यूपी के वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार के मुताबिक नए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को गुनाहगारों की लिस्ट में नहीं खड़ा किया जा सकता

अजय कुमार, लखनऊ

भारतीय नववर्ष के पहले ही दिन उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी को अपना नया हाकिम मिल गया। यूपी में अगले साल होने वालो विधान सभा चुनाव में कमल खिलाने की जिम्मेदारी भाजपा आलाकमान ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की सहमति के बाद कट्टर हिन्दूवादी छवि वाले नेता और सांसद केशव प्रसाद मौर्य पर डालकर बड़ा दांव चल दिया है। अति पिछड़ा वगै से आने वाले केशव के उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनते ही यूपी की सियासी पारा एकदम से बढ़ना स्वभाविक था और ऐसा ही हुआ। कांग्रेस, सपा और बसपा एक तरफ केशव की कुंडली खंगाल रहे हैं तो दूसरी ओर उनकी ताजपोशी से होने वाले नफा-नुकसान का भी आकलन भी इन दलों द्वारा किया जा रहा है।

केशव को सूबे की कमान सौंपे जाते ही यह साफ हो गया है कि दिल्ली-बिहार में सियासी प्रयोग का खामियाजा भुगत चूकी भाजपा यूपी में ऐसी गलती नहीं करना चाहती है। वह यूपी की सत्ता हासिल करने के लिये उन्हीं तौर-तरीकों को अजमायेगी जिस पर कांग्रेस से लेकर सपा, बसपा और अन्य छोर्ट-छोटे दल दशकों से चले आ रहे हैं। भाजपा आलाकमान ने संकेत दे दिया है कि वह 55 प्रतिशत पिछड़ों-अति पिछड़ों को लुभाने के लिये सपा-बसपा और कांग्रेस को कांटे की टक्कर देगी। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की संसदीय सीट पर पहली बार कमल खिलाने वाले केशव प्रसाद मौर्य का यूपी भाजपा अध्यक्ष बनना काफी आश्चर्यजनक रहा। वह यूपी का प्रदेश अध्यक्ष बनने के इच्छुक नेताओं की दौड़ में सबसे पीछे चल रहे थे, लेकिन अचानक ऐसे समीकरण बदले की र्मार्य सबसे आगे हो गये।

केशव के चयन का हिसाब-किताब लगाया जाये तो  आलाकमान को उनकी संघ से उनकी करीबी,पिछड़ा चेहरा, कट्टर हिन्दुत्व और भगवा छवि काफी रास आया। केशव ऐसे नेता हैं जो भले ही राम मंदिर की बात नहीं करेंगे,लेकिन लम्बे समय तक राम आंदोलन से रहा उनका जुड़ाव लोंगो को याद आता रहेगा। इसी तरह भले ही नये भाजपा अध्यक्ष अपनी कट्टर हिन्दुत्व और भगवा छवि का प्रचार करने से बचेंगे, मगर सियासी पिच पर वह कई बार हिन्दू समाज के हितों की रक्षा करने के लिये कर्णधार की भूमिका में नजर आ चुके हैं, जिसे कोई भूलेगा नहीं। पिछड़ा चेहरा तो हैं ही। केशव भाजपा के उस वोट बैंक को वापस ला सकते हैं जो पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के कमजोर पड़ने के कारण पार्टी से दूर चला गया था। ओम प्रकाश सिंह की निष्क्रियता के कारण उनकी पकड़ वाला वोट बैंक भी जो भाजपा से दूर चला गया था, केशव प्रसाद के अध्यक्ष बनने  से वापस आ सकता है।

नवनिुयक्त अध्यक्ष को सियासी रीति-रिवाजों के अनुसार नई पीढ़ी का नेता भी माना जा सकता है।उम्र के हिसाब से केशव और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के बीच कोई खास अंतर नहीं है।छात्रों के बीच सक्रियता और छात्र राजनीति से उनका लगाव कई मौको पर उजागर हो चुका है। केशव प्रसाद भले ही प्रदेश की कमान संभालने वाले 12 वें भाजपा नेता हो,लेकिन पिछड़ा समाज से आकर प्रदेश की कमान संभालने वाले वह चौथे नेता हैं। इससे पूर्व कल्याण सिंह, ओम प्रकाश सिंह और विनय कटियार प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रह चुके हैं। केशव के खिलाफ विरोधी यह प्रचार कर सकते हैं कि उनके ऊपर कई आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं, मगर ऐसा करते समय विपक्ष को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि कहीं यह दांव उलटा न पड़ जाये। केशव पर ज्यादातर मुकदमें ऐसे दर्ज है जिनका संबंध उनके (भाजपा) वोट बैंक की मजबूती से जुड़ा है। एक वर्ग विशेष को खुश करने वाली सपा, बसपा सरकारों और कांग्रेस की कथित धर्मरिपेक्षता के खिलाफ उन्होंने कई बार सड़क पर आकर संघर्ष किया है। इस वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा और मुकदमें भी दर्ज हुए, लेकिन आज तक किसी मुकदमें में फैसला नहीं आ पाया है। इसलिये उन्हें गुनाहगारों की लिस्ट में नहीं खड़ा किया जा सकता है।

लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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अवसरवादी भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अदभुत डांस… देखें ये पांच वीडियो…

Yashwant Singh : भजपइये पूरे बकलोल होते हैं क्या… यार, मंदिर में कोई नेक कार्यक्रम कराने जा रहे हो तो मंत्री जी खातिर भीड़ जुटाने के वास्ते बार बालाओं का डांस क्यों करा दिया? क्या अब जनता को बुलाने जोड़ने के लिए यही तरीका बच गया है? क्या वाकई जमीनी लोकप्रियता भाजपा की खत्म हो चुकी है जो भीड़ दिखाने के लिए ठुमके लगवाने का ही आप्शन शेष रहा… खैर, मजा आप लोग भी लो…

अवसरवादी भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अदभुत डांस… देखें ये पांच वीडियो… यूपी के बलिया में मंदिर परिसर के अंदर बनी गौशाला में तैयार मंच पर बारबालाओं के खूब ठुमके लगे. केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के लिए ये मंच सजा था. भीड़ गायब न हो जाए इसलिए बार बालाओं का डांस जमकर चालू रहा. गिरिराज ज्यों आए, बार बालाओं को गायब कर दिया गया. उसके बाद गिरिराज जी ने मुर्गी पालन से लेकर गोपालन तक की बात करते हुए नेहरू से लेकर पाकिस्तान और मीडिया तक को कोसा गरियाया… वो ज्यों गए फिर चालू हो गया बार बालाओं का डांस. कहने वालों ने कहा- अदभुत है अवसरवादी भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का डांस!

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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https://www.youtube.com/watch?v=vesiRxDdJD0

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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पेशे व योग्यता से शेयर ब्रोकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भावनाओं से खेलने में उस्ताद हैं

Anil Singh :  राजनीति के दल्ले कहीं के! संसदीय राजनीति हो या मकान की खरीद, शेयर बाज़ार या किसी चीज़ की मंडी, दलाल, ब्रोकर या बिचौलिए लोगों की भावनाओं को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। राजनीति में सेवा-भाव ही प्रधान होना चाहिए था। लेकिन यहां भी भावनाओं के ताप पर पार्टी या व्यक्तिगत स्वार्थ की रोटियां सेंकी जाती हैं। इसीलिए इसमें वैसे ही लोग सफल भी होते हैं।

जैसे, भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह पेशे व योग्यता से शेयर ब्रोकर हैं। पूर्णकालिक राजनीति में उतरने से पहले वे पीवीसी पाइप का धंधा करते थे। मनसा (गुजरात) में उनका करोड़ों का पैतृक निवास और घनघोर संपत्ति है। मां-बाप बहुत सारी ब्लूचिप कंपनियों के शेयर उनके लिए छोड़कर गए हैं।

भावनाओं से खेलने में अमित शाह उस्ताद हैं। अयोध्या में राम मंदिर की शिलाएं भेजने में वे सबसे आगे रहे हैं। 2002 में गोधरा से कारसेवकों के शव वे ही अहमदाबाद लेकर आए थे। सोमनाथ मंदिर के वे ट्रस्टी हैं। बताते हैं कि उनके बहुत सारे मुस्लिम मित्र हैं। अहमदाबाद के सबसे खास-म-खास मुल्ला तो उनके अभिन्न पारिवारिक मित्र हैं। उनके साथ वे शाकाहारी भोजन करते रहते हैं, लेकिन इस बाबत वे सार्वजनिक तौर पर बात नहीं करते।

कांग्रेस तो ऊपर से नीचे तक दलालों की ही पार्टी हैं। भाजपा, कांग्रेस, सपा व बसपा जैसी तमाम पार्टियों के नेतागण समझते हैं कि भारतीय अवाम को भावनाओं और चंद टुकड़ों के दम पर नचाया जा सकता है। चर्चा है कि जब प्रधानमंत्री मोदी से कुछ लोगों ने कहा कि आपकी छवि इधर खराब होती जा रही है तो उनका कहना था कि आखिरी दो साल (2017 से 2019) में सब संभाल लेंगे और उनकी यह रणनीति गुजरात में सफल होती रही है। लेकिन इन तमाम नेताओं को जनता की तरफ से रोहित बेमुला की मां राधिका ने बहुत सही जवाब दिया है।

सरकार की तरफ से दिए जा रहे 8 लाख रुपए को ठुकराते हुए इस 49 साल की स्वाभिमानी महिला ने कहा, “हमें तुम्हारे पैसे नहीं चाहिए। आठ लाख क्या, तुम आठ करोड़ रुपए भी दोंगे तो हमें नहीं चाहिए। मुझे बस इतना बता दो कि मेरा बेटा क्यों मरा?”

राधिका वेमुला का यह भी कहना था, “जब निर्भया नाम की लड़की से नृशंस बलात्कार व हत्या हुई, तब क्या किसी ने उसकी जाति पूछी थी? फिर रोहित की जाति पर क्यों सवाल उठाए जा रहे हैं?” मालूम हो कि रोहित की जाति पर पहला सवाल मोदी सरकार की चहेती मंत्री व अभिनेत्री स्मृति ईरानी ने बाकायदा प्रेस कॉन्फरेंस करके उठाया था। मोदी ने रोहित को ‘मां भारती का लाल’ कह कर जनभावना का दोहन करने की कोशिश की है। लेकिन हमें भी राधिका बेमुला की तरह आगे बढ़कर जवाब देना चाहिए – भावनाओं की दुकान कहीं और जाकर खेलो, अब हम तुम्हारे झांसे में आनेवाले नहीं हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और अर्थकाम डाट काम के संपादक अनिल सिंह के फेसबुक वॉल से.

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सावधान, भाजपा राज में मिमिक्री करने वाले जेल जाएंगे, कॉमेडियन किकू शारदा गिरफ्तार

खबर है कि टीवी कलाकार कीकू को गुरुमीत राम रहीम की नकल (मिमिक्री ) उतारने के ले IPC की धारा 295 A के तहत धार्मिक भावनाएं आहत करने के अपराध में गिरफ्तार कर लिया गया है. यह वही गुरमीत है जो खुद गुरु गोविंदसिंह का वेश धारण करता है. तब इसके भक्तों को मोतियाबिंद हो गया था शायद. गुरमीत कब से और कौन से धर्म का ठेकेदार बन गया है भई? या २०१४ के आम चुनाव में भाजपा को समर्थन देने के एवज में ‘धर्म के ठेकेदार’ की पदवी मिली है?

साध्वी संध्या जैन के फेसबुक वॉल से.

महाराष्ट्र की सहिष्णु भाजपा सरकार ने कॉमेडियन किकू शारदा को अपने समर्थकों को बधिया करने जैसे तमाम आरोप झेल रहे बाबा राम रहीम की मिमिक्री करने के जुर्म में गिरफ्तार किया। उम्मीद है उसकी इस करतूत से पंजाब की सहिष्णु भाजपा-अकाली सरकार को डेरा सच्चा सौदा का समर्थन लेने में मदद मिलेगी।  Maharashtra’s tolerant BJP govt arrests Actor Kiku Sharda for mimicking controversial Godman Ram Rahim (accused, among othher things, of castrating his followers). Move expected to help Punjab’s tolerant BJP-Akali govt get Dera’s support, something it desperately needs!

मानवाधिकारवादी समर अनार्या के फेसबुक वॉल से.

BJP Govt Haryana arrests Comedian Kiku Sharda for doing mimicry on Baba Gurmeet Ram Rahim. Mimicry not allowed?

वरिष्ठ पत्रकार Vinod Mehta का ट्वीट

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आज छपी इन तीन खबरों के जरिए जानिए भाजपा का चाल, चरित्र और चेहरा

Anil Singh : तीन खबरों में चाल-चरित्र और चेहरा! आज छपी तीन खबरें जो सरकार के चाल-चरित्र व चेहरे को समझने के लिए काफी हैं। एक, उत्तर प्रदेश के शामली कस्बे में एक मुस्लिम युवक का चेहरा कालिख से पोतकर सड़क पर जमकर पीटनेवाले बजरंग दल के जेल में बंद नेता विवेक प्रेमी पर लगा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश पर हटा लिया गया।

दो, महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों में प्रशिक्षण के लिए किसानों से स्वैच्छिक अनुदान में मिले धन को राज्य की भाजपा सरकार ने किसानों पर न खर्च करके अपने कर्मचारियों के वेतन में लगा डाला।

तीन, प्रवर्तन निदेशालय ने सुषमा स्वराज के पारिवारिक मित्र और अरुण जेटली के सह-क्रिकेट प्रशासक ललित मोदी की जांच के लिए सिंगापुर की सरकार को कानूनी रूप से इतना अस्पष्ट और लचर पत्र लिखा था कि सिंगापुर सरकार को कहना पड़ा कि आप नियम तोड़ने के मामले साफ-साफ बताएं, तभी तो हम कुछ मदद कर सकते हैं।

इंडियन एक्सप्रेस के 7 जनवरी के मुंबई संस्करण में ये खबरें प्रमुखता से छपी हैं.

मुंबई में रह रहे वरिष्ठ पत्रकार और अर्थकाम डॉट कॉम पोर्टल के संपादक अनिल सिंह के फेसबुक वॉल से.

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भाजपा और कांग्रेस दोनों अपराधी पार्टियां : जस्टिस काटजू

Markandey Katju : Criminal Organizations… I regard the Congress and the BJP as criminal organizations. In 1984 that criminal gangster Indira Gandhi, who imposed a fake ‘ Emergency’ in 1975 in India in order to hold on to power after she had been declared guilty of corrupt election practices by the Allahabad High Court, an ‘ Emergency in which even the right to life was suspended, and lacs of Indians were falsely imprisoned, was assassinated.

As a reaction, the Congress Party led by Rajiv Gandhi organized a slaughter of thousands of innocent Sikhs, many of whom were burnt alive by pouring petrol or kerosene on them and setting them on fire. When there were protests against this horrendous crime, Rajiv Gandhi said ‘ jab bada ped girta hai, dharti hil jaati hai’ (when a big tree falls, the earth shakes). It is believed that he gave oral instructions to the police not to interfere with the massacres for 3 days (see my blog ‘The 1984 Sikh riots’).

Soon after these horrible massacres, elections to the Lok Sabha was declared, and Congress swept the polls on this emotional wave winning a record 404seats in the 532 seat Lok Sabha, while BJP won only 2 seats.

In 2002 the massacre of Muslims was organized in Gujarat by BJP led by our friend, and the result was that BJP has been regularly winning the Gujarat elections ever since, and has even won the Lok Sabha elections in 2014.

So the message which has been sent is loud and clear : organize massacre of some minority in India, and you will sweep the polls. Never mind how much misery you cause to many people.

Are not the Congress and BJP, and even many smaller political parties, which are responsible for horrible deeds and for systematically looting the country of a huge amount of money for decades, and for causing such terrible sufferings and misery to the people, criminal organizations, most of whose members deserve the gallows?

देश के शीर्षस्थ चर्चित न्यायाधीश रहे और अपनी बेबाक बयानी व बेबाक लेखनी के लिए विख्यात जस्टिस मार्कंडेय काटजू के फेसबुक वॉल से.

जस्टिस काटजू साहब का लिखा ये भी पढ़ें>

Great Injustice to Urdu in India

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भारत में क्रांति के लिए माहौल तैयार… वजह गिना रहे हैं जस्टिस काटजू

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मुलायम से पंगा लेने वाले आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर की पत्नी नूतन ठाकुर भाजपा में शामिल होंगी

मैंने आज भाजपा में शामिल होने का फैसला लिया है. राजनीति में आने के मेरे फैसले का मुख्य कारण है कि मैंने अपने सामाजिक कार्यों के दौरान यह अनुभव किया कि वृहत्तर स्तर पर समाज की सेवा कर पाने और अधिक प्रभाव के सामने अपनी बात रख पाने के लिए एक राजनैतिक पार्टी के मजबूत संबल की बहुत अधिक जरुरत है. भाजपा में शामिल होने के मुख्य कारण यह हैं कि इस पार्टी में वंशवाद नहीं है, इसमें सर्वाधिक आतंरिक प्रजातंत्र है, यह विभिन्न वगों में विभेद नहीं करता है, एक अखिल भारतीय पार्टी है और राष्ट्रीयता की भावना पर आधारित है. जल्द ही मैं औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता ग्रहण करुँगी.

Today I have decided to join BJP. The main reason for my joining politics is that I have understood during my social activities that there is an immense need for support of a strong political party to work more effectively and efficiently for the larger social goals. The reasons for joining BJP are that it does not have any dynastic politics, has the highest inner democracy, it does not discriminate between different classes, is an all India Party and is based on the concept of Nationality. Very soon I shall be taking formal membership of the Party.

यूपी कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर की पत्नी डॉ नूतन ठाकुर के फेसबुक वॉल से.

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भाजपा जिलाध्यक्ष टिकट देने के लिए दो लाख रुपये रिश्वत मांग रहा (सुनें टेप)

घटना उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की है. BJP जिलाध्यक्ष जगदीश तिवारी ने एक व्यक्ति से टिकट दिलाने के बदले दो लाख रुपये रिश्वत मांगा था. घूस की उनकी बातचीत का ऑडियो वायरल हो गया है. इसके बाद भाजपा ने जगदीश तिवारी को पद से हटा दिया.

भाजपा जिलाध्यक्ष जगदीश तिवारी को पदमुक्त कर उनकी जगह उदयन पालीवाल को प्रभारी जिलाध्यक्ष बनाया गया है. टेप सुनने के लिए इस यूट्यूब लिंक पर क्लिक करें : https://www.youtube.com/watch?v=0ZppDeDRRQs

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‘भारतीय जुमला पार्टी’ का ‘शवराज’ हाय हाय : शीतल पी सिंह

मध्य प्रदेश में भारतीय जुमला पार्टी ने हर क़िस्म की सार्वजनिक राजनैतिक नैतिकता की धज्जियाँ उड़ा कर सत्ता क़ायम कर रक्खी है ।

वहाँ एक ऐसे सज्जन को राज्यपाल पद पर सुशोभित कर रक्खा है जिन पर ख़ुद व्यापम घोटाले में संलिप्तता का आरोप/संदेह/पारिवारिक भागीदारी के तथ्य मौजूद हैं । उनके बेटे पर आरोप थे और उसने भी संदिग्ध ढंग से आत्महत्या कर ली थी। राज्यपाल महोदय कांग्रेस के ज़माने में इस पद पर लाये गये थे पर बीजेपी के रत्न में बदल गये हैं जैसे नसीब तंग !

आरोप और तथ्य बरसों से मुख्यमंत्री शवराज के परिजन (पत्नी ) और मुख्यमंत्री के आवास के फ़ोन नं के लगातार स्तेमाल की गाथा गा रहे हैं पर कान पर जूँ रेंगने को तैयार नहीं !

लगता ही नहीं कि यह किसी जवाबदेह राष्ट्रीय पार्टी के राज्य का मसला है !

अब जब इस कांड की बदबू लंकाकांड की तरह मध्यप्रदेश की बाउंड्री लाँघ देश विदेश में सड़ रही है तब भी “पार्टी विद डिफरेन्स” नानसेन्स मोड में ही विद्यमान है ।

देश के सवर्ण तबक़ों का बड़ा हिस्सा भाजपा की वकालत करना धरम मानता रहा है। जिन ४६ लोगों की व्यापम ने अब तक बलि ली है उनमें ९०% सवर्ण ही हैं अब इस पर उनकी बोलती भी बन्द है ।

बोलती तो मेरी भी बन्द है , समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ ? ये जो कुछ जैसे जहाँ तक हो रहा है उसकी सिर्फ़ व्याख्या करने पर ख़ुद से ख़ुद को शर्म आ रही है !

शवराज हाय हाय

शीतल पी सिंह के एफबी वाल से

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भाजपा के आईटी सेल ने नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया समर्थकों में कराया दो-फाड़!

Sharad Tripathi : नरेंद्र मोदी के सर्वाधिक मजबूत गढ़ “सोशल मीडिया” पर पार्टी के भीतर से ही अबतक का सबसे बड़ा और सफल हमला. हमले में पार्टी के IT CELL गैंग ने निभायी निर्णायक और महत्वपूर्ण भूमिका. केंद्र में सत्तारूढ़ होते ही दिल्ली के “अंधाधुंध” भाजपाई दरबार में कैसे कैसे गधे पंजीरी खा रहे हैं और कैसे कैसे बंदरों के हाथों में किस किस तरह के उस्तरे चमक रहे हैं इसका सर्वाधिक शर्मनाक उदाहरण दो दिन पूर्व सामने आया है.

वैसे तो मैं इसको काफी समय से पूरी तरह अनदेखा कर रहा था. तटस्थ था और इसपर कुछ भी नहीं लिख रहा था. लेकिन कल जब इनके हौसले इतनी बुलंदी पर पहुंचे की इनकी जयचंदी/विभीषणी फ़ौज़ ने आप और हम जैसे लाखों मोदी समर्थकों को सार्वजनिक रूप से “अयोग्य मूर्खों” की संज्ञा देकर सोशल मीडिया के मंचों पर हमारी आपकी खिल्ली उड़ाना प्रारम्भ की तो मुझे लगा कि अब चुप्पी तोड़नी ही होगी तथा सोशल मीडिया में निस्वार्थ भाव से देशहित में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में अपनी अपनी शैली में अपनी अपनी क्षमतानुसार यथासम्भव योगदान कर रहे लाखों राष्ट्रवादियों की कलम/कीबोर्ड/विचारों का ठेकेदार होने का दावा कर रहे गधों और बंदरों की फ़ौज़ का चेहरा भी बेनकाब करना ही होगा.

दो दिन पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निवास पर उनसे 150 उन लोगों की भेंट करायी गयी जो सोशल मीडिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हैं. इन 150 लोगों की लिस्ट तैयार की थी पार्टी के IT CELL ने. यहाँ तक कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था. लिस्ट का पैमाना क्या था, वो कौन लोग थे.? सरीखे प्रश्न भी अप्रासंगिक थे क्योंकि सोशल मीडिया में जिस नेता के करोड़ों प्रशंसक समर्थक हों और उनमे से केवल डेढ़ दो सौ लोगों को चुनना हो तो. जाहिर सी बात है कि बहुत से उन लोगों को धैर्य रखना ही होगा जिनको नहीं चुना गया हो. क्योंकि यदि वो चले जाते तो उनके जैसा कोई और छूट जाता. अतः कौन बुलाया गया किस आधार पर क्यों बुलाया गया सरीखे प्रश्न कोई मायने नहीं रखते.

किन्तु प्रधानमंत्री से मिलने के बाद उन 150 लोगों ने सोशल मीडिया पर जब अपनी मूर्खता धूर्तता और उदण्डता का नंगा नाच शुरू किया तो उपरोक्त सभी प्रश्न अत्यधिक प्रासंगिक हो गए तथा उन 150 लोगों का चयन तथा उन्हें चुनने वाले IT CELL के ठेकेदारों की नीयत और नीति संगीन सवालों के घेरे में आ गयी. प्रधानमंत्री से मिलने के बाद बुरी तरह बौराये उन 150 लोगों ने सोशल मीडिया में ट्विटर और फेसबुक पर खुद का महिमा मंडन ‪#‎SUPER150‬ के साथ इस प्रकार करना प्रारम्भ किया मानो केवल वो डेढ़ सौ लोग सुपर हैं शेष करोड़ों समर्थक लुल्ल हैं. किन्तु पार्टी के IT CELL के इन VVIP गुर्गों की मूर्खता धूर्तता और उदण्डता की सुनामी इतने पर ही शांत नहीं हुई. इन लोगों ने उन करोड़ों मोदी समर्थकों को non deserving foolsअर्थात वे “मूर्ख” जो उस भेंट के “योग्य” नहीं थे, कहकर उनपर कीचड़ उछालना/उन्हें अपमानित करना शुरू किया.

अपने इन VVIP गुर्गों की इस करतूत/कुकर्म के खिलाफ बोलने के बजाय BJP IT CELL के ठेकेदारों ने शातिर चुप्पी साधे रखी, और झगड़े की आग भड़कने दी. उनकी इस करतूत ने शेष समर्थकों के धैर्य की सारी हदें ध्वस्त कर दी थी अतः जवाब में शुरू हुई जोरदार जूतांजलि से 150 VVIP मूर्खों की फ़ौज़ थर्रा उठा थी. परिणामस्वरूप उसकी तरफ से तत्काल एक फूहड़ और बचकानी सफाई दी गयी कि non deserving fools हम खुद अपने लिए कह रहे हैं. लेकिन देर हो चुकी थी, लकीरें खिंच गयी थीं. और मोदी के सबसे मजबूत गढ़ सोशल मीडिया में सबसे तगड़ा हमला कर उसके समर्थकों को आपस में लड़वा कर मोदी के सबसे मजबूत दुर्ग की दीवारों में दरारे डालने का BJP IT CELL का षड्यंत्र पूरी तरह सफल हो चुका था. इस काम की सुपारी उसे किसने दी.? जाँच इसकी होनी चाहिए. समर्थक अभी भी आपस में जूझ रहे हैं.

अब जानिये उन लोगों को, उनकी कर्मठता कर्तव्य परायणता और दायित्व निर्वहन के सच को जिन्होंने 150 लोगों को मोदी समर्थक होने के प्रमाणपत्र जारी किये थे कि कौन 150 सौ लोग मोदी समर्थक हैं कौन नहीं… BJP IT CELL के देश भर के ठेकदार हैं अरविन्द गुप्ता. इनकी गिनती अरबपति नेताओं में होती है. ये उसी नईदिल्ली विधानसभा के जोरबाग इलाके में रहते हैं जिस नयी दिल्ली विधानसभा सीट से अरविन्द केजरीवाल 32 हज़ार वोटों से अधिक की प्रचंड शर्मनाक पराजय की कालिख BJP के मुंह पर पोतकर दिल्ली का CM बना है. अब इसके बाद गुप्ता जी की कर्मठता कर्तव्य परायणता और दायित्व निर्वहन के सच के बारे में कुछ कहना बेकार ही है.

इस लिस्ट के लिए समर्थक होने का प्रमाणपत्र जारी करनेवाला दूसरा नाम है विकास पाण्डेय. इनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक योग्यता यह है कि, यह एक भाजपा नेता के सुपुत्र हैं इसीलिए पूरे देश में सोशल मीडिया में कौन मोदी समर्थक है कौन नहीं इसका प्रमाणपत्र बाँटने का ठेका पार्टी ने इनको सौंप रखा है. इनके विषय में ज्यादा कुछ लिखने कहने के बजाय बस इतना कहूँगा कि एकबार खुद इनकी अपनी टाइमलाइन पर नज़र जरूर डालिये. फिर खुद फैसला करिये.

#‎narendramodi‬ #‎AmitShah‬

कई मीडिया हाउसों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके मेरठ निवासी शरद त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से.

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सीएम अरविंद केजरीवाल के टीवी विज्ञापन पर भाजपा का प्रहार, सुप्रीम कोर्ट जाने की धमकी

इन दिनों टीवी पर केजरीवाल सरकार का एक ऐड चल रहा है जिसमें अरविंद केजरीवाल को छोड़ कर बाकी सभी नेताओं को बेईमान बताया जा रहा है। विज्ञापन को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का ‘उल्लंघन’ करार देते हुए भाजपा ने धमकी दी है कि अगर इसे तुरंत नहीं हटाया गया तो वह सुप्रीम कोर्ट जाएगी। केजरीवाल सरकार विज्ञापन पर पैसे की बर्बादी कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने एक फैसले में कहा था कि सरकारी विज्ञापनों में मुख्‍यमंत्री, मंत्री, गवर्नर समेत किसी नेता की तस्वीर नहीं लगा सकते। सरकारी विज्ञापनों पर केवल प्रधानमंत्री, राष्‍ट्रपति और सीजेआई की तस्‍वीर लग सकती है। विज्ञापनों में इन तीनों की तस्‍वीर तभी लगाई जा सकती है, जब वे खुद इसकी जवाबदेही लेंगे।

भाजपा के राष्ट्रीय सचिव आर. पी. सिंह ने शनिवार को एक बयान में कहा, “हालांकि, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का चेहरा नहीं दिखाया जा रहा रहा है, लेकिन बार-बार उनका नाम लेकर उन्हें ‘गरीबों का मसीहा’ बताने की कोशिश की जा रही है। जबकि अन्य दलों के नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और मीडिया को खलनायक की तरह पेश किया जा रहा है। ‘आप’ का यह ऐड सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। बीजेपी नेता जीवीएल नरसिम्हा राव ने कहा कि नेशनल टीवी पर ‘आप’ सरकार का ऐड झूठ से भरा है। अरविंद केजरीवाल के पास सफाई कर्मचारियों को सैलरी देने के लिए पैसा नहीं है, लेकिन असंवैधानिक तरीके से अपने प्रचार के लिए पैसा खर्च कर रहे हैं। 

आप के प्रवक्ता आशुतोष ने कहा है कि बीजेपी आप को दिल्ली ही नहीं पूरे देश से खत्म करना चाहती है। हम लोग कुछ भी करते हैं तो बीजेपी को आखिर मिर्ची क्यों लगती है? प्रशांत भूषण ने विज्ञापन को ‘जय हो केजरीवाल’ की संज्ञा देते हुए इसे महज एक व्यक्ति या नेता को प्रोजेक्ट करने के लिए फंड के गलत इस्तेमाल का उदाहरण बताया है। 

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एक तरफ ‘मेक इन इंडिया’ का नारा, दूसरी तरफ छंटनी से लेकर मंदी तक की परिघटनाएं

कांग्रेस की श्रम विरोधी व कारपोरेट परस्त नीतियों से त्रस्त जनता को मोदी सरकार के ‘मेक इन इंडिया‘ और ‘कौशल विकास‘ के नारे से बहुत उम्मीद जगी थी। परन्तु आशा की यह किरण धुंधली पड़ने लगी है। उद्योगों  के निराशाजनक व्यवहार को साबित करते हुये देश की दूसरे नम्बर की ट्रैक्टर बनाने वाली कम्पनी ने अपने संयत्रों से 5 प्रतिशत कर्मचारियों की छंटनी कर दी है। गनीमत यह रही कि एक प्रतिष्ठित दक्षिण भारतीय महिला की छत्रछाया में चलने वाले इस औद्योगिक समूह से निकाले जाने वाले कर्मियों के प्रति संवेदना दिखाते हुये प्रबन्धन ने उन्हें पहले से ही सूचना देने के साथ साथ न केवल तीन माह का ग्रोस वेतन दिया। बल्कि छंटनी ग्रस्त कर्मियों के लिये एक सुप्रसिद्व जॉब कन्सलटेंट की सेवायें दिलवाकर उन्हें दूसरी कम्पनियों में नौकरी दिलवाने की भी कोशिश की। 

वहीं दूसरी और दिल्ली आधारित आटोमोटिव कलपुर्जे  बनाने व लगभग 16990 करोड़ टर्नआवर एवं हजारों कर्मचारियों की मदद से चलने वाली एक नामी कम्पनी अपने प्रमुख संयत्रों से 20 प्रतिशत स्थाई व 10 प्रतिशत अस्थाई कर्मियों को बाहर करने का लक्ष्य पूरा करने के करीब है। कम्पनी के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के हरियाणा, राजस्थान सहित पूरे देश स्थित बहुत से संयत्रों से अभियन्ताओं, प्रबन्धकों व अन्य कर्मियों को सड़क पर खड़ा कर दिया गया है। इसी कम्पनी में 7 वर्ष से कार्यरत व अपने काम में पूणतया दक्ष हरियाणा के एक इंजीनियर जिनको एक दिन दिल्ली स्थित कार्यालय बुलाकर त्यागपत्र लिया गया।

वे कहते हैं सरकार अकुशल नौजवानों को कुशलता का प्रक्षिक्षण देने के लिये (स्किल डवेलपमेन्ट) कौशल विकास के तहत करोड़ों रूपये खर्च करके रोजगार दिलाने की बात करती है। परन्तु जो इंजीनियर, कामगार पहले से ही अपने खर्चे पर डिग्री, डिप्लोमा लेकर कुशलता प्राप्त कर देश के निर्माण में लगे हुये हैं। अगर उन्हें इस तरीके से बाहर किया जा रहा है। तो सरकार के नये युवकों को कुशल बनाने के ‘कौशल विकास‘ के नारे पर कौन विश्वास करेगा?

नई दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया से इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री लेकर 15 वर्षों से इसी कम्पनी में कार्यरत एक दूसरे शख्स के मुताबिक उदारीकरण व वैश्वीकरण की नीतियों के चलते विकास व तकनीक के गुब्बारे ने मानवीय मूल्यों को धराशायी कर दिया। कभी अच्छी कम्पनियों में कार्यरत कर्मियों के 10 या 15 साल का कार्यकाल पूरा होने पर चेयरमैन अपने हाथों से ‘लम्बी अवधि पुरस्कार‘ देता था। आज मुझे 15 वर्षों की सेवा के वदले पहले से ही लिखित त्यागपत्र पर हस्ताक्षर करने के लिये 15 मिन्ट का भी समय नहीं दिया गया। क्या भारतीय संस्कृति का दम भरने वाली सरकार की छत्रछाया में कारपोरेट को ‘यूज़ एण्ड थ्रो‘ (इस्तेमाल करो व फेंको) जैसी पश्चिमी अवधारणा को अपनाने की खुली छूट मिल चुकी है?

क्या विगत 20 वर्षों में मात्र कुछ करोड़ से लगभग 16990 करोड़ की टर्नआवर पर पहुंची इस कम्पनी को मोदी सरकार की असहयोग की नीतियों के चलते ऐसा कदम उठाना पड़ा या कांग्रेस के शासन में ऐसी कम्पनियां गलत ढंग से विकसित हुई, जिसे वर्तमान सरकार की दूरगामी व खराब कम्पनियों पर लगाम कसने की नीति के परिणाम स्वरूप यह सव हुआ? या इसका कारण केवल आर्थिक मन्दी है? यह बहस का विषय हो सकता है। 

एक प्रमुख आर्थिक अखबार के मार्च 2015 के एक अंक के अनुसार इस कम्पनी द्वारा जर्मनी की एक कम्पनी को 175 मिलियन यूरो (लगभग 1200 करोड़ रू) में खरीदने की योजना थी। भारतीय मूल की इस कम्पनी के वैश्विक मुखिया जोकि एक विदेशी है, ने इस अधिग्रहण की पुष्टि समूह की वेबसाईट पर 22 मई को जारी प्रेस रिलीज में की । यद्यपि इस में अधिग्रहण की राशि का जिक्र नहीं किया गया। तो क्या कम्पनी भारतीय संयत्रों को आंशिक रूप में ही चलाकर विदेश में पैसा लगा रही है ? अर्थात कम्पनी  ‘मेक इन इंडिया‘ की अपेक्षा ‘मेक इन जर्मनी‘ के नारे में ज्यादा विश्वास करती है ? 

सड़क पर आ चुके कुशल व शिक्षित कर्मचारी क्या इसे अच्छे दिनों का आगमन मान रहे हैं। कुछेक के अनुसार टेलिवजन चैनल व मीडिया कुछ भी कहें। परन्तु उनके 15-20 वर्ष के कैरियर में शायद यह सबसे बुरे दिन हैं। मोदी सरकार की ‘बीमा सुरक्षा योजना‘, ‘अटल पेंशन योजना‘ व ‘स्वच्छ भारत अभियान‘ निश्चित रूप से सराहनीय कदम हैं। पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक रिश्तों व आंतकवाद के विरूद्व अगर पूर्णरूपेण नहीं तो कम से कम पुरानी सरकार की अपेक्षा सरकार का प्रर्दशन कहीं बेहतर है।  परन्तु एक और जहां सरकार 7.5 प्रतिशत विकास दर बताकर विदेशों में भारत को एक उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में पेश कर रही है। वहीं देश के आर्थिक विकास की रीढ़ माने जाने वाले नामी उद्योगों में कार्यरत शिक्षित कर्मियों की ऐसी बदहाली के क्या संकेत माने जाने चाहिये ? यह कटु सत्य है कि वर्तमान व्यवस्था व अधिकांश मीडिया कारपोरेट व शोषक वर्ग के पक्ष में होने के कारण ऐसी घटनाएं आमजन तक कम ही पहुंचती हैं। परन्तु अगर यही क्रम छुपते छुपाते भी चलता रहा तो इसका परिणाम अंततः उद्योगपतियों, मानव संसाधन, सत्ता व देश किसी के भी हित में नहीं होगा। 

लेखक संजीव सिंह ठाकुर से संपर्क : singhsanjeev7772@gmail.com

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कांग्रेस के पास रॉबर्ट वाड्रा, भाजपा के पास दुष्यंत, अब खेल बराबरी का

मेरे पास माँ है… यह फिल्मी डायलॉग तो पुराना हो गया है। अब तो राजनीति में नया डायलॉग चल रहा है कि तुम्हारे पास (कांग्रेस) अगर रॉबर्ट वाड्रा है तो हमारे पास (भाजपा) भी दुष्यंत सिंह है। भला हो ललित मोदी का, जिसने कम से कम कांग्रेस की कुछ तो लाज रख ली और दामादजी वाले मामले पर पीट रही भद के बीच अब वसुंधरा के लाड़ले का मामला उजागर हो गया। 

अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ और देश की जनता की याददाश्त भी कमजोर नहीं है, जब उसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर पूरी भाजपा को भाषणों में यह कहते सुना होगा कि रॉबर्ट वाड्रा के पास ऐसा कौन सा जादुई कारोबारी नुस्खा है, जिसके बलबूते पर उन्होंने अपने एक रुपए को एक करोड़ में तब्दील कर डाला। हालांकि इन भाषणवीरों ने सत्ता में आते ही दामादजी यानि रॉबर्ट वाड्रा को जेल भिजवाने की कसमें भी कम नहीं खाई थी, मगर हर पार्टी में रॉबर्ट वाड्रा हैं इसलिए ऐसे भाषण चुनावों तक ही सीमित रहते हैं। सत्ता में आने पर भाजपा भी दामादजी को भूल गई और साथ ही विदेशों में जमा काला धन जुमले में तब्दील हो गया। 

और तो और काले धन के एक बड़े प्रतीक और भगोड़े ललित मोदी को बचाने का कलंक अवश्य सालभर तक भ्रष्टाचार के मामले में खुद को पाक साफ बताने वाली भाजपा के माथे पर लग गया है। सुषमा स्वराज ने तो ललित मोदी की मदद की ही, मगर उससे भी बड़ी मददगार तो राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे निकली, जिन्होंने ललित मोदी पर किए गए उपकारों के बदले में अपने बेटे दुष्यंत सिंह की कम्पनी नियंत हैरीटेज होटल्स प्रा.लि. में 11.63 करोड़ रुपए का निवेश ललित मोदी की कम्पनी आनंद हेरीटेज होटल्स के मार्फत करवाया और 10 रुपए मूल्य के शेयर मोदी ने 96 हजार 190 रुपए में खरीदे। अब कांग्रेस भी पूछ सकती है कि दुष्यंत सिंह ने ऐसा क्या करतब दिखाया कि उनका 10 रुपए का शेयर 96190 हजार रुपए का हो गया? यह ठीक उसी तरह का मामला है जैसा रॉबर्ट वाड्रा ने डीएलएफ के साथ संगनमत होकर किया था। हालांकि तमाम बड़े राजनेताओं ने इसी तरह के गौरखधंधे कर रखे हैं। 

ये तो रॉबर्ट वाड्रा के बाद दुष्यंत सिंह का खुलासा हो गया, जिस पर अब राजनीति से लेकर मीडिया में हल्ला मचा है। इस पूरे प्रकरण से अब भाजपा को भी रॉबर्ट वाड्रा से कारोबारी समझ लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि उनकी खुद की पार्टी के पास दुष्यंत सिंह जैसा जादूगर मौजूद है। यानि भाजपा फिजूल ही बगल में छोरा और गांव में ढिंढोरा पीटती रही। रॉबर्ट वाड्रा तो सक्रिय राजनीति में नहीं कूदे और दामादजी होने का ही पर्याप्त सुख भोगते रहे, लेकिन वसुंधरा राजे के करतबी कारोबारी पुत्र दुष्यंत सिंह तो बकायदा झालावाड़ से निर्वाचित भाजपा सांसद हैं। अब देश की निगाह प्रधानमंत्री के उन बयानों पर भी टिकी है, जिसमें वे स्वच्छ और पारदर्शी शासन देने के दावे करते हुए खम ठोंककर अपने छप्पन इंची सीने के साथ यह कहते रहे कि वे ना खाएंगे और ना खाने देंगे। हुजूर अब तो आपकी नाक के नीचे ही खाऊ ठिये खुल गए हैं। सुषमा-वसुंधरा पर ही कार्रवाई करके अपने दावों की लाज रख लो।

लेखक राजेश ज्वेल से संपर्क : 9827020830, jwellrajesh@yahoo.co.in

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मोदी समर्थक क्रोनी कैपिटल के ऐतिहासिक साइज के प्रपंच से दयनीय स्तर तक अनभिज्ञ है

Sheetal P Singh : BJP के हाथियों के दंगल में पैदल सेना की बड़ी दुर्गति है. बीजेपी की पैदल सेना मुख्यत:दरिद्र सवर्णो की रुग्णशाला से आती है। रुग्णशाला का मतलब यहाँ उन प्रतिभागियों से है जो आर्थिक शैक्षिक शारीरिक मोर्चों पर दोयम दर्जा रखते हैं पर मनु महाराज की अनुकम्पा से उन्हे अपने से बुरे हाल में सड़ रहे ग़रीब नसीब हैं, जिन्हें देखकर उन्हे ख़ुद के “बड़े” होने का एक झूठा अहसास तरावट देता रहता है. तो यह पैदल सेना अपनी दो हज़ार से बीस हज़ार के मध्य झूलती सामुदायिक विपन्नता के दौर में अरबों ख़रबों के वारे न्यारे करने वाले फ़ैसलों /विवादों के पैरवीकारों के रूप में अपने आप को पाकर समझ ही नहीं पाती कि बैटिंग किधर करनी है. इंतज़ार करती है कि कुछ ऊपर से ज्ञान छिड़का जाय तो वह भी लोकल बघारे.

मसलन आप सोशल मीडिया के गट्ठर के गट्ठर अकाउंट देख आइये. एक भी शायद ही मिले जिसने KG6 basin प्रसंग पर ख़ुद से कुछ लिखा हो? आयरन ओर के गोरखधंधे पर एक हर्फ़ दरज कराया हो? अडानी के बारे में कुछ गहरी जानकारी प्रकट की हो? अब यकायक उसे ललित मोदी/सुषमा स्वराज की मानवीय रिश्तेदारी पर डिफ़ेंस खड़ा करना है. काफ़ी मीमांसा के बाद मैंने पाया कि कम से कम सोशल मीडिया में मौजूद मोदी/बीजेपी समर्थकों का ९९% आज के क्रोनी कैपिटल के ऐतिहासिक साइज़ के प्रपंच से दयनीय स्तर तक अनभिज्ञ है. वह दरअसल मुसलमानों से लड़ रहा है, ईसाइयों से लड़ रहा है, औरतों को क़ाबू (उसकी समझ में मर्यादा) में रखने में लगा है, कश्मीर में तैनाती चाहता है, लाहौर पे क़ब्ज़ा, चीन को सबक़ और विश्व गुरू/हिन्दू /संस्कृत …

सब गड्ड मड्ड. वो बहस नहीं कर सकता. ख़ाली डब्बा है. सो गालियों में जीता है. इसी वजह से इसकी सारी सर्किल मर्दों की है. कुछ नकली महिला प्रोफ़ाइल्स छोड़कर. मैं दस साल बाद का दृश्य अपने हिसाब से जैसा देख पा रहा हूँ कि “खेती सेठों की हो चुकी होगी और बेरोज़गारों के झुंड तमाम तरह की लम्पट सेनायें बनाकर एक दूसरे से निबटने/निबटाने में लगे होंगे. सरकारी फौजफाटा/पुलिस अपनी लूटपाट अराजकता में. सांप्रदायिक बँटवारा नई चुनौतियों को पेश कर रहा होगा. बुज़ुर्ग औरतें बच्चे और बीमार सबसे ज़्यादा वलनरेबल होंगे. है तो बहुत बुरा सा स्वप्न पर… 

शीतल पी सिंह के एफबी वॉल से

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जनवरी 2016 में कौन होगा बीजेपी का अध्यक्ष?

पहली बार संघ और सरकार के भीतर यह आवाज गूंजने लगी है कि जनवरी 2016 के बाद बीजेपी का अध्यक्ष कौन होगा। और यह सवाल मौजूदा बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की सफलता या असफलता से हटकर प्रधानमंत्री मोदी को ज्यादा मजबूत बनाने की दिशा में उठे हैं। चूंकि अमित शाह को राजनाथ के कार्यकाल के बीच में ही बीजेपी अध्यक्ष बनाया गया था तो जनवरी 2016 में अमित शाह का कार्यकाल पूरा होगा और दिल्ली नागपुर के बीच अब यह चर्चा शुरु हो गई है कि 2019 तक प्रधानमंत्री मोदी के पीछे तो पूरी ताकत से आरएसएस खड़ी है लेकिन पार्टी के भीतर यह सवाल बडा होता जा रहा है कि बीते एक बरस से सरकार और दल दोनों ही एक सरीखा हैं। यानी कोई विकेन्द्रीकरण नहीं है। जबकि गुरुगोलवरकर के दौर से संघ यह मानता आया कि अगर परिवार में सबकुछ एक सरीखा होगा तो वह सिटता जायेगा।

इसीलिये सरकार और पार्टी में केन्द्रीयकरण नहीं होना चाहिये बल्कि विकेन्द्रीकरण यानी अलग अलग सोच होनी चाहिये । तभी आरएसएस बहुआयामी तरीके से देश के हर रंग को एक साथ ला सकता है। संघ का तो यह भी मानना है कि सरकार नी आर्थिक नीतियों का विरोध बारतीय मजदूर संघ नहीं करेगी या किसान संघ सरकार के किसान नीति का विरोध नहीं करेगा तो फिर संघ परिवार के बाहर विरोध के संगठन खड़े होने लगेंगे। और मौजूदा वक्त में तो सरकार और बीजेपी दोनो ही एक रंग के हैं। यानी दोनों ही गुजरात केन्द्रित रहेगें ।तो हिन्दी पट्टी में बीजेपी का असर कम होगा । हालाकि संघ यह भी मान रहा है कि नये अध्यक्ष की ताजपोशी उसी हालत में हो जब प्रधानमंत्री मोदी के कामकाज पर पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव ना पडे । 

दरअसल इसकी सुगबुगाहट में तेजी मई के दूसरे हफ्ते शुरु हुई जब मोदी सरकार के एक बरस पूरा होने पर दिल्ली से चार नेताओ को नागपुर से बुलावा आया । जिन चार नेताओ को नागपुर बिलाया गया उनमें राजनाथ सिंह के अलावे अमित साह , नीतिन गडकरी और मनोहर पार्रिकर थे। यानी मौजूदा बीजेपी अध्यक्ष को छोड़कर बाकि तीन चेहरे वहीं थे जिनके नाम का जिक्र कभी अध्यक्ष बनाने को लेकर लालकृष्ण आडवाणी ने किया था। यानी चारों नेताओं की मौजूदगी संघ हेडक्वार्टर में एक साथ नहीं हुई बल्कि अलग अलग सबसे चर्चा हुई । और चूकि इन चारो में से राजनाथ सिंह ही यूपी-बिहार की राजनीति के सबसे करीब रहे है और दोनो ही राज्यो के ज्यादातर सांसदो के बीच राजनाथ की पैठ भी है तो आने वाले वक्त में बीजेपी का अध्यक्ष हिन्दी पट्टी से क्यों होना चाहिये इस सवाल को उठाने और जबाब देने में भी वही सक्षम थे। 

खास बात यह भी है कि राजनाथ संघ मुख्यालय के बाद एक वक्त संघ के ताकतवर स्वयंसेवक रहे एमजी वैघ के घर भी गये । यह वही वैघ है जो शुरु में नरेन्द्र मोदी के भी विरोधी रहे । लेकिन सरसंघचालक मोहन भागवत जिस मजबूती के साथ नरेन्द्र मोदी के पीछे खडे हुये। उससे वैध सरीके स्वयंसेवक हाशिये पर पहुंच गये। बावजूद इसके संघ के भीतर अगर यह सवाल अब शुरु हुआ है कि एक ही विचार से पार्टी और सरकार नहीं चलनी चाहिये तो तीन संकेत साफ हैं। पहला मोदी सरकार के विरोध के स्वर अगर पार्टी से निकलते है तो उसे संभालना आसान है। दूसरा अगर सभी एक लाइन पर चलेंगे तो संघ का काम ही कुछ नहीं होगा । तीसरा सरकार के विरोध को अगर जनता के बीच जगह किसी दूसरे संगठन या पार्टी से मिलेगी तो फिर आने वाले वक्त में बीजेपी के लिये राजनीतिक मुश्किल शुरु हो जायेगी । लेकिन संयोग भी ऐसा है कि अक्टूबर में बिहार चुनाव होने है और दो महीने बाद बीजेपी अध्यक्ष का कार्यकाल खत्म हो रहा है । 

तो चुनाव में जीत के बाद अध्यक्ष बदले जाते है तो संघ की वह थ्योरी कमजोर पड़ेगी जो उन्होंने अमित साह को अध्यक्ष बनाते वक्त कही थी किचुनाव जिताने वाले शख्स को अध्यक्ष बनाना सही निर्णय है। और अगर चुनाव में जीत नहीं मिलती है तो फिऱ संकेत जायेगा कि बीजेपी डांवाडोल है और उसका असर यूपी चुनाव पर पड़ेगा। इन हालातों से बचने के लिये ही नये अध्यक्ष को लेकर पहले से ही व्यापक स्तर पर चर्चा शुरु हुई है। जिन चार नेताओं को नागपुर बुलाया गया उसमें बीजेपी संगठन और हिन्दी पट्टी के बीजेपी नेताओं के अनुभव और प्रभाव का इस्तेमाल हो नहीं पा रहा है इस पर खासा जोर दिया गया । यानी बीजेपी को चलाने का अमित शाह मॉडल चुनावी जीत के लिये जरुरी है लेकिन बिहार, यूपी , बंगाल में सिर्फ शाह माडल यानी प्रबंधन के जरिये चुनाव जीता नहीं जा सकता है, यह सवाल भी उठा। वैसे इस सवाल को हवा दिल्ली चुनाव में बीजेपी की हार के बाद भी मिली। लेकिन तब यह सवाल इसलिये दब गया क्योकि हार की वजहों को डि-कोड करने का काम शुरु हुआ ।

 लेकिन जैसे जैसे बिहार चुनाव की तारीख और अध्यक्ष पद का कार्यकाल पूरा होने का वक्त नजदीक आ रहा है वैसे वैसे यूपी-बिहार के बीजेपी नेताओ के सामने भी यह सवाल है कि चुनाव जीतने के लिये उनके पास केन्द्र की तर्ज पर कोई नरेन्द्र मोदी सरीखा नेता तो है नहीं । फिर मोदी और अमित शाह दोनो के गुजरात से दिल्ली आने की वजह से दोनो के बीच बैलेस इतना ज्यादा है कि जमीनी राजनीति के सवाल सरकार की उपलब्धी गिनाने तले दब जाते है यानी उड़ान है ,लेकिन कोई चैक नहीं है । यानी संघ पहली बार चुनाव के दौर की सक्रियता से आगे पार्टी की दिशा कैसी होनी चाहिये और उसे किस तरह काम करना चाहिये इसमें भी सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है। असर भी इसी का है कि बिहार चुनाव में नीतिन गडकरी को प्रभारी बनाना चाहिये यह सोच भी निकल रही है और मोदी के बाद गुजरात आंनदीबाई पटेल से संभल नहीं पा रहा है चर्चा इसपर ही हो रही है और महाराष्ट्र में पवार की राजनीति को साधने में फडनवीस सरकार सफल हो नहीं पा रही है, चर्चा इसपर भी हो रही है । लेकिन नया संकेत यही है कि सात महीने बाद बीजेपी का अध्यक्ष कौन होगा इसपर संघ परिवार के भीतर अगर चर्चा हो रही है तो यह साफ है कि गडकरी की तर्ज पर मौजूदा वक्त में अध्यक्ष का कार्यकाल बढाने की संघ सोचेगा नहीं ।

पुण्य प्रसून बाजपेई के ब्लॉग से

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वह सुबह कभी तो आयेगी…..

ठीक साल भर पहले सुबह से दिल की धडकन देश की बढ़ी थी । हर की नजरें न्यूज चैनलों के स्क्रीन पर लोकसभा चुनाव परिणाम का इंतजार कर रही थी। ऐसे में न्यूज चैनल के भीतर की धड़कने कितनी तेज धड़क रही होंगी और जिसे न्यूज चैनल के स्क्रीन पर आकर चुनाव परिणाम की कमेंट्री से लेकर तमाम विश्लेषण करना होगा उसकी धडकनें कितनी तेज हो सकती हैं। यह सिर्फ महसूस किया जा सकता है। रिजल्ट सुबह आठ बजे से आने थे लेकिन हर चैनल का सच यही था कि उस रात रतजगा थी। और रिजल्ट से पहले वाली रात को देश सोया जरुर लेकिन एक नयी सुबह के इंतजार में। सुबह 5 बजे से गजब का शोर हर चैनल के दफ्तर में । एडिटर से लेकर चपरासी तक सक्रिय। सुबह साढे चार बजे घर से नोएडा फिल्म सिटी जाते हुये पहली बार यह एहसास अपने आप जागा कि आज सुबह वक्त से पहले क्यो नहीं। सुबह की इंतजार इतना लंबा। वही एहसास यह भी जागा कि जिस सुबह की आस में बीते कई बरस से देश छटपटा रहा है, वह सुबह आ ही गई ।

एंकरिग करने बैठा तो जहन में बचपन के वह दिन याद आने लगे जब रात साढे ग्यारह बजे पिताजी ने झटके में जगाया और कहा कि इंदिरा गांधी चुनाव हार गई है। याद करने लगा कि क्या खुशी थी उस रात पिताजी के चेहरे पर । फिर बोले सो जाओ लेकिन मैंने जगाया इसलिये क्योंकि इतिहास के गवाह बन सको। अब देश बदलेगा। मार्च 1977 । रात बारह बजे भी चुनाव परिणाम को लेकर इतना जोश इतना उत्साह क्यो था यह तो धीरे धीरे समझा लेकिन 16 मई 2014 को मेरी घड़कन चुनाव परिणाम आने से पहले क्यों बढ़ी हुई है । क्या वाकई बदलाव सुबह का एहसास करा देता है। सुखनवर भरा यह एहसास ही रात भर मेरी भी आंखों से नींद गायब कर चुका था। और घर से दफ्तर तक पहुंचते पहुंचते मेरा दिल मान चुका था कि रात कोई भी सोया नहीं होगा। हर किसी को सुबह का इंतजार ही होगा। और सुबह भी हुई तो ऐसे सुनामी के साथ की रात की जड़ें हिल गई । दरख्त टूट गये। पत्तिया झड़ गईं। इतिहास के सबसे अंधेरे अध्याय को समेटे कांग्रेस का वृक्ष ओ हेनरी की कहानी “द लास्ट लीफ” की तर्ज पर सोनिया-राहुल गांधी की जीत में उम्मीद जैसा ही नजर आया है । वहीं सुबह के नायक नरेन्द्र मोदी लारजर दैन लाइफ हो चुके थे। और शायद इसी एहसास को महसूस करने ही दोपहर दो बजे तक लगातार एंकरिंग के बाद बिना कुछ खाये मैं भी अपने सहयोगी गोपाल को लेकर बीजेपी हेडक्वार्टर पहुंचने के लिये लालयित हुआ । दफ्तर से चला तो 2004 का बीजेपी दफ्तर याद आ गया । जहां शाइनिंग इंडिया की हवा में प्रमोद महाजन की तूती बोलती और जिस दिन लोकसभा चुनाव के परिणाम आये उसी बीजेपी हेडक्वार्टर में कौवा भी कांव कांव करने नहीं पहुंचा। उस दोपहर महसूस किया कि बीजेपी सत्ता वाली पार्टी बन चुकी है और एसी के सुकून तले सड़क पर संघर्ष अब बीजेपी में दूर की गोटी हो चुकी है । 

शायद यह एहसास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक में भी रहा इसीलिये वहां से चार किलोमीटर दूर झंडेवालान के संघ हेडक्वार्टर में चाय की चुस्की स्वयंसेवकों को खासी मीठी लग रही थी। उस वक्त राम माधव बोल गये कि हिन्दू संगठन नाराज थे । लेकिन सच यह भी निकला कि संघ को जिताने से ज्यादा हराकर अपनी लीक पर चलने के लिये बीजेपी को असहाय बनाने का सुकून हर कोई महसूस कर रहा है। फिर याद 24 अकबर रोड भी आया। झटके में महसूस किया जो कांग्रेसी तरसते थे कोई बात करें वहीं कांग्रेसी सत्ता की आहट सुन मचलने लगे। 2009 का नजारा तो भूलाये नहीं भूलता कैसे जनार्दन द्विवेदी मशगूल थे कैमरे को देखकर और हिकारत से देख रहे थे पत्रकारों को। जयराम में कुछ सरोकार बचे थे तो जीत के बाद भी पत्रकारों के अभिवादन पर मुस्कुरा रहे थे । और 2009 में सूने पडे बीजेपी हेडक्वार्टर में प्रवक्ता जरुर पहुंचे । कुछ कहा। कुछ माना । दरअसल हमेशा लगा कि ग्राउंड जीरो से पार्टी की जीत हार को समझना है तो चैनल का स्टूडियो छोड पार्टी हेडक्वार्टर पहुंच कर ही तापमान देखा जाये । लेकिन 16 मई 2014 को बीजेपी हेडक्वार्टर पहुंच कर तापमान देखने से ज्यादा तापमान सहना पड़ेगा । यह एहसास आज भी सिहरन ही पैदा करता है। क्योंकि दोनो तरफ से बंद अशोक रोड में 10 नंबर तक पहुंचने से पहले पुलिस का जमावडा और नारो की गूंज तो सामान्य थी । लेकिन बीजेपी हेडक्वार्टर में पहुंचते ही हर नारा हर हर मोदी की गूंज में सुनाई देने लगा । 

एक तरह की सुरसुरी तो पूरे शरीर में थी क्योंकि दिल्ली में बैठे बीजेपी के नेताओं में मनमोहन सरकार के दौर में जितनी जंग लग चुकी थी उसका एहसास हर बार मनमोहन की आवारा पूंजी की अर्थव्यवस्था पर चोट करने के बाद बीजेपी नेताओ से मुलाकात में लगता रहा । मनमोहन की आर्थिक नीतियों से लेकर सरकार चलाने के तौर तरीकों के खिलाफ इतना कुछ अखबारो में लिखा। एसआईजेड से लेकर खुदकुशी करते किसानो के मसले से लेकर राडिया टेप में गुम सरकार का कच्चा-चिट्टा भी सबसे पहले सचिन पाय़लट के सामने यह सोच कर रखा कि संचार मंत्रालय में ए राजा के वक्त जो हो रहा था उसे युवा कांग्रेसी नेता मंत्री समझे । लेकिन उस दौर में सचिन सरीखा संचार राज्यमंत्री भी कैसे मनमोहन सरकार की हवा में खामोश रह कर गुस्सा पीते हुये काम करने को ही सही मानता यह भी महसूस किया और उस दौर में कांग्रेसी कुछ इस भाव में रहे जैसे राडिया टेप या स्पेक्ट्रम का खेल कुछ भी नायाब नहीं है । कोयला घोटाला तो नही लेकिन घोटाले की दिशा को ही नीतिगत तौर पर मनमोहन सरकार कैसे अपना रही है इसपर भी कलम चलायी लेकिन तब भी कांग्रेसियो ने इसे अर्थव्यवस्था को ना समझने या आर्थिक सुधार के लिये इसे जरुरी करार दिया । तब भी दिल्ली में बीजेपी नेता खुश हुये कि मनमोहन सरकार के खिलाफ लिखना तो शुरु हुआ । आर्थिक सुधार के खिलाफ माहौल तो बन रहा है । यानी मनमोहन सरकार जायेगी यह तो तय था । इसीलिये दिल्ली में बैठे बीजेपी नेताओं में आगे बढने की होड थी । पूर्ती मामले में बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गडकरी के मुंबई दफ्तर पर छापा उसी दिन पड़ा जाये जिस दिन गडकरी के कार्यकाल को बढाने पर फैसला होना है । यह कांग्रेस नहीं बीजेपी के ही नेताओ का असर रहा । बंद कमरे में मीडिया ब्रीफिंग के जरीये अपने ही साथी नेता को कैसे कमजोर साबित किया जा सकता है यह बिसात भी दिल्ली में बीजेपी नेता ही बिछाते रहे । इसलिये 16 मई 2014 को मोदी मोदी की गूंज भी अच्छी लगी कि चलो अब तो लुटियन्स की दिल्ली पर से रेशमी लिबास हटेगा । सियासी बिसात पर शह मात अपने अपनों के बीच खेला जाना बंद होगा। 10 अशोक रोड के भीतर एक नये तरह का उल्लास नजर आया । घुसते ही पता चला बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ प्रेस कांन्फ्रेस कर रहे हैं। तो दफ्तर में घुसने की जगह हेडक्वार्टर के अंदर खुले मैदान में जमा लोगों के बीच चल पड़ा । नारे तेज होने लगे । गुलाल उड रहे थे । झटके में कोई आया और मेरे चेहरे पर भी गुलाल लगा तेजी से निकल पड़ा और उसके बाद चारों तरफ से मोदी मोदी की गूंज के बीच किसी ने धकेला । तो किसे ने फब्ती कसी । टीवी स्क्रीन पर कैसे मोदी को लेकर विश्लेषण कर सकते हैं और चुनाव प्रचार के वक्त जैसे ही पेड मीडिया शब्द होने वाले पीएम के मुख से निकला तो मीडियाकर्मी मोदी मोदी के नारे लगाते भक्तों के बीच खलनायक हो चुके थे । शायद इसीलिये समझ न आया कि जो चुनाव प्रचार के वक्त मीडिया या पत्रकारों को लेकर नरेन्द्र मोदी की टिप्णिया थीं उसी को फब्ती में बदलकर खुले तौर पर बीजेपी हेडक्वार्टर में एक नये तरह की भीड की गूंज थी। चेहरे भी नये थे । चारो तरफ  सिर्फ लोग थे तो समझ ना आया कि कौन सी दिशा पकड़ी जाये । बस एक तरफ चल पड़ी । और इस बीच किसी ने झटके में मेरा हाथ पकडकर मुझे अपने पास खींच लिया । ध्यान दिया तो वह राजनाथ सिंह थे । जिन्होंने अपने एसपीजी के दायरे में मुझे खिंचने की कोशिश की । लेकिन भीड़ का रेला ऐसा कि लगा फिर वही भींड में समा जाऊगा । तबतक राजनाथ सिंह के पीछे रविशंकर प्रसाद ने मेरा हाथ पकडा और एसपीजी से कहा इन्हें अंदर ले लें । अंदर घुसा तो हेडक्वार्टर में अक्सर दिखायी देने वाले बीजेपी के पहचाने चेहरे दिखायी दिये जो अक्सर बीजेपी हेडक्वार्टर के भीतर किताब की दुकान पर जाने के दौरान बीते कई बरसो से मिलते रहे । हंगामे-शोर-नारो के बीच किसी तरह हेडक्वार्टर के भीतर पहुंचा। राजनाथ सिंह के दरवाजे पर तैनात रहने वाले कार्यकर्ता ने पानी की बोतल ला कर दी । फिर किसी ने कहा आप बगल के कमरे में बैठें । वहां गया तो बीजेपी के ही एक कार्यकर्ता ने कुछ ऐसा टोका कि मैं भी उसे बस देखता ही रह गया । आप खुले मैदान में क्यों चले गये । आपको लगा नहीं कि काफी भीड है। आपने महसूस नहीं किया कि बीजेपी का दफ्तर बदल गया है । बदल गया है । यह शब्द कुछ ऐसे थे जिसे बीजेपी हेडक्वार्टर में बैठे बैठे मैं सोचता रहा । क्या वाकई बीजेपी हेडक्वार्टर बदल गया । तब तो बीजेपी भी बदलेगी । कामकाज के तरीके भी बदलेंगे । झटके में मैंने भी जबाब दिया तब तो अच्छा है। नहीं तो बीजेपी का कांग्रेसीकरण हो चला था । बदलने का मतलब कांग्रेसीकरण से मत जोड़ें । आपने देखा नहीं एकदम नये चेहरो की भरमार। अब राजनाथ सिंह के बदले अमित शाह होंगे । अभी तो चुनाव के परिणाम ही आये हैं और अध्यक्ष बदलने की सुगबुगाहट ही नहीं बल्कि कौन होंगे, यह भी तय हो चला है । बदलाव की रफ्तार इतनी तेज होगी । उस दिन भी अच्छा ही लगा कि बीजेपी बदलेगी । बदलाव होगा । तमाम विश्लेषण के साथ मैंने भी 17 मई 2014 को ही दिल्ली के राष्ट्रीय अखबार में एलान कर दिया कि अब अमितशाह होंगे बीजेपी अध्यक्ष । लेकिन बीतते वक्त के साथ जब सरकार का एक बरस पूरा हो चुका है तो कई सवाल सरकार से हटकर पहली बार बीजेपी के बदलाव से टकरा रहे हैं। संघ की विचारधारा से टकरा रहे है। कद्दावर नेताओं के आस्तित्व के संघर्ष से टकरा रहे हैं । वैकल्पिक राजनीति पर भारी पडती सत्ता की समझ से टकरा रहे हैं । और सत्ता के खातिर संस्थानों के कमजोर होने के हालात से खुलेतौर पर दो दो हाथ करने की जगह कंधे पर बैठाकर जीत के नारे लगाने से नहीं चूक रहे । दरअसल तमाम सवाल बार बार 16 मई 2014 और 26 मई 2015 के दौर में ही पैदा हुये है । इसीलिये यह सवाल बड़ा होते जा रहा है कि आखिर देश की दिशा होगी क्या । जो  20 मई 2014 को सेन्ट्रल हाल में नरेन्द्र मोदी ने कहा या फिर 26 मई 2014 के बाद से जो प्रधानमंत्री मोदी कह रहे हैं । दोनों के बीच का अंतर सिर्फ व्यापक ही नहीं है बल्कि देश की भावनाओं के साथ राजनीतिक सत्ता का खुले तौर पर माखौल उड़ाना है । बरस पूरा हो रहा है तो सरकार चलाने से ज्यादा सरकार के कामकाज को किस रोशनी में रखना चाहिये यह मैनेज हो जाये ।

यानी पेड मीडिया कोई मायने नहीं रखता । सूचना प्रसारण मंत्री रात के अंधेरे में कभी चेहते तो कभी बीट रिपोर्टर तो कभी मालिकान को दावत पर बुलाकर पीएम के आकस्मिक दर्शन कराकर अभिमूत हैं । दर्शन करने वाला मीडियाकर्मी भी अभिभूत हैं । क्योंकि झटके में वह सरकार के चुनिंदा चहेतों में शामिल हो गया । तो फिर पत्रकारिता की क्यों जाये । गुणगान में ही सारे तत्व छिपे हैं । इसी रास्ते विकास की धारा है । विदेशी पूंजी भी मंजूर, मजदूरों के हक खत्म करने वाले कानूनो को लागू कराना भी मंजूर , किसानों को सरकारी मदद के लिये ताकते रहने वाली नीतियां भी मंजूर , शिक्षा से लेकर स्वास्थय को मुनाफाखोरों के हाथो सौप कर विकास का नारा लगाना भी मंजूर । यह मंजूरी उसी संघ की है जो वाजपेयी सरकार से सिर्फ इसलिये रुठ गई थी क्योंकि स्वदेशी को ताक पर रखा गया था । राम मंदिर मसले को दबा दिया गया था । और खुली पूंजी के खेल में छोटे-छोटे तबको का धंधा मंदा पड़ गया था । नार्थ-ईस्ट में स्वयंसेवक मारा जा रहा था और गृहमंत्रालय संभाले लालकृष्ण आडवाणी बेबस दिखायी दे रहे थे । लेकिन मोदी सरकार तो कई फर्लांग से निकल चुकी है । लेकिन संघ बेबस नहीं बल्कि खुश है कि वह भी तो आवारा पूंजी की तर्ज पर कुलांचे मार सकता है । यानी हिन्दू आतंकवाद का कानूनी भय नहीं । और हिन्दू राष्ट्रवाद का नारा लगाने का वक्त है तो फिर आर्थिक विवशता में जकडे जाते देश को लेकर फिक्र क्यो की जाये । तो फिर साल भर पहले मोदी की जीत का मतलब जीत पर टिके संघ परिवार और बीजेपी की महत्ता तो होगी लेकिन विचारधारा की माला जपते हुये चुनाव हारने वालों की कोई पूछ नहीं होगी । जाहिर है किसी कारपोरेट के मुनाफे की तर्ज पर किसी सीईओ के भविष्य की तरह ही चुनावी जीत की माला भी बूंथी गई तो साल भर बाद हर किसी के सामने यही सवाल बडा होने लगा कि अगर जीत न मिले तो क्या होगा । यह सवाल किसी कार्यकर्ता से नेता पूछ सकता है । नेता से पार्टी अध्यक्ष और पार्टी अध्यक्ष से पीएम पूछ सकता है । शायद इसीलिये सरकार हो या पार्टी चुनाव के वक्त समूचा तंत्र ही जुट जाता है । यानी सरकार देश चलाये लेकिन सवाल बीजेपी की चुनावी जीत का होगा तो देश से पहले पार्टी । क्योकि पार्टी जीतेगी नहीं तो फिर राजनीतिक सत्ता भी कहा बचेगी । तो क्या यह भी बदलाव की रणनीति का हिस्सा है जहा जीते तो हम । हारे तो सभी । दिल्ली में बीजेपी हारे तो खलनायक बीजेपी के भीतर से नहीं बल्कि बाहर से किरण बेदी को खरीद कर ले आया गया. तो क्या बिहार, यूपी बंगाल में भी यही होगा । या फिर बिहार का दांव बीजेपी अध्यक्ष की कुर्सी पर जा लगा है । क्योंकि गुजरात से आकर यूपी के बीजेपी वालो को कोई मैनेजर वाले स्किल सिखाकर चुनाव जीत जाये । यह कैसे संभव है । बिहार को सिर्फ जातीय आधार पर टटोलकर राजनीतिक बिसात बिछाकर कोई चुनाव जीत जाये यह कैसे संभव है। खासकर बीजेपी के ही कार्यकर्ता से लेकर नेताओ की पूरी फौज ही जब बिहार यूपी की जमीनी राजनीति का पाठ पढते हुये बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा कर पायी और उसे ही कारपोरेट पूंजी या जीत की थ्य़ोरी के पाठ तले दबा कर रखा जाये । यह संभव है या नहीं सवाल अब यह नहीं बल्कि सवाल यह है कि क्या बीजेपी वाकई बदल गई । जिसका जिक्र 16 मई 2014 को बीजेपी हेडक्वाटर में बैठा कार्यकत्ता जीते के हंगामे और हर हर मोदी के नारे के बीच कर गया । तब तो मोदी सरकार के बरस भर का पाठ यह भी है कि अब राजनीति बदलेगी । 

अब विकास आर्थिक नीतियो पर नहीं बल्कि राष्ट्रवाद या हिन्दु राष्ट्रवाद की थ्योरी तले देश को विकास के कटघरे में बांटने के सिलसिले से शुरु होगा । कटघरा इसलिये क्योकि विदेशी पूंजी और देसी बाजार से जो 25 करोड समायेगा और जो सौ करोड बचेगा दोनो के बीच के वही चुनी हुई सरकार राज करेगी जो कुछ इस हाथ बांटेगी । कुछ उस हाथ लुटायेगी । यह थ्योरी जीत के बाद जीत के लिये राजनीतिक बिसात पर मोहरो को बदलने से लेकर बिसात तक बदलने की कवायद करती है । सवाल सिर्फ आडवाणी या मुरली मनोहर जोशी को दरकिनार करने का नहीं है । सवाल सिर्फ बीजेपी या संघ हेडक्वाटर को भी उसकी कमजोरी के लिहाज से खामोश समर्थन पाने का नहीं है ।सवाल सिर्फ चुनावी के वक्त वादो की फेरहिस्त को भुलाते हुये या राजनीतिक जुमलो में बदलते हुये नई लकीर खिचने भर का भी नहीं है । सवाल है कि 16 मई 2014 के पहले का जो वातावरण देश में बना था और 16 मई 2015 के बाद जो वातावरण देश में बन रहा है उसमें मोदी सरकार कहां खड़ी है । और आम जनता की भावनायें क्या सोच रही है । वित्त मंत्री, सूचना प्रसारण मंत्री , मानव संसाधन मंत्री चुनाव हारे हुये नेता है । और वाणिज्य मंत्री , रेल मंत्री, संचार मंत्री,ऊर्जा मंत्री, पेट्रोलियम मंत्री , अल्पसंख्यक मामलो के मंत्री समेत दर्जन भर से ज्यादा मंत्री ने तो मोदी की एतिहासिक जीत में चुनाव लडकर सीधी भागेदारी की ही नहीं । फिर दर्जन भर से ज्यादा मंत्री ऐसे है जो बीजेपी के भीतर कद के लिहाज से दूसरी या तीसरी पायदान पर खडे है । तो उन्हे मंत्री बनाकर साल बर के भीतर उन्ही के मंत्रालयो को पीएमओ से संभालवकर देश को संकेत भी दे दिये कि प्रधानमंत्री मोदी को ही देश ने चुना तो देश के लिये वही अकेले काम भी कर रहे है । फिर लोकसभा में चुन कर आये दागी सांसदों के खिलाफ कानून को काम करते हुये संसद को पाक साफ बनाना चाहिये यह कथन साल भर का था लेकिन साल भर सिर्फ कथन के तौर पर ही रहा । लोकसभा में 185 दागियो में से 97 तो बीजेपी के दागी है । लेकिन उनको लेकर भी कोई निर्णय नहीं लिया गया । वैसे बरस भर में बेहद महीन राजनीति ने बीजेपी के भीतर इस सवाल को खडा जरुर कर दिया कि बीजेपी में मोदी की जीत के सामने किसी सांसद या किसी भी कद्दावर नेता के पास कोई नैतिक बल नहीं है कि वह अपने तजुर्बे या अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर राजनीति करने के लिये आगे बढे । यह सवाल बीजेपी के लोकतांत्रिक ढांचे के लिये नुकसानदायक हो सकता है लेकिन समझना यह भी होगा कि मोदी का विरोध बीजेपी में कौन से नेता कर सकते है । हर किसी पर कोई ना कोई दाग है ही । या जो दागदार नहीं है वह इतने कमजोर है कि पार्षद का चुनाव नहीं जीत सकते है । और कुछ सत्ता के साथ खडे होकर नारे लगाते हुये कद्दावर होने का सपना पाल कर वक्त निकालने में माहिर है । यानी साल भर पहले जो वाज गुजरात से निकली उसने सिर्फ काग्रेस को ही पराजित नहीं किया बल्कि बीजेपी के भीतर के उस काग्रेसी कल्चर को हराया जो लुटियन्स की दिल्ली पर काबिज थी । इसिलिये साल भर पहले बीजेपी हेडक्वाटर के हंगामे और हर-हर मोदी, घर-घर मोदी के नारे में भी सुकुन था कि अब लुटियन्यस की दिल्ली का नैक्सेस खत्म होगा । इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, तीन मूर्ती से लेकर पार्लियामेंट एनेक्सी के बीच घुमडती सत्ता की ताकत खत्म होगी । लेकिन यह किसे पता था साल भर बीतते बीतते सत्ता के नये केन्द्र कही ज्यादा खतरनाक तरीके से पुराने केन्द्र को पीछे भी छोडेगें और लुटियन्स की दिल्ली को आधुनिक तरीके से लुभायेगें भी कि वह या तो सत्ता के नये केन्द्रो में शामिल हो जाये । या फिर सियासी कटघरे में ट्रायल के लिये तैयार रहे । यानी जो धड़कन 16 मई 2014 को देश के भीतर थी । वही घडकन 16 मई 2015 के बाद भी घुमड रही है अंतर सिर्फ इतना है साल भर पहले सुबह का इंतजार था। साल भर बाद सुबह को अंधेरे से बचाने के संघर्ष की धड़कन है ।

पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लॉग से 

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अब सूट-बूट के कलेक्टर चाहिए भाजपा सरकार को

कुछ साल पहले मैं छत्तीसगढ के रायगढ गया था तो वहां शहर में अतिक्रमण के चलते टूटे पक्के मकानों,विशाल ईमारतों को देख दंग रह गया था,क्योंकि अपने देा दशक के पत्रकारिता जीवन में मैंने गरीबों के झोपडे टूटते देखा है,अमीरों के पक्के अतिक्रमण कभी—कभार एक—दो तब टूटते हैं जब वो अमीर किसी नेता या अधिकारी से पंगा लेता है। लेकिन इसके विपरीत रायगढ में कलेक्टर अमित कटारिया का बुलडोजर बिना  किसी बीपीएल सूची के चला।

तब इन महोदय के बारे में पता किया तो पता चला कि ये मात्र एक रूपए वेतन लेते हैं। घर से संपन्न है और ज्यादा खर्च नहीं है इसलिए काम चल जाता है। रायपुर में भी इन्होंने निगम आयुक्त के रूप में बेहतरीन काम किया था,जिसका पता आज के रायपुर को देखकर लग सकता है। कुछ ऐसा ही नया रायपुर बनने पर गांव के युवाओं को प्रशिक्षण देकर किया।

अब जब बस्तर में कलेक्टर ही नक्सलियों के अपरहरण के शिकार हो रहे हैं और जब पीएम व सीएम के आने पर 20 हजार से अधिक सुरक्षाकर्मियों की तैनाती करनी पडती है तब एक कलेक्टर बस्तर में कलेक्टरी कर रहा है तो ये किसी बहादुरी से कम नहीं है।

ऐसे में प्रदेश की भाजपा सरकार को केन्र्द सरकार के प्रधानमंत्री कार्यालय से तथाकथित दिशानिर्देश मिलने पर सिर्फ इसलिए कारण बताओ नोटिस थमाया जाता है कि उन्होंने सूट नहीं पहना और चश्मा लगाया था। इसी तरह दंतेवाडा के युवा कलेक्टर केसी देवासीनपंथी को भी सूट नहीं पहनने पर नोटिस दिया गया।

सवाल यह उठता है कि अंग्रेजों को गए दशकों हो गया लेकिन प्रशासन और यह शासन अभी भी अंग्रेज बना है।

उम्मीद थी कि भाजपा सरकार आएगी और कुछ बदलाव होगा लेकिन मोदी सरकार आई और सच में यह सरकार सूटबूट की ही सरकार है।

अब इतनी गर्मी में कोई बेवकूफ ही होगा जो सूटबूट और टाई पहनेगा।लेकिन रमन सरकार को चाहिए।

दूसरी बात यदि यही प्रोटोकाल है तो प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के लिए कोई प्रोटोकाल नहीं है।

कहां गए संघ के लोग जो भाजपा को स्वदेशी बताते थे और कांग्रेस को अंग्रेज मानसिकता का। अब जवाब दें वो, कि क्या इस सूट बूट का समर्थन करते हैं वो।

लेखक अनिल द्विवेदी संपर्क : 9826550374

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चाय के सहारे चुनिंदा पत्रकारों को चारण-भांट बनाने की तैयारी में जुटे सुनील बंसल!

पत्रकारों से अपनापा जताते यूपी भाजपा के संगठन मंत्री सुनील बंसल

पत्रकारों से अपनापा जताते यूपी भाजपा के संगठन महामंत्री सुनील बंसल 

लखनऊ। पार्टी कार्यालय को कोतवाली की तरह चलाने तथा अपनी लक्‍जरी जीवन शैली से दीन दयाल उपाध्‍याय के एकात्‍म मानवतावाद को हाशिए पर रखने के आरोपों से घिरे यूपी भाजपा के संगठन महामंत्री सुनील बंसल चाय के सहारे कुछ अखबारों और न्‍यूज एजेंसी के पत्रकारों को साधने का प्रयास करने लगे हैं. कोतवालों की तरह कुछ पत्रकारों को अपना भांट-चारण बनाने की कोशिश कर रहे हैं. हाल तक पत्रकारों से दूरी बनाकर रखने वाले बंसल कलई खुलने की शुरुआत होने के बाद कुछ चुनिंदा पत्रकारों से नजदीकियां बढ़ा रहे हैं ताकि मौका आने पर खबरों का काउंटर कराया जा सके. 

दरअसल, पिछले दिनों कुछ अखबारों और चैनलों पर सुनील बंसल को लेकर ऐसी खबरें चलीं, जिससे साबित हुआ कि वो पार्टी के विचारधारा एकात्‍म मानवतावाद के विपरीत कार्यालय में लक्‍जरी सुख-सुविधा भोग रहे हैं, जबकि इनके पहले के संगठन मंत्रियों ने एक ही कमरे के भीतर अपना कार्यकाल काट दिया था. दिल्‍ली में कोतवाली चला रहे अमित शाह के नाम का धौंस देकर इन पर लखनऊ भाजपा कार्यालय को कोतवाली की तरह चलाने के आरोप लगे. कार्यकर्ताओं या पत्रकारों से मिलने में इनका सदा परहेज रहा. पर जब अंदर की खबरें बाहर आने लगीं तो बंसल साहब खबरों को मैनेज करने के लिए एक अदद पत्रकार-दलाल की तलाश करने लगे. 

इसी क्रम में इन्‍होंने कुछ पत्रकारों से अपनी नजदीकियां बढ़ाई ताकि खबरें रोकी जा सकें, पक्ष में खबरें लिखवाई जा सके. परेशान बंसल की सहायता के लिए सामने आया आरएसएस, संघ ने अपने समाचार एजेंसी हिंदुस्‍थान समाचार के माध्‍यम से बंसलजी मुश्किल कम करने की ठानी. संघ के एजेंसी के निर्देशन में यह योजना बनाई गई कि जल्‍द ही राजधानी के कुछ चुनिंदा पत्रकारों को उनसे मिलवाकर उनका एक ग्रुप तैयार कराएगा ताकि उनके खिलाफ छपने वाली खबरों को काउंटर किया जा सके. इसके लिए उक्‍त समाचार एजेंसी के कार्यालय में शुक्रवार को बड़ी गोपनीय तरीके से चाय पर चर्चा का कार्यक्रम रखा गया, जिसमें अतिथि बनाए गए सुनील बंसल जी और राजधानी के कुछ चुनिंदा पत्रकार. 

अत्‍यन्‍त ही गुपचुप तरीके से कार्यक्रम तैयार हुआ ताकि इस ग्रुप से बाहर के पत्रकारों को इसकी भनक ना लग सके. सारी सावधानियां बरती गईं. एजेंडा इतना फूल प्रूफ और पुख्‍ता बनाया गया कि हर दम एक साथ रहने वाले कई पत्रकार भी अपने साथी पत्रकारों से यह बात छुपा ले गए. पर, बात उस समय बाहर आ गई जब एक एजेंसी के पत्रकार ने बंसलजी के सामने उन पर कार्यकर्ताओं से दूरी बनाए रखने का आरोप लगाया और वाहवाही में इस बात को कुछ भाजपाइयों से शेयर कर दी. इसके बाद अन्‍य पत्रकारों तक भी यह सूचना पहुंच गई कि बंसलजी कुछ चुनिंदा पत्रकारों के साथ चाय पार्टी आयोजित कर उन्‍हें अपना बनाने की कोशिश की. 

खबर यह भी आ रही है कि सुनील बंसल कुछ चुनिंदा पत्रकारों का एक समूह तैयार कर रहे हैं, जो इनके खिलाफ चलने वाली खबरों को रोकने और उसका काउंटर करने का काम करेंगे. बदले में एकात्‍म मानवतावाद की ऐसी तैसी करके लक्‍जरी जीवन जीने वाले बंसलजी इनकी चिंता करेंगे. दरअसल, अब तक मीडिया से दूरी बनाकर रखने वाले बंसलजी खबरों के बाहर आने के बाद अपने चारण-भांट पत्रकारों का एक समूह तैयार करने जा रहे हैं, पहले चरण में इन्‍हें सफलता भी मिली है. चाय पीने वाले पत्रकार जल्‍द ही इसका एहसान भी चुकाने वाले हैं. सू्त्रों ने बताया कि चाय पर बुलाए गए पत्रकार बंसलजी के पक्ष में खबर छापकर-चलाकर चाय का एहसान उतारेंगे. 

बंसलजी के सामने मुश्किल यह है कि इनके निर्देशन में लड़े गए उपचुनावों-विधान परिषद चुनाव में हार होने के बाद कार्यकर्ता विरोध में आवाज उठाने लगे हैं. इनके कार्यशैली से परेशान भाजपा का मीडिया विंग खुद चैनल पत्रकारों को चुपचाप से इनकी सच्‍चाई बताकर पोल खोलने लगा है, जिसके बाद चैनलों पर बंसलजी की कलई खोलने की शुरुआत हुई है. यूपी भाजपा का मीडिया विंग अपने अपने खास पत्रकारों को सुनील बंसल से जुड़ी खबरें बताकर उन पर हमला करा रहा है. अब देखना है कि बंसलजी का नया चारण-भांट समूह उनको परेशानी से निजात दिलाता है या पार्टी का मीडिया विंग भारी पड़ता है?

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बस्ती में भाजपा सांसद का न्यूज चैनलों पर अटैक

बस्ती (उ.प्र.) : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नौ महीने के कार्यकाल का दबाव उनके सांसदों पर दिखने लगा है। अब जनता हिसाब चाहती है। हिसाब देने के चक्कर में इस जिले के सांसद इन दिनों गड़बड़ा गए हैं। सांसद हरीश द्विवेदी भरे मंच से घोषणा करते हुए जनता से अपील करते हैं कि जो चैनल मेरे खिलाफ खबर दिखाए, उसे देखना छोड़ दीजिए। इस पर केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा कहते हैं कि मीडिया नहीं रहेगा तो देश से लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा। 

केंद्रीय पर्यटन मंत्री महेश शर्मा के यहां एक कार्यक्रम में सांसद हरीश द्विवेदी ने उपस्थित कार्यकर्ताओं को सीख दी कि वे मीडिया से सावधान रहें क्योंकि ये भरोसे लायक नहीं रह गए हैं। इसी तरह मखौड़ा में जो कुछ उन्होंने कहा, वह संसदीय गरिमा के विपरीत रहा। हालांकि मौके पर मौजूद पर्यटन मंत्री ने मीडिया का बचाव करते हुए कहा कि कभी-कभी हो जाता है। इसे दिल से नहीं लेना चाहिए। हरीश द्विवेदी की तकलीफ क्या है, पिछले दिनों की एक जनसभा उसका भेद खोलती है। कार्यक्रम था ‘मन की बात’। उस समय उन्होंने कुछ बातें कही थीं, जिसे मीडिया के तमाम चैनलों ने प्रमुखता से प्रसारित किया था। 

प्रसारण के तुरंत बाद ही हरकत में आए सांसद ने प्रेस कांउसिल आफ इंडिया के माध्यम से नोटिस भी जारी करा दिया लेकिन अभी भी मीडिया के प्रति उनकी तल्खी बनी हुई है। लगता है कि उन्हें प्रेस परिषद की कारवाई पर भरोसा नहीं है। 

राजकुमार का ई-मेल संपर्क : bastirajkumar@gmail.com

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उल्टी खबर चलाने पर समाचार प्लस को सांसद का नोटिस, स्ट्रिंगर पर एक करोड़ का दावा ठोकेंगे

बस्ती (उ.प्र.) : इलेक्ट्रानिक मीडिया के चार पत्रकार अक्सर जिले में अपने कारनामों से चर्चा में रहने के लिये जाने जाते हैं। एक बार फिर इलेक्ट्रानिक मीडिया सेंटर के नाम से सक्रिय तथाकथित चार-पांच पत्रकारों की जुगलबंदी चर्चा में आ गई है। इस बार तो समाचार प्लस के स्ट्रिंगर्स की नौकरी भी मानो फंस सी गई है। ऐसी खबर है कि चैनल कभी भी अपने स्ट्रिंगर्स रजनीश को बाहर का रास्ता दिखा सकता है। 

इस तरह स्ट्रिंगर ने उल्टी खबर प्रसारित करा दी

 

सांसद द्वारा एनबीए को भेजी गई नोटिस की छायाप्रति

दरअसल यह विवाद भाजपा के सांसद द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम ‘मन की बात’ से शुरू हुआ। सांसद हरीश द्विवेदी ने कप्तानगंज ब्लाक क्षेत्र में मन की बात कार्यक्रम में जिले के युवाओं को आमंत्रित किया। इस कार्यक्रम में हर युवा सांसद से सीधा संवाद करते हुये अपनी भड़ास या मन की बात कह सकता था। इस न्यूज की कवरेज के लिये सांसद ने प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के सभी पत्रकारों को बुलाया। कार्यक्रम में एक युवक ने सांसद से भ्रष्टाचार समाप्त करने के उपाय के बारे में पूछ लिया। सांसद ने कहा कि केवल सरकारों के चाहने से भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा। उसके लिये हर किसी को ईमानदार बनना पड़ेगा। 

उदाहरण स्वरूप सांसद ने खुद का हवाला देते हुए कहा कि उनके घर सुबह 7 बजे क्षेत्र के तमाम लोग पहुंच जाते हैं, जो उनसे कुछ अपेक्षा लेकर आते हैं। कोई न कोई बहाना बनाकर वे उनसे अपनी मांग रख देते हैं। जबकि एक सांसद की सैलरी एक प्राईमरी स्कुल के अध्यापक के बराबर है। भत्ता वगैरह लेकर लगभग उन्हें भारत सरकार से एक लाख रूपये मिल जाते हैं। अगर वे रोज 20 हजार रूपये लोगों में बांटने लगेंगे तो इतना पैसा लायेंगे कहां से। इसके लिये वे चोरी करेंगे, चोरी करने वे जापान तो जायेंगे नहीं, चोरी वे यहीं करेंगे। सरकारी योजनाओं में काम करने वाले ठेकेदारों और अधिकारियों को वे बुलायेंगे और उनसे 50 प्रतिशत देने को कहेंगे। 

इस बात की समाचार प्लस के स्ट्रिंगर्स ने ऐसी एडिटिंग की कि सांसद महोदय के कहने का तात्पर्य ही पलट गया। समाचार प्रसारित होने के बाद हर किसी को लगा कि सांसद भी भ्रष्टाचार में लिप्त हो गये हैं और 50 प्रतिशत कमीशन मांग रहे हैं। जैसे ही इस बात की जानकारी सांसद हुई तो हैरत में पड़ गए। दबी जुबान चर्चा है कि रजनीश ने कुछ दिन पूर्व सांसद को अपने आवास पर आयोजित एक घरेलू कार्यक्रम में आमंत्रित किया था मगर सांसद व्यस्तता की वजह से नहीं पहुंच सके। इसी के बाद से रजनीश की सांसद से ठन गई। सपा के काबिना मंत्री राजकिशोर सिंह भी रजनीश को इस मुहिम में पूरा सहयोग कर रहे हैं। चैनल प्रबंधन को अंधेरे में रखकर सांसद के खिलाफ खबरें प्रसारित करवाई जा रही हैं। 

इतना सब होने के बाद सांसद ने समाचार प्लस और चार अन्य चैनलों के संपादकों को गलत खबर चलाने पर एनबीए के माध्यम से नोटिस भेजी है। सांसद ने स्ट्रिंगर्स के खिलाफ एक करोड़ के मानहानि का दावा ठोकने की भी प्रक्रिया शुरू कर दी है। सूत्रों के मुताबिक सांसद ने समाचार प्लस के किसी बड़े पद पर बैठे अधिकारी से इस बात की शिकायत की तो उन्हे बताया गया कि उनका कोई भी स्ट्रिंगर बस्ती जनपद में है ही नहीं। ऐसे में गलत खबरें चलाना रजनीश को भारी पड़ने की चर्चाएं हैं। मीडिया सेंटर के पत्रकारों का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी इन सभी पत्रकारों को बोर्ड परीक्षा में वसूली के दौरान बीच सड़क पर दौड़ा दौड़ा कर पीटा गया था। बावजूद कोई सबक लेने के इनके कारनामे बदस्तूर जारी हैं।

संबंधित वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें… https://www.youtube.com/watch?v=6jIFhQMTgrY

एक पत्रकार द्वारा भेजे गये पत्र पर आधारित

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औवेसी बंधुओं की एमआईएम ने यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा को भारी फायदा पहुंचाने की कवायद शुरू कर दी!

Saleem Akhter Siddiqui :  औवेसी बंधुओं की एमआईएम उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है। इस सिलसिले में उसके जिला स्तरीय नेता जगह-जगह सभाएं कर रहे हैं। कल ऐसी ही एक सभा में जाने का इत्तेफाक हुआ। वक्ताओं की उम्र 20 से 25 साल के बीच थी। उनका अंदाज-बयां सुनकर तोगड़ियाओं, साध्वियों, साक्षियों और भागवतों की याद आ गई।

अगर एमआईएम के नेता यह सोच रहे हैं कि हिंदूवादी नेताओं की शैली अपनाकर वह उत्तर प्रदेश में अपनी पैठ बना लेंगे, तो गलत सोच रहे हैं। ‘एक मुसलमान सौ पर भारी है’। या ‘हिंदुस्तान उनके बाप का नहीं है’ जैसे जुमलों से सिवाय भाजपा का हित करने से कुछ नहीं होगा। बोलने का सलीका सबसे पहले आना चाहिए। जोशीली तकरीरें करके तालियां हासिल की जा सकती हैं, वोट नहीं। महज मुसलमानों की राजनीति करके कहीं नहीं पहुंच पाएंगे। दो-चार सीटें निकाल लेंगे, तो पहाड़ नहीं तोड़ देंगे। हां, भाजपा को भारी फायदा पहुंचा देंगे।

मेरठ के पत्रकार और ब्लागर सलीम अख्तर सिद्दीकी के फेसबुक वॉल से.

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प्रतिबंध लगाना और थोपना भाजपा सरकारों की फितरत बनने लगा है : ओम थानवी

Om Thanvi : प्रतिबंध लगाना, थोपना भाजपा सरकारों की फितरत बनने लगा है। कोई किस वक्त कौनसी फिल्म देखे, राज्य तय कर रहा है। क्या खाएं, यह भी। अभी सिर्फ शुरुआत है, आगे देखिए। गौमांस के निर्यात में हम, अमेरिका को भी पीछे छोड़, भारी विदेशी मुद्रा कमा रहे हैं; मगर देश में राज्य गौमांस पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। वह भी सभी राज्य नहीं लगा रहे। महाराष्ट्र और गोवा दोनों जगह भाजपा का राज है, पर गोवा – जिसका हाईकोर्ट मुंबई में है – प्रतिबंध से बरी है। वजह महज इतनी है कि महाराष्ट्र में प्रतिबंध से वोट बैंक मजबूत होगा, गोवा में कमजोर!

 

दरअसल गौहत्या – और कतिपय अन्य पशुहत्या – पर प्रतिबंध की गली संविधान ही छोड़ गया है, हालांकि उसका मकसद संभवतः धार्मिक नहीं बल्कि खेती और पशुपालन को बढ़ावा देना था। अब जब शासन धार्मिक आस्थाओं का ही लिहाज कर चल रहे हैं, तो मैं कहता हूँ गाय-सूअर की हत्या के साथ तमाम पशुओं को मारने, दुख देने पर प्रतिबंध लगा दो क्योंकि जैन धर्म में इसकी अपेक्षा की गई है; पशुओं से तैयार खाद्य-पदार्थों की बिक्री के साथ आलू-कंदमूल और प्याज-लहसुन उगाने-बेचने तक पर भी प्रतिबंध लगाओ, धर्म में उनकी की भी मुमानियत है। … जब हम दो धर्मों का खयाल रख सकते हैं तो चार का क्यों नहीं? (मैं जैन नहीं, पर ऐसे प्रतिबंध से मेरा भी निजी भला होगा, आप जानते हैं!)

Om Thanvi : साहित्यकार कैलाश वाजपेयी के निधन पर हिंदी ही नहीं, अंगरेजी के बड़े अखबारों ने अप्रत्याशित रूप से बड़ी खबरें और स्मृतिलेख छापे। यह सुखद था। लेकिन कल शाम जब कैलाश कैलाशजी की स्मृति में आयोजित सभा (अरदास) में गया तो देखा कि वहाँ हिंदी के सिर्फ दो साहित्यकार थे – अशोक वाजपेयी और मृदुला गर्ग। मित्रों की ओर से बोलने वाले राजनारायण बिसारिया। बाकी सब दिवंगत कवि के घर-परिवार के लोग थे, मित्र-बांधव, पत्नी रूपा वाजपेयी और बेटी अनन्या के परिचित। बात चली तो पता चला कि कैलाशजी के अंतिम संस्कार में भी साहित्यकारों की उपस्थिति बड़ी दयनीय थी। … इतनी बड़ी दिल्ली और साहित्यकारों का इतना छोटा दिल?

वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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भाजपा सांसद श्यामा चरण गुप्त दलाल है!

Padampati Sharma : श्यामा चरण गुप्त इलाहाबादी को कौन नहीं जानता. 250 करोड़ के कारोबारी हैं.. वे कहते हैं कि बीड़ी में औषधीय गुण हैं. वे खुद बीड़ी किंग हैं. कई जातिवादी दलों में घूम फिर कर फिर से भाजपा का दामन थामा है. उम्मीद कुछ मोदी से ही है. कांग्रेस की रेप्लिका बन चुकी भाजपा से नहीं. पता नहीं, नमों पार्टी को सुधार पाएंगे कि पार्टी उन्हें ही तार देगी.. आने वाला समय तय करेगा… लेकिन सिगरेट निर्माता कंपनी की दलाली कर रहे हैं भाजपा सांसद, यह तय है…

यह हो क्या रहा है… भाजपा के दो तंबाकू प्रेमी सांसदों का दावा है कि तंबाकू से कैसर नहीं होता और इस संदर्भ में सरकार को सर्वे कराना चाहिए. एक हैं दिलीप गांधी और दूसरे हैं श्याम बीड़ी के अधिष्ठाता श्यामा चरण गुप्ता. मैं किसी सर्वे को नहीं जानता. मैं तो अपने चाचा पं बैकुंठ पति शर्मा ( गीगा गुरू ) को इसी तंबाकू की वजह से खो चुका हूं. हर वक्त उनके मुंह में गुटके के साथ पान घुला रहता था. मुंह का कैंसर हो गया. कोलकाता स्थित अपोलो अस्पताल में आपरेशन हुआ. लोगों से यही कहते थे ‘ कभी तंबाकू- गुटका मत खाना. चंद महीने ही जी सके. पतंजलि ( हरिद्वार ) भी मैं ले गया था उन्हें. वहां से बैरंग लौटा दिया.

यही नहीं मेरी फुफेरी बहन आरती परी जैसी थी पर हाय इसी तंबाकू ने उसका क्या बुरा हाल कर रखा था दो बार आपरेशन हो चुका था. जिंदगी जहन्नुम से गयी गुजरी हो चुकी थी और ये ‘दलाल’ सांसद किस तरह की बकवास कर रहे हैं ! मित्रों, आपसे हाथ जोड़ कर प्रार्थना है कि तंबाकू मिश्रित किसी भी चीज का सेवन न करें. करते हों तो त्याग दे. इच्छा शक्ति हो तो आप एक झटके में इस दुर्व्यसन से निजात पा सकते हैं. मैं कोई संत महात्मा नहीं हूं. साधारण सा इंसान हूं. कभी हजारों रुपये इसी कुआदत में बहा करते थे. बनारस मे दो दुकानों से बंधी का पान आता था. पान मसाला अलग से और आफिस में पान आता सो बताने की जरूरत नहीं.

एक दिन की बात है..एक चैनल लांच होने को था उस टीम में मैं भी था. एक दिन प्रोमो बन रहा था और मैं स्वामी क्रिकेटानंद महाराज के गेटअप में था. एक शाट में पाया कि बोलते समय एक सिट्टी मुंह से गिरती नजर आयी. शर्म के मारे पानी पानी हो गया. भागा भागा गया वाशरूम और कुल्ला करने के दौरान संकल्प लिया कि बस आज के बाद कुछ नहीं. तत्काल दूसरा प्रोमो बनवाया. इस बात को छह बरस होने को आए…हां, बनारस जाता हूं तो मित्र है लल्लू तीन दशक तक बंधी का पान खिलाया था, एकाध बीड़ा जमा लेता हूं बिना सुर्ती के. कभी बैडमिंटन खेलने के बाद सरस्वती फाटक स्थित उसकी दुकान पर आधा घंटे की बैठकी हुआ करती थी. बैठकी तो अब भी होती है पर बिना पान घुलाए ही. औसत साल मे महज दो पान का ही होगा. पहले हालत यह थी कि जरा सी भी गरम चीज हो, नहीं खा पाता था, सू सू करने लगता था, मिर्च तो देख भी नहीं सकता था. मैं भी गीगा चाचा और शरद पवार ( शतायु हों ) की राह पर बढ़ चला था. समय पर होश आ गया. आज सब कुछ आराम से खाता हूं जिंदगी मौज बन गयी. संसद का सत्र शुरू होने दीजिए इन सांसदों की थुक्का फजीहत देखने लायक होगी.

नोट : हमारे काठमांडो स्थित अनुज मानवेंद्र शर्मा ‘पप्पू’ ने अभी अभी बताया कि कुछ दिन पहले आरती नारकीय कष्ट से मुक्ति पा कर भगवान को प्यारी हो गयी..कर्सियांग (दार्जीलिंग ) में रहती थी. दिन भर तंबाकू वाली सुंघनी और गुड़ाकू ही करती थी. परमात्मा उसकी आत्मा को शांति प्रदान करें.

Om Thanvi : तम्बाकू के धंधे को कानून के कंधे का सहारा देने वाली संसदीय समिति के एक सदस्य श्यामाचरण गुप्ता (भाजपा) खुद बीड़ी-निर्माता हैं। उनको क्यों ऐसी समिति का सदस्य होना चाहिए? समिति – जिसमें आधे से ज्यादा सदस्य भाजपा के थे – के अध्यक्ष दिलीप गांधी भी भाजपा सांसद हैं। उनका तर्क थाः “भारत में कोई सर्वे नहीं हुआ जो तम्बाकू सेवन से कैंसर के संबंध को साबित कर सके; ऐसे जो अध्ययन हुए हैं, सब विदेश में हुए हैं।” विदेश में विज्ञान के अध्ययन क्या उसी देश पर लागू रहते हैं? यह दलील उद्योगपतियों के फायदे के लिए दी गई है या जन-समुदाय के? सांसद गुप्ता ने एक और हास्यास्पद तर्क दिया है। कहते हैं- “चीनी से डायबिटीज होती है, चीनी को तो प्रतिबंधित नहीं करते?” यह तर्क हास्यास्पद इसलिए भी है कि चीनी खाने की वजह से डायबिटीज या मधुमेह का रोग होता हो, कोई अध्ययन ऐसा नहीं कहता। हां, जिन्हें पहले से रोग है उनके लिए चीनी (और अन्य अनेक पदार्थ भी) जरूर नुकसानदेह होती है। और तम्बाकू और चीनी के गुणावगुण – है इनमें कोई साम्य? माना कि कॉरपोरेट का दौर-दौरा है, बीड़ी-सिगरेट के धंधे की रक्षा करनी है तो करो – पर कुतर्क तो न दो!

वरिष्ठ पत्रकार द्वय पदमपति शर्मा और ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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जिंदगी की जंग लड़ रहे पत्रकार की भाजपा विधायक ने की मदद, सपा सरकार बेखबर

लखनऊ : भारतीय जनता पार्टी के विधायक सत्यदेव पचौरी ने गत दिनो संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में अपना इलाज करा रहे वरिष्ठ पत्रकार उदय यादव से भेंट कर उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी प्राप्त की। उदय को दोनों किडनियां खराब होने के बाद इलाज के लिए भर्ती किया गया है। वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके दूसरे मंत्रियों ने उदय की ओर ध्यान तक नहीं दिया है। 

उदय यादव दैनिक जागरण और कई अन्य प्रमुख समाचार पत्रों में भी कार्य कर चुके हैं। पचौरी ने बीस हजार रुपए की आर्थिक मदद तत्काल निजी रूप से उपलब्ध करायी। साथ ही चिकित्सकों से उनकी बीमारी के बारे में भी चर्चा की। बाद में श्री पचौरी ने कानपुर के अन्य पत्रकारों के साथ चर्चा कर यादव के इलाज में अर्थिक मद्द दिलाए जाने हेतु हर संभव कोशिश करने का आश्वासन दिलाया। विधायक ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा अब तक पत्रकार के इलाज हेतु आर्थिक सहायता न उपलब्ध कराये जाने पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि यथाशीघ्र सरकारी स्तर से व निजी क्षेत्रों में पत्रकार के इलाज हेतु हर संभव सहायता का काम करेंगे।

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हमने कोई मिस्ड काल नहीं किया लेकिन भाजपा का मेंबर बनाकर बधाई तक मैसेज कर दिया!

Badal Saroj : दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी…. जिसे ढंगढौर से चोट्टयाई करना भी नहीं आता…  हमने कोई मिस्ड काल नहीं किया – कोई बटन नहीं दबाया, किसी मेल में दिए ऑप्शन को क्लिक नहीं किया। मगर हमारे दोनों सेल फ़ोन नंबर्स पर हमें भाजपा का सदस्य बनने के लिए बधाई दी जा चुकी है। इनके अलावा दो और नंबर्स हैं हमारे पास – जिन्हे हम फिलहाल इस्तेमाल नहीं कर रहे है, संभवतः उन पर भी इसी तरह की सदस्यता प्राप्ति के मेसेज आये होंगे। इस तरह हम एक ऐसी पार्टी के चार बार सदस्य बन चुके हैं, जिसकी किसी भी बात से हम सहमत नहीं हैं।

इन संदेशों में रिप्लाई-बैक का कोई प्रावधान नहीं है। इस बेहूदगी के बारे में आपत्ति जताने का कोई स्थान नहीं है। बहरहाल इसे हम सड़क पर चलते समय कौओं के झुण्ड द्वारा उड़ते में की गयी निवृत्ति से कपड़ों पर पड़ी छींट की तरह नव-तकनीक से उपजी निजी त्रासदी के रूप में ले लेते हैं।  मगर इस लिहाज से भी तो अमितशाह-मोदी की भाजपा का सदस्यता अभियान अभी बहुत पीछे है। इन्हे तो ढंगढौर से चोट्टयाई करना भी नहीं आता।

दिसंबर 2014 में देश में कुल जीवित मोबाइल कनेक्शन्स थे 970.97 मिलियन अर्थात 97+ करोड़। इनमे प्रतिमाह औसत बढ़ोत्तरी 5.88 मिलियन की दर से होने के रुझान के हिसाब से तीन माह में कुल नए कनेक्शन्स जुड़े 17.64 मिलियन। कुल हुए 988.61 मिलियन अर्थात 98 करोड़ 86 लाख 10 हजार। (Source : Telecommunications in India)  इन 98 करोड़ 86 लाख 10 हजार मे से फर्जी मेसेज भेजने का काम अभी तक ये भाई लोग – दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के साथ होने के बावजूद – केवल 8+ करोड़ फोन तक ही कर पाये हैं! यार किसी काम में तो अपना नाकारापन झुठलाओ!!

मध्य प्रदेश के वरिष्ठ सीपीएम नेता बादल सरोज के फेसबुक वॉल से.

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काम की जगह बीजेपी कर रही है टोटके

दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनने का सपना संजोए भाजपा अपने सदस्यता अभियान को लेकर नए सिरे से सक्रिय हो गई है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने निर्देश दिया है कि गत लोकसभा चुनावों में पार्टी के पक्ष में मतदान करने वाले 17.3 करोड़ मतदाताओं में से ज्यादातर लोगों से संपर्क साधा जाए। मिस्ड कॉल के जरिये सदस्यता अभियान चला रही भाजपा अपनी  साख बचाने के लिए जूझ रही है।

सदस्यता के लिए उपलब्ध कराए गए टोल फ्री नंबर पर करीब 6.5 करोड़ लोगों ने मिस कॉल तो दिए, मगर सदस्यता लेने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसे देखते हुए भाजपा ने 31 मार्च को खत्म हो रहे सदस्यता अभियान को एक महीने के लिए आगे बढ़ा दिया है। बीजेपी सदस्यता अभियान को मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में मिल रहे पब्लिक के ठंडे रिस्पांस ने दिग्गजों की चिंता बढ़ा दी है। सवा दो करोड़ के लक्ष्य को देखते हुए प्रदेश संगठन फिसड्डी साबित हो रहा है, नवंबर से अब तक 67 लाख सदस्यों का रजिस्ट्रेशन हो सका है। यूं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी सदस्य संख्या बढाकर इतिहास रचने की मुहिम में जुटी है, मगर मध्य प्रदेश में कई ब़डी गडबडियां सामने आ रही हैं। यहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की प्रदेश इकाई के सचिव बादल सरोज को भी भाजपा का सदस्य बना दिया गया है। खास बात यह कि उन्हें एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार सदस्य बनाया गया है।  

माकपा के बादल सरोज ने भाजपा के सदस्यता अभियान पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि भाजपा फर्जी सदस्य बनाए जा रही है। उनका कहना है कि भाजपा ने उन्हें भी अपना सदस्य बना लिया है। उन्होंने बताया कि उनके दो मोबाइल नंबर हैं, दोनों ही मोबाइल पर उनके पास संदेश आया है कि आपने भाजपा की सदस्यता ली है, इसके लिए आपको धन्यवाद। बीजेपी के अनुसार इस समय पार्टी के सदस्यों की संख्या नौ करोड़ के आसपास पहुंच गई है। जबकि सदस्यता के लिए आए मिस्ड कॉल की संख्या 15 करोड़ से ज्यादा है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक दिल्ली स्थित देश के एक नामी स्कूल रेयान इंटरनेशनल स्कूल में बीजेपी का सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है। टीचर और छात्रों को बीजेपी ज्वाइन करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। स्कूल की मैनेजिंग डायरेक्टर ग्रेस पिंटो ने इस बात की पुष्टि की कि स्कूल में सदस्यता अभियान चलाया गया लेकिन यह पूरी तरह स्वैच्छिक है। किसी पर ‌इसके लिए कोई दबाव नहीं है। यद्दपि स्कूल प्रशासन कह रहा है कि यह अभियान स्वैच्छिक है लेकिन शिक्षकों और बच्चों का कहना है कि ये सच नहीं है। कुछ शिक्षकों ने तो दावा किया है कि उनकी सैलरी भी रोक ली गई, जब तक वो बीजेपी में सदस्यता न ले लें। शिक्षकों, बच्चों और उनके अभिभावकों ने भी ये बात कही है कि उन्हें वॉट्सऐप मैसेज मिले हैं जिनमें बीजेपी की सदस्यता लेने के लिए एक टोल फ्री नंबर 18002662020 दिया गया है। इस नंबर पर कॉल करने पर उसके रिप्लाई में एक मैसेज आता है, जिसमें बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता का नंबर आता है।

इसका मतलब कि आप बीजेपी के सदस्य हो गए। बीजेपी का मानना है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है लेकिन कांग्रेस की गोवा इकाई ने भारतीय जनता पार्टी के सदस्यता अभियान के विश्व रिकार्ड बनाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि भाजपा राज्य में अपने चार लाख पंजीकृत सदस्य होने का दावा करती है, इसके बावजूद इसे जिला पंचायत चुनाव में इससे भी कम वोट मिले हैं। कांग्रेस सचिव दुर्गादास कामत ने सोमवार को जारी एक बयान में कहा कि भाजपा ने इस साल जनवरी में चार लाख लोगों के पार्टी से जुड़ने का दावा किया है, जबकि मार्च में हुए जिला पंचायत चुनाव में इसे जो वोट मिले हैं, वह इसकी तुलना में बहुत कम है। कामत ने कहा, “गोवा में जिला पंचायत चुनाव ने भाजपा के राष्ट्रव्यापी सदस्यता अभियान के दावों की पोल खोल दी है। भाजपा को सिर्फ 1,50,674 वोट ही मिले हैं, जबकि जनवरी में इसने अपने सदस्यों की संख्या चार लाख पहुंच जाने की बात कही थी। तो क्या इसका मतलब यह है कि भाजपा के दो लाख से अधिक सदस्यों ने अपनी ही पार्टी के लिए मतदान नहीं किया, जिसकी सदस्यता के लिए उन्होंने हस्ताक्षर किए।” हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने इसके सदस्यों की संख्या 8.8 करोड़ हो जाने और इसके विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन जाने का दावा किया था।

जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के 8.6 करोड़ सदस्यों को पार कर गई है। कामत ने कहा कि गोवा में इसके सदस्यता अभियान की धोखाधड़ी ने देशव्यापी स्तर पर बनाए जा रहे सदस्यों की संख्या को लेकर इसके झूठ का छोटा सा नमूना पेश किया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए गोवा के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर ने यह जरूर स्वीकारा की चुनाव में कम वोट मिले, लेकिन यह दावा भी किया कि राज्य में भाजपा के सदस्यों की संख्या चार लाख हो गई है। पारसेकर ने कहा, “जिला पंचायत चुनाव के अंतर्गत सभी नगरनिगम नहीं आते। इसका मतलब है कि सभी सदस्यों ने वोट नहीं किया।” वहीँ दूसरी और गुजरात बीजेपी का दावा है कि गुजरात में बीजेपी की सदस्यों की संख्या एक करोड़ हो गई है। पार्टी की गुजरात इकाई के अनुसार राज्य में उनकी सदस्यता मुहिम सफल हुई और गुजरात में सदस्यों की संख्या एक करोड़ हो गई। चुनाव में जनता से पार्टियाँ वादा करती है कि ग़रीबी ख़त्म होगी, भ्रष्टाचारियों को जेल में डाला जायेगा,मंहगाई ख़त्म होगी, सुशासन का राज होगा, बेघरों को घरों को घर मिलेगा, लेकिन गद्दी पर बैठते ही वह अमीरों की सेवा में लग जाती हैं। बीजेपी ने अपना रंग दिखा दिया है। चुनाव में फ़ायदा पहुँचाने वाले अडानी को उसने 390 एकड़ ज़मीन दे दी।

एसबीआई की एक विदेशी शाखा से एक प्रतिशत ब्याज पर छह हजार करोड़ का लोन दिला दिया गया। कच्चे तेल का दाम बढ़ाकर अंबानी को उसने करोड़ों करोड़ का लाभ पहुँचाया। कैग समिति की रिपोर्ट है कि गुजरात सरकार ने 15,000 हज़ार करोड़ का लाभ अडानी, रिलांयस और एस्सार ग्रुप को पहुँचाया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने चुनावी वादे से पीछे हट चुके हैं। उन्होंने 15-15 लाख काला धन नागरिकों को देने का वादा किया था, अब वे कह रहे हैं कि मुझे मालूम ही नहीं है कि विदेशी बैंकों में काला धन कितना है? मंहगाई बढ़ती जा रही है, भ्रष्टाचार और महिला सुरक्षा पर नीतियां हो विफल हो रही हैं। प्रभु जी के लम्बे चौड़े दावों  बावजूद रेलों के एक्सीडेंट हो रहे हैं, सांसद तक लुट रहे हैं। स्मार्ट सिटीज बयानों तक सीमित हो गयी हैं। बहुचर्चित स्वच्छता अभियान विद्या बालन के शौचालय विज्ञापन पर अटका हुआ है। कानून व्यवस्था में कोई सुधार न होकर अपराधों में बढ़ोत्तरी हो रही है। भ्रष्टाचार पर किसी क्षेत्र में काबू नहीं पाया जा सका है। मोदी जी चौड़ा सीना कर दावा कर रहे हैं कि उनके शासन में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है। श्रम क़ानून को पूँजीपतियों के हित में बदल दिया गया है। मोदी सरकार दावा कर रही है कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के तहत किसानों को चार गुना मुआवजा मिलेगा, लेकिन बीजेपी शासित राज्यों में हकीकत कुछ और ही है। हरियाणा, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में किसानों को बाजार भाव का सिर्फ दो गुना मुआवजा ही मिलेगा। किसानों पर मौसम की मार पड़ी है उसपर मोदी जी सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं। मन की बात कर अपने बिल को जायज ठहरा रहे हैं। कुल मिलाकर भाजपा पिछले दस महीनों में सिर्फ कुछ टोटके भर करती रही है। जमीन पर कोई ठोस काम वह नहीं कर सकी है। इसलिए जनता का ध्यान भावनात्मक मुद्दों पर डाइवर्ट करना भाजपा की मज़बूरी है। 

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ये है इंडिया मेरी जान : भाजपाइयों ने स्टेशन पर कराया बैंड बाजा डांस… सुनिए स्टेशन मास्टर का अदभुत बयान

नीचे दो वीडियो लिंक हैं. पहले में बलिया के सुरेमनपुर रेलवे प्लेटफार्म पर बैंड बाजा डांस है. दूसरे में इस डांस और भीड़ पर स्टेशन मास्टर सुरेमन पुर टीएन यादव का बयान है. बलिया के सुरेमनपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर स्टेशन मास्टर की मौजूदगी में हुआ डांस चर्चा का विषय बन गया है. हजारों लोगों ने बिना प्लेटफार्म टिकट लिये स्टेशन पर नाच का खूब मजा लिया. जनता ने खुश होकर नाचने वाली को पैसे भी खूब दिए.

स्टेशन मास्टर ने कहा कि प्लेटफार्म पर जो नाच हो रहा है वह गैर-कानूनी है लेकिन नाच बहुत अच्छा हो रहा है, उसे होने दीजिये. ये डांस उस वक्त कराया गया जब BSP नेता मुक्तेश्वर सिंह ने BSP को छोड़ कर BJP का दामन थाम लिया. इसके बाद वह पहली बार बलिया आ रहे थे तो ट्रेन लेट हो गयी. स्वागत में खड़े हजारो लोगों की भीड़ को रोकने के लिए भाजपा के आयोजकों ने प्लेटफार्म पर ही अश्लील डांस शुरू करा दिया.

वीडियो देखने के लिए इन लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=tvBy-YrVPJ0

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https://www.youtube.com/watch?v=4o7-ZkfWgCA

बलिया से संजीव कुमार की रिपोर्ट.

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भारत को अपना 21वीं सदी का सबसे बड़ा झुट्ठा और सबसे बड़ा झूठ मिल गया है!

Yashwant Singh :  भारत को अपना 21वीं सदी का सबसे बड़ा झुट्ठा मिल गया है. वह हैं माननीय नरेंद्र मोदी. जाहिर है, जब झुट्ठा मिल गया तो सबसे बड़ा झूठ भी खोज निकाला गया है. वह है- ‘अच्छे दिन आएंगे’ का नारा. नरेंद्र आम बजट में चंदा देने वाले खास लोगों को दी गयी 5% टैक्स की छूट… इसकी भरपाई वोट देने वाले आम लोगों से 2% सर्विस टैक्स बढा कर की जाएगी.. मोदी सरकार पर यूं ही नहीं लग रहा गरीब विरोधी और कारपोरेट परस्त होने के आरोप. खुद मोदी के कुकर्मों ने यह साबित किया है कि उनकी दशा-दिशा क्या है. इन तुलनात्मक आंकड़ों को कैसे झूठा करार दोगे भक्तों… अगर अब भी मोदी भक्ति से मोहभंग न हुआ तो समझ लो तुम्हारा एंटीना गड़बड़ है और तुम फिजूल के हिंदू मुस्लिम के चक्कर में मोदी भक्त बने हुए हो. तुम्हारी ये धर्मांधता जब तुम्हारे ही घर के चूल्हे एक दिन बुझा देगी शायद तब तुम्हें समझ में आए. कांग्रेस की मनमोहन सरकार से भी गई गुजरी मोदी सरकार के खिलाफ हल्ला बोलने का वक्त आ गया है… असल में संघ और भाजपा असल में हिंदुत्व की आड़ में धनिकों प्रभुओं एलीटों पूंजीपतियों कार्पोरेट्स कंपनियों मुनाफाखोरों की ही पार्टी है। धर्म से इनका इतना भर मतलब है कि जनता को अल्पसंख्यक बहुसंख्यक में बाँट कर इलेक्शन में बहुमत भर सीट्स हासिल कर सकें। दवा से लेकर मोबाइल इंटरनेट घर यात्रा तक महंगा कर देना कहाँ के अच्छे दिन हैं मोदी जी। कुछ तो अपने भासड़ों वादों का लिहाज करो मोदी जी। आप तो मनमोहन सोनिया राहुल से भी चिरकुट निकले मोदी जी।

Badal Saroj : Budget 2015… “ये जो तुम्हारे चेहरे पर लाली है सेठ जी, तुमने मेरे लहू से चुरा ली है सेठ जी।” जो पैसा कार्पोरेट्स और धन्ना सेठों के लिए छोड़ दिया गया उसका विवरण Via Sunand Sunand. (उपर दोनों ग्राफ बारीकी से देखें.) ध्यान रहे, यह इनके बाबा जी का माल नहीं था- जनता का पैसा था !! और यह खैरात जनता – बेहद बदहाल जनता – को मिलने वाली कल्याणकारी योजनाओं में कटौती करके बांटी गयी है।

Dinesh Choudhary जय हो! साहेब ने चुनावी चंदे की एक और किस्त चुका दी है। (Corporate taxes are taxes against profits earned by businesses during a given taxable period; reduced from 30 % to 25%)I और मध्यमवर्गीय भक्तगण चुप- चुप से क्यों हैं? पहले सरकारें जनपक्षीय होने का दिखावा करती थीं और इसीलिए थोड़ी रियायत भी। ये पहली बेशर्म सरकार है जो सरमायेदारों के गलबहियां लगकर कीमत अदा कर रही है। इस बजट में हालांकि साहित्य अकादमी और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, क्योंकि उनके बजट में क्रमश: 54 और 44 फीसदी की कटौती की गई है। साहित्या अकादमी का आवंटन 21.23 फीसदी से घटाकर 9.76 फीसदी कर दिया गया है और एनएसडी का आवंटन 43.03 फीसदी से घटाकर 13.45 फीसदी कर दिया गया है। कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय सहायता योजना के लिए आवंटित धन में बहुत बड़ी कटौती की गई है। पहले इसका बजट 59.33 फीसदी था जो कि घटाकर 3.20 फीसदी कर दिया गया है।

Sheetal P Singh : दरअसल पहले दूसरे और तीसरे साल में सभी “लोकप्रिय सरकारें” अपने असल रंग में होती हैं। बाद के दो सालों में वे चुनाव की तैयारी में ग़रीब नवाज़ हो जाती हैं। यूपीए २ को याद करें। मोदी कुछ अलग नहीं कर रहे भक्तों ऽऽऽऽ। तेल के दाम बढ़ने से ख़फ़ा ख़फ़ा क्यूँ हो? अपनों के लिये जो भी कर गुज़रना है उसका वक़्त अभी ही है। टीवी चैनलों की डिबेट में गला फाड़ने के लिये जन धन स्वच्छ भारत दो लाख का बीमा आदि आदि आदि कितना तो किया है जेटली साब ने। लोग कुछ जादा नाशुक्रे हो चले हैं ……। मंहगाई न देखो उसके बढ़ने की दर देखो, कित्ती कम है ना ? देखो मुसलमानों की आबादी बढ़ी जा रही है, हिन्दू इसाई हुए जा रहे हैं , चीन चुमार में घुसने से रोक दिया गया है , पाक सीमा पर ५६” का सीना अड़ा दिया है । रामलला भी बुला रहे हैं । चार बच्चे ….नहीं छ: तो करो ही , मंहगाई की तुसी फ़िक्र ना करो । देखो देखो सामने आकाश में देखो … बिकासइ बिकास , टी वी में बिकास,अख़बार में बिकास बस सोशल मीडिया में ऐन्टी सोशलन के मारे कुछ गड्ड मड्ड चल रयो है । दो तीन साल तो यों बीतेंगे कि बस फुर्र…..

Mukesh Kumar : कार्पोरेट और अमीरों के लिए अच्छे दिन का बजट- सुपर बजट सुपर रिच के लिए। 10 में से 10 नंबर। कार्पोरेट को तमाम तरह की रियायतें। कार्पोरेट टैक्स में फिर से कमी। 10 में से 10 नंबर। इंडस्ट्री को तरह-तरह की राहते, रियायतें और नियामतें। 10 में से 9 नंबर। अपर मिडिल क्लास को भी कुछ हल्के-फुल्के तोहफे। 10 में से 5 नंबर। कृषि क्षेत्र के लिए कुछ नहीं। आम आदमी की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए कुछ नहीं। 10 में से 3 नंबर। बजट के साथ आए अच्छे दिन… पेट्रोल और डीज़ल दोनों की क़ीमतें एक झटके में लगभग तीन रुपए बीस पैसे बढ़ा दी गई है। फरवरी महीने में ही ये दूसरी बढोतरी है। ध्यान रहे अभी भी यूपीए सरकार के ज़माने के मुक़ाबले अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की क़ीमतें आधे से भी कम हैं, तब ये आलम है। ये भी मत भूलिएगा कि दो दिन पहले रेलमंत्री ने मालभाड़े में दस फ़ीसदी की बढोतरी की थी। स्वागत कीजिए अच्छे दिनों में बढ़ती महँगाई के तोहफे का।

Punj Prakash : कला, कलाकार और संस्कृति विरोधी है यह बजट… यह बात केवल इसलिए नहीं कही जा रही है कि इस बजट में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बजट में 44% और साहित्य अकादमी के बजट में 54% की कटौती की गई है बल्कि यह बात इसलिए कह रहा हूँ कि“अच्छे दिन” का वादा करके सत्ता में आई वर्तमान सरकार ने कला और संस्कृति को बढ़ावा देनेवाली बजट में क्रूरता पूर्ण कटौती करते हुए 59.33 करोड़ से घटाकर 3.20 करोड़ कर दिया है । मैं इस बात से भी भली-भांति परिचित हूँ कि कला और संस्कृति के नाम पर दिए जा रहे आर्थिक सहयोगों में घनघोर अराजकता है । यह अराजकता कलाकारों के नैतिक पतन की निशानी तो है लेकिन इससे ज़्यादा सरकारी महकमे की नाकामी भी है । जिसका उपाय उस अराजकता को ज़िम्मेदारी पुर्वक खत्म करके भी किया जा सकता था । समाज या सरकार का कोई अंग यदि बीमार हो जाता है तो उसका इलाज किया जाना चाहिए न कि उसकी निर्मम हत्या । इतिहास गवाह है कि बिना किसी आश्रय (जनता, सरकार व कारपोरेट आदि) के कला और कलाकार ज़्यादा समय तक ज़िंदा नहीं रह सकते । जो सरकार कला और संस्कृति के प्रति इतना निर्मम हो वह समाज के प्रति संवेदनशील होगी, इस बात पर मुझे संदेह है । सनद रहे, इस विषय पर कला संस्थानों और कलाकारों की यह शर्मनाक चुप्पी एक दिन कला और कलाकार दोनों के पतन का कारण बनेगीं । याद रखिए वो यह सब सोच समझकर, एक मुहीम के तहत कर रहें हैं, मासूमियत और अनजाने में नहीं।

Vikram Singh Chauhan : मैं सबसे ज्यादा लाचार, हताश और निराश इन दिनों मोदीभक्तों को देखता हूँ। ये चुपचाप कहीं दुबक गए है और कइयों ने अपनी आईडी डिलीट कर दिया है। ये साल भर पहले अपने नाम के आगे -पीछे नमो लिखते थे और हम लोगों को धमकाते थे। आज उनकी खुद की भी पहचान नहीं है। मोदी भी इन्हें व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानते सो अडानी की तरह इनको कोई लाभ मिलने से रहा। मैं इन लोगों से लंबे समय तक लड़ा। कई लोग मुझे खुलेआम मारने की धमकी देते थे ,कुछ जाननेवाले लोग तो मोदी आलोचना से ऐसे गुस्से में थे मुझे ट्रैन से फेंक देंगे तक बोलते थे। नाईट में ऑफलाइन होने के बाद ये लोग कमेंट में माँ -बहन की गाली लिख देते थे। कभी -कभी रात 3 -4 बजे उठ मैं इस कमेंट को डिलीट करता था। पर मैं अपने रास्ते पर अडिग रहा और सच लिखता रहा। आख़िरकार आज इनको मोदी की असलियत पता चला। है तो ये लोग भी हमारी तरह आम इंसान। लेकिन विचारधारा दूसरा और ज़हरीला। आज ये लोग हमसे नज़र नहीं मिला पाते। चुपचाप अब मुझे फॉलो कर रहे है और सभी पोस्ट को लाइक। पर कुछ कह नहीं पा रहे है। मैं आज भी इन्हें माफ़ करने को तैयार हूँ।

Dayanand Pandey : जनता के अच्छे दिन तो नहीं ही आए, न आने के आसार हैं पर हां, नरेंद्र मोदी की बदनसीबी के दिन शुरू हो गए हैं। और तय मानिए मंहगाई जो ऐसे ही अबाध रूप से बढ़ती रही तो मनमोहन सिंह से भी ज्यादा दुर्गति नरेंद्र मोदी की होगी! होनी ही है! यह सर्विस टैक्स, यह टोल टैक्स, वैट आदि का नाम बदल कर सरकार को डाका टैक्स या जबराना टैक्स रख देना चाहिए!
   
Sandeep Verma : बजट में जूते इसलिए सस्ते किये गए है कि वित्त मंत्री चाहते है कि हर वोटर जरनैल सिंह बन सके. देश के हर गरीब -अमीर पर सर्विस टैक्स का डेढ़ प्रतिशत अधिक कर देने का भार सिर्फ इसलिए बढ़ाया गया है ताकि मोदी जी की सरकार कारपोरेट को टैक्स में पांच प्रतिशत की छूट दे सकें. वैसे मोदी जी की सरकार ने थोड़ी बेईमानी भी की है. डेढ़ प्रतिशत की इस बढ़ोत्तरी से वे कारपोरेट का पूरा ही कर माफ़ कर सकते थे. मगर उन्होंने नहीं किया. इसलिए मोदी की सरकार को पूरी तरह कारपोरेट के हाथों में खेलने वाला नहीं कहा जा सकता है.

Daya Sagar : रेल बजट के बाद आज आम बजट भी आ गया। अनुकूल जलवायु, अनुकूल अंतरराष्ट्रीय बाजार, मजबूत जनादेश से आए राजनीतिक स्‍थायित्व के बावजूद इतनी निराशा। तेजस्वी प्रधानमंत्री के भाषणों की चमक इस बजट में कहीं नहीं दिख रही। कारपोरेट जगत खुशी के पटाखे फोड़ रहा है। यकीन मानिए गरीब और मध्यम वर्ग के लिए अच्छे दिन अभी बहुत दूर हैं।

Cartoonist Irfan : देश के सबसे खास दिन जब आम आदमी का अगले साल का जीना कैसा होगा, तय होता है. उस समय इस बार बार के बजट पर गंभीर चर्चा चल रही थी सभी न्यूज़ चैनलों पर. कि एंकर ने सभी विशेषज्ञों को रोक दिया कि बेर्किंग न्यूज़ आ रही है ‘भारत ने अभी-अभी शानदार जीत दर्ज की है यूएई पर. और सारा कार्यक्रम क्रिकर्ट पर शुरू हो गया। यह हर न्यूज़ चैनल का हाल था। जब देश इतनी गंभीर चर्चा हो रही हो तब क्या नीचे फलेश देकर ही इस ‘विशाल’ जीत का जश्न नहीं मनाया जा सकता थ. और वैसे भी रोज़ आप खेल पर अलग से कार्यक्रम करते ही हैं. क्या समझें कि देश के लिए दो वक्त की रोटी से बड़ा क्रिकेट है?

Suraj Sahu : लो जी सर्विस टैक्स 12.50% से बढ़ाकर 14%हुआ ।। लो जी आ गए अच्छे दिन ।। अब खाओ खाना होटल में । वाह आम बजट में आम आदमी को टैक्स में कोई छूट नही और कॉर्पोरेट कंपनियों को टैक्स में छूट… अबकी बार कॉर्पोरेट कंपनियों की सरकार

फेसबुक से.


आगे की कथा यहां पढ़ें…

बीजेपी के चंदे का काला धंधा देखिए… ऐसे में मोदी जी क्यों नहीं पूंजीपतियों के हित में काम करेंगे….

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बीजेपी के चंदे का काला धंधा देखिए… ऐसे में मोदी जी क्यों नहीं पूंजीपतियों के हित में काम करेंगे….

दिल्‍ली विधानसभा चुनावों से पहले आम आदमी पार्टी को चंदे के मुद्दे पर घेरने वाली बीजेपी के चंदे का खेल देखकर आप हैरान रह जाएंगे। खबरों के अनुसार भाजपा के खजाने में 92 फीसदी चंदा 2014 में लोकसभा चुनावों के ठीक पहले आया। बीजेपी को 20 हजार रुपए से अधिक 92 फीसदी चंदा बड़े कॉर्पोरेट घरानों ने दिया। उन घरानों में भारती समूह की सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट, स्टरलाइट इंडस्ट्रीज और केयर्न इंडिया ने 2014 में ही भाजपा को चंदा दिया। संयोग से 2014 से पहले इन घरानों ने भाजपा को चंदा दिया भी नहीं था। ये जानकारियां भाजपा द्वारा चुनाव आयोग में को दिए गए वर्ष 2013-14 के चंदो के आंकड़ों में सामने आई है। एसोशिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (ADR) ने आंकड़ों के विश्लेषण के बाद बताया है कि लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा को 157.84 करोड़ रुपए चंदा बड़े कॉर्पोरेट घराने ने ही दिया।

एडीआर के मुताबिक, 20 हजार रुपए से अधिक देने वालों में महज 8 फीसदी चंदा किसी व्यक्ति के नाम से आया। लगभग 772 व्यक्तियों ने भाजपा को 12.99 करोड़ रुपए चंदा दिया। उल्लेखनीय है कि 20 हजार रुपए या उससे अधिक चंदा देने पर ही व्यक्ति या संस्‍थान को पैन नंबर देना पड़ता है और चंदा देने वाले की पहचान ज‌ाहिर हो पाती है। मोबाइल कंपनी एयरटेल के मालिक भारती समूह के सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट ने भाजपा को सबसे अधिक 41.37 करोड़ चंदा दिया। उसके बाद स्टरलाइट इंडस्ट्रीज ने 15 करोड़ और केयर्न इंडिया 7.50 करोड़ की रकम दो चंदों के रूप में दी।

रोचक बात यह है कि सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट ने 2013-14 में कांग्रेस को 36.50 करोड़ रुपए चंदा दिया। कांग्रेस को सबसे ज्यादा चंदा देने वालों में ये ट्रस्ट भी था। भारती समूह का यही ट्रस्‍ट शरद पवार की पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को चंदा देने में भी आगे रहा। उसने एनसीपी को चार करोड़ का चंदा दिया, जो उस पार्टी का सबसे बड़ा चंदा दिया। 2013-14 में भाजपा, कांग्रेस, एनसीपी और सीपीआई के चंदों में 2012-13 की तुलना में 158 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। 2012-13 में भाजपा का चंदा 83.19 करोड़ रुपए था, अगले ही वर्ष यह 105 फीसदी की वृद्घि की साथ 170.86 करोड़ रुपए हो गया।

भाजपा ने 2013-14 में जो चंदा जुटाया, वह उसी साल में कांग्रेस, एनसीपी, सीपीआई और सीपीएम द्वारा ज़ुटाए गए कुल चंदे के दोगुने से भी ज्यादा था। सभी पार्टियों ने 20 हजार के चंदे से अधिक की जो रकम घोषित की उसका कुल योग 247.79 करोड़ रुपए है। कुल 2361 व्यक्तियों या संस्थानों के चंदों की घोषणा की गई है। बसपा का कहना है कि उसे 20 हजार से अधिक का एक भी चंदा नहीं मिला, इसलिए उसने अपने चंदे की घोषणा भी नहीं की। लोकसभा चुनावों में भाजपा को जो चंदा मिला, वह राष्‍ट्रीय पार्टियों को मिले कुल चंदे का 69 फीसदी था। भाजपा को औसतन हर एक चंदेदार से 13.19 लाख रुपए मिले, जबकि कांग्रेस के लिए यही आंकड़ा 11.‍70 लाख रुपए का है और एनसीपी एक करोड़ रुपए है। सीपीआई को औसतन हर चंदेदार से 3.23 लाख रुपए मिला, सीपीएम के लिए यह रकम 4.‍03 लाख रुपए थी दिल्‍ली वालों ने लोकसभा चुनावों में सर्वाधिक चंदा दिया। दिल्‍ली के 119 चंदेदारों ने भाजपा को 45.21 करोड़ रुपए दिए। कांग्रेस को भी दिल्‍ली से 39.05 करोड़ का चंदा मिला, जबकि सीपीआई को दिल्‍ली से 54.6 लाख और सीपीएम 1.88 करोड़ रुपए का चंदा मिला। सभी आंकड़े वित्त वर्ष 2013-14 के हैं। (साभार- न्यूज24आनलाइन)

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BJP Continues to Mislead Farmers and their Supporters in Various Parties

: The Real Battle is between Farmers and Land Grabbing Corporates and BJP, not between Bharat and Pakistan! :  BJP is Hiding Behind the Poor in its Defence :  The Ordinance now Bill is Bringing Back the Colonial Legacy: Unacceptable : Delhi : Forcible land acquisition has always been an issue of life and death for millions of people in India, not only farmers but also agricultural laborers and fish workers. With the Land Ordinance it has become a political hot-potato. More than 350 people’s organizations gathered at the Parliament Street on February 24th, with 25,000 people from Gujarat to Orissa to Assam, and from Himachal Pradesh to Tamil Nadu and Kerala. It has forced the political parties to take a stand on the issue and leading to heated debate and discussion on the floor of the Parliament. It is certainly a result of the anti-farmer and anti-poor move of undemocratically amending the 2013 Act on Land Acquisition and Rehabilitation to the extent of killing its very spirit and purpose.

The ordinance brought in by the NDA government just after the Winter session of the Parliament came to an end was an obvious imposition on the country’s common people of the same colonial legacy of the perverted vision of development through an unjust and undemocratic modus operandi. Ordinance is an attempt at opening of the land that is life support, source of livelihood and shelter for India’s toiling masses, to the wealthy investors, including big corporations and builders. It is to forcibly divert India’s agricultural land at the cost of food security giving a free hand with no ceiling to the private companies as well as private entities i.e. the private trusts and expensive profit making educational and health institutions. The intention is to benefit private interests in the name of public interest.

The 2013 Act which replaced the British Act on Land Acquisition, for the first time brought in the process of assessing Social Impact (SIA) along with environmental (EIA) in consultation with the affected people and the Gram Sabhas as well as appropriate urban units. As a precondition for the proper planning of rehabilitation including identifying, and listing of the affected population, the impact on their livelihood, culture, and an appropriate plan to compensate, this was a must if justice is to be done to those who are made to sacrifice in the name of development. Assessing options and seeking suggestions for alternatives to minimize impact and displacement would go a long way. The consent of land losers was also an important clause at least for private and PPP projects (The 2013 Act too left out government projects, unjustifiably) to respect and give our farmers due role, space and primacy in development planning as against ‘no level playing field’ situation between the monetary capitalists (the corporates) and the natural resource investors (farmers and others).

BJP’s Half Truths and Propaganda

The BJP leaders are now making false interpretations and unjustifiable arguments to accusing the people’s movements and pro people politicians and parties as indicated from the press conference held by Nitin Gadkari and statement by Arun Jaitley, the finance minister before the parliament, both of them the architects of the Ordinance and now the Bill. Without entering into dialogue with the agitating farmers’ organizations except members of their own ‘Parivar’, they are deliberately confusing the issues and presenting the struggle as a war between Bharat and Pakistan, drawing a false threat to India’s security.

“If the SIA process is carried out and consent is sought, taking some time for the same, Pakistan will come to know about the project and can sabotage it,” said Mr. Jaitley. This is a statement, an indicator of the frustration and fury among the ruling party led by the Prime Minister that wishes to save the Bill by misbriefing the people. How can seeking consent for a project developed by a private corporation, since government is allowing PPP and FDI in Defence as well, be threat to the national security but the private corporations involvement is not. Does that make any sense ?

The people’s movements, instrumental in getting the former UPA government to abolish the British Act of 1894 and to bring in the 2013 Act condemn this fake, communal appeal to disrespect the farmers and deny them the right to be partners in development. SIA and consent will not stop the projects but rather resolve the conflicts due to imposition of projects without rehabilitation.

The private and PPP projects have been grabbing land through forcible acquisition standing on the shoulders of the State. The SEZ of Ambani was to get 35000 hectares in Maharashtra, and DMIC is targeting 3,90,000 hectares. While the thousands of hectares of Sardar Sarovar command area land in Gujarat is diverted to companies, along with waters, Industrial Corridors to mining, tourism, water and power projects profiting companies are now proposed to be granted land that can be forcibly acquired from farmers. The 1894 British Act too was not permitted to be used for this, and no other country in the world has any such legal and legitimate way to forcibly transfer the farmers’, fishworkers’, and common peoples’ resources.

Mr. Gadkari is claiming the credit for including 13 acts under the purview of the 2013 Act but this is done after killing the spirit and main provisions in the Act. Mr. Gadkari and BJP spokespersons have also resorted to a farcical justification for the ordinance, referring to 31.12.2014 as the deadline, for including the acts. The fact is that Section 105 allowed 1 year to bring in these 13 acts so as to allow amendments in those and make land acquisition procedures and provisions therein, consistent with the new Act. Section 105 also elaborates the procedure of placing any amendment, notification before the parliament for 30 days, seeking approval. Instead of doing the same, the BJP government waited till the last day to include the Acts, only after excluding the main pro-people provisions.

The farmers in dam areas like Tata’s, Gosikhurd, Waang Marathwadi, Narmada or in industrial areas in Nandigram, POSCO or hill city project like Lavasa have experienced that the wasteland and previously acquired but unused land is ignored and more land, even irrigated, multiple crop land is forcibly acquired for non agricultural purposes. There is not less than 100,000 hectares of MIDC land, acquired for industries but left unutilized. The land acquired for Varasgaon Dam, 141 hectares were leased out for bungalows once Lavasa City came up, engulfing the dam itself!

The 2013 Act for the first time, brought in a restraint by suggesting a certain percentage to be decided by the state as a limit for acquiring multiple crop land in a district and a state. The movements believed no agricultural land should be acquired as today’s single crop land becomes multiple crop land tomorrow. But BJP doesn’t wish to put any limit to grabbing and destroying even prime agricultural land by changing the 2013 provision for the same.

The Penalty Clause (Section 87) in the 2013 Act is also changed to meet the heads of the departments sanctioning authorities as against holding them responsible for the violations by erring officials! The common persons cannot file a case (FIR) against the violators without a sanction, as per the Bill, 2015.

All this proves that the strong opposition to the Ordinance and the Bill 2015 by many an opposition parties and some of the NDA partners like Shiv Sena and LJD, is fully justifiable. We appreciate their taking a position in favor of the farming community in the country at this crucial juncture. Consideration including food security and no rehabilitation is possible without guaranteeing alternative livelihood (missing in the 2013 Act itself) has now led all those who support our food growers and toiling masses including small traders, artisans, to challenge the anti-people move, the Bill, 2013 which will lead to more suicides and make millions landless laborers.

We instead demand further pro-people amendments as recommended by the two Parliamentary Standing Committees in the 2013 Act to save farmers’ lives and livelihoods of millions.

श्री अरुण जेटली ने कल राज्य सभा ने भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, २०१५ के बचाव में जो अपना वक्तव्य दिया है वह सिर्फ गरीबों के पीछे छुपने वाली बात है।  मंत्री महोदय ने बार बार यही कहा की उन्होंने प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, सिंचाई और गरीबों के लिए घर बंनाने के लिए संशोधन प्रस्तुत किये। उन्होंने यह भी कहा की देश की सुरक्षा के लिए सरकार किसानो की सहमति और सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट नहीं करा सकती और इसलिए सुरक्षा और डिफेन्स से जुडी परियोजनाओं को इसमें से बाहर किया गया है।  हम कुछ बातें आपके सामने इस बाबत रखना चाहते हैं।

१. २०१३ के कानून में १३ केंद्रीय क़ानून, भूमि अधिग्रहण से जुड़े हुए, को अलग रखा गया था, लेकिन धरा १०५ में यह भी कहा गया था की, सरकार एक साल के अंदर इन कानूनों में जरूरी संशोधन करे ताकि इन्हे २०१३ के कानून के बराबर ला सके।  मुद्दा सिर्फ मुआवजा और पुनर्वास के प्रावधान लाने का नहीं था।  इसलिए NDA सरकार का दावा गलत है की वह कुछ नया नहीं कर रहे है, सहमति और SIA को लेकर।

२. २०१५ के बिल में धारा १० बी के तहत जो नए पांच श्रेणी को जोड़ा गया है, उनकी परिभाषा काफी विस्तृत है और सभी तरह के प्रोजेक्ट्स उसमे शामिल होंगे।  वित्त मंत्रालय के नोटिफिकेशन १३/६/२००९- INF २७ मार्च २०१२ में जो इंफ्रास्ट्रक्चर की परिभाषा दी गयी है वह बहुत ही बृहद है और इसमें शामिल है।  कारण बस अगर २०१५ बिल पास होता है तो किसानों से जबरन भूमि अधिग्रहण बढ़ेगा और पूरे देश में वापस सरकार के साथ टकराव बढ़ेगा।  यहाँ यह भी कहने की जरूरत है की NDA सरकार निजी कंपनियों को ही फायदा पहुंचाने का काम कर रही है और कुछ नहीं।  किसानों के पक्ष में एक भी प्रावधान हैं।

३. अरुण जेटली जी ने पाकिस्तान का हवाला देते हुए कहा की किसानों की सहमति पूछने से राष्ट्रहित को खतरा है, यह राष्ट्र हित  कैसा है, जो धरती माँ के बेटे को और जो पूरे देश को खिलाने के लिए अन्न पैदा करते हैं उनकी सहमति से राष्ट्रहित को खतरा पहुँचता है।  आज रक्षा के क्षेत्र में सरकार विदेशी  निवेश आमंत्रित कर रही है लेकिन किसानों को देश द्रोही बता रही है।

४. सरकार सिंचाई की परियोजनाओं का हवाला दे रही है, पर मालूम हो की गुजरात सरकार ने पिछले पंद्रह साल में आज तक ज़मीन मुहैया होते हुए भी २४% नहरें बनाएँ है, जिसके कारण से सरदार सरोवर बाँध के पानी का लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है।  और तो और पिछले दो सालों में ४ लाख हेक्टेयर खेती की ज़मीन को कमांड एरिया से बाहर कर औद्योगिक क्षेत्र घोषित कर दिया। भाजपा की सरकार अपने बचाव का रास्ता देख रही है और गरीबों को ढाल बना रही है।

५. यह भी एक भ्रान्ति MID से फैलाई जा रही है की, २०१३ के कानून से देश में विकास की  हुई है।  आज सभी सरकारों केंद्र और राज्य दोनों, के पास अकूत मात्रा में लैंड बैंक में ज़मीन पड़ी है।  मौजूदा जानकारी के आधार पर महाराष्ट्र में सिर्फ MIDC की १ लाख हेक्टेयर ज़मीन का आवंटन नहीं हुआ है, एक लाख आवंटित भूमि में भी आधे खाली पड़े हैं।  आंध्रा प्रदेश में ५० हज़ार एकर ज़मीन का आवंटन आज भी नहीं हुआ है, उत्तर प्रदेश में लगभग १७००० एकर, गुजरात में ५४ हज़ार एकर ज़मीन खाली पड़ी है।  इन सभी ज़मीनों का अधिग्रहण विकास के नाम पर औने पौने भाव में जबरदस्ती किया गया था।  २०१३ का कानून इस बात को रोकने के लिए था, खाली पड़ी हुई ज़मीन किसानों को वापस मिल सके और वो देश की खाद्य सुरक्षा निश्चित कर सके।  

Medha Patkar – Narmada Bachao Andolan and the National Alliance of People’s Movements (NAPM); Prafulla Samantara – Lok Shakti Abhiyan & Lingraj Azad – Samajwadi Jan Parishad – Niyamgiri Suraksha Samiti, NAPM, Odisha; Dr. Sunilam, Aradhna Bhargava – Kisan Sangharsh Samiti & Meera – Narmada Bachao Andolan, NAPM, MP; Suniti SR, Suhas Kolhekar, Prasad Bagwe – NAPM, Maharashtra; Gabriele Dietrich, Geetha Ramakrishnan – Unorganised Sector Workers Federation, NAPM, TN; C R Neelkandan – NAPM Kerala; P Chennaiah & Ramakrishnan Raju – NAPM Andhra Pradesh, Arundhati Dhuru, Richa Singh – NAPM, UP; Sister Celia – Domestic Workers Union & Rukmini V P, Garment Labour Union, NAPM, Karnataka; Vimal Bhai – Matu Jan sangathan & Jabar Singh, NAPM, Uttarakhand; Anand Mazgaonkar, Krishnakant – Paryavaran Suraksh Samiti, NAPM Gujarat; Kamayani Swami, Ashish Ranjan – Jan Jagran Shakti Sangathan & Mahendra Yadav – Kosi Navnirman Manch, NAPM Bihar; Faisal Khan, Khudai Khidmatgar, NAPM Haryana; Kailash Meena, NAPM Rajasthan; Amitava Mitra & Sujato Bhadra, NAPM West Bengal; B S Rawat – Jan Sangharsh Vahini & Rajendra Ravi, Madhuresh Kumar and Kanika Sharma – NAPM, Delhi

For details contact : Madhuresh Kumar 9818905316 | email : napmindia@gmail.com 

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