शाजी ज़मां की बीस साल की मेहनत है ‘अकबर’

Ajit Anjum : शाजी ज़मां हिन्दी टीवी चैनलों के सबसे संजीदा और संवेदनशील पत्रकारों में से एक हैं… शाजी कम बोलते हैं, कम दिखते हैं, कम लिखते हैं, कम लिखते हैं, कम मिलते हैं लेकिन जो भी सोचते और रचते हैं, वो सबसे अलहदा होता है… शायद इसलिए भी कि वो कहने-बताने से ज़्यादा चुपचाप करते रहने में यक़ीन करते हैं… शाजी को मैं क़रीब पंद्रह सालों से जानता हूँ और जितना जानता हूँ, उसके आधार पर कह सकता हूँ कि उनकी ये किताब साहित्य की दुनिया में हलचल मचाएगी… अकबर जैसे किरदार पर शाजी ने इतना काम करके कुछ रचा है तो ये हर साल छपने वाले उपन्यासों की भीड़ से अलग होगा…

अकबर का यह अकेलापन, यह गुस्सा, यह अवसाद

आज अल्लसुबह पांच बजे हैदराबाद एयरपोर्ट पर अचानक एम जे अकबर से भेंट हो गई। वह दिल्ली आ रहे थे और मैं लखनऊ। एक ही फ्लाइट से। हम जब पढ़ते थे तब अकबर को यंगेस्ट एडिटर के तौर पर जानते हुए उन से बहुत रश्क करते थे । पैतीस साल की उम्र में कोलकाता के आनंद बाज़ार पत्रिका के प्रकाशन में वह संडे और टेलीग्राफ दोनों के संपादक थे ।