यशवंत पर हमले की कहानी, उन्हीं की जुबानी ( देखें सुनें संबंधित आडियो, वीडियो और तस्वीरें )

बिना वाइपर की बस… यह तस्वीर तबकी है जब बारिश थोड़ी कम हो गई थी.

दिल्ली को अलविदा कहने के बाद आजकल भ्रमण पर ज्यादा रहता हूं. इसी कड़ी में बनारस गया. वहां से रोडवेज बस के जरिए गाजीपुर जा रहा था. मेरे चाचाजी को हार्ट अटैक हुआ था, जिसके बाद उनकी ओपन हार्ट सर्जरी होनी है. उन्हीं को देखने के लिए गाजीपुर जा रहा था. शिवगंगा ट्रेन से बनारस उतरा और रोडवेज की बस पकड़ कर गाजीपुर जाने लगा. मौसम भीगा भीगा था. बारिश लगातार हो रही थी. बस चलने लगी. बिना वाइपर की बस धीमी गति से रेंगते हुए बढ़ रही थी. ड्राइवर कुछ ज्यादा ही सजग था क्योंकि लगातार बारिश से बस का शीशा पानीमय हुआ जा रहा था और उसे शीशे के पार सड़क पर देखने के लिए कुछ ज्यादा ही मशक्कत करनी पड़ रही थी.

मेरी सीट ड्राइवर के ठीक पीछे यानि पहली वाली सीट थी. मैं आसानी से बारिश और ड्राइवर का संकट देख समझ पा रहा था. बस जब घंटे डेढ़ घंटे की मशक्कत के बाद बनारस शहर के बाहर निकल गई और गाजीपुर की तरफ चलने लगी तो भी बस की स्पीड तीस चालीस से ज्यादा नहीं हो पा रही थी. एक जगह चाय पानी के लिए जब बस रुकी तो ड्राइवर साहब अपने सामने वाले बस के शीशे पर कुछ सफेद सफेद पोतने लगे. मैंने पूछा कि ये क्या रगड़ रहे हैं. ड्राइवर ने बताया कि ये चूना है, ये कैटलिस्ट होता है, पानी को रुकने नहीं देता, यानि पानी बूंद के रूप में शीशे पर इकट्ठा नहीं हो सकेगा और चूने के प्रभाव में आकर सरपट नीचे भागेगा जिससे थोड़ी बहुत विजिबिलिटी बनी रहेगी. ड्राइवर के इस देसी नुस्खे को देखकर हैरत में पड़ गया है. क्या गजब जुगाड़ है भारत में. हर चीज जो नहीं है, उसका स्थानापन्न तलाश लिया जाता है. शायद दुख और संकट का भी स्थानापन्न हम तलाश लेते हैं, मन ही मन, कि ये सब पूर्व जन्मों का फल है इसलिए भोग लो.

ड्राइवर ने जब दुबारा बस स्टार्ट की तो चूने का असर साफ दिख रहा था. ड्राइवर के सामने वाले जिस शीशे पर चूना लगा था वहां पानी रुक नहीं रहा था, सरपट भाग रहा था नीचे, इसलिए साफ दिख रहा था. ड्राइवर के बाएं वाले शीशे जहां चूना नहीं लगा था, वहां बूंद बूंद पानी चिपका हुआ था. ड्राइवर से बातचीत शुरू हुई. आखिर बिना वाइपर ये बस चलाने का मकसद, मतलब क्या है. इतने सारे यात्रियों की जान खतरे में डाले हुए हैं. जहां हमें दो घंटे में पहुंच जाना चाहिए, वहां वाइपर न होने के कारण चार घंटे में पहुंचेंगे, स्पीड धीमी होने के कारण. ड्राइवर बस चलाते हुए लगभग फट पड़ा. अपने अधिकारियों के उपर. अफसरों की लापरवाही और हीलाहवाली से दुखी ड्राइवर बोला कि मैं साल भर से कंप्लेन कर रहा हूं, कोई नहीं सुन रहा. आज भी जब ये बस ले कर चला हूं तो रजिस्टर पर लिखवा कर आया हूं कि इसमें वाइपर नहीं लगा है.

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यशवंत जी, आपका ब्लाग कुछ समय से अरविन्द केजरीवाल, ABP न्यूज़ और ND टीवी का मुखपत्र बन गया है!

प्रिय यशवंत जी।

मैं लंबे समय से आपका भड़ास4मीडिया ब्लॉग पढ़ रहा हूँ। पहले मुझे ये अच्छा लगता था क्यों की आप मीडिया में फैली बुराइयों को सामने लाते थे। लेकिन कुछ समय से देख रहा हूँ की आपका ये ब्लॉग अरविन्द केजरीवाल, ABP न्यूज़ और ND टीवी का मुखपत्र बन गया है।

सिवाए सरकार की आलोचना, RSS का विरोध, सरकारी चैंनल की आलोचना, अरविन्द केजरीवाल के समर्थन की न्यूज़ और ND टीवी व् ABP न्यूज़ की बढ़ाई के और कुछ पढ़ने को नहीं मिलता।

जो बाते सोशल साईट पर शर्मीला, शोभा डे, कविता कृष्णन के बारे में बताई गई क्या वो गलत है।

क्या आपने अरविन्द के उस जोक पर कोई कटाक्ष किया? जो उन्होंने एक रिक्शे वाले के सन्दर्भ में कहा। केजरीवाल भी तो मीडिया के दम से ही फेमस हुआ है।

अच्छा लगेगा अगर आप जवाब देंगे।

प्रार्थी

आदित्य गुप्ता

aditya0786@gmail.com

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भड़ास वाले यशवंत ने दिल्ली को अलविदा कहा

Yashwant Singh : अलविदा दिल्ली। 9 साल का साथ आज ख़त्म। पैकिंग कम्प्लीट। रात में रवानगी। अब पूरा देश मेरा। केरल से लेकर कासगंज तक रहेगा डेरा, बारी बारी। दिल्ली में आज आखिरी दिन विदा देने राहुल पूनम राजीव आदि साथी पहुंचे। सबका आभार। लेकिन हे दिल्ली वालों, ये मत बुझना कि यहाँ से गया तो चला ही गया। आऊंगा, भले ही मेहमान की तरह। दिल्ली में हर राज्य के बने भवन सदन गेस्ट हाउस निवास जो हजारों की संख्या में हैं, सब मेरे हैं। इतने सारे दोस्त साथी मित्र भाई दिल्ली में हैं कि रहने के दिन कम पड़ जाएंगे, जगह नहीं। इसलिए जाने का मतलब ये नहीं कि मूंग दलना बंद होगा या कम होगा। पर अब फिक्स हो कर नहीं बैठेंगे। पूरा भारत दबा के घूमना है। काम जब अपना ऑनलाइन है तो शरीर के मोबाइल रहने में कोई प्रॉब्लम नहीं। और, कई दफे शरीर की सचेत या निष्प्रयोज्य मोबिलिटी आत्मा चेतना को झकझोरने जगाने का काम करता है। कुल मिला कर अज्ञात नए के लिए के लिए तन मन से प्रस्तुत हूँ।

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Yashwant Singh : आज रात दिल्ली पहुँच जाऊँगा। हफ्ते भर तक का दिल्ली प्रवास रहेगा। भड़ास का दरियागंज ऑफिस बंद करना पड़ रहा है। 10 अक्टूबर आखिरी दिन होगा। पहली वजह आर्थिक संकट। दूसरी वजह दिल्ली से ऊब। तीसरी वजह किसी खूंटे से न बंध कर रहने की इच्छा। चौथी और आखिरी वजह भारत भ्रमण की परियोजना। सो हे मित्रों बाबा भड़ासानंद के दिल्ली में दर्शन मिलन का पुण्य लाभ 10 अक्टूबर तक ले लो। और हाँ, 7 अक्टूबर को प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में एक प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन करवा रहा हूँ। एक योद्धा किस्म की महिला एक मीडिया हाउस की पोल खोलेगी। उस प्रेस कांफ्रेंस में आप सभी सोशल मीडिया के साथी आमंत्रित है, बतौर न्यू मीडिया एक्टिविस्ट। आपके खाने पीने का उचित प्रबंध रहेगा। 10 अक्टूबर के बाद भारत भ्रमण के लिए कोई आवारा बंजारा तैयार हो तो बताए।

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सन्डे को दरियागंज के फुटपाथ से एक बुक (स्वामी ब्रह्मदेव : क्वेश्चन एंड एनस्वर्स) खरीद कर टुकड़े टुकड़े में कई दिनों से पढ़ रहा हूँ। किताब पर 30 रुपये खर्चा हुआ। आनंद लाखों का मिल रहा है। कई पन्ने अदभुत हैं। जैसे एक ये अंश: There is a force of patience. Do you know where patience lives? Have you ever tried to see patience? Patience live in silence, and it is a secret, one of the biggest secrets of Nature. When we say life, do we know what the process of life is? Where does life come from? Life comes from silence; Life comes from patience. Silence and patience. There is no place on earth where there is no life. Sometimes try to see Nature, all of her, all the trees, all the forests, everything is full of life. Go close to a tree and look, try to see the life, to feel how life is growing in silence, with a lot of patience and with a lot of silence. All Nature is growing and what happens? That you forget about it, you lose contact with your patience and with your silence and you stop growing. They are connected, that is why you must try to establish your connection with patience and with silence. If there is not a total sincerity, your foundations will be very weak. Grow your willpower and your patience. The foundations of our life must be based on patience. We must see how much of it we have. To receive the Divine we need mountains of patience and, sometimes, at the last moment, when things are going to come, we lose patience. The power of patience is the one that has the highest speed of progress, it increases your speed of evolution. To have patience is to put time on your side.

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सुप्रभात मित्रों. आज भड़ास पर नेता से लेकर पत्रकारों तक के रिश्वत मांगते हुए कई टेप अपलोड किए गए हैं. यूपी में जी मीडिया तो राजस्थान में समाचार प्लस के संवाददाताओं के टेप हैं. वहीं भाजपा जिलाध्यक्ष टिकट देने के लिए दो लाख रुपये मांग रहा है, उसका भी टेप है. प्रिंट मीडिया के पत्रकार किस तरह घपलों-घोटालों में शामिल हैं और इसे ढंकने के लिए तत्पर रहते हैं, इससे संबंधित तीन टेप हैं. कुल मिलाकर आज भड़ास पर टेप डे है. सारे टेप एक एक कर सुनें और आज के दिन व आने वाले दिनों के मंगलमय होने की कामना करें. लिंक ये हैं: (1) http://goo.gl/Yhofn1 (2) http://goo.gl/Lva4WH (3) http://goo.gl/PKIOPa

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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यशवंत सिंह की अगुवाई में भड़ास लड़ रहा मजीठिया की लड़ाई

मीडिया में सिर्फ एक फीसद मस्त-मस्त संप्रदाय सारस्वत है और बाकी लोग अस्पृश्य बंधुआ मजदूर …; बहरहाल मोदियापे में मशगूल मीडिया कर्मियों से हमारा सवाल है कि लंबे तेरह साल के इंतजार के बाद माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो मजीठिया अपनी देखरेख में लागू करने का फैसला किया है, उसमें समानता और न्याय कितना है, क्या वेतनमान मिला, ठेके पर जो हैं, उनको क्या मिला, ग्रेडिंग और कैटेगरी में कितनी ईमानदारी बरती गयी और दो-दो प्रमोशनों के बाद उनकी हैसियत क्या है, पहले इस पर गौर करें तो आम जनता पर क्या कहर बरप रहा है, उसका तनिक अंदाज आपको हो जाये। ‘भड़ास4मीडिया’ जैसे मंचों से उनकी बात सिलसिलवार सामने आ रही है और हमें इसके लिए यशवंत सिंह का आभार मानना चाहिए। लेकिन सिर्फ पत्रकार उत्पीड़ित नहीं हैं, जिनके लिए वे आवाज बुलंद कर रहे हैं। हम मीडिया उनके हवाले छोड़ आम जनता के मसले उठा रहे हैं।

बहरहाल, यशवंत सिंह की अगुवाई में भड़ास4मीडिया पर मजीठिया सिफारिशों से न्याय दिलाने के लिए सिलसिलेवार आंदोलन चल रहा है और मीडियाकर्मियों का जबर्दस्त समर्थन है लेकिन सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में कितना मजीठिया लागू हो पाया अब तक और सितारा अखबारों में पत्रकारिता का जोश का अंजाम क्या है, इसे मीडिया कर्मी की जांच लें और समझ लें कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश हाथी के दांत कैसे-कैसे हैं।

कम-से-कम एक आदेश तो लागू हो गयो रे कि मोदियापा का देश हुई गयो हमार देश। मोदी का चेहरा चमके भी,  दमके भी और गायब हुआ रे देश यह फिसड्डी।

किस्सा कुछ यूं है कि बंगाल में सबसे बड़े मीडिया ग्रुप में बंगाल के सारे साहित्यकार कलाकार संस्कृतिकर्मी बंधुआ हैं, के उन्हें उनकी औकात बनाने में, ग्रुम करने में और फिर बाजार का आइकन बनाकर बेचना ही इस ग्रुप का कारोबार है। वह केसरिया हुआ है।

हिंदी वालों को इस ग्रुप का एक उत्पाद बता रहे हैं, सो वो हैं तसलीमा नसरीन। बाजार ने जिनका जीवन नर्क बनाया हुआ है और इस ग्रुप की ओर से हांका लगाकर मछलियों के गले में हुक फंसाने का काम किया करते थे भारतीय साहित्य और संस्कृति को महानगरीय साफ्ट कोक में तब्दील करके जनपदों को हाशिये पर डालकर मुक्त बाजार की जमीन पकाने वाले महामहिम सारे। उनका नाम भी सार्वजनीन हैं।

इस ग्रुप में बाजार में बेचने से पहले सबको छापते रहने का रिवाज है और झूठ को कला के उत्कर्ष में बदलने की दक्षता की ट्रेनिंग यहीं दी जाती है।

इस गुरुकुल से प्रशिक्षित तमामो हिंदी अंग्रेजी राजनेता भी अब बिलियनर राजनेता खेल खिलाड़ी पिलाड़ी हुआ करे हैं।

यह तरीका भारतीय भाषाओं में मराठी से लेकर ओड़िया और असमिया में भी है जो मूल मीडिया मोड अंग्रेजी का है और सांस्कृतिक वर्चस्व का यह चामत्कारिक कलाकौशल है। जहां बाकी जनता तमाशबीन है और अहा, कि आनंद स्थाईभाव।

हिंदी में चूंकि रंगभेद जातिभेद और नस्ली भेदभाव स्थाई भाव है तो यहां चुन चुनकर मसीहा निर्माण होता है बहुतै सावधानी से कहीं वर्चस्व का आलम टूटे नहीं…..

लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार पलाश विश्वास के लेख का अंश ‘हस्तक्षेप’ से साभा

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भड़ास पर खबर आने के बाद सहारा वालों ने मेरी माता को भुगतान कर दिया

 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृहग्राम हरनौट में दिनकर प्रसाद सिंह की सत्तर वर्षीय मां सरोज सिंह के जमा अवधि पूरी कर चुके अमाउंट के 3,20,000 रुपए सहारा ने बिना उनकी अनुमति के अन्य स्कीम में हड़प कर लिया था। दिनकर प्रसाद सिंह ने बताया कि भड़ास4मीडिया पर यह खबर प्रसारित होने के बाद सहारा प्रबंधन ने पूरे रुपए का भुगतान सरोज सिंह को कर दिया है। 

 

भड़ास4मीडिया के संस्थापक संपादक यशवंत सिंह को आज प्रेषित पत्र में दिनकर प्रसाद सिंह ने लिखा है- 

Sir, Thanks a lot for co operation regarding my mother maturity Rs 320000 from SAHARA. Today 20 cheques of Rs 16000/- credit to my mother account at SBI Sipara Patna branch. 6 months interest not paid by SAHARA.But my parents are glad to get principal amount. Again very very thanks!!! 

– Dinkar Prasad Singh

इससे पूर्व दिनकर सिंह ने भड़ास4मीडिया को ये पत्र लिखा था – 

My mother Saroj Singh 70 years old is illeterate. Her SAHARA a/c control no- 20719201775, date 15-12-2003 maturity amount Rs 320000/-. Without her permission by keeping her in dark maturity amoung fixed in other scheme Receipt no-034005534023-43, Date 19-09-2014, Amount Rs 320000/-. This is the case of Bihar CM village Harnauth branch code (2071). branch Manager Mr Vijay Singh-09939205612, 09471004666.

Regarding this when I contact Mr Rajesh Singh Media Head TV, Noida on his Mobile no 09811170008 on 05-04-2015 at 9 am with my wife and friend he says “SAHARA main humse puch kar paisa jama karaye the, Main kuch nahi kar sakta. Main para banking main nahi hoon. paise lene ke liye sidhe tareke se baat karoo” After that his mobile switch off.

Yashwant g please help so that I may get back hard earned money without interest.

Regard,

Saroj Singh

Mother of Dinkar Prasad Singh

09891136359

dinkarprasadsingh@gmail.com

भड़ास4मीडिया पर पूर्व में प्रकाशित समाचार : सहारा वालों ने बिहार के सीएम के गांव की बूढ़ी लाचार महिला का सवा तीन लाख रुपये हड़पा

https://bhadas4media.com/article-comment/4631-sahara-ki-thagi

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भ्रष्टाचार में डूबे हैं देश के बड़े मीडिया घराने, अब भरोसा सिर्फ सोशल मीडिया पर : यशवंत सिंह

मथुरा (उ.प्र.) के चन्द्रलेखा कैम्पस में 31 मई को आईएमए के पत्रकार सम्मान समारोह को संबोधित करते भड़ास4मीडिया के संस्थापक संपादक यशवंत सिंह  

मथुरा (उ.प्र.) : पत्रकारिता दिवस पर एक सम्मान समारोह को मुख्यवक्ता के रूप में सम्बोधित करते हुए भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि इस बड़े मीडिया घराने पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। मजीठिया आयोग की शिफारिशों को आज तक इन मीडिया घरानों ने लागू नहीं किया है। सत्ता एवं भ्रष्ट तंत्र के साथ जोड़तोड़ बनाकर मीडिया कर्मियों को उनके श्रम का न्याय संगत एवं वेज बोर्ड से निर्धारित वेतनमान नहीं दिया जा रहा है। इसीलिए अब सोशल मीडिया पर ही लोगों का भरोसा बढ़ रहा है। ऐसे हालात में एक सच्चाई ये है कि सोशल मीडिया ने अब परम्परागत मीडिया को पीछे छोड़ दिया है। 

 

चन्द्रलेखा कैम्पस में दीप प्रज्ज्वलन कर पत्रकार सम्मान समारोह एवं विचारगोष्ठी के शुभारंभ की झलक।

गत दिवस 31 मई को पत्रकारों के मान-सम्मान एवं स्वाभिमान को समर्पित संस्था इंटेलीजेन्स मीडिया एसोसिएशन (आईएमए) ने सम्मान समारोह एवं विचार गोष्ठी ‘‘सामाजिक विकास में पत्रकारों की भूमिका’’ का आयोजन चन्द्रलेखा कैम्पस निकट एटीवी, एनएच 2 पर किया था, जिसमें बड़ी संख्या में जनपद के पत्रकार उपस्थित हुए।

विचार गोष्ठी को संबोधित करते हुए यशवंत सिंह ने कहा कि आज मीडिया में नीचे से भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि इसका आधार ऊपर से है। बड़े मीडिया घराने घिनौने तरीके से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। मजीठिया आयोग की शिफारिशों को आज तक इन मीडिया घरानों ने लागू नहीं किया है। इससे मीडिया में काम करने वाले कर्मचारियों को उचित वेतनमान नहीं मिल पा रहा है। सच्चाई की पत्रकारिता की राह में कठिनाइयां अधिक हैं। फिर भी हमें समाज के प्रति अपने दायित्व को समझते हुये कार्य करना होगा। 

उन्होंने कहा कि समाज विरोधी हालात से निपटने तथा आम आदमी की परेशानियों को दूर करने के लिए उस तक हमे पहुंचना होगा। आज पत्रकारिता का दायरा बड़ा हो गया है। हर घर, हर मौबाइल से पत्रकारिता हो रही है। आसपास कुछ गलत होते देख अब युवा भी उसे तुरन्त लोगों तक पहुंचाने लगे हैं। सोशल मीडिया ने अब परम्परागत मीडिया को पीछे छोड़ दिया है। अब अधिकारी भी सोशल मीडिया पर आ रही खबरों से घबराने लगे हैं। इसका दायरा और बढ़ना चाहिए। 

विशिष्ठ वक्ता दिल्ली ईसान टाइम्स ग्रुप के सम्पादक संजय राय ने कहा कि पत्रकारों के सामने अनेक मजबूरियां हैं। उनको दूर की आवश्यकता है। पत्रकारों के हितों की रक्षा की जानी चाहिए। सरकारों और पत्रकारों को मिलकर इसके लिये योजना बना कर कार्य किये जाने की आवश्यकता है। जसवंत नगर के वरिष्ठ पत्रकार वेदव्रत गुप्ता ने कहा पत्रकार समाज का आईना है। वह समाज के के लिए प्रतिबद्ध होता है, लेकिन उसके लेखन को अखबारों के मालिक दबा देते हैं। इससे पत्रकार हतोत्साहित होता है तथा समाज में यह सन्देश जाता है कि समाज के प्रति उसकी उदासीनता है। पत्रकारों के वेतनमानों में विसंगतियां हैं। अखबारों के मालिक पत्रकारों का शोषण कर रहे हैं। उनके खिलाफ मोर्चा खड़ा करने की जरूरत है। 

रामनगर से पत्रकार मंशा राय ने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि संगठन को मजबूत करने की दिशा में और अधिक कार्य करने की आवश्यकता है। पत्रकार के.के. वर्मा ने कहा कि पत्रकारों को अपने ज्ञान को बढ़ाना चाहिए तथा अधिक से अधिक अध्ययन करना चाहिए। चंदौसी के पत्रकार विनय समीर ने कहा कि पत्रकारों की आर्थिक स्थिति हमेशा से खराब है। इसी कारण वह अपने बच्चों की परवरिश ठीक से नहीं कर पाता है। जो पत्रकार बीमार होते हैं, अच्छा इलाज भी नहीं करा पाते हैं। इसके लिये सरकार की ओर से पत्रकारों को अच्छी स्वास्थ्य सेवायें मिलनी चाहिये। सिंगापुर प्रवासी विनय राय ने कहा कि पत्रकारों को किसी भी क्राइम को ज्यादा बढ़ा चढ़ा कर नहीं छापना चाहिए बल्कि अच्छे कार्यों को बढ़ावा देना चाहिए। कार्यक्रम में और भी कई वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किये। 

आईएमए की राष्ट्रीय अध्यक्ष मन्जू वार्ष्णेय, अध्यक्ष नियन्त्रण समिति विनय समीर, प्रदेश अध्यक्ष अनूप गुप्ता, दैनिक कल्पतरू एक्सप्रेस आगरा से राजीव दधीच, दैनिक कल्पतरू एक्सप्रेस आगरा से भानुप्रताप सिंह, सम्पादक दैनिक अग्रभारत आगरा से धर्मेंन्द्र सिंह, जसवीर मलिक, सन्तोष गंगवार, डा. इन्द्रा राय विशेष आमन्त्रित सदस्य के रूप में उपस्थित थे। 

इस अवसर पर ग्यारह पत्रकारों का सम्मान किया गया। ग्वालियर से राजेश चतुर्वेदी को संस्कृत में समाचार पत्र निकालने पर, कृषि समस्याओं लेख आदि के प्रकाशन पर दिलीप यादव को, अलवर के पत्रकार स्व. मुरारी लाल अग्रवाल को सम्मानित किया गया। उनके सम्मान को उनके भतीजे डा. धनेश अग्रवाल को दिया गया। बल्देव के स्व.गोविन्द बल्लभ पाठक का सम्मान उनके पुत्र राजेश पाठक ने ग्रहण किया। 

विचार गोष्ठी में जनपद के पत्रकार मोहन स्वरूप भाटिया, डा. अशोक बंसल, एडवोकेट प्रदीप राजपूत, आईएमए के संस्थापक नरेन्द्र एम. चतुर्वेदी, डा. सी.के. उपमन्यु, सुनील शर्मा, विवेकदत्त मथुरिया, अमरेन्द्र गुप्ता एपीएन न्यूज दिल्ली, डा. धनेश अग्रवाल, मफत लाल अग्रवाल, गोपाल शर्मा, विनोद अग्रवाल, पं. ओमप्रकाश शर्मा, राजेश कुमार पाठक, कुन्ज बिहारी शर्मा, जितेन्द्र भारद्वाज, राजेश कुमार बब्बू, मिथलेश कुमार, रशिक बल्लभ, सुबीर सेन, चन्द्र प्रकाश पान्डेय, कुशल प्रताप सिंह, मोहनवीर सिंह, शशिकान्त, विपिन कुमार आदि उपस्थित थे। आयोजन के स्वागताध्यक्ष संयुक्त जाट आरक्षण संघर्ष समिति राष्ट्रीय अध्यक्ष एच.पी.सिंह परिहार थे तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता अखिल बख्शी ने की। सभी वक्ताओं का स्वागत आईएमए के जिलाध्यक्ष चौ. दलवीर सिंह विद्रोही ने और संचालन दीपक गोस्वामी ने किया।

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भड़ास को कूरियर से पांच हजार रुपये रिश्वत भेजने वाले ने दिमाग तो खूब लगाया लेकिन थोड़ी-सी कमी कर दी

Editor

BHADAS4MEDIA.COM

माननीय महोदय

सब जानते है साम, दाम अथवा दण्ड से भड़ास पर दबाव बना नहीं सकते. माफिया ने भेद का अक्लमंदी से उपयोग किया. आप के आत्मसम्मान को गहरी ठेस पहुंचाने का उनका उददेश्य हुआ पूरा. कमी हमारी लाल इमली टीम में है. कुछ लोग प्रतिज्ञा के साथ जुड़े थे. हमारी टीम के जयचंद चंद टुकड़ों के लिए प्रयास आरंभ होते ही कुठाराघात कर देते है. हम क्या सोचते हैं, किस तरफ काम कर रहे हैं,  वो BIC Management तक बिजली की गति से परोसा जाता रहा है. जो उद्योगपति 12 साल तक इस घोटाले को थामे हुए हैं, वह हम लोगों से सौ गुना तेज हैं. यह बात कई बार साबित हो चुकी है. लाल इमली के हम लोग इस लायक नहीं कि एकजुट हो कर इस संघर्ष को आगे ले जा सके.

5000/- के कथिक प्रेषक श्री ओम प्रकाश 16/30 सिविल लाइन्स कभी BIC / लाल इमली में कार्यरत नहीं थे वह डा शक्ति भार्गव के मामा है. डा शक्ति भार्गव इस घोटाले को उच्च न्यायालय में मजबूती से उजागर कर रहे हैं. श्री ओम प्रकाश 65-70 वर्ष के हैं. याददास्त जा चुकी है. साल भर से पलंग पर है. मल मूत्र आने पर बता नहीं पाते. वह और उनकी पत्नी ही कानपुर में रहते हैं. पुत्र जयपुर में. जिसने भी आपको रुपये भेजे उसने यह तो पता कर लिया कि डॉ भार्गव के कौन कौन रिश्तेदार व निकट सहयोगी हैं परन्तु अगर वह श्री ओम प्रकाश को कथिक प्रेषक बनाने से पहले यह भी पता कर लेते कि उनकी शारीरिक व मानसिक स्थिति क्या है तो उनसे यह चूक नहीं होती और वह किसी अन्य को प्रेषक बनाते.

आपका बहुमूल्य सहयोग हमें मिला उसके लिया बहुत धन्यवाद. खेल ऐसा खेला कि हम Main Objective जो घोटाला उजागर करना था से भटक कर जासूसी के खेल में लग गए. वाकई दिमाग पाया है गुप्ता जी ने – ऐसे ही नहीं खरबपति बन गए. फरियादी हो गया मुल्ज़िम. असली मुल्ज़िम धुए के गुब्बार में खो जायेगा. भेदी तो हमारे घर का ही था. दंड भी हम सबको मिलना चाहिए.

साक्ष्य व दस्तावेज में कमी न निकाल पाये तो माफिया लोगों ने खबर को जड़ से ही संदिग्ध बना दिया. इस स्कैम को उजागर करने वाले दस्तावेज अब इतने ज्यादा हो गए हैं कि उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए टेम्पो की आवश्यकता होगी. हर कागज़ ये साबित कर रहा है कि बहुत बड़ा खेल हुआ परन्तु 12 साल में किसी ने साहस नहीं जुटाया की वो इस पर कार्यवाही कर सके। मोदी सरकार से पारदर्शिता की उम्मीद थी वह कब की धूमिल हो गयी.

आपके प्रयास के लिए धन्यवाद

सदा आभारी रहेंगे

Aditya Narain
anbajpai7@gmail.com


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खबर छापने पर bhadas4media को मिले पांच हजार के नोट!

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कानपुर ‘लाल इमली महाघोटाले’ पर हाईकोर्ट के रुख से वस्त्र मंत्रालय हिला

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खबर छापने पर bhadas4media को मिले पांच हजार के नोट !

ये तो बड़ी अजीब सी बात, कि हम आप के लिए खबर लिखें और उसके बदले लिफाफे में पांच हजार रुपए डाल कर हमे उसे कोरियर से भेजें। कुछ ऐसा ही वाकया गुजरा आज भड़ास4मीडिया के साथ। ये चौंकाने वाला घटनाक्रम है, 18 मई, 2015 को भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित ‘कानपुर ‘लाल इमली महाघोटाले’ पर हाईकोर्ट के रुख से वस्त्र मंत्रालय हिला’ शीर्षक समाचार के संबंध में।

गौरतलब है कि वस्त्र मंत्रालय (भारत सरकार) के अधीन बीआईसी कानपुर (उ.प्र.) के पुनरुद्धार में हुए लगभग हजार करोड़ के भूखंडीय महाघोटाले ने लाल इमली के लगभग ढाई हजार अधिकारियों, कर्मचारियों की रोजी रोटी सांसत में डाल रखी है। हालात से उनकी कमर ही टूट गई है। बताते हैं कि हाईकोर्ट के फैसलों के बावजूद इतना बड़ा घोटाला आजतक कानपुर से दिल्ली तक सुर्खियों में न आ पाने की खास वजह है, पर्दे के पीछे इस खेल में एक बड़े मीडिया घराने का मुख्य रूप से संलिप्त होना। इसी मामले पर हाल में ही 8 मई 2015 को पीएमओ में संयुक्त सचिव स्तरीय बैठक भी हुई थी। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी विचाराधीन है। 

भड़ास4मीडिया ने प्राप्त पर्याप्त दस्तावेजों के संज्ञान सहित सविस्तार गत 18 मई को प्रकाशित किया। अब आगे का हाल जानिए। खबर प्रकाशित होने के आज पांचवें दिन भड़ास4मीडिया को कोरियर से एक लिफाफा प्राप्त हुआ। लिफाफे में प्रकाशित खबर के प्रिंट, वर्ष 2014 में सिविल लाइन कानपुर निवासी शक्तिभार्गव के नाम इसी मामले में प्रेषित पीएमओ का एक पत्र, और उसी लिफाफे के अंदर रखे छोटे लिफाफे में 5000 हजार रुपए के नोट मिले। ऐसा क्यों किया गया, समझ से परे नहीं। पत्रकारों को उपकृत करने का जो बेईमान चलन मीडिया घरानों और भ्रष्ट तंत्र ने चला रखा है, ये उसी का एक छोटा सा नमूना लगता है… कि ‘तुम खबर छापो, हम तुम्हे नोट देंगे।’

ये करतूत चाहे जिसकी हो, प्राप्त कोरियर लिफाफे पर ‘ओम प्रकाश, डिप्टी मैनेजर बीआईसी, 16/30, सिविल लाइन्स, खलासी लाइन, कानपुर’ का पता दर्ज है। भड़ास4मीडिया के पास वे पांच हजार रुपए रखे हुए हैं। ये सूचना जानने के एक माह के अंदर नाजायज पैसे भेजने वाले महोदय अपने ये पांच हजार रुपए भड़ास4मीडिया कार्यालय दिल्ली से प्राप्त कर लें। अन्यथा ये रकम किसी जरूरतमंद को दे दी जाएगी। साथ ही, उन्हें ये सबक लेना है कि हर पत्रकार बिकाऊ नहीं। उनकी आदत खराब है तो उसे सुधार लें वरना ऐसी करतूतों पर उन्हें कभी लेनी की देनी पड़ जाएगी। खैर मनाएं कि हम ये मामला पुलिस तक नहीं ले जा रहे हैं। उनकी करतूत तो इसी तरह की है। खबर और कोरियर से संबंधित सारे साक्ष्य भड़ास4मीडिया ने अपने पास सुरक्षित रख लिए हैं। 

..और ये है 18 मई 2015 को भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित उस समाचार का लिंक – 

कानपुर लाल इमली महाघोटाले पर हाईकोर्ट के रुख से हिला वस्त्र मंत्रालय

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टेक्नोलॉजी क्रांति के दौर में आज इंटरनेट मीडिया कमाई का बड़ा अवसर : यशवंत सिंह

गोरखपुर : गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब व लेंस मैन के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को प्रेस क्लब सभागार में भड़ास4मीडिया के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह ने ’वेब मीडिया कंटेंट मानेटाइजेशन वर्कशाप’ में यूट्यूब चैनल, न्यूज पोर्टल, ब्लाग, फेसबुक, के जरिए पैसे कमाने के तरीके बताए। 

शुक्रवार को गोरखपुर प्रेस क्लब सभागार में वर्कशॉप के बाद भड़ास4मीडिया के संस्थापक संपादक यशवंत सिंह (बीच में) के साथ सहभागी मीडिया कर्मी

उन्होंने बताया कि इंटनेट मीडिया प्रभावी माध्यम बन गया है। इंटरनेट में स्पेस है। मगर हमारे पास मेधा व स्किल होन के बावजूद हम उस रास्ते से अनजान है। आज के दौर में विचारधारा नहीं टेक्नोलॉजी क्रांति लाएगी। आज जब हम इंटरनेट पर लिखते है तो वह ग्लोबल हो जाता हैं। हमें पता ही नहीं चलता। गूगल पत्रकारों के लेख, फोटो, वीडियों के जरिए खूब कमायी कर रहा है और हमे कमायी करने का मौका भी दे रहा है। इंटरनेट पूरी दुनिया पढ़ती है। मुख्यधारा मीडिया में बढ़ते व्यवसायिक हस्तक्षेप के मद्देनजर एक विकल्प के रूप में इंटरनेट मीडिया बेहद प्रभावशाली है। अपनी बात निष्पक्षता से रखने के लिए इंटरनेट मीडिया सशक्त माध्यम बनकर उभरा है।

उन्होंने इंटरनेट मीडिया के बढ़ते हुए प्रभाव की चर्चा करते हुए कहा कि आज विज्ञापनदाता कम्पनियां भी इलैक्ट्रानिक चैनल और समाचार पत्रों की तुलना में इंटरनेट मीडिया को प्रचार का ज्यादा सशक्त माध्यम मानने लगे है क्योंकि यह निर्धारित उपभोक्ता तक पहुंचने का सीधा माध्यम है। इसमें हर वह व्यक्ति प्रकाशक हैं जो वीडियो, लेख या फोटो यूट्यूब, ब्लाग पर डालता है। 

उन्होंने निशा मधुलिका का उदहारण दिया। जो यूट्यूब चैनल के माध्यम से शाकाहारी व्यंजनों की पाक विधि से लोगों तक पहुंचाती है। उनके इस चैनल की दर्शक संख्या लाखांे में है। गूगल द्वारा उन्हें हर माह अच्छी आय प्राप्त होती है। हिन्दी पट्टी में उनका कोई प्रतिद्वंदी भी नहीं है। उन्होंने संजय चैहान  ब्लागर का भी उदाहरण दिया।

उन्होंने कहा कि हर जिले में पत्रकार से लेकर पढ़े-लिखे वयक्ति तक अपने अपने न्यूज पोर्टल, ब्लाग, फेसबुक, यूट्यूब चैनल आदि पर सक्रिय हैं और खुद द्वारा क्रिएट जनरेट कंटेंट अपलोड कर रहे हैं। फिलहाल ज्यादातर लोग यह काम शौकिया करते हैं. लेकिन अब इस दौर में जब गूगल जैसा बड़ा ग्रुप हिंदी में कंटेंट रचने वालों को, वीडियो डालने वालों को जमकर डालर दे रहा है, गूगल एडसेंस व कंटेंट मानेटाइजेशन के जरिए, हिंदी पट्टी के अधिकतर लोग अनजान हैं। 

वर्कशाप में उन्होंने बताया कि यूट्यूब चैनल पर एकाउंट खोलने के लिए एक ईमेल की आवश्यकता पड़ती है। जब एकाउंट बन जाएं तो स्क्रीन के दाहिनें तरफ ऊपर की तरफ एप्स का ऑप्शन होता है। वहां क्लिक करें। क्लिक करते ही पॉप अप मीनू खुलेगा। वहां यूट्यूब के आइकान पर क्लिक करें। स्क्रीन के दायीं तरफ अपलोड का आप्शन होगा। इस तरह आप अपना वीडियो अपलोड कर सकते है। इसके बाद मानेटाइजेशन करना होगा। लोडिंग के बाद गूगल एकाउंट सत्यापित करेगा। इसी तरह आप लिखित सामग्री व फोटो डालनी होगी। इसके लिए यूट्यूब की जगह ब्लागर पर क्लिक कर बाकी की प्रक्रिया को अंजाम दे सकते है। छह माह तक ब्लाग चलने के बाद ही पैसा कमाया जा सकता है। वहीं यूट्यूब में शुरू से ही पैसा कमाया जा सकता है। इस प्रक्रिया द्वारा अपने दम पर, अकेले के बल पर महीने में पांच से पचास हजार रुपये तक कमा सकते हैं।

इस दौरान लोगों के सवालात के जवाब देकर जिज्ञासाओं को शांत कराया गया।

इस मौके पर प्रेस क्लब अध्यक्ष अशोक चैधरी, महामंत्री पंकज श्रीवास्वत, पुस्तकालय मंत्री विनय कुमार शर्मा, संयुक्त मंत्री चन्दन निषाद, कोषाध्यक्ष हेमंत तिवारी, उपाध्यक्ष कुंदन उपाध्याय, मनोज कुमार सिंह, अर्जुमंद बानो, मनोज यादव, अब्दुल जदीद, मुर्तजा हुसैन रहमानी, सैयद फरहान अहमद, ओंकार धर द्विवेदी,, मारकण्डेय मणि त्रिपाठी, सुशील राय, सफी, सेराज, हरिकेश सिंह, फैयाज अहमद, अविनाश, महेश्वर मिश्र, राजीव राय, महेश्वर मिश्र, इब्राहीम सिद्दीकी, चेतना पाण्डेय, धनेस, महेश, संजय, सफीक, मुन्ना, शैलेन्द्र शुक्ला, राजेश, संगम दूबे, दीपक पाण्डेय, दीपक श्रीवास्तव, प्रदीप सहित तमाम लोग मौजूद रहे। 

श्री  सिंह ने बताया कि जब भड़ास ब्लाग हम लोगों ने शुरू किया था तो 2007 में गूगल के मानेटाइजेशन प्रोग्राम को एडाप्ट कर गूगल एडसेंस के विज्ञापन कोड लगाने से पहली दफे पांच हजार रुपये का चेक अमेरिका से आया तो मुझे अजीब-सी खुशी हुई। तभी लगने लगा था कि यही काम आगे करते हुए कमाया जा सकता है। तब भड़ास ब्लाग गूगल के ही ब्लागस्पाट पर था। 

उन्होंने बताया कि बिना खुद की आर्थिक निर्भरता के ब्लाग, वेबसाइट, पत्रकारिता लंबे समय तक संभव नहीं है. इसलिए इन्हीं सब चीजों को ध्यान में रखते हुए वर्कशाप का आयोजन किया गया। आज हर जिले में दो चार वेबसाइट्स वहां के स्थानीय पत्रकारों द्वारा चलाई जा रही है. हर जिले में वीडियो जर्नलिस्ट और कैमरामैन हैं जो रोजाना वीडियो शूट करते हैं. ये लोग अगर गूगल मानेटाइजेशन के तौर-तरीके को समझ कर अपना लें तो हर महीने एक अच्छी रकम घर बैठे कमा सकते हैं। कुल मिलाकर यह वर्कशाप उन लोगों के लिए है जो सीखना चाहते हैं, अपनी आज की स्थिति से आगे बढ़ना चाहते हैं, अपने आनलाइन कामकाज को मानेटाइज करना चाहते हैं।  को नौकरी करने की जगह खुद का काम करने को प्रेरित करना भी है।

आज खोला जाएगा एकाउंट

गोरखपुर। वर्कशाप में भाग लेने वाले प्रशिक्षुओं का 16 मई को पूर्वाह्न 11.00 बजे कंटेंट मानेटाइजेशन एकाउंट खोला जाएगा।

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जुआ खेलकर रक़म जीतने का लालच देता ये विज्ञापन भड़ास को शोभा नहीं देता!

यशवंत सिंह जी

संपादक, भड़ास4मीडिया

भड़ास को हम सब पत्रकार बहुत गंभीरता से लेते हैं… पर एक ऐसा विज्ञापन देखा कि आपको पत्र लिखने को मजबूर हुआ.. लिखने को तो दस पेज भी लिख सकता हूँ.. मगर आप बुद्धिजीवी हैं… इसलिए पूरा यकीन है कि कम लिखे को ज़्यादा ही समझेंगे… इस मेल के साथ में एक तस्वीर अटैच की है, उसे देखिए… इसमें जो ऑफर है, वो किसी भी नज़रिये से स्वस्थ नहीं कहा जा सकता… जुआ खेलने का ऑफर देकर रक़म जीतने की उम्मीद या लालच देता ये विज्ञापन भड़ास को शोभा नहीं देता… आशा करता हूं कि आप इस पर ध्यान देंगे.

धन्यवाद.

आसिफ खान

Asif Khan

kasif.niaz@gmail.com

आसिफ भाई,

आपने बिलकुल सही प्वाइंट की ओर ध्यान दिलाया है.  हम भड़ास के लोग खुद भी दूसरे न्यूज पोर्टल्स के गंदे विज्ञापनों के खिलाफ छापते रहे हैं. ये जो विज्ञापन भड़ास पर चलते हैं, वह गूगल की तरफ से चलाए जाते हैं. गूगल बहुत ही सोच समझ कर विज्ञापन देता है. जब भी आप क्लिक करते हो तो गूगल नए किस्म का विज्ञापन दिखाता है. ज्यादातर विज्ञापन यूजर की पसंद या सर्च या रुझान के हिसाब से होते हैं. मान लीजिए आप अगर सर्वर तलाश रहे हों और इस बारे में गूगल या जीमेल पर सर्च कर रहे हों, मेल कर रहे हों, तो गूगल के पास फीडबैक पहुंच जाता है कि आप सर्वर की तलाश में है. आपको तब यह सर्वर के विज्ञापन ही दिखाएगा.

इसी तरह जो लोग सेक्स आदि ज्यादा सर्च करते हैं उन्हें गूगल सेक्स रिलेटेड विज्ञापन दिखाता है. मेरे कहने का आशय ये है कि आप को जो विज्ञापन दिखाया गया गूगल द्वारा, जरूरी नहीं कि वह दूसरों को भी दिखाया जा रहा हो. फिर भी, ये जुवे का विज्ञापन बिलकुल गलत है. इसके खिलाफ हम लोग गूगल को पत्र लिखकर अपनी आपत्ति जताएंगे और ऐसे विज्ञापन न दिखाने को लेकर अनुरोध करेंगे. आपके लेटर को हम भड़ास पर प्रकाशित कर रहे हैं ताकि भड़ास अपनी खुद की आलोचना को भी सुन और छाप सके, साथ ही इसके जरिए हम खुद को सुधार सकें.

आभार

यशवंत सिंह

एडिटर

भड़ास4मीडिया

 

 

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भास्कर, हिंदुस्तान, जागरण समेत कई अखबारों में भड़ास पर पाबंदी

खुद को अभिव्यक्ति की आजादी का नेता बताने वाले और इस हक के लिए लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले मीडिया समूह अब उन छोटे व नए मीडिया माध्यमों की आवाज अपने यहां दबाने में लगे हैं जो बड़े बड़े मीडिया हाउसों की पोल खोलते हैं. ताजी सूचना के मुताबिक दैनिक भास्कर और दैनिक हिंदुस्तान अखबार के दफ्तरों में भड़ास4मीडिया डॉट कॉम को ब्लाक कर दिया गया है. इन संस्थानों के प्रबंधकों ने ऐसा फैसला मालिकों के निर्देश के बाद लिया है. मालिकों ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर भड़ास4मीडिया द्वारा चलाए गए अभियान और आम मीडियाकर्मियों को उनका हक दिलाने से संबंधित मुहिम से नाराज होकर इस पोर्टल को अपने संस्थान के अंदर बंद कराने का आदेश दिया ताकि उनके यहां काम करने वाला कोई कर्मचारी इस पोर्टल को पढ़कर सुप्रीम कोर्ट न चला जाए.

 

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर भास्कर प्रबंधन किस तरह घबराहट में है, इसका ताजा उदाहरण ये है कि पूरे मध्य प्रदेश सहित देश भर के भास्कर के सेंटरों पर भडास4मीडिया की साइट ब्लाक कर दी गई है. यह साइट कर्मचारियों में जागरूकता फैलाने में अहम रोल अदा कर रही है. इस कारण कई कर्मचारियों ने हिम्मत दिखाई और अपने हक के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. इससे मालिकों की नींद हराम हो गई. अब प्रबंधन के पालतू सफेद हाथी कोर्ट गए कर्मचा‍रियों को तरह तरह से धमकाने में लगे हुए हैं. जो इस उम्‍मीद से चुप बैठे थे कि वे प्रबंधन के चहेते बन जाएंगे वे भी इन दिनों प्रताड़ना के दायरे में आ गए हैं. वैसे प्रताड़ना से डरने की जरूरत नहीं है क्‍योंकि इनका एक भी गलत कदम मालिकों को सुब्रत राय बना सकता है. अभी भी समय है. उठो जागो और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष पथ पर चल पड़ो. सफलता सौ फीसदी आपके कदम चूमेगी.

सुप्रीम कोर्ट में 10 मार्च को हुई सुनवाई के बाद हिन्दुस्तान अख़बार में भड़ास4मीडिया को बंद कर दिया गया है ताकि कोई मजीठिया से संबंधित खबर न जान सके. प्रबन्धन के इस फैसले पर हंसी आती है. मोबाइल के ज़माने में भी हिन्दुस्तान का प्रबंधन ऐसी हरकत करेगा, ये कोई सोच भी नहीँ सकता. धनबाद के एक पत्रकार ने बताया कि अब वहां के कर्मचारी मोबाइल पर ही भड़ास पढ़ रहे हैं.

ज्ञात हो कि राजस्थान पत्रिका से लेकर कई अन्य दूसरे अखबार व न्यूज चैनल अपने अपने यहां भड़ास4मीडिया पर समय-समय पर पाबंदी लगाते आए हैं. खबरों और मीडिया के इन ठेकेदारों को लगता है कि वे अपने संस्थान में पाबंदी लगाकर अपने मीडियाकर्मियों को मीडिया से संबंधित सूचनाओं जानकारियों अधिकारों को जानने से वंचित कर देंगे लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि अब जमाना स्मार्ट फोन का है. इससे पहले हजारों मीडियाकर्मियों ने सिर्फ भड़ास पढ़ने के लिए अपने बचत के पैसे से लैपटाप खरीदा और घर से भड़ास पढ़ कर भड़ास को इनपुट भेजना शुरू कर दिया.

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भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह का एक पुराना इंटरव्यू

मीडियासाथी डॉट कॉम नामक एक पोर्टल के कर्ताधर्ता महेन्द्र प्रताप सिंह ने 10 मार्च 2011 को भड़ास के संपादक यशवंत सिंह का एक इंटरव्यू अपने पोर्टल पर प्रकाशित किया था. अब यह पोर्टल पाकिस्तानी हैकरों द्वारा हैक किया जा चुका है. पोर्टल पर प्रकाशित इंटरव्यू को हू-ब-हू नीचे दिया जा रहा है ताकि यह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे और यशवंत के भले-बुरे विचारों से सभी अवगत-परिचित हो सकें.

यशवंत सिंह

 

कठघरे में ‘भड़ास4मीडिया’ के एडिटर यशवंत सिंह

साक्षात्कारकर्ता : महेन्द्र प्रताप सिंह

10.03.2011 11.30pm


(मीडिया साथी डॉट कॉम के कठघरे में इस बार हैं, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के एडिटर यशवंत सिंह। इस साक्षात्कार में हमने देशभर के मीडिया हाउसों की ख़बर लेने वाले यशवंत सिंह की ख़बर ली है और ‘मीडिया साथी डॉट कॉम’ के स्तर के अनुरूप बिना किसी लाग-लपेट के सीधी और खरी-खरी बातें की हैं। ‘भड़ास4मीडिया’ पर लगाए गए सभी आरोपों के जवाब में यशवंत ने जो कहा, उससे आप और हम असहमत हो सकते हैं, किन्तु इससे कम से कम ‘भड़ास4मीडिया’ से जुड़ी विचारधारा और यशवंत के पक्ष को तो समझा ही जा सकता है – महेन्द्र प्रताप सिंह)

-यशवंत जी, सीधे आरोपों से शुरुआत करते हैं। ‘भड़ास’ एक नकारात्मक शब्द है। क्या आपको नहीं लगता कि हमें विभिन्न मुद्दों पर सिर्फ़ अपनी भड़ास निकालने तक सीमित रहने के बजाय समस्या के समाधान के लिए कुछ सार्थक क़दम उठाने चाहिए?

–समाधान तो अंतिम चरण है। पर पहले तो हम लोग समस्या बताने वाले चरण से ही वंचित थे। कोई प्लेटफ़ॉर्म नहीं था, जो हम लोगों के सुखों-दुःखों को सामूहिक तौर पर व ईमानदारी से अभिव्यक्त करे। जब समस्या का प्रकटीकरण होता है, तभी समाधान की दिशा में क़दम बढ़ता है। और अब इसका असर दिख रहा है। पेड न्यूज़ से लेकर पत्रकारों को उत्पीड़ित करने तक में मीडिया प्रबंधन सतर्क हो गया है कि कहीं उनका भेद न खुल जाए।

-लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि ‘भड़ास’ पत्रकारों में बहुत लोकप्रिय वेबपोर्टल है और इस नाते केवल भड़ास निकालने के बजाय पत्रकारों की विचारधारा और रुचि में परिष्कार की भी आपकी नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है?

–बिल्कुल सही कही कहा आपने, ये कैसे हो सकता है, इस दिशा में आपके भी सुझाव जानना चाहूँगा।

-जी, इसी पर चर्चा करते हैं। बहुत से लोगों को लगता है कि ‘भड़ास’ लोकप्रिय अवश्य है, किन्तु गंभीर पत्रकारिता में इसका नाम सम्मानपूर्वक नहीं लिया जाता और इसे एक-दूसरे की छीछालेदर करने और गाली-गलौज वाली वेबसाइट माना जाता है।

–आज जिन्हें गंभीर माना जाता है, वे कितने छिछले निकले, ये आपको भी पता है। पत्रकारिता के वे बड़े नाम जो कभी गंभीरता के प्रतीक थे, राडिया कांड के बाद दलाली के प्रतीक के रूप में सामने आए। और जब भी, कुछ भी आप कभी नया करेंगे तो जमी-जमाई व्यवस्था शीघ्र आपको स्वीकार नहीं करेगी। वे आप पर तमाम तरह के आरोप व लांछन लगाएँगे। ग़नीमत है कि हम लोगों पर अभी इसी तरह के आरोप लग रहे हैं। पर आज उनसे पूछिए कि ‘भड़ास’ क्या है जो कभी ‘भड़ास’ के आलोचक हुआ करते थे, तो वे भी मानेंगे कि ‘भड़ास’ चाहे जैसा हो इसे इगनोर नहीं कर सकते।

-लोगों का मानना है कि ‘भड़ास’ पर कैसा भी, कुछ भी आसानी से छपवाया जा सकता है। जहाँ तक कि झूठे-सच्चे आरोप और गालियाँ तक आसानी से जगह पा जाती हैं। इस पर आपकी क्या राय है?

–इसमें क्या दिक़्क़त है। कोई तो ऐसा खुला मंच हो। वैसे हम तो काफ़ी छानबीन करके छापते हैं। पर सोचिए गूगल के ब्लॉगों, बज़ व अन्य तमाम वेबसाइटों पर तो तमाम कुछ छपता रहता है। लेकिन लोग वहाँ नोटिस नहीं लेते, क्योंकि उनको लगता है कि गूगल को भला कैसे रोका जा सकता है। पर ‘भड़ास’ को लेकर आप उँगली उठा देते हैं, क्योंकि ‘भड़ास’ को भारत का एक बंदा चला रहा है और वह आपको फ़ोन-मोबाइल पर तत्काल उपलब्ध है, इसलिए उसे आप हड़का लोगे, मुक़दमा कर दोगे। पर आने वाले दौर में, यह जो मनुष्य व मीडिया के जनवादीकरण का दौर शुरू हुआ है, बहुत तेज़ होगा। सबका स्याह-सफ़ेद बाहर आना चाहिए और सब कुछ बेहद ट्रांसपेरेंट होना चाहिए।

-‘भड़ास’ पर न तो भाषा की शुद्धता का ख़याल रखा जाता है और न ही शालीनता का। भाषा पत्रकारिता का एक आधार स्तंभ है। ऐसे में आपको नहीं लगता ‘भड़ास’ पत्रकारों के भाषाई संस्कारों को परिमार्जित करने के स्थान पर उन्हें दूषित कर रहा है?

–पाखंडी क़िस्म की शालीनता से परहेज़ है हम लोगों को। ऐसे पाखंडी क़िस्म के शालीनों ने ही चुपके-चुपके सिस्टम करप्ट कर दिया है। थोड़ा बदज़ुबान ईमानदार चलेगा। और ‘भड़ास’ गुस्से व विरोध का प्लेटफ़ॉर्म है तो कई बार बात कहने में उग्रता, अशालीनता दिख सकती है, पर यह उससे तो अच्छा है, जो टीवी और अख़बारों में दिखाया-छापा जा रहा है। लिंगवर्धक यंत्र, बिग बॉस, सेक्सी सीरियल्स आदि-आदि।

-‘भड़ास’ पर गाली-गलौज और अभद्र भाषा का प्रयोग आम है। लेखों और टिप्पणियों में आपको ये खूब मिल जाएँगी। आपको नहीं लगता कि यह ग़लत है? जहाँ हमें सभी जगह गालियों का विरोध करना चाहिए, हम ख़ुद गालियाँ प्रकाशित कर रहे हैं।

–मजबूर और भूखा आदमी गाली नहीं देगा तो क्या भजन गाएगा। भरे पेट वाले सुरुचि और शालीनता की ज़्यादा बातें करते हैं पर जिनके पेट खाली हैं, सिर पर सिपाहियों के डंडे हैं, वे कैसे शांत रह सकते हैं। मीडिया में एक बड़ा हिस्सा शोषित व उत्पीड़ित है। ये जब अपनी पीड़ा लिखते-बाँटते-बताते हैं तो कई बार उग्र हो जाते हैं।

-कंटेंट को लेकर भी ‘भड़ास’ तथ्यपरक नहीं होता और कई अप्रामाणिक और अपुष्ट समाचार यहाँ डाल दिए जाते हैं। जिन्हें बाद में लोग ग़लत ठहराते नज़र आते हैं। (जैसे पत्रकारों द्वारा भेजे पत्रों के आधार पर ख़बरें डाल दी जाती हैं और उनका नाम आदि भी नहीं दिखाया जाता।)

–पत्र प्रकाशित करना एक पक्ष होता है और उस पर आई टिप्पणियाँ दूसरा पक्ष। हम उन पत्रों को ही प्रकाशित करते हैं, जिन्हें हम लोग भी मानते हैं कि सही हैं। अगर कोई तथ्य ग़लत हो तो उसको लेकर आए स्पष्टीकरण को ससम्मान प्रकाशित करते हैं। बाक़ी जब आप काम करेंगे तो ग़लतियाँ तो होंगी ही। ग़लती वही नहीं करता, जो काम नहीं करता।

-आरोप यह भी है कि ‘भड़ास’ पत्रकारों में चटपटी बातों, झूठे-सच्चे गॉशिप और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने को बढ़ावा दे रहा है।

–कोशिश करते हैं कि ऐसा न हो। लेकिन अगर मीडिया में गॉशिप है, घटनाएँ हैं, सरगर्मियाँ हैं तो वे प्रकाशित होंगी ही। न्यू मीडिया के लिए मीडिया के मायने काफ़ी बदल गए हैं। हम लोग गॉसिप व चर्चाओं को भी ख़बर मानते हैं। बदलते दौर में चीज़ें बदल जाती हैं।

-‘भड़ास’ पर एक कॉलम है ‘कानाफूसी’। उस पर कभी-कभी बहुत ही संवेदनशील ख़बरें बिना किसी प्रमाण और पुष्टि के डाल दी जाती हैं। जैसे, 15 फ़रवरी 2011 को ‘हिन्दुस्तान के भदोही, सोनभद्र, मिर्ज़ापुर ऑफ़िस पर भी लगेगा ताला’ और ‘राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर के संपादक और ब्यूरो चीफ़ आपस में भिड़े’ आदि। बाद में टिप्पणियों में ही लोग इन्हें ग़लत साबित करते हैं।

–हिन्दुस्तान के कई ऑफ़िसों में ताले लगे हैं और कई जगह लगने बाक़ी हैं। होता क्या है कि कई बार ख़बरें छपने के बाद मीडिया हाउस कुछ निर्णयों का एक्ज़ीक्यूशन रोक देते है या टाल देते हैं ताकि साइड इफ़ेक्ट कम से कम हो। दूसरे, अगर चर्चा है तो छाप दिया, वो ग़लत है या नहीं, लोग बता रहे हैं कमेंट में तो स्पष्ट हो गया कि पूरी तस्वीर क्या है। यहाँ आपको बता दूँ कि हम लोग न तो कोई मीडिया हैं, और न कोई अनुदान लाभ प्राप्त मीडिया हाउस। हमें आप मीडिया सेंट्रिक एक इनफ़ॉरमेशन सेंटर कह सकते हैं। इसलिए तथ्यों को सत्यापित करने का काम हमारे पाठकों का भी होता है, क्योंकि हमारे पास कोई लंबा-चौड़ा बजट व टीम नहीं है, जो हर स्टोरी पर पूरी गहराई से काम कर सके।

-‘भड़ास’ वैसे तो ‘भड़ास4मीडिया’ है, किन्तु यदि आपको लगता है कि कोई बात आपकी दर्शक संख्या बढ़ा सकती है, तो आप असंबद्ध बातें भी यहाँ प्रकाशित कर देते हैं। जैसे, ‘मैं मर्द हूँ-तुम औरत, मैं भूखा हूँ-तुम भोजन हो’ या ‘इसे माँ-बेटे का प्यार कहेंगे या रोमांस’ या ‘सरकार चिंतित है कि सेक्स करने की उम्र ज़्यादा क्यों?’ इत्यादि।

–‘भड़ास4मीडिया’ के पाठक आम लोग नहीं होते। पढ़े-लिखे लोग होते हैं। इन पढ़े-लिखे व वयस्कों के सामने सेक्स से संबंधित बात करने में क्या दिक़्क़त है। ट्रेडिशनल मीडिया ने जो दायरे बनाए हैं, अगर उसी दायरे में हम लोग फँस जाएँगे तो फिर काहे का न्यू मीडिया। न्यू मीडिया प्रयोगात्मक है। इसीलिए प्रयोग होते रहेंगे। कभी प्रयोग अच्छे लग सकते हैं और कभी बुरे। मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना। तो अगर किसी का कोई विचार है, जिससे आप भले असहमत हों तो उसे प्रकाशित करने में क्या दिक़्क़त। हमें विरोधी विचारों का सम्मान करना चाहिए। सीखना चाहिए और उससे सबक लेना चाहिए कि मनुष्य बहुत विविधता भरी चीज़ है, जिसे किसी एक डंडे से हाँक पाना अन्याय होगा। यह विविधता अगर हमारे यहाँ झलक रही है तो यह अच्छी बात है।

-आरोप यह भी है कि आप बेमतलब के लेखों को सनसनीख़ेज़ बनाते हुए शीर्षक लगाकर प्रकाशित करते हैं। जैसे ‘पत्रकार हैं, लुगाई कहाँ से लाएँ?’  

–ऐसा नहीं है। हेडिंग और कंटेंट में साम्य होता है। हम लोग टीवी और अख़बारों के द्वारा निर्जीव क़िस्म की हेडिंगों के आदी हैं। पर वेब पर तो प्रयोग होंगे। जिस शीर्षक का आपने ज़िक्र किया है, वह ठीक-ठाक रचना है, जिसका कंटेंट बढ़िया है। हेडिंग तो एक माध्यम होता है, कंटेंट पढ़ाने के लिए, आगे बढ़ने के लिए। इसी कारण हेडिंग में प्रयोग होते रहते हैं।

-‘भड़ास4मीडिया’ के विचार सेक्शन में एक सज्जन का नक्सलवाद पर गृहमंत्री को गरियाता हुआ एक लेख बहुत विवादास्पद हुआ था। उन सज्जन का आरोप था कि आपने पुलिस के डर से वो आलेख वेबसाइट से हटा दिया। बाद में आपने स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि प्रकाशन से पूर्व आपने वह पत्र पढ़ा नहीं था। क्या ये बात वास्तव में सच थी और क्या आपको नहीं लगता कि आपको निडर होकर अभिव्यक्ति के अधिकार को लेकर अडिग रहना चाहिए था?

–आपने पूरे प्रसंग के बारे में इसलिए जाना क्योंकि जिन्होंने विरोध किया था, उसका भी लेख हम लोगों ने छापा और अपना पक्ष भी रखा। तो ये अच्छी बात है कि हम लोग एक बेहद डेमोक्रेटिक प्लेटफ़ॉर्म बनने की तरफ़ तेज़ी से बढ़ चले हैं। कई बार सबकी बात रखने के चक्कर में कुछ चाइल्डिश या एक्स्ट्रीमिस्ट क़िस्म की चीज़ें भी छप जाती हैं, जिस पर ध्यान दिलाए जाने पर उसे हटा लिया या संशोधित कर दिया जाता है। मैं हर चीज़ नहीं देख पाता, क्योंकि सब कुछ पढ़ पाना मुश्किल है एक आदमी के लिए।

-क्या आपको नहीं लगता कि आप जिन वजहों से वर्तमान मीडिया हाउसों को कठघरे मे खड़ा करते हैं, वही काम ‘भड़ास’ पर आप ख़ुद भी करते हैं?

–जैसे बताएँ, उदाहरण दें कुछ। इतना जान लें आप कि हम लोग भी वही काम कर रहे होते तो भड़ास कभी का मर चुका होता। क्योंकि मीडिया के कई मगरमच्छ इसी फ़िराक़ में हैं कि यशवंत या भड़ास से कोई ग़लती हो, इनका कोई स्टिंग हो और इनका सत्यानाश हो जाए। हम लोग बेहद ट्रांसपेरेंट हैं। जो जानना चाहेंगे वो जानकारी पूरी ईमानदारी से आपको दी जाएगी। लेकिन यह ज़रूर मैं कह रहा हूँ कि हम लोग कहीं से कोई रजिस्टर्ड मीडिया नहीं हैं, न कोई अनुदान, भुगतान या लाभ पातें हैं सरकारों से। बावजूद इसके हम नब्बे फ़ीसदी ईमानदार हैं। 90 फ़ीसदी कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करते। 10 फ़ीसदी करते हैं तो इसलिए ताकि ‘भड़ास’ का सर्वाइवल रहे। और इस दस फ़ीसदी में भी वो लोग हैं, जिन्हें हम बेहतर मानते हैं, नया ग्रुप मानते हैं, जिनको प्रमोट करना अपना धर्म मानते हैं ताकि जमे-जमाए व बेहद करप्ट बड़े मीडिया हाउसों को चेलेंज मिल सके।

-तथाकथित न्यू मीडिया को लेकर बहुत बवाल मचा हुआ है। न्यू मीडिया के लोगों का आरोप है कि मुख्य धारा के लोग इस क्षेत्र के अनाधिकृत मठाधीश बनने की कोशिश कर रहे हैं। आपके क्या ख़याल हैं?

–बेवजह का बवाल है। जो लोग हल्ला कर रहे हैं, दरअसल वे खुद मठाधीश बनने की फ़िराक़ में हैं। आप काम करते रहिए, मठाधीश अपने आप क़िनारे लग जाएँगे। कोई बनने से मठाधीश नहीं बन जाता।

-आपके मुताबिक़ न्यू मीडिया की ताक़त और कमज़ोरियाँ क्या हैं और इसका क्या भविष्य देखते हैं?

–परंपरागत अख़बारों व न्यूज़ चैनलों के बाज़ार व सरकार संरक्षित होते जाने की वजह से न्यू मीडिया का तेजी से विस्तार हो रहा है। भविष्य न्यू मीडिया का है। न्यू मीडिया का काम ही मीडिया के असली काम के रूप में प्रकट होगा। भारत में न्यू मीडिया की कमज़ोरी यही है कि अभी इसकी पहुँच गाँव-गाँव तक नहीं है। जिस दिन गाँव-गाँव में इंटरनेट-ब्रॉडबैंड होगा, उस दिन सही मायने में न्यू मीडिया के लोग क्रांति कर रहे होंगे और फिर मिस्र जैसी क्रांति भारत में संभव हो जाएगी।

-यशवंत जी, आइए अब आपकी निजी ज़िंदगी की ओर रुख़ करते हुए चलते हैं… अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताइए।

–मेरा गाँव अलीपुर बनगाँवा है। ग़ाज़ीपुर ज़िले से 22 किलोमीटर दूर। शहर में भी एक मकान है, जिसे बाबा ने बनवाया था, जहाँ रहकर हाईस्कूल और इंटर की पढ़ाई की। उसके पहले कक्षा आठ तक गाँव में रहकर पढ़ाई की। पिता का नाम लालजी सिंह है और माँ यमुना सिंह। पिता रिटायर्ड फ़ौजी हैं, माँ हाउस वाइफ। हम लोग तीन भाई हैं। बहन नहीं है। बहन न होने की कमी रक्षाबंधन के दिन ख़लती है।

-अपने बचपन के विषय में कुछ बताएँ।

–बचपन में हाईग्रेड की शरारतें करता था। पैसा चोरी से लेकर भुट्टा व गन्ना चोरी तक। इन्नोवेशन हर फ़ील्ड में करता था, बचपन में ही। सेक्स से लेकर समाधि तक में बचपन में प्रयोग किया। कभी परम पुजारी बन जाता था, हनुमान चालीसा और सुंदरकांड याद करके, तो कभी गाँव से बाहर किसी खेत में हम कुछ मित्र अपने गुप्तांगों का सामूहिक प्रदर्शन कर इस छुपी दुनिया के रहस्य जानने की कोशिश करते।

-अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइए।

–गाँव में ही प्राइमरी और मिडिल स्कूल की पढ़ाई की। बाद में ग़ाज़ीपुर ज़िले के इंटर कॉलेज से इंटर किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए किया और उसके बाद बीएचयू से बीजेएमसी की डिग्री ली।

-दिल्ली कब और कैसे आना हुआ और गाँव और शहरी जीवन तथा ग़ाज़ीपुर और दिल्ली में आपने कितना अंतर पाया और इसने आपको कैसे प्रभावित किया?

–दिल्ली चार साल पहले आया। पहले दिल्ली से डर लगता था, लेकिन दिल्ली आने की ठान भी चुका था, क्योंकि प्रतिभाओं को सही मुक़ाम दिल्ली-मुंबई में ही मिल पाता है। दिल्ली में सारी टेक्नोलॉजी और तरह-तरह के क्षेत्रों के वरिष्ठ लोग हैं। इससे अगर आप प्रयोगधर्मी हैं तो काफ़ी कुछ सीखने-करने की ग़ुंजाइश होती है। बाक़ी गाँव के लोगों को शहरी जीवन में जो मुश्किलें होती हैं, वो मेरे साथ भी होती रही हैं। भीड़ में अकेले होने का भाव, सामूहिकता का अभाव। तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में भावनाओं को न समझा जाना आदि-आदि।

-अध्ययन के दौरान आपने आजीविका के लिए कौन-सा क्षेत्र चुना था? और बाद में क्या परिस्थितियाँ बनीं? क्या मनचाही फ़ील्ड में कार्य किया या समझौता करना पड़ा?

–अध्ययन करने इलाहाबाद पहुँचा तो मक़सद था, आईएएस बनना, पर बीच पढ़ाई में भगत सिंह को आदर्श मानते हुए ग़रीबों के लिए लड़ने और सिस्टम से लोहा लेने को एक नक्सलवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गया और पूरी तरह, होलटाइमर के रूप में काम करने लगा। बाद में लगा कि इतना मुश्किल काम मैं नहीं कर सकता।

-पत्रकारिता में आपकी रुचि कब पैदा हुई? और किस-किस मीडिया संस्थान में कार्य किया? और वहाँ आपके अनुभव कैसे रहे?

–पत्रकारिता में रुचि पॉलिटिकल एक्टीविज़्म के दौर में पैदा हुई। अमर उजाला और जागरण में काम किया। दोनों जगहों के अच्छे व बुरे दोनों तरह के अनुभव रहे।

-साथी कर्मचारियों में आपकी छवि कैसी थी और उनका आपके प्रति कैसा व्यवहार था?

–चूँकि मैं ज़्यादा तेज़ी से और ज़्यादा इन्नोवेशन के साथ काम करता हूँ, और ऐसे ही लोगों को पसंद करता हूँ तो कई बार जो लोग मेरी सोच के अनुसार नहीं चल पाते, उनसे मतभेद-मनभेद आदि होते रहते हैं।

-बॉस और कर्मचारियों के रिश्ते बहुत नाज़ुक होते हैं। बॉसों की क्रूरता के बहुत से क़िस्से प्रचलित हैं। आपके और आपके बॉसों के रिश्ते कैसे थे?

–आम तौर पर मेरे बॉस ही मुझसे डरा करते थे, क्योंकि मैंने कभी किसी बॉस की चेलहाई नहीं की। वीरेन डंगवाल जैसे संपादकों के साथ काम किया, जो चेला नहीं, अच्छे दोस्त की तरह अपने अधीनस्थों से काम करते-कराते हैं।

-मीडिया छोड़कर कुछ दिनों आपने एक मोबाइल वैल्यू एडेड सर्विस कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट (मार्केटिंग एंड कंटेंट) के पद पर भी काम किया। ये फ़ील्ड में परिवर्तन कैसे हो गया?

–एक टीवी संपादक से रात में फ़ोन पर गाली-गलौज हो गई और उन्होंने मेरी गालियों को रिकॉर्ड कर दैनिक जागरण के मालिक के पास भेज दिया तो इस स्टिंग में मैं नप गया। पत्रकार की नौकरी हर जगह तलाश की। नौकरी न मिली तो जो मिला उसको ग्रहण कर लिया। मार्केटिंग फ़ील्ड में जाने से बहुत कुछ नई चीज़ें समझ में आईं और उसी समझ के कारण मुझे लगा कि ख़ुद का काम करना चाहिए, किसी की नौकरी करने की जगह।

-नौकरी के वक़्त का कोई रोचक प्रसंग बताइए।

–अमर उजाला कानपुर की बात है. एक बार मेरे संपादक वीरेन डंगवाल ने मुझे डाँटा, तो मैंने उन्हें चुपके से इस्तीफ़ा थमा दिया और कमरे पर जाकर दारू पीने लगा। उन्होंने कुछ वरिष्ठों को मुझे मनाने के लिए भेजा, पर मैं नहीं माना। सुबह संदेशा भिजवाकर अपने कमरे पर बुलवाया। उन्होंने कहा कि तुम पहले तय कर लो कि जीवन में करना क्या है। तुम आईएएस बनने इलाहाबाद गए थे, वह न बन सके। लगे क्रांति करने। क्रांति करने के लिए निकले तो वो न कर सके। चल पड़े पत्रकार बनने। अब पत्रकारिता की राह छोड़ने की बात कर रहे हो। जीवन में इतनी अस्थिरता ठीक नहीं। अपनी प्रियारटीज़ तय कर लेनी चाहिए। उनकी इस बात ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया और तय किया पत्रकारिता के क्षेत्र में लगकर काम करना है, सो उनकी प्रेरणा से आज तक इस पेशे में बना हुआ हूँ।

-ब्लॉगिंग में रुचि कैसे हुई?

–वो हिन्दी ब्लॉगों के शुरू होने का दौर था। कई ब्लॉग खुल रहे थे, सो मैंने भी एक ब्लॉग बनाने का निश्चय किया और कुछ अलग-सा, कुछ हटके ब्लॉग बनाने की प्रक्रिया में ‘भड़ास’ ब्लॉग बनाया।

-ब्लॉग तो ठीक है, पर उसका नाम ‘भड़ास’ कैसे सूझा?

–यूँ ही। उन दिनों हिन्दी ब्लॉगों के जितने नाम थे, सबको देखने के बाद लगा कि अलग व विचित्र-सा नाम ‘भड़ास’ ही है, जो हिन्दी की देसज आत्मा को प्रतिध्वनित करता है और यह भी बताता है कि हम हिन्दीवालों में शहरों और अंग्रेज़ियत के ख़िलाफ़ काफ़ी भड़ास है, जिसे निकाले जाने की ज़रूरत है।

-और उसके बाद ‘भड़ास4मीडिया’ वेबसाइट शुरू करने का ख़याल कैसे आया?

–‘भड़ास’ ब्लॉग पर मीडिया से संबंधित पोस्टों को काफ़ी लोकप्रियता मिलने लगी। कम्युनिटी ब्लॉग होने के कारण ढेरों लोग डायरेक्ट अपनी जानकारियाँ पोस्ट करने लगे कि फलाँ पत्रकार ने फलाँ जगह ज्वॉइन कर लिया, उनको बधाई। इस तरह से करते-करते मुझे लगा कि मीडिया पर सेंट्रिक हिन्दी में एक अलग पोर्टल होना चाहिए।

-पाठकों का तो ‘भड़ास’ को खूब प्रतिसाद मिला, लेकिन आपके मित्रों और नज़दीकी लोगों ने इसे कैसे लिए और कितना सहयोग किया?

–मिला-जुला रहा। ‘भड़ास’ ब्लॉग के कारण जागरण में एक बार नौकरी जाते-जाते बची थी। तब ‘भड़ास’ को डिलीट करना पड़ा था। वहाँ से मुक्त होने के बाद फिर ‘भड़ास’ बनाया। कई दोस्त बने ‘भड़ास’ के कारण और कई दुश्मन भी पैदा किए ‘भड़ास’ ने।

-‘भड़ास’ के शुरुआती दौर में जब मैं आपसे मिला था, आपने बताया था कि उस वक़्त आपके किसी परिचित ने ‘भड़ास’ के नाम का ग़लत इस्तेमाल किया था। क्या इस तरह के वाक़ये भी हुए और आप उनसे कैसे निपटे?

–पहले मुझे लगता था कि ‘भड़ास’ का मतलब यशवंत सिंह होना चाहिए। अब मुझे लगता है कि भड़ास या कोई और शब्द किसी एक का नहीं है, सबका होना चाहिए। इसी कारण ‘भड़ास’ नाम से ढेरों ब्लॉग और पोर्टल बन रहे हैं और यह सब देखकर मुधे ख़ुद पर गर्व होता है कि मैंने एक शब्द को इतनी ताक़त दे दी।

-‘भड़ास’ के पहले और बाद में मीडिया को लेकर आपके नजरिए में कितना और क्या बदलाव आया?

–पहले मीडिया रूपी समुद्र में मैं एक तैराक भर था। अब मीडिया रूपी समुद्र का सर्वेयर हूँ जो तैराकों पर नज़र रखता है और उनके भले-बुरे को समझता-महसूसता है और दुनिया को बताता है। बहुत बदला हूँ अंदर से, यह काम करते हुए। कई बार मैं कन्फ़्यूज़्ड हो जाता हूँ कि सही क्या है और ग़लत क्या है। कई बार मुझे सही कहे जाने वाला व्यक्ति ज़्यादा ख़राब दिखता है, बजाय बुहरा कहे जाने वाले से।

-आपके जीवन का लक्ष्य क्या था और क्या ‘भड़ास4मीडिया’ ने इसे पूरा किया?

–लक्ष्य भी समय-समय पर बदलते रहते हैं पर मेरा एक मक़सद शुरू से रहा है मनुष्यता के लिए किसी बड़े स्तर पर काम आना और काम करना। मदर टेरेसा, ओशो, मार्क्स, भगत सिंह जैसे लोग मेरे आदर्श रहे हैं और इसमें दर्शन सिर्फ़ एक है कि मनुष्य को कैसे उसके दुःखों से मुक्ति दिलाई जाए। मुझे लगता है कि अंततः मैं कोई आध्यात्मिक टाइप का जीव हो जाऊँगा जो अपने में मगन रहेगा, गाते-माँगते।

-‘भड़ास’ ने वेब-पत्रकारिता में अपना अलग मुक़ाम बनाया है। कैसा अनुभव है इतने लोकप्रिय पोर्टल का मॉडरेटर और मालिक होने का, जिससे इतने सारे लोग जुड़े हैं और रोज़ देखते-पढ़ते हैं?

–मालिक होने का भाव रोज़ सुख नहीं देता। इस सुख का अहसास तब होता है, जब कराया जाता है। जैसे आपने अभी अहसास कराया है, तो मुझे महसूस हो रहा है कि हाँ, मैं मालिक हूँ। लेकिन सही बात तो यह है कि मैं क्लर्क हूँ जो पूरे दिन लोगों के मेलों का निस्तारण करता रहता है, उनकी सूचनाओं पर काम करता है। इसी ऊर्जा ने ‘भड़ास’ को खड़ा किया और कोशिश करता हूँ कि यही ऊर्जा क़ायम रहे।

-‘भड़ास’ ने अनेक मामले ऐसे उठाए हैं, जो मीडिया हाउसों के मालिकों और प्रबंधकों को पसंद नहीं आए। इन लोगों ने आप पर अनेक मुक़दमे दायर किए हैं। हमारे पाठक ज़रूर जानना चाहेंगे कि इस वक़्त आप पर कितने मुक़दमे चल रहे हैं; उनकी क्या स्थिति है और ‘भड़ास’ उनसे कैसे निपट रहा है?

–क़रीब एक दर्जन मुकदमे हैं। कई नोटिस हैं। हम लोगों ने भी एक लीगल सेल बना दिया है। जब तक आप ज़िंदा हैं, यह मानकर चलिए कि केस, मुक़दमे, थाना, पुलिस ये सब आपके जीवन के हिस्से हैं। इनसे अगर आप बचे हुए हैं, तो आप बहुत सीमित दुनिया में जी रहे हैं। जो लड़ते हैं, उन्हें हराने के लिए चौतरफ़ा घेराबंदी होती है और सिस्टम का हर अंग-प्रत्यंग उसे भाँति-भाँति से क़ाबू में करने की कोशिश करता है। पर अच्छी बात है कि अगर आप सही हैं तो बहुत देर तक कोई आपको परेशान नहीं कर सकता।

-इतना बड़ा और जटिल पोर्टल चलाना बहुत तनाव भरा काम है। कभी-कभी ये आपके लेखों में भी झलकता है। इतनी मुश्किलें, उलाहने, आलोचना और मुक़दमेबाज़ी से कभी निराशा भी होती होगी। ऐसे हालात में स्वयं को कैसे संभालते हैं और फिर से ऊर्जा और आशा कहाँ से जुटाते हैं?

–दारू पीकर, भजन गाकर। सच बता रहा हूँ। दारू मेरे लिए मुक्ति का माध्यम है। कुछ लोगों के लिए सेक्स होता है, कुछ लोगों के लिए सिर्फ़ संगीत होता है। पर मेरे लिए दारू और संगीत, दोनों मिक्स होकर परम मुक्ति के मार्ग बन जाते हैं और मैं अपने सारे अवसाद, दुःखों, तनावों को इसमें होम कर देता हूँ। किसी के प्रति कोई पाप जो होता है मन में, वो भी इसी अवस्था में तिरोहित हो जाता है।

-यदि ‘भड़ास’ न होता तो आज आप क्या कर रहे होते?

–किसी कंपनी में पत्रकार या मार्केटियर बनकर नौकरी कर रहा होता। बच्चों, पत्नी को जिलाने में अपनी ज़िंदगी होम कर रहा होता।

-अपनी रुचियों (हॉबीज़) के विषय में कुछ बताइए। फ़ुरसत का वक़्त कैसे बिताते हैं?

–इधर तो मेरी एक ही हॉबी है, भड़ास और सिर्फ़ भड़ास। इस कारण ज़्यादातर वक़्त भड़ास के लिए देना पड़ता है। बचे हुए वक़्त में दारू और म्यूज़िक।

-हमारे पाठक ज़रूर जानना चाहेंगे कि ‘भड़ास’ का कामकाज कैसे चलता है? कितने लोग इस काम में आपका हाथ बँटाते हैं और ख़बरें कैसे जुटाते हैं और कैसे प्रकाशित की जाती हैं?

–ख़बरें जनता भेजती है। मीडिया के लोग भेजते हैं। छह लोगों की टीम है, जिनमें कुछ अंशकालिक और कुछ पूर्णकालिक हैं। अनिल सिंह कंटेंट एडिटर हैं, जो अमूमन ख़बरों के संपादन व प्रकाशन का काम करते हैं। पोर्टल के लिए पैसे वग़ैरह के जुगाड़ में मैं लगा रहता हूँ ताकि सर्वर का खर्चा और हम लोगों रहने-खाने का खर्चा निकलता रहे।

-‘माँ को न्याय’ ‘भड़ास4मीडिया’ का बहुत ही मार्मिक प्रसंग था। आपको क्या लगता है कि हम पत्रकार इतने कमज़ोर क्यों हैं कि अपनी माँ को छोड़िए, ख़ुद तक को इंसाफ़ नहीं दिला पाते?

–जैसा सिस्टम होता है, वैसा ही असर उस समय की जनता पर पड़ता है। मैं तो भाग्यशाली हूँ कि मैंने अपनी माँ के लिए अभियान चलाया। तमाम लोग तो पुलिस के चंगुल में फँसकर आत्महत्या तक कर लेते हैं। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि सिस्टम लगातार असंवेदनशील, क्रूर, भ्रष्ट और आपराधिक होता जा रहा है। जनविरोधी सिस्टम में आम जनता को न्याय नहीं मिल पाता। सिर्फ़ ताक़तवर और पैसे वाले लोग ही न्याय ख़रीद कर अपने को सुरक्षित रख पाते हैं। ऐसे माहौल में लगता है कि अब बिना किसी क्रांति से कम पर काम चलने वाला नहीं है। पत्रकार भी तो किसी मीडिया कंपनी में नौकरी करते हैं। अगर मीडिया कंपनी न चाहे, तो भला कौन पत्रकार अपने लिए लड़ पाएगा।

-वर्तमान मीडिया पर कुछ सवाल। मीडिया की वर्तमान स्थिति के बारे में आपकी क्या राय है?

–परंपरागत मीडिया जनता के सुखों-दुःखों से तेज़ी से कट गया है तथा विज्ञापन के लिए सिर्फ़ मेट्रो केंद्रित, शहर केंद्रित है जो बहुत दुःखद है। वर्तमान मीडिया में पेड न्यूज़ का चलन भयंकर रूप से बढ़ा है और इस पर नियंत्रण के लिए चारों ओर से आवाज़ उठने का क्रम शुरू हुआ है।

-आपके विचार मीडिया के क्या दायित्व है और क्या वर्तमान मीडिया अपने दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन कर पा रहा है?

–मीडिया का उद्देश्य समाज को जाग्रत करना है, सही दिशा दिखाना है, वैज्ञानिक सोच पैदा करना है। पर दुःखद है कि कई चैनल व अख़बार समाज को मध्ययुगीन दौर में ले जाने का काम कर रहे हैं।

-हाल ही में राडिया टेप प्रकरण ने मीडिया की छवि को बहुत नुक़्सान पहुँचाया है। आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

–अब लोग पत्रकारों से पूछने लगे हैं कि आप मीडिया से हैं या राडिया से। यानी मीडिया में ऊपर के स्तर पर दलालों की जो बड़ी फ़ौज तैयार कर दी गई थी, उसके चेहरे का पहली बार ऐसा ख़ुलासा हुआ है। मुनाफ़ा कमाने के लिए मीडिया कंपनियाँ संपादक की नियुक्ति करती हैं और इसी वजह से राडियाएँ उन्हें जूती के नीचे रखने की कोशिश कर रही हैं।

-भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएँ हैं?

–बहुत जल्दी मैं संन्यासी बनना चाहता हूँ। वैसे मन से तो मैं संन्यासी बन चुका हूँ, अब तन से भी बनना है। संन्यासी का यहाँ आशय भगवा पहनने और दाढ़ी-मूँछ बढ़ाकर राम-राम करने से नहीं बल्कि लोगों को ख़ुश रखने, लोगों को जागरूक करने, लोगों से इंटरेक्ट करने जैसे स्वांतः सुखाय काम में लगना है। आजकल मैं गाता भी रहता हूँ, कबीर को…”नइहरवा हमका न भावे..” और “मन लागा यार फ़क़ीरी में..”

-“मीडिया साथी डॉट कॉम” की ओर से आपको ढेर सारी शुभकामनाएँ और अपना बहुमूल्य वक़्त देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

–आपका भी बहुत धन्यवाद।

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मजीठिया के हिसाब से पैसा मिलते ही रजनीश रोहिल्ला ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस ली (देखें कोर्ट आर्डर)

आरोप लगा सकते हैं कि रजनीश रोहिल्ला ने सबकी लड़ाई नहीं लड़ी, अपने तक सीमित रहे और मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से दैनिक भास्कर से पैसे मिलते ही सुप्रीम कोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली. ज्यादा अच्छा होता अगर रजनीश रोहिल्ला सबकी लड़ाई लड़ते और सारे पत्रकारों को मजीठिया के हिसाब से पैसा दिला देते. लेकिन हम कायर रीढ़विहीन लोग अपेक्षाएं बहुत करते हैं. खुद कुछ न करना पड़े. दूसरा लड़ाई लड़ दे, दूसरा नौकरी दिला दे, दूसरा संघर्ष कर दे, दूसरा तनख्वाह दिला दे. खुद कुछ न करना पड़े. न लड़ना पड़े. न संघर्ष करना पड़े. न मेहनत करनी पड़े.

कई लोग रजनीश रोहिल्ला पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने पत्रकारों को धोखा दिया. अरे भाई. रजनीश रोहिल्ला ने अपने लिए याचिका दायर की थी. उनके आगे जब भास्कर प्रबंधन रोया गिड़गिड़ाया और भरपूर पैसा दिया तो उन्होंने याचिका वापस ले ली. सुप्रीम कोर्ट के आर्डर की प्रति यहां चिपकाया गया है ताकि आप जान सकें कि किस तरह रजनीश रोहिल्ला ने खुद समेत तीन साथियों की लड़ाई लड़ी और जीते. ये अलग बात है कि वह सबके लिए नहीं लड़े. ठीक भी किया. जिसे मजीठिया चाहिए उसे सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट जाना बेहद आसान है. किसी परिचित वकील से एक ड्राफ्ट तैयार कराइए. सुप्रीम कोर्ट में दायर करा दीजिए. बस, देखिए कैसे नहीं मिलेगा आपको मजीठिया.

अब आप ये न कहना कि ये मालिक तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भी नहीं दे रहे. मालिक लोग मोटी चमड़ी वाले होते हैं. शांत, सुंदर, सौम्य लोगों का ये मोटी चमड़ी वाले जमकर शोषण करते हैं और इसी शोषण-उत्पीड़न के जरिए वे लोग मोटी चमड़ी वाले यानि बड़े आदमी बन जाते हैं. ये मोटी चमड़ी वाले यानि बड़े लोग सिर्फ उनसे डरते घबराते हैं जो इनको उंगली कर देते हैं, जो इनकी पोलखोल देते हैं, जो इनके खिलाफ कोर्ट कचहरी से लेकर विभिन्न माध्यमों में घुसकर जाकर हो हल्ला करते हैं. ऐसे हल्लाबाजों के आगे ये मोटी चमड़ी वाले तुरंत समर्पण कर देते हैं. तो भाइयों, आप लोग सुंदर सौम्य शांत बने रहिए और किसी मसीहा का इंतजार करते रहिए. आप लोगों के मसीहा थे मोदी जी. बड़ा भारी भरोसा था. वे मोदी जी तो अब मोटी चमड़ी वालों के सबसे मोटे मित्र बन चुके हैं. फिर इंतजार करिए किसी नए मसीहा का. रजनीश रोहिल्ला ने अपनी लड़ाई लड़ी और जीत कर आगे बढ़ चुके हैं.

रजनीश रोहिल्ला ने इस लड़ाई के दौरान अपना खुद का मीडिया कारोबार भी शुरू कर दिया. राजस्थान केंद्रित एक मैग्जीन का प्रकाशन शुरू कर दिया. इस तरह इस बहादुर समझदार पत्रकार ने संघर्ष और सृजन, दोनों रास्तों को अपनाते हुए अपने लिए शानदार जीत हासिल कर नई मंजिल की तरफ कूच कर दिया है. उनके लिए, जो सपने देखते हैं, लड़ते हैं, संघर्ष करते हैं, यह धरती, यह दुनिया बहुत कुछ तोहफे देती है. उनके लिए जो डरपोक हैं, जो कमजोर हैं, जो कायर हैं, जो बने बनाए लीक पर चलने वाले हैं, ये धरती दुनिया बेहद कष्टकारी और दुखद है. रजनीश रोहिल्ला को एक बार फिर बधाई कि उन्होंने संघर्ष और सृजन का रास्ता चुनकर अपने लिए एक नया आसमान बनाया है. ये बताना भी जरूरी है कि भड़ास ने जिन जिन को हीरो बनाया, वे चाहे दैनिक जागरण के प्रदीप सिंह हों या दैनिक भास्कर के रजनीश रोहिल्ला, सबने अंततः जीत हासिल की, उनके आगे उनका संस्थान उनका प्रबंधन झुका.

प्रदीप सिंह आज दैनिक जागरण में शान से नौकरी कर रहे हैं. प्रदीप वही शख्स हैं जिन्होंने दैनिक जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन गुप्ता और संजय गुप्ता को डायरेक्ट मेल कर मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से पैसा मांगा था. इसके बाद प्रदीप का तबादला कर दिया गया था. भड़ास ने जब पूरे मसले को प्रमुखता के साथ उठाया तो जागरण प्रबंधन की हवा खिसक गई और इन लोगों ने प्रदीप के आगे हथियार डालकर उन्हें फिर से सम्मान के साथ व शर्तें मानते हुए काम करते रहने का अनुरोध किया.

तो भाइयों, अगर सच्चे मीडियाकर्मी हो, चाहे किसी मीडिया संस्थान में चपरासी हो या मशीनमैन हो, पत्रकार हो या पेजीनेटर हो, आप तभी सच्चे मीडियाकर्मी कहलाओगे जब अपने हक के लिए लड़ोगे, भिड़ोगे. जिनके कंधे पर पूरे जमाने के शोषण अत्याचार के खिलाफ लड़ने बोलने दिखाने की जिम्मेदारी हो, वे अपनी ही लड़ाई अगर नहीं लड़ सकते तो सच्चे कहां के और कैसे हुए. इसलिए मीडियाकर्मी दोस्तों, सोचो नहीं. आगे बढ़ो और अपना हक अपना हिस्सा लो. मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अगर पैसा नहीं मिला है तो चुपचाप सात फरवरी से पहले सुप्रीम कोर्ट में कंटेंप्ट आफ कोर्ट का केस डाल दो. केस डालने के बाद तो आपको आपका प्रबंधन ट्रांसफर भी नहीं कर सकता क्योंकि तब यह पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर की गई कार्यवाही में शुमार किया जाएगा और आपको लेबर कोर्ट से या सुप्रीम कोर्ट से स्टे मिल जाएगा. नीचे एक पत्र है, जिसे एक साथी ने भड़ास को भेजा है, सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त आर्डर के साथ. पढ़िए और आप भी सात फरवरी से पहले कंटेंप्ट आफ कोर्ट का मुकदमा दायर करने की तैयारी करिए. जैजै.

-यशवंत सिंह, एडिटर, भड़ास4मीडिया

संपर्क: yashwant@bhadas4media.com


BHASKAR EMPLOYEES KE LIYE BADHI DUKHAD KHABAR

LOG SOCH TE HAI KE KOI MASHIHA AAYEGA JO UNKA HAKK DILAYEGA…. YE KALYUG HAI BHAI… KHUD KO HI BULAND KARO, KHUD LADAI KARO AUR KHUD MAVA KHAO… DAINIK BHASKAR VALO KE SAATH BHI KUCHH AISHA HI HUA…. PAHELE GUJARAT HIGH COURT ME EMPLOYEES NE CASE KIYA TO PAISA DEKE CASE SATTLEMENT KARKE WITHDRAW HO GAYA….. AUR AB SUPREME COURT KE CASE ME EMPLOYEES KO PAISA DE KE CASE WITHDRAW KARVA LIYA…. (ORDER COPY ATTACHED))

ABHI BHI 7 FEBRUARY SE PAHELE CONTEMPT PETITION HO SAKTI HE NAHITO USKE BAAD TO MAJETHIA MANCH BHI KUCHH NAHI KARVA PAYEGA…. CHALO BHAI HAM TO CHALE APNI LADAI KHUD LADNE…. HAKK KI LADAI…

PLS CONTACT GUJARAT MAJDOOR SABHA– 09879105545 IF INTERESTED TO AVAIL..

HITESH TRIVEDI
hrdb123@gmail.com


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आप जिया न्यूज के कर्मियों के पक्ष में लिख-लड़ रहे हैं और वो कर्मी आपका विश्वास नहीं करते!

यशवंत भईया प्रणाम, बड़े दु:ख की बात है कि ये जो जिया न्यूज के कर्मचारी आपका विश्वास नहीं करते, आपके सहयोगियों का विश्वास नहीं करते, उनके लिए आप इतना कर रहे हैं. आपको बता दूं भइया, आपने एक न्यूज डाली थी भड़ास पर जिया न्यूज की महिला कर्मचारी का पैर कटने की. उस समाचार को मैंने सभी जिया न्यूज के कर्मचारियों को मेल किया. उस मेल में रोहन जगदाले, एसएन विनोद और कई शीर्ष कर्मियों के नाम शामिल थे.

जब मैं उसी शाम करीब 7 बजे जिया न्यूज के बाहर पहुंचा तो कई लोग मेरा विरोध करने लगे. सबने कहा कि वह खबर गलत है. भड़ास सिर्फ अपनी टीआरपी के लिए ऐसा करता है. कुछ ने कहा कि जिसने यह खबर अपने फेसबुक वाल पर डाली है, वह बेरोजगार था, मैंने ही उसे नौकरी दिलाई थी.. आज वह ऐसा कर रहा है. किसी संस्थान का नाम बदनाम करना ठीक नहीं है…

मैं तो कहता हूं कि भइया इन लोगों के साथ ऐसा होना जरूरी है. एक तरफ यशवंत सिंह (वन मैन आर्मी बनकर) उस महिला पत्रकार की मदद कर रहा है लेकिन दूसरी तरफ भड़ास को सिर्फ टीआरपी का खेल बताया जा रहा है. आज ये लोग आपके पास फोटो भेज रहे हैं कि हम हड़ताल पर है. अरे भाई… क्या आप लोगों को (हड़तालियों) उस महिला पत्रकार का कटा हुआ पैर नहीं दिखाई दिया जिसे देखने के बाद शायद कुछ लोग खाना नहीं खाएं होंगे…. सच कहा है किसी ने … क्या जाने कोई पीर पराई…. रही बात रोहन जगदाले की तो वो बंदा पहले ही कह चुका है कि भइया मेरे ऊपर कई मामले हैं… या फिर दूसरे शब्दों में कह लीजिए कि मैं फ्रॉड हूं, मेरा क्या कर लोगे…. यशवंत भइया, मैं तो पहले से ही आपका मुरीद हूं…. लेकिन कभी-कभी दु:ख होता है जब आप लोगों का साथ देते हो और लोग आपकी आलोचना करते हैं … जैसे कि ये जो आज हड़ताल पर बैठे हैं…

संबंधित खबरों के लिंक ये हैं…

https://www.bhadas4media.com/tv/2787-news-channel-strike

स्नेहा बघेल

https://bhadas4media.com/tv/2397-snehal-vaghela-accident

https://bhadas4media.com/tv/2466-snehal-case-channel-baat

आपका

एस. शैलेंद्र
पत्रकार
नोएडा

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भड़ास के जरिए मैंने जिंदगी में पहली बार न्यू मीडिया / सोशल मीडिया की शक्ति का अनुभव किया

जानिब ए मंजिल की ओर अकेला चला था मगर
लोग मिलते गए, कारवां बनता गया!!!

यशवंतजी की ओर से देशभर के पत्रकारों के नाम भड़ास पर पोस्ट हुआ संदेश न्याय की लड़ाई में उबाल ला चुका है। भड़ास के जरिए मैंने जिंदगी में पहली बार न्यू मीडिया / सोशल मीडिया की शक्ति का अनुभव किया। भड़ास की पूरी टीम को मेरा धन्यवाद! धन्यवाद देने का एक बड़ा कारण यह भी है कि मजीठिया के मामले में देश के पत्रकारों को एकजुट होने का मंच भी मिला है। भड़ास के यशवंतजी का मेरे को लेकर लेख आने के बाद मेरे पास पिछले दो दिनों से देशभर से बड़ी संख्या में पत्रकारों के फोन आ रहे हैं। अधिकांश पत्रकार मजीठिया की लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहते हैं।

मुझे लगता है कि यह समय पत्रकारों के जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट है। दूसरे शब्दों में आर-पार की लड़ाई है। पत्रकारों ने फोन कर मुझे न सिर्फ बधाई दी बल्कि मेरा हौसला भी बढ़ाया। मैं जानता हूं कि मेरी लड़ाई अरबों रुपए का कारोबार करने वाली कंपनी से है। यह लड़ाई मैं देशभर के पत्रकारों के दम पर ही लड़ सकता हूं। मुझसे  पत्रकारों ने पूछा कि हम तो सब अलग-थलग पड़े हैं, ऐसे में मजीठिया की लड़ाई कैसे लड़ी जा सकती है। मैंने इन साथियों को बताया कि अपने शहर में  पत्रकारों का छोटा-छोटा समूह बना लें और वकीलों से राय मशविरा कर सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए ड्राफ्ट तैयार करा लें।

मैंने ये भी सुना है कि कंपनियां मजीठिया से बचने के लिए बड़ी संख्या में पत्रकारों के ट्रांसफर की तैयारी कर रही हैं या कर चुकी हैं, ताकि अधिकांश पत्रकार नौकरी छोड़कर चले जाने के लिए मजबूर हो जाएं। कंपनियों की दूसरी रणनीति यह है कि वो अपने स्थाई कर्मचारियों से इस्तीफा लिखवाएंगी तथा कान्टेक्ट कर्मचारी के रूप  में नया अप्वाइंटमेंट देगी। साथियों! ये समय भारत के पत्रकारों के लिए सबसे दुर्भाग्य का समय होगा। वर्तमान में जब सुप्रीम कोर्ट हमारी ताकत बना हुआ, तो हमारा कमजोर रहना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। मालिकों व कर्मचारियों के बीच हर युग में संघर्ष होता आया है और सबसे सुखद बात यह है कि हर युग में कर्मचारी जीते हैं। आप भरोसा रखिए कि जब दुनिया में कोई भी परिवर्तन आता है तो उसके  पीछे परमात्मा की शक्ति और उसकी इच्छा होती है। मजीठिया भी उसी का एक पार्ट है। यह हमारे लिए बना है। हमारा हक है। …और इसे लेने के लिए हमें ठान लेनी चाहिए। जो लोग इस मुगालते में हैं कि न्याय मांगने व देने वालों को खरीद लेंगे, उनकी गलतफहमी दो जनवरी को सहारा समय के मालिक सुब्रत राय की तरह दूर हो जाएगी।

मजीठिया की लड़ाई में एक-एक पत्रकार उसी तरह महत्वपूर्ण है, जिस तरह देश के लिए एक-एक सैनिक है। दोस्तों! मैं ये कोई आर्टिकल नहीं लिख रहा हूं बल्कि जो अनुभव कर रहा हूं, वो आप को बता रहा हूं। अभी नहीं तो कभी नहीं। हम  पत्रकारों  पर आने वाली  पीढियां हंसेंगी। हमारी पीढियां कहेंगी कि हम सशक्त भारत के सबसे कमजोर वर्ग हैं। मजीठिया देश के एक-एक पत्रकार को मिले, इस बात की लड़ाई लड़ने के लिए मैं चैन की नींद नहीं सो रहा हूं। उसी तरह आप भी आज से संकल्प लीजिए कि मजीठिया की लड़ाई में जो संभव होगा, मदद करूंगा। अगर आपने अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ी तो ये बात मत भूलना कि आप अपने शोषण का रास्ता खुद बना रहे हैं। मैं आप से फिर से मुखातिब होउंगा, देश के तमाम उन पत्रकारों को धन्यवाद जिन्होंने भड़ास संपादक यशवंत जी के लेख के बाद मुझे फोन कर मेरा हौसला बढ़ाया।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरा मकसद है, ये तस्वीर बदलनी चाहिए

आप का
रजनीश रोहिल्ला
मोबाइन नंबर : 9950954588


मूल खबर….

दैनिक भास्कर को औकात दिखाने वाले सीनियर रिपोर्टर रजनीश रोहिल्ला को आप भी सलाम करिए

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इस पोर्टल के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह ( संपर्क: yashwant@bhadas4media.com ) हैं जो करीब डेढ़ दशक तक दैनिक जागरण और अमर उजाला जैसे अखबारों में कार्यरत रहे. यशवंत ने मीडिया के भीतर के भ्रष्टाचार को उजागर करने हेतु वर्ष 2008 में इस पोर्टल को लांच किया. पत्रकारिता के मिशनरी तेवर को कायम रखने के उद्देश्य से अस्तित्व में आए इस हिंदी पोर्टल के साथ देशभर के हजारों अनुभवी, ईमानदार और सचेत मीडियाकर्मियों की टीम जुड़ी है जो खबरें भेजने से लेकर अपडेट करने तक का आनलाइन काम करते हैं. भड़ास4मीडिया न सिर्फ मीडिया जगत से जुड़ी सूचनाएं, खबरें, विश्लेषण प्रकाशित करता है बल्कि उन खबरों को भी तवज्जो देता है जिन्हें मुख्यधारा की कारपोरेट मीडिया अपने स्वार्थी हितों और भ्रष्टाचारियों से गठजोड़ के चलते दिखाता छापने से इनकार कर देता है. Continue reading

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पहले यश मेहता को गालियां दी, नौकरी से निकाला गया तो भड़ास पर खबर छपने के कारण यशवंत को गालियां दे रहा

Yashwant Singh :  कल रात एक बंदे ने मुझे फोन किया और बिना नाम पहचान बताए धाराप्रवाह माकानाका करने लगा यानि गालियां बकने लगा. खूब दारू पिए हुए लग रहा था. उससे मैं पूछता रह गया कि भाई साब आप कौन हैं, क्या समस्या है.. पर वो सिवाय गाली बकने के दूसरा कोई काम नहीं कर रहा था, न सुन रहा था, न सवालों का जवाब दे रहा था. वह सिर्फ गालियां बकता जा रहा था. फोन कटा तो मैं हंसा. उस बंदे का नंबर फेसबुक पर डाला और फेसबुकिया साथियों से पता लगाने को कहा कि ये कौन शख्स है, जरा काल कर के इससे पूछें.

Divya Ranjan

Divya Ranjan

Divya Ranjan FB Profile


एफबी वाले कितने मित्रों ने पूछा, ये तो नहीं पता लेकिन ढेर सारे साथियों ने उसी के अंदाज में उस गालीबाज शख्स को फोन कर उसकी धुलाई की. मीडिया और पुलिस के कई साथियों को इसका नंबर देकर पता लगाने को कह दिया कि इस नंबर से गाली बकने वाले का नाम पता लोकेशन आदि सर्विलांस के जरिए पता करें व बताएं. सुबह होते-होते सब पता चल गया. आज सुबह मालूम हुआ कि ये शख्स ‘दिव्य रंजन’ नामक प्राणी है जो कभी ‘4रीयल न्यूज’ चैनल में पीसीआर में सेवारत हुआ करता था. वहां के तत्कालीन सीईओ यश मेहता के साथ ऐसी ही ओछी व गाली-गलौज वाली हरकत इसने की थी. तब यश मेहता ने इसके खिलाफ नोएडा में एफआईआर दर्ज कराई और नौकरी से बाहर कर दिया. सीईओ को फोन पर गरियाने, धमकाने आदि से संबंधित एफआईआर की खबर मय दस्तावेज भड़ास पर छपी थी. ये बात इसी साल अप्रैल की है. संबंधित खबर का लिंक ये http://goo.gl/Cq4ozm है, इस पर क्लिक करें और पढ़ें.

भड़ास पर छपी इसी खबर के कारण वह बंदा चिढ़ा हुआ था और करीब चार महीने बाद उसकी चिढ़न कल रात अचानक सतह पर आ गई. उसने मुझे बतौर खलनायक अपने मन-मस्तिष्क में पेंट किया और दिल में छुपा रखी महीनों पुरानी खुन्नस को सामने ले आया. इसी क्रम में उसने नशे की अधिकता में फोन मिलाया और गालियां बकने लगा. हालांकि भड़ास पर छपी खबर में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसका कोई कम अक्ल पत्रकार भी बुरा माने. अगर किसी के खिलाफ कोई एफआईआर हुई है तो उस एफआईआर की कापी के साथ खबर छापने में कोई गलत बात नहीं. यह एक रुटीन किस्म की खबर है. इसमें आहत करने होने जैसी कोई बात ही नहीं है. पर इस खबर के कारण अगर खबर में उल्लखित कोई आरोपी खार खा जाए, कुंठित हो जाए, रिएक्ट करने लगे और दुबारा वही हरकत करे जिसके कारण वह खबर का हिस्सा बना था तो उसे पत्रकार हरगिज नहीं माना जा सकता. वह प्रोफेशनल क्रिमिनल माइंडसेट रखने वाला शख्स माना जाएगा.

ऐसे लोगों का क्या इलाज है? अब सुबह से इस प्राणी को फोन कर रहा हूं तो यह फोन नहीं उठा रहा. ऐसे लोग रात में दारू की उर्जा में स्कोर सेटल करने बैठते हैं. वैसे, सच कहूं तो कुछ-कुछ मेरी तरह का लगता है ये दिव्य रंजन नामक प्राणी. बस एक बड़ा फर्क यह है कि अपन ने कभी नाम पहचान छिपाकर किसी से बदतमीजी नहीं की. जिससे भी बुरी या खरी बात कही तो पहले नाम पता परचिय बताया उसके बाद सुनाया या समझाया. दूसरी बात ये कि अपन कभी छोटे मोटे मसलों को लेकर रिएक्ट नहीं हुए. ज्यादातर मामलों को इगनोर किया, चित्त से देहि उतार के अंदाज में. फिर भी, मैंने भी मदिरापान करके ढेर सारे कांड और कुकृत्य किए हैं, इससे इनकार नहीं. पर जो नाम पहचान छुपाकर और बिना कारण बताए गाली गलौज करने लगे उसे मैं ओछा व महाकुंठित प्राणी मानूंगा. अबे दम है तो पहले नाम पता बताओ, फिर जो कहना है कहो. वैसे मदिरा मस्त विभाग में एक ऐसा रोग है, जो महाकुंठित लोगों को हो जाया करता है. वो ये कि ऐसे लोग पीते ही अथाह उर्जा से खुद को लैस पाते हैं और इसी ताव में कुछ ही देर में विवेक शून्य हो जाते हैं. फिर इन्हें एहसास नहीं होता कि ये क्या कह रहे, क्या कर रहे.

ऐसे लोगों से जब आप सुबह बात करने की कोशिश करेंगे तो ये बात नहीं करेंगे, आंखें नीची किए रहेंगे, आमना-सामना करने से कतराएंगे. यह एल्कोहलिक एब्यूज और डिसार्डर भारत में काफी कामन है. ऐसे मेंटल स्टेट में ढेर सारे अपराध घटित हो जाया करते हैं. सुबह जब दिव्य रंजन ने फोन नहीं उठाया तो उसे मैसेज करके बता दिया कि तुम्हारा नाम पहचान करतूत सब पता है और तुमने रात में जो किया है वह अक्षम्य है, लेकिन अगर तुम्हें गल्ती का एहसास तनिक भी हो तो क्षमा मांग लो, मेरा दिल बहुत उदाहर है, माफ कर दूंगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो लीगल प्रक्रिया में मुझे जाना पड़ेगा. मजेदार है कि दिव्य रंजन मेरे फेसबुक फ्रेंड भी हैं : उनका फेसबुक प्रोफाइल और तस्वीर यहां दे रहा हूं… मैं हमेशा से मानता रहा हूं कि लिखने पढ़ने वाले बरास्ते पुलिस से बात नहीं करते, कलम के जरिए बात करते हैं. इसी कारण पूरे घटनाक्रम को यहां लिख रहा हूं. अगर पुलिस में जाना होता तो अभी तक एफआईआर करा चुका होता. लेकिन किसी की भी एक दो गल्तियां माफ की जानी चाहिए. खासकर तब जब वह घोड़े पर सवार होकर हवा से बात करने वाली दारूबाजी की स्थिति में हो.

दिव्य रंजन को देर सबेर अपने एल्कोहलिक व्यवहार का इलाजा कराना पड़ेगा अन्यथा ये जीवन में कभी बड़ा गड़बड़ कर बैठेगा जिसके चलते उसे पूरे जीवन पश्चाताप करना होगा. इसलिए मैं दिव्य रंजन से अनुरोध करूंगा कि वह नार्मल स्थितियों में बात करे और अपनी बात रखे. अगर उसे भड़ास से कोई शिकायत है, मेरे से कोई शिकायत है तो लिखकर भेजे, उसके पक्ष को प्रमुखता से भड़ास पर प्रकाशित किया जाएगा. भड़ास इसीलिए जाना जाता है कि यह निष्पक्ष मंच है, एकपक्षीय मंच नहीं है. अगर हम गल्तियां करते हैं तो उससे सबक लेते हैं और उसका परिमार्जन भी प्रकाशित करते हैं. सभी के जीवन में उतार चढ़ाव आता है और सभी हालात से निपटने के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं. पर कई साथी मुश्किलों चुनौतियों को फेस करने की जगह नकारात्मक दृष्टिकोण लिए अतीतजीवी हो जाते हैं. इस अतीतजीविता में सिवाय डिप्रेशन, तनाव, कुंठा, विवाद के कुछ मिलता नहीं है. खैर, यहां काफी लंबा भाषण हो गया लेकिन यह सब लिखना जरूरी था ताकि मेरे दिल दिमाग पर कोई बोझ न रहे और सब कुछ ट्रांसपैरेंट रहे. दिव्य रंजन के लिए मेरी शुभकामनाएं हैं. वो खुद को संभालें, सफल हों, यह कामना है. दिव्य रंजन का फेसबुक प्रोफाइल लिंक ये https://www.facebook.com/dibya.ranjan.792 है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. इसी मामले पर यशवंत की शुरुआती पोस्ट यूं है…

Yashwant Singh : +917870199133 Es number se ek aadmi makanaka kar raha hai. Apna naam pehchaan bhi nahi bata raha. Chhup ke gaali dene wala ye shakhs kaun ho sakta hai? Vigyaan aawo kar ke dekhen Aap bhi lagiye zara aur apna feedback dijiye. Ek call aapki taraf se en bhayi saab ko banta hai na.. — feeling excited.

इस पोस्ट पर आए कुछ कमेंट इस प्रकार हैं…

UmaShanker Sharma यह फोन अभी गया बिहार के आस पास कही है बाकी सुबह पुलिस में एक कम्प्लेंट डालिए , बाकी वो सम्भाल लेगी

Yashwant Singh Subah police mei jaana hi hai. Tab tak raat ka aanand liya jaaye..

UmaShanker Sharma कोई फायदा नहीं इन उच्चको के मुह लगने का ये सब अपने माता पिता की ग़लतफ़हमी से इस धरती पे आ गए हैं

Shekhar Subedar Great Yashwant Singh ji .Bilkul banta hai.

Arsh Vats Sahb ye kh rha h danish bol rha hu isko alankaar lga diye h bhut ab phn nhi utha rha msg kar diye h bhut sare or sewa btyo sirSee Translation

Ashok Aggarwal स्विच आफ जा रहा है अब ? शायद फट गई ….

Pradeep Sharma दादा अगर इस नंबर वाले को गाली देने की छुट दे तो में कर सकता हू अपनी जुबान भी जरा साफ़ हो जायेगी…..आज्ञा दे दादा..

Prashant Mishra are good ,bahut din se kisi ki gariyaye nhi hai…

Mukesh Gairola KYa aap bhi hamre ley aise taiyar rhengy ?

Anurag Singh Mob.switched off……

Punit Bhargava bihar-jharkhand circle ka number hai

Gyanesh Tiwari Busy ja raha hai. Shayad kayi log ek saath try kar rahe honge.

Vikash Kumar Gupta ha ha iska no. to switch off ja raha hain

Prashant Mishra shubham v.c. to mila nhi.esi sale ko gariaao……abhi sala off aa rha..See Translation

Pradeep Sharma ऑफ़ आ रहा है नंबर दादा..

Prashant Singh Bhaiya meri awaz unko pasand nahi kutch bol hi nahi rahe. waise mai puri rat jaga hi hu check karta rahungaSee Translation

Gyanesh Tiwari Number on hai. Koi uthaya tha lekin bol nahi raha hai.

Yashwant Singh Jab bhi number on ho, en bhayi saab ko phone kariye. Baaki servilance ki sewaaye lene ki taiyaari hai. Jald hi mahashay ko saamne le aata hu.

Shubham Pandey Hum bhi try kiye. Waisa hi mann mera hai. Frustiyaaye huye hai tab se yaar. Gariyaya jaaye saale ko kuttu smjh ke hi Prashant Mishra

Yashwant Singh Number on hai. Busy bata raha hai. Mai bhi try kar raha. Aap sabhi bhi kariye. Gaali do lekin naam pehchaan ke saath. Chhupa khel pasand nahi aata apan ko.

Pradyumna Yadav एक धक्का गाली-गलौज हुयी है । उसका पूरा खानदान किये है । ससुरा , दांत चियार रहा था । बहुत बेहया लगता है ।

Yashwant Singh Pradyumna Yadav ha ha ha … Wo bhi sochega kaha fas gaya

Ashok Aggarwal मुझे लगता है उसे ये न0 बन्द करना पडेगा वो सोच रहा होगा पडी लकडी ले ली….

Kamal Kumar Singh हम एक ठो उससे बात पूछे, उसके बाद वो भड़क गया। नंबर सदाबहार मनोरंजन का साधन है ये। मजे लिजिए समय समय पर सब।

UmaShanker Sharma यशवंत भाई, गुस्ताखी के लिए अग्रिम माफ़ी उसके लिए क्या है वो तो निर्लज्ज होगा , लेकिन अपने तो निर्लज्ज नहीं न हो सकते अपनी जुबान काहे को कडवी करे इन सब को ट्रेस आउट करने में पुलिस को केवल चार घंटे लगते हैं, और थोड़ी पहचान हो तो ६ घंटे में गिरफ़्तारी भी हो जाती है सामने आएगा तो उसके समझ में आ जायेगा के अगले तीन पीढियों को ये समझाना है के ऐसा काम नहीं करने का

Yashwant L Choudhary मैंने तो कुछ सुना ही नहीं, फोन उठाते ही अपनी पूरी भड़ास निकाल दी, फोन ही काट दिया मेरा

Yashwant Singh UmaShankar Sharma bhayi. Aap se sahmat hu. Kal din mei ho jaayega kaam. Lekin raat mei kyu karen aaraam

Aman Singh Yah sala kisi bikau mediahause ka pilla hoga..

मुकेश कुमार http://www.truecaller.com/in/7870199133

Alpna Chauhan Hahaha…thakur shab k sath prani n ye vyabhar kiya h kya isko chor diya jaye?

Gyanesh Tiwari Diya hoon khaane bhar ko. Saala palat ke gaali bak raha hai. Subah iska ilaaj hona hi chahiye.

Yashwant Singh Mere paas abhi uska phone aaya. Bol raha hai ki dusro se gaali dilwa rahe ho.. es sadachaari pe to mar mar jaawan.

Gyanesh Tiwari Hahahaha… Jo bhi hai, bahut bada wala patit hai…

Syed Shakeel Good hai boss …..kamaal hai ap bhi wo ek apke pochhe laga tha apne ek hajar log uske pichhe laga diye ….uski to maa ka ho gaya saki nakaSee Translation

Abdul Noor Shibli Oo kaisa besharm hai re bhai…..

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Bhadas Workshop Pic 9

: 17 April 2015 : Bhadas Content Monetisation Workshop : Urdu Ghar, Deen Dayal Upadhyay Marg, Delhi :

वर्कशाप में मेहमान बनकर शिरकत करने आए वरिष्ठ टीवी जर्नलिस्ट और एंकर अतुल अग्रवाल से बातचीत करते भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह…

 

पूरे वर्कशाप का हाल जानने और अन्य तस्वीरें व वीडियो देखने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें:

उम्मीद न थी कि लोग 1100 रुपये देकर मुझे सुनने मुझसे सीखने आएंगे! (देखें भड़ास वर्कशाप की तस्वीरें और कुछ वीडियो)

 

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Bhadas Workshop Pic 7

: 17 April 2015 : Bhadas Content Monetisation Workshop : Urdu Ghar, Deen Dayal Upadhyay Marg, Delhi :

आयोजन स्थल उर्दू घर के बाहर लगा वर्कशाप से संबंधित स्टैंडी…

पूरे वर्कशाप का हाल जानने और अन्य तस्वीरें व वीडियो देखने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें:

उम्मीद न थी कि लोग 1100 रुपये देकर मुझे सुनने मुझसे सीखने आएंगे! (देखें भड़ास वर्कशाप की तस्वीरें और कुछ वीडियो)

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