सतीश उपाध्याय, उमेश उपाध्याय और बिजली कंपनियों का खेल

Madan Tiwary : सतीश उपाध्याय पर अरविन्द केजरीवाल ने आरोप लगाये है बिजली के मीटर को लेकर सतीश उपाध्याय बीजेपी के दिल्ली अध्यक्ष हैं। उन्होंने मानहानि का मुकदमा करने की धमकी दी है और आरोपों से इंकार किया है। सतीश जी, शायद केजरीवाल के हाथ बहुत छोटी सी जानकारी लगी है। आप जेल चले जायेंगे सतीश जी। आपके ऊपर करीब चार सौ करोड़ बिजली कंपनी से लेने का मुद्दा बहुत पहले से गरमाया हुआ है और आपके भाई उमेश उपाध्याय की सहभागिता का भी आरोप है। यह दीगर बात है कि पत्रकार बिरादरी भी यह सबकुछ जानते हुए खुलकर नहीं बोल रही है। दिल्ली की जनता को दुह कर दिल्ली की सत्ता को दूध पिलाने का काम करती आ रही हैं बिजली कंपनियां। खैर मुद्दा चाहे जो हो लेकिन एक साल के अंदर बिजली की दर 2:80 प्रति यूनिट से 4:00 प्रति यूनिट करने की दोषी तो भाजपा है ही। देश है, सब मिलकर बेच खाइये। जनता है, किसी न किसी को वोट देगी ही। काश! देश की जनता सही लोगों को चुन पाती या चुनाव बहिष्कार कर पाती। अपने नेताओं से सवाल कर पाती। काश।

Awadhesh Kumar : तो अरविन्द केजरीवाल ने पहला आरोप बम पटका… दीजिए जवाब… तो अरविंद केजरीवाल ने यह आरोप लगा दिया है कि दिल्ली में बिजली आपूर्ति करने वालीं कंपनियों और भाजपा के प्रदेश नेताओं के बीच कारोबारी रिश्ते व सांठगांठ के आरोपों का बम पटक दिया है। अरविन्द का आरोप देखिए, ‘ जिस कंपनी में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय और उनकी पत्नी की हिस्सेदारी है, वह बिजली कंपनी बीएसईएस के लिए मीटर लगाने और बदलने का काम करती है। दिल्ली भाजपा के उपाध्यक्ष आशीष सूद भी इस कंपनी में डायरेक्टर रह चुके हैं।’ जरा सोचिए, यह कितना बड़ा आरोप है। अरविन्द ने सतीश उपाध्याय की जिन छह कंपनियांे के नाम लिए उनमें से एक एनसीएनएल इंफो मीडिया प्राइवेट लिमिटेड बीएसईएस के लिए मीटर लगाने और बदलने का काम करती है। दिल्ली में बिजली के मीटर हर व्यक्ति के लिए आज भी खलनायक है। लोगों ने मजबूरी में आत्मसमर्पण किया है, पर मेरे सहित तमाम दिल्लीवासी मानते हैं कि ये मीटर बिजली शुल्क के नाम पर जबरन लूटने के वैधानिक मशीन है। अभी मेरे पास विस्तृत जानकारी नहीं है। जानने की कोशिश कर रहा हूं। हालांकि व्यवसाय करना कोई अपराध नहीं है। सतीश उपाध्याय या आशीष सूद स्वयं मीटर उत्पादन नहीं करते हैं। केवल इसे लगाने और बदलने का काम करते हैं। यानी यह एक ठेका है जो किसी न किसी कंपनी को तो मिलना ही था। पर चुनाव के लिए यह तो एक मुद्दा है ही। हमें भी भाजपा के जवाब की प्रतीक्षा है।

तो सतीश उपाध्याय का जवाब भी आ गया… केजरीवाल पर एक और मुकदमा तय…

तो केजरीवाल के आरोप बम का जवाब मिल गया। अगर सतीश उपाध्याय और आशीष सूद की बातें मानें तो उन पर लगा पूरा आरोप ही झूठा है, बेबुनियाद है। सतीश उपाध्याय ने साफ कह दिया है कि उनने जो आरोप लगाया है उसे साबित कर दें अन्यथा राजनीति छोड़ दें। अगर उनने साबित कर दिया तो मैं राजनीति से संन्यास ले लूुगा। उन्होंने कहा कि जिन दो कंपनियों का उनने नाम लिया उनके बारे में मुझे कुछ पता ही नहीं है। सतीश उपाध्याय की बात मानें तो अरविन्द केजरीवाल पर आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर होना निश्चित है। उपाध्याय एवं आशीष सूद दोनों की बातों को मानें तो उनकी कंपनी है, जिसके माध्यम से वे मिलकर ठेकेदारी का काम करते थे। केबल डालने का मीटर लगाने का, पर उनने कभी कोई मीटर खरीदकर नहीं लगाया। सतीश के अनुसार उनकी मीडिया कंपनी है जो 1996 की है जिसमें किसी कंपनी से कोई लेनदेन नहीं हुआ। उन्होंने यह भी साफ किया जब मैं राजनीति में आ गया तो सभी कंपनियों से त्यागपत्र दे दिया। दोनों का कहना है कि मैं परिवार को पालने के लिए व्यवसाय करता हूं, लेकिन साफ सुथरा करता हूं। उनके अनुसार राजनीति में इतना स्तर नीचे नहीं गिरना चाहिए कि हम व्यक्तिगत स्तर पर उतरकर हमला करें।

Dayanand Pandey : दिल्ली विधानसभा चुनाव में मौलाना लोग बहुत तेज़ी से लामबंद हो रहे हैं । इन के पास ज़रा भी अकल नहीं है । अगर खुदा न खास्ता भाजपा के खिलाफ मुसलामानों से आम आदमी पार्टी को वोट देने का फतवा जारी कर दिया इन मौलाना लोगों ने तो जो अरविंद केजरीवाल अभी तक बढ़त बनाए दिख रहे हैं , औंधे मुंह गिरेंगे। यह मौलाना लोग कहीं हिंदू वोटों को पोलराइज करने के लिए नरेंद्र मोदी के ट्रैप में तो नहीं फंस गए हैं ? इस लिए भी कि भाजपा दिल्ली में पांच से अधिक मुसलमानों को उम्मीदवार बनाने जा रही है । इन में से कुछ पूर्व आपिये भी हैं। नरेंद्र मोदी जैसा बहेलिया अभी तक भारतीय राजनीति में तो नहीं देखा गया। मुसलमानों की खिलाफत ने ही इस बहेलिये को इतना ताकतवर बनाया है यह मौलाना लोग अभी तक नहीं समझ पाए , यह तो हद्द है!

पत्रकार मदन तिवारी, अवधेश कुमार और दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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श्रवण गर्ग और नई दुनिया संबंधी मेरी अपील पर एक साथी इतनी तीखी प्रतिक्रिया देंगे, यह कल्पना न की थी : अवधेश कुमार

: यह पत्रकारिता के व्यापक हित के लिए लिखा गया : मेरी एक सार्थक और सकारात्मक अपील पर, जिसकी आम पत्रकारों ने और स्वयं जागरण एवं नई दुनिया के पत्रकारों ने स्वागत किया, हमारे एक साथी के अंदर इतनी तीखी प्रतिक्रिया पैदा हो जाएगी (जो भड़ास पर प्रकाशित है), यह मेरे कल्पना से परे था। लेकिन उनको अपनी प्रतिक्रिया देने की आजादी है। जीवंत समाज में इस तरह बहस होनी भी चाहिए।  पर यहां निजी स्तर की कोई बात न थीं, न है। यह पत्रकारिता के व्यापक हित को ध्यान में रखकर लिखा गया है। इसमें तो सभी खासकर हिन्दी और भाषायी पत्रकारों को प्रसन्न होना चाहिए था।

पता नहीं इन्हें इसमें गलत क्या लगा। मुझे व्यक्तिगत कोई समस्या नहीं है। यह तो एक सुझाव है कि दोनों अखबारों का स्वतंत्र अस्तित्व  रहे, अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद की अनिवार्यता खत्म हो। हिन्दी की गरिमा स्थापित हो। जिस तरह हिन्दी अखबारों में सामान्य रूप से अंग्रजी लेखकों के लेख अनुवादित होकर छप रहे हैं उस तरह अंग्रेजी अखबारों में कभी हिन्दी के लेख अनुवादित होकर नहीं छपते। इसलिए मैंने ये अपील की है।

दूसरे, नई दुनिया एक समय आदर्श अखबारों में से एक था जिसका अपना गौरवपूर्ण इतिहास है। और वह गौरव अंग्रेजी के लेखकों के छपने से नहीं कायम हुआ था। वही गौरव पुनर्स्थापित हो, ये मेरी कामना है। इसी सोच के तहत ये अपील मैंने अपने फेसबुक पर लिखी थी। इसे व्यापक समर्थन मिला है।  लेकिन जैसा आपने उदाहरण दिया वह आजकल हो रहा है। कंपनी चाहे तो शेयर करे। लेकिन मेरी अपील होगी कि ऐसा न कर, दोनों की स्वतंत्र महिमा बनाने की कोशिश हों। निजी आरोपों का उत्तर देना आवश्यक नहीं, पर लगता है मेरे बारे में साथी को पता नहीं है। मेरा घर न कभी शीशे का था, न है., न होगा। सच तो यह है कि मेरे घर में कोई दरवाजा ऐसा नहीं है जहां से आपको यह पता न चले कि मैं क्या हूं, क्या करता हूं।  

मैं कई कॉलम लिखता हूं और देशभर के अनेक अखबारों में छपता है….सबको मालूम है। ऐसा करते समय जितनी नैतिकता का पालन मुझे करनी चाहिए, उसका सख्ती से करता हूं। जो मुझे छापते हैं उन्हें भी मालूम हैं और सबका मेरे प्रति लगाव, प्रेम और सम्मान वर्षों से यू ही कायम नहीं है। मैं देश का अकेला पत्रकार होउंगा जो 200 के आसपास छोटे अखबारों के लिए मुफ्त में लिखता हंू। कई आंदोलन की, कई संस्थाओं की जो बेहतर काम कर रहे हैं, उनके लिए भी समय-समय पर लिखता हूं। मैं अपनी किसी रचना पर कोई कॉपीराइट नहीं रखता। कोई मेरी सामग्री का उपयोग कर सकता है। ऐसे कई चैनल हैं जो मुझे भुगतान नही करते, पर जाता हूं।

जहां तक पहचान का प्रश्न है तो लेखन और पत्रकारिता के अलावा गैर दलीय इतने संगठन, आंदोलन, अभियान से अपना जुड़ाव है कि मेरे मित्रों और जानने वालों की संख्या उतनी है जितनी बहुत लोगों को कल्पना भी नहीं होगी। मेरे लिए पत्रकारिता समाज सेवा है, मेरी तपस्या है…..। मैं इसे उतने ही पवित्र भाव से अंजाम देता हूं।  फिर भी इस प्रतिक्रिया के कारण मेरे मन में कोई कटुता नहीं। यह हर व्यक्ति का अधिकार है कि वह अपने नजरिये से मुझे, मेरे काम को, मेरे लेखन को देखे।

लेखक अवधेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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जागरण प्रबंधन से अपील, श्रवण गर्ग के बाद नई दुनिया के संपदाकीय पृष्ठ को भी मुक्ति दिलाये

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अवधेश कुमार जी, खुद के घर जब शीशे के हों तो दूसरों पर पत्थर नहीं मारते

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अवधेश कुमार जी, खुद के घर जब शीशे के हों तो दूसरों पर पत्थर नहीं मारते

अवधेश कुमार जी आजकल एक दुविधा में पड़े हैं। प्रतिष्ठत अखबार दैनिक जागरण से संबद्ध नई दुनिया को लेकर। उनकी परेशानी यह है कि जागरण में छपे संपादकीय लेख नई दुनिया में भी छापे जा रहे हैं। पर इसमें कोई गलती इसलिए नहीं कही जा सकती है क्योंकि दोनों ग्रुप एक ही हैं। इसलिए आपस में खबरों आलेखों का आदान प्रदान कर सकते हैं। जैसे आजतक न्यूज चैनल अपने रीजनल चैनल दिल्ली आजतक पर कई बार वही स्टोरी चलाता है जो पहले आजतक पर चल चुकी होती हैं।

यह बात कोई अवधेश जी से पूछे कि आप तो ऐसा सालों से करते आ रहे हो। एक लेख को कई अखबारों में छपवा रहे हो। यह बात अवधेश जी आपको नहीं भूलनी चाहिए कि आपकी जितनी भी पहचान है, इन्हीं अखबारों से है। अगर अखबार आपके लेख प्रकाशित न करें तो आप समाज से खत्म हो जाओगे। इसलिए किसी को नसीहत देने से पहले खुद अपने गिरेबां में झांक कर देख लेना चाहिए। अवधेश जी किसी मुददे पर एक लेख लिखते हैं, पहले दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में छपवाते हैं, फिर जनसंदेश टाइम्स, बाद में हरीभूमि, फिर लोकमत, फिर दबंग दुनिया आदि में छपवाने के लिए भेज देते हैं। किसी ने आपसे आजतक यह सवाल नहीं किया है कि रिपीट हुए लेखों का आप पारिश्रमिक क्यों लेते हो। हालांकि कुछ संपादकों को इनकी असलियत पता है, वह इनके लेख नहीं छापते। आदमी अपनी इज्जत खुद धूमिल करता है।

मिलन कुरकुर

पूर्व बीबीसी पत्रकार


भड़ास के पास उपरोक्त टिप्पणी milansingh055@gmail.com मेल आईडी से आई है.


मूल खबर…

जागरण प्रबंधन से अपील, श्रवण गर्ग के बाद नई दुनिया के संपदाकीय पृष्ठ को भी मुक्ति दिलाये

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जागरण प्रबंधन से अपील, श्रवण गर्ग के बाद नई दुनिया के संपदाकीय पृष्ठ को भी मुक्ति दिलाये

Awadhesh Kumar : आजकल मैं यह देखकर आश्चर्य में पड़ रहा हूं कि आखिर नई दुनिया में जागरण के छपे लेख क्यों छप रहे हैं। जागरण इस समय देश का सबसे बड़ा अखबार है। उसका अपना राष्ट्रीय संस्करण भी है। जागरण प्रबंधन ने नई दुनिया को जबसे अपने हाथों में लिया उसका भी एक राष्ट्रीय संस्करण निकाला जो रणनीति की दृष्टि से अच्छा निर्णय था। पर उस अखबार को जागरण से अलग दिखना चाहिए।

जब तक श्रवण गर्ग रहे उन्होंने नई दुनिया के संपदाकीय पृष्ठ को ऐसा बना दिया जिसे आम पाठक पढ़ ही नहीं सकता था। उसका पहला लेख केवल अंग्रेजी लेखकों का छपने लगा। इससे उसके परंपरागत पाठक दूर हुए। लोगों ने नाक भौं सिकोड़ी, पर श्रवण गर्ग को कोई असर नहीं पड़ा। अंग्रेजी में ऐसे पत्रकारों के लेख भी छपते रहे जो पत्रकारिता की मुख्य धारा से भी दूर हो चुके हैं। ऐसे भी हैं जिनके पास विषयों की अद्यतन जानकारी नहीं होती। विचार तो होते भी नहीं। कोई क्यों पढ़े उसे।

स्वयं नई दुनिया के बहुसंख्य पत्रकार इसके विरुद्ध थे, पर श्रवण जी का आतंक ऐसा था कि कोई बोल नहीं सकता था। इसलिए वे जैसा चाहे होता रहा। उन्होंने साफ कर दिया कि अंग्रेजी लेखकों का लेख पहला लेख होगा और हिन्दी के कुछ लेखकों का दूसरा। उसमें भी उन्होंने कुछ नामों को वहां प्रतिबंधित कर दिया। इसका कोई कारण नहीं था। इन सबसे नई दुनिया की छवि को, उसके प्रसार को, विश्वसनीयता को भारी धक्का लगा है।

मुझे आश्चर्य होता था कि जागरण के मालिकान श्री संजय गुप्ता, श्री महेन्द्र मोहन गुप्ता आदि कैसे ऐसा होने दे रहे थे। लेकिन अब जब उन्होंने श्रवण गर्ग जी से इस्तीफा ले लिया तो उनके ऐसे गलत निर्णयों को भी बदलना आवश्यक है। जागरण प्रबंधन से मेरी कुछ अपील है। सबसे पहले तो यह आरक्षण तत्काल खत्म होनी चाहिए कि केवल अंग्रेजी के लेखक जो घास भूसा लिख दें उसे ही पहले लेख के रुप में छापा जाए। नई दुनिया की यह तासीर नहीं रही है। इसलिए वह एकीकृत मध्यप्रदेश का सबसे चहेता और विश्वसनीय अखबार था। इसी तरह जागरण के लेखों को छापने से भी परहेज करना चाहिए। पाठक इसे पसंद नहीं कर रहे हैं। नई दुनिया की स्वतंत्र पहचान कायम रहे।

जागरण प्रबंधन को अवश्य इसका इल्म होगा और उम्मीद है तुरत वे इस पर निर्णय करेंगे। जो लोग वहां अभी संपादकीय पृष्ठ पर काम कर रहे हैं उनके पास श्रवण जी के सामने अपनी सोच समझ को अपने तक सीमित रखने के अलावा कोई चारा नहीं था। ऐसा न करने पर उनका कोपभाजन बनते जैसे अनेक लोग बने। लेकिन उनके अंदर भी ऐसी समझ होगी कि उसका संपादकीय पृष्ठ कैसा होना चाहिए। मुझे उम्मीद है कि उन्हें यदि स्वतंत्रता दी जाए तो वे बेहतर संपादकीय पृष्ठ निकाल सकते हैं जो सर्वसाधारण पाठक के लिए भी पठनीय होगा। इसलिए जागरण प्रबंधन विवेकशील निर्णय ले और नई दुनिया को उसके मूल स्वरुप में लाने के लिए अंग्रेजी के जूठन और जागरण के लेखों से मुक्त करे।

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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सुमित्रा महाजन अपने गृह क्षेत्र से दो मीडियाकर्मियों पंकज क्षीरसागर और हरीश कश्यप को लाई हैं

Awadhesh Kumar :  लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन जब पद के लिए निर्वाचित हुई थीं तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि हमारी अध्यक्ष केवल मित्र नहीं सुमित्र हैं। सामान्यतः यह धारणा भी है कि सुमित्रा जी आम कार्यकर्ताओं, नेताओं सबसे सुह्रदयता से व्यवहार करती हैं। हालांकि उनको निकट से जानने वाले कई लोग इसके विपरीत बात भी करते हैं, पर राजनीति में ऐसा होता है इसलिए इसे हम यहां छोड़ दें। हाल में पूर्व लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ सुमित्रा महाजन के घर आये। जब वे आए तो उन्होंने पूछा कि ‘सुमित्रा जी हैं?’ उनसे सुमित्रा जी के सहयोगियों ने पूछा कि ‘आपका नाम क्या है?’ जाखड़ साहब ने कहा कि ‘जी बलराम जाखड़।’ फिर पूछा गया कि ‘आपने पहले से समय लिया है?’ जाखड़ साहब ने कहा कि ‘हां मेरी उनसे बातचीत हुई है।’ तो ठीक है बैठिए। सुमित्रा जी अभी एक जरुरी मीटिंग में हैं। वे बैठ गए।

काफी देर बाद सुमित्रा महाजन किसी काम से बाहर आईं तो देखीं कि जाखड़ साहब बाहर बैठे हैं। उन्होंने पूछा कि ‘आप यहां क्यों बैठे हैं?’ जाखड़ साहब ने कहा कि मुझे कहा गया कि आप बाहर बैठिए, सुमित्रा जी एक मीटिंग में हैं। सुमित्रा जी अपने सहयोगियों पर उबल पड़ीं, उनसे माफी मांगी, फिर अंदर ले गईं। यह सामान्य समझ की बात है कि बलराम जाखड़ बिना पहले से बात किए और समय निर्धारित किए तो वहां गए नहीं होंगे। वे सबसे ज्यादा समय तक लोकसभा के अध्यक्ष रहे हैं। मध्यप्रदेश के राज्यपाल रहे हैं। संभव है सुमित्रा जी ने ही कोई सलाह लेने के लिए उनसे संपर्क किया हो और उन्होंने कहा हो कि मैं ही आ जाता हूं। या उन्होंने स्वयं कुछ सलाह देने का सोचा हो और फोन पर बात किया हो। लेकिन यदि मध्यप्रदेश के नेता और लोकसभा अध्यक्ष के सहयोगी बलराम जाखड़ को नहीं पहचानते तो इसे क्या कहा जाए? ऐसी घटना पहली बार नहीं हुई है। यह एक प्रतिनिधि घटना के तौर पर मैं आपके सामने रख रहा हूं।

सुमित्रा महाजन ने अपने गृह क्षेत्र से दो सहयोगी लाये हैं- श्री पंकज क्षीरसागर एवं श्री हरीश कश्यप। श्री पंकज क्षीरसागर नई दुनिया के विपणन विभाग में थे। श्री हरीश कश्यप भी सिटी रिपोर्टर के रुप में काम कर चुके हैं। कहा जाता है कि सुमित्रा जी के पुत्र मिलिंद महाजन उनका सारा काम देखते हैं। चूंकि नरेन्द्र मोदी ने रिश्तेदारों को सहयोगी रखने का निषेध किया हुआ है, इसलिए उन्होंने इन दोनों को वहां लाया और इनको सरकारी ओहदा दे दिया है। कई लोग इनसे असंतुष्ट होकर वापस होते हैं।

सुमित्रा जी के पुराने सहयोगी अमोल हैं जो पिछले लंबे समय से साथ रहे हैं। उनको इन दोनों से नीचे रखा हुआ है। सुमित्रा जी से लंबे समय से संबंध रखने वाले बताते हैं कि अमोल इस कारण असंतुष्ट रहते हैं कि मैं इतने दिनों से हूं तो मुझे ऐसी जगह नहीं दी गई। इसलिए वे सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करते। कई घटनाओं को चुपचाप देखते हैं। वे तो बलराम जाखड़ को पहचान ही गए होंगे, पर उनसे उपर के लोग यदि कोई फैसला कर रहे हैं तो वे क्यों उसमें बोलने जाएं। इस कारण वहां ऐसी घटनाएं होतीं रहतीं हैं। जरा सोचिए, यदि बलराम जाखड़ जैसे देश के बड़े नेता के साथ ऐसा हुआ तो फिर आम लोगांे के साथ वे कैसा व्यवहार करते होंगे?

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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तस्लीमा नसरीन ने अपने से बीस साल छोटे ब्वायफ्रेंड की तस्वीर ट्विटर पर पोस्ट की

Awadhesh Kumar : ट्विटर पर तस्लीमा नसरीन ने पोस्ट की अपने ब्वॉयफ्रेंड की फोटो, बताया-20 साल छोटा… तस्लीमा नसरीन ने एक बार फिर चौंकाने वाला ट्वीट किया है। माइक्रो ब्लॉगिंग साइट पर उन्होंने इस बार अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ खुद की तस्वीर पोस्ट की है। यही नहीं, उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ‘मेरा ब्वॉयफ्रेंड मुझसे उम्र में 20 साल छोटा है। इट्ज कूल।’ उनके इस ट्वीट को 10 मिनट के अंदर 22 लोगों ने रीट्वीट किया।

इस पोस्ट के साथ तस्लीमा ने स्पष्ट कर दिया कि वो single नहीं हैं। उनके निजी और सेक्स जीवन को लेकर समय समय पर कयास सामने आते थे। इसके बाद यह बंद हो जाना चाहिये। लेकिन ऐसा उन्होंने क्यों किया है? कुछ का मानना है कि यु अत्यंत साहस का कदम है। बिना निकाह यह बताना कि उनका ब्वॉयफ्रेंड है, जिसके साथ वो जीवन इन्ज्वाय करतीं हैं….कट्टरपंथियों को रास नहीं आयेगा। लेकिन तस्लीमा जानी ही जातीं हैं इसीलिये। अभी उनके ब्वॉयफ्रेंड के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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ओम थानवी जी से कहूंगा कि आपका लंबा दौर चला, अब दूसरे लोगों को आने दीजिए : अवधेश कुमार

Awadhesh Kumar : ओम थानवी जी का दर्द… मैं ओम थानवी जी की पोस्ट पढ़ता हूं, पर उस पर टिप्पणियां कभी-कभार करता हूं। जब वे साहित्य, कला, संस्कृति, सिनेमा, समाज आदि पर लिखते हैं तो उसमें अंतःशक्ति होती है- शब्द, सोच, प्रस्तुति सभी स्तरों पर। राजनीति पर खासकर भाजपा, संघ, नरेन्द्र मोदी पर जब वे लिखते हैं तो भी पढ़ता हूं, पर जो भाव आता है उसे कभी व्यक्त नहीं करता। न करना चाहूंगा। लेकिन आज उन्होंने जो पोस्ट लिखा, उस पर टिप्पणी के रुप में अलग से लंबा पोस्ट लिखने से नहीं रोक पा रहा हूं। अगर उनको कष्ट हो तो मैं पहले ही क्षमा मांग लेता हूं। मैं उनसे छोटा हूं, इसलिए वे अवश्य क्षमा कर देंगे।

#AwadheshKumar

उन्होंने लिखा है कि दूरदर्शन वाले दो ढाई महीने से मुझे अब नहीं बुलाते। पहले भी बुलाते थे तो उन्हीं की गरज पूरी करता था। उनके अनुसार दूसरे कई लोगों को भी आजकल नहीं बुलाया जाता। पता नहीं कौन किसकी गरज पूरी करता था। चाहे ओम थानवी जी हों या अवधेश कुमार….हम सब अपनी भूमिका निभाते हैं लेकिन हम कहें कि हमारी कोई गरज ही नहीं दूसरे की गरज है तो इसमें अहंमन्यता का बोध होता है। बहरहाल, यह कहने की आवश्यकता नहीं कि वे क्या बताना चाह रहे हैं। यानी जबसे केन्द्र की सत्ता बदली है तबसे उनको बुलाया जाना बंद कर दिया गया है। मैं कह रहा हूं कि मुझे दूरदर्शन ने पिछले 10 वर्षों में एक बार भी नहीं बुलाया। क्यों? क्या मुझे विषयों की समझ नहीं? क्या मैं अपनी बात ठीक से नहीं रख पाता? क्या मेरी पत्रकारिता में खोट थी? क्या देश में मेरा नाम नहीं है? मेरे सुनने वाले, चाहने वाले किसी से कम हैं? यह मेरा दंभ नहीं है लेकिन किसी को संदेह हो तो सर्वेक्षण करा ले।

मेरे अंदर भी सवाल उठते थे, पर मैंने कभी नहीं लिखा। दूरदर्शन को संप्रग सरकार के दौरान जिस तरह से चलाया गया, वह कोई छिपा तथ्य नहीं है। वहां पैनल में नाम तक मंत्रालय से तय होने लगा था। मुझे पता है वहां के अधिकारियों ने मेरा नाम कई बार भेजा लेकिन स्वीकृत नहीं हुआ। फिर कुछ लोग घर पर ही आकर समय-समय पर किसी कार्यक्रम के लिए या किसी विषय पर बात करके ले जाते थे और दिखाते थे। उसका तो मुझे पारिश्रमिक भी नहीं मिलता था। देश के कुछ ऐसे पत्रकार, जिनका नाम नहीं लेना चाहूंगा यह प्रमाण पत्र देते थे कि किस पत्रकार को बराबर आना चाहिए और किसे नहीं।

दूरदर्शन तो छोड़िए, ओम थानवी जी के नेतृत्व में निकलने वाला अखबार जनसत्ता न जाने कितने वर्षों से मेरा कोई लेख नहीं छापता। क्यों? मैंने बीच-बीच में उनके मेल पर और संपादकीय पृष्ठ के मेल पर लेख भेजे। छपा नहीं। क्या मुझे लिखना नहीं आता? अगर अखबार में लेखों के चयन में निष्पक्षता और ईमानदारी हो तो अवधेश कुमार का लेख छपना चाहिए। जाहिर है, यह मनमर्जी है जिसे मैं गैर ईमानदारी और अलोकतांत्रिक व्यवहार ही कहूंगा। जब वे छापते नहीं तो मैंने वहां भेजना लगभग बंद कर दिया। मैंने कभी फोन करके पूछा भी नहीं कि आप मुझे क्यों नहीं छापते।

हालांकि एक समय देश के सक्रिय लोगों के लिए सबसे प्यारा अखबार जनसत्ता इस समय कराह रहा है। उसके पाठकों की संख्या देख लीजिए। फिर भी उस अखबार के पूर्वज पत्रकारों के कारण उसके प्रति थोड़ा सम्मान लोगों के मन में बचा हुआ है। क्या मैं इसे मुद्दा बनाउं कि आम थानवी जी मुझे नहीं छापते हैं? मेरे मित्र अक्सर पूछते हैं कि आप जनसत्ता में नहीं लिखते क्या? इसके जवाब में मैं या तो चुप रह जाता हूं या बोलता हूं जनसत्ता मुझे नहीं छापता। बस।

मैं सबसे ज्यादा इंडिया न्यूज पर जाता रहा हूं। इस कारण कई बार लोगों ने अफवाह भी फैलाई कि अवधेश कुमार को वहां से मोटा रकम दे दिया गया है, जबकि मुझे प्रति बहस उतना ही निर्धारित धन मिलता है जितना अन्य अतिथियों को मिलता है। संयोग देखिए कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यानी 26 मई के बाद मेरे पास इंडिया न्यूज से फोन आना लगभग बंद हो गया। जून जुलाई में तो लगभग फोन आया ही नहीं। तो क्या मैं ये मानूं कि यहां भी मोदी का प्रभाव हो गया? मैं जानता हूं कि ऐसा नहीं है।

फिर हर व्यक्ति का दौर होता है। मैं ओम थानवी जी से कहूंगा कि दूरदर्शन, राज्य सभा टीवी आदि पर आपका लंबा दौर चला, अब दूसरे लोगों को आने दीजिए। उनका कुछ दिन दौर चलेगा। मैं यह तब लिख रहा हूं जब मुझे दूरदर्शन नहीं बुलाता है। राज्य सभा भी जबसे आरंभ हुआ मुझे तीन या चार बार बुलाया है। मैं मानता हूं कि यह ठीक नहीं है। वहां मेरे मित्र चाहते हैं कि मैं नियमित आउं लेकिन व्यवस्था तंत्र की अपनी सोच है। तो क्या मैं शिकायत करने लग जाउं? मुझे शिकायत करने या इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना चाहिए, पर मैंने आज तक नहीं उठाया, क्योंकि मेरे पास काम की कभी कमी रहती ही नहीं। पत्रकारिता के अलावा अपना सार्वजनिक जीवन भी है और उसमें भी व्यस्तता इतनी रहती है कि इन सब विषयों पर लड़ने या प्रतिक्रिया देने का समय ही नहीं रहता।

मैं अगर कभी शिकायत करुंगा तो व्यवस्था तंत्र में सुधार के लिए ताकि वहां निष्पक्षता, ईमानदारी और पारदर्शिता से अतिथियों का चयन हो। जो योग्यतम हो ज्ञान में और उस ज्ञान को ठीक प्रकार से अभिव्यक्त करने में भी सक्षम हो…… विषय और बहस के अनुरूप उसमें आवश्यक गतिशीलता और रोचकता लाने में माहिर है उन्हें ही ज्यादा अवसर मिलना चाहिए। जाहिर है, फिर किसी को शिकायत नहीं रह जाएगी।

दोस्तों मैं आगे राज्य सभा टीवी को लेकर एक पूरा पोस्ट लिखूंगा।

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

मूल पोस्ट….

मोदी राज आने के बाद ओम थानवी को परिचर्चा के लिए नहीं बुलाता दूरदर्शन

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‘इंडिया न्यूज’ ने अवधेश को इतना धन दे दिया है कि उनसे अपने अनुसार बातें बुलवाता है!

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अलविदा बिपिन चन्द्रा, अलविदा बलराज पुरी.

Samar Anarya : अलविदा बिपिन चन्द्रा, अलविदा बलराज पुरी. अब भी याद है कि इलाहाबाद में साइकोलॉजी में एमए पूरा कर लेने के बाद सामने मौजूद दो विकल्पों में से एक चुनना कितना मुश्किल था. एक तो क्लिनिकल साइकोलॉजी जो इलाहाबाद शहर के बाद अपनी दूसरी माशूक थी तो एक तरफ वो इंकलाबी जज्बा जिसे क्रान्ति हुई ही दिखती थी.

इन दोनों संभावनाओं के सबब भी सामने थे- क्लिनिकल साइकोलॉजी का मक्का-मदीना निमहंस बंगलौर तो पढ़ाई से ज्यादा मार्क्सवाद के लिए जाना जाने वाला जेएनयू. फैसला करने में बिपिन चन्द्रा, रोमिला थापर, टी के ओमेन.. न जाने किस किस को पढ़ने ही नहीं भर आँख देखने की भी ख्वाहिश काम आई थी. (अब भी याद है कि आने के हफ्ते भर में ही ट्रिपल एस 1 की लिफ्ट में रोमिला जी को देख कैसा रोमांच हुआ था पर अपनी माशाअल्लाह अंग्रेजी के चलते कुछ कह पाने का साहस नहीं जुटा पाया था). आज उनमें से एक और स्तम्भ नहीं रहा जिनका कहीं होना हम जैसे न जाने कितनों को खींच लाता था.

अलविदा बलराज पुरी भी- काश्मीर पर सबसे निष्पक्ष आवाजों में एक का खामोश हो जाना बहुत खलेगा.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर के फेसबुक वॉल से.

Awadhesh Kumar : बिपिन चन्द्रा और बलराज पुरी का जाना। आज एक साथ दो जाने माने व्यक्तियों ने विदा ले ली। मशहूर इतिहासकार बिपिन चंद्रा तथा पत्रकार एवं मानवाधिकारवादी बलराज पुरी। चंद्रा आधुनिक भारत के इतिहास के विशेषज्ञ के तौर पर जाने गये। इतिहास पर उनकी करीब 20 पुस्तकें मे है,रप जानकारी में है। इनमें आधुनिक भारत का इतिहास, आधुनिक भारत और आर्थिक राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और भारतीय वामपंथ काफी चर्चित एवं संभवतः सबसे ज्यादा बिकनेवाली व पढी जाने वाली थीं। ‘द राइज़ एंड ग्रोथ ऑफ इकॉनॉमिक नेशनलिज़्म’, ‘इंडिया आफ़्टर इंडिपेंडेंस’ और ‘इंडियाज स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस’ नामक पुस्तकें भी बहस के केन्द्र में रहीं। इतिहास का विद्यार्थी होने के कारण भी मैंने उनकी ये पुस्तकें पढीं। हालांकि राष्ट्रवाद के उदय और विकास के साथ ऐसे कई बातें थी जिनसे मैं सहमत नहीं हो पाया, पर उनकी किताबों से बहुत ज्ञान प्राप्त किया। अन्य घोर वामपंथी इतिहासकारों से वे थोडे अलग थे। वे किसी से भी खुलकर मिलते थे। लेकिन जीवन के अंतिम समय वे लगभग अकेले थे। पत्नी पहले गुजर गईं और बेटा एक ही जो विदेश में रहता है। प्रोफेसर चंद्रा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग में अध्यक्ष रह चुके थे। वहां से सेवानिवृत होने के बाद वह संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कार्यकाल में नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष भी बनाये गये थे और 2012 तक इस पद पर रहे। वह इन दिनों शहीदे आजम भगत सिंह पर जीवनी लिख रहे थे। विनम्र और सादर श्रद्धांजलि। बलराज पुरी जम्मू कश्मीर के विशेषज्ञ के तौर पर जाने जाते थे। उनकी भी अपनी सोच थी, जिससे कुछ सहमत कुछ असहमत थे। कश्मीर के मानवाधिकार को लेकर उनको आलोचना झेलनी पडती थी। लेकिन अपने अंतिम समय तक वे बहुत बदले नहीं। उनके लेख कश्मीर पर जानकारी बढाने वाले होते थे। उनकी एक या दो पुस्तकें मेरे पास आइं थीं लेकिन अभी नाम याद नहीं आ रहा। उनको भी विनम्र और सादर श्रद्धांजलि।

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

Om Thanvi : प्रो. बिपिन चन्द्र का जाना सिर्फ एक बड़े इतिहासकार जाना नहीं है। वे एक उदार प्रगतिशील विचारक थे। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (NBT) के अध्यक्ष के नाते उन्होंने और कृतियों के अलावा समाज विज्ञान और प्रवासी भारतीयों पर पुस्तकों की जो बहुभाषी शृंखला नियोजित की, वह उनका अहम योगदान माना जाएगा। उनके साथ काम कर चुके Pankaj Chaturvedi का कहना सही है कि प्रो. चन्द्र निरे अध्यक्ष नहीं थे, अक्सर वे प्रधान संपादक का विवेक इस्तेमाल करते थे। इतिहास की एक किताब में वीर सावरकर के माफी मांगने वाले प्रसंग को उन्होंने यह कहकर निकलवा दिया था कि आजादी के इतिहास में उनका जो योगदान है, उसकी उपेक्षा उचित न होगी। हालाँकि कट्टर हिंदुत्व के खिलाफ उनकी राय हमेशा साफ और बेबाक होती थी। जब हमें उनकी ज्यादा जरूरत थी, इतिहास के अजीबोगरीब दौर को वे लांघकर चले गए। जीवंत स्मृति के साथ उन्हें नमन।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

मूल खबर…

प्रसिद्ध इतिहासकार बिपिन चंद्र का 86 वर्ष की उम्र में निधन

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लव जेहाद के हंगामे को कैसे देखें

Awadhesh Kumar : आज जैन टीवी पर हमने पाकिस्तान की ओर से गोलीबारी एवं लव जेहाद पर चर्चा की। पिछले एक दशक से हम लव जेहाद शब्द सुन रहे हैं। मैंने कभी इस शब्द को गंभीरता से लिया ही नहीं। कई बार लोग मेरे पास आते थे कि इस विषय को उठाइए। मुझे लगता था कि ये अतिवादी लोग हैं और सांप्रदायिक बातें करते हैं। लेकिन अब जिस तरह की घटनाएं आ रहीं हैं उनसे भले मैं इस शब्द को स्वीकार न करुं या नहीं इस बात को स्वीकराने को विवश होना पड़ रहा है कि अगर ऐसी घटनाएं हो रहीं हैं तो इससे आंखें नहीं मूंदी जा सकती है।

रांची में राष्ट्रीय स्तर की शूटर तारा शाह देव की कथा ने पूरे देश को झकझोड़ दिया है। वह एक पढ़ी लिखी, खुले दिल की और अच्छे परिवार की लड़की है। उसका अपना नाम और ग्लैमर भी है। उसे एक रणजीत नामक लड़के से प्यार हुआ और घरवालों ने उसकी खूब धूमधाम से शादी भी कर दी। लेकिन ससुराल जाते ही उसे पता चला कि वह रणजीत है ही नहीं, वह तो मुसलमान है। उसे वहां जाते ही कहा गया कि कुरान पढ़ों और इस्लाम स्वीकार करो। उसके मना करने पर मारा पीटा जाता था। उसे कम खाना दिया जाता था। उससे शादी करने वाला युवक उसके साथ एकदम जबरदस्ती यौन संबंध बनाता था। उसे कहा जाता था कि तुम इस्लाम स्वीकार कर लो, यहां से जा नहीं सकती, तुम्हें पता नहीं तुम कहां फंस गई हो। उसके परिवार का कहना है कि जब हम शादी के पहले उसके घर गए तो व्यवहार या हाव भाव से यह पता ही नहीं चला कि वह हिन्दू नहीं है।

खैर, अब ताराशाह देव वहां से भागकर घर आ चुकी है। पुलिस छानबीन कर रही है। लेकिन उसका शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न इतन ज्यादा हुआ है कि वह अभी ठीक से चल नहीं पाती। एक खबर के अनुसार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ महीने में 50 से ज्यादा ऐसी घटनाएं हुईं हैं, जिनमें एक हिन्दू लड़की को प्यार के बाद पता चला कि उसके साथ छल हुआ है। यानी जो लड़का चंदन लगाकर हिन्दू बना हुआ था वह मुसलमान है। बाद में उसे धर्म परिवर्तन कराने की कोशिशें हुईं हैं।

कोई हिन्दू लड़की लड़का किसी मुसलमान से अपनी मर्जी से शादी करे, उनके बीच प्यार हो जाए तो इसका विरोध नहीं किया जा सकता। दो मजहबों, दो जातियों में शादियां किसी सभ्य समाज की स्वाभाविक स्थिति है। लेकिन अगर किसी मजहब का लड़का दूसरे मजहब का वेश रखकर किसी लड़की को प्रेम जाल में फांसे और उसे बाद में शादी करके अपने मजहब में परिवर्तित करने की कोशिश करे तो फिर इसे किसी सूरत मंे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अगर ऐसी घटनाएं ज्यादा संख्या में हो तो फिर आशंका उठना स्वाभाविक है। मेरे मत में मुस्लिम समाज के सम्मानित लोगों को ही इसके खिलाफ सामने आना चाहिए, वक्तव्य देना चाहिए। उलेमा इसकी निंदा करें। सरकार का दायित्व है कि ऐसी घटनाओं का संज्ञान लेकर राष्ट्रीय स्तर पर एक विशेष जांच दल या ऐसी कोई जांच दल गठित करे।

आलोक कुमार : “लव जेहाद” की परिकल्पना निहायत जाहिल मानसिकता की उपज है।- प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।

Nitin Thakur : लव जिहाद पर सालों पहले आईबीएन-7 पर एक आधे घंटे का शो देखा था। दक्षिण भारत में ऐसी कई घटनाओँ पर आधारित उस शो का रिपोर्टर कोई मुस्लिम था। मेरठ, मुज़फ्फरनगर में मैंने भी बहुत सालों तक करीने से देखा है तो ये उतना भी झूठ नहीं लगता। आपको अच्छा-लगे या बुरा लेकिन कुछ लोग तो हैं जिन्होंने मुहब्बत को मज़हब के लिए इस्तेमाल किया है। इसके इतर एक सच ये भी है कि लव-जिहाद के ‘खतरे’ को प्रचारित करनेवाले तत्व आडवाणी और सुब्रह्मण्यम स्वामी के घरों की तरफ नज़र डालने से बच रहे हैं। अब लव जिहाद हिंदू-मुस्लिमों में कितना ज़हर घोलेगा..देखते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार, आलोक कुमार और नितिन ठाकुर के फेसबुक वॉल से.

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