‘समकालीन तीसरी दुनिया’ मैग्जीन के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा का इंटरव्यू

हिंदी के दिग्गज और पुरोधा पत्रकार हैं आनंद स्वरूप वर्मा. ग्लैमर, पैसा और बाजार के आकर्षण से बिलकुल दूर अलग वे अपने पत्रकारीय मिशन में डूबे / लीन रहते हैं. आनंद स्वरूप वर्मा को अगर हिंदी पत्रकारिता का लौह पुरुष कहा जाए तो अनुचित न होगा. न जाने कितने झंझावात और उतार चढ़ाव आए, लेकिन उनका विजन, सरोकार और लक्ष्य नहीं बदला. वे ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ मैग्जीन के जरिए आम जन के लिए पत्रकारिता को जीते रहे और सिस्टम को चुनौती देते रहे. आनंद स्वरूप वर्मा ने इस मैग्जीन की मदद से कई पीढियों को देश-दुनिया की हलचलों के पीछे की सरोकारी समझ से शिक्षित-प्रशिक्षित किया और बाजार के प्रभाव से दिमाग में निर्मित हो रहे वैचारिक झाड़-झंखाड़ और झालों को साफ कर जनता के प्रति प्रतिबद्धता को प्रतिष्ठित करने का काम अनवरत किया.

आर्थिक संकट के कारण ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ मैग्जीन का प्रकाशन स्थगित

Abhishek Srivastava : पिछले दो महीने से समकालीन तीसरी दुनिया का प्रकाशन नहीं हो पा रहा था। अब अक्‍टूबर-दिसंबर, 2016 का संयुक्‍तांक आपके सामने है। भारी मन से यह बताना पड़ रहा है कि पिछले 35 वर्षों से रुक-रुक कर निकल रही और पिछले करीब छह वर्ष से नियमित निकल रही यह पत्रिका इस अंक के बाद नहीं निकल पाएगी। ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ दो साल पहले ही बंद हो जाती अगर कुछ सरोकारी पाठकों और शुभचिंतकों ने लगातार आर्थिक मदद नहीं की होती। करीब डेढ़ वर्ष पहले एक अपील जारी की गई थी और यह कहा गया था कि कोई समूह इसकी वैचारिकी के साथ छेड़छाड़ किए बगैर इसका प्रकाशन अपने हाथ में ले सके तो बेहतर हो, लेकिन यह भी मुमकिन नहीं हो सका।

भ्रष्ट हो चुके चौथे खंभे पर नजर रखने के लिए अब पांचवें खंभे की जरूरत

Yashwant Singh : वरिष्ठ पत्रकार Anand Swaroop Verma ने भड़ास के आठवें बर्थडे समारोह में दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में 11 सितंबर को कहा कि लोकतंत्र के तीन खंभों पर नजर रखने के लिए चौथा खंभा है तो अब भ्रष्ट हो गए चौथे खंभे पर नजर रखने के लिए पांचवें खंभे की जरूरत है. उनकी बात बहुत सारे साथियों के दिल में उतर गई.

नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड के माफीनामे को मोदी ने कबूल कर लिया है!

Anand Swaroop Verma :  आज के हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित प्रशांत झा की रिपोर्ट से पता चला कि नेपाल के माओवादी नेता और प्रधान मंत्री प्रचंड ने अपने विशेष दूत और गृहमंत्री बिमलेन्द्र निधि से नरेंद्र मोदी के पास सन्देश भेजा है कि अतीत में उनसे कई गलतियां हुईं क्योंकि उन्हें खुली राजनीति का अनुभव नहीं था, और अब वह इस बात का ध्यान रखेंगे कि भविष्य में ऐसा न हो और भारत के साथ अच्छे सम्बन्ध बने रहें.

मेरी अंतिम इच्छा : एक जनपक्षीय व्यवसायी कामरेड महादेव खेतान ने मरने के दो दिन पहले जो वसीयत तैयार की, उसे पढ़ें

करेंट बुक डिपो कानपुर के संस्थापक महादेव खेतान का अब से तकरीबन 16 वर्ष पूर्व 6 अक्टूबर 1999 को निधन हुआ। महादेव खेतान ने अपनी पुस्तकों की इस दुकान के जरिए वामपंथी विचारधारा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान किया और उनके इस योगदान को हिन्दी भाषी क्षेत्रों में काफी सराहा गया। विचारों से साम्यवादी होने के साथ वह एक सफल व्यवसायी भी थे लेकिन उन्होंने अपने व्यवसायी हित को कभी-भी व्यापक उत्पीड़ित जनसमुदाय के हित से ऊपर नहीं समझा। यही वजह है कि अपनी पीढ़ी के लोगों के बीच वह कॉमरेड महादेव खेतान के रूप में जाने जाते थे… अपने निधन से दो दिन पूर्व उन्होंने अपनी वसीयत तैयार की। हम उस वसीयत को यहां अक्षरशः प्रकाशित कर रहे हैं ताकि एक जनपक्षीय व्यवसायी के जीवन के दूसरे पहलू की भी जानकारी पाठकों को मिल सके. -आनंद स्वरूप वर्मा, संपादक, समकालीन तीसरी दुनिया

इंसाफ का पलड़ा अमीरों के पक्ष में, वक्त को और भी शाहिद आजमियों की जरूरत : आनन्द स्वरूप वर्मा

लखनऊ । आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को इंसाफ दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने वाले मुम्बई के वकील शाहिद आजमी की शहादत की पांचवी बरसी पर रिहाई मंच ने ‘लोकतंत्र, हिंसा और न्यायपालिका’ विषय पर सेमिनार किया। यूपी प्रेस क्लब में आयोजित सेमिनार में मुख्य वक्ता के बतौर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि हमारे लोकतंत्र के सामने कई बार चुनौतियां पेश हुई हैं। उन्होंने कहा कि जब भी लोकतंत्र पर खतरे बढ़ते हैं उस खतरे के खिलाफ हिंसा भी बढ़ जाती है।