आशुतोष को आजादी मुबारक, ‘आप’ को गुडबाई कहा

Ashutosh AAP : Every journey has an end. My association with AAP which was beautiful/revolutionary has also an end. I have resigned from the PARTY/requested PAC to accept the same. Continue reading

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राजदीप और आशुतोष की आत्मा जिंदा होती तो इस डाक्टर से माफी मांग चुके होते, देखें वीडियो

डाक्टर अजय अग्रवाल नोएडा के जिला अस्पताल के सीएमएस हैं. घुटना प्रत्यारोपण के फील्ड में देश के जाने माने डाक्टर हैं. हम बताएंगे कि इनकी जिंदगी किस तरह एक न्यूज चैनल ने तबाह कर दी…. Continue reading

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राजदीप सरदेसाई, आशुतोष, राघव बहल समेत नौ लोगों पर मुकदमा चलाने का रास्ता साफ

एक बड़ी खबर आ रही है. जिन दिनों आईबीएन सेवेन और आईबीएन-सीएनएन नाम से  न्यूज चैनलों का संचालन हुआ करता था और इसकी कमान राघव बहल, राजदीप सरदेसाई, आशुतोष आदि के हाथों में हुआ करती थी, उन्हीं दिनों एक स्टिंग दिखाया गया, ‘शैतान डाक्टर’ नाम से. Continue reading

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आशुतोष के ज्ञान और कुमार विश्वास के आखेट का किस्सा सुना रहे अभिषेक श्रीवास्तव

Abhishek Srivastava : कुछ महीने पहले आशुतोष गुप्‍ता से मुलाकात हुई थी। आम आदमी वाले। पूर्व पत्रकार। बात होने लगी तो किशन पटनायक का जि़क्र आया। बोले- ”कौन किशन पटनायक? आखिर किशन पटनायक हैं कौन? एक पत्रिका ही तो निकालते थे?” मैंने कहा भाई साब, ऐसा न कहिए, आप मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं। मैंने उन्‍हें गंधमार्दन के ऐतिहासिक आंदोलन की याद दिलाई। इस पर वे बोले- ”अभिषेकजी, ये सब छोटे-छोटे बुलबुले हैं।”

आम आदमी पार्टी के भीतर शीर्ष नेतृत्‍व के स्‍तर पर अज्ञानता और अहंकार मिश्रित अंधकार की यह हालत तब थी जब किशन पटनायक के स्‍वयंभू मानस पुत्रों में एक योगेंद्र यादव इस विचारधारा-रहित पार्टी के काडरों को विचारधारा और राजनीति की ट्रेनिंग देकर बाहर धकियाए जा चुके थे। आशुतोष जैसे पत्रकार और नए-नवेले नेता को वे ये तक नहीं सिखा सके कि जानें या न जानें, लेकिन किशन पटनायक को कम से कम ‘पत्रिका निकालने वाला’ तो न ही कहें।

आज योगेंद्र यादव स्‍वराज इंडिया के वॉट्सएप ग्रुप में दांय-दांय मैसेज भेज रहे हैं और ट्वीट मार रहे हैं कि किशन पटनायक को टाइम्‍स ऑफ इंडिया के पत्रकारों ने नक्‍सली लिख दिया और किशनजी समझ बैठे। किशन पटनायक को नक्‍सली बता देना कोई पत्रकारीय चूक नहीं है। ऐसा जान-बूझ कर किया गया है। कल ही ओडिशा के नियमगिरि से एक डोंगरिया कोंढ आदिवासी लड़की को नक्‍सली बताकर गिरफ्तार किया गया था। गृह मंत्रालय नियमगिरि आंदोलन को अपनी रिपोर्ट में माओवादी करार दे चुका है। ज़ाहिर है, माओवाद वहां मंगल ग्रह से तो टपका नहीं। वह इलाका समाजवादी जन परिषद की राजनीति का गढ़ रहा है। किशन पटनायक का पुराना क्षेत्र है। आज भी लिंगराज जैसे कद्दावर नेता वहां डटे हुए हैं। सजप का वर्तमान दूषित करने के लिए ज़रूरी है कि चुपके से उसके अतीत को भी कलंकित कर दिया जाए।

अब भी वक्‍त है। योगेंद्र यादव को अपने सीने में धधकती कथित अपमान की ज्‍वाला पर थोड़ा पानी छिड़कना चाहिए। केजरीवाल से प्रतिशोध की आंच को सिम पर करना चाहिए और जितना ज्ञान जिंदगी भर हासिल किए हैं, उसे सामान्‍य लोगों के बीच बांटने में लग जाना चाहिए। दुख जताने से कुछ नहीं होगा। धीरे-धीरे आपके सारे नायक छीन लिए जाएंगे और बदनाम कर दिए जाएंगे। फिर योगेंद्र यादव के पास घर वापसी का रास्‍ता भी नहीं रह जाएगा।

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एक बार कुमार विश्वास को घेर कर आखेट करने का मौका मिला था। मिश्र बंधु अविनाश और अवनीश उसके साक्षी हैं। सदारत प्रेम भारद्वाज कर रहे थे। दफ्तर पाखी का था। तीन घंटे से भी लंबे चले साक्षात्कार के दौरान रचना प्रक्रिया आदि गंभीर सवालों पर जब उनका कंविंसिंग जवाब नहीं आया तो मैंने उनके बालों की स्टाइल पर सवाल पूछ दिया, कि कोई पढ़ा-लिखा आदमी बीच से मांग नहीं काढ़ता है तो आप ऐसा क्यों करते हैं? एकदम पश्चिमी यूपी के लौंडों जैसे दिखते हैं!

महाकवि इस पर भड़क कर पेशाब करने चला गया और उसके बाद बातचीत ही बंद हो गई। मैंने अलवर के उनके कुछ मित्रों का हवाला भी इंटरव्यू में दिया था जो बताते थे कि ये सज्जन वहां रहते हुए लड़कीबाज़ी के शौकीन थे। भाई ने साफ इनकार कर दिया था। ऐसी कई बातें थीं जिन पर कुमार विश्वास का जवाब अविश्वसनीय और कौमार्यपूर्ण था। बाद में पाखी में जो साक्षात्कार छपा, वह भयंकर रूप से सम्पादित था। शायद कुमार की नज़र से गुजरने और छंटाई के बाद उसे छापा गया था। इस शाकाहारी साक्षात्कार के बावजूद उनकी बहन ने मुझे लिख कर गरियाया था कि आप लोगों ने मेरे भाई को अकेला पाकर सामूहिक शिकार कर लिया।

सच को छांट कर छापने वाले मालिक अपूर्व जोशी ने कुमार से भले ही अपनी दोस्ती निभा दी थी लेकिन आज भी वह टेप पाखी के दफ्तर में रखा होगा। उसे यदि लीक या सार्वजनिक कर दिया जाए, तब जाकर शायद अरविंद केजरीवाल को पता चलेगा कि उनका पाला कैसे जड़ियल जीव से पड़ा है। वैसे भी, जो राजनीतिक दल या अखबार किसी कवि के चक्कर में पड़ा, इतिहास गवाह है कि वो बर्बाद होकर रह गया। कवि चाहे जैसा भी हो, उसे नेता या संपादक कभी नहीं बनाना चाहिए। शर्तिया ले डूबेगा!

पत्रकार, एक्टिविस्ट और मीडिया आलोचक Abhishek Srivastava की एफबी वॉल से.

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‘न्यूज़ किलर एडिटर एसोसिएशन’ अंत की ओर!

मुझे नहीं पता कि आप न्यूज चैनलों में होने वाली एक बड़ी आहट को पढ़ पा रहे है या नहीं। ‘न्यूज़ किलर एडिटर एसोसिएशन’ (अजीत अंजुम, विनोद कापड़ी, सतीश के सिंह, आशुतोष, मिलिंद खांडेकर आदि का गैंग) अपने अंत की ओर बढ़ रही है। इस बात की आहट न्यूज़ 24 चैनल के एक नये फैसले में झलकती है। न्यूज़ 24 ने इंडिया टीवी के प्रखर श्रीवास्तव को अपना नया आउटपुट हेड बनाने का फैसला लिया है। अगर आप ध्यान से देखें तो पिछले एक साल में ये चौथी बार हो रहा है जब किसी मेन स्ट्रीम के चैनल ने नए युवा लोगों पर भरोसा किया है। पिछले एक साल के अंदर आजतक ने मनीष कुमार, ज़ी न्यूज ने रोहित सरदाना, आईबीएन 7 ने आर सी शुक्ला और अब न्यूज़ 24 ने प्रखर श्रीवास्तव को आउटपुट हेड बनाया है।

वहीं इनमें से दो चैनलों ने अपने हेड भी युवा बनाए हैं, न्यूज़ 24 ने दीप उपाध्याय और आईबीएन 7 ने सुमित अवस्थी। यानि साफ है कि चैनल के मालिक भी अब इस ‘न्यूज़ किलर एडिटर एसोसिएशन’ से छुटकारा पाना चाहते हैं। नई पीढ़ी के टीवी प्रोफेशनल्स अब तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और चैनल मालिक भी अब नये लोगों पर भरोसा जता रहे हैं। जहां तक ‘न्यूज़ किलर एडिटर एसोसिएशन’ की बात है तो विनोद कापडी पहले ही मार्केट से आउट होने के बाद फिल्म बनाने के धंधे में लग गए हैं, आशुतोष आप की राजनीति करने में लगे हैं, सतीश के सिंह की सत्ता अब लाइव इंडिया जैसे छोटे से चैनल तक सिमट कर रह गई है, एनके सिंह के पास तो नौकरी के भी लाले हैं, बस बचे हैं तो अजीत अंजुम। लेकिन ‘न्यूज़ किलर एडिटर एसोसिएशन’ के इस असली खिलाड़ी के बचे खुचे दिन ही बाकी हैं। जिस तरह से इन्होने इंडिया टीवी में लाखों रुपये देकर लोगों की भर्तियां की है उसके बाद चैनल के मालिक रजत शर्मा इनसे परफॉरमेंस की उम्मीद करेंगे जो अजीत अंजुम के लिए बहुत कठिन है।

ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अजीत अंजुम के पास इंडिया टीवी में सिर्फ छ महीने का समय है। और अगर अजीत अंजुम बाहर हो जाते हैं तो न्यूज़ चैनलों में खबर की हत्या करने वाले इस ‘न्यूज़ किलर एडिटर एसोसिएशन’ (अजीत अंजुम, विनोद कापड़ी, सतीश के सिंह, आशुतोष, मिलिंद खांडेकर आदि का गिरोह) का अंत तय है। जब इनका समय था तो इन लोगों ने ना सिर्फ ख़बरों की हत्या की बल्कि अपनी जगह बचाने के लिए मालिकों को धोखा देकर अपने-अपने चैनल के सीक्रेट भी एक दूसरे को लीक किए। यहां तक कि कोई इनके पास नौकरी के लिए इंटरव्यू देने आता था तो ये दूसरे चैनल के अपने एडिटर दोस्त को बता देते थे। अपनी जगह बचाने के लिए इन्होने कभी नये लोगों को आगे नहीं बढ़ने दिया। पर लगता है कि इनका समय गुज़र चुका है। आजतक के सुप्रिय प्रसाद इसलिए बचे हैं कि वो कभी इस चौकड़ी का हिस्सा नहीं रहे। 

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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सोशल मीडिया में आशुतोष के आंसुओं की किरकिरी

अजित अंजुम और राना यशवंत, दोनों ने आशुतोष के आंसुओं पर यक़ीन करते हुए, फेसबुक पर हम सबको भी यक़ीन दिलाने की कोशिश की, कि आशुतोष वाकई भावुक थे…गम्भीर थे…और ये आंसू असली थे…

हम आपकी बात पर यक़ीन करना चाहते हैं, लेकिन अगर आप वाकई आशुतोष को इतनी अच्छी तरह जानते हैं और इस सच की पुष्टि कर रहे हैं…तो आपके चैनल इस तथ्य की पुष्टि क्यों नहीं कर रहे हैं? आप दोनों ही के, बल्कि और भी चैनल्स ने लगभग इसके उलट थ्योरी प्रसारित की है…

विनोद कापड़ी का कहना है कि चूंकि, फिलहाल कहीं सम्पादक नहीं हैं…इसलिए उनकी राय पर कोई सवाल नहीं उठा रहा हूं…

ऐसे में भरोसा किस पर किया जाए, आपके चैनलों पर, जहां आप सम्पादक हैं…या फेसबुक की वॉल पर….जहां आप आम आदमी हैं…

क्या दोनों एक साथ सच हो सकते हैं…इसको एक जिज्ञासा के तौर पर ही लीजिएगा…क्योंकि आप सम्पादक के साथ पत्रकार भी हैं…तो फिर आपके द्वारा प्राप्त तथ्यों का प्रयोग चैनल की ख़बर में क्यों नहीं होगा…????

प्रदीप शेखर लिखते हैं- आशुतोष के ड्रामे के बाद ‪आम‬ के भाव गिरे।

शीतल पी सिंह लिखते हैं – गजेन्द्र (जो अब नहीं हैं) के गाँव खेत खलिहान पिता बच्चे भाई और गाँव जवार के लोगों से मिलकर वापस होते हुए…..पहले सोचा था बहुत दिनों बाद इसे रिपोर्ट की तर्ज़ पर लिखूँगा पर अब पता नहीं क्यों मन बदल गया ….शायद ट्विटर और FB पर आशुतोष के आजतक के स्टूडियो में रो पड़ने पर या कुछ और सहज हो लूँ फिर देखता हूँ।

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आशू के आंसू : उस दिन तो साढ़े तीन सौ घरों के चूल्हे बुझ जाने पर भी नहीं रोए थे आशुतोष

जब आईबीएन7 से साढ़े तीन सौ लोग निकाले गए थे और इनके घरों का चूल्हा अचानक ठंडा पड़ गया था तब मैनेजिंग एडिटर पद पर आसीन आशुतोष के आंसू तो छोड़िए, बोल तक नहीं फूटे थे. धरना प्रदर्शन सब हुआ लेकिन आशुतोष चुप रहे. आजकल वे अक्सर टीवी शोज में कहते रहते हैं कि मैं नौकरी छोड़कर राजनीति में आया… पर हम लोगों को पता है कि आशुतोष को निकाला जाना था… कारपोरेट में एक वाक्य होता है स्मूथ एक्जिट. यानि लात मार कर निकाले जाने से पहले सम्मानजनक तरीके से खुद छोड़ देने की प्रक्रिया. 

तब आशुतोष ने यही किया था. बजाय नया चैनल खोजने के, वे केजरीवाल को खोज चुके थे, अन्ना आंदोलन पर किताब लिखकर केजरीवाल के गुडबुक में आ चुके थे, सो राजनीति में कूद पड़े. आशुतोष के करियर को ध्यान से देखें तो उसमें टर्निंग प्वाइंट तभी आया जब उनके साथ कोई हादसा घटिया हुआ या प्लान हुआ. एक बार बेडरूम में घुसने की कोशिश में तमाचा क्या पड़ा, पत्रकारिता में इनकी गाड़ी दौड़ पड़ी, सौजन्य से कांशीराम-एसपी सिंह. एक तमाचे से आशुतोष का पत्रकारीय करियर संवर गया. 

अब जबकि आशू की राजनीतिक गाड़ी गड़बड़ाई डगमगाई हुई है, बेतुकी बयानबाजी और ओवर रिएक्शन के कारण, तो उन्होंने बिलकुल सही समय पर बिलकुल सही चैनल चुना और फफक फूट कर आंसू बहाने लगे, लाइव.. पीपली लाइव में ये वाला लाइव ऐसा कि कुछ भावुक दर्शक भी रुमाल निकाल पड़े. जो शख्स दशकों तक टीवी, टीआरपी. लाइव और इमोशंस का मास्टर रहा हो, उसे खूब पता है कि वह क्या कर रहा है. और, उसे यह भी पता है कि यह भावुक देश उसके रोने के बाद उसके सारे पाप माफ कर देने की कूव्वत रखता है. 

सच कहूं तो सोनिया राहुल मनमोहन कांग्रेस और मोदी अमित शाह राजनाथ भाजपा के मुकाबले बहुत छोटे पापी हैं केजरीवाल, आशुतोष, सिसोदिया आदि इत्यादि लेकिन जब पूरा का पूरा कारपोरेट करप्ट मीडिया इन बड़े पापियों के हिसाब से संचालित होते हों, छोटे मोटे पापी पकड़कर गला दबाते हों तो तो छोटे मोटे पापियों को पाप धोने का देसी तरीका रुदालियों की तरह लोटपोट करके रोना छाती पीटना और माफी मांगना ही तो हो सकता है. इसलिए आशुतोष को आप लोग भी माफ करिए… लेकिन ध्यान रखते हुए कि इन सज्जन के संपादकत्व में सैकड़ों घरों के चूल्हे बुझे थे, पर इनकी आत्मा ने तब इन्हें झकझोरा नहीं, इनकी आंखों ने एक बूंद आंसू नहीं टपकाए, इनके मुंह से सांत्वाना के एक बोल नहीं फूटे… सो, आशू भाई… मैं तो यही कहूंगा… ”रोइए जार-जार क्या, कीजिए हाय-हाय क्यों…”

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

यशवंत का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

किसान की खुदकुशी और बाजारू मीडिया : कब तक जनता को भ्रमित करते रहोगे टीआरपीखोर चोट्टों….

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गजेंद्र की बेटी मेघा से बात कर फफक पड़े आशुतोष, मेघा ने कहा- मीडिया गलत आरोप न उछाले

नई दिल्ली: दिल्ली के जंतर मंतर पर फांसी लगाने वाले राजस्थान के किसान गजेंद्र सिंह कल्याणवत की बेटी मेघा से बात करते हुए आप नेता आशुतोष आज फूट-फूट कर रो पड़े। उन्होंने ‘आजतक’ न्यूज चैनल पर गजेंद्र की बेटी मेघा से बात करते हुए कहा कि मैं तुम्हारा गुनहगार हूं। मैं राजनाथ सिंह, अजय माकन, संबित पात्रा से गुजारिश करता हूं कि ऐसी राजनीति मत करिए। पार्टियां ऐसी राजनीति न करें। हम पर साजिश के आरोप लगाए जा रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस को इस मामले में राजनीति नहीं करनी चाहिए। मीडिया भी इस तरह का जर्नलिज्म न करे। मैं कुसूरवार हूं तो मुझे फांसी पर चढ़ा दे। जब आशुतोष रो रहे थे, चैनल पर भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा, कांग्रेस के नेता राजीव त्यागी भी बातचीत में शामिल थे।

मेघा ने कहा कि मेरे पिता तो नहीं रहे लेकिन पत्रकार इस तरह से किसी को दोषी न ठहराएं। मैं बोल नहीं पा रही हूं क्योंकि मेरे पिता मुझसे हमेशा के लिए अलग हो गए। मेरे परिवार को, हम तीन भाई बहनो को छोड़ कर चले गए। अब इस मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जिन्होंने उनको उकसा कर पेड़ पर चढ़ाया, जिन्होंने उनके नाम से जाली सुसाइड नोट लिखा, वे गुनगहार दुनिया के सामने आने चाहिए। मेघा ने कहा कि जो लोग मेरे पिता की मृत्यु का वीडियो बना रहे थे, क्या उन्हें बचाने के लिए आगे नहीं आना चाहिए था?

आशुतोष ने कहा कि मुझे चाहे जो सजा दीजिए, मुझे फांसी पर चढ़ा दीजिए लेकिन ऐसी राजनीति बंद करिए। गजेंद्र कोई पहला किसान नहीं, जिसने आत्महत्या की हो। विदर्भ में सैकड़ों किसान इस तरह जान दे चुके हैं। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, संजय सिंह, कुमार विश्वास और मुझ पर इंसानियत का वास्ता देते हुए आरोप लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि आम आदमी पार्टी ने आत्महत्या के लिए गजेंद्र को उकसाया।  

उन्होंने कहा कि सब लोग मिल-बैठकर कोई ऐसी तरकीब निकालें, कोई ऐसी व्यवस्था बनाएं कि आगे कोई किसान इस तरह से फिर आत्महत्या न करे। इसके लिए कानून में व्यवस्था की जाए। मीडिया भी इस तरह से खबरें लिखना-दिखाना बंद करे। ये जर्नलिज्म नहीं है। ऐसा जर्नलिज्म मत करिए। मैं भी लंबे समय तक मीडिया में रहा हूं। 

आशुतोष ने कहा कि मैं गजेंद्र की बेटी मेघा की राय से सहमत हूं। देश के सामने सच आना चाहिए। अभी सच का किसी को पता नहीं। मेघा का परिवार जो कहेगा, जो चाहेगा, वह करने के लिए हम तैयार हैं। हम भी इंसान हैं। हमारी इंसानियत पर तोहमत मत लगाइए। अगर किसी इससे शांति मिले तो हमे फांसी पर चढ़ा दे लेकिन मेरे जमीर को न ललकारे। 

गौरतलब है कि इससे पहले  दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी के जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी (आप) की रैली के दौरान एक किसान की आत्महत्या की घटना के बावजूद अपना भाषण जारी रखने के लिए माफी मांग चुके हैं। किसान गजेंद्र की खुदकुशी पर सवाल उठ रहे हैं। गजेंद्र के परिवार ने ही उनकी खुदकुशी पर सवाल उठाते हुए कहा है कि जो सुसाइड नोट बरामद किया गया है, वह गजेंद्र की हेंडराइटिंग में नहीं है। परिवार ने गजेंद्र की डायरी भी एक न्यूज चैनल को दिखाई है, जिससे लगता है कि सुसाइड नोट की हैंडराइटिंग गजेंद्र की हैंडराइटिंग से मेल नहीं खाती है। पीड़ित परिवार पूरे मामले की जांच की मांग कर रहा है। 

यह भी उल्लेखनीय होगा कि आप नेता कुमार विश्वास ने रैली के दौरान कहा था कि राजस्थान के रहने वाले एक किसान ने खुदकुशी की कोशिश की है। कुमार ने पूरी चिट्ठी पढ़कर सुनाते हुए कहा था कि मीडिया ने ये लेटर मुझे दिया है जिसमें लिखा है कि गजेंद्र की पूरी फसल बर्बाद हो गई है और उसके तीन बच्चे हैं। उसके पिता ने उसे घर से निकाल दिया है। इस चिट्टी में लिखा है कि मैं खुदकुशी कर रहा हूं, लेकिन उस नोट में कहीं भी नहीं लिखा है कि ‘मैं खुदकुशी कर रहा हूं।’

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आम आदमी पार्टी के आशुतोष को रवीश कुमार का खुला पत्र

आशुतोष जी,

मैं आज दिल्ली में नहीं था। देवेंद्र शर्मा के साथ रिकॉर्डिंग कर रहा था कि किसानों की इस समस्या का क्या कोई समाधान हो सकता है। हम गेहूं के मुरझाए खेत में एक मायूस किसान के साथ बात कर रहे थे। हमने किसान रामपाल सिंह से पूछा कि आपके खेत में चलेंगे तो जो बचा है वो भी समाप्त हो जाएगा। पहले से मायूस रामपाल सिंह ने कहा कि कोई बात नहीं। इसमें कुछ बचा नहीं है। अगर आपके चलने से दूसरे किसानों को फायदा हो जाता है तो मुझे खुशी होगी। वैसे भी अब इसका कोई दाम तो मिलना नहीं है, कुछ काम ही आ जाए। ये उस किसान का कहना है जो चाहता है कि उसकी बर्बादी के ही बहाने सही कम से कम समाधान पर बात तो हो। शायद गजेंद्र ने भी इसी इरादे से जान दे दी जिस इरादे से रामपाल सिंह ने हमारे लिए अपना खेत दे दिया।

हम इसलिए दिल्ली से करनाल आ गए थे कि समाधान पर बात नहीं हो रही थी। कांग्रेस बीजेपी की तमाम बहसों से सबका बहिखाता तो खुल रहा था मगर बात आगे नहीं बढ़ रही थी। मैंने सहयोगी शरद शर्मा की वो भी रिपोर्ट भी देखी थी कि दिल्ली सरकार ने बीस हज़ार रुपये प्रति एकड़ मुआवज़ा देने का ऐलान किया है लेकिन किसी किसान को मुआवज़ा नहीं मिला है। आपके ही विधायक देवेंद्र सहरावत दिल्ली और उसके आस-पास किसानों की इस समस्या को लेकर हरकत में आने वाले पहले नेताओं में से थे। अगर मुझे ठीक-ठीक याद है तो देवेंद्र सहरावत ने मीडिया को कई एसएमएस किया था कि स्थिति बहुत ख़राब है। तब से लेकर आज तक दिल्ली में कितने किसानों को मुआवज़ा दिया गया है इसकी कोई सार्वजनिक जानकारी नहीं है। जंतर-मंतर की रैली से दो दिन पहले की गई शरद शर्मा की रिपोर्ट बताती है कि वहां कोई सर्वे करने वाला नहीं गया है। किसान कब तक इंतज़ार करते लिहाज़ा गेहूं काटने लगे हैं।

शायद दिल्ली सरकार बिना सर्वे के ही चौपालों के ज़रिये किसानों को सीधे पैसा देने की बात कर रही है। ऐसी कोई चौपाल हुई है या नहीं मगर मोहल्ला सभा की विस्तृत रिपोर्ट अख़बारों में पढ़ी है। चौपाल में विधायक और प्रधान के बीच लोगों से पूछकर मुआवज़ा देने की बात वाकई नायाब है। अगर ऐसा है तो दिल्ली सरकार को अब तक मुआवज़ा बांट देना चाहिए था क्योंकि उसे बाकी सरकारों की तरह सर्वे करने और तहसीलदार से कलक्टर तक रिपोर्ट भेजने की लंबी प्रक्रिया से नहीं गुज़रना है। वैसे सर्वे वाले राज्यों में जहां पूरा सर्वे भले न हुआ हो केंद्र सरकार को रिपोर्ट दे दी गई है। यह भी एक किस्म का फर्ज़ीवाड़ा है जो चल रहा है।

ख़ैर तो क्या आप बता सकते हैं कि केंद्र सरकार को दिल्ली सरकार ने कोई रिपोर्ट भेजी है या नहीं। दिल्ली सरकार ने रैली के पहले तक कितने किसानों को बीस हज़ार प्रति एकड़ की राशि से पैसे बांट दिए हैं। यह बताना इसलिए भी ज़रूरी है ताकि यह बाकी राज्यों के लिए भी नज़ीर बन सके। अगर दिल्ली सरकार नुकसान के वक्त लागत में मुनाफ़ा जोड़कर मुआवज़ा देने का ऐलान कर सकती है तो क्या उससे यह उम्मीद की जाए कि वह न्यूनमत समर्थन मूल्य भी बाकी राज्यों से ज्यादा देगी। अगर केंद्र सरकार का कोई कानून आड़े नहीं आता हो तो।

खेती संकट पर बनी तमाम कमेटियों ने सुझाव दिये हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की जगह लागत पर मुनाफा जोड़कर तय मूल्य पर किसानों से उत्पाद खरीदा जाए। दिल्ली में हरियाणा या उत्तर प्रदेश की तरह किसानों की संख्या भी उतनी नहीं होगी इसलिए क्या यह उम्मीद की जा सकती है इस छोटे से राज्य में ऐसा हो सकता है। इतना सब लिखने का मेरा यही मकसद है कि इसी बहाने किसानों का कुछ भला हो जाए। मुआवज़े के साथ-साथ कुछ ठोस नीति बन जाए। इसीलिए आपने देखा होगा कि मैंने इस लेख की शुरूआत आपसे से तो की मगर आपके उस बयान से नहीं कि जो आपने जंतर मंतर की घटना के बाद दिया है।

अच्छा किया जो आपने माफी मांग ली पर क्या आप यह भी बता सकते हैं कि माफी मांगने लायक बयान देते वक्त आप किस मनोदशा से गुज़र रहे थे। गजेंद्र की आत्महत्या से तो आप भी काफी दुखी होंगे फिर दुख के समय ऐसे तेवर वाले बयान कैसे निकल गए। क्या आपको गुस्सा आ गया कि आत्महत्या को लेकर आपके नेता को घेरा जा रहा है। पत्रकार क्यों पूछ रहे हैं कि आत्महत्या के बाद रैली क्यों चलती रही। लोग तो ट्वीटर पर मीडिया से भी पूछ रहे हैं कि कैमरे वालों ने क्यों नहीं देखा या बचाने का प्रयास किया।

क्यों गुस्सा आया। क्यों आपने कहा कि अगर अगली बार कुछ ऐसा होगा तो दिल्ली के मुख्यमंत्री पेड़ पर चढ़ जाएंगे और व्यक्ति को बचा लेंगे। आप भूल गए कि आपके ही मुख्यमंत्री बिजली के खंभे पर चढ़कर तार काटने की बात करते थे। आप भूल गए कि मुख्यमंत्री होने के बाद भी विरोधी से लेकर पत्रकार असहज सवाल पूछ सकते हैं। सवाल गलत भी हो सकते हैं। सही भी हो सकते हैं। लेकिन इस बयान में अतिरिक्त निष्ठा जताने के अलावा यह प्रवृत्ति भी नज़र आ रही है कि मुख्यमंत्री का नाम इस विवाद में कैसे ले लिया गया। मुझे लगता है कि अगर सरकारें समाधान की तरफ बढ़ेंगी तो किसी को गुस्सा नहीं आएगा बल्कि उसके भीतर सेवा भाव जागेगा।

निश्चित रूप से इस घटना पर राजनीति हो रही है जैसे किसानों की दशा को लेकर राजनीतिक रैलियां हो रही हैं। मैं नहीं कह रहा कि गजेंद्र की मौत के लिए आप ज़िम्मेदार हैं या आपमें से कोई मंच छोड़कर बचा सकता था। जो भी है गजेंद्र आपकी रैली में आया था इसलिए वो आपका मेहमान होने के साथ-साथ सहयात्री भी है। क्या पता उसने इस रैली में राजनीति के उस विराट सत्य को देख लिया हो जिसके बारे में वो ख़त लिखकर लाया था। गजेंद्र के लिए कोई पेड़ पर नहीं चढ़ सकता था इसीलिए वो ख़ुद पेड़ पर चढ़ गया।

एक सहयात्री की मौत का दुख तेवर वाले बयानों से ज़ाहिर नहीं करते। भले ही बीजेपी या कांग्रेस के नेताओं ने राजनीतिक बयान दिये हों या उन बयानों में भी वैसी क्रूरता हो जैसी आपके इस बयान में नज़र आई लेकिन गजेंद्र की मौत सभी सरकारों और समाजों के लिए शर्मनाक है। यह सामूहिक शर्म और चिन्ता का समय है। जंतर-मंतर और रामलीला मैदानों को छोड़ वैसे ही राहत सामग्री लेकर खेतों में जाने का समय है जैसे बाकी आपदाओं के वक्त लोग जाते हैं।

रवीश कुमार

चर्चित टीवी जर्नलिस्ट रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से साभार.

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आशुतोष जैसा एक मीडियॉकर पत्रकार और बौनी संवेदना का आदमी ही इतनी विद्रूप बातें बोल सकता है!

Vishwa Deepak : गजेन्द्र नामक ‘किसान’ की आत्महत्या के बारे में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष कहते हैं- ”यह अरविंद केजरीवाल की गलती है. उन्हें मंच से उतर जाना चाहिए था.उन्होंने गलती की. अगली बार मैं केजरीवाल को कहूंगा कि वो मंच से उतर पेड़ पर चढ़ें और लोगों को बचाएं.”

एक मीडियॉकर पत्रकार और बौनी संवेदना का आदमी ही इतनी विद्रूप बातें बोल सकता है. पत्रकार के रूप में इनका क्लेम टू फेम रहा है कांशीराम का थप्पड़. और…? अगर टीवी नहीं होता या हमारे समाज की मीडिया अंडरस्टैंडिंग ज्यादा होती तब? जैसे 1920-30-40 के बीच पैदा होने वाले अपने आप स्वाधीनता संग्राम सेनानी बन गए, वैसे ही बहत से लोग हिंदी पत्रकारता के ‘सेनानी’ हैं. कई बार घिन आती है अपने पेशे से जिसे बहुत सारे लोगों ने बहुत कुछ छोड़ कर के चुना था.

Satish Tyagi : Can not write in Hindi due to net problem but its urgent.—many years ago ashutosh was slapped by kanshiram ji. today ashutosh crossed all the limits. had he uttered such words in my presence I would have certainly slapped him. How come such an insensitive guy survived in media for so long. Chullu bhar pani men doob maro ashutosh.

विश्व दीपक और सतीश त्यागी के फेसबुक वॉल से.

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मीडिया की तरह राजनीति को भी सर्कस बनाना चाहते हैं आशुतोष

आशुतोष ने एक ट्वीट किया है जिसमें उन्होंने मीडिया को माफ़ी मांगने की सलाह दी है. उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा है – “Will media apologise?ASIF KHAN claimed a sting on Sanjay Singh.He has none.It ran as headline/every channel has his interview.#MediaFooled”.

दूसरा ट्वीट कर आशुतोष फिर लिखते हैं- 

इसी ट्वीट पर मीडिया मामलों के विशेषज्ञ विनीत कुमार लिखते हैं- आशुतोष वैलिडिटी पीरियड के सरोकारी पुरुष हैं. आशुतोष आज आम आदमी पार्टी के नेता और कल देश के प्रधानमंत्री भी हो जाएँ तो भी कभी भी ये नैतिक हक नहीं रखते कि मीडिया से अपने को अलग रखकर उपदेश दे सकें. अपने मीडिया मालिकों के आगे चेहरा चमकाने के दौरान ये हक बहुत पहले खो चुके हैं.

आशुतोष जैसे लोग न्यूज़ चैनल के वो चेहरे रहे हैं जिसने न्यूज़रूम के भीतर संपादक जैसी संस्था को ख़त्म करके मीडियाकर्मी को मालिक का चम्पू बन जाने को प्रोत्साहित किया..पत्रकार विरोधी मैनेजमेंट के अभियान का हिस्सा रहे है..जिसे वो अब मीडिया के दल्ले कहते हैं,उनमे से अधिकांश लोग उनके सामने बने हैं और इन्होंने कुछ नहीं किया.

आज इनके लिए आम आदमी पार्टी की राजनीति उतनी ही सही है,जितनी इनके मीडिया में रहने तक कॉर्पोरेट और उनकी ताकतें सही रही हैं. आशुतोष अपने मूल चरित्र में अलोकतांत्रिक रहे हैं, मीडिया के भीतर भी और अब उसके बाहर भी.

जब अच्छा-बुरा का पैमाना आपके होने-न होने से तय होने लगे तो आप वैसे भी लोकतान्त्रिक नहीं रह जाते. कोई पूछे तो सही कि दिल्ली के लोगों ने इन्हें मीडिया के रिंग मास्टर होने के लिए चुना है या फिर मीडिया के रिंग मास्टर हो जानेवाली व्यवस्था को बदलने के लिए.

आशुतोष अभी भी न्यूज़रूम के आका वाली माइंड सेट से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. यदि वो डंके की चोट पर टीवी शो नहीं चला पाये तो कम से कम डंडे की चोट पर राजनीति न ही करें.आशुतोष वैसे भी बेसलेस बातें करने के लिए मशहूर रहे हैं जिसका एकल प्रदर्शन वो जब-तब टीवी पर करते रहते हैं.मीडिया वही फसल काट रहा है,जिसे नॉएडा फ़िल्म सिटी में बो कर आशुतोष राजनीति में आये..मीडिया में रहकर भी इसे सर्कस बनाया और अब राजनीती में भी आकर.

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डिबेट में अर्णब ने जब किया आशुतोष को शर्मसार

दिल्ली : अर्णव गोस्वामी को दाद तो देनी ही पड़ेगी. साथ ही उनकी प्रोडक्शन टीम को. जिस तरह आशुतोष की कही बात को उन्होंने Live झूठा करार दिया और उस दिन के फुटेज को तुरंत चला दिया, आशुतोष हतप्रभ रह गए. इसे कहते हैं तेजी. टीवी की तेजी, जवाब देने की तेजी, टीम की तेजी… और अर्णब के तेवर देखिए. वो भी पूरे रौ में हैं. मजा आ गया.

https://www.youtube.com/watch?v=xCRn6Rmxcn8

और आशुतोष के बारे में क्या कहें. पत्रकारिता में थे तो ये भी तेज-तर्रार एंकर हुआ करते थे. राजनीति में जाने के बाद पता नहीं सब कुछ हवा हो गया. अर्णब ने तो ऑन एयर कह दिया कि– आशुतोष, मैं आपको लम्बे समय से जानता हूं, इसलिए नैशनल टीवी पर आपको embarrass नहीं करना चाहता था. और आशुतोष को आईना दिखाने के बाद कह दिया कि अभी के अभी माफी मांगिए, आपने झूठ बोला है और आपका झूठ हम अभी टाइम्स नाऊ पर दिखा रहे हैं. So Ashutosh, Apologize.

आशुतोष बेचारे करें भी तो क्या. उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा. लगता है कि blank हो गए हैं. बार-बार अपने चश्मे के फ्रेम को ठीक कर रहे हैं. अफसोसनाक. आशुतोष को ऐसा करते देख दुख भी हुआ. इसे कहते हैं सार्वजनिक रूप से भद्द पिटना. अर्णब के News Hour Debate का ये हिस्सा देखने लायक है. 

(‘मीडिया खबर’ से साभार)

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‘अमर उजाला’ के आशुतोष मिश्र और टीम को केसी कुलिश अवार्ड

‘अमर उजाला’ कानपुर के सीनियर रिपोर्टर आशुतोष मिश्र और उनकी टीम को केसी कुलिश इंटरनेशनल मेरिट अवॉर्ड देने की घोषणा की गई है। मेरिट अवार्ड के लिए ‘अमर उजाला’ की ओर से भेजी गई दोनों एंट्रीज को चुन लिया गया है। टीम को यह अवार्ड 14 मार्च को जयपुर राजस्थान में होने वाले कार्यक्रम में दिया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय पुल्तिजर पुरस्कार जैसे ख्यातिलब्ध केसी कुलिश इंटरनेशनल अवार्ड का प्रथम पुरस्कार 11 हजार यूएसए डॉलर है। इसके अलावा दस मेरिट अवॉर्ड भी दिए जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय समाचार जगत में उल्लेखनीय पत्रकारिता के लिए यह पुरस्कार राजस्थान पत्रिका समूह की ओर से दिया जाता है।

 खोजी पत्रकारिता की श्रेणी में दिए जाने वाले केसी कुलिश अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन प्रिंट जर्नलिज्म की जूरी ने आशुतोष मिश्र और उनकी टीम को दो एंट्रीज में अवार्ड दिया है। पहला अवार्ड पाकिस्तानी नागरिक इदरीस की पोल खोलने और उसे जेल तक पहुंचाने के लिए मिला है। दूसरा पुरस्कार कानपुर के राजा हिंदू के किले पर अवैध रूप से कब्जा करने वालों का खुलासा कर किले को फिर से पब्लिक लैंड घोषित कराने पर दिया गया है। ‘अमर उजाला’ की इस टीम में सीनियर रिपोर्टर आशुतोष मिश्र के साथ सीनियर सब एडिटर अभिषेक सिंह, सीनियर फोटो जर्नलिस्ट संजय लोचन पांडेय और फोटो जर्नलिस्ट धीरेंद्र जायसवाल शामिल थे। आशुतोष मिश्र को केसीके पदक, प्रमाण पत्र और टीम के सदस्यों को प्रमाण-पत्र दिए जाएंगे।

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”मनीष सिसोदिया और आशुतोष खुद पत्रकार रहे हैं और अब वही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोटना चाहते हैं”

दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (डीजेए) केजरीवाल सरकार द्वारा दिल्ली सचिवालय में पत्रकारों के प्रवेश पर प्रतिबंध की कड़ी निंदा करता है और साथ ही दिल्ली के उप-राज्यपाल से मांग करता है कि वह प्रेस की आजादी को बचाने के लिए हस्तक्षेप करें और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को फौरन इस प्रतिबंध को हटाने का निर्देश दें। पिछली बार भी जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी थी तब भी केजरीवाल सरकार ने पत्रकारों के सचिवालय में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन पत्रकारों के प्रबल विरोध और सचिवालय पर धरना प्रदर्शन के बाद यह प्रतिबंध हटा लिया गया था। इस बार भी पत्रकार इसके विरोध में मीडिया रूम में दो दिन से डटे हुए हैं।

डीजेए आंदोलनकारी पत्रकारों के साथ है और उनकी मांगों का समर्थन करता है। एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज वर्मा ने केजरीवाल सरकार से सचिवालय में मीडियाकर्मियों के प्रवेश पर से फौरन प्रतिबंध हटाने की मांग करते हुए कहा कि दुख इस बात का है कि जिस मीडिया ने अरविंद केजरीवाल को अरविंद केजरीवाल बनाया, मुख्यमंत्री बनते ही वही अब मीडिया से न केवल दूरी बनाने लगे हैं बल्कि उसके प्रवेश पर प्रतिबंध तक लगा दिया है। तब और हैरानी होती है जब आम आदमी पार्टी के दो बड़े नेता, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और आशुतोष खुद पत्रकार रहे हैं और अब वही संविधान द्वारा आम आदमी को दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का गला घोटना चाहते हैं।

मनोज वर्मा ने कहा कि केजरीवाल सरकार के लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के घला घोटने के फैसले से साफ पता चलता है कि वह लोकतंत्र और उसके बुनियादी वसूलों में विश्वास नहीं करती और उसका रवैया तानाशाही का है। एसोसिएशन के पदाधिकारी इस बारे में जल्दी ही दिल्ली के उप राज्यपाल, केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री और प्रेस काउंसिल के चेयरमैन से मिल कर इस प्रतिबंध को हटाने की मांग करेंगे। अगर जल्द ही प्रतिबंध नहीं हटाया गया तो डीजेए सड़कों पर उतर कर केजरीवाल सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाएगा।

भवदीय
अनिल पांडेय
महासिचव
डीजेए

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छल-कपट वाली इस राजनीति में मैं अनफिट हूं : आशुतोष

आम आदमी पार्टी के नेता औऱ पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष ने ‘मुखौटे का राजधर्म’ नामक किताब लिखी है. किताब के विमोचन से पहले कहा कि, राजनीति में छल-कपट है, मैं राजनीति में अनफिट हूं. आप नेता और पूर्व पत्रकार ने ट्वीट किया, ”मेरी किताब ‘मुखौटे का राजधर्म’ का विमोचन आज हाल नं 8, प्रगति मैदान में शाम 4.20 बजे है. नामवर सिंह, शशिशेखर किताब पर चर्चा करेंगे. आप आमंत्रिति हैं.

आशुतोष ने अपनी किताब पर प्रकाश डालते हुए ट्वीट किया, ”लिखना आत्ममंथन है. ख़ुद को और समाज को खोजना है. ‘मुखौटे का राजधर्म’ मेरी निजी यात्रा है. एक व्यक्ति के तौर पर और एक पत्रकार के तौर.”

आशुतोष खुद को एक पत्रकार के तौर पर लोगों के बीच याद रखे जाने की तमन्ना रखते हैं. उन्होंने लिखा, ”मुझे क्या पसंद है? लिखना या राजनीति. लेखन जीवन है, राजनीति एक पड़ाव. पत्रकार के तौर पर याद किया जाऊँ, बस इतनी सी ख़्वाहिश है.”

आखिर केजरीवाल के मन में चल क्या रहा है? यह सवाल आशुतोष के इस ट्वीट से भी उठता है जिसमें उन्होंने लिखा है, ”राजनीति में छल है, कपट है. आत्मा संकीर्ण होती है. लेखन आत्मा का विस्तार है. स्व से साक्षात्कार है. राजनीति में मैं अनफ़िट हूँ.”

आशुतोष ने आगे लिखा, ”छोटे शहर से निकला हूँ. अंतिम साँस तक ईमानदार बना रहू, बस इतना तप है. जैसे चोला लेकर आया हूँ, वैसे का वैसा रख देना चाहता हूँ.”

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पंकज श्रीवास्तव की प्रेस कांफ्रेंस के लिए केजरीवाल ने जुटा दी मीडिया वालों की भीड़!

अगर फिक्सिंग होती है तो हर कदम पर दिखने लगती है. नाकारापन और अकर्मण्यता के आरोपों में आईबीएन7 से निकाले गए पंकज श्रीवास्तव ने तयशुदा रणनीति के तहत अपने संपादक को एक मैसेज भेजा. उस मैसेज का स्क्रीनशाट लिया. उसे क्रांतिकारी भाषण के साथ फेसबुक पर लगा दिया. ‘आप’ वालों ने फेसबुक और ट्विटर पर पंकज को शहीद बताते हुए उनके मसले को वायरल करना शुरू किया. ‘आप’ नेता आशुतोष, जो कभी आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं, ने पंकज के मसले को जोरशोर से सोशल मीडिया पर उठाया.

पंकज ने आज चार बजे प्रेस क्लब आफ इंडिया में प्रेस कांफ्रेंस करने की घोषणा की. इसके पहले केजरीवाल ने आज दिन में दो बजे प्रेस क्लब आफ इंडिया में प्रेस कांफ्रेंस करने की घोषणा की थी. लेकिन केजरीवाल ने ऐन वक्त, जब मीडिया के लोग प्रेस क्लब में जुट गए थे, अपनी प्रेस कांफ्रेंस रद्द कर दी. इस तरह सारे मीडिया वालों के सामने पंकज श्रीवास्तव नमूदार हुए. आशुतोष भी आ गए. इनने अपनी-अपनी भड़ास निकाली. लंबे लंबे सिद्धांत पेले. देखते जाइए, चुनाव भर शहीद बनते घूमने के बाद पंकज श्रीवास्तव चुनाव बाद आम आदमी पार्टी के साथ सक्रिय हो जाएंगे और 2017 के यूपी विधानसभा इलेक्शन में विधायक का चुनाव लड़ जाएंगे.

इस मामले पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर उर्फ समर अनार्या ने फेसबुक पर कुछ लिखा है, जो इस तरह है….

Samar Anarya : आप नेता आशुतोष आईबीएन7 से पंकज श्रीवास्तव भाई की बर्खास्तगी पर मार लालपीले हो रहे हैं. बाकी इनके अपने मैनेजर काल में 200 (पूरे समूह से 350) लोग निकाले गए थे तब भाई कुछ नहीं बोले थे! इधर वाली जनता अभी मोदिया नहीं हुई है आशुतोष भाई.

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Samar Anarya : पंकज श्रीवास्तव की आईबीएन 7 के एसो.एडिटर पद से बर्खास्तगी दुखद है, पर न जाने क्यों इसी आईबीएन 7 (और नेटवर्क 7 समूह के बाकी चैनलों) से अगस्त 2013 में 320 से ज्यादा पत्रकारों को एक साथ निकाल दिया जाना याद आ गया.(अब) आप नेता आशुतोष के गुस्से भरे ट्वीट देखते हुए उनका इतनी बड़ी छंटनी के बाद सड़क पर आ गये पत्रकारों के बीच ऐम्बीअन्स मॉल में मद्रास कैफ़े का ‘प्रीव्यू’ देखना भी. ये मुट्ठियाँ तब भिंची होतीं तो शायद बात यहाँ तक न पंहुचती. अपने ऊपर न होने तक हमलों पर भी क्रांतिकारिता जागती तो बात यहाँ तक न पंहुचती, शायद. खैर, जब भी शुरू हो, लड़ाई में साथ देना बनता है. पर बहुत कुछ याद रख के. उस दौर के दो स्टेटस लगा रहा हूँ. ताकि सनद रहे वाले अंदाज में-
https://www.facebook.com/samar79/posts/10201740504700560
https://www.facebook.com/samar79/posts/10201728758446911

पूरी कहानी जानने के लिए इस मूल पोस्ट को पढ़ें….

आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

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आशुतोष से फिक्सिंग के बाद ‘बागी’ बने पंकज श्रीवास्तव, 2017 में ‘आप’ के टिकट से यूपी में लड़ेंगे चुनाव!

एसोसिएट एडिटर पंकज श्रीवास्तव को नान-परफारमेंस में खुद की बर्खास्तगी का एहसास पहले से था. इसी कारण उन्होंने कभी आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर रहे और आजकल ‘आप’ के खास नेता बने घूम रहे आशुतोष से संपर्क साधा. आशुतोष के जमाने में ही पंकज श्रीवास्तव की भर्ती हुई थी. आशुतोष और पंकज की डील हुई. इसी डील के तहत यह तय हुआ कि ऐन चरम चुनावी प्रक्रिया के बीच पंकज श्रीवास्तव अपने नए मैनेजिंग एडिटर सुमित अवस्थी को ‘आप’ और केजरीवाल को लेकर एक मैसेज करेंगे. सबको पता है कि टीवी में इस तरह के आंतरिक मैसेज का अंजाम क्या होता है. पंकज श्रीवास्तव को समय से पहले यानि चुनाव बाद तय बर्खास्तगी से पहले ही बर्खास्त कर दिया गया.

पंकज ने बर्खास्त होते ही पहले से तय रणनीति के तहत सुमित अवस्थी को भेजे गए मैसेज का स्क्रीनशाट फेसबुक पर लगा दिया और साथ ही बेहद क्रांतिकारी जोशीला भाषण लिख डाला. जो पंकज श्रीवास्तव अपने फेसबुक वॉल पर किसी भी पोस्ट के लिए अपने फ्रेंड्सलिस्ट से बाहर के लोगों के लिए कमेंट बाक्स बंद रखते हों, उन पंकज श्रीवास्तव की ये क्रांतिकारी पोस्ट देखते ही देखते सैकड़ों बाहर शेयर हो गई. इसके पीछे ‘आप’ नेता आशुतोष का हाथ था. उनके इशारे पर ‘आप’ की आईटी विंग ने धड़ाधड़ शेयर करना शुरू कर दिया.

पंकज श्रीवास्तव के मसले पर ‘आप’ नेता आशुतोष ने खेलना शुरू कर दिया, ट्विटर के जरिए, ताकि इस बर्खास्तगी का फायदा ‘आप’ को मिल सके और ‘भाजपा’ को डैमेज किया जा सके. आशुतोष ने जो फटाफट तीन ट्वीट किए हैं पंकज के मसले पर, उससे साफ जाहिर होता है कि उन्हें सब कुछ पता था और सब कुछ उनकी सहमति से हुआ.  आशुतोष के ट्वीट को आम आदमी पार्टी की तरफ से रीट्वीट किया गया और देखते ही देखते पूरा मामला वायरल हो गया. आशुतोष के तीन ट्वीट इस तरह हैं…

ashutosh ‏@ashutosh83B
IBN7 is owned by Reliance. Sacking of Pankaj shows BJP and Reliance can go to any extent to stop AAP in Delhi .

ashutosh ‏@ashutosh83B
Pankaj wrote an SMS to his editor at 8pm, his services was terminated by 1030. Editor Umesh Upadhaya is brother of Satish Upadhaya , cont..

ashutosh ‏@ashutosh83B
Pankaj Srivastav, associate Editor in IBN7 was sacked because he objected blackout of AAP and Kejriwal on channel . Cont…

चर्चा है कि पंकज श्रीवास्तव की आशुतोष से जो डील हुई है, उसके तहत पंकज 2017 के यूपी के विधानसभा चुनाव में अपने गृह जनपद रायबरेली से ‘आप’ पार्टी के टिकट पर विधायक का चुनाव लड़ेंगे. इसी की पृष्ठभूमि के तहत पंकज को दिल्ली चुनाव से ठीक पहले शहीद की तरह पेश करने का फैसला लिया गया. अब जो कुछ हो रहा है उसी के तहत हो रहा है. पंकज श्रीवास्तव पहले से तय एजेंडे के तहत अब दिल्ली प्रेस क्लब में प्रेस कांफ्रेंस करने जा रहे हैं और आम आदमी पार्टी इस प्रेस कांफ्रेंस व इस मामले को तूल पकड़ाने की तैयारी कर रही है. पंकज पूरे चुनाव तक यूं ही खुद को शहीद बनाकर घूमते बोलते बतियाते दिखेंगे.

ज्ञात हो कि जब आईबीएन7 में सैकड़ों कर्मचारियों को निकाला गया तब न तो आशुतोष एक शब्द बोले थे और न ही पंकज श्रीवास्तव. तब दोनों ही लाखों की सेलरी और अपनी अपनी कुर्सी के कारण चुप बैठे रहे. जब आईबीएन7 को अंबानी ने खरीद लिया तब भी पंकज श्रीवास्तव चुप बैठे रहे थे. एंकर तनु शर्मा के मसले पर जब फिल्म सिटी में प्रदर्शन हुआ तो पंकज श्रीवास्तव को इसमें शरीक होने के लिए इनकी कम्युनिस्ट पार्टी के साथियों ने मैसेज भेजा था, तब भी पंकज श्रीवास्तव आफिस से बाहर नहीं निकले थे. अब जब उनका आगे का करियर (राजनीति में) सेट हो गया है तो एक बार फिर हुंकार भरकर क्रांतिकारी बन गए हैं. क्या यह क्रांतिकारिता की फिक्सिंग नहीं है. जब इच्छा करे तब करियरिस्ट बनकर क्रांति पर चुप्पी साधे रहो और जब मौका अवसर दिखे राजनीति में पांव जमाने की तो क्रांतिकारी बनकर हुंकार भरने लगो. अंततः है तो मामला करियर और पापी पेट का ही.

इस पूरे मामले पर युवा और तेजतर्रार पत्रकार राहुल पांडेय कहते हैं: ”जब शहादत कला बन जाती है तो शहीदों पे बड़ी हंसी आती है।”

आईबीएन7 में काम कर चुके Kishor Joshi कहते हैं: ”दुःख तब होता है जब अपने पर आ पड़ती है, आपने तो एकतरफा खबरों को दिखाने का मुद्दा उठाया और चैनल को वो गलत लगान और suspend कर दिया लेकिन कभी सोचा जब 300 लोग बिना गलती के एक साथ निकाले गए थे तब आपने कुछ कहा या विरोध जताया? अब जब अपने पर आ पड़ी तो आप शहीद का श्रेय लेने में चूक नहीं रहे हैं।”

अन्य जानकारियों के लिए इस मामले की मूल खबर को पढ़ सकते हैं, जिसका शीर्षक नीचे है…

आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

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अभिसार आज आशुतोष की क्‍लास ले रहे थे…

Kumar Sauvir : पालतू कूकुर और सड़कछाप कूकुर की फितरतों में बड़ा फर्क होता है। ताजा-ताजा पालतु हुआ कूकुर बहुत भौकता है और ताजा-ताजा सड़कछाप हुआ कूकुर बहुत झींकता हैं, मिमियाता है और बगलेंं भी खूब झांकता है। यह हकीकत दिखाया एबीपी-न्‍यूज के एक कार्यक्रम में। मौका है दिल्‍ली के चुनावों को लेकर। एक दौर हुआ करता था जब वरिष्‍ठ पत्रकार रहे आशुतोष ने एक कार्यक्रम में कांग्रेस के एक सांसद की इस तरह क्‍लास ली थी कि वह खुद ही कार्यक्र से भाग गया। ऐसे कई मौके आ गये हैं आशुतोष के कार्यक्रमों में जब उन्‍होंने बड़े-बड़े नेताओं की जमकर क्‍लास ली।

सवाल यह नहीं कि वह क्‍लास जायज हुई थी या फिर गलत। आज अभिसार-हनीमून के दिनों में ताजा-नवेली वधू की तरह दूसरों को लतिया रहे थे, जबकि आशुतोष किसी बूढ़े सांड़ की तरह खुद के होने की हरचंद मगर बेकार कोशिशों में जुटे थे। आज अभिसार जिस तरह आशुतोष की क्‍लास ले रहे थे तो आशुतोष उस तरह बिलबिला रहे थे जैसे आशुतोष अपने कार्यक्रमों में दीगर वक्‍त में दूसरे वक्‍ताओं पर बिलबिलाते रहते थे। पुरानी कहावतों में बिलकुल सही कहा गया है कि:- समय बहुत बलवान।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

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