…तब सपा का राज था और अब भाजपा का है!

अवनिन्द्र कुमार सिंह ‘अमन’


वाराणसी : क्या संयोग है कि 23 सितंबर 2015 को संतों के ऊपर पुलिस ने लाठी चलाया और अब 23 सितंबर को ही पुलिसकर्मियों ने बीएचयू छात्राओं के ऊपर लाठियां भांजी। फर्क इतना है कि तब अखिलेश की सरकार थी और अब योगी आदित्यनाथ की। संतों का स्वाभव शांत का और लड़कियों को फूल कहा जाता है। जिला प्रशासन का हाथ उस वक्त भी नहीं कापा जब वह संतों की पीठ पर लाठी बरसाई और उस वक्त भी शर्म नहीं आई जब महिला महाविद्यालय में घुसकर पुलिसकर्मियों ने छात्राओं पर लाठियां तोड़ी।

जिस फोटोजर्नलिस्ट ने बीएचयू को जिंदगी भर कवर किया, उसे अंतिम समय वहीं बेड नहीं मिला

नहीं रहे मंसूर चच्चा… हम सबके बीच नही रहे काशी के वरिष्ठ छायाकार मंसूर आलम जी। उन्होंने कइयों को फोटोग्राफी सिखाई, फीचर फोटो पर रिपोर्टरों को स्पेशल स्टोरी लिखने के बारे में बताया। हमेशा हंसता चेहरा। उम्र की कोई बंदिश नहीं। जहां मिले खुल कर मिले। खुल कर हंसा और हसाया। जिंदगी में किसी से कुछ बोला नहीं। संकोची टाइप के प्राणी थे। प्रोग्राम में पहुंचे। धीरे से काम किया। निकल लिए। अगला तब जान पाता था जब हिंदुस्तान में अगले दिन फोटो छपती थी।

स्वर्गीय मंसूर आलम

बनारस में टीवी पत्रकार नितिन को पीएसी वाले ने पीटा

Avanindr singh Aman : शनिवार की देर शाम मूर्ति विसर्जन के दौरान बनारस के दशाश्वमेघ के डेढ़सीपुल के समीप ऋषि सेठ अपनी पत्नी और बच्चे संग बाइक से घर जा रहे। भीड़ अधिक होने के कारण डेढ़सीपुल के करीब किनारे बाइक खड़ी कर मूर्ति देखने लगे। इसी बीच पी.ए.सी. का जवान राजाराम यादव वहा पंहुचा और भद्दी-भद्दी गालियां बकनी शुरू कर दी। आरोप है कि ऋषि को तीन-चार थप्पड़ भी जड़ दिया। जब KTV के पत्रकार नितिन ने विरोध किया तो पी.ए.सी. के जवान ने उससे परिचय पूछा।

बनारस के ज्योतिषाचार्य और संपादक लक्ष्मण दास कहां गए?

Avanindr singh Aman : इन दिनों वाराणसी के अखबारों में ज्योतषाचार्य व एक सांध्यकालीन अखबार के सम्पादक लक्ष्मण दास के विज्ञापनों के साथ-साथ उनके लापता होने की खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित किया जा रहा है। उनको खोजने के लिए एसटीएफ तक को लगा दिया गया है। जमीनी विवाद व पैसे के लेन-देन से जोड़कर हो रही है जांच। बिहार गैंग पर शक की सुई है। चन्दौली-बिहार बार्डर पर हो रही खोज। वैसे, सवाल तो ये भी है कि पुलिस केवल हाई प्रोफाइल लोगों को ही क्यों इतनी तल्लीनता से खोजती है। गरीब लोगों को तो गुमशुदगी तक की रिपोर्ट लिखाने में पसीने छूट जाते हैं। और, गरीबों के मामलों को लेकर मीडिया भी इस कदर सक्रिय नहीं होती।