आकाशवाणी के कैज़ुअल एनाउंसर का आकाशवाणी महानिदेशालय के बाहर प्रदर्शन

आल इंडिया रेडियो केजुअल एनांउसर एण्ड कम्पीयर यूनियन का आकाशवाणी महानिदेशालय के सामने धरना… इसके बाद अतिरिक्त महानिदेशक ने बातचीत के लिये बुलाया…

नई दिल्ली। दिनांक 12 सितंबर 2017 को आल इंडिया रेडियो केजुअल एनांउसर एण्ड कम्पीयर यूनियन के देश भर से विभिन्न आकाशवाणी केन्द्रों से आये केजुअल एवं उनके प्रतिनिधि जंतर मंतर पर इकट्ठा हुये और वहाँ से शांतिपूर्ण तरीके से मुँह पर काली पट्टी लगाकर पैदल मार्च करते हुये प्रसार भारती के गेट के सामने पहुँचे। वहाँ पर उन्होंने महानिदेशक से मिलने के लिये समय मांगा किन्तु महानिदेशक के बाहर होने के कारण अतिरिक्त महानिदेशक ने मिलने का समय दिया। इसमे उन्होंने सिर्फ तीन पदाधिकारियों को ही अन्दर आने की अनुमति देने की बात कही।

हिसार के आकस्मिक प्रस्तोताओं और उद्घोषकों की जिद से झुका आकाशवाणी प्रशासन, वार्ता के बाद आंदोलन खत्म

हिसार : आकाशवाणी आकस्मिक प्रस्तोता संघ के बैनर तले लिखित व स्वर परीक्षा को लेकर जारी आंदेालन बुधवार को दोनों पक्षों की सहमति के बाद वापस ले लिया गया। परीक्षा शुरू होने के बाद जब आंदोलनरत कर्मचारियों का जुलूस धरना स्थल से सीआर लॉ कॉलेज के परीक्षा केंद्र पर पहुंचा तो प्रशासन के हाथ पैर फूल गए। वहीं पुलिस प्रशासन ने आंदेालनकारियों को धारा 144 का हवाला देते हुए रोक दिया। जिससे आंदोलनकारी में और गुस्सा देखने को मिला।

आज विश्व रेडियो दिवस है… आइए अशोक अनुराग से सुनते हैं रेडियो की कहानी

आज विश्व रेडियो दिवस है। रेडियो यानी आवाज़ की वो दुनिया जिसमे बातें हैं कहानियां हैं गीत संगीत है नाटक है रूपक है बाल कार्यक्रम है महिलाओं का कार्यक्रम है बुज़ुर्गों का कार्यक्रम है युवाओं का कार्यक्रम है सैनिक भाइयों का कार्यक्रम है किसानों का भी कार्यक्रम है समाचार है और है वो सब कुछ जो हमारी इस दुनिया में है। रेडियो के आविष्कारक मारकोनी ने जब पहली बार इटली में 1895 रेडियो सिग्नल भेजा और उसे सुना तो भविष्य का इतिहास वहीं अंकित हो गया था। एक कमरे में किया गया ये प्रयोग जब 1899 में इंग्लिश चैनल को रेडियो सिग्नल पार करता दूसरी छोर पर चला गया तो हंगामा मच गया। लेकिन रेडियो सिग्नल मात्र भेजना एक उपलब्धि तो थी लेकिन सवाल ये था कि क्या आवाज़े भी इस माध्यम से जा सकेंगीं।

न्याय पाने से वंचित आकाशवाणी के सैकड़ों कैज़ुअल एनाउंसर फिर जंतर-मंतर पहुंचे

जंतर-मंतर एक अगस्त 2016 को एक बार फिर गवाह बना उस आंदोलन का, जिसमें शामिल थे आकाशवाणी में काम करने वाले कैज़ुअल उद्घोषक / कमपियर और आर. जे. यानि रेडियो जॉकी, पिछले साल भी तीन और चार अगस्त को जंतर मंतर से आवाज़ दी गई थी आकाशवाणी महानिदेशालय और प्रसार भारती के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को. हैरत की बात है आकाशवाणी महानिदेशालय और प्रसार भारती न सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मान रही है और ना उसकी नज़रों में संसद के संसदीय समिति द्वारा पारित आदेश का कोई सम्मान है। इतना ढीठ, जिद्दी, अभिमानी, अहंकारी कोई कैसे हो सकता है और वो भी एक ऐसा संस्थान जो देश की आवाज़ कहलाता है।

जहां सच्चाई दम तोड़ देती है उसे आकाशवाणी कहते हैं…

हम सभी जानते हैं कि हर संस्थान का अपना मैन्यूअल होता है जिसे हम नियमावली भी कहते हैं, जिसमें उस संस्थान को चलाने के कुछ नियम विधि संगत तरीके से रखे जाते हैं और उनका पालन करके ही कोई भी संस्थान अपने को चला पाती है, गैर सरकारी संस्थानों में मैन्यूअल की अनदेखी जग जाहिर है, नियम सिर्फ किताबों में रह जाते हैं उनका पालन शायद ही होता है।