहीं सुनी जा रही है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क ajaimayanews@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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यूपी में जंगलराज : भ्रष्ट नौकरशाहों पर ‘सरकारी मेहरबानी’

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश के तमाम नौकरशाह भ्रष्टाचार मे लिप्त हैं, लेकिन लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुईं सरकारें इन भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाये उन्हें संरक्षण देती हैं। यह सिलसिला लम्बे समय से चलता आ रहा है और कहीं कोई सुबुगाहट नहीं सुनाई दी। जनता,  नेताओं-नौकरशाहों के गठजोड़ से भले ही .त्रस्त हो,  लेकिन सरकारों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। कई दशकों के बाद हाल ही में हाईकोर्ट ने इस गठजोड़ पर सवाल खड़ा करके जनता की उम्मीदों को पंख लगा दिये हैं। मामला सीबीआई की कोर्ट में होने के बाद भी भ्रष्टाचार के आरोपी आईएएस अधिकारी राजीव कुमार के प्रति अखिलेश सरकार जिस तरह ‘प्रेम’ का इजहार कर रही थी,  वह हाईकोर्ट को कतई रास नहीं आया। नाराज कोर्ट ने सरकार से ही इस मेहरबानी कारण पूछ लिया।

बहरहाल, आईएएस राजीव कुमार के जेल जाने के साथ ही यह भी तय हो गया है कि नोयडा प्लाट आवंटन घोटाले की आंच ठंडी नहीं पड़ने वाली है।  आईएएस नीरा यादव के बाद वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राजीव कुमार भी जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गये हैं।  हाल ही में लंबी जद्दोजहेद के बाद आईएएस राजीव कुमार ने सरेंडर किया था।  सीबीआई कोर्ट ने वर्ष 2012 में राजीव कुमार और नोयडा प्राधिकरण की तत्कालीन चेयरमैन नीरा यादव को तीन वर्षो की सजा सुनाई थी।  सजा के खिलाफ नीरा यादव और राजीव कुमार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन वहां से दोनों को कोई राहत नहीं मिली थी। 

आईएएस राजीव कुमार के जेल जाने से नौकरशाहों की लॉबी सहम कई है। गौरतलब हो,  प्रदेश में तमाम आईएएस अधिकारियों के खिलाफ तरह-तरह की जांचे तो चल रही है लैकिन अभी तक किसी का बाल भी बांका नहीं हो पाया है। नेताओं और नोकरशाहों के गठजोड़ के चलते प्रदेश में भ्रष्टाचार हमेशा चरम पर रहा लेकिन  आईएएस राजीव कुमार यूयी काडर के दूसरे ही ऐसे आईएएस अधिकारी थे जिन्हें सरकारी सेवा में रहते हुए जेल जाना पड़ा हैं।  इससे पूर्व आईएएस अधिकारी प्रदीप शुक्ला भी जेल जा चुके हैं।  प्रदीप को एनआरएचएम घोटाले के आरोप में सीबीआई जांच के बाद जेल जाना पड़ा था, लेकिन अभी प्रदीप शुक्ला के खिलाफ अपराध साबित नहीं हुआ है। भले ही भ्रष्टाचार के कारण एक-दो नौकरशाह जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गये हो, लेकिन इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इन भ्रष्ट नौकरशाहों को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाने में राज्य की सरकारों की अनदेखी के बाद भी अदालतों ने अहम भूमिका निभाई है।  वर्ना चाहे सपा की सरकार हो या फिर बसपा राज दोनों में ही दागी नौकरशाहों को अच्छी से अच्छी पोस्टिंग देकर नवाजा जाता रहा है।  2012 में सपा सरकार आई तो थी इस दावे के साथ कि पुराने सरकार के घोटालों की जांच करा जिम्मेदारों को जेल भेजेंगे पर हुआ इसके उलट।  जिस अफसर पर जितने दाग लगे अखिलेश सरकार ने उससे उतना ही प्यार  दिखाया। ऐसे अधिकारियों की लम्बी-चौड़ी लिस्ट है जो हटे भी वह कोर्ट की वजह से।  जेल जाने वाले राजीव कुमार सजायाफ्ता होने के बाद भी प्रमुख सचिव नियुक्ति के रूप में प्रदेश भर के अधिकारियों की नियुक्ति और जिम्मेदारी तय करते रहे। 

बताते चलें आईएएस राजीव कुमार को 20 नवंबर 2012 को ही नोएडा प्लाट आवंटन घोटाले में सीबीआई कोर्ट ने 3 साल की सजा सुनाई थी।  हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई तक सजा पर रोक लगा रखी थी। इस कारण राजीव कुमार को बेल मिल गई थी, जिसकी मियाद पूरी हो रही थी और कहीं से कोई राहत नहीं मिलने के कारण राजीव को जेल जाना पड़ गया। एक तरफ कोर्ट आईएएस राजीव कुमार के भ्रष्टाचार के खिलाफ सजा सुना चुका था तो दूसरी तरफ इससे बेपरवाह अखिलेश सरकार  ने भ्रष्टाचार के दोषी होने के बावजूद भी उन्हें दो महीने पहले तक प्रमुख सचिव नियुक्ति जैसे अहम पद पर बनाए रखा। जब सरकार से हाई कोर्ट ने पूछा कि सजायाफ्ता को इतना अहम पद देने की क्या वजह है और नियुक्ति की पॉलिसी मांग ली तब जाकर राजीव कुमार को विभाग से हटाया गया। इसी तरह नोएडा मे गड़बड़ी के आरोपी आईएएस संजीव सरन और राकेश बहादुर नोएडा अथारिटी में जमे रहे थे।  इससे पहले माया सरकार ने उन्हें सस्पेंड किया था।

यह दोनों अधिकारी नोएडा से तब हट सके जब हाई कोर्ट को यह कहना पड़ा कि इन दोनों को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तैनाती न दी जाए।  हालांकि सरकार उन्हें अहम पदों से नवाजती रही।  नोयडा अथार्रिटी के भ्रष्ट मुख्य अभियंता यादव सिंह की पैरवी तो अखिलेश सरकार सुप्रीम कोर्ट तक कर चुकी है।  मनरेगा घोटालों में सवालों के घेरे में आए आईएएस पंधारी यादव आवास विभाग में अहम पद पर बने हैं। वहीं जेल से छूटने के बाद एनआरएचम घोटाले के आरोपित प्रदीप शुक्ला को भी प्रमुख सचिव,  लघु उद्यम के पद पर तैनाती दी गई थी।  इस समय वह सामान्य प्रशासन में हैं। इससे पहले मुलायम सिंह यादव ने भी अपने कार्यकाल में घोटालों का आरोपित होने के बाद भी नीरा यादव को मुख्य सचिव बना दिया था जो अब जेल में हैं। आईएएस नीरा यादव पर बेटियों और खुद के नाम पर गलत तरीके से प्लाट आवंटन करने का आरोप है।  सीबीआई जांच हुई तो 2012 में उन्हें तीन साल की सजा सुनाई गई। बाद में वह जमानत पर बाहर आ गईं। कहीं से मोहलत नहीं मिलने पर 15 मार्च 2016 को वह जेल चली गई थीं।

बात अन्य दागी नौकरशाहों की कि जाये तो आईएएस राकेश बहादुर पर भी वर्ष 2006 में किसानों की जमीन औने पौने दामों पर बिल्डरों को देने का आरोप लगा था।  इनके खिलाफ भी जांच एजेंसी ने पड़ताल की थी। राकेश प्रमुख सचिव गृह,  प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री समेत कई प्रभावशाली पोस्ट पर रहे।  अब केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं।  आईएएस असोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं। मौजूदा प्रमुख सचिव वन  आईएएस अधिकारी संजीव सरन भी नोएडा तैनाती के दौरान विवादों में रहे।  उन पर 2006 में किसानों की जमीन औने पौने दामों पर बिल्डरों को बेचने के आरोप लगे।  कोर्ट के निर्देश पर नोएडा से हटाया गया था। नोएडा के सीईओ रहे आईएएस मोहिंदर सिंह नोएडा के मायाजाल में फंसे।  उन पर नियम विरुद्ध फॉर्म हाउस आवंटन के आरोप लगे।  फार्म हाउस आवंटन में बिल्डरों व प्रभावशाली लोगों को फायदा पहुंचाया गया। दागी नौकरशाहों पर सरकारी मेहरबानी से नाराज हाईकोर्ट ने पिछले दिनों सख्त कदम उठाते हुए अखिलेश सरकार से ही पूछ लिया कि वह बतायें कि सजायाफ्ता आईएएस के खिलाफ उन्होंने क्या कार्रवाई की।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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यूपी के वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार के मुताबिक नए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को गुनाहगारों की लिस्ट में नहीं खड़ा किया जा सकता

अजय कुमार, लखनऊ

भारतीय नववर्ष के पहले ही दिन उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी को अपना नया हाकिम मिल गया। यूपी में अगले साल होने वालो विधान सभा चुनाव में कमल खिलाने की जिम्मेदारी भाजपा आलाकमान ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की सहमति के बाद कट्टर हिन्दूवादी छवि वाले नेता और सांसद केशव प्रसाद मौर्य पर डालकर बड़ा दांव चल दिया है। अति पिछड़ा वगै से आने वाले केशव के उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनते ही यूपी की सियासी पारा एकदम से बढ़ना स्वभाविक था और ऐसा ही हुआ। कांग्रेस, सपा और बसपा एक तरफ केशव की कुंडली खंगाल रहे हैं तो दूसरी ओर उनकी ताजपोशी से होने वाले नफा-नुकसान का भी आकलन भी इन दलों द्वारा किया जा रहा है।

केशव को सूबे की कमान सौंपे जाते ही यह साफ हो गया है कि दिल्ली-बिहार में सियासी प्रयोग का खामियाजा भुगत चूकी भाजपा यूपी में ऐसी गलती नहीं करना चाहती है। वह यूपी की सत्ता हासिल करने के लिये उन्हीं तौर-तरीकों को अजमायेगी जिस पर कांग्रेस से लेकर सपा, बसपा और अन्य छोर्ट-छोटे दल दशकों से चले आ रहे हैं। भाजपा आलाकमान ने संकेत दे दिया है कि वह 55 प्रतिशत पिछड़ों-अति पिछड़ों को लुभाने के लिये सपा-बसपा और कांग्रेस को कांटे की टक्कर देगी। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की संसदीय सीट पर पहली बार कमल खिलाने वाले केशव प्रसाद मौर्य का यूपी भाजपा अध्यक्ष बनना काफी आश्चर्यजनक रहा। वह यूपी का प्रदेश अध्यक्ष बनने के इच्छुक नेताओं की दौड़ में सबसे पीछे चल रहे थे, लेकिन अचानक ऐसे समीकरण बदले की र्मार्य सबसे आगे हो गये।

केशव के चयन का हिसाब-किताब लगाया जाये तो  आलाकमान को उनकी संघ से उनकी करीबी,पिछड़ा चेहरा, कट्टर हिन्दुत्व और भगवा छवि काफी रास आया। केशव ऐसे नेता हैं जो भले ही राम मंदिर की बात नहीं करेंगे,लेकिन लम्बे समय तक राम आंदोलन से रहा उनका जुड़ाव लोंगो को याद आता रहेगा। इसी तरह भले ही नये भाजपा अध्यक्ष अपनी कट्टर हिन्दुत्व और भगवा छवि का प्रचार करने से बचेंगे, मगर सियासी पिच पर वह कई बार हिन्दू समाज के हितों की रक्षा करने के लिये कर्णधार की भूमिका में नजर आ चुके हैं, जिसे कोई भूलेगा नहीं। पिछड़ा चेहरा तो हैं ही। केशव भाजपा के उस वोट बैंक को वापस ला सकते हैं जो पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के कमजोर पड़ने के कारण पार्टी से दूर चला गया था। ओम प्रकाश सिंह की निष्क्रियता के कारण उनकी पकड़ वाला वोट बैंक भी जो भाजपा से दूर चला गया था, केशव प्रसाद के अध्यक्ष बनने  से वापस आ सकता है।

नवनिुयक्त अध्यक्ष को सियासी रीति-रिवाजों के अनुसार नई पीढ़ी का नेता भी माना जा सकता है।उम्र के हिसाब से केशव और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के बीच कोई खास अंतर नहीं है।छात्रों के बीच सक्रियता और छात्र राजनीति से उनका लगाव कई मौको पर उजागर हो चुका है। केशव प्रसाद भले ही प्रदेश की कमान संभालने वाले 12 वें भाजपा नेता हो,लेकिन पिछड़ा समाज से आकर प्रदेश की कमान संभालने वाले वह चौथे नेता हैं। इससे पूर्व कल्याण सिंह, ओम प्रकाश सिंह और विनय कटियार प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रह चुके हैं। केशव के खिलाफ विरोधी यह प्रचार कर सकते हैं कि उनके ऊपर कई आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं, मगर ऐसा करते समय विपक्ष को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि कहीं यह दांव उलटा न पड़ जाये। केशव पर ज्यादातर मुकदमें ऐसे दर्ज है जिनका संबंध उनके (भाजपा) वोट बैंक की मजबूती से जुड़ा है। एक वर्ग विशेष को खुश करने वाली सपा, बसपा सरकारों और कांग्रेस की कथित धर्मरिपेक्षता के खिलाफ उन्होंने कई बार सड़क पर आकर संघर्ष किया है। इस वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा और मुकदमें भी दर्ज हुए, लेकिन आज तक किसी मुकदमें में फैसला नहीं आ पाया है। इसलिये उन्हें गुनाहगारों की लिस्ट में नहीं खड़ा किया जा सकता है।

लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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यूपी में जंगलराज : तंजील की हत्या बिगड़ी कानून व्यवस्था एक और नमूना

…2007 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को इसलिये हार का सामना करना पड़ा था, क्योंकि तब प्रदेश में जंगलराज जैसे हालात थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया था, यही समस्या अखिलेश सरकार के साथ है…

अजय कुमार, लखनऊ

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के डीएसपी मोहम्मद तंजील अहमद की जिस तरह से एक शादी समारोह से लौटते समय मौत के घाट उतारा गया वह शर्मनाक तो है ही इस तरह की वारदातें कई गंभीर सवाल खड़े करती है। खासकर तब तो और भी आश्चर्य होता है जब ऐसे हादसों के समय सियासतदार चुप्पी साध लेते हैं कथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियां की जुबान पर ताला लग जाता है। उम्मीद तो यही की जा रही थी शहीद डीएसपी तंजील की मौत के बाद फिजाओं में तुम कितने तंजील मारोगे, घर-धर से तंजील निकलेगा’ का नारा गूंजेगा। यह तंजील को सच्ची श्रद्धांजलि होती, लेकिन नारा लगाना तो दूर चंद लोगों के अलावा तंजील के घर जाकर उनके परिवार के आंसू तक पोछना किसी ने जरूरी नहीं समझा। तंजील की हत्या आतंकवादी साजिश थी या फिर कोई और वजह, इसका खुलासा देर-सबेर हो ही जायेगा। 

मगर वतन पर शहीद होने वालों के प्रति ऐसी बेरूखी न केवल दुखदायी है, बल्कि चिंताजनक भी है। जिस देश में अफजल गुरू और यहां तक की 26/11 के हमले में शामिल  पाकिस्तानी आतंकवादी कसाब के समर्थन में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है वहां तंजील अहमद की शहादत को सलाम करने के लिये नेताओं और लोगों को समय नहीं मिलता है। शहीद डीएसपी तंजील का तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर शाहीन बाग स्थित उनके घर पहुंचा तो वहां रोना पीटना मच गया। हजारों की संख्या में लोग जमा हो गए। ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं था कि तंजील एनआईए में कार्यरत हैं। उनको जामिया नगर स्थित कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। तंजील को दफनाने से पूर्व स्थानीय लोगों ने खूब हंगामा किया। लोगों का कहना था कि केंद्र, यूपी और दिल्ली सरकार से शहीद के घर उनके परिवार को सांत्वना देने कोई नहीं पहुंचा। 

बात तंजील के परिवार की कि जाये तो तंजील की पत्नी फरजाना बटला हाउस स्थित सरकारी स्कूल में टीचर हैं। वहीं, बेटी दसवीं में पढ़ती है, जबकि बेटा सातवीं कक्षा में पढ़ता है। तंजील के बड़े भाई रागिब अजमेरी गेट स्थित एंग्लो अरेबिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल में टीचर हैं। हत्याकांड के समय रागिब दूसरी गाड़ी में तंजील से कुछ दूरी पर थे। तंजील को दिल्ली सरकार ने एक करोड़ की आर्थिक मदद दी है तो यूपी सरकार ने बीस लाख की।

बहरहाल, तंजील पर  जिस तरह ताबड़तोड़ दो दर्जन गोलियां दागी गईं उससे यह स्पष्ट है कि हत्यारों का मकसद उनकी जान लेना ही था। तंजील अहमद राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआइए से 2009 से जुड़े थे इसलिए इस तरह की आशंकाएं उभरना स्वाभाविक हैं कि कहीं उनकी हत्या के पीछे आतंकी तत्वों का तो हाथ नहीं है? ध्यान रहे कि जिस बिजनौर जिले में उन्हें निशाना बनाया गया वहां कुछ समय पहले हुए बम विस्फोट की जांच एनआइए ही कर रही थी। इस बम विस्फोट के पीछे आतंकियों का ही हाथ था। आतंकवादी भटकल की गिरफ्तारी में तंजील का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। एनआइए का सदस्य होने के नाते तंजील पठानकोट में हुई आतंकी वारदात के अलावा अन्य कई आतंकवादी घटनाओं की जांच से भी जुड़े हुए थे। तंजील अहमद थे तो एनआईए में जरूर लेकिन मूलरूप से वह सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के अधिकारी थे। 1991 में तंजील की बीएसएफ में सब इंस्पेक्टर के रूप में भर्ती हुई थी। तेजतर्रार तंजील की कार्यक्षमता को देखकर उन्हें एनआइए में लाया गया था और वह इस एजेंसी के गठन के समय से ही उससे जुड़े हुए थे। तंजील की उर्दू भाषा पर अच्छी पकड़ थी। वह सर्विलांस में भी माहिर थे। आतंकवादियों के कोडवर्ड आसानी से टेªस कर लेते थे। आतंकवादियों के बीच होने वाली बातचीत को समझने में उन्हें महारथ हासिल थी।

तंजील की हत्या एक दुस्साहसिक घटना तो थी ही इससे अलावा इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है यह उत्तर प्रदेश में बिगड़ी कानून का एक और नमूना थी।  इस संदर्भ में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए जो कहा कि इस राज्य में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है उससे असहमत नहीं हुआ जा सकता है। राज्यपाल राम नाईक भी कई बार प्रदेश की कानून व्यवस्था पर प्रश्न चिंह लगा चुके हैं। यहां तक की कानून व्यवस्था को लेकर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की नाराजगी भी किसी से छिपी नहीं है। 2007 के विधान सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को इसी लिये हार का सामना करना पड़ा था, क्योंकि तब प्रदेश में जंगलराज जैसे हालात थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया था। यही समस्या अखिलेश सरकार के साथ है।

उत्तर प्रदेश सरकार चाहे जैसे दावे क्यों न करे, रह-रहकर ऐसी घटनाएं होती ही रहती हैं जो यही बताती हैं कि राज्य सरकार कानून एवं व्यवस्था के समक्ष उपजी चुनौतियों का सही तरह से सामना नहीं कर पा रही है। इस मामले में उसके पास अपने बचाव का यही तर्क होता है कि उत्तर प्रदेश एक बड़ा राज्य है और कानून एवं व्यवस्था संबंधी आंकड़े अन्य राज्यों से बेहतर हैं।  आंकड़ों की अपनी एक महत्ता होती है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि उत्तर प्रदेश सरकार रह-रहकर इस आरोप से दो चार होती है कि वह उन तत्वों पर लगाम नहीं लगा पा रही है जो कानून एवं व्यवस्था के लिए खतरा बने हुए हैं। उधर, उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने कहा है कि पठानकोट आतंकी हमले की जांच में शामिल एनआईए अफसर तंजील अहमद की हत्या देश के खुफिया तंत्र की कार्यप्रणाली में खामी का नतीजा है। उन्होंने इस घटना पर गहरी चिंता जताई है। प्रकाश सिंह हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई उपद्रव और हिंसा की घटनाओं की जांच करने वाली कमेटी के अध्यक्ष हैं। पूर्व डीजीपी प्रकाश कहते हें अगर हत्या किसी निजी वजह से की गई है तो जांच में इसका खुलासा हो जाएगा,  लेकिन देश के बड़े-बड़े मामलों की जांच से जुड़े अधिकारी को अगर आईएसआई के इशारे पर मारा गया है, तो इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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यूपी विधानसभा का कटघरा : राजदीप आये और विधानसभा अध्यक्ष के कमरे में ही माफी मांग कर चले गये

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश विधान सभा में गत दिनों तमाम राजनैतिक दलों ने अपने आपसी मतभेद भुलाकर मीडिया का जमकर विरोध किया। विपक्ष के नेता स्वामी प्रसाद मौर्या ने तो वर्तमान मीडिया को ‘पक्षपाती’ तक कह डाला। दरअसल, सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों से संबंधित एक इलेक्ट्रानिक चैनल आजतक पर प्रसारित किये गये ‘स्टिंग आपरेशन’ की जांच रिपोर्ट में मीडिया घराने टीवी टुडे को दोषी पाया गया। इस संबंध में विधानसभा द्वारा गठित जांच समिति ने सदन में जो रिपोर्ट रखी उसमें बड़े इलेक्ट्रानिक मीडिया आजतक को ‘कटघरे’ में खड़ा कर दिया। रिपोर्ट में जहां तो मंत्री आजम खां को क्लीन चिट दी गई वहीं मीडिया पर पक्षपात पूर्ण कार्य करने का आरोप लगा।

असल में मुजफ्फरनगर दंगों के समय इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल आजतक ने आजम खां का एक स्टिंग दिखाया था, जिसमें कुछ पुलिस वाले कहते दिख रहे थे कि ऊपर (सत्तारूढ़ दल) से आये आदेशों के चलते उन्हें एक वर्ग विशेष के कुछ अपराधियों को छोड़ना पड़ गया। उस समय विधान सभा में यह मामला उठने पर भाजपा सहित सभी विपक्षी दलो ने हंगामा किया था। आजम खां से इस्तीफे तक की मांग हुई थी। विपक्ष के हमलों से घिरता देख अध्यक्ष ने स्टिंग आपरेशन की जांच के लिये सदन की एक सर्वदलीय समिति गठित कर दी। भाजपा ने इस जांच समिति से बाद में अपने को अलग कर लिया।

जांच समिति में इसी 16 फरवरी को अपनी रिपोर्ट सदन में रखी। समिति ने पाया कि ‘स्टिंग’ फर्जी था और सरकार को बदनाम करने के लिये किया गया था। मामला मीडिया और सियासतदारों के बीच का था। इसी वजह से हमेशा आपस में लड़ने वाले नेता एकजुट हो गये। भाजपा ने जरूर इससे दूरी बनाये रखी। इसकी वजह भी थी, इस स्टिंग ऑपरेशन के सहारे भाजपा को लोकसभा चुनाव में जर्बदस्त कामयाबी मिली थी। जांच समिति ने उक्त चैनल के पत्रकारों को अवमानना का दोषी पाया। दोषी करार दिये जाने के बाद भी उक्त चनैल का कोई भी पदाधिकारी सदन में हाजिर नहीं हुआ।

वैसे यह सिलसिला पुराना है। इससे पूर्व 1954 में ब्लिट्ज के संपादक आर. के. करंजिया को भी एक समाचार से सदन की अवमानना के मामले में विधान सभा में पेश होना पड़ा था। करंजिया सदन में हाजिर हुये और अपनी बात रखी, तब सदन ने करंजिया को माफ कर दिया था। इसी प्रकार माया राज में पत्रकार राजदीप सरदेसाई को एक विधायक उदयभान करवरिया के संदर्भ में गलत समाचार प्रसारित करने के लिये नोटिस देकर सदन में बुलाया गया था। राजदीप आये और विधान सभा अध्यक्ष के कमरे में ही माफी मांग कर चले गये।

भाजपा राज में केशरीनाथ त्रिपाठी ने दूरदर्शन पर रोक लगा दी थी। दूरदर्शन पत्रकार को प्रेस दीर्घा में आने से रोक दिया गया था। वैसे गैर पत्रकारों को भी अक्सर अवमानना के मामलों में सदन में हाजिर होना पड़ता रहा है। 70 के दशक में सामाजिक कार्यकर्ता केशव सिंह को तत्कालीन विधायक नरसिंह नारायण पांडे के खिलाफ आपत्तिजनक बयान देने के मामले में सदन में हाजिर होने का आदेश दिया गया था। इसके खिलाफ केशव सिंह हाईकोर्ट से स्टे ले आये, लेकिन सदन ने इस स्टे को यह कहते हुए मानने से इंकार कर दिया था कि विधायिका पर हाईकोर्ट का कोई आदेश लागू नहीं होता है। लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद केशव को सदन में हाजिर होना पड़ा और उन्हें दंडित भी किया गया। इसी तरह से 1990 के दशक में आईएएस अधिकारी शंकर दत्त ओझा को विवादास्पद बयान के चलते सदन के कटघरे में आकर मांफी मांगनी पड़ी थी।

बहरहाल, बात मीडिया की ही कि जाये तो मीडिया समाज का दर्पण होता है। उसे दर्पण बनकर ही रहना चाहिए। आजादी की जंग के समय मींडिया देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने में इसी लिये अपना महत्वपूर्ण योगदान दे पाया था क्योंकि उस समय पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी। मिशन देश को आजादी दिलाने का था। आजादी के मिशन को पूरा करने में कई पत्रकारों को जान तक की कुर्बानी देनी पड़ी थी, लेकिन किसी ने कोई गिला-शिकवा नहीं किया। आजादी के बाद से पत्रकार भले ही बढ़ते गये हों लेकिन पत्रकारिता की धार लगातार कुंद होती गई। बड़े-बड़े पूंजीपति मीडिया में सिर्फ इसी लिये पैसा लगाते हैं जिससे की वह मोटी कमाई कर सकें और इसकी आड़ में अपने अन्य धंधों को भी आगे बढ़ाया जा सके।आज शायद ही कोई मीडिया समूह ऐसा होगा,जो पत्रकारिता के अलावा अन्य तरह के करोबार से न जुड़ा हो। सबके अपने-अपने हित हैं। पत्रकारिता के माध्यम से कोई अपना धंधा चमकाना चाहता है तो किसी को इस बात की चिंता रहती है कि कैसे सरकार या राजनैतिक दलों पर दबाव बनाकर सांसदी हासिल की जाये या बड़े-बड़े पदों पर अपने चाहने वालों को बैठाया जाये।

आज के परिदृश्य में पत्रकारिता का स्तर क्या है। यह कहाँ खड़ा है,इस बात को जब जानने की कोशिश की गई तो पता चला कि करीब-करीब सभी मीडिया घराने किसी न किसी विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। कहीं किसी नेता का कोई न्यूज चैनल चल रहा है या फिर अखबार प्रकाशित हो रहा है तो कहीं उद्योगपति मीडिया के धंधे में पौबारह कर रहे हैं। इसी लिये अक्सर समाचारों में विरोधाभास देखने को मिलता है। अगर बात इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनलों की कि जाये तो एबीपी न्यूज चैनल (यानी आनंद बाजार पत्रिका) वामपंथी विचारधारा को आगे बढ़ाने में लगा है। मोदी सरकार को घेरने का कोई भी मौका यह चैनल नहीं छोड़ता है। ‘न्यूज ‘24’ चैनल कांग्रेस के एक सांसद और पत्रकार का है। यहां भी भाजपा को घेरने का उपक्रम चलता रहता है। ‘इंडिया न्यूज’ चैनल के मालिक भी कभी कांग्रेसी नेता थे, आज वह बीजेपी में हैं। एनडीटीवी बंगाली परिवार से ताल्लुक रखने वाले राय साहब का है। राय साहब को वृंदा करात के पति की बहन ब्याही है। ‘इंडिया टीवी’ के रजत शर्मा अपने को प्रधानमंत्री मोदी का करीबी है। इसी तरह से जी टीवी वालों के भी भाजपा से अच्छे संबंध हैं। आईबीएन 7 को उद्योगपति मुकेश अंबानी ने खरीद लिया है। यही हाल कमोवेश अन्य इलेक्ट्रानिक चैनलों ओर प्रिंट मीडिया घरानों का भी है।

आज देश में जो माहौल बना हुए है,उसके बारे में निसंकोच कहा जा सकता है सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है तो इसके लिये मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है। देश की सियासत गरमाई हुई है। मुट्ठी भर नेताओं और चंद मीडिया समूहों द्वारा देश पर थोपा गया ‘तनाव’ देश की सवा सौ करोड़ शांति प्रिय जनता पर भारी पड़ रहा है। खबर के नाम पर मीडिया में वह सब दिखाया जा रहा है जिससे देश को नुकसान हो सकता है। जनता से जुड़ी तमाम समस्याएं मीडिया की सुर्खियां बनना तो दूर खबरों में जगह तक नहीं बना पाती हैं।

नेताओं के सीधे-साधे बयान को तोड-मरोड़ कर विवादित रूप में पेश करने की पीत पत्रकारिता भी पूरे शबाब पर है। ऐसा लगता है, अब समय आ गया है कि कुछ मीडिया समूहों और पत्रकारों के क्रियाकलापों की भी जांच कराई जाये ताकि पता चल सके कि यह लोग विदेशी शक्तियों के हाथ का खिलौना तो नहीं बन गये हैं। देश का दुर्भाग्य है कि वर्षों से मीडिया का एक वर्ग और खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया घटिया नेताओं को आगे करके देश का बड़ा नुकसान करने में लगा है। इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं लगाया गया तो देश के गर्दिश में जाने के दिन थमने वाले नहीं है। मीडिया का कर्तव्य देशहित है। किसी व्यक्ति विशेष, समूह या विचारधारा को आगे बढ़ाने के बजाये मीडिया को सिर्फ समाज और राष्ट् के लिये पत्रकारिता करनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9335566111 के जरिए किया जा सकता है.

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यूपी सियासत में बढ़ी मुस्लिम वोटों के सौदागरों की संख्या, मुलायम अब हिन्दू कार्ड भी खेल रहे

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक कालखंड ऐसा भी रहा था, जब परस्पर विरोधी भाजपा नेता कल्याण सिंह और समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव की सूबे की सियासत में तूती बोलती थी। भाजपा नेता और मुख्यमंत्री रह चुके कल्याण सिंह को उनके समर्थक हिन्दू हदय सम्राट की उपाधि देते नहीं थकते थे तो मुलायम सिंह की छवि मुल्ला मुलायम वाली थी।  दोनों की ही सियासत को परवान चढ़ाने में अयोध्या से जुड़े एक विवाद(राजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मसला)का अहम रोल रहा। कल्याण सिंह ने जहां भगवान राम के नाम का जाप कर-करके अपनी हिन्दुत्ववादी छवि को चमकाया, वहीं मुलायम ने बाबरी मस्जिद के सहारे मुसलमानों के बीच अपना जनाधार बढ़ाया। हाल यह था कि कल्याण सिंह के समर्थक मुलायम का नाम सुनते ही लाल- पीले हो जाते थे तो मुलायम समर्थक कल्याण सिंह का नाम आते ही मुट्ठी तान लेते थे।

टकराव दोनो दलों के कार्यकर्ताओं के बीच तक ही नहीं सिमटा था दोनो नेता (कल्याण-मुलायम) भी एक-दूसरे के खिलाफ ‘तलवार’ निकाले रहते थे। दोनों ही नेता उने मंचों और समारोह से भी दूरी बनाकर चलते थे, जहां दोनों का आमना-सामना हो सकता था, लेकिन समय बलवान होता है।  जो लोग कल्याण सिंह और मुलायम को नदी के दो पाट मानते थे, उनके जेहन में शायद कभी अमर सिंह का नाम नहीं आया होगा।  जो काम सबके लिये असंभव था, उसे अमर सिंह ने कर दिखाया।  वर्ष 2009 में समाजवादी पार्टी के आगरा अधिवेशन में अमर सिंह के प्रयास से कल्याण-मुलायम एक मंच पर नजर आये तो यूपी की सियासत में हाहाकार मच गया।

चर्चा यह भी छिड़ी थी की कल्याण सिंह (उस समय भाजपा से बाहर चल रहे थे) को समाजवादी पार्टी ज्वांइन कराकर लोकसभा चुनाव  लड़ने का आफर तक दिया गया था। कल्याण-मुलायम को एक मंच पर लाने और कल्याण को सपा के टिकट पर चुनाव लड़ाने के पीछे की सियासी सोच यही थी कि किसी तरह से मुलायम की मुल्ला मुलायम वाली छवि जिसके कारण हिन्दू वोटर सपा से बिदक रहे थे,  का रंग थोड़ा फीका किया जा सके।  परंतु इस पर बात बनती उससे पहले ही समाजवादी पार्टी में बवाल खड़ा हो गया।  आजम खान ही नहीं सपा के अन्य कई मुस्लिम नेताओें ने भी बगावत कर दी।  विरोधी हमलावार हो गये तो आम मुसलमान के बीच भी इस पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई। मुलायम के मुंह लगे आजम खान ने इस प्रकरण से नाराज होकर समाजवादी पार्टी से किनारा कर लिया।  सपा में सब कुछ अप्रत्याशित हो रहा था।  मुलायम ने अपना दांव उलटा पड़ते देख, कदम पीछे खींच लिये तो अमर सिंह का पार्टी में रूतबा कम हो गया।  कालांतर में जिसकी परिणिति अमर की समाजवादी पार्टी से विदाई के रूप में हुई।  6 जनवरी 2010 को अमर सिंह ने सपा के सभी पदों से इस्तीफा दिया तो 2 फरवरी 2010 को पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया। 

यह वह दौर था जब बड़ी तादात में लोग यह मानने लगे थे कि समाजवादी पार्टी में अमर सिंह का कद मुलायम से भी बड़ा हो गया है, लेकिन कल्याण प्रकरण के बाद अमर सिंह के लिये समाजवादी पार्टी में रहना मुश्किल हो गया।  अमर सिंह जिन्हें बाद में समाजवादी पार्टी से बाहर का रास्ता देखना पड़ा था।  अब करीब छहःवर्षो के पश्चात एक बार फिर उनकी(अमर सिंह)सपा में वापसी की चर्चा छिड़ी है। भले ही आजम खान यह कहते हुए घूम रहे हों कि अमर सिंह दगा कारतूस हैं, सपा में वापस नहीं आ रहे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि अमर की वापसी की खबरों ने आजम ही नहीं उनके जैसे तमाम सपा नेताओं की नींद उड़ा रखी है।

खैर, यहां चर्चा अमर सिंह की समाजवादी पार्टी में वापसी की संभावनाआंें को लेकर नहीं हो रही है।  इस घटना का जिक्र प्रसंगवश किया गया था। दरअसल,  तब भी मुलायम पार्टी का वोट बैंक बढ़ाने को लेकर चिंतित थे और आज भी उनकी यही फिक्र हैं। मुलायम को डर सता रहा है कि कहीं एम-वाई (मुस्लिम-यादव) के सहारे 2017 की बैतरणी पार करने की उनकी तमन्ना अधूरी न रह जाये। इसीलिये मुलायम सिंह यादव मुसलमानों को लुभाने के साथ-साथ हिन्दुत्व के एजेंडे को भी आगे बढ़ाने में जुट गये हैं।  एक ओर नेताजी को वह अमर सिंह याद आ रहे हैं जो हिन्दुत्व क प्रतीक कल्याण सिंह को उनके (मुलायम सिंह) करीब लाये थे तो दूसरी तरफ नब्बे के दशक में अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने की घटना पर भी मुलायम अफसोस जाहिर कर रहे हैं।

बताते चलें, मुलायम उस समय मुख्यमंत्री थै।  लाखों की संख्या में कारसेवक रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे के पास जमा हो गये तो बतौर सीएम उन्होंने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया, जिसमें 16 कारसेवकों की मौत हो गई थी।  तब से लेकर आज तक इस मुद्दे पर शांत रहने वाले मुलायम ने हाल ही में एक न्यूज चैनल को दिये इंटरव्यू में कहा था कि वह एक दर्दनाक फैसला था, लेकिन उस समय मेेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। मुलायम का हिन्दू प्रेम ऐसे ही नहीं जागा है। इसके पीछे सटीक कारण हैं। राजनीति की पैनी नजर रखने वाले नेताजी जानते हैं कि 2017 के विधान सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के अलावा भी मुस्लिम वोटों के कई सौदागर मैदान में ताल ठोंकते दिखाई देंगे। चाहें ओवैसी हो या नीतिश-लालू की जोड़ी अथवा बहुजन समाज पार्टी सबकी नजरें मुस्लिम वोट बैंक को लुभाने की है, जबकि हिन्दू वोटरों का सौदागर सिर्फ भाजपा बनी हुई है।  ऐसे में मुलायम को हिन्दू वोट बैंक में सेंध लगाना ज्यादा आसान लगा तो उन्होंने हिन्दुत्व के एजेंडे को ही आगे बढ़ा दिया। 

सपा प्रमुख मुलायम ने यह पैतरा ऐसे समय में चला है जब समाजवादी पार्टी और अखिलेश सरकार मिशन 2017 का लक्ष्य हासिल करने के लिये चारो तरफ हाथ-पैर मार रही है।  पार्टी के रणनीतिकारों को इस बात की बेहद चिंता सता रही है कि सपा के वोट बैंक में बिखराव हो रहा है। समाजवादी पार्टी को मुस्लिम वोट बैंक के बिखराव की तो चिंता है ही इसके अलावा भी सपा जिन पिछड़ों को अपनी सियासी पूंजी मानती थी, उसमें से यादवों को छोड़कर करीब-करीब अन्य सभी पिछड़ा वर्गो का सपा से मोहभंग होता दिख रहा है। समाजवादी पार्टी के नेता जानते हैं कि भले ही 2012 के विधान सभा चुनाव में उनके खाते में 224 और बसपा के खाते मं 80 सीटें आईं थीं, लेकिन दोनों पार्टिंयों को मिलने वाले वोट प्रतिशत में मात्र तीन प्रतिशत का अंतर था।

समाजवादी पार्टी को 29.2 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि 80 सीटंे जीतने वाली बसपा का वोट प्रतिशत 25.9 था। भाजपा 15 प्रतिशत वोटों के साथ तीसरे और कांग्रेस 11.6 प्रतिशत वोट हासिल कर चौथे स्थान पर रही थी।  2014 के लोकसभा चुनाव आते-आते समाजवादी पार्टी का जनाधार 07 प्रतिशत घट गया। सपा को मात्र 22.2 प्रतिशत वोट मिले।  वहीं बसपा को 2012 के विधान सभा चुनावों के मुकाबले 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 06 प्रतिशत का नुकसान हुआ था।  बसपा 20 प्रतिशत वोट ही हासिल कर सकी थी। लोकसभा चुनाव के समय यूपी में भले ही बसपा का वोट बैंक घटा था, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वह सबसे अधिक वोट पाने वाले दलों में तीसरे नंबर पर रही थी। बसपा को पूरे देश में 4.1 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि समाजवादी पार्टी  3.4 प्रतिशत वोटों के साथ तृणमूल कांग्रेस के बाद पांचवें स्थान पर रही थीं। हॉ,  यह जरूर था कि सपा से अधिक वोट पाने के बाद भी बसपा का एक भी सांसद नहीं जीता था, जबकि सपा पांच सीटों पर जीतने में कामयाब रही थी।

2014 के लोकसभा चुनाव के समय यूपी में मोदी अपने आप को पिछड़ों के नेता के रूप में प्रोजेक्ट कर चुके थे, अब बसपा भी गैर यादव पिछड़ोे पर डोरे डालने लगी है।  दूसरी तरफ मुसलमान भी समझ नहीं पा रहा है कि समाजवादी पार्टी और उसके मुखिया मुलायम सिंह पर कितना भरोसा किया जाये। इसकी वजह भी है।  2012 में समाजवादी पार्टी ने चुनाव के समय मुसलमानों से जो वायदे किये थे, उन्हें अखिलेश सरकार भले ही पूरे कर देने की बात कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है।  मुसलमानों को इससे कोई फायदा नहीं हुआ है।  इसके अलावा अखिलेश कैबिनेट में भी उस अनुपात में मुस्लिम नेताओं को नहीं लिया गया है, जिस अनुपात में वह जीतकर आये थे। इसी प्रकार मुलायम सिंह का बार-बार दादरी के बिसाहड़ा में भीड़ द्वारा अखलाक नामक व्यक्ति की हत्या के लिए बीजेपी के तीन नेताओं को जिम्मेदार ठहराया जाना और यह कहना कि अगर प्रधानमंत्री कहें तो वह उन तीनों के नाम बताने को तैयार हैं। वाली बात मुसलमानों को रास नहीं आ रही है। वह सवाल पूछ रहे हैं कि ऐसी कौन सी मजबूरी है जो मुलायम उक्त बीजेपी नेताओं का नाम सार्वजनिक नहीं करके उन्हें बचा रहे हैं। ऐसी ही बातों और बीजेपी के प्रति नेताजी का अक्सर दिखता झुकाव मुसलमान वोटरों को रास नहीं आता है। यह परेशानी सबब न बन जाये इसी चिंता में डूबे मुलायम और समाजवादी सरकार ने अब हिन्दूु कार्ड खेलना शुरू कर दिया है। 

2012 के विधान सभा चुनाव के समय सपा को मुस्लिम वोटों की चिंता सता रही थी तो 2017 में उसे हिन्दू वोट बैंक की भी चिंता सताने लगी है। संभवताःइसी लिये पिछले वर्ष सितंबर के महीने में अखिलेश सरकार द्वारा हिन्दुओं की सबसे पवित्र धार्मिक मानसरोसवर यात्रा पर जाने वाले भक्तों के लिये सब्सिडी 25 हजार से बढ़ाकर 50 हजार कर दी गई थी। इससे पूर्व अखिलेश सरकार द्वारा  शुरू की गई ‘समाजवादी श्रवण यात्रा’ भी इसी कड़ी का एक हिस्सा था। जिसके माध्यम से प्रदेश के बुजुर्ग श्रद्धालुओं को यूपी सरकार के खर्चो पर पूरे देश के धार्मिक स्थलों की यात्रा कराई जा रही है। अभी तक हजारों बुजुर्ग इस यात्रा का फायदा उठा चुके हैं। इसी तरह से अखिलेश सरकार 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले राज्यभर के मंदिरों का जीर्णोद्धार भी करने जा रही है।

अखिलेश सरकार की सवर्ण समाज के वोटों पर नजर है।  उत्तर प्रदेश में अधिकतर मंदिरों का प्रबंधन सवर्ण जातियों से आने वाले पुजारियों के हाथ में है।  यूपी सरकार की कोशिश है कि हर जिले में कम से कम एक मंदिर का जीर्णोद्धार हो। इस सिलसिले में राज्य सरकार की धार्मिक मामलों के विभाग ने हर जिले के जिलाधिकारी को अपने जिले से एक महत्वपूर्ण मंदिर का ब्यौरा उपलब्ध कराने के लिए कहा है।  विभाग के निर्देश के बाद अब तक 34 जिलों से सरकार को प्रस्ताव भेजा जा चुका है। इसी प्रकार वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर की तरह मथुरा और विध्यांचल के मंदिर मंे भी रिसीवर नियुक्त कर न्यास बनाये जाने की चर्चा चल रही है ताकि यहां आने वाले भक्तों को सुविधाएं मिल सकें। अभी इन मंदिरों में पंडो और मठाधीशों का दबदबा है, जिनके बारे में यहां आने वाले श्रद्धालुओं का अनुभव अच्छा नहीं है।  यह लोग मंदिर पर आने वालेे चढ़ावे से लेकर श्रद्धालुओं को प्रसाद, दान-पुण्य के नाम पर खूब लूटते हैं। 

खैर, बात अगर कारसेवकों पर गोली चलाने के लिये मुलायम सिंह द्वारा दुख व्यक्त करने की कि जाये तो मामला यहीं तक सीमित नहीं है।  अयोध्या को लेकर समाजवादी सरकार काफी नरम रूख अपनाये हुए है। बीते साल के मध्य में राजस्थान से जब पत्थरों की खेप अयोध्या पहुंची तो ऐसा लगा कि अखिलेश सरकार इस पर कोई सख्त कदम उठायेगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, बल्कि समाजवादी पार्टी के नेता बुक्कल नबाव स्वयं अयोध्या में भगवान राम के मंदिर निर्माण की वकालत करते हुए मीडिया में दिखाई देने लगे। वह मंदिर निर्माण के लिये दान देने की भी बात कर रहे थे। नबाव साहब की बातों को गंभीरता से इस लिये जा रहा है क्योकि उनकी गिनती मुलायम सिंह के करीबियों में होती है। अयोध्या में मंदिर निर्माण की वकालत करने के चलते अखिलेश सरकार के राज्य मंत्री ओमपाल नेहरा को भले ही पद गंवाना पड़ गया था, लेकिन बुक्कल नबाव पर आंच तक नहीं आई।

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिये राजस्थान से पत्थर आ रहे थे और अखिलेश सरकार चुप्पी साधे हुए थी। इस संबंध में जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से पूछा गया तो उन्होंने कोई कार्रवाई करने की बजाये यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि ‘‘अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर में हर हाल में न्यायालय के निर्देशों का पूरी सख्ती से कार्यान्वयन एवं अनुपालन सुनिश्चित कराया जाएगा।  प्रदेश में कानून व्यवस्था को खराब करने की किसी को इजाजत नहीं दी जाएगी क्योंकि अयोध्या का यह मामला उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है। ’’जबकि इससे पूर्व गृह विभाग के प्रमुख सचिव देवाशीष पांडा ने कहा था कि राज्य सरकार राम मंदिर के लिए अयोध्या में पत्थर नहीं आने देगी। ‘‘चूंकि मामला न्यायालय में विचाराधीन है, लिहाजा सरकार अयोध्या मुद्दे के बाबत कोई नई परंपरा शुरू करने की इजाजत नहीं देगी।’’ वहीं एडीएम सिटी आरएन शर्मा ने भी कहा था कि पत्थर दान व राजस्थान से पत्थर मंगाए जाने की न कोई अनुमति ली गई है,  न ही उनके संज्ञान में मामला है।

अयोध्या में भगवान राम के मंदिर का निर्माण ऐसा मसला है जिसपर हमेशा वोट बैंक की सियासत होती रहती है। अयोध्या में पत्थर लाये जाने की घटना पर अखिलेश सरकार ने भले ही(हिन्दुत्व के एजेंडे को धार देने के लिये) चुप्पी साध ली थी, लेकिन बसपा सुप्रीमों मायावती ने इसके सहारे मुसलमानों को रिझाने का मौका नहीं खोया।  माया ने अखिलेश सरकार पर पत्थरों को अयोध्या आने से नहीं रोकने के लिये तंज कसते हुए इसे समाजवादी पार्टी और भाजपा की सांठगांठ बता कर राजनैतिक चाल चल दी। बसपा सुप्रीमों मायावती बीजेपी-सपा के बीच गठजोड़ की बात करके मुस्लिम वोटरों में संशय पैदा करने का कोई भी मौका छोड़ती नहीं हैं।  बहरहाल,  तमाम किन्तु-परंतुओं के बीच 2017 में राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, कोई नहीं जानता है।

लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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बसपा ने तय किया मिशन-2017 एजेंडा

अजय कुमार, लखनऊ

बसपा सुप्रीमों मायावती ने मिशन 2017 के आगाज के साथ ही सियासी एजेंडा भी तय कर दिया हैै। दलितों को लुभाने के लिये बसपा बड़ा दांव चलेगी तो मुसलमानों को मोदी-मुलायम गठजोड़ से बच के रहने को कहा जायेगा।  प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था, किसानों की दुर्दशा, बुंदेलखंड की बदहाली को अखिलेश सरकार के विरूद्ध हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जायेगा। एकला चलो की राह पर  बीएसपी केन्द्र की सत्ता पर काबिज बीजेपी को नंबर वन का दुश्मन मानकर चलेगी तो प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को नंबर दो पर रखा गया है। नंबर तीन पर कांग्रेस सहित अन्य वह छोटे-छोटे दल रहेंगे जिनका किसी विशेष क्षेत्र में दबदबा है। बसपा हर ऐसे मुद्दे को हवा देगी जिससे केन्द्र और प्रदेश सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा सके।  विधान सभा के बजट सत्र और इससे पूर्व के सत्रों मे बसपा नेताओं ने जिस तरह के तीखे तेवर दिखाये उससे यह बात समझने में किसी को संदेह नहीं बसपा सड़क से लेकर विधान सभा तक में अपने लिये राजनैतिक बढ़त तलाश रही है। 

बसपा में छोटे-बड़े सभी नेता मिशन 2017 को पूरा करने के लिये जिस तरह से तेजी दिखा रहे हैं उससे भाजपा-सपा भी बेचैन दिख रहे हैं।  2012 के विधान सभा चुनाव में पराजय और 2014 के लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खोल पाने वाली बहुजन समाज पार्टी की नेत्री मायावती अगर 2017 के विधान सभा चुनाव जीत कर सत्ता में वापसी का सपना देख रही हैं तो इसे माया का आत्मविश्वास या बढ़बोलापन दोनों ही कहा जा सकता हैै, लेकिन राजनैतिक पंडित इसे बसपा का आत्मविश्वास ही बता रहे हैं।  बात 2012 और 2014 में बसपा को मिली करारी शिकस्त के बाद मायावती की राजनीति और व्यक्तिग जीवन में आये बदलाव की कि जाये तो दोनों ही मोर्चो पर बसपा सुप्रीमों काफी सजग नजर आती है।  इसकी बानगी 15 जनवरी 2016 को देखने को मिली। माया ने अबकी से अपना जन्मदिन सादगीपूर्ण तरीके से मनाया।  इस बार हीरों के चमकते आभूषण बहनजी के चेहरे की शोभा भले ही नहीं बढ़ा रहे थे, लेकिन 2017 में सत्ता वापसी की चमक उनके चेहरे पर साफ दिखाई पड़ रही थी, जिसे देखकर बसपाई चकाचौंध हो रहे थे। 

विधान सभा चुनाव से एक वर्ष पूर्व बसपा को नंबर वन पर देखा जा रहा है तो इसका कारण उत्तर प्रदेश की केन्द्र की मोदी और यूपी की अखिलेश सरकार की नीतियां हैं। मोदी सरकार को दलित और मुस्लिम विरोधी साबित करने का प्रयास हो रहा है।  अयोध्या में भगवान राम का मंदिर निर्माण करने संबंधी बीजेपी नेताओं के बयानों, हैदराबाद में दलित छात्र की आत्महत्या, बीते साल हरियाणा में दो दलितों की जलकर हुई मौत, अखलाक की हत्या आदि तमाम ऐसी घटनाएं हैं जिसके सहारे मोदी सरकार को न केवल दलित बल्कि मुसलमान विरोधी भी साबित किया जा रहा। इसकी बानगी हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी के लखनऊ कार्यक्रम के दौरान तब देखने को मिली, जब इस बात का खुलासा हुआ कि हैदराबाद की घटना को लेकर ‘नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद और मोदी वापस जाओ’ के नारा लगाने वाले छात्र बसपा प्रमुख मायावती के समर्थक थे। इस पूरे प्रकरण को बेहद प्‍लानिंग के साथ अंजाम दिया गया था। इसमें बसपा का हाथ था।  मायावती दलित वोटरों को यह बताने का कोई भी मौका नहीं खोती हैं कि आरएसएस,  भाजपा व केंद्र सरकार के कट्टरवादी सांसदों,  मंत्रियों व उच्च पदों पर बैठे लोग दलितों को नुकसान पहुंचाने के लिये कभी भारतीय संविधान की तो कभी आरक्षण की समीक्षा करने की बात कर रहे हैं। वह कहती हैं कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद हर क्षेत्र में दलितों व अति पिछड़ों का उत्पीड़न बढ़ा गया है।  इन वर्गों के प्रति उनकी हिंदुत्व आधारित जातिवादी सोच नहीं बदली है।

मायावती जहां दलित वोट बैंक को लेकर चिंतित है, वहीं उन्होंने मुस्लिमों के बीच अपने समर्थन की जमीन तलाशने की कवायद भी शुरू कर दी है। इस क्रम में माया नेे सबसे पहले बसपा के मुस्लिम नेताओं को टिकट देने में दरियादिली दिखाई। इस बार करीब 25 फीसदी टिकट मुस्लिमों को देकर पार्टी अपने लिये बेहद खास अल्पसंख्यक वोटों पर निगाहें टिकाए हुए है। हालांकि यह और बात है कि लोकसभा चुनाव के बाद संगठन में हुए बड़े पैमाने पर बदलाव के बाद भी नए संगठन में मुसलमानों से अधिक दलितों को तवज्जो दी गई थी। मुसलमानों को टिकट देने में दरियादिली दिखाने वाली बसपा सुप्रीमों  अयोध्या के बहाने भी मुसलमानों पर डोरे डाल रही हैं।  एक तरफ वह अयोध्या में जल्द मंदिर बनने संबंधी बीजेपी नेताओं के ताजा बयानों को हवा दे रही हैं तो वहीं मुलायम के उस बयान को भी मुद्दा बना रही हैं जिसमें मुलायम ने कहा था कि कारसेवकों पर लाठचार्ज करने का उन्हें दुख है। अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद द्वारा मंदिर निर्माण के लिए राजस्थान से शिलाएं लाए जाने के सवाल पर बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्या तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहते है कि मामला सुर्प्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।  जो ऐसा कर रहे है वे देसी आतंकवादी हैं।  मौर्य ने कहा, ‘अयोध्या में ट्रकों से लद कर शिलाएं पहुंच गईं।  मगर सपा सरकार सोती रही।  इससे भी साबित होता है कि सपा भाजपा में सांठगांठ है। उन्होंने कहा यदि समाजवादी पार्टी सरकार सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करती तो शिलाएं वहां कतई न पहुंच पातीं।  मुस्लिमों का बसपा के प्रति झुकाव की वजह मुस्लिम आरक्षण भी बन सकता है।  2012 में मुसलमानों को लगता था कि समाजवादी सरकार बनेगी तो वह मुसलमानों को नौकरियों में आरक्षण देने के लिये कोई न कोई रास्ता तलाश लेगी, परंतु ऐसा हुआ नहीं।

बसपा दलितों और मुसलमान वोट बैंक के अलावा ऊंची जाति के एक वर्ग के वोटों पर भी नजर रखे हुए है।  इसके लिए यह इस समुदाय के गरीब लोगों के लिए बसपा सुप्रीमों नौकरी में आरक्षण की जोरदार वकालत कर रही हैं। याद रखना जरूरी है कि 2007 के चुनावों में दलित-मुस्लिम और ब्राहमण वोटों की गोलाबंदी करके बसपा ने 403 में से 206 सीटें जीतने में सफलता हासिल की थी।  पार्टी को मिलने वाले कुल वोटों में 30.43 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं का था। जानकर कहते हैं कि केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार का कामकाज ठीकठाक  होता तो मायावती के पक्ष में संभावनाएं इतनी प्रबल न होतीं।  पर लोकसभा चुनाव में दूसरी तमाम पार्टियों को बौना बना देने वाली भाजपा दिल्ली-बिहार के बाद उत्तर प्रदेश में भी अपना वर्चस्व कायम रखने में विफल होती दिख रही है।  लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत का ताना-बाना बुनने वाले पार्टी के मुखिया अमित शाह भले ही दोबारा अध्यक्ष बन गये हों लेकिन उनका रुतबा काफी घटा है।

मिशन 2017 फतह करने के लिये बसपा केन्द्र की भांति ही अखिलेश सरकार के खिलाफ भी जाति,  धर्म और समुदाय से इतर कानून-व्यवस्‍था की बिगड़ी स्थिति को  प्रमुख मुद्दा बन सकती है। बसपा का प्रमुख वोट बैंक रहीं जाटव,  दलित समूह और अन्य पिछड़ी जातियां,  जिनका मायावती से मोहभंग हो गया था,  यादवों के वर्चस्व से त्रस्त होकर एक बार फिर उनके पक्ष में एकजुट हो रही हैं।  ब्राह्मणों की स्थिति भले उतनी खराब न हो,  लेकिन ग्रामीण इलाकों में बंदूक की नोक पर गुंडाराज करने वालों से वे भी आजिज आ चुके हैं। इसी प्रकार राज्य में बढ़ते कृषि संकट और खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों को उनकी समस्याओं से निजात दिलाने में माया की भूमिका को उम्मीद भरी नजरों से देखा जा रहा है।  प्रदेश की सपा और केंद्र की भाजपा सरकार से त्रस्त किसान बसपा के शासन को याद करते हैं,  जब न केवल चीनी मिलों से समय पर गन्ने का भुगतान हो जाता था,  बल्कि कीमत भी वाजिब मिलती थी।  सपा सरकार द्वारा पिछले तीन वर्षो से गन्ना मूल्य नहीं बढ़ाया जाना भी गन्ना किसानों को खटक रहा है। 

कानून व्यवस्था के अलावा अखिलेश सरकार में प्रमोशन में दलित कोटा खत्म करना,  दलितों की जमीन की बिक्री के लिये बनाये गये नियमों में बदलाव ऐसे मुद्दे हैं जिससे दलितों को लगता है कि माया राज में ही उसके हित सुरक्षित रह सकते हैं। यही सोच माया की सत्ता में वापसी की राह आसान कर रही है। वैसे  तो समाजवादी सरकार में कानून-व्यवस्था की स्थिति सबके लिये दुखद है,  किंतु दलितों के प्रति अधिपत्यशाही समूहों का अन्याय बढ़ा है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव दलित कल्याण के मुद्दे पर या तो उदासीन है या ऐसी नीतियां लागू कर रहे है,  जिन्हें दलित हितों के खिलाफ माना जाता है। बीते वर्ष समाजवादी पार्टी सरकार ने अदालत के आदेश की आड़ में नौकरी में प्रमोशन में अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (एससी – एसटी)कर्मचारियों के लिए नौकरी में निर्धारित किए गए कोटा को समाप्त करने के साथ-साथ ही एक ऑफिस आर्डर के तहत नौकरी में प्रोन्नत किए गए एससी-एसटी कर्मचारियों को पदावनत(डिमोशन) करने का निर्णय लिया था।  इस आदेश से  लाखों एससी-एसटी कर्मचारी प्रभावित होते दिखे।

इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग ने इस ऑफिस आर्डर को ध्यान में रख पूर्व में प्रोन्नत किए गए एससी/एसटी कर्मचारियों को पदावनत करने का आदेश दे दिया।  दलित समाज में समाजवादी पार्टी सरकार के इस पहल का काफी विरोध हो रहा है। इसको लेकर दलितों में वर्तमान सरकार के प्रति गुस्सा और नाराजगी बढ़ रही है। दलितों का प्रोन्नति कोटा खत्म किये जाने के अलावा अखिलेश सरकार का एक और निर्णय दलितों के हितचिंतकों को रास नहीं आ रहा है।  राज्य सरकार का यह निर्णय भी बसपा को 2017 के लिये संजीवनी दे रहा है।  खुद दलितों में भी एक बड़ी संख्या इस निर्णय से खफा है। समाजवादी सरकार ने बीते वर्ष ही दलितों की भूमि खरीद और विक्रय संबंधी कानून में भी एक बड़ा परिवर्तन किया था। गौरतलब हो,  1950 का भूमि कानून गैर दलितों द्वारा दलितों की भूमि के खरीद की इजाजत तो देता था,  किंतु 1.26 हेक्टेयर से ज्यादा होने वाली भूमि ही खरीदी-बेची जा सकती थी। दलितों की भूमि 1.26 हेक्टेयर से कम होने पर किसी दलित को ही बेची जा सकती थी, परंतु इसके  जिला प्रशासन द्वारा कड़ी छानबीन की जाती थी, लेकिन अखिलेश सरकार ने दलितों के भूमि विक्रय संबंधी इस नियम को खोखला करके फरमान जारी कर दिया कि अगर किसी दलित के पास न्यूनतम 1.26 हेक्टेयर भूमि भी है तो वह भी खरीदी-बेची जा सकती है।  कोई गैर-दलित भी उसे खरीद सकता है। 

इस नियम परिवर्तन का असर यह हुआ कि भूमि माफियाओं का उत्साह बढ़ गया तो दूसरी ओर दलितों को अपनी जमीन कैसे सुरक्षित रहेगी इसकी चिंता सताने लगी है। अखिलेश सरकार के इस निर्णय पर इस लिये भी सवाल खड़े किये जा रहे हैं, क्योंकि अक्सर खबरें आती रहती हैं कि सपा में भू-माफियाओं का दबदबा है।  यह और बात है कि कुछ दलित अपनी जमीन किसी को भी बेचने की छूट में लाभ भी देख रहे हैं,  पर इनका प्रतिशत काफी कम है और यह दलितों का प्रतिनिधित्व भी नहीं करते हैं।  दलितों का बड़ा तबका इस निर्णय से काफी नाराज हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती इन  निर्णयों की आलोचना कर चुकी है।  मायावती कहती हैं कि दलितों व अन्य पिछड़े वर्गों के मामले में प्रदेश की सपा सरकार की सोच लगभग बीजेपी व आरएसएस की तरह नजर आती है।  दलित वर्ग के कर्मचारी व अधिकारी पदोन्नति में आरक्षण को बरकरार रखने के लिए केंद्र व प्रदेश की सपा सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करते रहते हैं।  सपा सरकार ने दलित कर्मचारियों व अधिकारियों को काफी ज्यादा नुकसान पहुंचा दिया है।

बसपा नेता और प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्या कहते हैं कि सपा राज में दलितों की जमीन सुरक्षित नहीं रह गई है। काूनन बनाकर दलितों का हक छीनने का मार्ग अखिलेश सरकार ने प्रशस्त कर दिया है। इसी तरह मौर्या प्रोन्नति में आरक्षण के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की आड़ में अनुसूचित जाति जनजाति के अधिकारियों कर्मचारियों की जिस मनमाने तरीके से पदावनति की जा रही है उससे भी खफा है।  मौर्यां के अनुसार प्रोन्नति में आरक्षण वापस लिये जाने से दलित समाज के आठ लाख से अधिक कर्मचारियों में उपेक्षा और पक्षपात का शिकार होने का भाव पैदा हो रहा है।

दलित समाज को अखिलेश सरकार की एक और बात भी कचोटती रहती है। सपा राज में दलित महापुरूषों के नाम पर बने स्मारकों, पार्कोे आदि के रखरखाव पर लाफी लापरवाही बरती जाती है, जबकि समाजवादी नेताओं के नाम पर बने पार्कों आदि पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है।  शायद इस बात का अहसास अखिलेश सरकार को भी हो गया होगा,  इसी लिये हाल ही में  अखिलेश सरकार ने लखनऊ में स्थापित किए जा रहे अत्याधुनिक हाईटेक सीजी सिटी परिसर में बाबा साहब डॉ0 भीमराव अंबेडकर का स्मारक बनाने के लिए अंबेडकर महासभा को भूमि उपलब्ध कराने का एलान किया है।  सीजी सिटी में अंबेडकर स्मारक के लिए जमीन देने का एलान कर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जहां बसपा सुप्रीमो मायावती के दलित एजेंडे में सेंध लगाने की कोशिश की है,  वहीं डॉ. अंबेडकर के सहारे चुनावी वैतरणी पार लगाने की भाजपा की मुहिम को भी कुंद करने का दांव चला है।   

बहरहाल,  बसपा सुप्रीमों मायावती और उनके समर्थक 2017 में अपना भविष्य जरूर तलाश कर रहे हैं,  तो 2012 में मिली करारी हार से सबक लेते हुए पिछले कार्यकाल की गलतियों से भी बचा जा रहा है। मायावती के तानाशाही रवैये और ब्राहमणों के प्रति बढ़ते उनके रूझान से नाराज होकर ही दलितों के एक बड़े धड़े ने 2014 में हाथी की जगह कमल खिला दिया था। ब्राहमण नेताओं के वर्चस्व के कारण  बीएसपी की पिछली सरकार में दलितों के अलावा पिछड़ा वर्ग भी अपने आप को उपेक्षा का शिकार समझ रहा था। माया की कैबिनेट से लेकर शासन तक में गैर दलितों का दबदबा देखने को मिला था। रामवीर उपाध्याय, बाबू सिंह कुशवाह,  स्वामी प्रसाद मौर्या, अंनत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू,  बादशाह सिंह, नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेताओं का माया कैबिनेट में  रूतबा था तो अफसर शाही की कमान शंशाक शेखर ने संभाल रखी थी जिसने के सामने किसी की एक नहीं चलती थी। मायावती कभी किसी शादी समारोह में नहीं जाती है, परंतु सतीश मिश्र के वहां जब वह पहुंची तो यह बात उन दलित नेताओं को भी रास नहीं आई जो माया के काफी करीबी हुआ करते थे।  2012 में समाजवादी पार्टी  माया के तानाशाही रवैये और पिछड़ों की उपेक्षा के मुद्दे को भुना कर जीत हासिल करने में सफल रही तो 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी दलितों को अपने पाले में खींच ले गये।

बात 2017 की करें तो माया ने भले ही अपना एजेंडा तय कर दिया हो लेकिन उन्हें इस बात का भी अहसास है कि बीजेपी और समाजवादी नेता प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा देकर कानून-व्यवस्‍था और कृषि संकट जैसे मुद्दों को हाशिये पर धकेल सकते है।  विश्व हिन्दू परिषद का राम मंदिर  राग अलाप। सपा में आजम खान जैसे नेताओं की उकसाने वाली बयानबाजी सांप्रदायिक माहौल बिगड़ने की आशंका को हवा देने का काम कर रही है। इसी बात को ध्यान में रखकर बसपा नेता भाजपा को दंगा वाली पार्टी का तमगा देने में जुट गये हैं। बसपा सुप्रीमों मायावती तय एजेंडे पर ही आगे बढ़ रही हैं, इसी लिये वह न तो इस बात से चिंतित होती हैं कि फेसबुक पर उनके साथ फोटो खिंचाने वाली बसपा उम्मीदवार का टिकट काटने पर विरोधियों के बीच क्या प्रतिक्रिया होती है और न ही इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि कौन उनका साथ छोड़ रहा है। बसपा नेत्री किसी भी तरह 2017 में अपनी बादशाहत कायम रखना चाहती है।

लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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राहुल गांधी सियासत का एक अवसरवादी चेहरा

अजय कुमार, लखनऊ

कांग्रेस के युवराज पूरा देश जीतने के लिये निकले हैं। इसके लिये उन्हें कुछ भी करने से परहेज नहीं है।  अपनी तकदीर बनाने के लिये वह देश की तस्वीर बदरंग करने से भी नहीं हिचकिचाते हैं।  आज की तारीख में राहुल गांधी अवसरवादी राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बन गये हैं। वह वहां तुरंत पहुंच जाते हैं जहां से मोदी सरकार को कोसा जा सकता है। अभी तक की उनकी सियासत देखी जाये तो वह देश के किसी भी हिस्से में हुई दर्दनाक मौत पर खूब सियासत करते हैं। बुंदेलखंड में भूख से मरते किसानों, मुजफ्फनगर दंगा, अखलाक की मौत, हैदराबाद में एक दलित छात्र की आत्महत्या जैसे मामलों को हवा देने में राहुल को काफी मजा आता है।

संसद में भले ही राहुल नहीं बोल पाते हैं, लेकिन गांव-देहात, आदिवासियों, किसानों के बीच वह खूब बोलते हैं, जहां उनसे कोई सवाल-जबाव करने वाला नहीं होता है।  2014 में भले ही उनके अरमानों पर मोदी ने पलीता लगा दिया हो लेकिन 2014 न सही 2019 में तो पीएम बनने का सपना तो राहुल देख ही सकते हैं।  भले ही राहुल की काबलियत पर लोग उंगली उठाते हों, लेकिन जिस परिवार में उन्होंने जन्म लिया है, वहां काबलियत नहीं देखी जाती है। यह परिवार तो यही सोचता और समझता है कि वह देश पर राज करने के लिये ही पैदा हुआ है। ऐसा सोचना गलत भी नहीं है नेहरू-गांधी परिवार की तीन पीढ़िया तो पीएम की कुर्सी पर बैठ ही चुकी हैं तो फिर चौथी पीढ़ी के राहुल गांधी क्यों नहीं पीएम बन सकते हैं।  उनके(राहुल गांधी) पास तो और कोई काम भी नहीं है, जबकि उनके पिता राजीव गांधी तो हवाई जहाज उड़ाते-उड़ाते पीएम बन बैठै थे। 

राहुल महाभारत के उस अर्जुन की तरह आगे बढ़ रहे हैं जिसे सिर्फ चिड़िया की ऑख दिखाई देती थी। बस फर्क इतना है कि आज के अर्जुन राहुल गांधी चिड़िया की जगह  पीएम की कुर्सी नजर आती है। येन केन प्रकारेण वह इस कुर्सी को हासिल कर लेना चाहते हैं। इसके लिये वह हर हथकंडा अपना रहे हैं। इसके लिये वह अपनी निगेटिव सोच को आगे बढ़ाने से भी गुरेज नहीं करते हैं। उन्हें इस बात की जरा भी चिंता नहीं रहती है कि अब जमाना बदल गया है।  किसी नेता को कोई दल जनता के ऊपर थोप नहीं सकता है। मुंबई के प्रबंधन कालेज में राहुल गांधी किस तरह उपहास के केन्द्र बने इसकी अनदेखी भी कर दी जाये तो भी राहुल की योग्यता पर प्रश्न चिंह लगता ही रहेगा। एप्पल के को फाउंडर स्टीव जोंब्स को माइक्रोसेफ्ट का बताने जैसी गलती राहुल अक्सर ही करते रहते हैं। मुंबई के जिस प्रबंधन कॉलेज में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी कार्यक्रम को संबोधित किया था, वहां के छात्र-छात्राएं ही उनके  संबोधन से संतुष्ट नही दिखे। 

कुछ छात्रों ने कहा कि राहुल के भाषण में कुछ ज्यादा ही राजनीति थी। इन छात्रों का कहना था कि राहुल को राजनीति को लेकर अपने विजन पर विस्तार से बोलना चाहिए।  जीएसटी पर की गई राहुल की टिप्पणी पर एक छात्र ने कहा कि कुछ चीजें ज्यादा विस्तार से बताई जानी चाहिए थी।  जैसे कि यदि जीएसटी विधेयक दो वजहों से अटका है तो सरकार और विपक्ष को इसे आगे बढ़ाने के लिए कोई व्यवस्था तलाशनी चाहिए।  एक अन्य छात्र ने कहा कि एक आम आदमी के तौर पर मेरी दिलचस्पी राजनीति में नहीं है।  मैं (विधेयक पारित होने में देरी) से निराश हूं। वहीं एक दूसरे छात्र का कहना था कि भारत के नेताओं को ‘‘जैसे को तैसा’’ वाला रवैया छोड़ना चाहिए।  कोई देश जैसे को तैसा वाले रवैये से नहीं चल सकता। सवाल-जवाब सत्र में राहुल से सवाल करने वाली एक छात्रा ने कहा कि राहुल गांधी ने मनरेगा और इसकी प्रक्रिया पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया।  उन्हें तो हमसे अपने विजन के बारे ज्यादा बात करनी चाहिए थी।

कांग्रेस के युवराज के साथ दिक्कत यह है कि एक पॉव विदेश में और दूसरा पॉव उस जगह रहता है जहां जरा भी वोट की उम्मीद नजर आती है।  जो कांग्रेस 60 वर्षो में और राहुल दस वर्षो तक सत्ता में रहते नहीं कर पाये उसके लिये राहुल गांधी केन्द्र की मोदी सरकार को सूली पर लटका रहे हैं।  अपने हित साधने के लिये संसद में व्यवधान खड़ा कर रहे हैं।  उन सभी मुद्दों को हवा दे रहे हैं जिससे विकास के काम प्रभावित हो सकते हैं।  देश में तनाव का माहौल पैदा करने में भी राहुल गांधी की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। राहुल को न तो कोई टोकने वाला है न कोई रोकने वाला, जिस पार्टी के नेताओं की वफादारी की पहचान दस जनपथ में घुटने टेकने से तय होती हो, वहॉ भला कोई राहुल को कैसे बता सकते हैं कि वह जिस रास्ते पर चल रहें हैं उससे न तो देश का भला होने वाला है न कांग्रेस को कोई फायदा होगा।  राहुल सिर्फ दूसरों की आलोचना ही करते रहते हैं।  कभी किसी मुद्दे पर अपनी सोच स्पष्ट नहीं करते हैं। चर्चा गंभीर से गंभीर विषय पर चल रही हो,  राहुल इसे घूमा फिराकर मोदी, सूट-बूट की सरकार,  असहिष्णुता,  आरएसएस, दलित, मुसलमान साम्प्रदायिक सोच, न खाऊंगा, न खाने दूंगा के इर्दगिर्द ही ले आते हैं।  राहुल की बेतुकी बातों से बीजेपी के नेता और मोदी सरकार ही बेचैन नहीं होते हैं कांग्रेस के भीतर भी दबी जुबान से लोग राहुल की काबलियत पर प्रश्न चिंह लगाते हैं। राहुल की काबलियत पर इतना बढ़ा प्रश्न चिंह लग गया है कि जब वह सही भी होते हैं तो भी लोग उन्हें सही नहीं समझ पाते हैं। 

दरअसल, गांधी परिवार के कारण ही कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी होने का गौरव हासिल कर पाई और इसी परिवार के कारण आज कांग्रेस हासिये पर पहुंच गई है।  कांग्रेस का अपना कोई काडर नहीं है। गांधी परिवार की नजर में जो व्यक्ति चढ़ गया वह राजा बनकर कांग्रेस में अपनी मनमर्जी चलाता है।  राहुल गांधी की पीढ़ा भी यही है कि जिन नये चेहरों को वे आगे लाने की कोशिश करते हैं, पुराने नेता उन्हें पनपने ही नहीं देते। यह स्थिति नेतृत्व के कमजोर होने के कारण उत्पन्न होती है।  राहुल  को एक दशक से ऊपर का समय सक्रिया राजनीति में आए हुए हो गया है।  इस एक दशक में वे उन कांग्रेसियों से मुक्त नहीं हो पाए जो सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द जमा रहते है।  अहमद पटेल का जलवा आज भी बरकरार है।  उनके गृह राज्य गुजरात में कांग्रेस कुछ खास नहीं कर पाई है। कांग्रेस में यह परम्परा नई नहीं है।  इंदिरा गांधी के जमाने में भी आरके धवन जैसे नेता कांग्रेस को चलाते थे।  उस वक्त कांग्रेस दुर्गति से बच पाई तो सिर्फ इसलिए की कोई राजनीतिक दल कांग्रेस को चुनौती देने वाला नहीं था। बात आज के नेतृत्व की कि जाये तो सोनिया गांधी के साथ भाषा की दिक्कत है तो राहुल गांधी तमाम कोशिशों के बाद भी अपनी छवि एंग्री नहीं बना पाए हैं। इसकी वजह भी है। 

राहुल गांधी के पास न तो सोच है,  न ही ऐसे रणनीतिकार, जो उन्हें देश व्यापी स्वीकार्यता दिला सकें।  इसके अलावा राबर्ट वाड्रा,  सोनिया और राहुल  की कमजोरी बने हुए हैं।  मां-बेटे को यह डर सताता रहता है कि राजग सरकार कहीं वाड्रा को जेल नहीं भेज दें? डर स्वाभाविक भी है।  वाड्रा कांग्रेस शासनकाल में रातों-रात करोड़ पति कैसे बने गये,  इसका जबाव अभी मिलना बाकी है।  आरोप है कि हरियाणा से लेकर राजस्थान तक उन्होंने कांग्रेस की सत्ता का दोहन किया।  वाड्रा यदि विवाद में रहते हैं तो प्रियंका गांधी कांग्रेस का नेतृत्व करने के लिये आसानी से आगे नहीं आ सकती हैं। 

कई बार यह भ्रम भी पैदा होता है कि सोनिया गांधी चाहती ही नहीं है कि कांग्रेस के पुराने दिन लौटें।  राजनीति हमेशा उनके समझ से परे रही।  यदि उनमें राजनीति करने और नेतृत्व करने के गुण होते तो डा.मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री ही नहीं होते।  कांग्रेस के नेताओं पर कोई नियंत्रण न तो सोनिया गांधी का है और न ही राहुल गांधी का।  राज्यों में भी नेतृत्व सामने पहचान का संकट है।  राहुल गांधी खुद इसके लिये जिम्मेदार हैं।  कांग्रेस के जिन युवा नेताओं का प्रभाव अपने-अपने राज्यों में है,  उन्हें नेतृत्व देने का साहस दस जनपथ नहीं उठा पा रहा हैं।  सोनिया गांधी को भय सताता रहता है कि नयी पीढी के नेता राहुल गांधी को ओवरटेक न कर जायें।  थोड़ी बहुत कसर बाकी थी वह नेशनल हेरेल्ड केस में सोनिया-राहुल का नाम आने से पूरी हो गई। यह ऐसा मसला है जो लम्बे समय तक कांग्रेस के गले की फांस बना रह सकता है।

राहुल गांधी की नासमझी का आलम यह है कि वह एक तरफ देश फतह करना चाहते हैं और दूसरी तरफ उन्हें इस बात का अहसास ही नहीं है कि उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी में संेध लग रही है।  यह लापरवाही राहुल की तरफ से तब हो रही है जबकि लोकसभा चुनाव में उनको जीत के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा था और भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी ने राहुल कों जबर्दस्त टक्कर देते हुए राहुल की जीत का आंकड़ा काफी कम कर दिया था।  कई दशकों से यूपी का अमेठी संसदीय क्षेत्र कांग्रेस पार्टी का अभेद्य किला समझा जाता रहा है, लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाला यह दुर्ग अब दरक रहा है। 

इसका नजारा हाल ही में तब देखने को मिला जब दिसंबर 2015 के आखिरी दिनों मे राहुल गांधी दो दिवसीय दौरे पर अमेठी पहुंचे।  लेकिन माहौल ऐसा नहीं था, जैसा आज से दस वर्ष पूर्व हुआ करता था।  जहां उनके आने की खबर मात्र सें कार्यकर्ताओं और लोगों का हुजूम लगा जाता था। वहां इस बार उनके कार्यक्रम में चंद लोग ही नजर आये। इतना ही नहीं, इसके अलावा भी वह जहां भी गए,  जिस गाँव से गुजरे लोगों में वह उत्साह नहीं दिखा।  जनसंपर्क के दौरान भी लोग नदारद थे।  स्थानीय लोगों के मुताबिक अब राहुल से कोई उम्मीद नहीं रह गई है।  उनका कहना था की उन्होंने कई बार राहुल के सामने अपनी समस्याएं रखी,  लेकिन उन्हें आश्वासन के अलावा कुछ भी नहीं मिला।  हालांकि कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि राहुल अभी भी अमेठी की जनता के दिलों में रहते हैं, जहां तक कार्यक्रम में भीड़ नहीं जुटने की बात है तो यह कार्यक्रम अचानक बना था इसीलिए लोगों को पता नहीं चल सका। अमेठी की जनता और राहुल के बीच दूरी तो बढ़ ही रही है, अमेठी में राहुल से जुड़े विवाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। 

मगर राहुल इन आरोप का सामना करने की बजाये मुंह सिले हुए हैं। अपनी कहना और दूसरे की न सुनने की महारथ रखने वाले कांग्रेस के युवराज अगर अमेठी में अपनी खराब होती छवि को लेकर चिंतित नहीं हैं तो इसकी दो वजह हैं या तो राहुल गांधी ने यह तय कर लिया है कि अब वह अमेठी से अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे (क्योंकि अमेठी में स्मृति ईरानी काफी तेजी से पांव पसार रही हैं) या फिर राहुल के पास उन आरोपों का जबाव नहीं हैं और इसीलिये वह इन मुद्दांे पर बोलकर अपनी और किरकिरी नहीं कराना चाहते हो।

उधर, राहुल के विरोधियों का कहना था कांग्रेस के युवराज को यह बात अच्छी तरह से समझ में आ गई है कि सिर्फ आश्वासन और चिकनी-चुपड़ी बातों  से जनता के दिल में जगह नहीं बनाई जा सकती है।  एक तरफ राहुल अमेठी को भूल पूरे देश की सुध ले रहे हैं तो दूसरी तरफ केन्द्रीय मंत्री और 2014 में अमेठी में राहुल को कड़ी टक्कर देने वाली स्मृति ईरानी लगातार अमेठी में दौरे पर दौरे कर रही हैं। वह अमेठी आने और यहां आकर राहुल गांधी को आईना दिखाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती हैं। उनके दौरे के दौरान भीड़ भी जुटती है और वह क्षेत्रीय जनता का काम भी कर रही हैं। जनता से संवाद बनाने की कला में राहुल और स्मृति में जमीन-आसमान का फर्क है। राहुल युवराज वाली छवि से उभर ही नहीं पा रहे हैं, जिसका खामियाजा उनको उठाना पड़ सकता है। हद तो तब हो गई जब हाल ही में अमेठी से जिला पंचायत अंध्यक्ष के चुनाव में अमेठी के कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी कृष्णा चौरसिया ने पर्चा वापस लेकर समाजवादी पार्टी को वॉकओवर दे दिया। यही हाल सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में भी रहा जहां उनका जिला पंचायत अध्यक्ष की प्रत्याशी जीत को तरस गईं। जिला पंचायत चुनाव चुनाव में कांग्रेस के 22 में से 21 प्रतियाशियों को हार का सामना करना पड़ा। 

अमेठी से लेकर पूरे देश में राहुल जिस तरह की राजनीति कर रहें है उससे पुराने कांग्रेसी काफी चिंतित हैं। इसी लिये  पार्टी के बाहर से ही नहीं भीतर से भी चंद नेता राहुल को आइना दिखाने का काम कर रहे हैं।  हाल ही में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को सलाह दी थी कि संसद में भाजपा को जवाब देने के लिए उन्हें ज्यादा आक्रामक होने की जरूरत है। चव्हाण का कहना था कि राहुल को संसद में ज्यादा बोलने के अलावा अपनी भावभंगिमा पर भी ध्यान देना चाहिए,  ताकि जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता बढ़ सके। संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है। ऐसे में राहुलजी को विषयों पर विस्तार से अपनी बात रखना चाहिए।  एक वाक्य बोलने से हमेशा काम नहीं चलता है।  उन्हें लगातार 45 मिनट से एक घंटे तक बोलना चाहिए। कांग्रेस नेतृत्व के करीबी माने जाने वाले चव्हाण ने कहा कि विपक्ष के नेताओं के लिए संसद ही एकमात्र विकल्प है जहां वे मुद्दों को उठा सकते हैं।  पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि राहुल गांधी को संसद में व्यक्त किए गए विचारों के आधार पर ही जाना जाएगा।

बार-बार फजीहत

मुंबई के प्रबंधन कालेज में सेमिनार से पूर्व नवंबर 2015 में बेंगलुरु के माउंट कार्मल कॉलेज में राहुल का सवाल-जवाब सेशन हुआ था।  उनकी उस वक्त भी काफी किरकिरी हुई थी, जब उनके सवालों पर स्टूडेंट्स ने कहा-हां,  मोदी सरकार की पॉलिसीज काम कर रही हैं।  हालांकि,  इसके बाद राहुल ने चर्चा का रुख ही मोड़ दिया।  जानिए,  आखिर कैसे राहुल और स्टूडेंट्स के बीच सवाल-जवाब हुआ।

राहुल का पहला सवाल-क्या स्वच्छ भारत पर काम हो रहा है ?

स्टूडेंट्स का जबाव-हां।

राहुल का इसी से मिलता-जुलता दूसरा सवाल-मैं तो नहीं देख पा रहा हूं कि स्वच्छ भारत अच्छे से काम कर रहा है।  क्या आपको लगता है कि यह काम कर रहा है?

स्टूडेंट्स का फिर से वही जबाव-हां।

राहुल का तीसरा सवाल- मैं एक और सवाल पूछता हूं।  क्या मेक इन इंडिया से फायदा हुआ ?

स्टूडेंट्स का फिर से वही जबाव- हां।

राहुल- क्या आपको वाकई ऐसा लगता है ?

स्टूडेंट्स- हां।

राहुल का चौथा स्वाल- क्या देश में यंगस्टर्स को नौकरी मिल रही है ?

स्टूडेंट्स का फिर से वही जबाव- हां।

राहुल निरूत्तर हो गये और बोले- मेरे ख्याल से स्वच्छ भारत काम नहीं कर रहा।  मेक इन इंडिया भी काम नहीं कर रहा।  देश के लिए बीजेपी का विजन काम नहीं कर रहा। …खैर जो भी हो।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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सरहद पार फेसबुक का प्यार : पाकिस्तानी प्रेमी के लिये हिन्दुस्तानी युवक ने कराया लिंग परिर्वतन

अजय कुमार, लखनऊ

प्यार अंधा होता है। उसे कुछ दिखाई-सुनाई नहीं देता है। न वह मजहब के दायरे में कैद होता है न किसी तरह की सीमाएं उसे बांध सकती हैं। न कोई प्यार पर पहरा बैठा सकता है,न ही न इसे जुल्मों-सितम से दबाया जा सकता है।  यह बात सदियों से प्रेम करने वालों के लिये कही जाती रही है। चाहें भगवान कृष्ण की दीवानी राधा हो या फिर मीरा।  लैला हो या मजनू, शीरी-फरहाद,हीर-रांझा,सलीम-अनारकली चंद ऐसे नाम हैं जिनकी बेपनाह मोहब्बत ने प्यार को नई ऊंचाइयां दी।  आजकल भी एक ‘मीरा’ का प्यार चर्चा में हैं। 

यह मीरा लखनऊ की है और उसका ‘कृष्ण’ पाकिस्तान में रहता है। अलग-अलग मुल्कांे में रहने वाले इस आशिक जोड़े का प्यार उस समय परवान चढ़ रहा था जब दोनों मुल्कों के बीच तलवारें खिंची हुई थीं। बात पाकिस्तान के एक युवक की हिन्दुस्तान के दूसरे युवक से प्रेम प्रसंग की हो रही है। दोनों युवक थे और एक-दूसरे को प्यार करते थे, लेकिन यह प्रेम समलैंगिक नहीं था। इस बात से काफी लोग अंजान थे तो जिनको कुछ भनक थी,वह इस लिये परेशान थे क्योकि प्रेम कहानी के दोनों किरदार परस्पर दुश्मन मुल्कों के थे।

भारत और पाकिस्तान के तल्‍ख रिश्तों की कहानी किसी से छुपी नहीं है,लेकिन इसके उलट इन दोनों मुल्कों में रहने वालों लोगों की सोच और एक-दूसरे के प्रति प्यार का नजरिया हमेशा से ही सियासी सरहदों से ऊपर रहा है।  ऐसे ही प्यार की एक बुनियाद पिछले कुछ वर्षो से राजधानी लखनऊ मे अंगड़ाई ले रही थी, जहां कथक डांसर गौरव (जो अपनी डांस कला के चलते ‘मीरा’ के रूप में भी पहचाना जाता था) अपने पाकिस्‍तानी प्रेमी रिजवान के लिए सेक्‍स चेंज ऑपरेशन कर गौरव से खूबसूरत युवती आशना बन गया था।

तकरीबन पांच साल पहले पाकिस्तानी युवक रिजवान से फेसबुक पर हुई फ्रेंडशिप के बाद लखनऊ का कथक डांसर गौरव से आशना बन गया। आशना बनने के लिये उसने मुंबई के डॉक्टरों से अपना लिंग परिवर्तन कराया था। पाकिस्तान के रिजवान से अपनी प्रेम कहानी को सही बताते हुए गौरव इस रिश्ते को रुहानी करार देते हुए कहता है,‘पांच वर्ष पूर्व फेसबुक पर रिजवान की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई। रिजवान पाकिस्तान के सिंध के एक सूफी परिवार से ताल्लुक रखता है। मैंने रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली।  धीरे-धीरे हमारी बातचीत होने लगी।  अक्सर सूफिज्म पर बात होती।  यह सिलसिला बढ़ा तो पता ही नहीं चला कि कब उसे मुझसे और मुझे उससे मोहब्बत हो गई। दोनों को एक-दूसरे से मोहब्बत हो गई थी,लेकिन हम लोग कभी मिले नहीं थे, स्काइप चैट पर जरूर हम दोनों ने एक-दूसरे को दो बार पहले देखा था।

अतीत के झरोखे में झांकते हुए गौरव ने बताया,‘ 5 मार्च 2012 को उसने फोन किया। कहा- ‘गौरव, मैं तुमसे निकाह करना चाहता हूं। मुझे भी उससे इश्क हो गया था, अंजाम की फिक्र किए मैंने तुंरत बिना बोल दिया- कुबूल है।’

गौरव बताता हैं, ‘मैं हमेशा से ऐसा नहीं था। मेरी परवरिश एक लड़के की तरह हुई थी। यहां तक कि एक लड़के की तरह ही मैं लड़कियों के साथ अफेयर्स भी करता था। मेरी  पीएचडी चल रही थी। पीएचडी के सिलसिले में मैं सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए पाकिस्‍तान के रिजवान से मिला।  उनका भी टॉपिक सूफीजम से संबंधित था।  इस दौरान दोनों एक दूसरे की काफी मदद करने लगे। समय बीतने के साथ ही रिजवान और मेरे बीच वर्चुअल दोस्ती लंबी चैट से बढ़ती गई।  कुछ वीडियो कॉल के साथ हम लोग एक दूसरे के काफी करीब आ गए।  इस दौरान हम दोनों को ऐसा फील होने लगा कि हम लोग दो शरीर एक आत्मा बन चुके थे।

गौरव अपने प्यार को पाकीजा करार देते हुए कहता हैं कि हमारा रिश्ता जिस्मानी नहीं, रुहानी था, जिसे ज्यादातर लोग नहीं समझ पाते।  वे हमें ‘गे’ ‘समलैंगिक कहेंगे।  ‘रिश्ते की शक्ल’ पर हमारी रिजवान से अक्सर बात होती।  इन सब बातों से मेरा परिवार अंजान था। मैं जानता था कि घर में बताने का मतलब अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना।  इस बीच, मां ने मेरी शादी के लिए लड़की तलाशनी शुरू कर दी।  मैं परेशान रहने लगा।  तब मैने रिजवान से ही इसका हल पूछा तो वो बोला , ‘ हममें से किसी एक को अपना वजूद छोड़कर लड़की बनना होगा।  पहले तो अजीब लगा,काफी सोचा-विचारा। बाद में इंटरनेट पर सेक्स चेंज से संबंधित जानकारियां ढूंढने लगा।  शुरुआती जानकारियों से मैं घबराया तो रिजवान ने कहा तुम परेशान न हो मैं अपना सेक्स चेंज करवा लूगा।

तब मैंने सोचा कि रिजवान क्यों, मैं क्यों नहीं ऑपरेशन करवा सकता हॅू ? लिंग परिवर्तन कराने के लिए घरवालों को मनाना जरूरी था।  इसलिए मैने अपनी बहन अदिति शर्मा (बदला हुआ नाम) से बात की। वह भी कथक की बेहतरीन डांसर थी। उसने पहले तो मुझे समझाया, लेकिन मेरी जिद्द के आगे उसकी एक नहीं चली। मेरी दशा देखकर बाद में वह मेरे से सहमत हो गई और मेरा हौसला भी बढ़ाया।  मां को मनाने की जिम्मेदारी भी उसी ने ले ली।  किसी तरह उन्हें मनाया गया।  गौरव कहता है जब एक बार फैसला हो गया तो फिर उसके बाद मैं इंटरनेट पर डॉक्टर की तलाश में जुट गया।  मुंबई के दो डॉक्टरों से सम्पर्क हुआ। डॉ. मिथिलेश मित्रा जो कि सर्जन थे और दूसरे डॉक्टर अम्या जोशी जो कि हार्मोन ट्रीटमेंट के एक्सपर्ट। उनसे मैंने इस बारे में बात की। बाद में डा0 मिथिलेश से मैंने अपना आपरेशन कराया।

गौरव के शब्दों में, ‘पूरे ऑपरेशन के प्रोसेस में तकरीबन डेढ़ साल का वक्त और करीब आठ लाख रुपये का खर्च आया।  सबसे पहले काउंसलिंग सेशन हुआ।  वहां से हरी झंडी मिलने के बाद सर्जन ने अपना काम शुरू किया। पहली ही काउंसलिंग में डॉक्टर ने इजाजत दे दी, तो ट्रीटमेंट शुरू हो गया।  लिंग बदलवाने के लिये नौ महीने में मेरे तीन मेजर ऑपरेशन हुए।  तीसरा और फाइनल ऑपरेशन नवंबर या दिसंबर 2015 में होना था पर मेरे रिजल्ट अच्छे थे, इसलिए 10 अक्तूबर 2015 को ही अंतिम ऑपरेशन हो गया।  गौरव कहता है,‘यह इत्तेफाक है कि उनका जन्मदिन 10 अक्तूबर को पड़ता है। आशना भी उसी दिन बनी।

गौरव को आशना बनाने वाले मुंबई के सर्जन डॉ. मिथिलेश मित्रा ऑपरेशन के बात स्वीकार करते हुए कहते हैं कि लिंग परिवर्तन के प्रोसेस को मेडिकल साइंस में ‘जेंडर रिअसाइनमेंट सर्जरी’ कहा जाता है।  ऐसे ऑपरेशन आसान नहीं होते, क्योंकि इंसान जिस रूप में पैदा होता है, उसमें संतुष्ट होता है।  कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो अपने शरीर से खुश नहीं होते।  मेडिकल साइंस इतनी एडवांस हो चुकी है कि ऐसे लोगों का ऑपरेशन कर सेक्स चेंज किया जा सकता है।  हालांकि ऐसे केस बहुत रेयर हैं।  मैंने भी अपने कॅरिअर में ऐसे चार-पांच ऑपरेशन ही किए हैं।  जहां तक गौरव की बात है, तो जब वह मेरे पास आए तो मानसिक रूप से लड़की बनने के लिए पूरी तरह से तैयार था।  यही वजह है कि उनका रिजल्ट सबसे कम समय में सबसे अच्छा रहा।  वे काफी अवेयर था।  वह डॉक्टरों की हर बात सुनता और उस पर फॉलो भी करता था।

खैर, बात दोनों के बीच समानताओं की कि जाये तो गौरव और रिजवान की सोच और शौक लगभग एक जैसे हैं। सेक्‍स चेंज कराने के बाद गोपाल से आशना बनी अपनी प्रेमिका से मिलने के लिये रिजवान के मार्च के महीने में पाकिस्‍तान से हिन्दुस्तान आने की संभावना है। गौरव और रिजवान ने फैसला ले लिया है लेकिन गौरव से आशना बनने वाले इस कथक डांसर को लेकर हर कोई काफी चिंतित है। उसके साथी परेशान हैं। आखिर रिजवान और उसके बीच ये रिश्‍ता कैसा होगा? रिजवान कब तक आशना का साथ देगा? यह ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर हर कोई तलाश रहा है।

भले ही गौरव के भविष्य को लेकर उसके घर वाले और यार-दोस्त चिंतित नजर आ रहे हों लेकिन गौरव निश्चिंत है। वह कहता है, ‘रूह तो कब की मिल चुकी है, बस अब तो प्यार को जिस्मानी और सामाजिक मान्यता मिलना बाकी रह गया है।” वह साथ ही जोड़ देता है कि ”मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी।” 

उम्मीद की जानी चाहिए कि गौरव आशना बनकर भी खुश रहेगा, लेकिन गौरव के आशना बनने से लखनऊ को बड़ा नुकसान हुआ है। गौरव न केवल कथक का बेहतरीन डांसर है, बल्कि वह इस पर कई किताबें भी लिख चुका हैं। प्यार होने से पहले तक गौरव लखनऊ के कथक घराने पर रिसर्च की तैयारी में था। जिंदगी में आए इस नए मोड़ ने उसकी इस योजना को फिलहाल विराम दे दिया है। आशना बने गौरव का प्रेमी रिजवान जो वजीर आबरू कराची सखर सिंध में रहता है, का कहना था, ‘‘इंशा अल्लाह मैं मार्च में हिंदुस्तान आऊंगा, पूरी कोशिश करूंगा लखनऊ की उस पाक जमीन को चूम सकूं जहां मेरा महबूब पैदा और बड़ा हुआ।”

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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यूपी के आला पुलिस अफसरों ने खाकी को चुल्लू भर पानी में डुबोया

उत्तर प्रदेश में खाकी अपनी करतूतों के चलते अक्सर ही शर्मसार होती रहती है, लेकिन जब भ्रष्टाचार के आरोप विभाग के मुखिया पर ही लगे तो हालात कितने खराब हैं, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। खाकी पर अबकी से उसके दो ‘हाकिमों’ (पूर्व पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी) के कारण दाग लगा है। दोनों डीजीपी ने अपनी तैनाती के दौरान ट्रांसफर-पोस्टिंग को धंधा बना लिया।

इस धंधे से इन अधिकारियों ने करोड़ों की दौलत बटोरी। आगरा के जालसाज सपा नेता शैलेंद्र अग्रवाल से हाथ मिला कर प्रदेश के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक एसी शर्मा के साथ-साथ एएल बनर्जी ने डीजीपी रहते खूब मनमानी की। यह राज खुलता भी नहीं लेकिन शैलेंद्र जब पुलिस की ही नजरें टेड़ी हुईं तो उसके मोबाइल ने भ्रष्टाचार का सारा राजफाश कर दिया। जिससे पता चला कि कथित सपा नेता ने प्रदेश भर के दारोगाओं के प्रमोशन डीजीपी एएल बनर्जी और एसी शर्मा से कराए, जिसमें प्रत्येक का रेट आठ लाख रुपये तय था। कभी इन पुलिस महानिदेशकों के अधीन काम कर चुके पुलिस के अधिकारी कहते हैं शैलेन्द्र और दोनो तत्कालीन हाकीमों के बीच करीब 3.20 करोड़ रुपये का लेनदेन हुआ। 

प्रदेश में सपा सरकार में बड़े पैमाने पर दारोगाओं के प्रमोशन हुए। इनमें रेग्यूलर के सात आउट ऑफ टर्न प्रमोशन भी हुए थे। जेल में बंद शैलेंद्र अग्र्रवाल इन प्रमोशन के लिए डीजीपी और दारोगाओं के बीच की कड़ी बन गया था। उसकी नजदीकी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दोनों हाकिमों ने 15 अक्टूबर 2014 को मोबाइल पर एसएमएस के जरिए ही तबादलों के रेट तय कर दिये।शैलेंद्र ने एसएमएस के  जरिये तबादले का रेट सात लाख रुपये रखने का प्रस्ताव रखा तो डीजीपी ने एक लाख और बढ़ा दिए। अब तक की जांच से खुलासा हुआ है कि सपा नेता के माध्यम से प्रदेश में करीब 40 दरोगाओं को प्रोन्नति देकर इंस्पेक्टर बनाया गया।ये सभी वे दारोगा थे जो प्रमोशन के लिये अधिकतर मानकों को पूरा तो करते थे लेकिन छोटी-मोटी जांचों के कारण या तो उनके प्रमोशन की फाइल बंद पड़ी थी या उसकी गति धीमी थी।परंतु सपा नेता के बीच में पड़ते ही  इन सभी फाइलों ने रफ्तार पकड़ ली और इन दरोगाओं को प्रमोशन भी मिल गया।सूत्रों के अनुसार 40 दारोगाओं से लिए पूर्व डीजीपी को 3.20 करोड़ रुपये दिए गये। इसके अलावा शैलेंद्र ने अपना कमीशन अलग से वसूला। 

गौरतलब हो आईजी (नागरिक सुरक्षा) अमिताभ ठाकुर ने  बनर्जी व शर्मा पर पोस्टिंग, प्रमोशन और गंभीर अपराधों की जांच बदलवाने के नाम पर 7-25 लाख रुपये तक की घूस लेने का आरोप लगाया था। आईजी ने आगरा में गिरफ्तार किए गए जालसाज शैलेन्द्र अग्रवाल के लैपटॉप व मोबाइल फोन की फरेंसिक जांच के बाद सामने आए तथ्यों के आधार पर ये आरोप लगाए थे। कानून व्यवस्था का राज स्थापित करने और अपराध पर अंकुश लगाने का दायित्व निभाने वाले शीर्ष पुलिस अधिकारी जब इस तरह घपलों-घोटालों के आरोपों से घिरे हांेगे तो इनके द्वारा अपना कर्तव्य कितनी निष्ठा से निभाया जाता होगा ? बहरहाल,इस मामले में अंतिम जांच परिणाम क्या आएंगे और किस गति को प्राप्त होंगे, यह भविष्य के गर्भ में है किंतु जितने तथ्य उजागर हुए हैं, उससे न केवल पूरा विभाग शर्मसार हुआ है बल्कि सरकार भी अपनी जवाबदेही और जिम्मेदारी से बच नहीं पा रही है।आगरा जेल में बंद एक दलाल नेता दो पूर्व महानिदेशकों के साथ मिलकर पुलिस महकमे में पैसे लेकर प्रोन्नति के काम में लगा था। पहले राज खुला कि उसके संबंध एक पूर्व पुलिस महानिदेशक से थे लेकिन अब जांच आगे बढ़ी तो एक और पूर्व महानिदेशक से भी संबंध उजागर हुए हैं। हालांकि, पहले दोनों ने ही अपने संबंध से इन्कार किया पर जब तथ्य सार्वजनिक हुए तो कहा कि उसके संबंध सभी से थे। उसका अक्सर पुलिस मुख्यालय आना जाना था। अफसर उसके साथी और कनिष्ठ उसके दबाव में रहते थे।वैसे,यह नहीं कहा जा सकता कि पूरा महकमा ही दागदार है। आखिर, दलाल नेता को जेल पहुंचाने और दलाली के तथ्य उजागर करने वाले भी इसी महकमे के लोग हैं।

ओहदेदार पदों पर बैठे खाकी वर्दी वालों द्वारा महकमें को कलंकित किये जाने से आईपीएस एसोसियेशन को अपनी छवि की चिंता सताने लगी है जो जायज भी है।मामला खुलने के बाद निष्पक्ष जांच और ऐसे दागी अफसरों को चिह्न्ति कर जेल भिजवाने की जिम्मेदारी अब सरकार पर ही है।अफसरों की पोस्टिंग और प्रमोशन को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे दोनों पूर्व डीजीपी के खिलाफ आईपीएस एसोसिएशन ने भी मोर्चा खोल दिया है। गाजियाबाद के एसएसपी धर्मेन्द्र यादव ने एसोसिएशन से दोनों अधिकारियों के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाने की मांग की थी। इसके बाद एसोसिएशन ने बैठक बुलाई और मसले पर चर्चा हुई।एसोसिएशन ने मुख्य सचिव व डीजीपी से दोनों अफसरों के खिलाफ जांच करवाकर कार्रवाई की मांग की है। आईपीएस एसोसिएशन के सदस्य धर्मेन्द्र यादव ने संगठन के सचिव आईजी एसटीएफ सुजीत पांडेय को पत्र लिख कर मांग रखी है कि एसोसिएशन की मीटिंग में भ्रष्टाचार के कारण चर्चा में आए दोनों पूर्व डीजीपी के नाम उजागर किए जाएं और उनके खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया जाए।मीटिंग के बाद एसोसिएशन के उपाध्यक्ष जाविद अहमद और सचिव सुजीत पांडेय ने मुख्य सचिव आलोक रंजन और डीजीपी एके जैन से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि एसोसिएशन सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही मुहिम का पुरजोर समर्थन करती है।जबकि डीजीपी एके जैन ने भी डीआईजी रेंज आगरा लक्ष्मी सिंह के साथ जालसाज शैलेन्द्र अग्रवाल और उससे जुड़े मुकदमों व शिकायतों पर हो रही कार्रवाई व जांच की समीक्षा की। उन्होंने डीआईजी रेंज को निर्देश दिए हैं कि आरोपित किसी भी स्तर का हो, उसे बख्शा नहीं जाए। 

बात शैलेन्द्र की कि जाये तो वह दो पूर्व डीजीपी का ही दलाल नहीं था, बल्कि उसके फंदे में एक दर्जन से ज्यादा आईएएस व आईपीएस थे। शैलेंद्र ने आम लोगों को ठगा तो अफसरों को भी तगड़ी चपत लगाई।आम लोग तो मुकदमा लिखाने आगे आ भी गए लेकिन अफसर हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। अभी तक शैलेंद्र के खिलाफ 27 मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। इसमें एक मुकदमा लखनऊ निवासी रिटायर डीआईजी अनिल दास की पत्नी संगीता दास ने लिखाया था। आगरा में तैनात रहे एक आईएएस के दो करोड़ रुपये शैलेंद्र डकार गया था। पैसा नंबर दो का था इसलिए वे तगादा नहीं कर पाए।शैलेन्द्र ने कई बड़े नेताओं को भी अपने जाल में फंसा रखा था। सपा के अलावा बसपा के शासन में भी उसकी खूब धमक थी। सूत्रों की मानें तो लखनऊ के एक होटल में उसके नाम से हमेशा कमरे बुक रहते थे। वहां सिर्फ शैलेंद्र अग्रवाल का नाम लेना होता था।शैलेंद्र पहले गिफ्ट देकर अफसरों से दोस्ती करता था। फिर वह उन्हें अपनी आलू की स्कीम समझाता था। भरोसा देता था कि पैसा तो मैं लगा दूंगा, बस कुछ काम आप करा देना। उसके बदले जो रकम आएगी वह उसे आलू स्कीम में लगा देगा। बदले में नंबर एक में फर्म के चेक से रुपए देगा। अफसर उसके झांसे में फंस जाते थे। वह अफसरों की पत्नियों को भी महंगे उपहार देता था।शैलेन्द्र गनर के साथ चलता था और बसपा राज में भी उसने अपने आप को आलू का करोबारी बन कर अपने पैर सत्ता के गलियारों में पसार रखे थे।

इस संबंध में पुलिस महकमे के रिटायर्ड अफसरों का कहना  था कि  सरकारें चाहें किसी भी दल की हों,वह डीजीपी की तैनाती पुलिस सुधार के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक लाभ और अपने करीबियों को फायदा पहुंचाने के लिए करती हैं। तीन साल के कार्यकाल में सात डीजीपी बदले जाएंगे तो ऐसे ही आरोप लगेंगे। एक और दो माह के लिए डीजीपी बनाए जा रहे हैं। ईमानदार अफसरों को सिर्फ इसलिए डीजीपी नहीं बनाया जा रहा है कि वे सरकार के मुताबिक काम नहीं करेंगे। रिटायर डीजीपी श्रीराम अरुण का कहना है कि पहली बार डीजीपी स्तर के अफसर पर इस तरह आरोप लगे हैं। जब तक सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक तय प्रक्रिया और साफ छवि वालों को नहीं चुना जाएगा तब तक हालात नहीं सुधरेंगे।वहीं एक अन्य रिटायर पुलिस अफसर का कहना है कि उत्तर प्रदेश में अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप मायने नहीं रखते हैं। करीब 18 साल पहले आईएएस असोसिएशन ने तीन सबसे भ्रष्टतम अफसरों को चुनकर उनकी सूची जारी की थी। लेकिन इनमें से दो को सरकार ने मुख्य सचिव के पद से नवाज था। इसी तरह आईपीएस अफसरों में भी है। कई अफसरों को तमाम आरोपों में घिरे होने के बाद भी महत्वपूर्ण तैनातियां दी गईं। अयोग्य होते हुए भी डीजीपी बनाया गया। एक अन्य रिटायर पुलिस अफसर का कहना था कि जब विश्व की सबसे बड़ी फोर्स का मुखिया ही भ्रष्ट हो जाएगा तो फोर्स का क्या होगा। पुलिस में निचले स्तर पर भ्रष्टाचार के मामले सामने आते रहते हैं।पूर्व डीजीपी एसी शर्मा पर डीजीपी रहने के दौरान भी भ्रष्टाचार का आरोप लगा था। अलीगढ़ पीएसी में तैनात डिप्टी एसपी बीके शर्मा ने आरोप लगाया था कि डीजीपी एसी शर्मा पोस्टिंग के नाम पर घूस लेते हैं। बीके शर्मा का आरोप था कि जब वह घूस नहीं दे पाए तो कुछ दिन के अंदर ही उनका पांच बार तबादला किया गया।

शैलेन्द्र के समाजवादी पार्टी का नेता होने की लगातार चर्चा के बीच सपा के प्रवक्ता और मंत्री राजेन्द्र चैधरी ने सफाई दी है कि शैलेन्द्र से सपा का कोई लेना-देना नहीं है, न ही शैलेन्द्र समाजवादी पार्टी का नेता है।वहीं भाजपा का आरोप है कि बिना सरकारी मदद के कोई व्यक्ति तबादला-पोस्टिंग का इतना बड़ा नेटवर्क नहीं चला सकता है।

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बेइन्तहा पैसे वाली हो गई डाक कर्मचारी की बेटी मायावती पर टिकट बेचने को लेकर चौतरफा हमला :

: बसपा से बिदकते नेताओं की भाजपा पहली पसंद : बसपा सुप्रीमो मायावती के ऊपर एक बार फिर टिकट बेचने का गंभीर आरोप लगा है।यह आरोप भी पार्टी से निकाले गये बसपा के एक कद्दावर नेता ने ही लगाया है।मायावती के विरोधियों और मीडिया में अक्सर यह चर्चा छिड़ी रहती है कि बसपा में टिकट वितरण में खासकर राज्यसभा और विधान परिषद के चुनावों में पार्दशिता नहीं दिखाई पड़ती है। विपक्ष के आरोपों को अनदेखा कर भी दिया जाये तो यह बात समझ से परे हैं कि बसपा छोड़ने वाले तमाम नेता मायावती पर टिकट बेचने का ही आरोप क्यों लगाते हैं। किसी और नेता या पार्टी को इस तरह के आरोप इतनी बहुतायत में शायद ही झेलने पड़ते होंगे। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि धुआ वहीं से उठता है जहां आग लगी होती है। आरोप लगाने वाले तमाम नेताओं की बात को इस लिये भी अनदेखा नहीं किया क्योंकि यह सभी नेता लम्बे समय तक मायावती के इर्दगिर्द रह चुके हैं और उनकी कार्यशैली से अच्छी तरह से परिचित हैं।

पूर्व सांसद धनंजय सिंह को बाहर का रास्ता दिखाने से मायावती ने शुरूआत की थी। उसमें नित नये नाम जुड़ते जा रहे हैं। वह भी विदादों के साथ। हाल में ही अखिलेश दास ने बसपा छोड़ते हुए आरोप लगाया था कि मायावती पैसे लेकर टिकट बेचती हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी बताया था कि उनसे कितनी रकम मांगी गई है। अखिलेश दास के बारे में तो यह भी चर्चा थी कि इससे पहले भी उन्होंने धनबल के सहारे राज्यसभा की सीट हथियाई थी। अखिलेश का बसपा की विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है। वह राज्यसभा का टिकट लेने के लिये बसपा में आये थे। पहली बार तो इसमें वह कामयाब भी रहे। दूसरी बार बात नहीं बनी तो उन्होंने बसपा सुप्रीमो मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाते हुए बसपा से किनारा कर लिया। इसके बाद माया के करीबी दलित नेता और राज्यसभा सदस्य जुगल किशोर ने बसपा से किनारा किया तो उनके भी सुर अखिलेश दास जैसे ही थे। जुगल किशोर का भी कहना था कि बसपा में में पैसे का बोलबाला है। बीएसपी में पैसे लेकर टिकट दिए जाते हैं।

पार्टी से निकाले जाने के बाद जुगल किशोर ने मायावती पर संगीन इल्जाम लगाए हैं। उन्होंने कहा है कि मायावती दलित की नहीं दौलत की बेटी हैं। उन्होंने मायावती के खिलाफ भंडाफोड़ अभियान छेड़ते हुए कहा कि मायावती कभी किसी दलित नेता के घर नहीं जातीं। पार्टी कार्यकर्ताओं के परिवार में मौत हो, तब भी नहीं पूछतीं। जुगलकिशोर ने आरोप लगाते हुए कहा एक डाक कर्मचारी की बेटी इंतहा पैसे वाली हो गई। उनके परिवार का हर सदस्य करोड़पति हो गया है। हकीकत है कि जुगलकिशोर कई राज जानते हैं और वे मायावती व दलित वोटों के बीच सेतु रहे हैं। इस सबसे बसपा की अंदरूनी बदहाली का साफ पता पड़ता है। लोकसभा चुनाव में बुरी हार के बाद मायावती ने ब्राह्यण आधार और नेताओं की उपेक्षा शुरू की। सिर्फ दलित नेताओं को महत्व दिया। लेकिन जुगलकिशोर के साथ उन्होंने जो किया है उससे दलित आधार खिसकने की बीज पड़ गए हैं। उत्तरप्रदेश में अकेले दलित आधार से यों भी बसपा जीरो हैसियत में आई हुई है।

देश के सबसे बड़े प्रदेश और सबसे बड़े वोट बैंक में मायावती की जो दुर्दशा है वह राजनीति की इस हकीकत को बयां करती है कि उसमें कुछ भी स्थाई नहीं होता। घटते आधार के बीच मायावती अपनी कोर टीम में भी अलोकप्रिय हो रही है यह जुगल किशोर के बयानों से जाहिर है। वैसे तो ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियों के हालात खराब हैं, लेकिन देश के सबसे बड़े राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार पांच साल चलाने के बाद आज बहुजन समाज पार्टी जिस हालत में है, उसे देख कर कहा जा सकता है कि उसकी स्थिति सबसे खराब है। विधानसभा में उसे 80 सीटें मिलीं, लेकिन उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। बसपा की हालत सिर्फ उत्तर प्रदेश में नहीं बिगड़ी है, बल्कि उन दूसरे राज्यों में भी, जहां वह एक बड़ी ताकत रही है, वहां भी उसका वोट आधार खिसक गया है।
सूत्रों के मुताबिक जुगल किशोर बीजेपी में जा सकते हैं। जुगल किशोर का कहना था कि उनका बेटा 2012 में विधानसभा चुनाव लड़ना चाहता था। इस दौरान उनसे पैसे मांगे गए थे। बेटे ने यह रकम देने से मना कर दिया, तो उसे टिकट नहीं मिला।

किशोर ने बताया कि कांशीराम के जीवित रहने तक पार्टी में ऐसा नहीं होता था। उनके मुताबिक, बीते कुछ सालों से ही पार्टी में यह प्रथा शुरू हुई है।  मामला अभी ठंडा भी नहीं हो पाया था कि पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद ने मायावती पर निशाना साधते हुए तमाम गंभीर आरोप लगा दिये। दद्दू ने कहा कि बसपा के डूबने से पहले मायावती उसे पूरी तरह बेचने में लगी हैं। वह बसपा से बाहर हुए नेताओं को एक मंच पर लाकर कांशीराम की विचारधारा आगे बढ़ाने को बहुजन समाज बनाएंगे। कांशीराम के मिशन को छोड़ मायावती जो कुछ कर रही हैं उससे बसपा बचने वाली नहीं है। पूर्व में पार्टी से अलग हुए नेताओं की तरह दद्दू ने भी मायावती पर करोड़ों रुपये में टिकट बेचने का आरोप लगाते हुए कहा कि कांशीराम के मूल सिद्धांतों से हटकर अब वह समाज को बेच रही हैं। दद्दू ने बताया कि पार्टी में लोकतंत्र तो है नहीं, नेता विरोधी दल स्वामी प्रसाद मौर्य तक के बोलने पर मायावती ने उन्हें सबके सामने न केवल डांट दिया बल्कि टिकट काटकर उनके कुशीनगर जाने पर भी रोक लगा दी। बसपा से निष्कासन के एक दिन बाद भी दद्दू प्रसाद ने मायावती पर निशाना साधते हुए उन पर इसी तरह के  गंभीर आरोप लगाए। कहा कि वह भाजपा या किसी दूसरी पार्टी में नहीं जा रहे हैं। दद्दू ने बताया कि 15 मार्च को वह कांशीराम के जन्मदिन पर लखनऊ में संगोष्ठी करने के साथ ही उनके विचारों की पुस्तक जारी करेंगे।

पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद के आरोपों का जवाब देने को बसपा विधान मंडल दल नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने मोर्चा संभाला। बसपा प्रमुख मायावती पर लगाए तमाम आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए दद्दू प्रसाद को अपने दामन में झांकने की सलाह दी। मौर्य ने पत्रकारों को बताया कि दद्दू प्रसाद की स्थिति खिसियाई बिल्ली खंभा नोचे जैसी है। निष्कासित होने के बाद दद्दू प्रसाद उस पार्टी और नेता पर आरोप लगा रहे हैं जिसने तीन बार उन्हें विधायक बनाया व मंत्री पद भी दिया। स्व. कांशीराम ने सार्वजनिक तौर पर मायावती को पार्टी और मिशन की कमान सौंपी थी, इसमें जबरदस्त कामयाबी भी मिली है। पार्टी से निष्कासित होने वाले नेता ही अंगूर खट्टे बताने वाली लोमड़ी की तर्ज पर अपनी भड़ास निकालते रहे हैं। बसपा में टिकट बेचने जैसी परंपरा नहीं रही। मौर्य पर भी जल्द कार्रवाई होने की दद्दू प्रसाद द्वारा जतायी गई संभावना के सवाल को हास्यास्पद करार देते स्वामी प्रसाद ने कहा कि दद्दू प्रसाद अपने आप को देखें।

बसपा में भगदड़ सी मची है तो दलित और पिछड़े वोटों के लिये हाथ-पैर मार रही भाजपा की लाटरी खुल गई है। बसपा से निकाले या उसे छोड़ने वाले नेताओं की भाजपा शरणस्थली बनी हुई है।दिग्गज बसपा नेता जुगल किशोर,पूर्व सांसद रमाशंकर राजभर और अखिलेश दास के भाजपा में जाने की चर्चा के बीच बसपा से निकाले गये दारा सिंह चौहान ने कांग्रेस में जाते-जाते भाजपा का दामन थाम भी लिया है। चौहान को पूर्व केन्द्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता बेनी प्रसाद वर्मा अपनी पार्टी में लाना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस की दुर्दशा के चलते चौहान ने भाजपा में आना ज्यादा मुनासिब समझा। दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में दारा सिंह चैहान भाजपाई हो गये। कभी बसपा सुप्रीमो मायावती के करीबी रहे दारा सिंह चैहान 15 वीं लोकसभा में बसपा संसदीय दल के नेता हुआ करते थे। पूर्वांचल में अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले दारा सिंह चौहान पिछड़ी जाति चौहान-नोनिया समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। बसपा में दारा सिंह की गिनती बेदाग नेताओं में हुआ करती थी। बताते हैं कि 2017 के चुनाव करीब आते-आते बसपा के कई और बड़े नाम भाजपा के साथ जुड़ सकते हैं। इसमें कुछ विधायक भी शामिल हैं जिन्हें लगता है कि अब ‘हाथी’ कमजोर हो गया है उसकी सवारी करना नादानी होगी।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट.

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2017 का विधानसभा चुनाव जातिवादी राजनीति के सहारे नहीं जीता जा सकेगा, अखिलेश यादव को अहसास हो गया

अजय कुमार, लखनऊ

एक वर्ष और बीत गया। समाजवादी सरकार ने करीब पौने तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया है। 2014 सपा को काफी गहरे जख्म दे गया। लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार ने धरती पुत्र मुलायम को हिला कर रख दिया। पार्टी पर अस्तित्व का संकट मंडराने लगा है। अगर जल्द अखिलेश सरकार ने अपना खोया हुआ विश्वास हासिल नहीं किया तो 2017 की लड़ाई उसके लिये मुश्किल हो सकती है। अखिलेश के पास समय काफी कम है। भले ही लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के पश्चात समाजवादी सरकार ने अपनी नीति बदली ली है, लेकिन संगठन वाले उन्हें अभी भी पूरी आजादी के साथ काम नहीं करने दे रहे हैं। सीएम अखिलेश यादव अब मोदी की तरह विकास की बात करने लगे हैं लेकिन पार्टी में यह बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है। मुलायम अभी भी पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं। निश्चित ही 2015 खत्म होते ही तमाम दलों के नेता चुनावी मोड में आ जायेंगे। भाजपा तो वैसे ही 2017 के विधान सभा चुनावों को लेकर काफी अधीर है, बसपा और कांग्रेस भी उम्मीद है कि समय के साफ रफ्तार पकड़ लेगी। फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि कांग्रेस ही नहीं सपा-बसपा भी 2014 में अर्श से फर्श पर आ गये।

बात सपा के संकट की कि जाये तो चाहें सपा हो या अन्य कोई दल उसे कमोवेश सत्ता विरोधी लहर का खामियाजा भुगतना ही पड़ता है, अखिलेश सरकार भी इससे अछूती नहीं रह पायेगी। बदले राजनैतिक परिदृश्य में सपा के लिये भाजपा और मोदी से निपटना टेड़ी खीर लग रहा है। मोदी ने यूपी के तमाम गैर भाजपाई नेताओं की नींद उड़ा दी है। कांग्रेस पर इसका सीधा प्रभाव पड़ा है। वहीं मुलायम-माया जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों को भी अपनी सियासत बचाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा है। सपा का ग्राफ गिर रहा है वहीं केन्द्र में सत्ता हासिल करने के बाद आत्म विश्वास से लबरेज ‘भाजपा ब्रिगेड’ एक के बाद एक राज्य में भी जीत का परचम लहराती जा रही है। उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं रहा है। लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार ने सपा-बसपा के सूरमाओ को मुंह दिखाने लायक नहीं रखा। भला हो उप-चुनावों का जो सपा की थोड़ी-बहुत साख लौट आई। परंतु इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता है कि बीजेपी से भयभीत सपा-बसपा को भाजपा और मोदी का कोई तोड़ नहीं समझ आ रहा है। लोकसभा चुनाव में खत्म हो गई बसपा फिर से खड़ी होने की जददोजहद में लगी है तो समाजवादी सरकार और संगठन वैचारिक रूप से दो धड़ों में बंटा नजर आ रहा है। यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि भले ही सपा सरकार और संगठन का एकमात्र लक्ष्य 2017 के विधान सभा चुनाव जीतना है,लेकिन जीत हासिल करने के लिये दोनों अलग-अलग रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं।समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव राज्य में विकास की गंगा बहा कर 2017 का लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं। औद्योगिक घरानो को यूपी में लाने का प्रयास,लखनऊ में आईटी हब बनाने या मेट्रो लाने का काम।सरकारी मशीनरी में तेजी लाने की कोशिश के साथ अखिलेश अपनी सरकार की छवि सुधारने की कोशिश में भी लगे हुए जिस पर उन्होंने लोकसभा चुनाव होने तक ध्यान नहीं दिया था। छवि सुधारने के लिये सीएम ने दागी छवि वाले दर्जा प्राप्त दर्जनों मंत्रियों को एक ही झटके में चलता कर दिया। अभी भी सरकारी स्तर पर उन नेताओं की तलाश जारी रखे हैं जिनके कारण सरकार की छवि कानून व्यवस्था सहित तमाम मोर्चो पर धूमिल हो रही है।

दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव में मोदी के हाथों पिटे और मात्र 05 सीटों पर सिमट गये सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव परम्परागत रूप से जातीय गणित की राजनीति में उलझे हुए हैं। इस बात का अहसास उप-चुनावों और उसके बाद राज्यसभा के लिये प्रत्याशी तय करते समय नेताजी करा भी चुके हैं। सपा यादवों और मुस्लिमों को अपना वोट बैंक मानती है,इसी लिये पार्टी में उन्हे तरजीह मिलती है। इसी को ध्यान में रखते हुए मुलायम ने राज्यसभा चुनाव में भी छहः में से चार सीटें यादवों-मुसलमान(दो-दो) प्रत्याशियों के नाम कर दी। वहीं कुर्मी वोटों को सहेजने के चक्कर में मुलायम ने लखीमपुर खीरी की राजनीति में वजनदार माने जाने वाले रवि प्रकाश वर्मा को राज्यसभा भेजनेे का मन बनाया। सपा ने जिस एक मात्र राजपूत नीरज शेखर को राज्यसभा भेजा उसकी पहचान राजपूत से अधिक पूर्व सांसद और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चन्द्रशेखर के बेटे के रूप में अधिक होती है। नीरज को राज्यसभा भेजकर मुलायम ने चन्द्रशेखर जी से अपने रिश्तो का सम्मान रखा। प्रत्याशी तय करते समय मुलायम ने साफ संकेत दिया कि उनकी नजर 2017 के विधान सभा चुनाव पर लगी है।

खासकर,मुस्लिम वोटों पर पकड़ बनाये रखने के लिये मुलायम सिंह यादव ने लम्बे समय से नाराज चल रहे सपा के कद्दावर नेता और अखिलेश कैबिनेट में मंत्री आजम खॉ की पत्नी को राज्यसभा का टिकट देकर यह पूरी तरह से साबित कर दिया कि उनकी राजनीति अभी भी जातिवाद पर ही टिकी हुई है। उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि आजम खॉ अपनी राजनीति चमकाने के लिये कभी अमर सिंह पर तो कभी जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी के नाम पर भड़क जाते हैं तो कभी जावेद अली खान को राज्यसभा का टिकट मिलने से उनका पारा चढ़ जाता हैं। शिया धर्मगुरू मौलान कल्बे जव्वाद से तो आजम का विवाद इतना बढ़ा की सड़क तक पर आ गया।मुलायम ने भले ही आजम को अपनी आंख का तारा बना रखा हो, लेकिन अखिलेश के साथ ऐसा नहीं है। सपा सरकार चला रहे अखिलेश यादव का भरोसा आजम खॉ से अधिक अपने मंत्री अहमद हसन जैसे मुस्लिम नेताओं पर है जो सीएम के विकास के एजेंडे को सलीके से आगे बढ़ा रहे हैं, जबकि आजम खॉ साहब अपना महकमा कायदे से संभालने की बजाये विभागीय अधिकारियों/कर्मचारियों में उलझे रहते हैं। आजम के विभाग में विकास के कौन से काम हो रहे हैं, इसके बारे में भले ही किसी को न पता हों, हां कहीं नफरत फैलाने का मौका मिल जाये तो इस मौके का फायदा उठाने से आजम खॉ जरा भी नहीं चूकते हैं। आजम के विवादास्पद बयानों के चलते चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव के समय उनके प्रचार पर रोक तक लगा दी थी।

ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव को तो इस बात का अहसास हो गया है कि 2017 का विधान सभा चुनाव जातिवादी राजनीति के सहारे नहीं जीता जा सकेगा। इसकी वजह भी है भाजपा अपनी छवि तेजी से बदल रही है।मुसलमानों के बीच मोदी और भाजपा को लेकर गैर भाजपाई नेताओं ने जो हौवा खड़ा किया था,वह अब धीरे-धीरे बदलने लगा है। मुसलमान भी तरक्की पंसद हो गया है।अगर ऐसा न होता तो दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैय्यद अहमद बुखारी द्वारा अपने बेटे शाबान बुखारी के इमाम के पद पर दस्तारबंदी के कार्यक्रम के समय पाक के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बुलाये जाने और मोदी को न्योता नहीं देने की घटना पर मुस्लिम समाज में मोदी के पक्ष में इतनी तीखी प्रतिक्रिया नहीं होती। यहॉ तक की मुस्लिम की सबसे बड़ी धार्मिक और सामाजिक संस्था दारूल उलूम तक ने इस मसले पर बुखारी का पक्ष लेने की बजाये चुप्पी साधे रखना ही बेहतर समझा। दारूल उलूम के मोहमिम मुफ्ती अबुल कासिम नौमानी ने इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी भले नहीं की लेकिन इशारों-इशारों में मोदी का पक्ष जरूर लिया। नौमानी ने मोदी के आमंत्रित नहीं किये जाने को सियासी स्टंट करार देते कहा कि हमने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कई कदमों की खुल कर सराहना की है। आखिर वे भारत के चुने हुए प्रधानमंत्री हैं और भारत एक लोकतांत्रिक देश है।उनका कहना था दारूल उलूम शाही इमाम की ओर से पैदा किये गये विवाद से खुद को नही जोड़ना चाहता है।

बहरहाल,तमाम किन्तु-परंतुओ के बीच सच्चाई यह भी है कि तमाम कोशिशों के बाद भी समाजवादी सरकार जनता के बीच  अपनी विश्सनीयता को बरकरार नहीं रख पा रही है।मोदी मैजिक के चलते सपा सरकार और संगठन पर अस्तित्व का खतरा मंडराने लगा हैं।हालात यह हैं कि लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद उप-चुनावों में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद सपाई सहमे हुए हैं।सपा के भीतर उप-चुनाव की सफलता से जो उत्साह का माहौल बना था उसेे महाराष्ट्र-हरियाणा में भाजपा के शानदार प्रदर्शन और समाजवादी प्रत्याशियों की दुर्दशा ने महीने भर के अंदर ही फीका कर दिया।महाराष्ट्र और हरियाणा में सपा की दुर्दशा तब देखने को मिली जबकि कुछ दिनों पूर्व लखनऊ में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में पार्टी को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी का दर्जा दिलाने की चाहत कई नेता मंच पर उजागर कर चुके थे।

बात निकले और सपा के साथ बसपा की न हो, ऐसा नहीं हो सकता है।दोनों की राजनीति करीब-करीब एक की दिशा पर चलती है,लेकिन आश्चर्य तब होता है जब यह देखने में आता है कि अपने ओजस्वी भाषणों से मुलायम और मायावती जैसे नेता यूपी की राजनीति में तो धूमकेतु की तरह चमकते रहते हैं,लेकिन यूपी से बाहर के मतदाताओं द्वारा सिरे से उनकी अहमियत को बार-बार नकार दिया जाता है।यूपी के बाहर न तो मुलायम का मुस्लिम और पिछड़ा कार्ड काम आता है और न ही बसपा सुप्रीमों मायावती दलित वोटरों को लुभा पाती हैं जिनके सहारे वह यूपी में वर्षाे तक राज कर चुकी हैं।ताज्जुब तो इस बात का है कि उत्तर प्रदेश और दिल्ली में कांग्रेस के दिग्गज नेता सपा-बसपा का सहारा ले लेते हैं,लेकिन उत्तर प्रदेश से बाहर कांग्रेस सहित कोई भी दल मुलायम-माया के साथ गठबंधन या साथ चलने को तैयार नहीं होता है।महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस से हाथ मिलाकर चुनाव लड़ने की काफी कोशिश की लेकिन उसे सफलता हाथ नहीं लगी।शुरू-शुरू में जरूर इस बात की चर्चा हुई थी कि कांग्रेस-सपा के बीच गठबंधन हो गया है,परंतु बाद में कांग्रेस इस गठबंधन से मुकर गई।यह सब तब हुआ जबकि कांग्रेस की महाराष्ट्र में हालत पतली थी और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस से उसका 15 वर्ष पुराना नाता टूट चुका था।हॉ,वोट प्रतिशत के मामले मंे जरूर बसपा की स्थिति सपा से बेहतर रहती हैै।महाराष्ट्र और हरियाणा की नाकामयाबी के बाद सपा ने झारखंड और जम्मू-कश्मीर विधान सभा चुनाव में भी अपने प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर दी है।देखना होगा कि आगे चलकर हालात कुछ बदलते हैं या फिर एक बार फिर महाराष्ट्र-हरियाणा दोहराया जायेगा।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को कई बार झूल चटा चुके यह दल अगर अन्य राज्यों में सफल नहीं होते हैं तो इसकी प्रमुख वजह है,इन दलों की सोच का दायरा काफी तंग होना।सपा-बसपा नेता चुनाव तो लड़ते हैं लेकिन उनके पास वीजन का अभाव रहता है।यूपी की तरह अन्य राज्य शैक्षिक,सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए नहीं हैं जो आंख मूंद कर नेताओं पर भरोसा कर लें।समाजवादी पार्टी के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष अबू आजमी ने महाराष्ट्र की राजनीति को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश तो बहुत की लेकिन वह सफल नहीं हो पाये।इसे इतिफाक ही कहा जायेगा कि यूपी में तो सपा-बसपा अपनी प्रतिद्वंदी भाजपा को साम्प्रदायिकता और जातिवाद के मोर्चे पर घेर लेते हैं,लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा पहुंच कर उसकी यह कोशिशें नाकामयाब हो जाती हैं।यूपी में मायावती अपनी राजनैतिक चालों से  बाबा साहब अंबेडकर के नाम पर दलित वोटरों को लामबंद कर ेलेती हैं,परंतु जब महाराष्ट्र में वह जाती हैं तो उनकी यह कोशिशें वहां परवान नहीं चढ़ पाती हैं,जबकि बाबा साहब की पहचान महाराष्ट्र से सबसे अधिक ही होती है।

उधर,तेजी से अपनी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ाती जा रही भाजपा ने दोनों ही राज्यों(महाराष्ट्र-हरियाणा) में विरोधी दलों के बिखराव का फायदा उठाया।झारखं डमें भी उसकी सरकार बन गई है,उम्मीद तो यह भी की जा रही है कि जम्मू-कश्मीर में भी सत्ता उसके इर्दगिर्द ही रहेगी।सभी जगह भाजपा को विरोधियों के बिखराव का फायदा मिला।ठीक ऐसे ही राजनैतिक हालात उत्तर प्रदेश के भी हैं।यहां चार बड़े दलों के अलावा राष्ट्रीय लोकदल भी पश्चिमी यूपी में अपनी जड़े मजबूत किये हुए है।सपा को चिंता यह सता रही है कि अगर यूपी में मोदी विरोधी एकजुट नहीं हुए तो 2017 की लड़ाई आसान नहीं होगी।क्षेत्रीय दलों को लेकर भाजपा-आरएसएस के साथ-साथ मोदी की तल्खी और सोच भी किसी से छिपी नहीं है।विरोधी तो विरोधी अपने साथ खड़े क्षेत्रीय क्षत्रपों को भी नरेन्द्र मोदी-अमित शाह की जोड़ीं सबक सिखाये जा रही है।बिहार में जदयू नेता नीतिश कुमार से दूरी बनाने के साथ यह सिलसिला शुरू हुआ था,जिसके कारण बिहार में 17 वर्ष पुराना भाजपा-जदयू गठबंधन ही नहीं टूटा भाजपा को बिहार सरकार से अलग भी होना पड़ गया,लेकिन लोकसभा चुनाव में इसका भाजपा को फायदा भी खूब मिला था।लोकसभा चुनाव आते-आते कई भाजपा के कई सहयोगी उससे दूर हो चुके थे,लेकिन भाजपा की सेहत पर इसका फर्क नहीं पड़ा।वह इन दलों की हैसियत को कम करके आगे बढ़ती ही गई। महाराष्ट्र और हरियाणा विधान सभा चुनाव में भाजपा ने जब अपने पुराने सहयोगियों शिवसेना और इंडियन नेशनल लोकदल को अपने से दूर किया तो यह समझते देर नहीं लगी कि भाजपा अब विस्तार में लग गई है।वह पूरे देश में बिना बैसाखी के चलना चाहती है।जल्द ही अकाली दल से भी भाजपा के रिश्ते खत्म हो जायें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।भाजपा का जब अपने सहयोगियों के साथ यह रवैया है तो विरोधी दलों के क्षत्रपों की तो बात ही दूसरी है।पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी लगातार मोदी से खतरा बना रहता है।इसी लिये वह मोदी सरकार पर हमला करने का कोई भी मौका छोड़ती नहीं हैं।

बात उत्तर प्रदेश की कि जाये तो लोकसभा चुनाव के समय दोनों दलों(सपा-बसपा) के क्षत्रपों को इस बात का अहसास अच्छी तरह से हो भी चुका है।चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने चुन-चुन कर उन्हें (मुलायम-माया) निशाना बनाया था।इसी लिये समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव जातिवाद राजनीति को पीछे छोड़कर विकासवादी राजनीति की ओर तेजी से आगे बढ़ रही है।मुलायम को भी यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जायेगी उतना अच्छा होगा।बहरहाल,सपा प्रमुख ने लालू यादव,शरद यादव,देवगौड़ा को साथ लेकर दिल्ली में धरना देकर अपनी ताकत का अहसास कराने की कोशिश तो जरूर की लेकिन वह इसमें ज्यादा सफल होते नीं दिखे।
 
लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं.

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भारत के न्यूज चैनल पैसा कमाने और दलगत निष्ठा दिखाने के चक्कर में सही-गलत का पैमाना भूल चुके हैं : अजय कुमार

: इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनलों का ‘शोर’ : टेलीविजन रेटिंग प्वांइट(टीआरपी) बढ़ाने की चाहत में निजी इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल अपनी साख खोते जा रहे हैं। समाचार सुनने के लिये जब आम आदमी इन चैंनलों का बटन दबा है तो उसे यह अहसास होने में देरी नहीं लगती कि यह चैनल समाचार प्रेषण की बजाये ध्वनि प्रदूषण यंत्र और विज्ञापन बटोरने का माध्यम बन कर रह गये हैं। इन चैनलों पर समाचार या फिर बहस के नाम पर जो कुछ दिखाया सुनाया जाता है, उससे तो यही लगता है कि यह चैनल न्यूज से अधिक  सनसनी फैलाने में विश्वास रखते हैं।

अक्सर यह देखने को मिल जाता है कि जिस समाचार और विषय को लेकर यह चैनल दिनभर गलाकाट प्रतियोगिता करते रहते हैं, उसे प्रिंट मीडिया में अंदर के पन्नों पर एक-दो कॉलम में समेट दिया जाता है।कभी-कभी तो यह भी नहीं होता है। न्यूज चैनलों का उबाऊ प्रसारण देखकर दर्शक तो रिमोट का बटन दबा कर मुक्ति प्राप्त कर लेता है, परंतु कभी-कभी स्थिति हास्यास्पद और शर्मनाक भी हो जाती है।मीडिया के इसी आचरण के कारण सरकार से लेकर नौकरशाह तक और नेताओं से लेकर जनता तक में इलेक्ट्रानिक मीडिया अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा है। दुखद बात यह भी है कि जिन संस्थाओं के कंधों पर मीडिया की मॉनिटरिंग करने की जिम्मेदार है, उसके कर्णधार इन न्यूज चैनलों के कार्यक्रम का हिस्सा बनकर अपना चेहरा चमकाने में लगे रहते हैं।

आज की तारीख में इलेक्ट्रानिक समाचार चैनल विवाद का केन्द्र बन गये हैं।अगर ऐसा न होता तो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय(एएमयू) के अंदर बड़े पैमाने पर मीडिया का विरोध नहीं होता। एएमयू से जुड़े छात्र-छात्राएं और कालेज स्टाफ गत दिनों यहां के वीसी के बयान को तोड़मरोड़ कर इलेक्ट्रानिक मीडिया में पेश किये जाने से नाराज था, जिसमें कहा गया था कि वीसी ने लाइब्रेरी में छात्राओं की इंट्री पर यह कहते हुए रोक लगा दी है कि इससे लाइब्रेरी में चार गुना छात्र ज्यादा आने लगेंगे। एएमयू छात्रसंघ और विमेंस कॉलेज स्टूडेंट्स यूनियन ने मीडिया में इस खबर को शरारतपूर्ण तरीके से दिखाये जाने से नाराज होकर विरोध मार्च निकाला और धरना दिया।

एक अंग्रेजी समाचार पत्र की प्रतियां भी जलाई गईं। विरोध की खबर किसी चैनल पर नहीं दिखाई गई, जबकि पत्रकारिता के कायदे तो यही कहते हैं कि इसे भी चैनल या समाचार पत्रों में उतना ही स्थान मिलना चाहिए जितना वीसी के बयान को पेश करने के लिये दिया गया था। वीसी का साफ कहना था कि किसी छात्रा पर रोक नहीं लगाई गई है। शोध और मेडिकल से जुड़ी छात्राएं लाइब्रेरी आती भी हैं। 1960 से जो व्यवस्था चल रही है उस पर ही आज भी एएमयू आगे बढ़ रहा है, अगर कुछ गलत हो रहा था तो यह आज की बात नहीं थी, जिसका विरोध वीसी की आड़ लेकर किया जा रहा है। यह घटना अपवाद मात्र है जबकि इस तरह के समाचारों से इलेक्ट्रानिक न्यूज बाजार पटा पड़ा है।

ऐसा लगता है कि निजी न्यूज चैनल के कर्ताधर्ता समाचार पत्र के स्रोत का गंभीरता से पता नहीं लगाते हैं, जिसकी चूक का खामियाजा उन्हें समय-समय पर भुगतना पड़ता है। आज स्थिति यह है कि करीब-करीब सभी न्यूज चैनल किसी न किसी दल या नेता के प्रति निष्ठावान बने हुए हैं और उन्हीं को चमकाने में लगे रहते हैं। पैसा कमाने के चक्कर में इनके लिये सही-गलत का कोई पैमाना नहीं रह गया है। अंधविश्वास फैलाना, बेतुके बयानों को तवज्जों देना, अलगावादी और विवादित नेताओं को हाईलाइट करना,बड़ी हस्तियों के निजी जीवन में तांकझाक करना इनकी फितरत बन गई है। यही वजह है कि कई नेता, नौकरशाह, उद्योगति, फिल्मी हस्तियां, समाजवसेवी मीडिया से बात करना पसंद नहीं करते हैं। उन्हें डर रहता है कि न जाने कब उन्हें विवादों में घसीट लिया जाये। न्यूज चैनलों का शोर जल्दी नहीं थमा तो इनके सितारे गर्दिश में जा सकते हैं।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. एक जमाने में माया मैग्जीन के यूपी ब्यूरो चीफ हुआ करते थे. चौथी दुनिया समेत कई अखबारों से जुड़े हुए हैं और नियमित स्तंभ लेखन करते हैं.

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चार नवम्बर के बाद टूट जायेगा ‘अपना दल’

अजय कुमार, लखनऊ

अपना दल 04 नवंबर को वाराणसी में 19वां स्थापना दिवस मनाने जा रहा है। स्थापना दिवस को लेकर तैयारी भी चल रही है, लेकिन अपना दल के संस्थापक अध्यक्ष स्वर्गीय सोनेलाल पटेल की विरासत संभाले उनकी पत्नी और पुत्रियों के बीच मची राजनैतिक होड़ ने स्थापना दिवस का रंग फीका कर दिया है। कार्यकर्ता गुटों में बंट गये हैं। पारिवारिक झगड़े के कारण अपना दल के स्थापना दिवस समारोह की कामयाबी पर ग्रहण लग गया है। सोनेलाल पटेल की मौत के बाद काफी तेजी के साथ राजनैतिक क्षितिज पर उभरी उनकी तीसरे नंबर की पुत्री अनुप्रिया पटेल के खिलाफ मॉ कृष्णा पटेल ने अपनी दूसरी बेटी पल्लवी पटेल को साथ लेकर बगावती रुख अख्तियार कर लिया है।

वैसे तो घर में मनमुटाव की खबरें काफी पहले से आ रही थीं, लेकिन यह झगड़ा उस समय सड़क पर खुल कर सामने आ गया जब अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने अनुप्रिया की मर्जी के खिलाफ दूसरे नंबर की बेटी पल्लवी पटेल को पार्टी उपाध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी। कृष्णा पटेल यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए अनुप्रिया पटेल को महासचिव के पद से भी हटा दिय। कृष्णा पटेल का आरोप था कि अनुप्रिया अपने आप को पार्टी से ऊपर समझती हैं और उनके पति की दखलंदाजी पार्टी में काफी बढ़ गई है। अनुप्रिया के पति पार्टी में तोड़फोड़ कर रहे हैं जो पार्टी हित में नहीं है। जबकि अनुप्रिया का कहना था कि उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है।

जो हालात बन रहे हैं उससे तो यही लगता है कि पारिवारिक कलह के कारण दो गुटों में बंटता जा रहा अपना दल कभी भी टूट का शिकार हो सकता है। इसका नजारा स्थापना दिवस के बाद दिखाई पड़ जाये तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दरअसल, अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल  ने सभी पदाधिकारियों कौर कार्यकताओं को स्थापना दिवस कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने को कहा है, वहीं अनुप्रिया गुट की तरफ से ऐसे संकेत आ रहें हैं कि वह (अनुप्रिया) स्थापना दिवस के कार्यक्रमों से दूरी बना कर रखेंगी।

बात राजनैतिक परिपक्वता की कि जाये तो ऐसा लगता नहीं है कि अनुप्रिया के बिना अपना दल का वजूद कृष्णा पटेल बचा पायेंगी। अनुप्रिया पटेल अपने पिता के समय से राजनीति में शिरकत कर रही हैं और कई आंदोलन भी चला चुकी हैं। सोनेलाल पटेल की मौत के बाद अनुप्रिया ने ही चाहरदीवारी से बाहर निकाल कर मॉ कृष्णा पटेल को अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाया था। अनुप्रिया ने पार्टी को नई पहचान दी। 2012 में वह वाराणसी की रोहनिया सीट से विधायक चुनी गईं और इसके बाद भाजपा के साथ मिलकर उन्होंने मिर्जापुर से संसदीय चुनाव लड़ा और सांसद बन गईं।

भाजपा के साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ने जैसा अहम फैसला अनुप्रिया ने ही लिया था। अनुप्रिया के इस्तीफे से रिक्त हुई रोहनिया सीट से सोनेलाल पटेल की पत्नी चुनाव लड़ीं, लेकिन उन्हें जीत नसीब नहीं हुई। इस पर कहा यह गया कि अनुप्रिया अगर पूरा दमखम लगाती तो कृष्णा पटेल यह चुनाव जीत जातीं। इस तरह के आरोप कृष्णा पटेल ने भी अपनी बेटी पर लगाये। गौरतलब हो, पूर्वांचल की लगभग एक दर्जन लोकसभा सीटों पर अपना दल हार-जीत के समीकरण बदलने की ताकत रखता है। भारतीय जनता पार्टी 2017 के विधान सभा चुनाव भी अपना दल के साथ मिलकर लड़ना चाहती है, लेकिन फिलहाल वह दर्शक की भूमिका में नजर आ रही है।

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अजय कुमार की रिपोर्ट.

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सपा राष्ट्रीय अधिवेशन में बसपा पर चुप्पी का मतलब किसी को समझ नहीं आया

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन का पहला दिन अपने पीछे कई खट्टे-मीठे अनुभव छोड़ गया। उम्मीद के अनुसार मुलायम सिंह यादव को नौंवी बार अध्यक्ष चुने जाने की औपचारिकता पूरी करने के अलावा अगर कुछ खास देखने और समझने को मिला तो वह यही था कि समाजवादी नेताओं ने यह मान लिया है कि अब उनकी लड़ाई भारतीय जनता पार्टी के साथ ही होगी। यही वजह थी वक्ताओं ने भाजपा और खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर खूब तंज कसे। इसके साथ ही समाजवादी मंच से एक बार फिर तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट भी सुनाई दी। जनता दल युनाइटेड(जेडीयू) के अध्यक्ष शरद यादव की उपिस्थति ने इस सुगबुगाहट को बल दिया। मुलायम के अध्यक्षीय भाषण के बाद शरद यादव बोलने के लिये खड़े हुए तो उनके तेवर यह अहसास करा रहे थे कि दोनों यादवों को एक-दूसरे की काफी जरूरत है।

बात मुलायम के भाषण की कि जाये तो उन्होंने अखिलेश सरकार के कामों के खूब कसीदे पढ़े। इसके साथ उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि हम अपने कामों का प्रचार नहीं कर पाये। सपा प्रमुख ने डॉ. लोहिया के विचारों, लखनऊ की हिन्दू-मुस्लिम एकता, अल्पसंख्यकों का समाजवादी पार्टी के प्रति विश्वास, मोदी सरकार की नाकामी सहित तमाम मुद्दों को उठाया। गुजरात दंगों की याद ताजा करके और गुजरात के मुस्लिमों के दर्द से अपने आप को जोड़ने की कोशिश लोकसभा चुनाव की तरह नेताजी यहां भी करते नजर आये। उन्होंने यह भी बताया कि दंगों के बाद उन्होंने गुजरात जाकर मुस्लिमों के हालात का जायजा लिया था। मोदी पर तंज करते हुए सपा प्रमुख ने कहा कि मोदी को मुझसे बात करने के लिये छप्पन इंच का सीना चाहिए।

मुलायम अपने पुराने साथी शरद यादव की उपस्थिति से गद्गद नजर आये और पुराने साथियों के साथ आने पर मुलायम खुशी का इजहार करने से नहीं चूके। मुलायम के अध्यक्ष चुनने के बाद उम्मीद है कि समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय और उत्तर प्रदेश कार्यकारिणी का जल्द पुर्नगठन किया जायेगा। समाजवादी नेताओं का पूरा फोकस 2017 के चुनावों के इर्दगिर्द घूमता रहा।

बात शरद यादव की कि जाये तो उन्होंने मंहगाई, कालाधन, बेरोजगारी जैसी तमाम समस्याओं पर मोदी सरकार की घेराबंदी करने का भरपूर प्रयास किया। सपा को शरद यादव ने गरीबों की पार्टी बताया। बाबा साहब अम्बेडकर के कामों की चर्चा की। मंच पर सपा के सभी बड़े नेता अखिलेश यादव, शिवपाल यादव,आजम खां, राम गोपाल यादव मौजूद थे। सांसद और अभिनेत्री जया बच्चन भी अधिवेशन में मंच पर नजर आईं।

मुलायम के अध्यक्ष चुने जाने के बाद यह तय हो गया है कि 2017 का चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जायेगा। मुलायम के बाद अधिवेशन में जिसकी सबसे अधिक चर्चा हो रही थी वह युवा नेता और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव थे। बसपा को लेकर समाजवादी पार्टी की चुप्पी का मतलब किसी को समझ में नहीं आया।

खैर, इन सब बातों के बीच यह अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि सपा ने अधिवेशन के प्रचार-प्रचार के लिये पानी की तरह पैसा बहाया। पूरा शहर बडे़-बड़े होल्डिंग से पाट दिया गया। गरीबों की पार्टी का दम भरने वाले समाजवादी लग्जरी गाडि़यों में घूमते नजर आये।

 

 

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं और यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं। अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं।

 

 

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