भाजपा नेता को पत्रकारिता पसंद न आई तो पत्रकार पर कर दिया तलवार से हमला

ये भाजपा वाले जन्मजात मीडिया विरोधी होते हैं.. या तो पटा लेते हैं या फिर हमला कर देते हैं.. इन्हें डेमोक्रेसी कतई पसंद नहीं… मध्य प्रदेश में एक भाजपा नेता को पत्रकारिता पसंद न आई तो पत्रकार पर कर दिया तलवार से हमला.. मध्य प्रदेश में जगह जगह पत्रकार भाजपा नेताओं के हाथों पीटे जाते हैं… कइयों की जान तक ले ली गई..

घटना मध्य प्रदेश की. खबर छापे जाने से नाराज था बीजेपी का नेता.. पत्रकार को तलवार मारी… जबलपुर में भाजपा नेता और पार्षद पति ने पत्रकार आशीष विश्वकर्मा को घर बुलाकर तलवार से जानलेवा हमला किया. पत्रकार को गंभीर हालत में इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती किया गया है. बताया जा रहा है कि एक खबर छापे जाने से नाराज होकर भाजपा नेता ने जानलेवा हमला किया. स्थानीय हिंदी दैनिक के पत्रकार आशीष विश्वकर्मा पर शुक्रवार रात को भाजपा गढ़ा जोन अध्यक्ष और पार्षद रीना राजपूत के पति हृदयेश और उसके भाई नीरज ने घर बुलाकर जानलेवा हमला कर दिया.

बताया जा रहा है कि आरोपियों ने आशीष को बर्थडे पर शुभकामनाएं देने के बहाने घर पर बुलाकर तलवार और बेसबॉल के डंडे से हमला कर दिया. हमले में आशीष को गंभीर चोटे आई हैं. आशीष ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि दो दिन पहले एक खबर को लेकर पार्षद पति ने आपत्ति जताई थी. हालांकि, बाद में मामला शांत हो गया था. शुक्रवार रात को आशीष जैसे ही पार्षद के घर पर पहुंचा, तो ह्रदयेश और नीरज ने उस पर जानलेवा हमला कर दिया. गंभीर रूप से घायल आशीष ने किसी तरह भागकर अपनी जान बचाई. बाद में परिचितों को फोन कर उसने हमले की जानकारी दी. आशीष को पहले इलाज के लिए मेडिकल अस्पताल भर्ती किया गया. हालत बिगड़ने पर आशीष को जबलपुर अस्पताल रेफर किया गया.

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रिटायरमेंट का फैसला मेरा खुद का था, चुनाव लड़ने को ना किसी ने कहा ना ही रोका : यशवंत सिन्‍हा

: इंतजार कीजिए, अगले साल मेरी किताब बहुत कुछ कहेगी : पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने अनौपचारिक चर्चा में की अपने दिल की बातें : देश के वित्त व विदेश मंत्री रह चुके वरिष्ठ राजनेता यशवंत सिन्हा अब सार्वजनिक बात करने से थोड़ा परहेज करते हैं। उनकी शिकायत है कि जो वो कहते हैं, उससे लोगों में गलतफहमी ज्यादा हो जाती है। श्री सिन्हा का कहना है कि यह रिटायरमेंटउन्होंने खुद चुना है। इन दिनों वह अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं, जो साल भर में पाठकों के समक्ष होगी। इसलिए उनका कहना है कि- हमेशा मेरा कहना जरूरी नहीं, अब जो कहेगी मेरी किताब कहेगी।

इसी महीने 2 सितंबर की सुबह मैं नोएडा स्थित उनके निवास पर था। 4 साल पहले अपने शहर भिलाई पर मैंने जो किताब लिखी थी, उसमें सिन्हा दंपत्ति का भी इंटरव्यू था। तब से सिन्हा दंपत्ति से मुलाकात नहीं हो पाई थी। उस रोज यशवंत सिन्हा और उनकी पत्नी नीलिमा सिन्हा अनौपचारिक मूड में घर में थे। ऐसे में अलग-अलग कई मुद्दों पर हमारी बातचीत हुई। यशवंत सिन्हा किसी तरह का इंटरव्यू नहीं देना चाहते थे, इसलिए सारी बातें अनौपचारिक ही हुई। उस बातचीत का कुछ हिस्सा सवाल-जवाब की शक्ल में-

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आप मुख्यधारा की राजनीति से बिल्कुल दूर हो गए हैं, क्या यह आपका राजनीतिक वनवास है

यशवंत सिन्‍हा : इसे वनवास कहना ठीक नहीं। दरअसल यह एक तरह का रिटायरमेंट है, जिसे मैंने खुद चुना है। क्योंकि मेरा मानना है कि दो तरह की राजनीति में सक्रिय रह कर देशहित में कार्य किया जा सकता है। पहला तो आप सक्रिय राजनीति में रह कर चुनाव लड़ें और मंत्री या जनप्रतिनिधि रहते हुए योगदान दें और दूसरा किसी राजनीतिक दल अथवा संगठन में रहते हुए देश की चिंता करें। जैसा कि गांधी जी और जयप्रकाश जी ने करते हुए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई थी। हालांकि अभी मैं गांधी जी और जयप्रकाश जी वाली भूमिका से कुछ दूर हूं।

-..तो क्या 2014 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला आपका खुद का था

यशवंत सिन्‍हा : मुझे चुनाव लड़ने से न किसी ने रोका न ही किसी ने कोई प्रस्ताव दिया। जब उन्होंने (इशारा पार्टी के नीति निर्धारकों की तरफ) 75 साल से उपर वालों का नियम बनाया था तो मैंने उसके पहले ही तय कर लिया था कि अब संसदीय चुनाव नहीं लड़ूंगा और इस तरह 2014 में मैं अपनी परंपरागत सीट हजारीबाग (झारखंड) से उम्मीदवार नहीं था।

मोदी सरकार में मंत्री आपके सुपुत्र जयंत सिन्हा के कामकाज में आपका कितना मार्गदर्शन या दखल रहता है

यशवंत सिन्‍हा : बतौर मंत्री जयंत का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है और मैं नहीं समझता कि मुझे उन्हें इसमें किसी तरह का मार्गदर्शन देना चाहिए। हां, एक परिवार में जैसे पिता-पुत्र की बात होती है हमारे रिश्ते भी वैसे ही हैं। मंत्री के तौर पर जयंत क्या करते हैं, उसमें मेरा कोई दखल नहीं रहता लेकिन हजारीबाग के विकास को लेकर हमारी चर्चा जरूर होती है।

-आज केंद्र में भाजपा सरकार है और आप पूर्व में बाजपेयी सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुके हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दोनों सरकारों में भूमिका को लेकर क्या फर्क देखते हैं?

यश्‍वंत सिन्‍हा : आज की सरकार पर टिप्पणी करना मेरा मकसद नहीं है क्योंकि इससे गलतफहमी ज्यादा बढ़ जाती है। वैसे भी हम तो संघ के बाहर के हैं। इतना जरूर है कि तब (बाजपेयी सरकार के दौरान) हमारे वक्त में संघ तो हावी नहीं हो पाया था और ज्यादातर फैसलों में संघ के लोग हमारे विरोध में ही थे।

सार्वजनिक जीवन में अब कैसी सक्रियता या व्यस्तता रहती है

यशवंत सिन्‍हा : देखिए, अपने परंपरागत निर्वाचन क्षेत्र रहे हजारीबाग के लिए तो लगातार काम कर रहा हूं। पिछले साल वहां रेल नेटवर्क आ गया। यहां दिल्ली में टेलीविजन चैनलों के शाम के डिबेट में मैं जाता नहीं। क्योंकि आधे घंटे की चिल्लपो में आपको 2 मिनट बोलने का मौका मिलता है और उसमें भी एंकर हावी होने लगता है। इसलिए मैंने सभी चैनलों को साफ मना कर दिया है। पिछले साल हिंदी के एक बड़े अखबार ने मुझे साप्ताहिक कॉलम लिखने प्रस्ताव दिया था। तीन हफ्ते मैंने कॉलम लिखा भी। फिर मुझे लगा कि वह अखबार पत्रकारिता के मानदंडों पर खरा नहीं उतर रहा है तो मैंने वहां लिखना बंद कर दिया। अब सिर्फ एनडीटीवी के लिए हर हफ्ते ब्लॉग लिख रहा हू्ं।

कलराज मिश्र जैसे कुछेक अपवादों को छोड़ कर पार्टी के 75 पार वरिष्ठ नेताओं को मंत्री न सही राज्यपाल तो बनाया जा रहा है। क्या ऐसा कोई प्रस्ताव मौजूदा सरकार की ओर से आपको मिला

यशवंत सिन्‍हा : यह सवाल ही नहीं उठता। मुझे अपने फैसले खुद लेने की आदत है। राज्यपाल बनना होता तो 1990 में ही बन जाता। तब के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने एक रोज बुलाया और बोले -आपको पंजाब का राज्यपाल बना कर भेजना चाहते हैं। तब मैंने साफ मना कर दिया था। आज ऐसा कोई प्रस्ताव केंद्र सरकार की तरफ से नहीं आया और न ऐसा प्रस्ताव स्वीकार कर सकता हूं।

अगले साल राष्ट्रपति चुनाव को लेकर क्या उम्मीदें दिखाई देती हैं

यशवंत सिन्‍हा : प्रत्याशी तय करना उनका (केंद्र सरकार) फैसला है। मैंने अपनी लाइफ तय कर ली है। तो,ऐसी उम्मीदें मैं क्यों पालूं। हां, पार्टी के अंदर कुछ नाम जरूर सुन रहा हूं। जिनका मैं खुलासा नहीं कर सकता। हालांकि धारणा यह बन रही है कि जो चर्चा में नहीं है, ऐसा कोई नया नाम सामने आएगा।

पाकिस्तान को लेकर हमारे देश की नीति कैसी होनी चाहिए?

यशवंत सिन्‍हा : (मोदी सरकार पर टिप्पणी नहीं करने की शर्त पर उन्होंने कहा) मैं जनरल मुशर्रफ की जीवनी पढ़ रहा था, उसमें एक जगह वह लिखते हैं-इंडिया से वालीबॉल का मैच जीतने पर पाकिस्तान में जबरदस्त खुशी का माहौल था। तो दोनों देशों में खेल में हार-जीत पर खुश होने वाली स्थिति है। बहुत सी बातें ऐसी हैं कि जिनसे यह बार-बार जाहिर करने की कोशिश होती है कि पाकिस्तान हमारे बराबर का देश है। कश्मीर को लेकर अब तक हमारे देश में एक नीति नहीं रही है। अब तक जो भी प्रधानमंत्री आए, उन्होंने अपने अनुसार नीति बना ली।

देश की आर्थिक नीति और विदेश नीति से कितने संतुष्ट हैं

यशवंत सिन्‍हा : इन पर मेरा कुछ भी सार्वजनिक कहना ठीक नहीं।

राजनीतिक जीवन में इतने अनुभव के बाद अचानक चुप्पी को जनता क्या समझे

यशवंत सिन्‍हा : इसे चुप्पी न समझें। अपनी बायोग्राफी (आत्मकथा) लिख रहा हूं। अगले साल तक पूरी हो जाएगी। उसमें सारी बातें लिखूंगा। पब्लिशर से बात हो गई है। जरा इंतजार कीजिए।

छत्तीसगढ़, खास कर भिलाई से भी आपका रिश्ता रहा है, उसे कैसे बयां करेंगे

यशवंत सिन्‍हा : अब इस बात को पूरे 56 साल हो चुके हैं। (पत्नी नीलिमा सिन्हा की तरफ इशारा करते हुए) इनके पिता निर्मलचंद्र श्रीवास्तव जी भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के जनरल मैनेजर थे और वहीं भिलाई के डायरेक्टर बंगला में हमारी शादी हुई। अरसा बीत गया है लेकिन भिलाई की तरक्की की खबर मिलते रहती है। अब पुराने भिलाई वाली बात तो नहीं होगी वहां..? छत्तीसगढ़ तो पिछले 16 साल में काफी बदल गया है। केंद्र में मंत्री रहते हुए छत्तीसगढ़ आना हुआ था। नए राज्य की तरक्की की खबर सुन कर और जानकर अच्छा लगता है।

(पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन छत्तीसगढ़ भिलाई से हैं। उनकी भिलाई के अतीत से वर्तमान तक पर केंद्रित किताब भिलाई एक मिसालप्रकाशित हो चुकी है। उनसे मोबाइल नंबर 09425558442 पर संपर्क किया जा सकता है।

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स्वामी प्रसाद मौर्य का भाजपा में शामिल होना तय (देखें वीडियो)

ऐसा कहना है केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री राम शंकर कठेरिया का. बहुजन समाज पार्टी से नाता तोड़ने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य के बारे में कठेरिया ने कहा कि स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा में शामिल होंगे और बहुत जल्द शामिल होंगे. ताजनगरी आगरा में सेवला स्थित खत्ताघर का लोकापर्ण करने के बाद रामशंकर कठेरिया पत्रकारों से वार्ता कर रहे थे.

केंद्रीय मंत्री राम शंकर कठेरिया ने सपा और बसपा पर निशाना साधते हुए कहा कि सपा में भगदड़ मची हुई है और अंतर्कलह से अपने आप खत्म हो जाएगी. वहीं बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती पर रुपये लेकर टिकट देने का आरोप लगाते हुए कहा कि बहुजन समाज पार्टी में जो जाएगा उसे टिकट के लिए एक से पांच करोड़ रुपया देना पड़ेगा, इसलिए सब परेशान हैं और बसपा टूट जायेगी. उन्होंने कहा कि 2017 में यूपी में भाजपा की सरकार बनेगी.

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें:

https://youtu.be/ebu8eU8Ssnc

आगरा से syed shakeel की रिपोर्ट.

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इन हिन्दी चैनलों की बीजेपी से ‘दोस्ती’ हो गई है!

Nadim S. Akhter : टीवी पर देखकर आप तय कर सकते हैं कि किन-किन हिन्दी चैनलों की बीजेपी से ‘दोस्ती’ हो गई है और वे बेवजह कैराना मामले को जबरदस्त हाइप दे रहे हैं। खूब खबर चला रहे हैं, बहस-डिबेट करवा रहे हैं और उनकी कोशिश है कि कैराना मामले को जिंदा रखा जाए। बीजेपी को और क्या चाहिए, मनमांगी मुराद मिल रही है। बात ये नहीं है कि कैराना का फर्जी मामला उठाकर बीजेपी यूपी में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करना चाहती है। बात यहां पब्लिक परसेप्शन की है और झूठ को हर मंच से इतनी बार बोलो कि पब्लिक को ये सच लगने लगे। और बीजेपी के इस एजेंडे में कुछ हिन्दी चैनल उनका खूब साथ दे रहे हैं।

आश्चर्यजनक रूप से एनडीटीवी इंडिया जैसा प्रणव राय वाला चैनल भी कैराना मामले को खूब तूल दे रहा है। अब किसकी गर्दन कहां अटकी है ये मुझे नहीं पता, पर एनडीटीवी इंडिया में मुझे ये एक खास किस्म का शिफ्ट नजर आ रहा है। दूसरी बात। अगर कैराना मामले में जरा भी सच्चाई है तो प्रधानमंत्री और गृह मंत्री तो यूपी से ही सांसद हैं। क्यों नहीं वे दूध का दूध और पानी का शर्बत करने के लिए कोई केंद्रीय टीम कैराना भेजते या न्यायिक जांच ही करा लेते हैं?

कैराना में बीजेपी की टीम जांच करने क्यों गई है, ये समझ से परे और हास्यास्पद है। पीएम साहब और गृहमंत्री जी!! आप विपक्ष में नहीं सरकार में हैं। सो रूदाली रूदन बंद करिए और सरकार की तरह बिहेव करिए। सिर्फ टीवी पे बयानबाजी करके और अखिलेश यादव को कोस कर आपकी पार्टी क्या साबित करना चाहती है, ये पब्लिक अच्छे से समझ रही है। उसकी समझ को हल्के में ना लीजिएगा, अटलजी और प्रमोद महाजन के काल वाले इंडिया शाइनिंग का चीरहरण याद तो होगा ना आप लोगों को?

सो काम करिए और पब्लिक को बरगलाना छोड़िए। बिहार ने पहले ही बोलती बंद करवा दी है, अब यूपी में भी भद्द पिटवाएंगे क्या!!?? दोनों सहोदर हिन्दी बेल्ट है, जरा संभल के मोदी जी, अमित शहंशाह साहेब!!! मियां की जूती मियां के सिर वाली कहावत का मतलब तो जानते होंगे ना आपलोग!!!

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के एफबी वॉल से.

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कौन होगा यूपी भाजपा में सीएम पद का चेहरा, कई नाम खारिज तो कई नाम चर्चा में

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश फिर से चुनावी मुहाने पर खड़ा है। राजनीति के गलियारों से लेकर गॉव की चौपालों , शहरों के नुक्कड़ों तक पर हर कोई यही सवाल  पूछ रहा है कि कौन होगा यूपी का अगला सीएम। सीएम की दौड़ में कुछ पुराने चेहरे हैं तो कुछ नये चेहरों को भी सीएम पद का संभावित दावेदार समझा जा रहा है। सपा की तरफ से अखिलेश यादव और बसपा की ओर से मायावती की दावेदारी तो पक्की है ही। इसलिये सपा और बसपा में कहीं कोई उतावलापन नहीं है। चुनौती है तो भाजपा और कांग्रेस के सामने। इसमें भी बीजेपी की स्थिति काफी सोचनीय है। सीएम की कुर्सी के लिये भाजपा के संभावित दावेदारों में कई नाम शामिल हैं। दोंनो ही दलों ने अभी तक सीएम उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है।

कांग्रेस तो शायद ही सीएम उम्मीदवार के नाम की घोषणा करे, लेकिन भाजपा के बारे में कयास लगाया जा रहा है कि असम के नतीजों से उत्साहित बीजेपी आलाकमान इलाहाबाद में 12-13 जून को होने वाली कार्यसमिति की बैठक में यूपी के लिये सीएम का चेहरा सामने ला सकती है। बीजेपी की तरफ से करीब आधा दर्जन नेताओं के नाम बतौर सीएम उम्मीदवार चर्चा में हैं,लेकिन अंतिम फैसला पीएम मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को ही लेना है। इतना तय है कि भाजपा किसी विवादित छवि वाले नेता को सीएम के रूप में प्रोजेक्ट नहीं करेगी। इस बात का भी ध्यान रखा जायेगा कि सीएम की दौड़ में कोई ऐसा नेता भी आगे न किया जाये जिसके चलते एक वर्ग विशेष के वोटर बीजेपी के खिलाफ लामबंद हो जायें। हॉ, दिल्ली से सबक लेकर आलाकमान पार्टी से बाहर का कोई चेहरा सामने नहीं लायेगी।

भाजपा 14 वर्षो के अम्बे अंतराल के बाद पहली बार यूपी के विधान सभा चुनावों को लेकर उत्साहित दिखाई दे रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने से पहले तक गुटबाजी और टांग खिंचाई में जुटे प्रदेश नेताओं पर जब से दिल्ली आलाकमान की मजबूत पकड़ हुई है तब से हालात काफी बदल गये है। बीजेपी के प्रदेश नेताओं की हठधर्मी पर लगाम लगा दी गई है। सारे फैसले अब दिल्ली से लिये जा रहे हैं। बात-बात पर लड़ने वाले यूपी के नेतागण दिल्ली के फैसलों के खिलाफ चूं भी नहीं कर पाते हैं। आलाकमान प्रदेश स्तर के नेताओं की एक-एक गतिविधि पर नजर जमाये रहता है। कौन क्या कर रहा है। पल-पल की जानकारी दिल्ली पहुंच जाती है।असम क तरह यूपी में भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) विधान सभा चुनाव के लिये सियासी जमीन तैयार करने में जुटा है। बीजेपी नेताओं को इसी जमीन पर चुनावी फसल उगानी और काटनी होगी।

बात 2012 के विधान सभा चुनाव की कि जाये तो उस समय समाजवादी पार्टी को 29.13, बीएसपी को 25.91,बीजेपी को 15 और कांग्रेस को 11.65 प्रतिशत वोट मिले थे। इन वोटों के सहारे समाजवादी पार्टी 224, बसपा 80, भाजपा 47 और कांग्रेस 28 सीटों पर जीतने में सफल रही थी। दो वर्ष बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में स्थिति काफी बदल गई। मोदी लहर में सपा-बसपा और कांग्रेस सब उड़ गये। विधान सभा चुनाव के मुकाबले बीजेपी के वोट प्रतिशत में 27 प्रतिशत से अधिक का इजाफा हुआ और उसको 42.63 प्रतिशत वोट मिले। वहीं सपा के वोटों में करीब 07 प्रतिशत और बीएसपी के वोटों में 06 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई। कांग्रेस की स्थिति तो और भी बदत्तर रही। उसे 2012 के विधान सभा में मिले 11.65 प्रतिशत वोटों के मुकाबले मात्र 7.58 प्रतिशत वोटों पर ही संतोष करना पड़ा। वोट प्रतिशत में आये बदलाव  के कारण बसपा का खाता नहीं खुला वहीं समाजवादी पार्टी 05 और कांग्रेस 02 सीटों पर सिमट गई थी। बीजेपी गठबंबधन के खाते में 73 सींटे आईं जिसमें 71 बीजेपी की थीं और 02 सीटें उसकी सहयोगी अपना दल की थीं। इसी के बाद से बीजेपी के हौसले बुलंद हैं और वह यूपी में सत्ता हासिल करने का सपना देखने लगी है।

पहले तो बीजेपी आलाकमान मोदी के चेहरे को आगे करके यूपी फतह करने का मन बना रहे थे,परंतु बिहार के जख्मों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया और असम की जीत ने बीजेपी को आगे का रास्ता दिखाया। यह तय माना जा रहा है कि यूपी चुनाव में मोदी का उपयोग जरूरत से अधिक नहीं किया जायेगा। इसकी जगह स्थानीय नेताओं को महत्व दिया जायेगा। असम में सीएम का चेहरा प्रोजक्ट करके मैदान मारने और यूपी में भी इसी तर्ज पर आगे बढ़ने की बीजेपी आलाकमान की मंशा को भांप कर यूपी बीजेपी नेताओं के बीच यह चर्चा शुरू हों गई कि पार्टी किसे मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करेगी। कई नाम सामने भी आयेे हैं। मगर आलाकमान फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। उसे डर भी सता रहा है कि जिसको सीएम प्रत्याशी घोषित नहीं किया जायेगा वह विजय अभियान में रोड़ा बन सकता है। पार्टी के भीतर मौजूद तमाम तरह के सियासी समीकरण भाजपा नेतृत्व को इस मामले में आगे बढ़ने से रोक रहे हैं तो आलाकमान की बाहरी चिंता यह है कि वह चाहता है कि सीएम उम्मीदवार का चेहरा ऐसा होना चाहिए जो बसपा सुप्रीमो मायावती,सपा नेता और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से 19 न हो,लेकिन यूपी की सियासत में ऐसा कोई चेहरा दिख नहीं रहा है। यूपी में जो दमदार चेहरे से उसमे से कुछ उम्र दराज हो गये हैं तो कुछ दिल्ली की सियासत छोड़कर यूपी के दंगल में कूदने को तैयार नहीं हैं। बीजेपी की तरफ से जब सीएम का चेहरा आगे करने की बात सोची जाती है तो पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह का नाम सबसे पहले दिमाग में आता है। परंतु कल्याण सिंह के सक्रिय राजनीति से कट जाने और राजनाथ के मोदी सरकार में नंबर दो की हैसियत पर होने के कारण यूपी वापस आने की संभावनाएं बिल्कुल खत्म हो जाती हैं। मोदी सरकार के और और मंत्री कलराज मिश्र भी दिल्ली छोड़कर यूपी नहीं आना चाह रहे हैं। इसके बाद जो नाम बचते हैं उनको लेकर नेतृत्व के भीतर ही असमंजस है।

अतीत में भाजपा के यह नेता किस तरह से सिरफुटव्वल करते रहे हैं किसी से छिपा नहीं है। भाजपा के दिग्गज नेता और मोदी सरकार में मंत्री कलराज मिश्र तो 2002 में सार्वजिनक रूप से कह चुके हैं कि भाजपा के कुछ बड़े नेताओं में अब दूसरे की टांग खींचने की प्रवृत्ति काफी बढ़ गई है। ऐसी सोच रखने वाले कलराज अकेले नहीं हैं।  कौन होगा बीजेपी का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार के  सवाल पर भाजपा के कई प्रमुख नेता कहते हैं कि यूपी के चुनावी समर में भाजपा का मुकाबला बसपा नेत्री मायावती व सपा प्रमुख मुलायम सिंह और उनके पुत्र तथा मौजूदा सीएम अखिलेश यादव जैसे चेहरों से होगा, जिनका अपना जातीय वोट आधार है। भाजपा के पास इन चेहरों का जवाब यूपी में कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह कलराज मिश्र जैसे चेहरे ही हो सकते थे पर, तीनों इस समय दूसरी भूमिका छोड़कर उत्तर प्रदेश की चुनौती स्वीकर करने के लिये तब तक राजी नहीं होंगे जब तक कि आलाकमान उन पर दबाव नहीं बनायेगा (जो मुश्किल लगता है।)

बाकी जो नाम चर्चा में है उनमें उत्तर प्रदेश से संबंधित नामों में कोई ऐसा नहीं है जो अपनी छवि और पकड़ की बदौलत भाजपा की नैया पार लगा सके। स्मृति ईरानी जैसे बाहर के नेताओं का नाम भी सीएम के लिये चर्चा में है, लेकिन उन्हें आगे लाने के लिये भाजपा नेतृत्व को पहले यूपी के प्रमुख नेताओं के बीच उनके नाम पर सहमति बनानी होगी। आज की तारीख में भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में जो नाम चर्चा में हैं उसके साथ न तो मोदी जैसी उपलब्धियां जुड़ी हैं और न उसकी कोई पहचान ही हैं। ऐसे किसी नाम पर आलाकमान सहमति की मोहर लगा देता है तो संभावना इस बात की भी है कि यूपी के अन्य प्रमुख नेता कहीं हाथ पर हाथ रखकर बैठ न जाये। शायद यही वजह है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को कहना पड़ रहा है कि असम के प्रयोग को यूपी में दोहरानें के बारे में  उन्होनें अभी कुछ तय नहीं किया है। फिर भी जिन नामों की चर्चा चल रही है उनके बारे में जान लेना भी जरूरी है।

सबसे पहला नाम मौजूदा केन्द्रीय गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह का आता है। कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा घर के दरवाजें खुले रखने और लगातार संपर्क व संवाद रखने के कारण प्रदेश के कार्यकर्ताओं में राजनाथ सिंह की स्वीकार्यता है। उनमें प्रशासनिक क्षमता भी है। उनकें चेहरे को आगे करके चुनाव लड़ने से भाजपा को लाभ भी हो सकता हैं। राजनाथ के सहारे भाजपा सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट का हवाला देकर अगड़ों, अति पिछड़ों व अति दलितो को भी अपने पक्ष में मोड़ सकती है। अल्पसंख्यकों के बीच भी उनकी अ़च्छी छवि है। पर यह तभी संभव है जब राजनाथ खुद इस भूमिका के लिए तैयार हों।

केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी का भी नाम चर्चा में है,लेकिन उनका यूपी से बस इतना ही नाता है कि वह 2014 में अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ी थीं और इसके बाद स वह अमेठी में लगातार सक्रिय हैं। स्मृति पर पीएम मोदी को काफी भरोसा है। लोकसभा व राज्यसभा में कई मुद्द्ों पर उन्होंने विपक्ष पर ंजिस तरह तर्कों के साथ हमला बोला और इसके अलावा अमेठी में लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद उन्होनें जिस प्रकार से अपने निर्वाचन क्षेत्र से नाता जोड़कर रखा उससे यूपी में स्मृति ईरानी की लोकप्रियता बढ़ी हैै। लोग मान रहे हैं कि प्रदेश में मायावती जैसी नेत्री से मुकाबला करने के लिए ईरानी का प्रयोग ठीक रहेगा। इससे भाजपा महिलाओं के बीच पकड़ व पैठ बना सकेगी।

भाजपा का एक वर्ग वरूण गांधी में मुख्यमंत्री बनने की संभावना और क्षमता तलाश रहा है। एक तो गांधी परिवार की पृष्ठभूमि और दूसरे हिंदुत्व पर आक्रामक भाषा, लोगों को लगता है कि वरूण को आगे लाने से पार्टी कोे चुनाव में लाभ हो सकता है। वरूण को आगे करने से भाजपा को उस वोट का लाभ मिल सकता है जो चेहरा और माहौल देखकर वोट डालने का आदि है। पर वरूण को लेकर पार्टी के भीतर हिचकिचाहट भी है कि वह  पार्टी के साथ तालमेल बैठाकर कितना काम करेंगे। लोकसभा चुनाव के समय वरूण गांधी अन्य नेताओं से इत्तर मोदी से दूरी बनाकर चले थे,जिस पर काफी चर्चा भी हुई थी। आज भी वरूण गांधी पीएम मोदी की गुड लिस्ट में नहीं हैं।

भाजपा अगर वोंटों के ध्रवीकरण के सहारे चुनाव मैदान में उतरना चाहेगी तो मंहत आदित्यनाथ भी एक चेहरा हो सकते हैं। आदित्यनाथ की एक तो हिंदुत्ववादी छवि है। साथ ही उन्होनें पिछले कुछ वर्षो से पूर्वांचल में मल्लाह, निषाद, कोछी, कुर्मी, कुम्हार, तेली जैसी अति पिछड़ी जातियों और धानुक,पासी, वाल्मीकी जैसी तमाम अति दलित जातियों में पकड़ मजबूत की है। पर भाजपा में इस बात को लेकर असमंजस है कि उन्हें सीएम का चेहरा घोषित करने से मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण न हो जाए। यही समस्या वरूण गांधी के साथ भी है। 2009 के लोकसभा चुनाव के समय पीलीभीत में दिया गया उनका विवादित भाषण आज भी मुस्लिमों की जुबान पर रहता है।

अगर भाजपा किसी अगड़े और उसमें भी किसी ब्राहमण चेहरे को सीएम का प्रत्याशी घोषित करना चाहेगी तो डा0 दिनेश शर्मा और कलराज मिश्र का नाम सबसे आगे हो सकता है। दिनेश शर्मा दो कार्यकाल से राजंधानी के महापौर है। भाजपा के सांगठनिक ढांचे में भी कई पदों पर काम कर चुके है। इस समय पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है। आम लोगों के बीच उनकी छवि व साख ठीक-ठाक है। सरल हैं और लोगों को आसानी से उपलब्ध भी है। प्रदेश भर के कार्यकर्ताओं से भी उनका संपर्क व संवाद है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रिय लोगों में शुमार होते हैं। डॉ. दिनेश शर्मा का नाम भी बतौर भावी मुख्यमंत्री उम्मीदवार चर्चा में शमिल रहा हैं। पर, सूबे का जातीय गणित उनके लिये पूरी तरह से अनुकूल नहीं बैठ रहा है। बात कलराज मिश्र की कि जाये तो वह प्रदेश में लंबे समय तक संगठन का नेतृत्व कर चुके है। लखनऊ के विधायक रह चुके हैं। सरलता और कार्यकर्ताओं से सतत संवाद व संपर्क के कारण पार्टी कार्यकर्ताओं में लोकप्रिय भी है। उनका चेहरा आगे करके चुनाव लड़ने से भी भाजपा को फायदा हो सकता है।

लब्बोलुआब यह है कि भाजपा आलाकमान को यूपी का सीएम प्रत्यााशी घोषित करने में पहाड़ जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। उसके हाथ बंधे होंगे,लेकिन दिमाग खुला रखना होगा। प्रदेश भाजपा में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो चुनाव जीतने की कूबत भले न रखते हों लेकिन किसी को चुनाव हराने में इन्हें महारथ हासिल है। यह नजारा अतीत में कई बार देखने को मिल भी चुका है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क उनके मोबाइल नंबर 9335566111 के जरिए किया जा सकता है.

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यूपी के वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार के मुताबिक नए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को गुनाहगारों की लिस्ट में नहीं खड़ा किया जा सकता

अजय कुमार, लखनऊ

भारतीय नववर्ष के पहले ही दिन उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी को अपना नया हाकिम मिल गया। यूपी में अगले साल होने वालो विधान सभा चुनाव में कमल खिलाने की जिम्मेदारी भाजपा आलाकमान ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की सहमति के बाद कट्टर हिन्दूवादी छवि वाले नेता और सांसद केशव प्रसाद मौर्य पर डालकर बड़ा दांव चल दिया है। अति पिछड़ा वगै से आने वाले केशव के उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनते ही यूपी की सियासी पारा एकदम से बढ़ना स्वभाविक था और ऐसा ही हुआ। कांग्रेस, सपा और बसपा एक तरफ केशव की कुंडली खंगाल रहे हैं तो दूसरी ओर उनकी ताजपोशी से होने वाले नफा-नुकसान का भी आकलन भी इन दलों द्वारा किया जा रहा है।

केशव को सूबे की कमान सौंपे जाते ही यह साफ हो गया है कि दिल्ली-बिहार में सियासी प्रयोग का खामियाजा भुगत चूकी भाजपा यूपी में ऐसी गलती नहीं करना चाहती है। वह यूपी की सत्ता हासिल करने के लिये उन्हीं तौर-तरीकों को अजमायेगी जिस पर कांग्रेस से लेकर सपा, बसपा और अन्य छोर्ट-छोटे दल दशकों से चले आ रहे हैं। भाजपा आलाकमान ने संकेत दे दिया है कि वह 55 प्रतिशत पिछड़ों-अति पिछड़ों को लुभाने के लिये सपा-बसपा और कांग्रेस को कांटे की टक्कर देगी। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की संसदीय सीट पर पहली बार कमल खिलाने वाले केशव प्रसाद मौर्य का यूपी भाजपा अध्यक्ष बनना काफी आश्चर्यजनक रहा। वह यूपी का प्रदेश अध्यक्ष बनने के इच्छुक नेताओं की दौड़ में सबसे पीछे चल रहे थे, लेकिन अचानक ऐसे समीकरण बदले की र्मार्य सबसे आगे हो गये।

केशव के चयन का हिसाब-किताब लगाया जाये तो  आलाकमान को उनकी संघ से उनकी करीबी,पिछड़ा चेहरा, कट्टर हिन्दुत्व और भगवा छवि काफी रास आया। केशव ऐसे नेता हैं जो भले ही राम मंदिर की बात नहीं करेंगे,लेकिन लम्बे समय तक राम आंदोलन से रहा उनका जुड़ाव लोंगो को याद आता रहेगा। इसी तरह भले ही नये भाजपा अध्यक्ष अपनी कट्टर हिन्दुत्व और भगवा छवि का प्रचार करने से बचेंगे, मगर सियासी पिच पर वह कई बार हिन्दू समाज के हितों की रक्षा करने के लिये कर्णधार की भूमिका में नजर आ चुके हैं, जिसे कोई भूलेगा नहीं। पिछड़ा चेहरा तो हैं ही। केशव भाजपा के उस वोट बैंक को वापस ला सकते हैं जो पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के कमजोर पड़ने के कारण पार्टी से दूर चला गया था। ओम प्रकाश सिंह की निष्क्रियता के कारण उनकी पकड़ वाला वोट बैंक भी जो भाजपा से दूर चला गया था, केशव प्रसाद के अध्यक्ष बनने  से वापस आ सकता है।

नवनिुयक्त अध्यक्ष को सियासी रीति-रिवाजों के अनुसार नई पीढ़ी का नेता भी माना जा सकता है।उम्र के हिसाब से केशव और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के बीच कोई खास अंतर नहीं है।छात्रों के बीच सक्रियता और छात्र राजनीति से उनका लगाव कई मौको पर उजागर हो चुका है। केशव प्रसाद भले ही प्रदेश की कमान संभालने वाले 12 वें भाजपा नेता हो,लेकिन पिछड़ा समाज से आकर प्रदेश की कमान संभालने वाले वह चौथे नेता हैं। इससे पूर्व कल्याण सिंह, ओम प्रकाश सिंह और विनय कटियार प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रह चुके हैं। केशव के खिलाफ विरोधी यह प्रचार कर सकते हैं कि उनके ऊपर कई आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं, मगर ऐसा करते समय विपक्ष को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि कहीं यह दांव उलटा न पड़ जाये। केशव पर ज्यादातर मुकदमें ऐसे दर्ज है जिनका संबंध उनके (भाजपा) वोट बैंक की मजबूती से जुड़ा है। एक वर्ग विशेष को खुश करने वाली सपा, बसपा सरकारों और कांग्रेस की कथित धर्मरिपेक्षता के खिलाफ उन्होंने कई बार सड़क पर आकर संघर्ष किया है। इस वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा और मुकदमें भी दर्ज हुए, लेकिन आज तक किसी मुकदमें में फैसला नहीं आ पाया है। इसलिये उन्हें गुनाहगारों की लिस्ट में नहीं खड़ा किया जा सकता है।

लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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अवसरवादी भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अदभुत डांस… देखें ये पांच वीडियो…

Yashwant Singh : भजपइये पूरे बकलोल होते हैं क्या… यार, मंदिर में कोई नेक कार्यक्रम कराने जा रहे हो तो मंत्री जी खातिर भीड़ जुटाने के वास्ते बार बालाओं का डांस क्यों करा दिया? क्या अब जनता को बुलाने जोड़ने के लिए यही तरीका बच गया है? क्या वाकई जमीनी लोकप्रियता भाजपा की खत्म हो चुकी है जो भीड़ दिखाने के लिए ठुमके लगवाने का ही आप्शन शेष रहा… खैर, मजा आप लोग भी लो…

अवसरवादी भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अदभुत डांस… देखें ये पांच वीडियो… यूपी के बलिया में मंदिर परिसर के अंदर बनी गौशाला में तैयार मंच पर बारबालाओं के खूब ठुमके लगे. केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के लिए ये मंच सजा था. भीड़ गायब न हो जाए इसलिए बार बालाओं का डांस जमकर चालू रहा. गिरिराज ज्यों आए, बार बालाओं को गायब कर दिया गया. उसके बाद गिरिराज जी ने मुर्गी पालन से लेकर गोपालन तक की बात करते हुए नेहरू से लेकर पाकिस्तान और मीडिया तक को कोसा गरियाया… वो ज्यों गए फिर चालू हो गया बार बालाओं का डांस. कहने वालों ने कहा- अदभुत है अवसरवादी भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का डांस!

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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https://www.youtube.com/watch?v=vesiRxDdJD0

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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पेशे व योग्यता से शेयर ब्रोकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भावनाओं से खेलने में उस्ताद हैं

Anil Singh :  राजनीति के दल्ले कहीं के! संसदीय राजनीति हो या मकान की खरीद, शेयर बाज़ार या किसी चीज़ की मंडी, दलाल, ब्रोकर या बिचौलिए लोगों की भावनाओं को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। राजनीति में सेवा-भाव ही प्रधान होना चाहिए था। लेकिन यहां भी भावनाओं के ताप पर पार्टी या व्यक्तिगत स्वार्थ की रोटियां सेंकी जाती हैं। इसीलिए इसमें वैसे ही लोग सफल भी होते हैं।

जैसे, भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह पेशे व योग्यता से शेयर ब्रोकर हैं। पूर्णकालिक राजनीति में उतरने से पहले वे पीवीसी पाइप का धंधा करते थे। मनसा (गुजरात) में उनका करोड़ों का पैतृक निवास और घनघोर संपत्ति है। मां-बाप बहुत सारी ब्लूचिप कंपनियों के शेयर उनके लिए छोड़कर गए हैं।

भावनाओं से खेलने में अमित शाह उस्ताद हैं। अयोध्या में राम मंदिर की शिलाएं भेजने में वे सबसे आगे रहे हैं। 2002 में गोधरा से कारसेवकों के शव वे ही अहमदाबाद लेकर आए थे। सोमनाथ मंदिर के वे ट्रस्टी हैं। बताते हैं कि उनके बहुत सारे मुस्लिम मित्र हैं। अहमदाबाद के सबसे खास-म-खास मुल्ला तो उनके अभिन्न पारिवारिक मित्र हैं। उनके साथ वे शाकाहारी भोजन करते रहते हैं, लेकिन इस बाबत वे सार्वजनिक तौर पर बात नहीं करते।

कांग्रेस तो ऊपर से नीचे तक दलालों की ही पार्टी हैं। भाजपा, कांग्रेस, सपा व बसपा जैसी तमाम पार्टियों के नेतागण समझते हैं कि भारतीय अवाम को भावनाओं और चंद टुकड़ों के दम पर नचाया जा सकता है। चर्चा है कि जब प्रधानमंत्री मोदी से कुछ लोगों ने कहा कि आपकी छवि इधर खराब होती जा रही है तो उनका कहना था कि आखिरी दो साल (2017 से 2019) में सब संभाल लेंगे और उनकी यह रणनीति गुजरात में सफल होती रही है। लेकिन इन तमाम नेताओं को जनता की तरफ से रोहित बेमुला की मां राधिका ने बहुत सही जवाब दिया है।

सरकार की तरफ से दिए जा रहे 8 लाख रुपए को ठुकराते हुए इस 49 साल की स्वाभिमानी महिला ने कहा, “हमें तुम्हारे पैसे नहीं चाहिए। आठ लाख क्या, तुम आठ करोड़ रुपए भी दोंगे तो हमें नहीं चाहिए। मुझे बस इतना बता दो कि मेरा बेटा क्यों मरा?”

राधिका वेमुला का यह भी कहना था, “जब निर्भया नाम की लड़की से नृशंस बलात्कार व हत्या हुई, तब क्या किसी ने उसकी जाति पूछी थी? फिर रोहित की जाति पर क्यों सवाल उठाए जा रहे हैं?” मालूम हो कि रोहित की जाति पर पहला सवाल मोदी सरकार की चहेती मंत्री व अभिनेत्री स्मृति ईरानी ने बाकायदा प्रेस कॉन्फरेंस करके उठाया था। मोदी ने रोहित को ‘मां भारती का लाल’ कह कर जनभावना का दोहन करने की कोशिश की है। लेकिन हमें भी राधिका बेमुला की तरह आगे बढ़कर जवाब देना चाहिए – भावनाओं की दुकान कहीं और जाकर खेलो, अब हम तुम्हारे झांसे में आनेवाले नहीं हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और अर्थकाम डाट काम के संपादक अनिल सिंह के फेसबुक वॉल से.

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सावधान, भाजपा राज में मिमिक्री करने वाले जेल जाएंगे, कॉमेडियन किकू शारदा गिरफ्तार

खबर है कि टीवी कलाकार कीकू को गुरुमीत राम रहीम की नकल (मिमिक्री ) उतारने के ले IPC की धारा 295 A के तहत धार्मिक भावनाएं आहत करने के अपराध में गिरफ्तार कर लिया गया है. यह वही गुरमीत है जो खुद गुरु गोविंदसिंह का वेश धारण करता है. तब इसके भक्तों को मोतियाबिंद हो गया था शायद. गुरमीत कब से और कौन से धर्म का ठेकेदार बन गया है भई? या २०१४ के आम चुनाव में भाजपा को समर्थन देने के एवज में ‘धर्म के ठेकेदार’ की पदवी मिली है?

साध्वी संध्या जैन के फेसबुक वॉल से.

महाराष्ट्र की सहिष्णु भाजपा सरकार ने कॉमेडियन किकू शारदा को अपने समर्थकों को बधिया करने जैसे तमाम आरोप झेल रहे बाबा राम रहीम की मिमिक्री करने के जुर्म में गिरफ्तार किया। उम्मीद है उसकी इस करतूत से पंजाब की सहिष्णु भाजपा-अकाली सरकार को डेरा सच्चा सौदा का समर्थन लेने में मदद मिलेगी।  Maharashtra’s tolerant BJP govt arrests Actor Kiku Sharda for mimicking controversial Godman Ram Rahim (accused, among othher things, of castrating his followers). Move expected to help Punjab’s tolerant BJP-Akali govt get Dera’s support, something it desperately needs!

मानवाधिकारवादी समर अनार्या के फेसबुक वॉल से.

BJP Govt Haryana arrests Comedian Kiku Sharda for doing mimicry on Baba Gurmeet Ram Rahim. Mimicry not allowed?

वरिष्ठ पत्रकार Vinod Mehta का ट्वीट

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आज छपी इन तीन खबरों के जरिए जानिए भाजपा का चाल, चरित्र और चेहरा

Anil Singh : तीन खबरों में चाल-चरित्र और चेहरा! आज छपी तीन खबरें जो सरकार के चाल-चरित्र व चेहरे को समझने के लिए काफी हैं। एक, उत्तर प्रदेश के शामली कस्बे में एक मुस्लिम युवक का चेहरा कालिख से पोतकर सड़क पर जमकर पीटनेवाले बजरंग दल के जेल में बंद नेता विवेक प्रेमी पर लगा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश पर हटा लिया गया।

दो, महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों में प्रशिक्षण के लिए किसानों से स्वैच्छिक अनुदान में मिले धन को राज्य की भाजपा सरकार ने किसानों पर न खर्च करके अपने कर्मचारियों के वेतन में लगा डाला।

तीन, प्रवर्तन निदेशालय ने सुषमा स्वराज के पारिवारिक मित्र और अरुण जेटली के सह-क्रिकेट प्रशासक ललित मोदी की जांच के लिए सिंगापुर की सरकार को कानूनी रूप से इतना अस्पष्ट और लचर पत्र लिखा था कि सिंगापुर सरकार को कहना पड़ा कि आप नियम तोड़ने के मामले साफ-साफ बताएं, तभी तो हम कुछ मदद कर सकते हैं।

इंडियन एक्सप्रेस के 7 जनवरी के मुंबई संस्करण में ये खबरें प्रमुखता से छपी हैं.

मुंबई में रह रहे वरिष्ठ पत्रकार और अर्थकाम डॉट कॉम पोर्टल के संपादक अनिल सिंह के फेसबुक वॉल से.

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भाजपा और कांग्रेस दोनों अपराधी पार्टियां : जस्टिस काटजू

Markandey Katju : Criminal Organizations… I regard the Congress and the BJP as criminal organizations. In 1984 that criminal gangster Indira Gandhi, who imposed a fake ‘ Emergency’ in 1975 in India in order to hold on to power after she had been declared guilty of corrupt election practices by the Allahabad High Court, an ‘ Emergency in which even the right to life was suspended, and lacs of Indians were falsely imprisoned, was assassinated.

As a reaction, the Congress Party led by Rajiv Gandhi organized a slaughter of thousands of innocent Sikhs, many of whom were burnt alive by pouring petrol or kerosene on them and setting them on fire. When there were protests against this horrendous crime, Rajiv Gandhi said ‘ jab bada ped girta hai, dharti hil jaati hai’ (when a big tree falls, the earth shakes). It is believed that he gave oral instructions to the police not to interfere with the massacres for 3 days (see my blog ‘The 1984 Sikh riots’).

Soon after these horrible massacres, elections to the Lok Sabha was declared, and Congress swept the polls on this emotional wave winning a record 404seats in the 532 seat Lok Sabha, while BJP won only 2 seats.

In 2002 the massacre of Muslims was organized in Gujarat by BJP led by our friend, and the result was that BJP has been regularly winning the Gujarat elections ever since, and has even won the Lok Sabha elections in 2014.

So the message which has been sent is loud and clear : organize massacre of some minority in India, and you will sweep the polls. Never mind how much misery you cause to many people.

Are not the Congress and BJP, and even many smaller political parties, which are responsible for horrible deeds and for systematically looting the country of a huge amount of money for decades, and for causing such terrible sufferings and misery to the people, criminal organizations, most of whose members deserve the gallows?

देश के शीर्षस्थ चर्चित न्यायाधीश रहे और अपनी बेबाक बयानी व बेबाक लेखनी के लिए विख्यात जस्टिस मार्कंडेय काटजू के फेसबुक वॉल से.

जस्टिस काटजू साहब का लिखा ये भी पढ़ें>

Great Injustice to Urdu in India

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भारत में क्रांति के लिए माहौल तैयार… वजह गिना रहे हैं जस्टिस काटजू

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मुलायम से पंगा लेने वाले आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर की पत्नी नूतन ठाकुर भाजपा में शामिल होंगी

मैंने आज भाजपा में शामिल होने का फैसला लिया है. राजनीति में आने के मेरे फैसले का मुख्य कारण है कि मैंने अपने सामाजिक कार्यों के दौरान यह अनुभव किया कि वृहत्तर स्तर पर समाज की सेवा कर पाने और अधिक प्रभाव के सामने अपनी बात रख पाने के लिए एक राजनैतिक पार्टी के मजबूत संबल की बहुत अधिक जरुरत है. भाजपा में शामिल होने के मुख्य कारण यह हैं कि इस पार्टी में वंशवाद नहीं है, इसमें सर्वाधिक आतंरिक प्रजातंत्र है, यह विभिन्न वगों में विभेद नहीं करता है, एक अखिल भारतीय पार्टी है और राष्ट्रीयता की भावना पर आधारित है. जल्द ही मैं औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता ग्रहण करुँगी.

Today I have decided to join BJP. The main reason for my joining politics is that I have understood during my social activities that there is an immense need for support of a strong political party to work more effectively and efficiently for the larger social goals. The reasons for joining BJP are that it does not have any dynastic politics, has the highest inner democracy, it does not discriminate between different classes, is an all India Party and is based on the concept of Nationality. Very soon I shall be taking formal membership of the Party.

यूपी कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर की पत्नी डॉ नूतन ठाकुर के फेसबुक वॉल से.

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भाजपा जिलाध्यक्ष टिकट देने के लिए दो लाख रुपये रिश्वत मांग रहा (सुनें टेप)

घटना उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की है. BJP जिलाध्यक्ष जगदीश तिवारी ने एक व्यक्ति से टिकट दिलाने के बदले दो लाख रुपये रिश्वत मांगा था. घूस की उनकी बातचीत का ऑडियो वायरल हो गया है. इसके बाद भाजपा ने जगदीश तिवारी को पद से हटा दिया.

भाजपा जिलाध्यक्ष जगदीश तिवारी को पदमुक्त कर उनकी जगह उदयन पालीवाल को प्रभारी जिलाध्यक्ष बनाया गया है. टेप सुनने के लिए इस यूट्यूब लिंक पर क्लिक करें : https://www.youtube.com/watch?v=0ZppDeDRRQs

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‘भारतीय जुमला पार्टी’ का ‘शवराज’ हाय हाय : शीतल पी सिंह

मध्य प्रदेश में भारतीय जुमला पार्टी ने हर क़िस्म की सार्वजनिक राजनैतिक नैतिकता की धज्जियाँ उड़ा कर सत्ता क़ायम कर रक्खी है ।

वहाँ एक ऐसे सज्जन को राज्यपाल पद पर सुशोभित कर रक्खा है जिन पर ख़ुद व्यापम घोटाले में संलिप्तता का आरोप/संदेह/पारिवारिक भागीदारी के तथ्य मौजूद हैं । उनके बेटे पर आरोप थे और उसने भी संदिग्ध ढंग से आत्महत्या कर ली थी। राज्यपाल महोदय कांग्रेस के ज़माने में इस पद पर लाये गये थे पर बीजेपी के रत्न में बदल गये हैं जैसे नसीब तंग !

आरोप और तथ्य बरसों से मुख्यमंत्री शवराज के परिजन (पत्नी ) और मुख्यमंत्री के आवास के फ़ोन नं के लगातार स्तेमाल की गाथा गा रहे हैं पर कान पर जूँ रेंगने को तैयार नहीं !

लगता ही नहीं कि यह किसी जवाबदेह राष्ट्रीय पार्टी के राज्य का मसला है !

अब जब इस कांड की बदबू लंकाकांड की तरह मध्यप्रदेश की बाउंड्री लाँघ देश विदेश में सड़ रही है तब भी “पार्टी विद डिफरेन्स” नानसेन्स मोड में ही विद्यमान है ।

देश के सवर्ण तबक़ों का बड़ा हिस्सा भाजपा की वकालत करना धरम मानता रहा है। जिन ४६ लोगों की व्यापम ने अब तक बलि ली है उनमें ९०% सवर्ण ही हैं अब इस पर उनकी बोलती भी बन्द है ।

बोलती तो मेरी भी बन्द है , समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ ? ये जो कुछ जैसे जहाँ तक हो रहा है उसकी सिर्फ़ व्याख्या करने पर ख़ुद से ख़ुद को शर्म आ रही है !

शवराज हाय हाय

शीतल पी सिंह के एफबी वाल से

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भाजपा के आईटी सेल ने नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया समर्थकों में कराया दो-फाड़!

Sharad Tripathi : नरेंद्र मोदी के सर्वाधिक मजबूत गढ़ “सोशल मीडिया” पर पार्टी के भीतर से ही अबतक का सबसे बड़ा और सफल हमला. हमले में पार्टी के IT CELL गैंग ने निभायी निर्णायक और महत्वपूर्ण भूमिका. केंद्र में सत्तारूढ़ होते ही दिल्ली के “अंधाधुंध” भाजपाई दरबार में कैसे कैसे गधे पंजीरी खा रहे हैं और कैसे कैसे बंदरों के हाथों में किस किस तरह के उस्तरे चमक रहे हैं इसका सर्वाधिक शर्मनाक उदाहरण दो दिन पूर्व सामने आया है.

वैसे तो मैं इसको काफी समय से पूरी तरह अनदेखा कर रहा था. तटस्थ था और इसपर कुछ भी नहीं लिख रहा था. लेकिन कल जब इनके हौसले इतनी बुलंदी पर पहुंचे की इनकी जयचंदी/विभीषणी फ़ौज़ ने आप और हम जैसे लाखों मोदी समर्थकों को सार्वजनिक रूप से “अयोग्य मूर्खों” की संज्ञा देकर सोशल मीडिया के मंचों पर हमारी आपकी खिल्ली उड़ाना प्रारम्भ की तो मुझे लगा कि अब चुप्पी तोड़नी ही होगी तथा सोशल मीडिया में निस्वार्थ भाव से देशहित में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में अपनी अपनी शैली में अपनी अपनी क्षमतानुसार यथासम्भव योगदान कर रहे लाखों राष्ट्रवादियों की कलम/कीबोर्ड/विचारों का ठेकेदार होने का दावा कर रहे गधों और बंदरों की फ़ौज़ का चेहरा भी बेनकाब करना ही होगा.

दो दिन पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निवास पर उनसे 150 उन लोगों की भेंट करायी गयी जो सोशल मीडिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हैं. इन 150 लोगों की लिस्ट तैयार की थी पार्टी के IT CELL ने. यहाँ तक कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था. लिस्ट का पैमाना क्या था, वो कौन लोग थे.? सरीखे प्रश्न भी अप्रासंगिक थे क्योंकि सोशल मीडिया में जिस नेता के करोड़ों प्रशंसक समर्थक हों और उनमे से केवल डेढ़ दो सौ लोगों को चुनना हो तो. जाहिर सी बात है कि बहुत से उन लोगों को धैर्य रखना ही होगा जिनको नहीं चुना गया हो. क्योंकि यदि वो चले जाते तो उनके जैसा कोई और छूट जाता. अतः कौन बुलाया गया किस आधार पर क्यों बुलाया गया सरीखे प्रश्न कोई मायने नहीं रखते.

किन्तु प्रधानमंत्री से मिलने के बाद उन 150 लोगों ने सोशल मीडिया पर जब अपनी मूर्खता धूर्तता और उदण्डता का नंगा नाच शुरू किया तो उपरोक्त सभी प्रश्न अत्यधिक प्रासंगिक हो गए तथा उन 150 लोगों का चयन तथा उन्हें चुनने वाले IT CELL के ठेकेदारों की नीयत और नीति संगीन सवालों के घेरे में आ गयी. प्रधानमंत्री से मिलने के बाद बुरी तरह बौराये उन 150 लोगों ने सोशल मीडिया में ट्विटर और फेसबुक पर खुद का महिमा मंडन ‪#‎SUPER150‬ के साथ इस प्रकार करना प्रारम्भ किया मानो केवल वो डेढ़ सौ लोग सुपर हैं शेष करोड़ों समर्थक लुल्ल हैं. किन्तु पार्टी के IT CELL के इन VVIP गुर्गों की मूर्खता धूर्तता और उदण्डता की सुनामी इतने पर ही शांत नहीं हुई. इन लोगों ने उन करोड़ों मोदी समर्थकों को non deserving foolsअर्थात वे “मूर्ख” जो उस भेंट के “योग्य” नहीं थे, कहकर उनपर कीचड़ उछालना/उन्हें अपमानित करना शुरू किया.

अपने इन VVIP गुर्गों की इस करतूत/कुकर्म के खिलाफ बोलने के बजाय BJP IT CELL के ठेकेदारों ने शातिर चुप्पी साधे रखी, और झगड़े की आग भड़कने दी. उनकी इस करतूत ने शेष समर्थकों के धैर्य की सारी हदें ध्वस्त कर दी थी अतः जवाब में शुरू हुई जोरदार जूतांजलि से 150 VVIP मूर्खों की फ़ौज़ थर्रा उठा थी. परिणामस्वरूप उसकी तरफ से तत्काल एक फूहड़ और बचकानी सफाई दी गयी कि non deserving fools हम खुद अपने लिए कह रहे हैं. लेकिन देर हो चुकी थी, लकीरें खिंच गयी थीं. और मोदी के सबसे मजबूत गढ़ सोशल मीडिया में सबसे तगड़ा हमला कर उसके समर्थकों को आपस में लड़वा कर मोदी के सबसे मजबूत दुर्ग की दीवारों में दरारे डालने का BJP IT CELL का षड्यंत्र पूरी तरह सफल हो चुका था. इस काम की सुपारी उसे किसने दी.? जाँच इसकी होनी चाहिए. समर्थक अभी भी आपस में जूझ रहे हैं.

अब जानिये उन लोगों को, उनकी कर्मठता कर्तव्य परायणता और दायित्व निर्वहन के सच को जिन्होंने 150 लोगों को मोदी समर्थक होने के प्रमाणपत्र जारी किये थे कि कौन 150 सौ लोग मोदी समर्थक हैं कौन नहीं… BJP IT CELL के देश भर के ठेकदार हैं अरविन्द गुप्ता. इनकी गिनती अरबपति नेताओं में होती है. ये उसी नईदिल्ली विधानसभा के जोरबाग इलाके में रहते हैं जिस नयी दिल्ली विधानसभा सीट से अरविन्द केजरीवाल 32 हज़ार वोटों से अधिक की प्रचंड शर्मनाक पराजय की कालिख BJP के मुंह पर पोतकर दिल्ली का CM बना है. अब इसके बाद गुप्ता जी की कर्मठता कर्तव्य परायणता और दायित्व निर्वहन के सच के बारे में कुछ कहना बेकार ही है.

इस लिस्ट के लिए समर्थक होने का प्रमाणपत्र जारी करनेवाला दूसरा नाम है विकास पाण्डेय. इनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक योग्यता यह है कि, यह एक भाजपा नेता के सुपुत्र हैं इसीलिए पूरे देश में सोशल मीडिया में कौन मोदी समर्थक है कौन नहीं इसका प्रमाणपत्र बाँटने का ठेका पार्टी ने इनको सौंप रखा है. इनके विषय में ज्यादा कुछ लिखने कहने के बजाय बस इतना कहूँगा कि एकबार खुद इनकी अपनी टाइमलाइन पर नज़र जरूर डालिये. फिर खुद फैसला करिये.

#‎narendramodi‬ #‎AmitShah‬

कई मीडिया हाउसों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके मेरठ निवासी शरद त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से.

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सीएम अरविंद केजरीवाल के टीवी विज्ञापन पर भाजपा का प्रहार, सुप्रीम कोर्ट जाने की धमकी

इन दिनों टीवी पर केजरीवाल सरकार का एक ऐड चल रहा है जिसमें अरविंद केजरीवाल को छोड़ कर बाकी सभी नेताओं को बेईमान बताया जा रहा है। विज्ञापन को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का ‘उल्लंघन’ करार देते हुए भाजपा ने धमकी दी है कि अगर इसे तुरंत नहीं हटाया गया तो वह सुप्रीम कोर्ट जाएगी। केजरीवाल सरकार विज्ञापन पर पैसे की बर्बादी कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने एक फैसले में कहा था कि सरकारी विज्ञापनों में मुख्‍यमंत्री, मंत्री, गवर्नर समेत किसी नेता की तस्वीर नहीं लगा सकते। सरकारी विज्ञापनों पर केवल प्रधानमंत्री, राष्‍ट्रपति और सीजेआई की तस्‍वीर लग सकती है। विज्ञापनों में इन तीनों की तस्‍वीर तभी लगाई जा सकती है, जब वे खुद इसकी जवाबदेही लेंगे।

भाजपा के राष्ट्रीय सचिव आर. पी. सिंह ने शनिवार को एक बयान में कहा, “हालांकि, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का चेहरा नहीं दिखाया जा रहा रहा है, लेकिन बार-बार उनका नाम लेकर उन्हें ‘गरीबों का मसीहा’ बताने की कोशिश की जा रही है। जबकि अन्य दलों के नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और मीडिया को खलनायक की तरह पेश किया जा रहा है। ‘आप’ का यह ऐड सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। बीजेपी नेता जीवीएल नरसिम्हा राव ने कहा कि नेशनल टीवी पर ‘आप’ सरकार का ऐड झूठ से भरा है। अरविंद केजरीवाल के पास सफाई कर्मचारियों को सैलरी देने के लिए पैसा नहीं है, लेकिन असंवैधानिक तरीके से अपने प्रचार के लिए पैसा खर्च कर रहे हैं। 

आप के प्रवक्ता आशुतोष ने कहा है कि बीजेपी आप को दिल्ली ही नहीं पूरे देश से खत्म करना चाहती है। हम लोग कुछ भी करते हैं तो बीजेपी को आखिर मिर्ची क्यों लगती है? प्रशांत भूषण ने विज्ञापन को ‘जय हो केजरीवाल’ की संज्ञा देते हुए इसे महज एक व्यक्ति या नेता को प्रोजेक्ट करने के लिए फंड के गलत इस्तेमाल का उदाहरण बताया है। 

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एक तरफ ‘मेक इन इंडिया’ का नारा, दूसरी तरफ छंटनी से लेकर मंदी तक की परिघटनाएं

कांग्रेस की श्रम विरोधी व कारपोरेट परस्त नीतियों से त्रस्त जनता को मोदी सरकार के ‘मेक इन इंडिया‘ और ‘कौशल विकास‘ के नारे से बहुत उम्मीद जगी थी। परन्तु आशा की यह किरण धुंधली पड़ने लगी है। उद्योगों  के निराशाजनक व्यवहार को साबित करते हुये देश की दूसरे नम्बर की ट्रैक्टर बनाने वाली कम्पनी ने अपने संयत्रों से 5 प्रतिशत कर्मचारियों की छंटनी कर दी है। गनीमत यह रही कि एक प्रतिष्ठित दक्षिण भारतीय महिला की छत्रछाया में चलने वाले इस औद्योगिक समूह से निकाले जाने वाले कर्मियों के प्रति संवेदना दिखाते हुये प्रबन्धन ने उन्हें पहले से ही सूचना देने के साथ साथ न केवल तीन माह का ग्रोस वेतन दिया। बल्कि छंटनी ग्रस्त कर्मियों के लिये एक सुप्रसिद्व जॉब कन्सलटेंट की सेवायें दिलवाकर उन्हें दूसरी कम्पनियों में नौकरी दिलवाने की भी कोशिश की। 

वहीं दूसरी और दिल्ली आधारित आटोमोटिव कलपुर्जे  बनाने व लगभग 16990 करोड़ टर्नआवर एवं हजारों कर्मचारियों की मदद से चलने वाली एक नामी कम्पनी अपने प्रमुख संयत्रों से 20 प्रतिशत स्थाई व 10 प्रतिशत अस्थाई कर्मियों को बाहर करने का लक्ष्य पूरा करने के करीब है। कम्पनी के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के हरियाणा, राजस्थान सहित पूरे देश स्थित बहुत से संयत्रों से अभियन्ताओं, प्रबन्धकों व अन्य कर्मियों को सड़क पर खड़ा कर दिया गया है। इसी कम्पनी में 7 वर्ष से कार्यरत व अपने काम में पूणतया दक्ष हरियाणा के एक इंजीनियर जिनको एक दिन दिल्ली स्थित कार्यालय बुलाकर त्यागपत्र लिया गया।

वे कहते हैं सरकार अकुशल नौजवानों को कुशलता का प्रक्षिक्षण देने के लिये (स्किल डवेलपमेन्ट) कौशल विकास के तहत करोड़ों रूपये खर्च करके रोजगार दिलाने की बात करती है। परन्तु जो इंजीनियर, कामगार पहले से ही अपने खर्चे पर डिग्री, डिप्लोमा लेकर कुशलता प्राप्त कर देश के निर्माण में लगे हुये हैं। अगर उन्हें इस तरीके से बाहर किया जा रहा है। तो सरकार के नये युवकों को कुशल बनाने के ‘कौशल विकास‘ के नारे पर कौन विश्वास करेगा?

नई दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया से इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री लेकर 15 वर्षों से इसी कम्पनी में कार्यरत एक दूसरे शख्स के मुताबिक उदारीकरण व वैश्वीकरण की नीतियों के चलते विकास व तकनीक के गुब्बारे ने मानवीय मूल्यों को धराशायी कर दिया। कभी अच्छी कम्पनियों में कार्यरत कर्मियों के 10 या 15 साल का कार्यकाल पूरा होने पर चेयरमैन अपने हाथों से ‘लम्बी अवधि पुरस्कार‘ देता था। आज मुझे 15 वर्षों की सेवा के वदले पहले से ही लिखित त्यागपत्र पर हस्ताक्षर करने के लिये 15 मिन्ट का भी समय नहीं दिया गया। क्या भारतीय संस्कृति का दम भरने वाली सरकार की छत्रछाया में कारपोरेट को ‘यूज़ एण्ड थ्रो‘ (इस्तेमाल करो व फेंको) जैसी पश्चिमी अवधारणा को अपनाने की खुली छूट मिल चुकी है?

क्या विगत 20 वर्षों में मात्र कुछ करोड़ से लगभग 16990 करोड़ की टर्नआवर पर पहुंची इस कम्पनी को मोदी सरकार की असहयोग की नीतियों के चलते ऐसा कदम उठाना पड़ा या कांग्रेस के शासन में ऐसी कम्पनियां गलत ढंग से विकसित हुई, जिसे वर्तमान सरकार की दूरगामी व खराब कम्पनियों पर लगाम कसने की नीति के परिणाम स्वरूप यह सव हुआ? या इसका कारण केवल आर्थिक मन्दी है? यह बहस का विषय हो सकता है। 

एक प्रमुख आर्थिक अखबार के मार्च 2015 के एक अंक के अनुसार इस कम्पनी द्वारा जर्मनी की एक कम्पनी को 175 मिलियन यूरो (लगभग 1200 करोड़ रू) में खरीदने की योजना थी। भारतीय मूल की इस कम्पनी के वैश्विक मुखिया जोकि एक विदेशी है, ने इस अधिग्रहण की पुष्टि समूह की वेबसाईट पर 22 मई को जारी प्रेस रिलीज में की । यद्यपि इस में अधिग्रहण की राशि का जिक्र नहीं किया गया। तो क्या कम्पनी भारतीय संयत्रों को आंशिक रूप में ही चलाकर विदेश में पैसा लगा रही है ? अर्थात कम्पनी  ‘मेक इन इंडिया‘ की अपेक्षा ‘मेक इन जर्मनी‘ के नारे में ज्यादा विश्वास करती है ? 

सड़क पर आ चुके कुशल व शिक्षित कर्मचारी क्या इसे अच्छे दिनों का आगमन मान रहे हैं। कुछेक के अनुसार टेलिवजन चैनल व मीडिया कुछ भी कहें। परन्तु उनके 15-20 वर्ष के कैरियर में शायद यह सबसे बुरे दिन हैं। मोदी सरकार की ‘बीमा सुरक्षा योजना‘, ‘अटल पेंशन योजना‘ व ‘स्वच्छ भारत अभियान‘ निश्चित रूप से सराहनीय कदम हैं। पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक रिश्तों व आंतकवाद के विरूद्व अगर पूर्णरूपेण नहीं तो कम से कम पुरानी सरकार की अपेक्षा सरकार का प्रर्दशन कहीं बेहतर है।  परन्तु एक और जहां सरकार 7.5 प्रतिशत विकास दर बताकर विदेशों में भारत को एक उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में पेश कर रही है। वहीं देश के आर्थिक विकास की रीढ़ माने जाने वाले नामी उद्योगों में कार्यरत शिक्षित कर्मियों की ऐसी बदहाली के क्या संकेत माने जाने चाहिये ? यह कटु सत्य है कि वर्तमान व्यवस्था व अधिकांश मीडिया कारपोरेट व शोषक वर्ग के पक्ष में होने के कारण ऐसी घटनाएं आमजन तक कम ही पहुंचती हैं। परन्तु अगर यही क्रम छुपते छुपाते भी चलता रहा तो इसका परिणाम अंततः उद्योगपतियों, मानव संसाधन, सत्ता व देश किसी के भी हित में नहीं होगा। 

लेखक संजीव सिंह ठाकुर से संपर्क : singhsanjeev7772@gmail.com

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कांग्रेस के पास रॉबर्ट वाड्रा, भाजपा के पास दुष्यंत, अब खेल बराबरी का

मेरे पास माँ है… यह फिल्मी डायलॉग तो पुराना हो गया है। अब तो राजनीति में नया डायलॉग चल रहा है कि तुम्हारे पास (कांग्रेस) अगर रॉबर्ट वाड्रा है तो हमारे पास (भाजपा) भी दुष्यंत सिंह है। भला हो ललित मोदी का, जिसने कम से कम कांग्रेस की कुछ तो लाज रख ली और दामादजी वाले मामले पर पीट रही भद के बीच अब वसुंधरा के लाड़ले का मामला उजागर हो गया। 

अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ और देश की जनता की याददाश्त भी कमजोर नहीं है, जब उसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर पूरी भाजपा को भाषणों में यह कहते सुना होगा कि रॉबर्ट वाड्रा के पास ऐसा कौन सा जादुई कारोबारी नुस्खा है, जिसके बलबूते पर उन्होंने अपने एक रुपए को एक करोड़ में तब्दील कर डाला। हालांकि इन भाषणवीरों ने सत्ता में आते ही दामादजी यानि रॉबर्ट वाड्रा को जेल भिजवाने की कसमें भी कम नहीं खाई थी, मगर हर पार्टी में रॉबर्ट वाड्रा हैं इसलिए ऐसे भाषण चुनावों तक ही सीमित रहते हैं। सत्ता में आने पर भाजपा भी दामादजी को भूल गई और साथ ही विदेशों में जमा काला धन जुमले में तब्दील हो गया। 

और तो और काले धन के एक बड़े प्रतीक और भगोड़े ललित मोदी को बचाने का कलंक अवश्य सालभर तक भ्रष्टाचार के मामले में खुद को पाक साफ बताने वाली भाजपा के माथे पर लग गया है। सुषमा स्वराज ने तो ललित मोदी की मदद की ही, मगर उससे भी बड़ी मददगार तो राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे निकली, जिन्होंने ललित मोदी पर किए गए उपकारों के बदले में अपने बेटे दुष्यंत सिंह की कम्पनी नियंत हैरीटेज होटल्स प्रा.लि. में 11.63 करोड़ रुपए का निवेश ललित मोदी की कम्पनी आनंद हेरीटेज होटल्स के मार्फत करवाया और 10 रुपए मूल्य के शेयर मोदी ने 96 हजार 190 रुपए में खरीदे। अब कांग्रेस भी पूछ सकती है कि दुष्यंत सिंह ने ऐसा क्या करतब दिखाया कि उनका 10 रुपए का शेयर 96190 हजार रुपए का हो गया? यह ठीक उसी तरह का मामला है जैसा रॉबर्ट वाड्रा ने डीएलएफ के साथ संगनमत होकर किया था। हालांकि तमाम बड़े राजनेताओं ने इसी तरह के गौरखधंधे कर रखे हैं। 

ये तो रॉबर्ट वाड्रा के बाद दुष्यंत सिंह का खुलासा हो गया, जिस पर अब राजनीति से लेकर मीडिया में हल्ला मचा है। इस पूरे प्रकरण से अब भाजपा को भी रॉबर्ट वाड्रा से कारोबारी समझ लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि उनकी खुद की पार्टी के पास दुष्यंत सिंह जैसा जादूगर मौजूद है। यानि भाजपा फिजूल ही बगल में छोरा और गांव में ढिंढोरा पीटती रही। रॉबर्ट वाड्रा तो सक्रिय राजनीति में नहीं कूदे और दामादजी होने का ही पर्याप्त सुख भोगते रहे, लेकिन वसुंधरा राजे के करतबी कारोबारी पुत्र दुष्यंत सिंह तो बकायदा झालावाड़ से निर्वाचित भाजपा सांसद हैं। अब देश की निगाह प्रधानमंत्री के उन बयानों पर भी टिकी है, जिसमें वे स्वच्छ और पारदर्शी शासन देने के दावे करते हुए खम ठोंककर अपने छप्पन इंची सीने के साथ यह कहते रहे कि वे ना खाएंगे और ना खाने देंगे। हुजूर अब तो आपकी नाक के नीचे ही खाऊ ठिये खुल गए हैं। सुषमा-वसुंधरा पर ही कार्रवाई करके अपने दावों की लाज रख लो।

लेखक राजेश ज्वेल से संपर्क : 9827020830, jwellrajesh@yahoo.co.in

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मोदी समर्थक क्रोनी कैपिटल के ऐतिहासिक साइज के प्रपंच से दयनीय स्तर तक अनभिज्ञ है

Sheetal P Singh : BJP के हाथियों के दंगल में पैदल सेना की बड़ी दुर्गति है. बीजेपी की पैदल सेना मुख्यत:दरिद्र सवर्णो की रुग्णशाला से आती है। रुग्णशाला का मतलब यहाँ उन प्रतिभागियों से है जो आर्थिक शैक्षिक शारीरिक मोर्चों पर दोयम दर्जा रखते हैं पर मनु महाराज की अनुकम्पा से उन्हे अपने से बुरे हाल में सड़ रहे ग़रीब नसीब हैं, जिन्हें देखकर उन्हे ख़ुद के “बड़े” होने का एक झूठा अहसास तरावट देता रहता है. तो यह पैदल सेना अपनी दो हज़ार से बीस हज़ार के मध्य झूलती सामुदायिक विपन्नता के दौर में अरबों ख़रबों के वारे न्यारे करने वाले फ़ैसलों /विवादों के पैरवीकारों के रूप में अपने आप को पाकर समझ ही नहीं पाती कि बैटिंग किधर करनी है. इंतज़ार करती है कि कुछ ऊपर से ज्ञान छिड़का जाय तो वह भी लोकल बघारे.

मसलन आप सोशल मीडिया के गट्ठर के गट्ठर अकाउंट देख आइये. एक भी शायद ही मिले जिसने KG6 basin प्रसंग पर ख़ुद से कुछ लिखा हो? आयरन ओर के गोरखधंधे पर एक हर्फ़ दरज कराया हो? अडानी के बारे में कुछ गहरी जानकारी प्रकट की हो? अब यकायक उसे ललित मोदी/सुषमा स्वराज की मानवीय रिश्तेदारी पर डिफ़ेंस खड़ा करना है. काफ़ी मीमांसा के बाद मैंने पाया कि कम से कम सोशल मीडिया में मौजूद मोदी/बीजेपी समर्थकों का ९९% आज के क्रोनी कैपिटल के ऐतिहासिक साइज़ के प्रपंच से दयनीय स्तर तक अनभिज्ञ है. वह दरअसल मुसलमानों से लड़ रहा है, ईसाइयों से लड़ रहा है, औरतों को क़ाबू (उसकी समझ में मर्यादा) में रखने में लगा है, कश्मीर में तैनाती चाहता है, लाहौर पे क़ब्ज़ा, चीन को सबक़ और विश्व गुरू/हिन्दू /संस्कृत …

सब गड्ड मड्ड. वो बहस नहीं कर सकता. ख़ाली डब्बा है. सो गालियों में जीता है. इसी वजह से इसकी सारी सर्किल मर्दों की है. कुछ नकली महिला प्रोफ़ाइल्स छोड़कर. मैं दस साल बाद का दृश्य अपने हिसाब से जैसा देख पा रहा हूँ कि “खेती सेठों की हो चुकी होगी और बेरोज़गारों के झुंड तमाम तरह की लम्पट सेनायें बनाकर एक दूसरे से निबटने/निबटाने में लगे होंगे. सरकारी फौजफाटा/पुलिस अपनी लूटपाट अराजकता में. सांप्रदायिक बँटवारा नई चुनौतियों को पेश कर रहा होगा. बुज़ुर्ग औरतें बच्चे और बीमार सबसे ज़्यादा वलनरेबल होंगे. है तो बहुत बुरा सा स्वप्न पर… 

शीतल पी सिंह के एफबी वॉल से

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जनवरी 2016 में कौन होगा बीजेपी का अध्यक्ष?

पहली बार संघ और सरकार के भीतर यह आवाज गूंजने लगी है कि जनवरी 2016 के बाद बीजेपी का अध्यक्ष कौन होगा। और यह सवाल मौजूदा बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की सफलता या असफलता से हटकर प्रधानमंत्री मोदी को ज्यादा मजबूत बनाने की दिशा में उठे हैं। चूंकि अमित शाह को राजनाथ के कार्यकाल के बीच में ही बीजेपी अध्यक्ष बनाया गया था तो जनवरी 2016 में अमित शाह का कार्यकाल पूरा होगा और दिल्ली नागपुर के बीच अब यह चर्चा शुरु हो गई है कि 2019 तक प्रधानमंत्री मोदी के पीछे तो पूरी ताकत से आरएसएस खड़ी है लेकिन पार्टी के भीतर यह सवाल बडा होता जा रहा है कि बीते एक बरस से सरकार और दल दोनों ही एक सरीखा हैं। यानी कोई विकेन्द्रीकरण नहीं है। जबकि गुरुगोलवरकर के दौर से संघ यह मानता आया कि अगर परिवार में सबकुछ एक सरीखा होगा तो वह सिटता जायेगा।

इसीलिये सरकार और पार्टी में केन्द्रीयकरण नहीं होना चाहिये बल्कि विकेन्द्रीकरण यानी अलग अलग सोच होनी चाहिये । तभी आरएसएस बहुआयामी तरीके से देश के हर रंग को एक साथ ला सकता है। संघ का तो यह भी मानना है कि सरकार नी आर्थिक नीतियों का विरोध बारतीय मजदूर संघ नहीं करेगी या किसान संघ सरकार के किसान नीति का विरोध नहीं करेगा तो फिर संघ परिवार के बाहर विरोध के संगठन खड़े होने लगेंगे। और मौजूदा वक्त में तो सरकार और बीजेपी दोनो ही एक रंग के हैं। यानी दोनों ही गुजरात केन्द्रित रहेगें ।तो हिन्दी पट्टी में बीजेपी का असर कम होगा । हालाकि संघ यह भी मान रहा है कि नये अध्यक्ष की ताजपोशी उसी हालत में हो जब प्रधानमंत्री मोदी के कामकाज पर पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव ना पडे । 

दरअसल इसकी सुगबुगाहट में तेजी मई के दूसरे हफ्ते शुरु हुई जब मोदी सरकार के एक बरस पूरा होने पर दिल्ली से चार नेताओ को नागपुर से बुलावा आया । जिन चार नेताओ को नागपुर बिलाया गया उनमें राजनाथ सिंह के अलावे अमित साह , नीतिन गडकरी और मनोहर पार्रिकर थे। यानी मौजूदा बीजेपी अध्यक्ष को छोड़कर बाकि तीन चेहरे वहीं थे जिनके नाम का जिक्र कभी अध्यक्ष बनाने को लेकर लालकृष्ण आडवाणी ने किया था। यानी चारों नेताओं की मौजूदगी संघ हेडक्वार्टर में एक साथ नहीं हुई बल्कि अलग अलग सबसे चर्चा हुई । और चूकि इन चारो में से राजनाथ सिंह ही यूपी-बिहार की राजनीति के सबसे करीब रहे है और दोनो ही राज्यो के ज्यादातर सांसदो के बीच राजनाथ की पैठ भी है तो आने वाले वक्त में बीजेपी का अध्यक्ष हिन्दी पट्टी से क्यों होना चाहिये इस सवाल को उठाने और जबाब देने में भी वही सक्षम थे। 

खास बात यह भी है कि राजनाथ संघ मुख्यालय के बाद एक वक्त संघ के ताकतवर स्वयंसेवक रहे एमजी वैघ के घर भी गये । यह वही वैघ है जो शुरु में नरेन्द्र मोदी के भी विरोधी रहे । लेकिन सरसंघचालक मोहन भागवत जिस मजबूती के साथ नरेन्द्र मोदी के पीछे खडे हुये। उससे वैध सरीके स्वयंसेवक हाशिये पर पहुंच गये। बावजूद इसके संघ के भीतर अगर यह सवाल अब शुरु हुआ है कि एक ही विचार से पार्टी और सरकार नहीं चलनी चाहिये तो तीन संकेत साफ हैं। पहला मोदी सरकार के विरोध के स्वर अगर पार्टी से निकलते है तो उसे संभालना आसान है। दूसरा अगर सभी एक लाइन पर चलेंगे तो संघ का काम ही कुछ नहीं होगा । तीसरा सरकार के विरोध को अगर जनता के बीच जगह किसी दूसरे संगठन या पार्टी से मिलेगी तो फिर आने वाले वक्त में बीजेपी के लिये राजनीतिक मुश्किल शुरु हो जायेगी । लेकिन संयोग भी ऐसा है कि अक्टूबर में बिहार चुनाव होने है और दो महीने बाद बीजेपी अध्यक्ष का कार्यकाल खत्म हो रहा है । 

तो चुनाव में जीत के बाद अध्यक्ष बदले जाते है तो संघ की वह थ्योरी कमजोर पड़ेगी जो उन्होंने अमित साह को अध्यक्ष बनाते वक्त कही थी किचुनाव जिताने वाले शख्स को अध्यक्ष बनाना सही निर्णय है। और अगर चुनाव में जीत नहीं मिलती है तो फिऱ संकेत जायेगा कि बीजेपी डांवाडोल है और उसका असर यूपी चुनाव पर पड़ेगा। इन हालातों से बचने के लिये ही नये अध्यक्ष को लेकर पहले से ही व्यापक स्तर पर चर्चा शुरु हुई है। जिन चार नेताओं को नागपुर बुलाया गया उसमें बीजेपी संगठन और हिन्दी पट्टी के बीजेपी नेताओं के अनुभव और प्रभाव का इस्तेमाल हो नहीं पा रहा है इस पर खासा जोर दिया गया । यानी बीजेपी को चलाने का अमित शाह मॉडल चुनावी जीत के लिये जरुरी है लेकिन बिहार, यूपी , बंगाल में सिर्फ शाह माडल यानी प्रबंधन के जरिये चुनाव जीता नहीं जा सकता है, यह सवाल भी उठा। वैसे इस सवाल को हवा दिल्ली चुनाव में बीजेपी की हार के बाद भी मिली। लेकिन तब यह सवाल इसलिये दब गया क्योकि हार की वजहों को डि-कोड करने का काम शुरु हुआ ।

 लेकिन जैसे जैसे बिहार चुनाव की तारीख और अध्यक्ष पद का कार्यकाल पूरा होने का वक्त नजदीक आ रहा है वैसे वैसे यूपी-बिहार के बीजेपी नेताओ के सामने भी यह सवाल है कि चुनाव जीतने के लिये उनके पास केन्द्र की तर्ज पर कोई नरेन्द्र मोदी सरीखा नेता तो है नहीं । फिर मोदी और अमित शाह दोनो के गुजरात से दिल्ली आने की वजह से दोनो के बीच बैलेस इतना ज्यादा है कि जमीनी राजनीति के सवाल सरकार की उपलब्धी गिनाने तले दब जाते है यानी उड़ान है ,लेकिन कोई चैक नहीं है । यानी संघ पहली बार चुनाव के दौर की सक्रियता से आगे पार्टी की दिशा कैसी होनी चाहिये और उसे किस तरह काम करना चाहिये इसमें भी सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है। असर भी इसी का है कि बिहार चुनाव में नीतिन गडकरी को प्रभारी बनाना चाहिये यह सोच भी निकल रही है और मोदी के बाद गुजरात आंनदीबाई पटेल से संभल नहीं पा रहा है चर्चा इसपर ही हो रही है और महाराष्ट्र में पवार की राजनीति को साधने में फडनवीस सरकार सफल हो नहीं पा रही है, चर्चा इसपर भी हो रही है । लेकिन नया संकेत यही है कि सात महीने बाद बीजेपी का अध्यक्ष कौन होगा इसपर संघ परिवार के भीतर अगर चर्चा हो रही है तो यह साफ है कि गडकरी की तर्ज पर मौजूदा वक्त में अध्यक्ष का कार्यकाल बढाने की संघ सोचेगा नहीं ।

पुण्य प्रसून बाजपेई के ब्लॉग से

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वह सुबह कभी तो आयेगी…..

ठीक साल भर पहले सुबह से दिल की धडकन देश की बढ़ी थी । हर की नजरें न्यूज चैनलों के स्क्रीन पर लोकसभा चुनाव परिणाम का इंतजार कर रही थी। ऐसे में न्यूज चैनल के भीतर की धड़कने कितनी तेज धड़क रही होंगी और जिसे न्यूज चैनल के स्क्रीन पर आकर चुनाव परिणाम की कमेंट्री से लेकर तमाम विश्लेषण करना होगा उसकी धडकनें कितनी तेज हो सकती हैं। यह सिर्फ महसूस किया जा सकता है। रिजल्ट सुबह आठ बजे से आने थे लेकिन हर चैनल का सच यही था कि उस रात रतजगा थी। और रिजल्ट से पहले वाली रात को देश सोया जरुर लेकिन एक नयी सुबह के इंतजार में। सुबह 5 बजे से गजब का शोर हर चैनल के दफ्तर में । एडिटर से लेकर चपरासी तक सक्रिय। सुबह साढे चार बजे घर से नोएडा फिल्म सिटी जाते हुये पहली बार यह एहसास अपने आप जागा कि आज सुबह वक्त से पहले क्यो नहीं। सुबह की इंतजार इतना लंबा। वही एहसास यह भी जागा कि जिस सुबह की आस में बीते कई बरस से देश छटपटा रहा है, वह सुबह आ ही गई ।

एंकरिग करने बैठा तो जहन में बचपन के वह दिन याद आने लगे जब रात साढे ग्यारह बजे पिताजी ने झटके में जगाया और कहा कि इंदिरा गांधी चुनाव हार गई है। याद करने लगा कि क्या खुशी थी उस रात पिताजी के चेहरे पर । फिर बोले सो जाओ लेकिन मैंने जगाया इसलिये क्योंकि इतिहास के गवाह बन सको। अब देश बदलेगा। मार्च 1977 । रात बारह बजे भी चुनाव परिणाम को लेकर इतना जोश इतना उत्साह क्यो था यह तो धीरे धीरे समझा लेकिन 16 मई 2014 को मेरी घड़कन चुनाव परिणाम आने से पहले क्यों बढ़ी हुई है । क्या वाकई बदलाव सुबह का एहसास करा देता है। सुखनवर भरा यह एहसास ही रात भर मेरी भी आंखों से नींद गायब कर चुका था। और घर से दफ्तर तक पहुंचते पहुंचते मेरा दिल मान चुका था कि रात कोई भी सोया नहीं होगा। हर किसी को सुबह का इंतजार ही होगा। और सुबह भी हुई तो ऐसे सुनामी के साथ की रात की जड़ें हिल गई । दरख्त टूट गये। पत्तिया झड़ गईं। इतिहास के सबसे अंधेरे अध्याय को समेटे कांग्रेस का वृक्ष ओ हेनरी की कहानी “द लास्ट लीफ” की तर्ज पर सोनिया-राहुल गांधी की जीत में उम्मीद जैसा ही नजर आया है । वहीं सुबह के नायक नरेन्द्र मोदी लारजर दैन लाइफ हो चुके थे। और शायद इसी एहसास को महसूस करने ही दोपहर दो बजे तक लगातार एंकरिंग के बाद बिना कुछ खाये मैं भी अपने सहयोगी गोपाल को लेकर बीजेपी हेडक्वार्टर पहुंचने के लिये लालयित हुआ । दफ्तर से चला तो 2004 का बीजेपी दफ्तर याद आ गया । जहां शाइनिंग इंडिया की हवा में प्रमोद महाजन की तूती बोलती और जिस दिन लोकसभा चुनाव के परिणाम आये उसी बीजेपी हेडक्वार्टर में कौवा भी कांव कांव करने नहीं पहुंचा। उस दोपहर महसूस किया कि बीजेपी सत्ता वाली पार्टी बन चुकी है और एसी के सुकून तले सड़क पर संघर्ष अब बीजेपी में दूर की गोटी हो चुकी है । 

शायद यह एहसास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक में भी रहा इसीलिये वहां से चार किलोमीटर दूर झंडेवालान के संघ हेडक्वार्टर में चाय की चुस्की स्वयंसेवकों को खासी मीठी लग रही थी। उस वक्त राम माधव बोल गये कि हिन्दू संगठन नाराज थे । लेकिन सच यह भी निकला कि संघ को जिताने से ज्यादा हराकर अपनी लीक पर चलने के लिये बीजेपी को असहाय बनाने का सुकून हर कोई महसूस कर रहा है। फिर याद 24 अकबर रोड भी आया। झटके में महसूस किया जो कांग्रेसी तरसते थे कोई बात करें वहीं कांग्रेसी सत्ता की आहट सुन मचलने लगे। 2009 का नजारा तो भूलाये नहीं भूलता कैसे जनार्दन द्विवेदी मशगूल थे कैमरे को देखकर और हिकारत से देख रहे थे पत्रकारों को। जयराम में कुछ सरोकार बचे थे तो जीत के बाद भी पत्रकारों के अभिवादन पर मुस्कुरा रहे थे । और 2009 में सूने पडे बीजेपी हेडक्वार्टर में प्रवक्ता जरुर पहुंचे । कुछ कहा। कुछ माना । दरअसल हमेशा लगा कि ग्राउंड जीरो से पार्टी की जीत हार को समझना है तो चैनल का स्टूडियो छोड पार्टी हेडक्वार्टर पहुंच कर ही तापमान देखा जाये । लेकिन 16 मई 2014 को बीजेपी हेडक्वार्टर पहुंच कर तापमान देखने से ज्यादा तापमान सहना पड़ेगा । यह एहसास आज भी सिहरन ही पैदा करता है। क्योंकि दोनो तरफ से बंद अशोक रोड में 10 नंबर तक पहुंचने से पहले पुलिस का जमावडा और नारो की गूंज तो सामान्य थी । लेकिन बीजेपी हेडक्वार्टर में पहुंचते ही हर नारा हर हर मोदी की गूंज में सुनाई देने लगा । 

एक तरह की सुरसुरी तो पूरे शरीर में थी क्योंकि दिल्ली में बैठे बीजेपी के नेताओं में मनमोहन सरकार के दौर में जितनी जंग लग चुकी थी उसका एहसास हर बार मनमोहन की आवारा पूंजी की अर्थव्यवस्था पर चोट करने के बाद बीजेपी नेताओ से मुलाकात में लगता रहा । मनमोहन की आर्थिक नीतियों से लेकर सरकार चलाने के तौर तरीकों के खिलाफ इतना कुछ अखबारो में लिखा। एसआईजेड से लेकर खुदकुशी करते किसानो के मसले से लेकर राडिया टेप में गुम सरकार का कच्चा-चिट्टा भी सबसे पहले सचिन पाय़लट के सामने यह सोच कर रखा कि संचार मंत्रालय में ए राजा के वक्त जो हो रहा था उसे युवा कांग्रेसी नेता मंत्री समझे । लेकिन उस दौर में सचिन सरीखा संचार राज्यमंत्री भी कैसे मनमोहन सरकार की हवा में खामोश रह कर गुस्सा पीते हुये काम करने को ही सही मानता यह भी महसूस किया और उस दौर में कांग्रेसी कुछ इस भाव में रहे जैसे राडिया टेप या स्पेक्ट्रम का खेल कुछ भी नायाब नहीं है । कोयला घोटाला तो नही लेकिन घोटाले की दिशा को ही नीतिगत तौर पर मनमोहन सरकार कैसे अपना रही है इसपर भी कलम चलायी लेकिन तब भी कांग्रेसियो ने इसे अर्थव्यवस्था को ना समझने या आर्थिक सुधार के लिये इसे जरुरी करार दिया । तब भी दिल्ली में बीजेपी नेता खुश हुये कि मनमोहन सरकार के खिलाफ लिखना तो शुरु हुआ । आर्थिक सुधार के खिलाफ माहौल तो बन रहा है । यानी मनमोहन सरकार जायेगी यह तो तय था । इसीलिये दिल्ली में बैठे बीजेपी नेताओं में आगे बढने की होड थी । पूर्ती मामले में बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गडकरी के मुंबई दफ्तर पर छापा उसी दिन पड़ा जाये जिस दिन गडकरी के कार्यकाल को बढाने पर फैसला होना है । यह कांग्रेस नहीं बीजेपी के ही नेताओ का असर रहा । बंद कमरे में मीडिया ब्रीफिंग के जरीये अपने ही साथी नेता को कैसे कमजोर साबित किया जा सकता है यह बिसात भी दिल्ली में बीजेपी नेता ही बिछाते रहे । इसलिये 16 मई 2014 को मोदी मोदी की गूंज भी अच्छी लगी कि चलो अब तो लुटियन्स की दिल्ली पर से रेशमी लिबास हटेगा । सियासी बिसात पर शह मात अपने अपनों के बीच खेला जाना बंद होगा। 10 अशोक रोड के भीतर एक नये तरह का उल्लास नजर आया । घुसते ही पता चला बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ प्रेस कांन्फ्रेस कर रहे हैं। तो दफ्तर में घुसने की जगह हेडक्वार्टर के अंदर खुले मैदान में जमा लोगों के बीच चल पड़ा । नारे तेज होने लगे । गुलाल उड रहे थे । झटके में कोई आया और मेरे चेहरे पर भी गुलाल लगा तेजी से निकल पड़ा और उसके बाद चारों तरफ से मोदी मोदी की गूंज के बीच किसी ने धकेला । तो किसे ने फब्ती कसी । टीवी स्क्रीन पर कैसे मोदी को लेकर विश्लेषण कर सकते हैं और चुनाव प्रचार के वक्त जैसे ही पेड मीडिया शब्द होने वाले पीएम के मुख से निकला तो मीडियाकर्मी मोदी मोदी के नारे लगाते भक्तों के बीच खलनायक हो चुके थे । शायद इसीलिये समझ न आया कि जो चुनाव प्रचार के वक्त मीडिया या पत्रकारों को लेकर नरेन्द्र मोदी की टिप्णिया थीं उसी को फब्ती में बदलकर खुले तौर पर बीजेपी हेडक्वार्टर में एक नये तरह की भीड की गूंज थी। चेहरे भी नये थे । चारो तरफ  सिर्फ लोग थे तो समझ ना आया कि कौन सी दिशा पकड़ी जाये । बस एक तरफ चल पड़ी । और इस बीच किसी ने झटके में मेरा हाथ पकडकर मुझे अपने पास खींच लिया । ध्यान दिया तो वह राजनाथ सिंह थे । जिन्होंने अपने एसपीजी के दायरे में मुझे खिंचने की कोशिश की । लेकिन भीड़ का रेला ऐसा कि लगा फिर वही भींड में समा जाऊगा । तबतक राजनाथ सिंह के पीछे रविशंकर प्रसाद ने मेरा हाथ पकडा और एसपीजी से कहा इन्हें अंदर ले लें । अंदर घुसा तो हेडक्वार्टर में अक्सर दिखायी देने वाले बीजेपी के पहचाने चेहरे दिखायी दिये जो अक्सर बीजेपी हेडक्वार्टर के भीतर किताब की दुकान पर जाने के दौरान बीते कई बरसो से मिलते रहे । हंगामे-शोर-नारो के बीच किसी तरह हेडक्वार्टर के भीतर पहुंचा। राजनाथ सिंह के दरवाजे पर तैनात रहने वाले कार्यकर्ता ने पानी की बोतल ला कर दी । फिर किसी ने कहा आप बगल के कमरे में बैठें । वहां गया तो बीजेपी के ही एक कार्यकर्ता ने कुछ ऐसा टोका कि मैं भी उसे बस देखता ही रह गया । आप खुले मैदान में क्यों चले गये । आपको लगा नहीं कि काफी भीड है। आपने महसूस नहीं किया कि बीजेपी का दफ्तर बदल गया है । बदल गया है । यह शब्द कुछ ऐसे थे जिसे बीजेपी हेडक्वार्टर में बैठे बैठे मैं सोचता रहा । क्या वाकई बीजेपी हेडक्वार्टर बदल गया । तब तो बीजेपी भी बदलेगी । कामकाज के तरीके भी बदलेंगे । झटके में मैंने भी जबाब दिया तब तो अच्छा है। नहीं तो बीजेपी का कांग्रेसीकरण हो चला था । बदलने का मतलब कांग्रेसीकरण से मत जोड़ें । आपने देखा नहीं एकदम नये चेहरो की भरमार। अब राजनाथ सिंह के बदले अमित शाह होंगे । अभी तो चुनाव के परिणाम ही आये हैं और अध्यक्ष बदलने की सुगबुगाहट ही नहीं बल्कि कौन होंगे, यह भी तय हो चला है । बदलाव की रफ्तार इतनी तेज होगी । उस दिन भी अच्छा ही लगा कि बीजेपी बदलेगी । बदलाव होगा । तमाम विश्लेषण के साथ मैंने भी 17 मई 2014 को ही दिल्ली के राष्ट्रीय अखबार में एलान कर दिया कि अब अमितशाह होंगे बीजेपी अध्यक्ष । लेकिन बीतते वक्त के साथ जब सरकार का एक बरस पूरा हो चुका है तो कई सवाल सरकार से हटकर पहली बार बीजेपी के बदलाव से टकरा रहे हैं। संघ की विचारधारा से टकरा रहे है। कद्दावर नेताओं के आस्तित्व के संघर्ष से टकरा रहे हैं । वैकल्पिक राजनीति पर भारी पडती सत्ता की समझ से टकरा रहे हैं । और सत्ता के खातिर संस्थानों के कमजोर होने के हालात से खुलेतौर पर दो दो हाथ करने की जगह कंधे पर बैठाकर जीत के नारे लगाने से नहीं चूक रहे । दरअसल तमाम सवाल बार बार 16 मई 2014 और 26 मई 2015 के दौर में ही पैदा हुये है । इसीलिये यह सवाल बड़ा होते जा रहा है कि आखिर देश की दिशा होगी क्या । जो  20 मई 2014 को सेन्ट्रल हाल में नरेन्द्र मोदी ने कहा या फिर 26 मई 2014 के बाद से जो प्रधानमंत्री मोदी कह रहे हैं । दोनों के बीच का अंतर सिर्फ व्यापक ही नहीं है बल्कि देश की भावनाओं के साथ राजनीतिक सत्ता का खुले तौर पर माखौल उड़ाना है । बरस पूरा हो रहा है तो सरकार चलाने से ज्यादा सरकार के कामकाज को किस रोशनी में रखना चाहिये यह मैनेज हो जाये ।

यानी पेड मीडिया कोई मायने नहीं रखता । सूचना प्रसारण मंत्री रात के अंधेरे में कभी चेहते तो कभी बीट रिपोर्टर तो कभी मालिकान को दावत पर बुलाकर पीएम के आकस्मिक दर्शन कराकर अभिमूत हैं । दर्शन करने वाला मीडियाकर्मी भी अभिभूत हैं । क्योंकि झटके में वह सरकार के चुनिंदा चहेतों में शामिल हो गया । तो फिर पत्रकारिता की क्यों जाये । गुणगान में ही सारे तत्व छिपे हैं । इसी रास्ते विकास की धारा है । विदेशी पूंजी भी मंजूर, मजदूरों के हक खत्म करने वाले कानूनो को लागू कराना भी मंजूर , किसानों को सरकारी मदद के लिये ताकते रहने वाली नीतियां भी मंजूर , शिक्षा से लेकर स्वास्थय को मुनाफाखोरों के हाथो सौप कर विकास का नारा लगाना भी मंजूर । यह मंजूरी उसी संघ की है जो वाजपेयी सरकार से सिर्फ इसलिये रुठ गई थी क्योंकि स्वदेशी को ताक पर रखा गया था । राम मंदिर मसले को दबा दिया गया था । और खुली पूंजी के खेल में छोटे-छोटे तबको का धंधा मंदा पड़ गया था । नार्थ-ईस्ट में स्वयंसेवक मारा जा रहा था और गृहमंत्रालय संभाले लालकृष्ण आडवाणी बेबस दिखायी दे रहे थे । लेकिन मोदी सरकार तो कई फर्लांग से निकल चुकी है । लेकिन संघ बेबस नहीं बल्कि खुश है कि वह भी तो आवारा पूंजी की तर्ज पर कुलांचे मार सकता है । यानी हिन्दू आतंकवाद का कानूनी भय नहीं । और हिन्दू राष्ट्रवाद का नारा लगाने का वक्त है तो फिर आर्थिक विवशता में जकडे जाते देश को लेकर फिक्र क्यो की जाये । तो फिर साल भर पहले मोदी की जीत का मतलब जीत पर टिके संघ परिवार और बीजेपी की महत्ता तो होगी लेकिन विचारधारा की माला जपते हुये चुनाव हारने वालों की कोई पूछ नहीं होगी । जाहिर है किसी कारपोरेट के मुनाफे की तर्ज पर किसी सीईओ के भविष्य की तरह ही चुनावी जीत की माला भी बूंथी गई तो साल भर बाद हर किसी के सामने यही सवाल बडा होने लगा कि अगर जीत न मिले तो क्या होगा । यह सवाल किसी कार्यकर्ता से नेता पूछ सकता है । नेता से पार्टी अध्यक्ष और पार्टी अध्यक्ष से पीएम पूछ सकता है । शायद इसीलिये सरकार हो या पार्टी चुनाव के वक्त समूचा तंत्र ही जुट जाता है । यानी सरकार देश चलाये लेकिन सवाल बीजेपी की चुनावी जीत का होगा तो देश से पहले पार्टी । क्योकि पार्टी जीतेगी नहीं तो फिर राजनीतिक सत्ता भी कहा बचेगी । तो क्या यह भी बदलाव की रणनीति का हिस्सा है जहा जीते तो हम । हारे तो सभी । दिल्ली में बीजेपी हारे तो खलनायक बीजेपी के भीतर से नहीं बल्कि बाहर से किरण बेदी को खरीद कर ले आया गया. तो क्या बिहार, यूपी बंगाल में भी यही होगा । या फिर बिहार का दांव बीजेपी अध्यक्ष की कुर्सी पर जा लगा है । क्योंकि गुजरात से आकर यूपी के बीजेपी वालो को कोई मैनेजर वाले स्किल सिखाकर चुनाव जीत जाये । यह कैसे संभव है । बिहार को सिर्फ जातीय आधार पर टटोलकर राजनीतिक बिसात बिछाकर कोई चुनाव जीत जाये यह कैसे संभव है। खासकर बीजेपी के ही कार्यकर्ता से लेकर नेताओ की पूरी फौज ही जब बिहार यूपी की जमीनी राजनीति का पाठ पढते हुये बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा कर पायी और उसे ही कारपोरेट पूंजी या जीत की थ्य़ोरी के पाठ तले दबा कर रखा जाये । यह संभव है या नहीं सवाल अब यह नहीं बल्कि सवाल यह है कि क्या बीजेपी वाकई बदल गई । जिसका जिक्र 16 मई 2014 को बीजेपी हेडक्वाटर में बैठा कार्यकत्ता जीते के हंगामे और हर हर मोदी के नारे के बीच कर गया । तब तो मोदी सरकार के बरस भर का पाठ यह भी है कि अब राजनीति बदलेगी । 

अब विकास आर्थिक नीतियो पर नहीं बल्कि राष्ट्रवाद या हिन्दु राष्ट्रवाद की थ्योरी तले देश को विकास के कटघरे में बांटने के सिलसिले से शुरु होगा । कटघरा इसलिये क्योकि विदेशी पूंजी और देसी बाजार से जो 25 करोड समायेगा और जो सौ करोड बचेगा दोनो के बीच के वही चुनी हुई सरकार राज करेगी जो कुछ इस हाथ बांटेगी । कुछ उस हाथ लुटायेगी । यह थ्योरी जीत के बाद जीत के लिये राजनीतिक बिसात पर मोहरो को बदलने से लेकर बिसात तक बदलने की कवायद करती है । सवाल सिर्फ आडवाणी या मुरली मनोहर जोशी को दरकिनार करने का नहीं है । सवाल सिर्फ बीजेपी या संघ हेडक्वाटर को भी उसकी कमजोरी के लिहाज से खामोश समर्थन पाने का नहीं है ।सवाल सिर्फ चुनावी के वक्त वादो की फेरहिस्त को भुलाते हुये या राजनीतिक जुमलो में बदलते हुये नई लकीर खिचने भर का भी नहीं है । सवाल है कि 16 मई 2014 के पहले का जो वातावरण देश में बना था और 16 मई 2015 के बाद जो वातावरण देश में बन रहा है उसमें मोदी सरकार कहां खड़ी है । और आम जनता की भावनायें क्या सोच रही है । वित्त मंत्री, सूचना प्रसारण मंत्री , मानव संसाधन मंत्री चुनाव हारे हुये नेता है । और वाणिज्य मंत्री , रेल मंत्री, संचार मंत्री,ऊर्जा मंत्री, पेट्रोलियम मंत्री , अल्पसंख्यक मामलो के मंत्री समेत दर्जन भर से ज्यादा मंत्री ने तो मोदी की एतिहासिक जीत में चुनाव लडकर सीधी भागेदारी की ही नहीं । फिर दर्जन भर से ज्यादा मंत्री ऐसे है जो बीजेपी के भीतर कद के लिहाज से दूसरी या तीसरी पायदान पर खडे है । तो उन्हे मंत्री बनाकर साल बर के भीतर उन्ही के मंत्रालयो को पीएमओ से संभालवकर देश को संकेत भी दे दिये कि प्रधानमंत्री मोदी को ही देश ने चुना तो देश के लिये वही अकेले काम भी कर रहे है । फिर लोकसभा में चुन कर आये दागी सांसदों के खिलाफ कानून को काम करते हुये संसद को पाक साफ बनाना चाहिये यह कथन साल भर का था लेकिन साल भर सिर्फ कथन के तौर पर ही रहा । लोकसभा में 185 दागियो में से 97 तो बीजेपी के दागी है । लेकिन उनको लेकर भी कोई निर्णय नहीं लिया गया । वैसे बरस भर में बेहद महीन राजनीति ने बीजेपी के भीतर इस सवाल को खडा जरुर कर दिया कि बीजेपी में मोदी की जीत के सामने किसी सांसद या किसी भी कद्दावर नेता के पास कोई नैतिक बल नहीं है कि वह अपने तजुर्बे या अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर राजनीति करने के लिये आगे बढे । यह सवाल बीजेपी के लोकतांत्रिक ढांचे के लिये नुकसानदायक हो सकता है लेकिन समझना यह भी होगा कि मोदी का विरोध बीजेपी में कौन से नेता कर सकते है । हर किसी पर कोई ना कोई दाग है ही । या जो दागदार नहीं है वह इतने कमजोर है कि पार्षद का चुनाव नहीं जीत सकते है । और कुछ सत्ता के साथ खडे होकर नारे लगाते हुये कद्दावर होने का सपना पाल कर वक्त निकालने में माहिर है । यानी साल भर पहले जो वाज गुजरात से निकली उसने सिर्फ काग्रेस को ही पराजित नहीं किया बल्कि बीजेपी के भीतर के उस काग्रेसी कल्चर को हराया जो लुटियन्स की दिल्ली पर काबिज थी । इसिलिये साल भर पहले बीजेपी हेडक्वाटर के हंगामे और हर-हर मोदी, घर-घर मोदी के नारे में भी सुकुन था कि अब लुटियन्यस की दिल्ली का नैक्सेस खत्म होगा । इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, तीन मूर्ती से लेकर पार्लियामेंट एनेक्सी के बीच घुमडती सत्ता की ताकत खत्म होगी । लेकिन यह किसे पता था साल भर बीतते बीतते सत्ता के नये केन्द्र कही ज्यादा खतरनाक तरीके से पुराने केन्द्र को पीछे भी छोडेगें और लुटियन्स की दिल्ली को आधुनिक तरीके से लुभायेगें भी कि वह या तो सत्ता के नये केन्द्रो में शामिल हो जाये । या फिर सियासी कटघरे में ट्रायल के लिये तैयार रहे । यानी जो धड़कन 16 मई 2014 को देश के भीतर थी । वही घडकन 16 मई 2015 के बाद भी घुमड रही है अंतर सिर्फ इतना है साल भर पहले सुबह का इंतजार था। साल भर बाद सुबह को अंधेरे से बचाने के संघर्ष की धड़कन है ।

पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लॉग से 

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अब सूट-बूट के कलेक्टर चाहिए भाजपा सरकार को

कुछ साल पहले मैं छत्तीसगढ के रायगढ गया था तो वहां शहर में अतिक्रमण के चलते टूटे पक्के मकानों,विशाल ईमारतों को देख दंग रह गया था,क्योंकि अपने देा दशक के पत्रकारिता जीवन में मैंने गरीबों के झोपडे टूटते देखा है,अमीरों के पक्के अतिक्रमण कभी—कभार एक—दो तब टूटते हैं जब वो अमीर किसी नेता या अधिकारी से पंगा लेता है। लेकिन इसके विपरीत रायगढ में कलेक्टर अमित कटारिया का बुलडोजर बिना  किसी बीपीएल सूची के चला।

तब इन महोदय के बारे में पता किया तो पता चला कि ये मात्र एक रूपए वेतन लेते हैं। घर से संपन्न है और ज्यादा खर्च नहीं है इसलिए काम चल जाता है। रायपुर में भी इन्होंने निगम आयुक्त के रूप में बेहतरीन काम किया था,जिसका पता आज के रायपुर को देखकर लग सकता है। कुछ ऐसा ही नया रायपुर बनने पर गांव के युवाओं को प्रशिक्षण देकर किया।

अब जब बस्तर में कलेक्टर ही नक्सलियों के अपरहरण के शिकार हो रहे हैं और जब पीएम व सीएम के आने पर 20 हजार से अधिक सुरक्षाकर्मियों की तैनाती करनी पडती है तब एक कलेक्टर बस्तर में कलेक्टरी कर रहा है तो ये किसी बहादुरी से कम नहीं है।

ऐसे में प्रदेश की भाजपा सरकार को केन्र्द सरकार के प्रधानमंत्री कार्यालय से तथाकथित दिशानिर्देश मिलने पर सिर्फ इसलिए कारण बताओ नोटिस थमाया जाता है कि उन्होंने सूट नहीं पहना और चश्मा लगाया था। इसी तरह दंतेवाडा के युवा कलेक्टर केसी देवासीनपंथी को भी सूट नहीं पहनने पर नोटिस दिया गया।

सवाल यह उठता है कि अंग्रेजों को गए दशकों हो गया लेकिन प्रशासन और यह शासन अभी भी अंग्रेज बना है।

उम्मीद थी कि भाजपा सरकार आएगी और कुछ बदलाव होगा लेकिन मोदी सरकार आई और सच में यह सरकार सूटबूट की ही सरकार है।

अब इतनी गर्मी में कोई बेवकूफ ही होगा जो सूटबूट और टाई पहनेगा।लेकिन रमन सरकार को चाहिए।

दूसरी बात यदि यही प्रोटोकाल है तो प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के लिए कोई प्रोटोकाल नहीं है।

कहां गए संघ के लोग जो भाजपा को स्वदेशी बताते थे और कांग्रेस को अंग्रेज मानसिकता का। अब जवाब दें वो, कि क्या इस सूट बूट का समर्थन करते हैं वो।

लेखक अनिल द्विवेदी संपर्क : 9826550374

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चाय के सहारे चुनिंदा पत्रकारों को चारण-भांट बनाने की तैयारी में जुटे सुनील बंसल!

पत्रकारों से अपनापा जताते यूपी भाजपा के संगठन मंत्री सुनील बंसल

पत्रकारों से अपनापा जताते यूपी भाजपा के संगठन महामंत्री सुनील बंसल 

लखनऊ। पार्टी कार्यालय को कोतवाली की तरह चलाने तथा अपनी लक्‍जरी जीवन शैली से दीन दयाल उपाध्‍याय के एकात्‍म मानवतावाद को हाशिए पर रखने के आरोपों से घिरे यूपी भाजपा के संगठन महामंत्री सुनील बंसल चाय के सहारे कुछ अखबारों और न्‍यूज एजेंसी के पत्रकारों को साधने का प्रयास करने लगे हैं. कोतवालों की तरह कुछ पत्रकारों को अपना भांट-चारण बनाने की कोशिश कर रहे हैं. हाल तक पत्रकारों से दूरी बनाकर रखने वाले बंसल कलई खुलने की शुरुआत होने के बाद कुछ चुनिंदा पत्रकारों से नजदीकियां बढ़ा रहे हैं ताकि मौका आने पर खबरों का काउंटर कराया जा सके. 

दरअसल, पिछले दिनों कुछ अखबारों और चैनलों पर सुनील बंसल को लेकर ऐसी खबरें चलीं, जिससे साबित हुआ कि वो पार्टी के विचारधारा एकात्‍म मानवतावाद के विपरीत कार्यालय में लक्‍जरी सुख-सुविधा भोग रहे हैं, जबकि इनके पहले के संगठन मंत्रियों ने एक ही कमरे के भीतर अपना कार्यकाल काट दिया था. दिल्‍ली में कोतवाली चला रहे अमित शाह के नाम का धौंस देकर इन पर लखनऊ भाजपा कार्यालय को कोतवाली की तरह चलाने के आरोप लगे. कार्यकर्ताओं या पत्रकारों से मिलने में इनका सदा परहेज रहा. पर जब अंदर की खबरें बाहर आने लगीं तो बंसल साहब खबरों को मैनेज करने के लिए एक अदद पत्रकार-दलाल की तलाश करने लगे. 

इसी क्रम में इन्‍होंने कुछ पत्रकारों से अपनी नजदीकियां बढ़ाई ताकि खबरें रोकी जा सकें, पक्ष में खबरें लिखवाई जा सके. परेशान बंसल की सहायता के लिए सामने आया आरएसएस, संघ ने अपने समाचार एजेंसी हिंदुस्‍थान समाचार के माध्‍यम से बंसलजी मुश्किल कम करने की ठानी. संघ के एजेंसी के निर्देशन में यह योजना बनाई गई कि जल्‍द ही राजधानी के कुछ चुनिंदा पत्रकारों को उनसे मिलवाकर उनका एक ग्रुप तैयार कराएगा ताकि उनके खिलाफ छपने वाली खबरों को काउंटर किया जा सके. इसके लिए उक्‍त समाचार एजेंसी के कार्यालय में शुक्रवार को बड़ी गोपनीय तरीके से चाय पर चर्चा का कार्यक्रम रखा गया, जिसमें अतिथि बनाए गए सुनील बंसल जी और राजधानी के कुछ चुनिंदा पत्रकार. 

अत्‍यन्‍त ही गुपचुप तरीके से कार्यक्रम तैयार हुआ ताकि इस ग्रुप से बाहर के पत्रकारों को इसकी भनक ना लग सके. सारी सावधानियां बरती गईं. एजेंडा इतना फूल प्रूफ और पुख्‍ता बनाया गया कि हर दम एक साथ रहने वाले कई पत्रकार भी अपने साथी पत्रकारों से यह बात छुपा ले गए. पर, बात उस समय बाहर आ गई जब एक एजेंसी के पत्रकार ने बंसलजी के सामने उन पर कार्यकर्ताओं से दूरी बनाए रखने का आरोप लगाया और वाहवाही में इस बात को कुछ भाजपाइयों से शेयर कर दी. इसके बाद अन्‍य पत्रकारों तक भी यह सूचना पहुंच गई कि बंसलजी कुछ चुनिंदा पत्रकारों के साथ चाय पार्टी आयोजित कर उन्‍हें अपना बनाने की कोशिश की. 

खबर यह भी आ रही है कि सुनील बंसल कुछ चुनिंदा पत्रकारों का एक समूह तैयार कर रहे हैं, जो इनके खिलाफ चलने वाली खबरों को रोकने और उसका काउंटर करने का काम करेंगे. बदले में एकात्‍म मानवतावाद की ऐसी तैसी करके लक्‍जरी जीवन जीने वाले बंसलजी इनकी चिंता करेंगे. दरअसल, अब तक मीडिया से दूरी बनाकर रखने वाले बंसलजी खबरों के बाहर आने के बाद अपने चारण-भांट पत्रकारों का एक समूह तैयार करने जा रहे हैं, पहले चरण में इन्‍हें सफलता भी मिली है. चाय पीने वाले पत्रकार जल्‍द ही इसका एहसान भी चुकाने वाले हैं. सू्त्रों ने बताया कि चाय पर बुलाए गए पत्रकार बंसलजी के पक्ष में खबर छापकर-चलाकर चाय का एहसान उतारेंगे. 

बंसलजी के सामने मुश्किल यह है कि इनके निर्देशन में लड़े गए उपचुनावों-विधान परिषद चुनाव में हार होने के बाद कार्यकर्ता विरोध में आवाज उठाने लगे हैं. इनके कार्यशैली से परेशान भाजपा का मीडिया विंग खुद चैनल पत्रकारों को चुपचाप से इनकी सच्‍चाई बताकर पोल खोलने लगा है, जिसके बाद चैनलों पर बंसलजी की कलई खोलने की शुरुआत हुई है. यूपी भाजपा का मीडिया विंग अपने अपने खास पत्रकारों को सुनील बंसल से जुड़ी खबरें बताकर उन पर हमला करा रहा है. अब देखना है कि बंसलजी का नया चारण-भांट समूह उनको परेशानी से निजात दिलाता है या पार्टी का मीडिया विंग भारी पड़ता है?

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बस्ती में भाजपा सांसद का न्यूज चैनलों पर अटैक

बस्ती (उ.प्र.) : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नौ महीने के कार्यकाल का दबाव उनके सांसदों पर दिखने लगा है। अब जनता हिसाब चाहती है। हिसाब देने के चक्कर में इस जिले के सांसद इन दिनों गड़बड़ा गए हैं। सांसद हरीश द्विवेदी भरे मंच से घोषणा करते हुए जनता से अपील करते हैं कि जो चैनल मेरे खिलाफ खबर दिखाए, उसे देखना छोड़ दीजिए। इस पर केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा कहते हैं कि मीडिया नहीं रहेगा तो देश से लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा। 

केंद्रीय पर्यटन मंत्री महेश शर्मा के यहां एक कार्यक्रम में सांसद हरीश द्विवेदी ने उपस्थित कार्यकर्ताओं को सीख दी कि वे मीडिया से सावधान रहें क्योंकि ये भरोसे लायक नहीं रह गए हैं। इसी तरह मखौड़ा में जो कुछ उन्होंने कहा, वह संसदीय गरिमा के विपरीत रहा। हालांकि मौके पर मौजूद पर्यटन मंत्री ने मीडिया का बचाव करते हुए कहा कि कभी-कभी हो जाता है। इसे दिल से नहीं लेना चाहिए। हरीश द्विवेदी की तकलीफ क्या है, पिछले दिनों की एक जनसभा उसका भेद खोलती है। कार्यक्रम था ‘मन की बात’। उस समय उन्होंने कुछ बातें कही थीं, जिसे मीडिया के तमाम चैनलों ने प्रमुखता से प्रसारित किया था। 

प्रसारण के तुरंत बाद ही हरकत में आए सांसद ने प्रेस कांउसिल आफ इंडिया के माध्यम से नोटिस भी जारी करा दिया लेकिन अभी भी मीडिया के प्रति उनकी तल्खी बनी हुई है। लगता है कि उन्हें प्रेस परिषद की कारवाई पर भरोसा नहीं है। 

राजकुमार का ई-मेल संपर्क : bastirajkumar@gmail.com

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उल्टी खबर चलाने पर समाचार प्लस को सांसद का नोटिस, स्ट्रिंगर पर एक करोड़ का दावा ठोकेंगे

बस्ती (उ.प्र.) : इलेक्ट्रानिक मीडिया के चार पत्रकार अक्सर जिले में अपने कारनामों से चर्चा में रहने के लिये जाने जाते हैं। एक बार फिर इलेक्ट्रानिक मीडिया सेंटर के नाम से सक्रिय तथाकथित चार-पांच पत्रकारों की जुगलबंदी चर्चा में आ गई है। इस बार तो समाचार प्लस के स्ट्रिंगर्स की नौकरी भी मानो फंस सी गई है। ऐसी खबर है कि चैनल कभी भी अपने स्ट्रिंगर्स रजनीश को बाहर का रास्ता दिखा सकता है। 

इस तरह स्ट्रिंगर ने उल्टी खबर प्रसारित करा दी

 

सांसद द्वारा एनबीए को भेजी गई नोटिस की छायाप्रति

दरअसल यह विवाद भाजपा के सांसद द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम ‘मन की बात’ से शुरू हुआ। सांसद हरीश द्विवेदी ने कप्तानगंज ब्लाक क्षेत्र में मन की बात कार्यक्रम में जिले के युवाओं को आमंत्रित किया। इस कार्यक्रम में हर युवा सांसद से सीधा संवाद करते हुये अपनी भड़ास या मन की बात कह सकता था। इस न्यूज की कवरेज के लिये सांसद ने प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के सभी पत्रकारों को बुलाया। कार्यक्रम में एक युवक ने सांसद से भ्रष्टाचार समाप्त करने के उपाय के बारे में पूछ लिया। सांसद ने कहा कि केवल सरकारों के चाहने से भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा। उसके लिये हर किसी को ईमानदार बनना पड़ेगा। 

उदाहरण स्वरूप सांसद ने खुद का हवाला देते हुए कहा कि उनके घर सुबह 7 बजे क्षेत्र के तमाम लोग पहुंच जाते हैं, जो उनसे कुछ अपेक्षा लेकर आते हैं। कोई न कोई बहाना बनाकर वे उनसे अपनी मांग रख देते हैं। जबकि एक सांसद की सैलरी एक प्राईमरी स्कुल के अध्यापक के बराबर है। भत्ता वगैरह लेकर लगभग उन्हें भारत सरकार से एक लाख रूपये मिल जाते हैं। अगर वे रोज 20 हजार रूपये लोगों में बांटने लगेंगे तो इतना पैसा लायेंगे कहां से। इसके लिये वे चोरी करेंगे, चोरी करने वे जापान तो जायेंगे नहीं, चोरी वे यहीं करेंगे। सरकारी योजनाओं में काम करने वाले ठेकेदारों और अधिकारियों को वे बुलायेंगे और उनसे 50 प्रतिशत देने को कहेंगे। 

इस बात की समाचार प्लस के स्ट्रिंगर्स ने ऐसी एडिटिंग की कि सांसद महोदय के कहने का तात्पर्य ही पलट गया। समाचार प्रसारित होने के बाद हर किसी को लगा कि सांसद भी भ्रष्टाचार में लिप्त हो गये हैं और 50 प्रतिशत कमीशन मांग रहे हैं। जैसे ही इस बात की जानकारी सांसद हुई तो हैरत में पड़ गए। दबी जुबान चर्चा है कि रजनीश ने कुछ दिन पूर्व सांसद को अपने आवास पर आयोजित एक घरेलू कार्यक्रम में आमंत्रित किया था मगर सांसद व्यस्तता की वजह से नहीं पहुंच सके। इसी के बाद से रजनीश की सांसद से ठन गई। सपा के काबिना मंत्री राजकिशोर सिंह भी रजनीश को इस मुहिम में पूरा सहयोग कर रहे हैं। चैनल प्रबंधन को अंधेरे में रखकर सांसद के खिलाफ खबरें प्रसारित करवाई जा रही हैं। 

इतना सब होने के बाद सांसद ने समाचार प्लस और चार अन्य चैनलों के संपादकों को गलत खबर चलाने पर एनबीए के माध्यम से नोटिस भेजी है। सांसद ने स्ट्रिंगर्स के खिलाफ एक करोड़ के मानहानि का दावा ठोकने की भी प्रक्रिया शुरू कर दी है। सूत्रों के मुताबिक सांसद ने समाचार प्लस के किसी बड़े पद पर बैठे अधिकारी से इस बात की शिकायत की तो उन्हे बताया गया कि उनका कोई भी स्ट्रिंगर बस्ती जनपद में है ही नहीं। ऐसे में गलत खबरें चलाना रजनीश को भारी पड़ने की चर्चाएं हैं। मीडिया सेंटर के पत्रकारों का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी इन सभी पत्रकारों को बोर्ड परीक्षा में वसूली के दौरान बीच सड़क पर दौड़ा दौड़ा कर पीटा गया था। बावजूद कोई सबक लेने के इनके कारनामे बदस्तूर जारी हैं।

संबंधित वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें… https://www.youtube.com/watch?v=6jIFhQMTgrY

एक पत्रकार द्वारा भेजे गये पत्र पर आधारित

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औवेसी बंधुओं की एमआईएम ने यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा को भारी फायदा पहुंचाने की कवायद शुरू कर दी!

Saleem Akhter Siddiqui :  औवेसी बंधुओं की एमआईएम उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है। इस सिलसिले में उसके जिला स्तरीय नेता जगह-जगह सभाएं कर रहे हैं। कल ऐसी ही एक सभा में जाने का इत्तेफाक हुआ। वक्ताओं की उम्र 20 से 25 साल के बीच थी। उनका अंदाज-बयां सुनकर तोगड़ियाओं, साध्वियों, साक्षियों और भागवतों की याद आ गई।

अगर एमआईएम के नेता यह सोच रहे हैं कि हिंदूवादी नेताओं की शैली अपनाकर वह उत्तर प्रदेश में अपनी पैठ बना लेंगे, तो गलत सोच रहे हैं। ‘एक मुसलमान सौ पर भारी है’। या ‘हिंदुस्तान उनके बाप का नहीं है’ जैसे जुमलों से सिवाय भाजपा का हित करने से कुछ नहीं होगा। बोलने का सलीका सबसे पहले आना चाहिए। जोशीली तकरीरें करके तालियां हासिल की जा सकती हैं, वोट नहीं। महज मुसलमानों की राजनीति करके कहीं नहीं पहुंच पाएंगे। दो-चार सीटें निकाल लेंगे, तो पहाड़ नहीं तोड़ देंगे। हां, भाजपा को भारी फायदा पहुंचा देंगे।

मेरठ के पत्रकार और ब्लागर सलीम अख्तर सिद्दीकी के फेसबुक वॉल से.

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प्रतिबंध लगाना और थोपना भाजपा सरकारों की फितरत बनने लगा है : ओम थानवी

Om Thanvi : प्रतिबंध लगाना, थोपना भाजपा सरकारों की फितरत बनने लगा है। कोई किस वक्त कौनसी फिल्म देखे, राज्य तय कर रहा है। क्या खाएं, यह भी। अभी सिर्फ शुरुआत है, आगे देखिए। गौमांस के निर्यात में हम, अमेरिका को भी पीछे छोड़, भारी विदेशी मुद्रा कमा रहे हैं; मगर देश में राज्य गौमांस पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। वह भी सभी राज्य नहीं लगा रहे। महाराष्ट्र और गोवा दोनों जगह भाजपा का राज है, पर गोवा – जिसका हाईकोर्ट मुंबई में है – प्रतिबंध से बरी है। वजह महज इतनी है कि महाराष्ट्र में प्रतिबंध से वोट बैंक मजबूत होगा, गोवा में कमजोर!

 

दरअसल गौहत्या – और कतिपय अन्य पशुहत्या – पर प्रतिबंध की गली संविधान ही छोड़ गया है, हालांकि उसका मकसद संभवतः धार्मिक नहीं बल्कि खेती और पशुपालन को बढ़ावा देना था। अब जब शासन धार्मिक आस्थाओं का ही लिहाज कर चल रहे हैं, तो मैं कहता हूँ गाय-सूअर की हत्या के साथ तमाम पशुओं को मारने, दुख देने पर प्रतिबंध लगा दो क्योंकि जैन धर्म में इसकी अपेक्षा की गई है; पशुओं से तैयार खाद्य-पदार्थों की बिक्री के साथ आलू-कंदमूल और प्याज-लहसुन उगाने-बेचने तक पर भी प्रतिबंध लगाओ, धर्म में उनकी की भी मुमानियत है। … जब हम दो धर्मों का खयाल रख सकते हैं तो चार का क्यों नहीं? (मैं जैन नहीं, पर ऐसे प्रतिबंध से मेरा भी निजी भला होगा, आप जानते हैं!)

Om Thanvi : साहित्यकार कैलाश वाजपेयी के निधन पर हिंदी ही नहीं, अंगरेजी के बड़े अखबारों ने अप्रत्याशित रूप से बड़ी खबरें और स्मृतिलेख छापे। यह सुखद था। लेकिन कल शाम जब कैलाश कैलाशजी की स्मृति में आयोजित सभा (अरदास) में गया तो देखा कि वहाँ हिंदी के सिर्फ दो साहित्यकार थे – अशोक वाजपेयी और मृदुला गर्ग। मित्रों की ओर से बोलने वाले राजनारायण बिसारिया। बाकी सब दिवंगत कवि के घर-परिवार के लोग थे, मित्र-बांधव, पत्नी रूपा वाजपेयी और बेटी अनन्या के परिचित। बात चली तो पता चला कि कैलाशजी के अंतिम संस्कार में भी साहित्यकारों की उपस्थिति बड़ी दयनीय थी। … इतनी बड़ी दिल्ली और साहित्यकारों का इतना छोटा दिल?

वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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भाजपा सांसद श्यामा चरण गुप्त दलाल है!

Padampati Sharma : श्यामा चरण गुप्त इलाहाबादी को कौन नहीं जानता. 250 करोड़ के कारोबारी हैं.. वे कहते हैं कि बीड़ी में औषधीय गुण हैं. वे खुद बीड़ी किंग हैं. कई जातिवादी दलों में घूम फिर कर फिर से भाजपा का दामन थामा है. उम्मीद कुछ मोदी से ही है. कांग्रेस की रेप्लिका बन चुकी भाजपा से नहीं. पता नहीं, नमों पार्टी को सुधार पाएंगे कि पार्टी उन्हें ही तार देगी.. आने वाला समय तय करेगा… लेकिन सिगरेट निर्माता कंपनी की दलाली कर रहे हैं भाजपा सांसद, यह तय है…

यह हो क्या रहा है… भाजपा के दो तंबाकू प्रेमी सांसदों का दावा है कि तंबाकू से कैसर नहीं होता और इस संदर्भ में सरकार को सर्वे कराना चाहिए. एक हैं दिलीप गांधी और दूसरे हैं श्याम बीड़ी के अधिष्ठाता श्यामा चरण गुप्ता. मैं किसी सर्वे को नहीं जानता. मैं तो अपने चाचा पं बैकुंठ पति शर्मा ( गीगा गुरू ) को इसी तंबाकू की वजह से खो चुका हूं. हर वक्त उनके मुंह में गुटके के साथ पान घुला रहता था. मुंह का कैंसर हो गया. कोलकाता स्थित अपोलो अस्पताल में आपरेशन हुआ. लोगों से यही कहते थे ‘ कभी तंबाकू- गुटका मत खाना. चंद महीने ही जी सके. पतंजलि ( हरिद्वार ) भी मैं ले गया था उन्हें. वहां से बैरंग लौटा दिया.

यही नहीं मेरी फुफेरी बहन आरती परी जैसी थी पर हाय इसी तंबाकू ने उसका क्या बुरा हाल कर रखा था दो बार आपरेशन हो चुका था. जिंदगी जहन्नुम से गयी गुजरी हो चुकी थी और ये ‘दलाल’ सांसद किस तरह की बकवास कर रहे हैं ! मित्रों, आपसे हाथ जोड़ कर प्रार्थना है कि तंबाकू मिश्रित किसी भी चीज का सेवन न करें. करते हों तो त्याग दे. इच्छा शक्ति हो तो आप एक झटके में इस दुर्व्यसन से निजात पा सकते हैं. मैं कोई संत महात्मा नहीं हूं. साधारण सा इंसान हूं. कभी हजारों रुपये इसी कुआदत में बहा करते थे. बनारस मे दो दुकानों से बंधी का पान आता था. पान मसाला अलग से और आफिस में पान आता सो बताने की जरूरत नहीं.

एक दिन की बात है..एक चैनल लांच होने को था उस टीम में मैं भी था. एक दिन प्रोमो बन रहा था और मैं स्वामी क्रिकेटानंद महाराज के गेटअप में था. एक शाट में पाया कि बोलते समय एक सिट्टी मुंह से गिरती नजर आयी. शर्म के मारे पानी पानी हो गया. भागा भागा गया वाशरूम और कुल्ला करने के दौरान संकल्प लिया कि बस आज के बाद कुछ नहीं. तत्काल दूसरा प्रोमो बनवाया. इस बात को छह बरस होने को आए…हां, बनारस जाता हूं तो मित्र है लल्लू तीन दशक तक बंधी का पान खिलाया था, एकाध बीड़ा जमा लेता हूं बिना सुर्ती के. कभी बैडमिंटन खेलने के बाद सरस्वती फाटक स्थित उसकी दुकान पर आधा घंटे की बैठकी हुआ करती थी. बैठकी तो अब भी होती है पर बिना पान घुलाए ही. औसत साल मे महज दो पान का ही होगा. पहले हालत यह थी कि जरा सी भी गरम चीज हो, नहीं खा पाता था, सू सू करने लगता था, मिर्च तो देख भी नहीं सकता था. मैं भी गीगा चाचा और शरद पवार ( शतायु हों ) की राह पर बढ़ चला था. समय पर होश आ गया. आज सब कुछ आराम से खाता हूं जिंदगी मौज बन गयी. संसद का सत्र शुरू होने दीजिए इन सांसदों की थुक्का फजीहत देखने लायक होगी.

नोट : हमारे काठमांडो स्थित अनुज मानवेंद्र शर्मा ‘पप्पू’ ने अभी अभी बताया कि कुछ दिन पहले आरती नारकीय कष्ट से मुक्ति पा कर भगवान को प्यारी हो गयी..कर्सियांग (दार्जीलिंग ) में रहती थी. दिन भर तंबाकू वाली सुंघनी और गुड़ाकू ही करती थी. परमात्मा उसकी आत्मा को शांति प्रदान करें.

Om Thanvi : तम्बाकू के धंधे को कानून के कंधे का सहारा देने वाली संसदीय समिति के एक सदस्य श्यामाचरण गुप्ता (भाजपा) खुद बीड़ी-निर्माता हैं। उनको क्यों ऐसी समिति का सदस्य होना चाहिए? समिति – जिसमें आधे से ज्यादा सदस्य भाजपा के थे – के अध्यक्ष दिलीप गांधी भी भाजपा सांसद हैं। उनका तर्क थाः “भारत में कोई सर्वे नहीं हुआ जो तम्बाकू सेवन से कैंसर के संबंध को साबित कर सके; ऐसे जो अध्ययन हुए हैं, सब विदेश में हुए हैं।” विदेश में विज्ञान के अध्ययन क्या उसी देश पर लागू रहते हैं? यह दलील उद्योगपतियों के फायदे के लिए दी गई है या जन-समुदाय के? सांसद गुप्ता ने एक और हास्यास्पद तर्क दिया है। कहते हैं- “चीनी से डायबिटीज होती है, चीनी को तो प्रतिबंधित नहीं करते?” यह तर्क हास्यास्पद इसलिए भी है कि चीनी खाने की वजह से डायबिटीज या मधुमेह का रोग होता हो, कोई अध्ययन ऐसा नहीं कहता। हां, जिन्हें पहले से रोग है उनके लिए चीनी (और अन्य अनेक पदार्थ भी) जरूर नुकसानदेह होती है। और तम्बाकू और चीनी के गुणावगुण – है इनमें कोई साम्य? माना कि कॉरपोरेट का दौर-दौरा है, बीड़ी-सिगरेट के धंधे की रक्षा करनी है तो करो – पर कुतर्क तो न दो!

वरिष्ठ पत्रकार द्वय पदमपति शर्मा और ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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जिंदगी की जंग लड़ रहे पत्रकार की भाजपा विधायक ने की मदद, सपा सरकार बेखबर

लखनऊ : भारतीय जनता पार्टी के विधायक सत्यदेव पचौरी ने गत दिनो संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में अपना इलाज करा रहे वरिष्ठ पत्रकार उदय यादव से भेंट कर उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी प्राप्त की। उदय को दोनों किडनियां खराब होने के बाद इलाज के लिए भर्ती किया गया है। वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके दूसरे मंत्रियों ने उदय की ओर ध्यान तक नहीं दिया है। 

उदय यादव दैनिक जागरण और कई अन्य प्रमुख समाचार पत्रों में भी कार्य कर चुके हैं। पचौरी ने बीस हजार रुपए की आर्थिक मदद तत्काल निजी रूप से उपलब्ध करायी। साथ ही चिकित्सकों से उनकी बीमारी के बारे में भी चर्चा की। बाद में श्री पचौरी ने कानपुर के अन्य पत्रकारों के साथ चर्चा कर यादव के इलाज में अर्थिक मद्द दिलाए जाने हेतु हर संभव कोशिश करने का आश्वासन दिलाया। विधायक ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा अब तक पत्रकार के इलाज हेतु आर्थिक सहायता न उपलब्ध कराये जाने पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि यथाशीघ्र सरकारी स्तर से व निजी क्षेत्रों में पत्रकार के इलाज हेतु हर संभव सहायता का काम करेंगे।

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हमने कोई मिस्ड काल नहीं किया लेकिन भाजपा का मेंबर बनाकर बधाई तक मैसेज कर दिया!

Badal Saroj : दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी…. जिसे ढंगढौर से चोट्टयाई करना भी नहीं आता…  हमने कोई मिस्ड काल नहीं किया – कोई बटन नहीं दबाया, किसी मेल में दिए ऑप्शन को क्लिक नहीं किया। मगर हमारे दोनों सेल फ़ोन नंबर्स पर हमें भाजपा का सदस्य बनने के लिए बधाई दी जा चुकी है। इनके अलावा दो और नंबर्स हैं हमारे पास – जिन्हे हम फिलहाल इस्तेमाल नहीं कर रहे है, संभवतः उन पर भी इसी तरह की सदस्यता प्राप्ति के मेसेज आये होंगे। इस तरह हम एक ऐसी पार्टी के चार बार सदस्य बन चुके हैं, जिसकी किसी भी बात से हम सहमत नहीं हैं।

इन संदेशों में रिप्लाई-बैक का कोई प्रावधान नहीं है। इस बेहूदगी के बारे में आपत्ति जताने का कोई स्थान नहीं है। बहरहाल इसे हम सड़क पर चलते समय कौओं के झुण्ड द्वारा उड़ते में की गयी निवृत्ति से कपड़ों पर पड़ी छींट की तरह नव-तकनीक से उपजी निजी त्रासदी के रूप में ले लेते हैं।  मगर इस लिहाज से भी तो अमितशाह-मोदी की भाजपा का सदस्यता अभियान अभी बहुत पीछे है। इन्हे तो ढंगढौर से चोट्टयाई करना भी नहीं आता।

दिसंबर 2014 में देश में कुल जीवित मोबाइल कनेक्शन्स थे 970.97 मिलियन अर्थात 97+ करोड़। इनमे प्रतिमाह औसत बढ़ोत्तरी 5.88 मिलियन की दर से होने के रुझान के हिसाब से तीन माह में कुल नए कनेक्शन्स जुड़े 17.64 मिलियन। कुल हुए 988.61 मिलियन अर्थात 98 करोड़ 86 लाख 10 हजार। (Source : Telecommunications in India)  इन 98 करोड़ 86 लाख 10 हजार मे से फर्जी मेसेज भेजने का काम अभी तक ये भाई लोग – दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के साथ होने के बावजूद – केवल 8+ करोड़ फोन तक ही कर पाये हैं! यार किसी काम में तो अपना नाकारापन झुठलाओ!!

मध्य प्रदेश के वरिष्ठ सीपीएम नेता बादल सरोज के फेसबुक वॉल से.

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