बदल रही है हिन्दी की दुनिया

हिन्दी और पत्रकारों के बीच लोकप्रिय साइट भड़ास4मीडिया (Bhadas4Media) पर ‘जिन्दगी’ का विज्ञापन अमैजन की ओर से। हिन्दी के दिन बदलेंगे? सरकारी खरीद के भरोसे रहने वाले हिन्दी के प्रकाशकों ने हिन्दी के लेखकों को खूब छकाया है। किताबें बिकती नहीं हैं, खरीदार कहां हैं – का रोना रोने वाले प्रकाशकों के रहते हुए मुमकिन है कि हिन्दी के लेखक भविष्य में खुद ही प्रकाशक भी बन जाएं। या लेखक और रचना को पहचानने वाले नए प्रकाशक सामने आएं और लेखक पाठकों तक आसानी से पहुंच सकें। भड़ास4मीडिया चलाने वाले यशवंत सिंह नेट पर लिखकर पैसा कमाने के तरीके बताने के लिए अलग आयोजन कर चुके हैं और चाहते हैं कि हिन्दी वाले कुछ अलग और नया करें। आत्म निर्भर हों। इसपर फिर कभी। 

हालांकि, हिन्दी की दुनिया नेट पर भी अजीब है। कल मैंने ‘काशी का अस्सी’ खरीदने के लिए वेबसाइट टटोलना शुरू किया तो हिन्दी वाले (प्रकाशक आदि) इसे 250 रुपए से लेकर 13 अमेरिकी डॉलर तक में बेच रहे थे पर आखिरकार मुझे फ्लिपकार्ट पर सिर्फ 98 रुपए में मिल गया। इससे लग रहा है कि हिन्दी के लेखक और पाठक दोनों के अच्छे दिन आने वाले हैं। पाठक को 98 रुपए में 250 रुपए की किताब मिली और लेखक को 98 रुपए पर ही सही, रायल्टी तो मिलेगी! ‘जिन्दगी’ के बारे में जो लोग नहीं जानते उन्हें बता दूं, यह पत्रकार और मित्र संजय सिन्हा की तीसरी पुस्तक है। पहली पुस्तक 6.1 रिक्टर स्केल एक विदेशी प्रकाशक लिट्रेट वर्ल्ड ने छापी थी जो बाद में बंद हो गई। इस तरह, यह लिट्रेट वर्ल्ड की पहली और आखिरी पुस्तक रही। तमाम कारणों, प्रेरणाओं या मजबूरियों के बाद संजय सिन्हा ने नवंबर 2013 में फेसबुक पर नियमित लिखना शुरू किया और ‘रिश्तों’ पर रोज कुछ ना कुछ लिख रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने इमरजेंसी की याद पर भी कई दिनों तक लिखा। 

फेसबुक पर लिखे उनके इन्ही विचारों, कहानियों का संकलन पहले ‘रिश्ते’ और अब ‘जिन्दगी’ (प्रभात प्रकाशन) के नाम से आया है। ‘रिश्ते’ को इस साल का सुप्रतिष्ठित सावित्र त्रिपाठी स्मृति सम्मान मिला है। और जैसा कि चयन समिति के अध्यक्ष और अग्रणी साहित्यकार, प्रो काशीनाथ सिंह ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा, “सावित्री त्रिपाठी स्मृति सम्मान के लिए संजय सिन्हा की पुस्तक ‘रिश्ते’ को चुनने से पहले उन्हें कई बार सोचना पड़ा, क्योंकि ‘रिश्ते’ परंपरागत तरीके से लिखा कोई उपन्यास, कोई कथा या कोई कहानी नहीं है। न तो वो डायरी का कोई अंश है, न यादों का कोई संग्रह। पर जो है, शानदार है और उसे पढ़ कर, उन्हें और पूरी चयन समिति को लगा कि इसबार कुछ ‘अलग’ को चुनने का साहस किया जाए। और बस चुन लिया गया ‘रिश्ते’ को।” जबकि पुरानी स्थितियों में या शर्तों के आधार पर यह पुस्तक प्रकाशित ही नहीं होती (क्योंकि सरकारी खरीद के दायरे में नहीं आती है) और जहां तक अपनी कृति के बारे में लेखक के विचार का सवाल है, संजय सिन्हा ने कहा कि ये किताब मैंने नहीं लिखी है, न ये किताब मेरी है। ये किताब मेरे फेसबुक परिजनों की है। इसलिए इस सम्मान के हकदार आप सभी (फेसबुक के पाठक जिन्हें वह परिजन कहता है) हैं। 

हिन्दी में लेखक और प्रकाशक का संबंध ऐसा है कि एक मशहूर प्रकाशक जो मुझे पिछले 20 साल से ज्यादा समय से जानते हैं, से मैंने पूछा कि मैंने एक किताब लिखी है आप देखना चाहेंगे। उन्होंने कहा अभी नहीं। कब तक? छह महीने बाद। वो छह महीने निकले कई महीने हो गए। उन्होंने तो नहीं ही पूछा – अपना भी मिजाज ऐसा नहीं है कि मैं उन्हें फिर फोन करूं।

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पढ़ते रहें भड़ास, लामबंद हो अब उत्पीड़ित-वंचित मीडिया बिरादरी

हम किसी भी कीमत पर इस कारपोरेट मीडिया के तिलिस्म को किरचों में बिखेरना चाहते हैं। मजीठिया के नाम पर धोखाधड़ी से जिन्हें संशोधित वेतनमान के सिवाय कुछ भी हासिल नहीं हुआ है और अपने अपने दफ्तरों में गुलामों जैसी जिनकी जिंदगी है, बेड़ियां उतार फेंकने की चुनौती वे अब स्वीकार करें। 

 

पांचवां स्तंभ बनाना असंभव नहीं है और असंभव नहीं है चुप्पियां तोड़ना भी। अपनी कलम और उंगलियों के एटम बम को फटने दो और देखते रहो कि मेहनतकशों के खून पसीने से सजे ताश के महल कैसे भरभराकर गिरते हैं। इसी सिलसिले में भड़ास की भूमिका अभूतपूर्व है, जहां मीडिया का रोजनामचा दर्ज होता रहता है राउंड द क्लाक। हमारे युवा साथी यशवंत सिंह ने यह करिश्मा कर दिखाया है।

लेकिन यथार्थ का खुलासा काफी नहीं होता है दोस्तों, इस यथार्थ को बदलने के लिए एक मुकम्मल लड़ाई जरुरी है। अब रोज रोज पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं। जान माल के खतरे बढ़े हैं।क्योंकि हमारी क्रांति सिर्फ आपबीती सुनाने की है। हमें अपने सिवाय किसी की परवाह होती नहीं है।

दावानल इस सीमेंट के जंगल में भी भयंकर है और इस दावानल में वे भी नहीं बचेंगे जो स्वीमिंग पूल में मदिरापान करके मजे ले रहे हैं। आग के पंख होते हैं और फन भी होते हैं आग के। बेहतर हो कि झुलसने से पहले इस कारपोरेट तंत्र को तहस नहस करने की कोई जुगत बनायें। साथी हाथ बढ़ाना। हाथों में हों हाथ, हम सब हो साथ साथ तो देख लेंगे कातिल बाजुओं में आखिर दम कितना है कि हममें से हर किसी का सर कलम कर दें।

इस देश में प्रकृति और मनुष्य के विरुद्ध जो जनसंहारी अश्वमेध हैं, उसके सिपाहसालार वे तमाम चेहरे हैं, जो मीडियाकर्मियों के खून पसीने से तरोताजा हैं। इस जनसंहार संस्कृति के खिलाफ इस तिलिस्म में कैद जनगण को जगाना तब तक नामुमकिन है, जब हमारी एटम बम बिरादरी कुंभकर्णी नींद से जागती नहीं। जागो दोस्तों। बहरहाल अब हम अपने ब्लागों में मौका मिलते रहने पर भड़ास की खबरों के लिंक भी शेयर करते रहेंगे ताकि कोई बंदा अलग थलग मरे नहीं बेमौत।

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राजनीति में आपके लिए ये चुनौतियां हैं यशवंत भाई

यशवंत भाई, 

राजनीतिक पार्टी शुरू करने के लिए बधाई। आपके जन सरोकारी विचारों का हम आदर करते हैं। लेकिन मेरे मन में कुछ बातें हैं जिन्हें साझा करना चाहता हूं। पहला तो यह कि यदि आप ईमानदारी से आगे बढ़ेंगे तो बेईमान प्रजाति के लोग आपके ऊपर हमला करने से नहीं चूकेंगे। आपको मटियामेट कर देना चाहेंगे ताकि उनका खेल चलता रहे,  बेहिसाब गति से अकूत संपत्ति आती रहे और वे ताकतवर भी बने रहें। 

दूसरे, आप यदि राजनीति में आगे बढ़ें, नाम- यश औऱ बढ़े- फैले तो आम आदमी की तकलीफ न भूलें। तमाम वादे करके अनेक पार्टियां सत्ता में आईं, लेकिन भारत जैसे देश में पीने का पानी बिक रहा है, सार्वजनिक फिल्टर्ड वाटर का प्लांट किसी सरकार ने नहीं लगाया। आपको फिल्टर लगाना है तो अपने खर्चे से लगाइए। यह लोकतंत्र है। सरकारी अस्पतालों का हाल कोई भी देख सकता है। 

क्या फर्क पड़ा- चाहे कांग्रेस की सरकार हो या भारतीय जनता पार्टी की? जेलों की हालत देखिए। वहां का भ्रष्टाचार अलग किस्म का है। मैं तो पत्रकार के नाते देख- सुन आया हूं। अगर भ्रष्टाचार नहीं है तो शातिर अपराधियों के पास मोबाइल फोन (या सेल फोन) कैसे आ जाता है? फिर बाद में कैसे जब्त होता है? ऐसी घटनाएं तो हम अक्सर अखबारों में पढ़ ही रहे हैं। अब आइए स्कूलों, कालेजों की तरफ। वहां दाखिले (या एडमिशन) को लेकर भयानक स्थिति है। नए स्कूल या कालेज आबादी के नाम पर खुल नहीं रहे हैं औऱ वहां एडमिशन गोल्ड मेडल पाने जैसी घटना हो गई है। दाखिले के मौसम में अनेक छात्र एडमिशन के लिए भटकते मिलेंगे। 

बुनियादी सुविधाएं पाना छोटे शहरों में कठिन है। खाना पकाने की गैस आसानी से वहां नहीं मिलती। आज भी लोग भीषण गर्मी औऱ धूप में लाइन लगा कर खड़े होते हैं। कोई माकूल इंतजाम वहां नहीं हो पाया है। आखिर गैस के लिए वहां इतनी परेशानी क्यों होनी चाहिए? है कोई सुनने- देखने वाला? इसी तरह आधार कार्ड का पता बदलवाना है तो छोटे शहरों में लोग भटकते रहते हैं। 

हजार- हजार समस्याएं हैं। बाजार में स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाली हजार- हजार चीजें होंगी। अभी तो उत्तर प्रदेश में सिर्फ मैगी के नूडल्स का मामला सामने आया है। बाजार मनमाना है। कुछ भी बेच दो।  कोई राजनीतिक पार्टी इस पर ध्यान नहीं देती। बस सिर्फ इस पर टिप्पणी जरूर होती है कि अमुक सूट- बूट पहनते हैं, तो अमुक जगह की महिलाएं सांवली लेकिन सुंदर होती हैं तो अमुक अंडरवियर नहीं पहनते। ये सब लोग राजनीति में अघाए हुए हैं और आम जनता के दुख- दर्द से मुंह मोड़ कर एक कृत्रिम संसार में रहते हैं। सिर्फ अपने  निजी हितों के प्रति जागरूक औऱ जरूरत से ज्यादा सतर्क। 

उम्मीद है कि ऐसे लोगों को अपनी पार्टी में लेने से आप परहेज करेंगे। आपकी पार्टी में जनहित से सरोकार रखने वाले लोग रहें। पूरी ईमानदारी से देश का भविष्य बनाएं। नहीं तो आपकी पार्टी लीक से हट कर नहीं हो पाएगी। जहां भी भ्रष्टाचार हो, वहां हल्लाबोल हो (लेकिन हिंसा बिल्कुल नहीं होनी चाहिए), जहां भी अव्यवस्था हो वहां आपकी पार्टी के प्रतिनिधि जाएं। हालात का जायजा लें औऱ तत्काल रिपोर्ट बना कर आपको दें औऱ संबंधित विभाग को भी दें। इसके लिए एक अलग से वेबसाइट खोलना हो तो वह भी ठीक है। हर चीज अव्यवस्थित है। इसे पटरी पर लाना जरूरी है। महंगाई पर काबू नहीं है। चीजों के दाम बढ़ते जा रहे हैं  और पैकेटों का वजन कम होता जा रहा है। मैं हार्लिक्स लाइट खरीदने गया तो दुकानदार कह रहा था कि दाम बढ़ गया है। अजीब हाल है? क्या महंगाई बढ़ने का कोई गणित आम आदमी कभी नहीं समझ पाएगा? क्या महंगाई कब बढ़ जाएगी, यह अनिश्चित है? आखिर सरकार क्या कंट्रोल कर रही है? 

आपको इन सब चीजों पर पैनी निगाह रखनी होगी। बेदाग लोगों की पार्टी  बना औऱ चला कर आप भी देश को दिखा दीजिए। यही आपकी चुनौती है।

विनय बिहारी सिंह से संपर्क : vinaybiharisingh@gmail.com

 

अब राजनीति में भड़ास, 7वें स्थापना दिवस पर लांच कर दी जाएगी नई राजनीतिक पार्टी

https://bhadas4media.com/article-comment/5516-bhadas-political-party

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आपसी मतभेद भुलाकर अब भड़ास के मंच पर आएं सभी वामपंथी

प्रिय भाई यशवंत जी, आपकी नई पार्टी बनाने की योजना का स्वागत करता हूँ लेकिन एक विचार मन में उत्पन्न हुआ, जो लिख रहा हूँ। यदि अच्छा लगे तो उस पर चिंतन और मनन करते हुए एक विचार गोष्ठी के लिए सभी गणमान्य लोगों आमंत्रित करें और उस पर कार्य हो। हम लोग आरम्भ से ही वामपंथ से जुड़े रहे और आज आवश्यकता है देश के सभी वामपंथी सभी भेदभाव भूलकर एक मंच पर आयें, सभी लोग मिलकर एक ही पार्टी बनायें। 

वर्ष 2019 के चुनाव में सभी सीट पर लड़ें। “एक ही नारा हो सबको देखा बार बार हमको देखो एक बार।” यदि माकपा, भाकपा, कपा-माले, आर एस पी, फॉरवर्ड ब्लॉक, और नक्सली संगठन भी सम्मिलित हो जायं तो सोने पर सोहागा। मुझे यकीन ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि कांग्रेस और बीजेपी को परास्त करने में सफल रहेंगे। आपका क्या विचार है, अपने भड़ास4मीडिया द्वारा सूचित करें। 

“मन चाहे तो स्वर्ग को नरक और नरक को स्वर्ग बना सकता है। क्योंकि मन को संस्कारवान बनाने और व्यक्तिगत तथा सामाजिक समृद्धि को प्राप्त करने का उपाय है उद्देश्य पूर्ण ढंग से स्वाध्याय।“ “शेर अपनी क्षमताओं और योग्यता के बल पर खुद ही राजत्व स्वीकार करता है।“

आपका अपना – आनंद रमन तिवारी, यूसुफपुर, ग़ाज़ीपुर, संपर्क- 8093098039 

अब राजनीति में भड़ास, 7वें स्थापना दिवस पर लांच कर दी जाएगी नई राजनीतिक पार्टी

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भड़ास को कूरियर से पांच हजार रुपये रिश्वत भेजने वाले ने दिमाग तो खूब लगाया लेकिन थोड़ी-सी कमी कर दी

Editor

BHADAS4MEDIA.COM

माननीय महोदय

सब जानते है साम, दाम अथवा दण्ड से भड़ास पर दबाव बना नहीं सकते. माफिया ने भेद का अक्लमंदी से उपयोग किया. आप के आत्मसम्मान को गहरी ठेस पहुंचाने का उनका उददेश्य हुआ पूरा. कमी हमारी लाल इमली टीम में है. कुछ लोग प्रतिज्ञा के साथ जुड़े थे. हमारी टीम के जयचंद चंद टुकड़ों के लिए प्रयास आरंभ होते ही कुठाराघात कर देते है. हम क्या सोचते हैं, किस तरफ काम कर रहे हैं,  वो BIC Management तक बिजली की गति से परोसा जाता रहा है. जो उद्योगपति 12 साल तक इस घोटाले को थामे हुए हैं, वह हम लोगों से सौ गुना तेज हैं. यह बात कई बार साबित हो चुकी है. लाल इमली के हम लोग इस लायक नहीं कि एकजुट हो कर इस संघर्ष को आगे ले जा सके.

5000/- के कथिक प्रेषक श्री ओम प्रकाश 16/30 सिविल लाइन्स कभी BIC / लाल इमली में कार्यरत नहीं थे वह डा शक्ति भार्गव के मामा है. डा शक्ति भार्गव इस घोटाले को उच्च न्यायालय में मजबूती से उजागर कर रहे हैं. श्री ओम प्रकाश 65-70 वर्ष के हैं. याददास्त जा चुकी है. साल भर से पलंग पर है. मल मूत्र आने पर बता नहीं पाते. वह और उनकी पत्नी ही कानपुर में रहते हैं. पुत्र जयपुर में. जिसने भी आपको रुपये भेजे उसने यह तो पता कर लिया कि डॉ भार्गव के कौन कौन रिश्तेदार व निकट सहयोगी हैं परन्तु अगर वह श्री ओम प्रकाश को कथिक प्रेषक बनाने से पहले यह भी पता कर लेते कि उनकी शारीरिक व मानसिक स्थिति क्या है तो उनसे यह चूक नहीं होती और वह किसी अन्य को प्रेषक बनाते.

आपका बहुमूल्य सहयोग हमें मिला उसके लिया बहुत धन्यवाद. खेल ऐसा खेला कि हम Main Objective जो घोटाला उजागर करना था से भटक कर जासूसी के खेल में लग गए. वाकई दिमाग पाया है गुप्ता जी ने – ऐसे ही नहीं खरबपति बन गए. फरियादी हो गया मुल्ज़िम. असली मुल्ज़िम धुए के गुब्बार में खो जायेगा. भेदी तो हमारे घर का ही था. दंड भी हम सबको मिलना चाहिए.

साक्ष्य व दस्तावेज में कमी न निकाल पाये तो माफिया लोगों ने खबर को जड़ से ही संदिग्ध बना दिया. इस स्कैम को उजागर करने वाले दस्तावेज अब इतने ज्यादा हो गए हैं कि उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए टेम्पो की आवश्यकता होगी. हर कागज़ ये साबित कर रहा है कि बहुत बड़ा खेल हुआ परन्तु 12 साल में किसी ने साहस नहीं जुटाया की वो इस पर कार्यवाही कर सके। मोदी सरकार से पारदर्शिता की उम्मीद थी वह कब की धूमिल हो गयी.

आपके प्रयास के लिए धन्यवाद

सदा आभारी रहेंगे

Aditya Narain
anbajpai7@gmail.com


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खबर छापने पर bhadas4media को मिले पांच हजार के नोट!

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कानपुर ‘लाल इमली महाघोटाले’ पर हाईकोर्ट के रुख से वस्त्र मंत्रालय हिला

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भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह को IMWA का बेस्ट सोशल मीडिया अवॉर्ड

दिल्ली : मावलंकर ऑडिटोरियम में गत दिवस हर साल की तरह इंडियन मीडिया वैल्फेयर एसोसिएशन की ओर से इम्वा अवार्ड 2015 से पत्रकारों को सम्मानित किया गया। केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा, सांसद उदित राज आदि की उपस्थिति में पत्रकारिता के भिन्न-भिन्न क्षेत्र में सक्रिय पत्रकार सम्मानित हुए। बेस्ट सोशल मीडिया का अवॉर्ड भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह को दिया गया। बेस्ट क्राइम एंकर श्रीवर्धन त्रिवेदी और लीडिंग शो के लिए रजत शर्मा को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर इंडियन मीडिया वेल्फेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव निशाना ने कहा कि पत्रकार हर परिस्थिति में हर खबर पर नज़र बनाए रखता है और जनता को हर खबर से राबता कराता है। मीडिया को ही लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। इसीलिए IMWA  पत्रकारों के मान और सम्मान के लिए इम्वा अवॉर्ड हर साल कराता है, जिससे पत्रकारों का हौसला अफज़ाई हो और साथ साथ उनका मनोबल भी बढ़ता जाए। 

सम्मान समारोह में बेस्ट एनसीआर न्यूज़ चैनल टोटल टीवी, फोकस न्यूज़ सीईओ दीपक अरोड़ा, बेस्ट रीजनल न्यूज़ चैनल यूपी न्यूज़ नेशन, बेस्ट रीजनल चैनल एमपी सहारा समय, बेस्ट नेशनल एंकर अजय कुमार न्यूज़ नेशन, बेस्ट नेशनल एंकर (वुमेन) अंजना ओम कश्यप आज तक, बेस्ट क्राइम एंकर (वुमेन) अनुराध दास (ज़ी न्यूज़), बेस्ट लाइफ टाइम अचिवमेंट अवॉर्ड वरिष्ठ पत्रकार रमाकांत पांडे को दिया गया। बेस्ट प्रोग्राम कॉर्डिनेटर मुन्ने भारती, बेस्ट कैमरामैन शेलेंद्र कुमार न्यूज़ एक्सप्रेस, बेस्ट सोशल न्यूज़ चैनल दिशा टीवी, बेस्ट लीगल जर्नलिस्ट धर्मेंद्र मिश्रा दैनिक जागरण, बेस्ट फिल्ड जर्नलिस्ट राकेश सोनी, बेस्ट फ्रीलांस जर्नलिस्ट दीपक दालमिया, बेस्ट सोशल जर्नलिस्ट प्रिंट शगुफ्ता शीरीन रायपुर ,  बेस्ट हेल्थ जर्नलिस्ट संदीप तिवारी, बेस्ट सोशल यंग जर्नलिस्ट अंकुर शुकला, बेस्ट इंटरनेशनल जर्नलिस्ट राजेश शर्मा, बेस्ट एजुकेशन जर्नलिस्ट- अंजुम जाफरी रोज़नामा, बेस्ट सेलिब्रिटी जर्नलिस्ट वुमेन सुनीता तिवारी हिंदुस्तान टाइम्स, बेस्ट इंटरटेंमेंट जर्नलिस्ट संजय निगम को सम्मानित किया गया।

इसी प्रकार से बेस्ट स्पोर्टस जर्नलिस्ट आरती दलाल, बेस्ट इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट राहुल छाबरा डेक्कन हराल्ड, बेस्ट एक्टिविटी जर्नलिस्ट फरीद अली आजतक, बेस्ट आर्ट & कल्चर अली आबिदी, बेस्ट इंटरप्रेन्यूर शगुन कश्यप, बेस्ट पीआर एजेंसी क्रोम, बेस्ट रेडियो जॉकी नवेद रेडियो मिर्ची, बेस्ट एचआर इश्तियाक खान न्यूज़ एक्सप्रेस, बेस्ट न्यूज़ पोर्टल पर्दाफाश अभिलाश, बेस्ट यंग इंटरटेंमेंट जर्नलिस्ट(वुमेन) सुनिता मिश्रा पंजाब केसरी, बेस्ट यंग जर्नलिस्ट(मेल) अमित आंनद यूएनआई, बेस्ट सोशल क्राइम रिपोर्टर – दुर्गेश गजरी, बेस्ट आरटीआई एक्टीविस्ट राजीव शर्मा, बेस्ट पॉलिटीकल जर्नलिस्ट उत्तराखंड – विधि चंद सिंघल, बेस्ट फार्मिग जर्नलिस्ट विरेंद्र परिहर, बेस्ट न्यूज़ एजेंसी (इलेक्ट्रोनिक) एएनआई , बेस्ट न्यूज़ एजेंसी(प्रिंट) यूएनआई, बेस्ट आर्ट एंड कल्चरल जर्नलिस्ट(इलेक्ट्रोनिक) समीना अली राज्यसभा टीवी, बेस्ट क्राइम जर्नलिस्ट(इले.) रवि के वैश न्यूज़ एक्सप्रेस, बेस्ट यंग जर्नलिस्ट(यंग) योगेश मिश्रा एसएमबीसी चैनल, बेस्ट इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट(इलेक्ट.) परिमल दास एनडीटीवी, बेस्ट स्पोर्टस जर्नलिस्ट रुमाना खान एबीपी न्यूज़, बेस्ट सोशल जर्नलिस्म रविश कुमार एनडीटीवी,  बेस्ट न्यूज़ एंकर यूपी अंजीत श्रीवास्तव न्यूज़ नेशन यूपी, बेस्ट फिमेल एंकर एवं समाजसेविका अनिता सहगल आदि को सम्मानित किया गया।

इम्वा अवॉर्ड के प्रोग्राम में दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ अजय लेखी, पॉप सिंगर शंकर साहनी, कॉमेडियन राजीव मल्हौत्रा, सरदार प्रताप फौजदार आदि जैसे प्रसिद्ध लोग मौजूद थे।

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जुआ खेलकर रक़म जीतने का लालच देता ये विज्ञापन भड़ास को शोभा नहीं देता!

यशवंत सिंह जी

संपादक, भड़ास4मीडिया

भड़ास को हम सब पत्रकार बहुत गंभीरता से लेते हैं… पर एक ऐसा विज्ञापन देखा कि आपको पत्र लिखने को मजबूर हुआ.. लिखने को तो दस पेज भी लिख सकता हूँ.. मगर आप बुद्धिजीवी हैं… इसलिए पूरा यकीन है कि कम लिखे को ज़्यादा ही समझेंगे… इस मेल के साथ में एक तस्वीर अटैच की है, उसे देखिए… इसमें जो ऑफर है, वो किसी भी नज़रिये से स्वस्थ नहीं कहा जा सकता… जुआ खेलने का ऑफर देकर रक़म जीतने की उम्मीद या लालच देता ये विज्ञापन भड़ास को शोभा नहीं देता… आशा करता हूं कि आप इस पर ध्यान देंगे.

धन्यवाद.

आसिफ खान

Asif Khan

kasif.niaz@gmail.com

आसिफ भाई,

आपने बिलकुल सही प्वाइंट की ओर ध्यान दिलाया है.  हम भड़ास के लोग खुद भी दूसरे न्यूज पोर्टल्स के गंदे विज्ञापनों के खिलाफ छापते रहे हैं. ये जो विज्ञापन भड़ास पर चलते हैं, वह गूगल की तरफ से चलाए जाते हैं. गूगल बहुत ही सोच समझ कर विज्ञापन देता है. जब भी आप क्लिक करते हो तो गूगल नए किस्म का विज्ञापन दिखाता है. ज्यादातर विज्ञापन यूजर की पसंद या सर्च या रुझान के हिसाब से होते हैं. मान लीजिए आप अगर सर्वर तलाश रहे हों और इस बारे में गूगल या जीमेल पर सर्च कर रहे हों, मेल कर रहे हों, तो गूगल के पास फीडबैक पहुंच जाता है कि आप सर्वर की तलाश में है. आपको तब यह सर्वर के विज्ञापन ही दिखाएगा.

इसी तरह जो लोग सेक्स आदि ज्यादा सर्च करते हैं उन्हें गूगल सेक्स रिलेटेड विज्ञापन दिखाता है. मेरे कहने का आशय ये है कि आप को जो विज्ञापन दिखाया गया गूगल द्वारा, जरूरी नहीं कि वह दूसरों को भी दिखाया जा रहा हो. फिर भी, ये जुवे का विज्ञापन बिलकुल गलत है. इसके खिलाफ हम लोग गूगल को पत्र लिखकर अपनी आपत्ति जताएंगे और ऐसे विज्ञापन न दिखाने को लेकर अनुरोध करेंगे. आपके लेटर को हम भड़ास पर प्रकाशित कर रहे हैं ताकि भड़ास अपनी खुद की आलोचना को भी सुन और छाप सके, साथ ही इसके जरिए हम खुद को सुधार सकें.

आभार

यशवंत सिंह

एडिटर

भड़ास4मीडिया

 

 

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मजीठिया मुद्दे पर भड़ास की लड़ाई जारी : जागरण, पत्रिका समेत कई मामलों पर 27 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

मजीठिया वेतनमान न देने और सुप्रीमकोर्ट की अवमानना करने के कुछ और मामले 27 मार्च को अदालत में आने वाले हैं। इन मामलों में दो मामले आरसी अग्रवाल और एक मामला महेंद्र मोहन गुप्‍ता के खिलाफ है। मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर दायर सभी नई याचिकाओं, जिनमें भड़ास की तरफ से दायर याचिकाएं भी शामिल हैं, को एक जगह करके सुप्रीम कोर्ट में इनकी सुनवाई के लिए 27 मार्च तारीख तय किया जा चुका है.

आगामी 27 मार्च को अदालत में राजस्‍थान पत्रिका के खिलाफ भी एक मामले में सुनवाई होगी। कुछ और मामले भी अा सकते हैं क्‍योंकि अभी तक सुप्रीमकोर्ट में डाले गए सभी मामलों की सुनवाई शुरू नहीं हो पाई है। काउज लिस्‍ट से स्‍पष्‍ट हो जाएगा। उम्‍मीद की जानी चाहिए कि ये सभी मामले भी अगले 28 अप्रैल की सुनवाई के दौरान दोबारा एक साथ अदालत के समक्ष आएंगे ।

उल्लेखनीय है कि उन सभी मीडियाकर्मियों के लिए खुशखबरी है जिन्होंने भड़ास की पहल पर मजीठिया वेज बोर्ड का अपना हक हासिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने की हिम्मत जुटाई. खुलेआम और गोपनीय, इन दो तरीकों से याचिका दायर करने के लिए सैकड़ों लोग भड़ास के पास आए. भड़ास ने जाने-माने वकील उमेश शर्मा के जरिए याचिकाएं तैयार करा के सुप्रीम कोर्ट में दायर कराई. दोनों याचिकाएं रजिस्ट्री से लेकर लिस्टिंग तक में महीने भर तक दौड़ती रहीं.अब जाकर इन्हें सुनवाई के लिए चुन लिया गया है. मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर दायर सभी नई याचिकाओं, जिनमें भड़ास की तरफ से दायर याचिकाएं भी शामिल हैं, को एक जगह करके सुप्रीम कोर्ट में इनकी सुनवाई के लिए 27 मार्च तारीख तय किया जा चुका है.

रांची में समाचार संपादक सत्य प्रकाश चौधरी और उनके कुछ अन्य सहकर्मियों ने मजीठिया को लेकर अवमानना की याचिका अपने प्रबंधन के खिलाफ फरवरी के पहले हफ्ते में दायर की थी. अब इस पर सुनवाई होने जा रही है. सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के मुताबिक सुनवाई 27 मार्च को होगी. इस बीच प्रभात खबर प्रबंधन अपने चिंटुओं के जरिये यह अफवाह फैला रहा है कि कर्मचारी जितना मर्जी हो लड़ लें, मजीठिया का फायदा उन्हें मिलने वाला नहीं है, बड़े-बड़े वकील आखिर बैठे किसलिए हैं.

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भास्कर, हिंदुस्तान, जागरण समेत कई अखबारों में भड़ास पर पाबंदी

खुद को अभिव्यक्ति की आजादी का नेता बताने वाले और इस हक के लिए लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले मीडिया समूह अब उन छोटे व नए मीडिया माध्यमों की आवाज अपने यहां दबाने में लगे हैं जो बड़े बड़े मीडिया हाउसों की पोल खोलते हैं. ताजी सूचना के मुताबिक दैनिक भास्कर और दैनिक हिंदुस्तान अखबार के दफ्तरों में भड़ास4मीडिया डॉट कॉम को ब्लाक कर दिया गया है. इन संस्थानों के प्रबंधकों ने ऐसा फैसला मालिकों के निर्देश के बाद लिया है. मालिकों ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर भड़ास4मीडिया द्वारा चलाए गए अभियान और आम मीडियाकर्मियों को उनका हक दिलाने से संबंधित मुहिम से नाराज होकर इस पोर्टल को अपने संस्थान के अंदर बंद कराने का आदेश दिया ताकि उनके यहां काम करने वाला कोई कर्मचारी इस पोर्टल को पढ़कर सुप्रीम कोर्ट न चला जाए.

 

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर भास्कर प्रबंधन किस तरह घबराहट में है, इसका ताजा उदाहरण ये है कि पूरे मध्य प्रदेश सहित देश भर के भास्कर के सेंटरों पर भडास4मीडिया की साइट ब्लाक कर दी गई है. यह साइट कर्मचारियों में जागरूकता फैलाने में अहम रोल अदा कर रही है. इस कारण कई कर्मचारियों ने हिम्मत दिखाई और अपने हक के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. इससे मालिकों की नींद हराम हो गई. अब प्रबंधन के पालतू सफेद हाथी कोर्ट गए कर्मचा‍रियों को तरह तरह से धमकाने में लगे हुए हैं. जो इस उम्‍मीद से चुप बैठे थे कि वे प्रबंधन के चहेते बन जाएंगे वे भी इन दिनों प्रताड़ना के दायरे में आ गए हैं. वैसे प्रताड़ना से डरने की जरूरत नहीं है क्‍योंकि इनका एक भी गलत कदम मालिकों को सुब्रत राय बना सकता है. अभी भी समय है. उठो जागो और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष पथ पर चल पड़ो. सफलता सौ फीसदी आपके कदम चूमेगी.

सुप्रीम कोर्ट में 10 मार्च को हुई सुनवाई के बाद हिन्दुस्तान अख़बार में भड़ास4मीडिया को बंद कर दिया गया है ताकि कोई मजीठिया से संबंधित खबर न जान सके. प्रबन्धन के इस फैसले पर हंसी आती है. मोबाइल के ज़माने में भी हिन्दुस्तान का प्रबंधन ऐसी हरकत करेगा, ये कोई सोच भी नहीँ सकता. धनबाद के एक पत्रकार ने बताया कि अब वहां के कर्मचारी मोबाइल पर ही भड़ास पढ़ रहे हैं.

ज्ञात हो कि राजस्थान पत्रिका से लेकर कई अन्य दूसरे अखबार व न्यूज चैनल अपने अपने यहां भड़ास4मीडिया पर समय-समय पर पाबंदी लगाते आए हैं. खबरों और मीडिया के इन ठेकेदारों को लगता है कि वे अपने संस्थान में पाबंदी लगाकर अपने मीडियाकर्मियों को मीडिया से संबंधित सूचनाओं जानकारियों अधिकारों को जानने से वंचित कर देंगे लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि अब जमाना स्मार्ट फोन का है. इससे पहले हजारों मीडियाकर्मियों ने सिर्फ भड़ास पढ़ने के लिए अपने बचत के पैसे से लैपटाप खरीदा और घर से भड़ास पढ़ कर भड़ास को इनपुट भेजना शुरू कर दिया.

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कोटा के बाद दैनिक भास्कर भीलवाड़ा में भी बगावत, प्रबंधन पीछे हटा

मजीठिया वेज बोर्ड के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने वाले कर्मियों को लगातार परेशान करने के कारण भास्कर ग्रुप में जगह-जगह विद्रोह शुरू हो गया है. अब तक प्रबंधन की मनमानी और शोषण चुपचाप सहने वाले कर्मियों ने आंखे दिखाना और प्रबंधन को औकात पर लाना शुरू कर दिया है. दैनिक भास्कर कोटा में कई कर्मियों को काम से रोके जाने के बाद लगभग चार दर्जन भास्कर कर्मियों ने एकजुटता दिखाते हुए हड़ताल कर दिया और आफिस से बाहर निकल गए.

बाएं से दाएं : आंदोलनकारी मीडियाकर्मियों के साथ बात करते भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह, अजमेर के वरिष्ठ पत्रकार रजनीश रोहिल्ला और जर्नलिस्ट एसोसिएशन आफ राजस्थान (जार) के जिलाध्यक्ष हरि बल्लभ मेघवाल.

यह सब कोटा में चल ही रहा था कि बगल के भीलवाड़ा एडिशन से खबर आई कि वहां भी प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट जाने के कारण दो लोगों को काम पर जाने से रोका तो दर्जनों मीडियाकर्मियों ने एकजुट होकर आफिस जाने से मना कर दिया. इससे प्रबंधन के हाथ पांव फूल गए. इन्हें अंदाजा नहीं था कि किसी एक को रोकने से दर्जनों लोग काम पर न जाने का ऐलान कर देंगे. ऐसे में कोटा एडिशन की बगावत से निपट रहे भास्कर प्रबंधन ने फौरन पांव पीछे खींचना ही बेहतर समझा और सभी को काम पर जाने की अनुमति दे दी. इस तरह भास्कर प्रबंधन की रणनीति भीलवाड़ा में फेल हो गई.

भीलवाड़ा एडिशन में बगावत की खबर सुनकर कोटा पहुंचे भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने भीलवाड़ा का रुख कर लिया और वहां पहुंचकर आंदोलित मीडियाकर्मियों के साथ बैठक की. उन्हें आगे की रणनीति और प्रबंधन से लड़ने-भिड़ने के तरीके समझाए. साथ ही स्थानीय लेबर आफिस में प्रबंधन की मनमानी के खिलाफ शिकायत करने के लिए फार्मेट दिया. भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के साथ दैनिक भास्कर अजमेर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत रहे और सुप्रीम कोर्ट जाकर मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अपना हिस्सा भास्कर प्रबंधन से छीन लेने में सफल रहे पत्रकार रजनीश रोहिल्ला भी दैनिक भास्कर कोटा और भीलवाड़ा के कर्मियों से मिलते जुलते रहे और लड़ने पर ही हक मिलने की बात समझाते रहे. उन्होंने बताया कि मीडिया के मालिकान सिर्फ सुप्रीम कोर्ट से ही डरते हैं. वे लेबर आफिस से लेकर निचली अदालतों तक को मैनेज कर पाने में कामयाब हो चुके हैं. ये मालिकान डरा धमका कर किसी तरह सुप्रीम कोर्ट से केस वापस कराना चाहते हैं. जो इस वक्त डर गया, साइन कर गया, झुक गया, वह जीवन भर पछताएगा. यही वक्त है डटे रहने का. ये प्रबंधन आप का कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

इस बीच, भास्कर प्रबंधन की तरफ से तरह-तरह की अफवाहें फैलाई जा रही हैं. भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने भास्कर कर्मियों से अपील की कि वे प्रबंधन की बातों पर भरोसा न करें क्योंकि प्रबंधन की अंतिम कोशिश यही होगी कि किसी तरह झूठ बोलकर, बरगला कर, अफवाह फैला कर, डरा कर, धमका कर सुप्रीम कोर्ट जाने वालों से फर्जी कागजातों पर साइन करा लें. साथ ही मीडियाकर्मियों की एकजुटता को खत्म कर दें. यशवंत ने कहा कि एकजुटता और संगठन ही वो ताकत है जो मालिकों को घुटनों पर बिठाने में सफल हो सकेगा.

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“सूत न कपास जुलाहे में लट्ठम-लट्ठा”

“सूत न कपास जुलाहे में लट्ठम-लट्ठा” ये बात जाहिर होती है पत्रकारिता बचाने के नाम पर लड़ाई करने वालों के सोशल मीडिया स्वांग से| अभी हाल का ही मामला ले लीजिये एक भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह हैं ने आईबीएन 7 के पंकज श्रीवास्तव मामले में जिस बचपने का परिचय दिया है उससे तो यही लगता है कि चैनलों और दूसरे मीडिया संस्थानों के भीतर की खबरों को भड़ास पर दिखा के यशवंत मीडिया के नामचीन मठाधीशों में शामिल तो हो गए लेकिन भड़ास से सिर्फ उनके व्यक्तिगत संबंधों और संपर्कों के सिवा और कुछ नहीं निकला| लेकिन अगर ये अनुमान लगाया जाए कि इससे देश दुनिया समाज और खुद पत्रकारिता पर फर्क क्या पड़ा तो नतीजा ढ़ाक के तीन पात ही नज़र आता है|

भड़ास के जानकार कहते हैं वेबसाइट पर मीडिया घरानों को धमका के फजीहत करने का काम होता है| कार्पोरेटी शह-मात के खेल में यशवंत पुराने महारथी हैं| लगभग तीन साल पहले लखनऊ दैनिक जागरण के राजू मिश्र से मिला तो उन्होंने बताया कि यशवंत ने दारू पी के अख़बार के मैनेजमेंट से झगडा कर लिया था| यशवंत अपना वेतन लेकर निकले और मीडिया में व्याप्त भ्रष्टाचार के लिए लिखना शुरू कर दिया| मेरे लिए भड़ास का पहला परिचय यही था जिसके बाद मुझे लगा कि कुछ भी हो यशवंत में कुछ तो करेंट है ही| इसीलिए यशवंत की कहानी बता के जब राजू भाई ने पूछा था कि पत्रकारिता करना चाहते हो क्या? तब मेरा सवाल यही था की पत्रकारिता के नाम पर नैतिक मूल्यों और सामाजिक सरोकारों की अनदेखी करके जैसा कारपोरेटीकरण हो रहा है उससे मीडिया और समाज की खैरख्वाही कैसे कर पायेगा?

इस मुलाकात के बाद गुजरे इतने सालों में मीडिया के बहुत से फोरमों में उठना-बैठना हुआ| पत्रकारों के फोरमों का जो हाल है उसको कुछ यूँ समझना बेहतर होगा कि चिराग के तले ही नहीं बल्ब, ट्यूब लाईट सीएफएल तले भी अँधेरा होता ही है| ज्यादातर मामलों में हुई आपसी कहा सुनी का कोई खास मतलब नहीं बनता| व्यवस्था और बड़के घाघ भले ही कहीं प्रभावित न हों लेकिन छूंछे मूल्यों के नाम पर आपसी संबंधों की अर्थी जरुर निकल जाती है| कोई भ्रष्टाचार से ही भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का फलसफा लेकर बहस में उलझा हुआ नज़र आता है| कहीं पत्रकारों का अहं यानि ईगो देश-दुनिया पर बोझ जैसा जान पड़ने लगता है तो कहीं नासमझी ही अंतिम सत्य लगता है|

बहुत ज्यादा तो कुछ नहीं पर कुल मिला के यही जान पाया हूँ कि सिद्धांतों, वाद-विवादों और बहसों के बीच अगर कमी है तो आपसदारी की| सोशल मीडिया में व्यक्तिगत विवादों को भी लोग चटकारे ले-ले कर पढ़ते हैं| पंकज- मनीषा श्रीवास्तव और यशवंत सिंह के मामले में सिर्फ यही सलाह है कि कहीं आमने सामने बैठ के आपसी समझदारी से मसले को निपटा लीजिये| बेहतर तो यही रहेगा कि व्यक्तिगत मामलों को सिद्धांतों का मुलम्मा चढ़ा के देश दुनिया बचाने का स्वांग न किया जाय| अगर “सिद्धांतों से संतुष्टि” है तो “एकता में शक्ति” फैसला आपको करना है| मेरा सुझाव तो यही है कि एक बनो-नेक बनो तभी लोग साथ देंगे|

| ऐसे मसलों में बाबा नागार्जुन की ये कविता जीवंत नज़र आती है ….

पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूँखार,
गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गए चार|

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन,
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन|

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो,
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो|

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक,
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक|

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झण्डा,
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अण्डा|

Rakesh Mishra

9313401818, 9044134164
सत्यमेव जयते
http://punarnavbharat.wordpress.com/

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भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह का एक पुराना इंटरव्यू

मीडियासाथी डॉट कॉम नामक एक पोर्टल के कर्ताधर्ता महेन्द्र प्रताप सिंह ने 10 मार्च 2011 को भड़ास के संपादक यशवंत सिंह का एक इंटरव्यू अपने पोर्टल पर प्रकाशित किया था. अब यह पोर्टल पाकिस्तानी हैकरों द्वारा हैक किया जा चुका है. पोर्टल पर प्रकाशित इंटरव्यू को हू-ब-हू नीचे दिया जा रहा है ताकि यह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे और यशवंत के भले-बुरे विचारों से सभी अवगत-परिचित हो सकें.

यशवंत सिंह

 

कठघरे में ‘भड़ास4मीडिया’ के एडिटर यशवंत सिंह

साक्षात्कारकर्ता : महेन्द्र प्रताप सिंह

10.03.2011 11.30pm


(मीडिया साथी डॉट कॉम के कठघरे में इस बार हैं, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के एडिटर यशवंत सिंह। इस साक्षात्कार में हमने देशभर के मीडिया हाउसों की ख़बर लेने वाले यशवंत सिंह की ख़बर ली है और ‘मीडिया साथी डॉट कॉम’ के स्तर के अनुरूप बिना किसी लाग-लपेट के सीधी और खरी-खरी बातें की हैं। ‘भड़ास4मीडिया’ पर लगाए गए सभी आरोपों के जवाब में यशवंत ने जो कहा, उससे आप और हम असहमत हो सकते हैं, किन्तु इससे कम से कम ‘भड़ास4मीडिया’ से जुड़ी विचारधारा और यशवंत के पक्ष को तो समझा ही जा सकता है – महेन्द्र प्रताप सिंह)

-यशवंत जी, सीधे आरोपों से शुरुआत करते हैं। ‘भड़ास’ एक नकारात्मक शब्द है। क्या आपको नहीं लगता कि हमें विभिन्न मुद्दों पर सिर्फ़ अपनी भड़ास निकालने तक सीमित रहने के बजाय समस्या के समाधान के लिए कुछ सार्थक क़दम उठाने चाहिए?

–समाधान तो अंतिम चरण है। पर पहले तो हम लोग समस्या बताने वाले चरण से ही वंचित थे। कोई प्लेटफ़ॉर्म नहीं था, जो हम लोगों के सुखों-दुःखों को सामूहिक तौर पर व ईमानदारी से अभिव्यक्त करे। जब समस्या का प्रकटीकरण होता है, तभी समाधान की दिशा में क़दम बढ़ता है। और अब इसका असर दिख रहा है। पेड न्यूज़ से लेकर पत्रकारों को उत्पीड़ित करने तक में मीडिया प्रबंधन सतर्क हो गया है कि कहीं उनका भेद न खुल जाए।

-लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि ‘भड़ास’ पत्रकारों में बहुत लोकप्रिय वेबपोर्टल है और इस नाते केवल भड़ास निकालने के बजाय पत्रकारों की विचारधारा और रुचि में परिष्कार की भी आपकी नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है?

–बिल्कुल सही कही कहा आपने, ये कैसे हो सकता है, इस दिशा में आपके भी सुझाव जानना चाहूँगा।

-जी, इसी पर चर्चा करते हैं। बहुत से लोगों को लगता है कि ‘भड़ास’ लोकप्रिय अवश्य है, किन्तु गंभीर पत्रकारिता में इसका नाम सम्मानपूर्वक नहीं लिया जाता और इसे एक-दूसरे की छीछालेदर करने और गाली-गलौज वाली वेबसाइट माना जाता है।

–आज जिन्हें गंभीर माना जाता है, वे कितने छिछले निकले, ये आपको भी पता है। पत्रकारिता के वे बड़े नाम जो कभी गंभीरता के प्रतीक थे, राडिया कांड के बाद दलाली के प्रतीक के रूप में सामने आए। और जब भी, कुछ भी आप कभी नया करेंगे तो जमी-जमाई व्यवस्था शीघ्र आपको स्वीकार नहीं करेगी। वे आप पर तमाम तरह के आरोप व लांछन लगाएँगे। ग़नीमत है कि हम लोगों पर अभी इसी तरह के आरोप लग रहे हैं। पर आज उनसे पूछिए कि ‘भड़ास’ क्या है जो कभी ‘भड़ास’ के आलोचक हुआ करते थे, तो वे भी मानेंगे कि ‘भड़ास’ चाहे जैसा हो इसे इगनोर नहीं कर सकते।

-लोगों का मानना है कि ‘भड़ास’ पर कैसा भी, कुछ भी आसानी से छपवाया जा सकता है। जहाँ तक कि झूठे-सच्चे आरोप और गालियाँ तक आसानी से जगह पा जाती हैं। इस पर आपकी क्या राय है?

–इसमें क्या दिक़्क़त है। कोई तो ऐसा खुला मंच हो। वैसे हम तो काफ़ी छानबीन करके छापते हैं। पर सोचिए गूगल के ब्लॉगों, बज़ व अन्य तमाम वेबसाइटों पर तो तमाम कुछ छपता रहता है। लेकिन लोग वहाँ नोटिस नहीं लेते, क्योंकि उनको लगता है कि गूगल को भला कैसे रोका जा सकता है। पर ‘भड़ास’ को लेकर आप उँगली उठा देते हैं, क्योंकि ‘भड़ास’ को भारत का एक बंदा चला रहा है और वह आपको फ़ोन-मोबाइल पर तत्काल उपलब्ध है, इसलिए उसे आप हड़का लोगे, मुक़दमा कर दोगे। पर आने वाले दौर में, यह जो मनुष्य व मीडिया के जनवादीकरण का दौर शुरू हुआ है, बहुत तेज़ होगा। सबका स्याह-सफ़ेद बाहर आना चाहिए और सब कुछ बेहद ट्रांसपेरेंट होना चाहिए।

-‘भड़ास’ पर न तो भाषा की शुद्धता का ख़याल रखा जाता है और न ही शालीनता का। भाषा पत्रकारिता का एक आधार स्तंभ है। ऐसे में आपको नहीं लगता ‘भड़ास’ पत्रकारों के भाषाई संस्कारों को परिमार्जित करने के स्थान पर उन्हें दूषित कर रहा है?

–पाखंडी क़िस्म की शालीनता से परहेज़ है हम लोगों को। ऐसे पाखंडी क़िस्म के शालीनों ने ही चुपके-चुपके सिस्टम करप्ट कर दिया है। थोड़ा बदज़ुबान ईमानदार चलेगा। और ‘भड़ास’ गुस्से व विरोध का प्लेटफ़ॉर्म है तो कई बार बात कहने में उग्रता, अशालीनता दिख सकती है, पर यह उससे तो अच्छा है, जो टीवी और अख़बारों में दिखाया-छापा जा रहा है। लिंगवर्धक यंत्र, बिग बॉस, सेक्सी सीरियल्स आदि-आदि।

-‘भड़ास’ पर गाली-गलौज और अभद्र भाषा का प्रयोग आम है। लेखों और टिप्पणियों में आपको ये खूब मिल जाएँगी। आपको नहीं लगता कि यह ग़लत है? जहाँ हमें सभी जगह गालियों का विरोध करना चाहिए, हम ख़ुद गालियाँ प्रकाशित कर रहे हैं।

–मजबूर और भूखा आदमी गाली नहीं देगा तो क्या भजन गाएगा। भरे पेट वाले सुरुचि और शालीनता की ज़्यादा बातें करते हैं पर जिनके पेट खाली हैं, सिर पर सिपाहियों के डंडे हैं, वे कैसे शांत रह सकते हैं। मीडिया में एक बड़ा हिस्सा शोषित व उत्पीड़ित है। ये जब अपनी पीड़ा लिखते-बाँटते-बताते हैं तो कई बार उग्र हो जाते हैं।

-कंटेंट को लेकर भी ‘भड़ास’ तथ्यपरक नहीं होता और कई अप्रामाणिक और अपुष्ट समाचार यहाँ डाल दिए जाते हैं। जिन्हें बाद में लोग ग़लत ठहराते नज़र आते हैं। (जैसे पत्रकारों द्वारा भेजे पत्रों के आधार पर ख़बरें डाल दी जाती हैं और उनका नाम आदि भी नहीं दिखाया जाता।)

–पत्र प्रकाशित करना एक पक्ष होता है और उस पर आई टिप्पणियाँ दूसरा पक्ष। हम उन पत्रों को ही प्रकाशित करते हैं, जिन्हें हम लोग भी मानते हैं कि सही हैं। अगर कोई तथ्य ग़लत हो तो उसको लेकर आए स्पष्टीकरण को ससम्मान प्रकाशित करते हैं। बाक़ी जब आप काम करेंगे तो ग़लतियाँ तो होंगी ही। ग़लती वही नहीं करता, जो काम नहीं करता।

-आरोप यह भी है कि ‘भड़ास’ पत्रकारों में चटपटी बातों, झूठे-सच्चे गॉशिप और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने को बढ़ावा दे रहा है।

–कोशिश करते हैं कि ऐसा न हो। लेकिन अगर मीडिया में गॉशिप है, घटनाएँ हैं, सरगर्मियाँ हैं तो वे प्रकाशित होंगी ही। न्यू मीडिया के लिए मीडिया के मायने काफ़ी बदल गए हैं। हम लोग गॉसिप व चर्चाओं को भी ख़बर मानते हैं। बदलते दौर में चीज़ें बदल जाती हैं।

-‘भड़ास’ पर एक कॉलम है ‘कानाफूसी’। उस पर कभी-कभी बहुत ही संवेदनशील ख़बरें बिना किसी प्रमाण और पुष्टि के डाल दी जाती हैं। जैसे, 15 फ़रवरी 2011 को ‘हिन्दुस्तान के भदोही, सोनभद्र, मिर्ज़ापुर ऑफ़िस पर भी लगेगा ताला’ और ‘राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर के संपादक और ब्यूरो चीफ़ आपस में भिड़े’ आदि। बाद में टिप्पणियों में ही लोग इन्हें ग़लत साबित करते हैं।

–हिन्दुस्तान के कई ऑफ़िसों में ताले लगे हैं और कई जगह लगने बाक़ी हैं। होता क्या है कि कई बार ख़बरें छपने के बाद मीडिया हाउस कुछ निर्णयों का एक्ज़ीक्यूशन रोक देते है या टाल देते हैं ताकि साइड इफ़ेक्ट कम से कम हो। दूसरे, अगर चर्चा है तो छाप दिया, वो ग़लत है या नहीं, लोग बता रहे हैं कमेंट में तो स्पष्ट हो गया कि पूरी तस्वीर क्या है। यहाँ आपको बता दूँ कि हम लोग न तो कोई मीडिया हैं, और न कोई अनुदान लाभ प्राप्त मीडिया हाउस। हमें आप मीडिया सेंट्रिक एक इनफ़ॉरमेशन सेंटर कह सकते हैं। इसलिए तथ्यों को सत्यापित करने का काम हमारे पाठकों का भी होता है, क्योंकि हमारे पास कोई लंबा-चौड़ा बजट व टीम नहीं है, जो हर स्टोरी पर पूरी गहराई से काम कर सके।

-‘भड़ास’ वैसे तो ‘भड़ास4मीडिया’ है, किन्तु यदि आपको लगता है कि कोई बात आपकी दर्शक संख्या बढ़ा सकती है, तो आप असंबद्ध बातें भी यहाँ प्रकाशित कर देते हैं। जैसे, ‘मैं मर्द हूँ-तुम औरत, मैं भूखा हूँ-तुम भोजन हो’ या ‘इसे माँ-बेटे का प्यार कहेंगे या रोमांस’ या ‘सरकार चिंतित है कि सेक्स करने की उम्र ज़्यादा क्यों?’ इत्यादि।

–‘भड़ास4मीडिया’ के पाठक आम लोग नहीं होते। पढ़े-लिखे लोग होते हैं। इन पढ़े-लिखे व वयस्कों के सामने सेक्स से संबंधित बात करने में क्या दिक़्क़त है। ट्रेडिशनल मीडिया ने जो दायरे बनाए हैं, अगर उसी दायरे में हम लोग फँस जाएँगे तो फिर काहे का न्यू मीडिया। न्यू मीडिया प्रयोगात्मक है। इसीलिए प्रयोग होते रहेंगे। कभी प्रयोग अच्छे लग सकते हैं और कभी बुरे। मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना। तो अगर किसी का कोई विचार है, जिससे आप भले असहमत हों तो उसे प्रकाशित करने में क्या दिक़्क़त। हमें विरोधी विचारों का सम्मान करना चाहिए। सीखना चाहिए और उससे सबक लेना चाहिए कि मनुष्य बहुत विविधता भरी चीज़ है, जिसे किसी एक डंडे से हाँक पाना अन्याय होगा। यह विविधता अगर हमारे यहाँ झलक रही है तो यह अच्छी बात है।

-आरोप यह भी है कि आप बेमतलब के लेखों को सनसनीख़ेज़ बनाते हुए शीर्षक लगाकर प्रकाशित करते हैं। जैसे ‘पत्रकार हैं, लुगाई कहाँ से लाएँ?’  

–ऐसा नहीं है। हेडिंग और कंटेंट में साम्य होता है। हम लोग टीवी और अख़बारों के द्वारा निर्जीव क़िस्म की हेडिंगों के आदी हैं। पर वेब पर तो प्रयोग होंगे। जिस शीर्षक का आपने ज़िक्र किया है, वह ठीक-ठाक रचना है, जिसका कंटेंट बढ़िया है। हेडिंग तो एक माध्यम होता है, कंटेंट पढ़ाने के लिए, आगे बढ़ने के लिए। इसी कारण हेडिंग में प्रयोग होते रहते हैं।

-‘भड़ास4मीडिया’ के विचार सेक्शन में एक सज्जन का नक्सलवाद पर गृहमंत्री को गरियाता हुआ एक लेख बहुत विवादास्पद हुआ था। उन सज्जन का आरोप था कि आपने पुलिस के डर से वो आलेख वेबसाइट से हटा दिया। बाद में आपने स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि प्रकाशन से पूर्व आपने वह पत्र पढ़ा नहीं था। क्या ये बात वास्तव में सच थी और क्या आपको नहीं लगता कि आपको निडर होकर अभिव्यक्ति के अधिकार को लेकर अडिग रहना चाहिए था?

–आपने पूरे प्रसंग के बारे में इसलिए जाना क्योंकि जिन्होंने विरोध किया था, उसका भी लेख हम लोगों ने छापा और अपना पक्ष भी रखा। तो ये अच्छी बात है कि हम लोग एक बेहद डेमोक्रेटिक प्लेटफ़ॉर्म बनने की तरफ़ तेज़ी से बढ़ चले हैं। कई बार सबकी बात रखने के चक्कर में कुछ चाइल्डिश या एक्स्ट्रीमिस्ट क़िस्म की चीज़ें भी छप जाती हैं, जिस पर ध्यान दिलाए जाने पर उसे हटा लिया या संशोधित कर दिया जाता है। मैं हर चीज़ नहीं देख पाता, क्योंकि सब कुछ पढ़ पाना मुश्किल है एक आदमी के लिए।

-क्या आपको नहीं लगता कि आप जिन वजहों से वर्तमान मीडिया हाउसों को कठघरे मे खड़ा करते हैं, वही काम ‘भड़ास’ पर आप ख़ुद भी करते हैं?

–जैसे बताएँ, उदाहरण दें कुछ। इतना जान लें आप कि हम लोग भी वही काम कर रहे होते तो भड़ास कभी का मर चुका होता। क्योंकि मीडिया के कई मगरमच्छ इसी फ़िराक़ में हैं कि यशवंत या भड़ास से कोई ग़लती हो, इनका कोई स्टिंग हो और इनका सत्यानाश हो जाए। हम लोग बेहद ट्रांसपेरेंट हैं। जो जानना चाहेंगे वो जानकारी पूरी ईमानदारी से आपको दी जाएगी। लेकिन यह ज़रूर मैं कह रहा हूँ कि हम लोग कहीं से कोई रजिस्टर्ड मीडिया नहीं हैं, न कोई अनुदान, भुगतान या लाभ पातें हैं सरकारों से। बावजूद इसके हम नब्बे फ़ीसदी ईमानदार हैं। 90 फ़ीसदी कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करते। 10 फ़ीसदी करते हैं तो इसलिए ताकि ‘भड़ास’ का सर्वाइवल रहे। और इस दस फ़ीसदी में भी वो लोग हैं, जिन्हें हम बेहतर मानते हैं, नया ग्रुप मानते हैं, जिनको प्रमोट करना अपना धर्म मानते हैं ताकि जमे-जमाए व बेहद करप्ट बड़े मीडिया हाउसों को चेलेंज मिल सके।

-तथाकथित न्यू मीडिया को लेकर बहुत बवाल मचा हुआ है। न्यू मीडिया के लोगों का आरोप है कि मुख्य धारा के लोग इस क्षेत्र के अनाधिकृत मठाधीश बनने की कोशिश कर रहे हैं। आपके क्या ख़याल हैं?

–बेवजह का बवाल है। जो लोग हल्ला कर रहे हैं, दरअसल वे खुद मठाधीश बनने की फ़िराक़ में हैं। आप काम करते रहिए, मठाधीश अपने आप क़िनारे लग जाएँगे। कोई बनने से मठाधीश नहीं बन जाता।

-आपके मुताबिक़ न्यू मीडिया की ताक़त और कमज़ोरियाँ क्या हैं और इसका क्या भविष्य देखते हैं?

–परंपरागत अख़बारों व न्यूज़ चैनलों के बाज़ार व सरकार संरक्षित होते जाने की वजह से न्यू मीडिया का तेजी से विस्तार हो रहा है। भविष्य न्यू मीडिया का है। न्यू मीडिया का काम ही मीडिया के असली काम के रूप में प्रकट होगा। भारत में न्यू मीडिया की कमज़ोरी यही है कि अभी इसकी पहुँच गाँव-गाँव तक नहीं है। जिस दिन गाँव-गाँव में इंटरनेट-ब्रॉडबैंड होगा, उस दिन सही मायने में न्यू मीडिया के लोग क्रांति कर रहे होंगे और फिर मिस्र जैसी क्रांति भारत में संभव हो जाएगी।

-यशवंत जी, आइए अब आपकी निजी ज़िंदगी की ओर रुख़ करते हुए चलते हैं… अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताइए।

–मेरा गाँव अलीपुर बनगाँवा है। ग़ाज़ीपुर ज़िले से 22 किलोमीटर दूर। शहर में भी एक मकान है, जिसे बाबा ने बनवाया था, जहाँ रहकर हाईस्कूल और इंटर की पढ़ाई की। उसके पहले कक्षा आठ तक गाँव में रहकर पढ़ाई की। पिता का नाम लालजी सिंह है और माँ यमुना सिंह। पिता रिटायर्ड फ़ौजी हैं, माँ हाउस वाइफ। हम लोग तीन भाई हैं। बहन नहीं है। बहन न होने की कमी रक्षाबंधन के दिन ख़लती है।

-अपने बचपन के विषय में कुछ बताएँ।

–बचपन में हाईग्रेड की शरारतें करता था। पैसा चोरी से लेकर भुट्टा व गन्ना चोरी तक। इन्नोवेशन हर फ़ील्ड में करता था, बचपन में ही। सेक्स से लेकर समाधि तक में बचपन में प्रयोग किया। कभी परम पुजारी बन जाता था, हनुमान चालीसा और सुंदरकांड याद करके, तो कभी गाँव से बाहर किसी खेत में हम कुछ मित्र अपने गुप्तांगों का सामूहिक प्रदर्शन कर इस छुपी दुनिया के रहस्य जानने की कोशिश करते।

-अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइए।

–गाँव में ही प्राइमरी और मिडिल स्कूल की पढ़ाई की। बाद में ग़ाज़ीपुर ज़िले के इंटर कॉलेज से इंटर किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए किया और उसके बाद बीएचयू से बीजेएमसी की डिग्री ली।

-दिल्ली कब और कैसे आना हुआ और गाँव और शहरी जीवन तथा ग़ाज़ीपुर और दिल्ली में आपने कितना अंतर पाया और इसने आपको कैसे प्रभावित किया?

–दिल्ली चार साल पहले आया। पहले दिल्ली से डर लगता था, लेकिन दिल्ली आने की ठान भी चुका था, क्योंकि प्रतिभाओं को सही मुक़ाम दिल्ली-मुंबई में ही मिल पाता है। दिल्ली में सारी टेक्नोलॉजी और तरह-तरह के क्षेत्रों के वरिष्ठ लोग हैं। इससे अगर आप प्रयोगधर्मी हैं तो काफ़ी कुछ सीखने-करने की ग़ुंजाइश होती है। बाक़ी गाँव के लोगों को शहरी जीवन में जो मुश्किलें होती हैं, वो मेरे साथ भी होती रही हैं। भीड़ में अकेले होने का भाव, सामूहिकता का अभाव। तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में भावनाओं को न समझा जाना आदि-आदि।

-अध्ययन के दौरान आपने आजीविका के लिए कौन-सा क्षेत्र चुना था? और बाद में क्या परिस्थितियाँ बनीं? क्या मनचाही फ़ील्ड में कार्य किया या समझौता करना पड़ा?

–अध्ययन करने इलाहाबाद पहुँचा तो मक़सद था, आईएएस बनना, पर बीच पढ़ाई में भगत सिंह को आदर्श मानते हुए ग़रीबों के लिए लड़ने और सिस्टम से लोहा लेने को एक नक्सलवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गया और पूरी तरह, होलटाइमर के रूप में काम करने लगा। बाद में लगा कि इतना मुश्किल काम मैं नहीं कर सकता।

-पत्रकारिता में आपकी रुचि कब पैदा हुई? और किस-किस मीडिया संस्थान में कार्य किया? और वहाँ आपके अनुभव कैसे रहे?

–पत्रकारिता में रुचि पॉलिटिकल एक्टीविज़्म के दौर में पैदा हुई। अमर उजाला और जागरण में काम किया। दोनों जगहों के अच्छे व बुरे दोनों तरह के अनुभव रहे।

-साथी कर्मचारियों में आपकी छवि कैसी थी और उनका आपके प्रति कैसा व्यवहार था?

–चूँकि मैं ज़्यादा तेज़ी से और ज़्यादा इन्नोवेशन के साथ काम करता हूँ, और ऐसे ही लोगों को पसंद करता हूँ तो कई बार जो लोग मेरी सोच के अनुसार नहीं चल पाते, उनसे मतभेद-मनभेद आदि होते रहते हैं।

-बॉस और कर्मचारियों के रिश्ते बहुत नाज़ुक होते हैं। बॉसों की क्रूरता के बहुत से क़िस्से प्रचलित हैं। आपके और आपके बॉसों के रिश्ते कैसे थे?

–आम तौर पर मेरे बॉस ही मुझसे डरा करते थे, क्योंकि मैंने कभी किसी बॉस की चेलहाई नहीं की। वीरेन डंगवाल जैसे संपादकों के साथ काम किया, जो चेला नहीं, अच्छे दोस्त की तरह अपने अधीनस्थों से काम करते-कराते हैं।

-मीडिया छोड़कर कुछ दिनों आपने एक मोबाइल वैल्यू एडेड सर्विस कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट (मार्केटिंग एंड कंटेंट) के पद पर भी काम किया। ये फ़ील्ड में परिवर्तन कैसे हो गया?

–एक टीवी संपादक से रात में फ़ोन पर गाली-गलौज हो गई और उन्होंने मेरी गालियों को रिकॉर्ड कर दैनिक जागरण के मालिक के पास भेज दिया तो इस स्टिंग में मैं नप गया। पत्रकार की नौकरी हर जगह तलाश की। नौकरी न मिली तो जो मिला उसको ग्रहण कर लिया। मार्केटिंग फ़ील्ड में जाने से बहुत कुछ नई चीज़ें समझ में आईं और उसी समझ के कारण मुझे लगा कि ख़ुद का काम करना चाहिए, किसी की नौकरी करने की जगह।

-नौकरी के वक़्त का कोई रोचक प्रसंग बताइए।

–अमर उजाला कानपुर की बात है. एक बार मेरे संपादक वीरेन डंगवाल ने मुझे डाँटा, तो मैंने उन्हें चुपके से इस्तीफ़ा थमा दिया और कमरे पर जाकर दारू पीने लगा। उन्होंने कुछ वरिष्ठों को मुझे मनाने के लिए भेजा, पर मैं नहीं माना। सुबह संदेशा भिजवाकर अपने कमरे पर बुलवाया। उन्होंने कहा कि तुम पहले तय कर लो कि जीवन में करना क्या है। तुम आईएएस बनने इलाहाबाद गए थे, वह न बन सके। लगे क्रांति करने। क्रांति करने के लिए निकले तो वो न कर सके। चल पड़े पत्रकार बनने। अब पत्रकारिता की राह छोड़ने की बात कर रहे हो। जीवन में इतनी अस्थिरता ठीक नहीं। अपनी प्रियारटीज़ तय कर लेनी चाहिए। उनकी इस बात ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया और तय किया पत्रकारिता के क्षेत्र में लगकर काम करना है, सो उनकी प्रेरणा से आज तक इस पेशे में बना हुआ हूँ।

-ब्लॉगिंग में रुचि कैसे हुई?

–वो हिन्दी ब्लॉगों के शुरू होने का दौर था। कई ब्लॉग खुल रहे थे, सो मैंने भी एक ब्लॉग बनाने का निश्चय किया और कुछ अलग-सा, कुछ हटके ब्लॉग बनाने की प्रक्रिया में ‘भड़ास’ ब्लॉग बनाया।

-ब्लॉग तो ठीक है, पर उसका नाम ‘भड़ास’ कैसे सूझा?

–यूँ ही। उन दिनों हिन्दी ब्लॉगों के जितने नाम थे, सबको देखने के बाद लगा कि अलग व विचित्र-सा नाम ‘भड़ास’ ही है, जो हिन्दी की देसज आत्मा को प्रतिध्वनित करता है और यह भी बताता है कि हम हिन्दीवालों में शहरों और अंग्रेज़ियत के ख़िलाफ़ काफ़ी भड़ास है, जिसे निकाले जाने की ज़रूरत है।

-और उसके बाद ‘भड़ास4मीडिया’ वेबसाइट शुरू करने का ख़याल कैसे आया?

–‘भड़ास’ ब्लॉग पर मीडिया से संबंधित पोस्टों को काफ़ी लोकप्रियता मिलने लगी। कम्युनिटी ब्लॉग होने के कारण ढेरों लोग डायरेक्ट अपनी जानकारियाँ पोस्ट करने लगे कि फलाँ पत्रकार ने फलाँ जगह ज्वॉइन कर लिया, उनको बधाई। इस तरह से करते-करते मुझे लगा कि मीडिया पर सेंट्रिक हिन्दी में एक अलग पोर्टल होना चाहिए।

-पाठकों का तो ‘भड़ास’ को खूब प्रतिसाद मिला, लेकिन आपके मित्रों और नज़दीकी लोगों ने इसे कैसे लिए और कितना सहयोग किया?

–मिला-जुला रहा। ‘भड़ास’ ब्लॉग के कारण जागरण में एक बार नौकरी जाते-जाते बची थी। तब ‘भड़ास’ को डिलीट करना पड़ा था। वहाँ से मुक्त होने के बाद फिर ‘भड़ास’ बनाया। कई दोस्त बने ‘भड़ास’ के कारण और कई दुश्मन भी पैदा किए ‘भड़ास’ ने।

-‘भड़ास’ के शुरुआती दौर में जब मैं आपसे मिला था, आपने बताया था कि उस वक़्त आपके किसी परिचित ने ‘भड़ास’ के नाम का ग़लत इस्तेमाल किया था। क्या इस तरह के वाक़ये भी हुए और आप उनसे कैसे निपटे?

–पहले मुझे लगता था कि ‘भड़ास’ का मतलब यशवंत सिंह होना चाहिए। अब मुझे लगता है कि भड़ास या कोई और शब्द किसी एक का नहीं है, सबका होना चाहिए। इसी कारण ‘भड़ास’ नाम से ढेरों ब्लॉग और पोर्टल बन रहे हैं और यह सब देखकर मुधे ख़ुद पर गर्व होता है कि मैंने एक शब्द को इतनी ताक़त दे दी।

-‘भड़ास’ के पहले और बाद में मीडिया को लेकर आपके नजरिए में कितना और क्या बदलाव आया?

–पहले मीडिया रूपी समुद्र में मैं एक तैराक भर था। अब मीडिया रूपी समुद्र का सर्वेयर हूँ जो तैराकों पर नज़र रखता है और उनके भले-बुरे को समझता-महसूसता है और दुनिया को बताता है। बहुत बदला हूँ अंदर से, यह काम करते हुए। कई बार मैं कन्फ़्यूज़्ड हो जाता हूँ कि सही क्या है और ग़लत क्या है। कई बार मुझे सही कहे जाने वाला व्यक्ति ज़्यादा ख़राब दिखता है, बजाय बुहरा कहे जाने वाले से।

-आपके जीवन का लक्ष्य क्या था और क्या ‘भड़ास4मीडिया’ ने इसे पूरा किया?

–लक्ष्य भी समय-समय पर बदलते रहते हैं पर मेरा एक मक़सद शुरू से रहा है मनुष्यता के लिए किसी बड़े स्तर पर काम आना और काम करना। मदर टेरेसा, ओशो, मार्क्स, भगत सिंह जैसे लोग मेरे आदर्श रहे हैं और इसमें दर्शन सिर्फ़ एक है कि मनुष्य को कैसे उसके दुःखों से मुक्ति दिलाई जाए। मुझे लगता है कि अंततः मैं कोई आध्यात्मिक टाइप का जीव हो जाऊँगा जो अपने में मगन रहेगा, गाते-माँगते।

-‘भड़ास’ ने वेब-पत्रकारिता में अपना अलग मुक़ाम बनाया है। कैसा अनुभव है इतने लोकप्रिय पोर्टल का मॉडरेटर और मालिक होने का, जिससे इतने सारे लोग जुड़े हैं और रोज़ देखते-पढ़ते हैं?

–मालिक होने का भाव रोज़ सुख नहीं देता। इस सुख का अहसास तब होता है, जब कराया जाता है। जैसे आपने अभी अहसास कराया है, तो मुझे महसूस हो रहा है कि हाँ, मैं मालिक हूँ। लेकिन सही बात तो यह है कि मैं क्लर्क हूँ जो पूरे दिन लोगों के मेलों का निस्तारण करता रहता है, उनकी सूचनाओं पर काम करता है। इसी ऊर्जा ने ‘भड़ास’ को खड़ा किया और कोशिश करता हूँ कि यही ऊर्जा क़ायम रहे।

-‘भड़ास’ ने अनेक मामले ऐसे उठाए हैं, जो मीडिया हाउसों के मालिकों और प्रबंधकों को पसंद नहीं आए। इन लोगों ने आप पर अनेक मुक़दमे दायर किए हैं। हमारे पाठक ज़रूर जानना चाहेंगे कि इस वक़्त आप पर कितने मुक़दमे चल रहे हैं; उनकी क्या स्थिति है और ‘भड़ास’ उनसे कैसे निपट रहा है?

–क़रीब एक दर्जन मुकदमे हैं। कई नोटिस हैं। हम लोगों ने भी एक लीगल सेल बना दिया है। जब तक आप ज़िंदा हैं, यह मानकर चलिए कि केस, मुक़दमे, थाना, पुलिस ये सब आपके जीवन के हिस्से हैं। इनसे अगर आप बचे हुए हैं, तो आप बहुत सीमित दुनिया में जी रहे हैं। जो लड़ते हैं, उन्हें हराने के लिए चौतरफ़ा घेराबंदी होती है और सिस्टम का हर अंग-प्रत्यंग उसे भाँति-भाँति से क़ाबू में करने की कोशिश करता है। पर अच्छी बात है कि अगर आप सही हैं तो बहुत देर तक कोई आपको परेशान नहीं कर सकता।

-इतना बड़ा और जटिल पोर्टल चलाना बहुत तनाव भरा काम है। कभी-कभी ये आपके लेखों में भी झलकता है। इतनी मुश्किलें, उलाहने, आलोचना और मुक़दमेबाज़ी से कभी निराशा भी होती होगी। ऐसे हालात में स्वयं को कैसे संभालते हैं और फिर से ऊर्जा और आशा कहाँ से जुटाते हैं?

–दारू पीकर, भजन गाकर। सच बता रहा हूँ। दारू मेरे लिए मुक्ति का माध्यम है। कुछ लोगों के लिए सेक्स होता है, कुछ लोगों के लिए सिर्फ़ संगीत होता है। पर मेरे लिए दारू और संगीत, दोनों मिक्स होकर परम मुक्ति के मार्ग बन जाते हैं और मैं अपने सारे अवसाद, दुःखों, तनावों को इसमें होम कर देता हूँ। किसी के प्रति कोई पाप जो होता है मन में, वो भी इसी अवस्था में तिरोहित हो जाता है।

-यदि ‘भड़ास’ न होता तो आज आप क्या कर रहे होते?

–किसी कंपनी में पत्रकार या मार्केटियर बनकर नौकरी कर रहा होता। बच्चों, पत्नी को जिलाने में अपनी ज़िंदगी होम कर रहा होता।

-अपनी रुचियों (हॉबीज़) के विषय में कुछ बताइए। फ़ुरसत का वक़्त कैसे बिताते हैं?

–इधर तो मेरी एक ही हॉबी है, भड़ास और सिर्फ़ भड़ास। इस कारण ज़्यादातर वक़्त भड़ास के लिए देना पड़ता है। बचे हुए वक़्त में दारू और म्यूज़िक।

-हमारे पाठक ज़रूर जानना चाहेंगे कि ‘भड़ास’ का कामकाज कैसे चलता है? कितने लोग इस काम में आपका हाथ बँटाते हैं और ख़बरें कैसे जुटाते हैं और कैसे प्रकाशित की जाती हैं?

–ख़बरें जनता भेजती है। मीडिया के लोग भेजते हैं। छह लोगों की टीम है, जिनमें कुछ अंशकालिक और कुछ पूर्णकालिक हैं। अनिल सिंह कंटेंट एडिटर हैं, जो अमूमन ख़बरों के संपादन व प्रकाशन का काम करते हैं। पोर्टल के लिए पैसे वग़ैरह के जुगाड़ में मैं लगा रहता हूँ ताकि सर्वर का खर्चा और हम लोगों रहने-खाने का खर्चा निकलता रहे।

-‘माँ को न्याय’ ‘भड़ास4मीडिया’ का बहुत ही मार्मिक प्रसंग था। आपको क्या लगता है कि हम पत्रकार इतने कमज़ोर क्यों हैं कि अपनी माँ को छोड़िए, ख़ुद तक को इंसाफ़ नहीं दिला पाते?

–जैसा सिस्टम होता है, वैसा ही असर उस समय की जनता पर पड़ता है। मैं तो भाग्यशाली हूँ कि मैंने अपनी माँ के लिए अभियान चलाया। तमाम लोग तो पुलिस के चंगुल में फँसकर आत्महत्या तक कर लेते हैं। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि सिस्टम लगातार असंवेदनशील, क्रूर, भ्रष्ट और आपराधिक होता जा रहा है। जनविरोधी सिस्टम में आम जनता को न्याय नहीं मिल पाता। सिर्फ़ ताक़तवर और पैसे वाले लोग ही न्याय ख़रीद कर अपने को सुरक्षित रख पाते हैं। ऐसे माहौल में लगता है कि अब बिना किसी क्रांति से कम पर काम चलने वाला नहीं है। पत्रकार भी तो किसी मीडिया कंपनी में नौकरी करते हैं। अगर मीडिया कंपनी न चाहे, तो भला कौन पत्रकार अपने लिए लड़ पाएगा।

-वर्तमान मीडिया पर कुछ सवाल। मीडिया की वर्तमान स्थिति के बारे में आपकी क्या राय है?

–परंपरागत मीडिया जनता के सुखों-दुःखों से तेज़ी से कट गया है तथा विज्ञापन के लिए सिर्फ़ मेट्रो केंद्रित, शहर केंद्रित है जो बहुत दुःखद है। वर्तमान मीडिया में पेड न्यूज़ का चलन भयंकर रूप से बढ़ा है और इस पर नियंत्रण के लिए चारों ओर से आवाज़ उठने का क्रम शुरू हुआ है।

-आपके विचार मीडिया के क्या दायित्व है और क्या वर्तमान मीडिया अपने दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन कर पा रहा है?

–मीडिया का उद्देश्य समाज को जाग्रत करना है, सही दिशा दिखाना है, वैज्ञानिक सोच पैदा करना है। पर दुःखद है कि कई चैनल व अख़बार समाज को मध्ययुगीन दौर में ले जाने का काम कर रहे हैं।

-हाल ही में राडिया टेप प्रकरण ने मीडिया की छवि को बहुत नुक़्सान पहुँचाया है। आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

–अब लोग पत्रकारों से पूछने लगे हैं कि आप मीडिया से हैं या राडिया से। यानी मीडिया में ऊपर के स्तर पर दलालों की जो बड़ी फ़ौज तैयार कर दी गई थी, उसके चेहरे का पहली बार ऐसा ख़ुलासा हुआ है। मुनाफ़ा कमाने के लिए मीडिया कंपनियाँ संपादक की नियुक्ति करती हैं और इसी वजह से राडियाएँ उन्हें जूती के नीचे रखने की कोशिश कर रही हैं।

-भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएँ हैं?

–बहुत जल्दी मैं संन्यासी बनना चाहता हूँ। वैसे मन से तो मैं संन्यासी बन चुका हूँ, अब तन से भी बनना है। संन्यासी का यहाँ आशय भगवा पहनने और दाढ़ी-मूँछ बढ़ाकर राम-राम करने से नहीं बल्कि लोगों को ख़ुश रखने, लोगों को जागरूक करने, लोगों से इंटरेक्ट करने जैसे स्वांतः सुखाय काम में लगना है। आजकल मैं गाता भी रहता हूँ, कबीर को…”नइहरवा हमका न भावे..” और “मन लागा यार फ़क़ीरी में..”

-“मीडिया साथी डॉट कॉम” की ओर से आपको ढेर सारी शुभकामनाएँ और अपना बहुमूल्य वक़्त देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

–आपका भी बहुत धन्यवाद।

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आप जिया न्यूज के कर्मियों के पक्ष में लिख-लड़ रहे हैं और वो कर्मी आपका विश्वास नहीं करते!

यशवंत भईया प्रणाम, बड़े दु:ख की बात है कि ये जो जिया न्यूज के कर्मचारी आपका विश्वास नहीं करते, आपके सहयोगियों का विश्वास नहीं करते, उनके लिए आप इतना कर रहे हैं. आपको बता दूं भइया, आपने एक न्यूज डाली थी भड़ास पर जिया न्यूज की महिला कर्मचारी का पैर कटने की. उस समाचार को मैंने सभी जिया न्यूज के कर्मचारियों को मेल किया. उस मेल में रोहन जगदाले, एसएन विनोद और कई शीर्ष कर्मियों के नाम शामिल थे.

जब मैं उसी शाम करीब 7 बजे जिया न्यूज के बाहर पहुंचा तो कई लोग मेरा विरोध करने लगे. सबने कहा कि वह खबर गलत है. भड़ास सिर्फ अपनी टीआरपी के लिए ऐसा करता है. कुछ ने कहा कि जिसने यह खबर अपने फेसबुक वाल पर डाली है, वह बेरोजगार था, मैंने ही उसे नौकरी दिलाई थी.. आज वह ऐसा कर रहा है. किसी संस्थान का नाम बदनाम करना ठीक नहीं है…

मैं तो कहता हूं कि भइया इन लोगों के साथ ऐसा होना जरूरी है. एक तरफ यशवंत सिंह (वन मैन आर्मी बनकर) उस महिला पत्रकार की मदद कर रहा है लेकिन दूसरी तरफ भड़ास को सिर्फ टीआरपी का खेल बताया जा रहा है. आज ये लोग आपके पास फोटो भेज रहे हैं कि हम हड़ताल पर है. अरे भाई… क्या आप लोगों को (हड़तालियों) उस महिला पत्रकार का कटा हुआ पैर नहीं दिखाई दिया जिसे देखने के बाद शायद कुछ लोग खाना नहीं खाएं होंगे…. सच कहा है किसी ने … क्या जाने कोई पीर पराई…. रही बात रोहन जगदाले की तो वो बंदा पहले ही कह चुका है कि भइया मेरे ऊपर कई मामले हैं… या फिर दूसरे शब्दों में कह लीजिए कि मैं फ्रॉड हूं, मेरा क्या कर लोगे…. यशवंत भइया, मैं तो पहले से ही आपका मुरीद हूं…. लेकिन कभी-कभी दु:ख होता है जब आप लोगों का साथ देते हो और लोग आपकी आलोचना करते हैं … जैसे कि ये जो आज हड़ताल पर बैठे हैं…

संबंधित खबरों के लिंक ये हैं…

https://www.bhadas4media.com/tv/2787-news-channel-strike

स्नेहा बघेल

https://bhadas4media.com/tv/2397-snehal-vaghela-accident

https://bhadas4media.com/tv/2466-snehal-case-channel-baat

आपका

एस. शैलेंद्र
पत्रकार
नोएडा

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भड़ास के जरिए मैंने जिंदगी में पहली बार न्यू मीडिया / सोशल मीडिया की शक्ति का अनुभव किया

जानिब ए मंजिल की ओर अकेला चला था मगर
लोग मिलते गए, कारवां बनता गया!!!

यशवंतजी की ओर से देशभर के पत्रकारों के नाम भड़ास पर पोस्ट हुआ संदेश न्याय की लड़ाई में उबाल ला चुका है। भड़ास के जरिए मैंने जिंदगी में पहली बार न्यू मीडिया / सोशल मीडिया की शक्ति का अनुभव किया। भड़ास की पूरी टीम को मेरा धन्यवाद! धन्यवाद देने का एक बड़ा कारण यह भी है कि मजीठिया के मामले में देश के पत्रकारों को एकजुट होने का मंच भी मिला है। भड़ास के यशवंतजी का मेरे को लेकर लेख आने के बाद मेरे पास पिछले दो दिनों से देशभर से बड़ी संख्या में पत्रकारों के फोन आ रहे हैं। अधिकांश पत्रकार मजीठिया की लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहते हैं।

मुझे लगता है कि यह समय पत्रकारों के जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट है। दूसरे शब्दों में आर-पार की लड़ाई है। पत्रकारों ने फोन कर मुझे न सिर्फ बधाई दी बल्कि मेरा हौसला भी बढ़ाया। मैं जानता हूं कि मेरी लड़ाई अरबों रुपए का कारोबार करने वाली कंपनी से है। यह लड़ाई मैं देशभर के पत्रकारों के दम पर ही लड़ सकता हूं। मुझसे  पत्रकारों ने पूछा कि हम तो सब अलग-थलग पड़े हैं, ऐसे में मजीठिया की लड़ाई कैसे लड़ी जा सकती है। मैंने इन साथियों को बताया कि अपने शहर में  पत्रकारों का छोटा-छोटा समूह बना लें और वकीलों से राय मशविरा कर सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए ड्राफ्ट तैयार करा लें।

मैंने ये भी सुना है कि कंपनियां मजीठिया से बचने के लिए बड़ी संख्या में पत्रकारों के ट्रांसफर की तैयारी कर रही हैं या कर चुकी हैं, ताकि अधिकांश पत्रकार नौकरी छोड़कर चले जाने के लिए मजबूर हो जाएं। कंपनियों की दूसरी रणनीति यह है कि वो अपने स्थाई कर्मचारियों से इस्तीफा लिखवाएंगी तथा कान्टेक्ट कर्मचारी के रूप  में नया अप्वाइंटमेंट देगी। साथियों! ये समय भारत के पत्रकारों के लिए सबसे दुर्भाग्य का समय होगा। वर्तमान में जब सुप्रीम कोर्ट हमारी ताकत बना हुआ, तो हमारा कमजोर रहना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। मालिकों व कर्मचारियों के बीच हर युग में संघर्ष होता आया है और सबसे सुखद बात यह है कि हर युग में कर्मचारी जीते हैं। आप भरोसा रखिए कि जब दुनिया में कोई भी परिवर्तन आता है तो उसके  पीछे परमात्मा की शक्ति और उसकी इच्छा होती है। मजीठिया भी उसी का एक पार्ट है। यह हमारे लिए बना है। हमारा हक है। …और इसे लेने के लिए हमें ठान लेनी चाहिए। जो लोग इस मुगालते में हैं कि न्याय मांगने व देने वालों को खरीद लेंगे, उनकी गलतफहमी दो जनवरी को सहारा समय के मालिक सुब्रत राय की तरह दूर हो जाएगी।

मजीठिया की लड़ाई में एक-एक पत्रकार उसी तरह महत्वपूर्ण है, जिस तरह देश के लिए एक-एक सैनिक है। दोस्तों! मैं ये कोई आर्टिकल नहीं लिख रहा हूं बल्कि जो अनुभव कर रहा हूं, वो आप को बता रहा हूं। अभी नहीं तो कभी नहीं। हम  पत्रकारों  पर आने वाली  पीढियां हंसेंगी। हमारी पीढियां कहेंगी कि हम सशक्त भारत के सबसे कमजोर वर्ग हैं। मजीठिया देश के एक-एक पत्रकार को मिले, इस बात की लड़ाई लड़ने के लिए मैं चैन की नींद नहीं सो रहा हूं। उसी तरह आप भी आज से संकल्प लीजिए कि मजीठिया की लड़ाई में जो संभव होगा, मदद करूंगा। अगर आपने अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ी तो ये बात मत भूलना कि आप अपने शोषण का रास्ता खुद बना रहे हैं। मैं आप से फिर से मुखातिब होउंगा, देश के तमाम उन पत्रकारों को धन्यवाद जिन्होंने भड़ास संपादक यशवंत जी के लेख के बाद मुझे फोन कर मेरा हौसला बढ़ाया।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरा मकसद है, ये तस्वीर बदलनी चाहिए

आप का
रजनीश रोहिल्ला
मोबाइन नंबर : 9950954588


मूल खबर….

दैनिक भास्कर को औकात दिखाने वाले सीनियर रिपोर्टर रजनीश रोहिल्ला को आप भी सलाम करिए

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पहले यश मेहता को गालियां दी, नौकरी से निकाला गया तो भड़ास पर खबर छपने के कारण यशवंत को गालियां दे रहा

Yashwant Singh :  कल रात एक बंदे ने मुझे फोन किया और बिना नाम पहचान बताए धाराप्रवाह माकानाका करने लगा यानि गालियां बकने लगा. खूब दारू पिए हुए लग रहा था. उससे मैं पूछता रह गया कि भाई साब आप कौन हैं, क्या समस्या है.. पर वो सिवाय गाली बकने के दूसरा कोई काम नहीं कर रहा था, न सुन रहा था, न सवालों का जवाब दे रहा था. वह सिर्फ गालियां बकता जा रहा था. फोन कटा तो मैं हंसा. उस बंदे का नंबर फेसबुक पर डाला और फेसबुकिया साथियों से पता लगाने को कहा कि ये कौन शख्स है, जरा काल कर के इससे पूछें.

Divya Ranjan

Divya Ranjan

Divya Ranjan FB Profile


एफबी वाले कितने मित्रों ने पूछा, ये तो नहीं पता लेकिन ढेर सारे साथियों ने उसी के अंदाज में उस गालीबाज शख्स को फोन कर उसकी धुलाई की. मीडिया और पुलिस के कई साथियों को इसका नंबर देकर पता लगाने को कह दिया कि इस नंबर से गाली बकने वाले का नाम पता लोकेशन आदि सर्विलांस के जरिए पता करें व बताएं. सुबह होते-होते सब पता चल गया. आज सुबह मालूम हुआ कि ये शख्स ‘दिव्य रंजन’ नामक प्राणी है जो कभी ‘4रीयल न्यूज’ चैनल में पीसीआर में सेवारत हुआ करता था. वहां के तत्कालीन सीईओ यश मेहता के साथ ऐसी ही ओछी व गाली-गलौज वाली हरकत इसने की थी. तब यश मेहता ने इसके खिलाफ नोएडा में एफआईआर दर्ज कराई और नौकरी से बाहर कर दिया. सीईओ को फोन पर गरियाने, धमकाने आदि से संबंधित एफआईआर की खबर मय दस्तावेज भड़ास पर छपी थी. ये बात इसी साल अप्रैल की है. संबंधित खबर का लिंक ये http://goo.gl/Cq4ozm है, इस पर क्लिक करें और पढ़ें.

भड़ास पर छपी इसी खबर के कारण वह बंदा चिढ़ा हुआ था और करीब चार महीने बाद उसकी चिढ़न कल रात अचानक सतह पर आ गई. उसने मुझे बतौर खलनायक अपने मन-मस्तिष्क में पेंट किया और दिल में छुपा रखी महीनों पुरानी खुन्नस को सामने ले आया. इसी क्रम में उसने नशे की अधिकता में फोन मिलाया और गालियां बकने लगा. हालांकि भड़ास पर छपी खबर में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसका कोई कम अक्ल पत्रकार भी बुरा माने. अगर किसी के खिलाफ कोई एफआईआर हुई है तो उस एफआईआर की कापी के साथ खबर छापने में कोई गलत बात नहीं. यह एक रुटीन किस्म की खबर है. इसमें आहत करने होने जैसी कोई बात ही नहीं है. पर इस खबर के कारण अगर खबर में उल्लखित कोई आरोपी खार खा जाए, कुंठित हो जाए, रिएक्ट करने लगे और दुबारा वही हरकत करे जिसके कारण वह खबर का हिस्सा बना था तो उसे पत्रकार हरगिज नहीं माना जा सकता. वह प्रोफेशनल क्रिमिनल माइंडसेट रखने वाला शख्स माना जाएगा.

ऐसे लोगों का क्या इलाज है? अब सुबह से इस प्राणी को फोन कर रहा हूं तो यह फोन नहीं उठा रहा. ऐसे लोग रात में दारू की उर्जा में स्कोर सेटल करने बैठते हैं. वैसे, सच कहूं तो कुछ-कुछ मेरी तरह का लगता है ये दिव्य रंजन नामक प्राणी. बस एक बड़ा फर्क यह है कि अपन ने कभी नाम पहचान छिपाकर किसी से बदतमीजी नहीं की. जिससे भी बुरी या खरी बात कही तो पहले नाम पता परचिय बताया उसके बाद सुनाया या समझाया. दूसरी बात ये कि अपन कभी छोटे मोटे मसलों को लेकर रिएक्ट नहीं हुए. ज्यादातर मामलों को इगनोर किया, चित्त से देहि उतार के अंदाज में. फिर भी, मैंने भी मदिरापान करके ढेर सारे कांड और कुकृत्य किए हैं, इससे इनकार नहीं. पर जो नाम पहचान छुपाकर और बिना कारण बताए गाली गलौज करने लगे उसे मैं ओछा व महाकुंठित प्राणी मानूंगा. अबे दम है तो पहले नाम पता बताओ, फिर जो कहना है कहो. वैसे मदिरा मस्त विभाग में एक ऐसा रोग है, जो महाकुंठित लोगों को हो जाया करता है. वो ये कि ऐसे लोग पीते ही अथाह उर्जा से खुद को लैस पाते हैं और इसी ताव में कुछ ही देर में विवेक शून्य हो जाते हैं. फिर इन्हें एहसास नहीं होता कि ये क्या कह रहे, क्या कर रहे.

ऐसे लोगों से जब आप सुबह बात करने की कोशिश करेंगे तो ये बात नहीं करेंगे, आंखें नीची किए रहेंगे, आमना-सामना करने से कतराएंगे. यह एल्कोहलिक एब्यूज और डिसार्डर भारत में काफी कामन है. ऐसे मेंटल स्टेट में ढेर सारे अपराध घटित हो जाया करते हैं. सुबह जब दिव्य रंजन ने फोन नहीं उठाया तो उसे मैसेज करके बता दिया कि तुम्हारा नाम पहचान करतूत सब पता है और तुमने रात में जो किया है वह अक्षम्य है, लेकिन अगर तुम्हें गल्ती का एहसास तनिक भी हो तो क्षमा मांग लो, मेरा दिल बहुत उदाहर है, माफ कर दूंगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो लीगल प्रक्रिया में मुझे जाना पड़ेगा. मजेदार है कि दिव्य रंजन मेरे फेसबुक फ्रेंड भी हैं : उनका फेसबुक प्रोफाइल और तस्वीर यहां दे रहा हूं… मैं हमेशा से मानता रहा हूं कि लिखने पढ़ने वाले बरास्ते पुलिस से बात नहीं करते, कलम के जरिए बात करते हैं. इसी कारण पूरे घटनाक्रम को यहां लिख रहा हूं. अगर पुलिस में जाना होता तो अभी तक एफआईआर करा चुका होता. लेकिन किसी की भी एक दो गल्तियां माफ की जानी चाहिए. खासकर तब जब वह घोड़े पर सवार होकर हवा से बात करने वाली दारूबाजी की स्थिति में हो.

दिव्य रंजन को देर सबेर अपने एल्कोहलिक व्यवहार का इलाजा कराना पड़ेगा अन्यथा ये जीवन में कभी बड़ा गड़बड़ कर बैठेगा जिसके चलते उसे पूरे जीवन पश्चाताप करना होगा. इसलिए मैं दिव्य रंजन से अनुरोध करूंगा कि वह नार्मल स्थितियों में बात करे और अपनी बात रखे. अगर उसे भड़ास से कोई शिकायत है, मेरे से कोई शिकायत है तो लिखकर भेजे, उसके पक्ष को प्रमुखता से भड़ास पर प्रकाशित किया जाएगा. भड़ास इसीलिए जाना जाता है कि यह निष्पक्ष मंच है, एकपक्षीय मंच नहीं है. अगर हम गल्तियां करते हैं तो उससे सबक लेते हैं और उसका परिमार्जन भी प्रकाशित करते हैं. सभी के जीवन में उतार चढ़ाव आता है और सभी हालात से निपटने के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं. पर कई साथी मुश्किलों चुनौतियों को फेस करने की जगह नकारात्मक दृष्टिकोण लिए अतीतजीवी हो जाते हैं. इस अतीतजीविता में सिवाय डिप्रेशन, तनाव, कुंठा, विवाद के कुछ मिलता नहीं है. खैर, यहां काफी लंबा भाषण हो गया लेकिन यह सब लिखना जरूरी था ताकि मेरे दिल दिमाग पर कोई बोझ न रहे और सब कुछ ट्रांसपैरेंट रहे. दिव्य रंजन के लिए मेरी शुभकामनाएं हैं. वो खुद को संभालें, सफल हों, यह कामना है. दिव्य रंजन का फेसबुक प्रोफाइल लिंक ये https://www.facebook.com/dibya.ranjan.792 है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. इसी मामले पर यशवंत की शुरुआती पोस्ट यूं है…

Yashwant Singh : +917870199133 Es number se ek aadmi makanaka kar raha hai. Apna naam pehchaan bhi nahi bata raha. Chhup ke gaali dene wala ye shakhs kaun ho sakta hai? Vigyaan aawo kar ke dekhen Aap bhi lagiye zara aur apna feedback dijiye. Ek call aapki taraf se en bhayi saab ko banta hai na.. — feeling excited.

इस पोस्ट पर आए कुछ कमेंट इस प्रकार हैं…

UmaShanker Sharma यह फोन अभी गया बिहार के आस पास कही है बाकी सुबह पुलिस में एक कम्प्लेंट डालिए , बाकी वो सम्भाल लेगी

Yashwant Singh Subah police mei jaana hi hai. Tab tak raat ka aanand liya jaaye..

UmaShanker Sharma कोई फायदा नहीं इन उच्चको के मुह लगने का ये सब अपने माता पिता की ग़लतफ़हमी से इस धरती पे आ गए हैं

Shekhar Subedar Great Yashwant Singh ji .Bilkul banta hai.

Arsh Vats Sahb ye kh rha h danish bol rha hu isko alankaar lga diye h bhut ab phn nhi utha rha msg kar diye h bhut sare or sewa btyo sirSee Translation

Ashok Aggarwal स्विच आफ जा रहा है अब ? शायद फट गई ….

Pradeep Sharma दादा अगर इस नंबर वाले को गाली देने की छुट दे तो में कर सकता हू अपनी जुबान भी जरा साफ़ हो जायेगी…..आज्ञा दे दादा..

Prashant Mishra are good ,bahut din se kisi ki gariyaye nhi hai…

Mukesh Gairola KYa aap bhi hamre ley aise taiyar rhengy ?

Anurag Singh Mob.switched off……

Punit Bhargava bihar-jharkhand circle ka number hai

Gyanesh Tiwari Busy ja raha hai. Shayad kayi log ek saath try kar rahe honge.

Vikash Kumar Gupta ha ha iska no. to switch off ja raha hain

Prashant Mishra shubham v.c. to mila nhi.esi sale ko gariaao……abhi sala off aa rha..See Translation

Pradeep Sharma ऑफ़ आ रहा है नंबर दादा..

Prashant Singh Bhaiya meri awaz unko pasand nahi kutch bol hi nahi rahe. waise mai puri rat jaga hi hu check karta rahungaSee Translation

Gyanesh Tiwari Number on hai. Koi uthaya tha lekin bol nahi raha hai.

Yashwant Singh Jab bhi number on ho, en bhayi saab ko phone kariye. Baaki servilance ki sewaaye lene ki taiyaari hai. Jald hi mahashay ko saamne le aata hu.

Shubham Pandey Hum bhi try kiye. Waisa hi mann mera hai. Frustiyaaye huye hai tab se yaar. Gariyaya jaaye saale ko kuttu smjh ke hi Prashant Mishra

Yashwant Singh Number on hai. Busy bata raha hai. Mai bhi try kar raha. Aap sabhi bhi kariye. Gaali do lekin naam pehchaan ke saath. Chhupa khel pasand nahi aata apan ko.

Pradyumna Yadav एक धक्का गाली-गलौज हुयी है । उसका पूरा खानदान किये है । ससुरा , दांत चियार रहा था । बहुत बेहया लगता है ।

Yashwant Singh Pradyumna Yadav ha ha ha … Wo bhi sochega kaha fas gaya

Ashok Aggarwal मुझे लगता है उसे ये न0 बन्द करना पडेगा वो सोच रहा होगा पडी लकडी ले ली….

Kamal Kumar Singh हम एक ठो उससे बात पूछे, उसके बाद वो भड़क गया। नंबर सदाबहार मनोरंजन का साधन है ये। मजे लिजिए समय समय पर सब।

UmaShanker Sharma यशवंत भाई, गुस्ताखी के लिए अग्रिम माफ़ी उसके लिए क्या है वो तो निर्लज्ज होगा , लेकिन अपने तो निर्लज्ज नहीं न हो सकते अपनी जुबान काहे को कडवी करे इन सब को ट्रेस आउट करने में पुलिस को केवल चार घंटे लगते हैं, और थोड़ी पहचान हो तो ६ घंटे में गिरफ़्तारी भी हो जाती है सामने आएगा तो उसके समझ में आ जायेगा के अगले तीन पीढियों को ये समझाना है के ऐसा काम नहीं करने का

Yashwant L Choudhary मैंने तो कुछ सुना ही नहीं, फोन उठाते ही अपनी पूरी भड़ास निकाल दी, फोन ही काट दिया मेरा

Yashwant Singh UmaShankar Sharma bhayi. Aap se sahmat hu. Kal din mei ho jaayega kaam. Lekin raat mei kyu karen aaraam

Aman Singh Yah sala kisi bikau mediahause ka pilla hoga..

मुकेश कुमार http://www.truecaller.com/in/7870199133

Alpna Chauhan Hahaha…thakur shab k sath prani n ye vyabhar kiya h kya isko chor diya jaye?

Gyanesh Tiwari Diya hoon khaane bhar ko. Saala palat ke gaali bak raha hai. Subah iska ilaaj hona hi chahiye.

Yashwant Singh Mere paas abhi uska phone aaya. Bol raha hai ki dusro se gaali dilwa rahe ho.. es sadachaari pe to mar mar jaawan.

Gyanesh Tiwari Hahahaha… Jo bhi hai, bahut bada wala patit hai…

Syed Shakeel Good hai boss …..kamaal hai ap bhi wo ek apke pochhe laga tha apne ek hajar log uske pichhe laga diye ….uski to maa ka ho gaya saki nakaSee Translation

Abdul Noor Shibli Oo kaisa besharm hai re bhai…..

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