Shame on you TOI its NIT (An Institute of National Importance), not NIIT

 

Since the time I remember, one thing that comes to my mind is the newspaper vendor flinging Times of India at the main gate of my house. I was an avid reader of prominent national daily, The Times of India. The exclusive coverage of issues of national importance always fascinated me. The idea of switching loyalty to any other national daily didn’t even cross my mind. I would have labelled that an exceedingly absurd thought. Today, in the hustle and bustle of college life, I somehow carve out time to login Times Of India on my laptop and go through the electronic version of it. It was my love for Times Of India that drove me crazy.

संपादक नाम के प्राणी…. आखिर तुम कहां खो गए हो!

एक जमाना था जब किसी भी अख़बार या पत्रिका की पहचान उसके संपादक के नाम से होती थीl  धर्मवीर भारती धर्मयुग की पहचान थे तो साप्ताहिक हिंदुस्तान यानी श्याम मनोहर जोशी थेl सारिका कमलेश्वर के नाम से जानी जाती थी तो दिनमान की पहचान रघुवीर सहाय के नाम से होती थीl यही हाल अखबारों का था। इंडियन एक्सप्रेस को अरुण शौरी के नाम से पहचान मिलती थी तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया में दुआ साहब ही सब कुछ थेl बहुत पहले बंद हो गई इलस्ट्रेटेड वीकली का तो वजूद ही खुशवंत सिंह के नाम पर थाl पराग के संपादक कन्हैया लाल नंदन थे तो कादम्बिनी राजेन्द्र अवस्थी के नाम से जानी और पहचानी जाती थीl किसी अखबार या पत्रिका के मालिक को कोई जाने या न जाने पर उसके संपादक की पहचान किसी की मोहताज नहीं थीl उस ज़माने में मालिक संपादक से बात करने में भी हिचकिचाते थे, उनके काम में दखलंदाजी की बात तो दूर की बात हैl

शशि शेखर का शब्द-ज्ञान : लेख का शीर्षक ‘जागृत जनों का जनतंत्र’, ‘जागृत’ कोई शब्द नहीं, ‘जन’ बहुबचन, ‘जनो’ अशुद्ध

यह लेख आज 28 जून , 2015 ‘हिन्दुस्तान’ समाचारपत्र के समस्त संस्करणों में पृष्ठ-संख्या छह पर शीर्षक के रूप में प्रकाशित है, जो पूर्णतः अशुद्ध है | इसे विधिवत जानते हुए भी इस सन्दर्भ में मैंने अपने परम शुभेच्छु, विचक्षण श्रद्धेय पण्डित रमेश प्रसाद शुक्ल जी से परामर्श किया था क्योंकि आज मैंने देश के एक विश्रुत समाचारपत्र के ‘प्रधान सम्पादक’ श्री शशि शेखर के भाषा-ज्ञान पर साधिकार अँगुली उठायी है, जो ‘हिन्दुस्तान’ समाचारपत्र के सारे संस्करणों के शीर्षस्थ पत्रकार हैं। शुद्ध शीर्षक होगा- ‘जाग्रत जन का जनतन्त्र’ । 

माखनलाल में मेरी पांच साल की पढ़ाई और आज की विज्ञापनी पत्रकारिता

सम्पादकीय पर विज्ञापन इस कदर हावी है कि लगता ही नहीं कहीं पत्रकारिता हो रही है। ये दौर ऐसा है कि हर कुछ को चाटुकारिता की चाशनी में बार-बार डुबाया जाता है और इसे ही सच्चा बताकर पेश किया जाता है। पत्रकार बनने का सपना लिए हमने 5 साल माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल में गुजारे। काफी गुर भी सीखे। पत्रकारिता की बारीकियों को हमारे गुरुओं ने हमें दम भर सिखाया। इंटर्नशिप ट्रेनिंग के लिए हमें दिल्ली आजतक भी भेजा। लेकिन पढ़ा था कि विज्ञापन और सम्पादकीय दो अलग चीजें होती हैं। लेकिन जब सच्चाई का सामना हुआ तो दिल के टुकड़े हजार भी हुए। हर समय विज्ञापन हावी रहा सम्पादकीय पर।

गदर पार्टी के संस्थापक शहीद करतार सिंह सराभा की 99वीं पुण्यतिथि 16 नवम्बर पर

१८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की विफलता के बाद में ब्रिटिश सरकार ने सत्ता पर सीधा नियंत्रण कर एक ओर उत्पीड़न तो दूसरी ओर भारत में औपनिवेशिक व्यवस्था का निर्माण शुरू किया। क्योंकि खुद ब्रिटेन में लोकतांत्रिक व्यवस्था थी, इसलिए म्युनिसपैलिटी आदि संस्थाओं का निर्माण भी किया गया, लेकिन भारत का आर्थिक दोहन अधिक से अधिक हो, इसलिए यहां के देशी उद्योगों को नष्ट करके यहां से कच्चा माल इंग्लैंड भेजा जाना शुरू किया गया। साथ ही पूरे देश में रेलवे का जाल बिछाया जाना शुरू हुआ। ब्रिटिश सरकार ने भारत के सामंतों को अपना सहयोगी बना कर किसानों का भयानक उत्पीड़न शुरू किया। नतीजतन उन्नीसवीं सदी के अंत तक आते-आते देश के अनेक भागों में छिटपुट विद्रोह होने लगे। महाराष्ट्र और बंगाल तो इसके केंद्र बने ही, पंजाब में भी किसानों की दशा पूरी तरह खराब होने लगी। परिणामतः बीसवीं सदी के आरंभ में ही पंजाब के किसान कनाडा, अमेरिका की ओर मज़दूरी की तलाश में देश से बाहर जाने लगे। मध्यवर्गीय छात्र भी शिक्षा-प्राप्ति हेतु इंग्लैंड, अमेरिका वे यूरोप के देशों में जाने लगे थे।

अवधेश कुमार जी, खुद के घर जब शीशे के हों तो दूसरों पर पत्थर नहीं मारते

अवधेश कुमार जी आजकल एक दुविधा में पड़े हैं। प्रतिष्ठत अखबार दैनिक जागरण से संबद्ध नई दुनिया को लेकर। उनकी परेशानी यह है कि जागरण में छपे संपादकीय लेख नई दुनिया में भी छापे जा रहे हैं। पर इसमें कोई गलती इसलिए नहीं कही जा सकती है क्योंकि दोनों ग्रुप एक ही हैं। इसलिए आपस में खबरों आलेखों का आदान प्रदान कर सकते हैं। जैसे आजतक न्यूज चैनल अपने रीजनल चैनल दिल्ली आजतक पर कई बार वही स्टोरी चलाता है जो पहले आजतक पर चल चुकी होती हैं।

जागरण प्रबंधन से अपील, श्रवण गर्ग के बाद नई दुनिया के संपदाकीय पृष्ठ को भी मुक्ति दिलाये

Awadhesh Kumar : आजकल मैं यह देखकर आश्चर्य में पड़ रहा हूं कि आखिर नई दुनिया में जागरण के छपे लेख क्यों छप रहे हैं। जागरण इस समय देश का सबसे बड़ा अखबार है। उसका अपना राष्ट्रीय संस्करण भी है। जागरण प्रबंधन ने नई दुनिया को जबसे अपने हाथों में लिया उसका भी एक राष्ट्रीय संस्करण निकाला जो रणनीति की दृष्टि से अच्छा निर्णय था। पर उस अखबार को जागरण से अलग दिखना चाहिए।