हिंदी संस्थान के पुरस्कार पाने वालों में 80 प्रतिशत से ज्यादा पोंगापंथी और सांप्रदायिक मानसिकता के लोग हैं

Anil Kumar Singh : कँवल भारती की औकात बताने के बाद आज उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंदी संस्थान के पुरस्कारों की घोषणा कर दी है. चूंकि मायावती की सरकार ने इन पुरस्कारों को बंद कर दिया था इसलिए पूरी कोशिश की गई है कि इस लिस्ट से दलितों का पत्ता पूरी तरह साफ रहे. भाजपा के शासन में पंडित दीनदयाल उपाध्ध्याय के नाम पर पुरस्कार शुरू किया गया था, उसे चालू रखा गया है क्योंकि उससे सपा के समाजवाद को मजबूती मिलने की संभावना है २०१४ में. दो-तीन यादव भी हैं क्योंकि इस समय की मान्यता है कि असली समाजवादी वही हो सकते हैं. खोज-खाज कर एक दो मुस्लिम भी लाये गए हैं क्योंकि उनके बिना समाज वाद २०१४ का ख्वाब भी नहीं देख सकता.

फैजाबाद के हिंदुस्तान और दैनिक जागरण अखबार के ब्यूरो चीफों को साहित्य से इतनी घृणा क्यों है?

Anil Kumar Singh : कुछ दिनों पहले इलाहाबाद वि वि में मेरे प्राध्यापक रहे प्रो राजेंद्र कुमार जी का फैजाबाद आना हुआ. वे एक बेहद संजीदा इन्सान होने के साथ ही एक बहुत ही अच्छे शिक्षक भी हैं. एम् ए फाइनल में वे हम लोगों को उर्दू साहित्य का वैकल्पिक पेपर पढ़ाते थे. हमारी जो भी साहित्य, संस्कृति की समझ बनी उसमे गुरुदेव का बड़ा योगदान है. हम लोगों ने उनसे अनुरोध करके फैजाबाद प्रेस क्लब में मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ कविता पर उनका व्याख्यान आयोजित किया.