‘लोकमत समाचार’ ने छिंदवाड़ा और जलगांव संस्करण बंद किया, एमपी के सभी प्रतिनिधियों को हटाया

नागपुर के लोकप्रिय मराठी अखबार ‘लोकमत’ के हिंदी अख़बार ‘लोकमत समाचार’ को लेकर इन दिनों अच्छी खबर सुनने को नहीं मिल रही है। ‘लोकमत समाचार’ के छिंदवाड़ा और जलगांव संस्करणों को बंद किए जाने की सूचना है। इस अखबार ने मध्यप्रदेश में अपने आगमन का संकेत छिंदवाड़ा से ही दिया था! भोपाल में हाल ही में ‘लोकमत’ ने अपना नया ऑफिस भी बनाया था! अंदर की खबर है कि भोपाल ऑफिस भी बंद किया जा रहा है।

मध्य प्रदेश में काम कर रहे जिला प्रतिनिधियों को भी हटा दिया गया है। भोपाल में काम कर रहे स्टॉफ को भी नागपुर ज्वाइन करने को कहा गया है। जबकि, भविष्य में भोपाल और इंदौर से संस्करण शुरू किए जाना थे। लेकिन, जो जानकारियां मिली है उनके मुताबिक लोकमत-समूह अपने हिंदी अखबार ‘लोकमत समाचार’ से हाथ खींच रहा है। फिलहाल हिंदी को लेकर बनी योजनाओं को रोक दिया गया! ये अखबार समूह अब अपनी सारी ताकत मराठी संस्करणों पर लगाने के मूड में है। लेकिन, अखबार से जुड़ा कोई भी पत्रकार कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है।

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‘खबरें अभी तक’ बंद… उमेश जोशी, नितेश सिन्हा, मनीष मासूम समेत कई बेरोजगार

आखिरकार ‘खबरें अभी तक’ चैनल पर लटका ही दिया ताला… शाम 5.15 पर एक नोटिस चस्पा कर चैनल बंद करने की सूचना चैनल कर्माचारियों को दे दी गई… इसी चैनल के प्रबंधन ने नवंबर में कई कर्मचारियों को यह कह कर निकाल दिया था कि कंपनी का पुनर्गठन हो रहा है. इस बहाने कुछ चाणक्यों ने नौकरी बचा ली थी. अब मालिक ने ऐसे चाटुकारों को भी नहीं छोड़ा. चैनल के मालिक सभापा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुदेश अग्रवाल हैं जो बिजली के खोपचे की दुकान का धंधा करते हैं. इन्होंने अपने चैनल से अपने आपको हरियाणा का भावी मुख्यमंत्री घोषित कर दिया था. मात्र 500 के लगभग वोट पाने वाले अग्रवाल अब अपने औकत में आ गए हैं.

ये 60 चैनल कर्मी को नहीं संभाल पाए. नंवबर में पुनर्गठन के बाद सुदेश ने चैनल के बचे हुए कर्मचारियों की मीटिंग लेकर कहा था कि आप सब चैनल को धोखा देकर मत जाना लेकिन अब मालिक साहब ही धोखा दे कर जा रहें हैं.. वह भी मात्र पांच माह में ही.. उस दौरान जो चैनल कर्मचारी निकले उनका किसी चाटुकार ने साथ नहीं दिया… जिसमें कथित रुप से एडिर इन चीफ उमेश जोशी भी था ..अब तीन माह की सैलरी की मांग करने के लिए प्रबंधन से लड़ने के लिए तैयार है …और हड़ताल पर बैठने की धमकी दे रहा है…

आपको चाटुकारों के नाम भी बता दें जो अब तीन माह की सैलरी के लिए भी लड़ने के लिए तैयार है  ..जिसमें आउटपुट हेड नितेश सिन्हा ….कथित रुप से इनपुट हेड मनीष मासूम .. (खुद पर बीती तो शेर बने चाटुकार ..)

आइए अब प्रबंधन की जानकारी दें जो सुदेश की ओर से चैनल कर्मचारी से लड़ने के लिए तैयार हैं… पहला परिचय केमिकल की दुकान के मालिक जो चैनल कार्यकारी निदेशक है.. आई.डी गर्ग… निदेशक मार्कटिंग और ऑपरेशन ..जो जी न्यूज में मामूली लाइब्रेरियन थे संजीव कपूर …साथ ही HR का H भी ना पता होने वाले मानव संसाधन प्रबंधक साहब नफे सिंह… मार्कटिंग के प्रबंधक साहब जो खोके की दुकान चलाते थे …बी डी अग्रवाल .. ऐसे प्रबंधन हो तो खाक चैनल चलेगा जिसे पत्रकारिता का कुछ ज्ञान नहीं होता…

प्रबंधन से चैनल कर्मचारी अब तीन माह की सैलरी चाहते हैं… साथ ही बता दें कि अगर चैनल इन्हें तीन माह की सैलरी देगा तो वह साथी भी जो पुर्नगठन के दौरान निकाले गये थे, सभी कर्मी भी अपनी तीन माह की सैलरी के लिए प्रबंधन से लड़ने का मन बना चुके हैं… साथ ही बड़े चाटुकार अपने लाभ निकालने के लिए छोटे कर्मी पर चाणक्य नीति ना अपना दें, इसका भी डर छोटे चैनल कर्मचारी पर मंडरा रहा है…. देखते हैं इस बार कौन चाणक्य बनता है…क्या खबरें अभी तक के कर्मी प्रबंधन के खिलाफ अपनी आवाज उठायेगा या नहीं, जो पत्रकार समाज के शोषण की आवाज उठाता है, क्या अपने शोषण की आवाज उठा पायेगा..

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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अरुण पुरी को पत्रकारिता से प्रेम होता तो इंडिया टुडे के दक्षिण भारत के तीन एडिशन्स क्यों बंद करते!

एक बुरी खबर इंडिया टुडे ग्रुप से है. इंडिया टुडे पत्रिका के दक्षिण भारत के तीन एडिशन्स बंद कर दिए गए हैं. अब इंडिया टुडे को तमिल, तेलगु और मलायलम भाषी लोग नहीं पढ़ सकेंगे. इन तीन एडिशन्स के बंद होने के बाद इंडिया टुडे सिर्फ अंग्रेजी और हिंदी में बची है. लोग कहने लगे हैं कि अगर अरुण पुरी को सच में पत्रकारिता से प्रेम होता या मीडिया के सरोकार से कोई लेना-देना होता तो वह दक्षिण भारत के तीन एडिशन्स बंद नहीं करता.

आखिर पूरे देश को एक स्तरीय पत्रिका को पढ़ने का हक है. अगर ये तीन दक्षिण भारतीय एडिशन्स घाटे में चल रहे थे तो इसे लाभ में लाने की कवायद की जानी चाहिए थी. पर तीन दक्षिण भारतीय भाषाओं में पत्रिका को बंद करके अरुण पुरी ने अपने धंधेबाज चेहरे का ही खुलासा किया है. जिस तरह दूसरे धंधेबाज मीडिया मालिक लाभ हानि के गणित से अपने मीडिया हाउस को चलाने बंद करने या विस्तारित करने पर ध्यान जोर देते हैं, वही काम अरुण पुरी भी कर रहे हैं.

वैसे, एक अच्छी बात ये है कि अरुण पुरी ने बंद किए जाने वाले तीनों एडिशन्स के कर्मियों को आश्वस्त किया है कि उन्हें समुचित मुआवजा मिलेगा. चेन्नई में अब इंडिया टुडे का आफिस बंद करके अब छोटा सा ब्यूरो रखा गया है. अरुण पुरी ने आंतरिक मेल जारी कर सभी को तीनों एडिशन्स बंद किए जाने की सूचना दी है. अपने पत्र में एक जगह अरुण पुरी लिखते हैं:

“The India Today weekly editions of Tamil, Telugu, and Malayalam have been incurring loss for over two decades. We have been absorbing the losses so far in the hope that they will turnaround. After great deal of deliberation we have come to the conclusion that we don’t see the viability of these editions in the foreseeable future. It is, therefore, with a heavy heart that we have decided to discontinue these editions.”

“The office in Chennai will now be a smaller Bureau. Some colleagues who are already contributing to the English edition will be retained in ITE and be a part of this Bureau.”

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पांच माह का वेतन दिए बगैर ‘जानो दुनिया’ चैनल बंद, मीडियाकर्मी आंदोलन के मूड में

गुजरात के अहमदाबाद से संचालित ‘जानो दुनिया’ नामक न्यूज चैनल बंद हो गया है. इस चैनल के प्रबंधन ने अपने कर्मियों को पांच महीने की सेलरी नहीं दी है. पांच महीना बिना सेलरी लिए काम करने वाले सैकड़ों कर्मचारी चैनल के अचानक बंद कर दिए जाने से सदमे में हैं. अब ये एकजुट होकर चैनल मालिक के गुड़गांव स्थित होटल के सामने आमरण अनशन करने की तैयारी कर रहे हैं.

‘जानो दुनिया’ का दिल्ली आफिस भी प्रबंधन ने बंद कर दिया है. ‘जानो दुनिया’ पीड़ित कई कर्मचारी दिल्ली में विभिन्न चैनलों में सेवारत हैं और ये भी चाहते हैं कि ‘जानो दुनिया’ के मालिक की सच्चाई सारे देश के सामने लाई जाए. इस हेतु सभी कर्मचारी आपस में गोलबंद हो रहे हैं.

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बंद होते न्यूज चैनलों और हजारों पत्रकारों की बेरोजगारी के मसले को प्रहलाद सिंह पटेल ने लोकसभा में उठाया

लोकसभा में दमोह से सांसद प्रह्लाद सिंह पटेल ने पिछले दिनों एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया. ये सवाल मीडिया जगत से जुड़ा था. प्रह्लाद सिंह पटेल ने उन न्यूज चैनलों का नाम लिया जो बंद हो गए. इनसे हजारों बेरोजगार पत्रकारों के परिवारों के सामने आए संकट का जिक्र किया. साथ ही इस पूरे मसले में कानून की लाचारी के बारे में बताया. प्रह्लाद सिंह पटेल का पूरा सवाल, पूरा संबोधन ये है….

 

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एबीपी का पंजाबी चैनल बंद हुआ, 200 बेरोजगार हुए, प्रदर्शन किया, पर ‘एबीपी न्यूज’ पर दस सकेंड की भी खबर नहीं चली

एक के बाद एक पंजाबी चैनलों के बंद होने के पीछे किसका हाथ? एबीपी चैनल सांझा ने दफ्तर बंद किया और 200 के करीब कर्मियों की छुट्टी की। उन्हें यह कहकर इस्तीफे देने का आदेश दिया कि पंजाब में केबल नेटर्वक उनका चैनल चलाने के लिए तैयार नहीं है। अगर पंजाब सरकार या केबल नेटर्वक किसी चैनल को जबरदस्ती रोकते हैं तो जिस मीडिया कंपनी का राष्ट्रीय स्तर का चैनल हो और वह अपना चैनल बंद करवाने वाले केबल नेटर्वक या सरकार के खिलाफ एक भी खबर तक न चलाए तो इस बात का क्या अर्थ निकलता है। ‘एबीपी सांझा’ बंद हुआ लेकिन एबीपी न्यूज़ (राष्ट्रीय चैनल) ने 10 सेंकड तक की भी कोई न्यूज़ नहीं चलाई। क्या विरोध केवल सरकार के खिलाफ होना चाहिए, कंपनी के खिलाफ नहीं जिसने अपनी मर्जी से प्रोजेक्ट शुरू किया और अचानक ही घाटे का सौदा बताकर बंद कर दिया।

पिछले दो दिन से पंजाब के मीडिया में हाहाकार मचा हुआ है। कारण एबीपी न्यूज के पंजाबी चैनल ‘एबीपी सांझा’ को शुरू होने से पहले अचानक बंद करने का एलान कर दिया गया और 200 के करीब मीडियाकर्मी व अन्य कर्मचारी सड़क पर आ गए। पंजाब में यह पहली घटना नहीं है इससे पहले ‘डे एंड नाइट’ न्यूज़ के बंद होने के कारण भी 200 से ज्यादा लोगों को अपना रोज़गार गवाना पड़ा था। पंजाब की अकाली-भाजपा सरकार पर केबल नेटवर्क को कंट्रोल करने का आरोप लगता है। इससे पहले भी जी-पंजाबी, पंजाब टुडे, साडा चैनल, परलस पंजाबी, पीबीसी न्यूज़ चैनल, स्टैंडर्ड टीवी, चैनल नंबर-1 व अन्य कुछ पंजाबी टीवी प्रोजेक्टस हैं जो केबल पर एक खास कंपनी का कब्जा होने के कारण चल नहीं पाए।

वैसे तो यह केवल पंजाब का ही मामला ही नहीं बल्कि देश में कई ऐसे प्रदेश हैं जहां पर केबल नेटर्वक पर सियासी पार्टियों ने कब्जे जमा रखे हैं। जिस पार्टी की भी सरकार आती है उसी का केबल नेटर्वक पर कंट्रोल हो जाता है और टीवी चैनल सरकार के खिलाफ़ चलते हैं उन्हें केबल पर चलने नहीं दिया जाता। ताज़ा घटना घटते ही जो मीडियाकर्मी बेरोजगार हुए उन्होंने कैंडल मार्च कर और प्रेस कांफ्रेंस कर पंजाब सरकार को आरोपी ठहराया। यह मुद्दा काफी समय से गरमाता रहा है और जब भी कभी पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल या उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल से इस बारे में पूछा जाता तो वे साफ तौर पर कहते कि यह दो कम्पनियों के बीच का मामला है सरकार का इसमें कोई दखल नहीं है। सरकार का इस मामले में कितना दखल है या कितना नहीं, इसके बारे में सरकार व विपक्ष की अपनी-अपनी दलीलें हो सकती हैं। लेकिन मैं समझता हूं कि पंजाब में जिस तरह का सिलसिला चल रहा है, वह लोकतंत्र का हनन है। मीडिया को लोकतंत्र का स्तंभ कहा जाता है। लेकिन अगर मीडिया को ही काम नहीं दिया जाएगा तो अच्छी लोकतांत्रिक प्रणाली कैसे चल सकती है।

ऐसे रुझान से तीन बड़े नुकसान हो रहे हैं पहला पंजाबी चैनलों की मार्किट अगर विकसित नहीं होती तो पंजाबी में काम करने वाले मीडियाकर्मी व पत्रकार पीछे रह जायेंगे। इससे भाषा का भी नुकसान होगा और कोई भी व्यक्ति या कंपनी पंजाबी में काम नहीं करेगी। केबल को माफिया की तरह चलाने का सिलसिला पंजाब में कांग्रेस के राज में शुरू हुआ जब पंजाब टुडे को सरकारी चैनल की तरह चलाया गया और तत्कालीन विपक्षी अकाली-भाजपा को मीडिया से ब्लैकआउट कर दिया गया। सत्ता में आते ही अकाली दल से जुडेÞ लोगों ने केबल पर अपना कंट्रोल किया। जैसे कांग्रेस की सरकार में केबल चल रही थी उसी तरह अब चल रही है केवल चेहरे बदल गए हैं।

मैं समझता हूं कि पंजाब में अकाली दल की सरकार है। यह वो पार्टी है जिसने पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत के लिए कुर्बानियां दी हैं। इस पार्टी का एक संघर्षमयी इतिहास रहा है। अगर उसके राज में कोई ऐसा काम हो रहा हो जिससे मातृभाषा पंजाबी का नुकसान होता हो तो यह गंभीर चिंतन का विषय होना चाहिए। प्रदेश सरकार के लिए भी और अकाली दल के नेतृत्व के लिए भी। केन्द्र में सरकार रहते हुए कांग्रेस ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे केबल नेटर्वक पर एक खास कंपनी का दबदबा रोका जा सके और मीडिया स्वतंत्र तौर पर काम कर सके। जब कांग्रेस सत्ता में थी तो वह केबल चला रही थी अब अकाली सत्ता में है तो अब वो चला रहे हैं मसला सिर्फ इतना है कि जो विपक्ष में होता है वो ‘फ्रीडम आॅफ स्पीच’ की बात करता है। इसके साथ-साथ लोगों के रोजगार का मसला भी जुड़ा हुआ है। पिछले 10 सालों में पंजाबी के कई चैनल बंद होने के कारण हजारों मीडियाकर्मी बेरोजगार हो चुके हैं और यह सिलसिला जारी है। इससे भी दुखदायक बात यह है कि अब शायद ही कोई बड़ी कम्पनी पंजाबी चैनल शुरू करने की सोचे। मैं इस हालात के लिए सरकार को क्लीन चिट नहीं दे रहा हूं बल्कि मैं तो कहूंगा कि पंजाब के मुख्यमंत्री को इस मुद्दे पर गंभीर संज्ञान लेना चाहिए और कोई ऐसा रास्ता निकालना चाहिए जिससे टीवी चैनल स्वतंत्रता से काम कर सकें।

सरकार के साथ-साथ एक और बात यहां करना चाहता हूं वह यह कि केबल माफिया की जब भी हम बात करते हैं तो सबसे पहले निशाना सरकार पर जाता है, सरकार के खिलाफ ही रोष प्रदर्शन शुरू होते हैं। लेकिन पंजाब में जो कुछ हुआ है उसमें एक पहलू ऐसा है जिस पर मीडिया में चर्चा नहीं हुई। मिसाल के तौर पर एबीपी चैनल सांझा ने जब दफ्तर बंद किया और 200 के करीब कर्मियों की छुट्टी की और उन्हें यह कहकर इस्तीफे देने का आदेश दिया कि पंजाब में केबल नेटर्वक उनका चैनल चलाने के लिए तैयार नहीं है। अगर पंजाब सरकार या केबल नेटर्वक किसी चैनल को जबरदस्ती रोकते हैं तो जिस मीडिया कंपनी का राष्ट्रीय स्तर का चैनल हो और वह अपना चैनल बंद करवाने वाले केबल नेटर्वक या सरकार के खिलाफ एक भी खबर तक न चलाए तो इस बात का क्या अर्थ निकलता है। ‘एबीपी सांझा’ बंद हुआ लेकिन एबीपी न्यूज़ (राष्ट्रीय चैनल) ने 10 सेंकड तक की भी कोई न्यूज़ नहीं चलाई। क्या विरोध केवल सरकार के खिलाफ होना चाहिए, कंपनी के खिलाफ नहीं जिसने अपनी मर्जी से प्रोजेक्ट शुरू किया और अचानक ही घाटे का सौदा बताकर बंद कर दिया। यह भी पहली बार नहीं हुआ है पंजाब में जब जी-पंजाबी को केबल नेटर्वक से आफ एयर किया गया तो जी न्यूज़ नेटर्वक ने एसी कोई मुहिम सरकार के खिलाफ़ नहीं चलाई। आखिर कुछ तो दाल में काला है। असल में कार्पोरेट मीडिया के चैनल जिस तरह की पत्रकारिता कर रहे हैं और जो हालात देश में पत्रकारिता के बन गए हैं केबल माफिया की उपज उसी में से होती है। यह किसी एक राज्य या एक राजनीतिक पार्टी का मसला नहीं है। बल्कि यह पूरे सिस्टम की गिरावट दर्शाता है। पंजाब में जब डे एंड नाइट न्यूज चैनल ने छंटनी की तो तब भी किसी टीवी चैनल ने इस मुद्दे को प्रमुखता नहीं दी।

मीडिया को केन्द्र सरकार पर दबाव डालना चाहिए कि वह कोई ऐसा सिस्टम तैयार करे जिससे राजनीतिक पार्टियां या सरकारों का मीडिया पर कंट्रोल न हो। मीडिया जब दूसरे मुद्दों पर सरकारों के खिलाफ मुहिम चला सकता है तो पत्रकारों या निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए क्यों नहीं। लेकिन सवाल यह है कि कार्पोरेट मीडिया ऐसा क्यों नहीं कर रहा। इसके पीछे क्या हित छिपे हैं। कुछ भी हो, फिलहाल यही कहा जा सकता है कि सियासी पाटियों और कार्पोरेट मीडिया के इस दौर में पत्रकार और पत्रकारिता मनफ़ी हो रही है।

लेखक खुशहाल लाली ‘सत्य स्वदेश’ के प्रधान संपादक हैं.

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एबीपी का पंजाबी चैनल लांच होने से पहले ही बंद, 200 मीडियाकर्मी बेरोजगार

एबीपी (आनंद बाजार पत्रिका) वालों ने 200 मीडियाकर्मियों के पाट पर लात मारने का काम किया है. एबीपी की तरफ से पंजाबी चैनल ‘एबीपी सांझा’ लांच करने की तैयारी कई वर्षों से चल रही थी. इसके लिए करीब 200 लोगों को भर्ती किया गया. अब सूचना आ रही है कि प्रबंधन ने चैनल को बंद करने का फैसला ले लिया है और सभी कर्मियों को घर जाने को बोल दिया है. यह चैनल मोहाली से लांच किया जाने वाला था. ABP सांझा नाम से आने वाले चैनल के प्रबंधन ने सभी कर्मचारियों को अपने यहां से बाहर निकाल दिया है.

उल्लेखनीय है कि एबीपी यानि आनंद बाजार पत्रिका समूह देश का बड़ा मीडिया हाउस है और इसी ग्रुप का एक नेशनल हिंदी न्यूज है एबीपी न्यूज नाम से. इस बड़े और गंभीर किस्म के मीडिया हाउस की इस सतही-ओछी हरकत से मीडियाकर्मियों में रोष है. पिछले कुछ समय से कई चैनलों के बंद होने का दौर चल रहा है. पी7न्यूज नामक चैनल देखते ही देखते धराशाई हो गया. भास्कर न्यूज नामक चैनल भी लांच होने से पहले बंद होने की स्थिति में है. अब एबीपी के पंजाबी चैनल के बंद होने से सैकड़ों लोग बेरोजगार हो गए हैं.

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