काम की जगह बीजेपी कर रही है टोटके

दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनने का सपना संजोए भाजपा अपने सदस्यता अभियान को लेकर नए सिरे से सक्रिय हो गई है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने निर्देश दिया है कि गत लोकसभा चुनावों में पार्टी के पक्ष में मतदान करने वाले 17.3 करोड़ मतदाताओं में से ज्यादातर लोगों से संपर्क साधा जाए। मिस्ड कॉल के जरिये सदस्यता अभियान चला रही भाजपा अपनी  साख बचाने के लिए जूझ रही है।

सदस्यता के लिए उपलब्ध कराए गए टोल फ्री नंबर पर करीब 6.5 करोड़ लोगों ने मिस कॉल तो दिए, मगर सदस्यता लेने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसे देखते हुए भाजपा ने 31 मार्च को खत्म हो रहे सदस्यता अभियान को एक महीने के लिए आगे बढ़ा दिया है। बीजेपी सदस्यता अभियान को मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में मिल रहे पब्लिक के ठंडे रिस्पांस ने दिग्गजों की चिंता बढ़ा दी है। सवा दो करोड़ के लक्ष्य को देखते हुए प्रदेश संगठन फिसड्डी साबित हो रहा है, नवंबर से अब तक 67 लाख सदस्यों का रजिस्ट्रेशन हो सका है। यूं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी सदस्य संख्या बढाकर इतिहास रचने की मुहिम में जुटी है, मगर मध्य प्रदेश में कई ब़डी गडबडियां सामने आ रही हैं। यहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की प्रदेश इकाई के सचिव बादल सरोज को भी भाजपा का सदस्य बना दिया गया है। खास बात यह कि उन्हें एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार सदस्य बनाया गया है।  

माकपा के बादल सरोज ने भाजपा के सदस्यता अभियान पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि भाजपा फर्जी सदस्य बनाए जा रही है। उनका कहना है कि भाजपा ने उन्हें भी अपना सदस्य बना लिया है। उन्होंने बताया कि उनके दो मोबाइल नंबर हैं, दोनों ही मोबाइल पर उनके पास संदेश आया है कि आपने भाजपा की सदस्यता ली है, इसके लिए आपको धन्यवाद। बीजेपी के अनुसार इस समय पार्टी के सदस्यों की संख्या नौ करोड़ के आसपास पहुंच गई है। जबकि सदस्यता के लिए आए मिस्ड कॉल की संख्या 15 करोड़ से ज्यादा है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक दिल्ली स्थित देश के एक नामी स्कूल रेयान इंटरनेशनल स्कूल में बीजेपी का सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है। टीचर और छात्रों को बीजेपी ज्वाइन करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। स्कूल की मैनेजिंग डायरेक्टर ग्रेस पिंटो ने इस बात की पुष्टि की कि स्कूल में सदस्यता अभियान चलाया गया लेकिन यह पूरी तरह स्वैच्छिक है। किसी पर ‌इसके लिए कोई दबाव नहीं है। यद्दपि स्कूल प्रशासन कह रहा है कि यह अभियान स्वैच्छिक है लेकिन शिक्षकों और बच्चों का कहना है कि ये सच नहीं है। कुछ शिक्षकों ने तो दावा किया है कि उनकी सैलरी भी रोक ली गई, जब तक वो बीजेपी में सदस्यता न ले लें। शिक्षकों, बच्चों और उनके अभिभावकों ने भी ये बात कही है कि उन्हें वॉट्सऐप मैसेज मिले हैं जिनमें बीजेपी की सदस्यता लेने के लिए एक टोल फ्री नंबर 18002662020 दिया गया है। इस नंबर पर कॉल करने पर उसके रिप्लाई में एक मैसेज आता है, जिसमें बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता का नंबर आता है।

इसका मतलब कि आप बीजेपी के सदस्य हो गए। बीजेपी का मानना है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है लेकिन कांग्रेस की गोवा इकाई ने भारतीय जनता पार्टी के सदस्यता अभियान के विश्व रिकार्ड बनाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि भाजपा राज्य में अपने चार लाख पंजीकृत सदस्य होने का दावा करती है, इसके बावजूद इसे जिला पंचायत चुनाव में इससे भी कम वोट मिले हैं। कांग्रेस सचिव दुर्गादास कामत ने सोमवार को जारी एक बयान में कहा कि भाजपा ने इस साल जनवरी में चार लाख लोगों के पार्टी से जुड़ने का दावा किया है, जबकि मार्च में हुए जिला पंचायत चुनाव में इसे जो वोट मिले हैं, वह इसकी तुलना में बहुत कम है। कामत ने कहा, “गोवा में जिला पंचायत चुनाव ने भाजपा के राष्ट्रव्यापी सदस्यता अभियान के दावों की पोल खोल दी है। भाजपा को सिर्फ 1,50,674 वोट ही मिले हैं, जबकि जनवरी में इसने अपने सदस्यों की संख्या चार लाख पहुंच जाने की बात कही थी। तो क्या इसका मतलब यह है कि भाजपा के दो लाख से अधिक सदस्यों ने अपनी ही पार्टी के लिए मतदान नहीं किया, जिसकी सदस्यता के लिए उन्होंने हस्ताक्षर किए।” हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने इसके सदस्यों की संख्या 8.8 करोड़ हो जाने और इसके विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन जाने का दावा किया था।

जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के 8.6 करोड़ सदस्यों को पार कर गई है। कामत ने कहा कि गोवा में इसके सदस्यता अभियान की धोखाधड़ी ने देशव्यापी स्तर पर बनाए जा रहे सदस्यों की संख्या को लेकर इसके झूठ का छोटा सा नमूना पेश किया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए गोवा के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर ने यह जरूर स्वीकारा की चुनाव में कम वोट मिले, लेकिन यह दावा भी किया कि राज्य में भाजपा के सदस्यों की संख्या चार लाख हो गई है। पारसेकर ने कहा, “जिला पंचायत चुनाव के अंतर्गत सभी नगरनिगम नहीं आते। इसका मतलब है कि सभी सदस्यों ने वोट नहीं किया।” वहीँ दूसरी और गुजरात बीजेपी का दावा है कि गुजरात में बीजेपी की सदस्यों की संख्या एक करोड़ हो गई है। पार्टी की गुजरात इकाई के अनुसार राज्य में उनकी सदस्यता मुहिम सफल हुई और गुजरात में सदस्यों की संख्या एक करोड़ हो गई। चुनाव में जनता से पार्टियाँ वादा करती है कि ग़रीबी ख़त्म होगी, भ्रष्टाचारियों को जेल में डाला जायेगा,मंहगाई ख़त्म होगी, सुशासन का राज होगा, बेघरों को घरों को घर मिलेगा, लेकिन गद्दी पर बैठते ही वह अमीरों की सेवा में लग जाती हैं। बीजेपी ने अपना रंग दिखा दिया है। चुनाव में फ़ायदा पहुँचाने वाले अडानी को उसने 390 एकड़ ज़मीन दे दी।

एसबीआई की एक विदेशी शाखा से एक प्रतिशत ब्याज पर छह हजार करोड़ का लोन दिला दिया गया। कच्चे तेल का दाम बढ़ाकर अंबानी को उसने करोड़ों करोड़ का लाभ पहुँचाया। कैग समिति की रिपोर्ट है कि गुजरात सरकार ने 15,000 हज़ार करोड़ का लाभ अडानी, रिलांयस और एस्सार ग्रुप को पहुँचाया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने चुनावी वादे से पीछे हट चुके हैं। उन्होंने 15-15 लाख काला धन नागरिकों को देने का वादा किया था, अब वे कह रहे हैं कि मुझे मालूम ही नहीं है कि विदेशी बैंकों में काला धन कितना है? मंहगाई बढ़ती जा रही है, भ्रष्टाचार और महिला सुरक्षा पर नीतियां हो विफल हो रही हैं। प्रभु जी के लम्बे चौड़े दावों  बावजूद रेलों के एक्सीडेंट हो रहे हैं, सांसद तक लुट रहे हैं। स्मार्ट सिटीज बयानों तक सीमित हो गयी हैं। बहुचर्चित स्वच्छता अभियान विद्या बालन के शौचालय विज्ञापन पर अटका हुआ है। कानून व्यवस्था में कोई सुधार न होकर अपराधों में बढ़ोत्तरी हो रही है। भ्रष्टाचार पर किसी क्षेत्र में काबू नहीं पाया जा सका है। मोदी जी चौड़ा सीना कर दावा कर रहे हैं कि उनके शासन में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है। श्रम क़ानून को पूँजीपतियों के हित में बदल दिया गया है। मोदी सरकार दावा कर रही है कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के तहत किसानों को चार गुना मुआवजा मिलेगा, लेकिन बीजेपी शासित राज्यों में हकीकत कुछ और ही है। हरियाणा, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में किसानों को बाजार भाव का सिर्फ दो गुना मुआवजा ही मिलेगा। किसानों पर मौसम की मार पड़ी है उसपर मोदी जी सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं। मन की बात कर अपने बिल को जायज ठहरा रहे हैं। कुल मिलाकर भाजपा पिछले दस महीनों में सिर्फ कुछ टोटके भर करती रही है। जमीन पर कोई ठोस काम वह नहीं कर सकी है। इसलिए जनता का ध्यान भावनात्मक मुद्दों पर डाइवर्ट करना भाजपा की मज़बूरी है। 

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ये है इंडिया मेरी जान : भाजपाइयों ने स्टेशन पर कराया बैंड बाजा डांस… सुनिए स्टेशन मास्टर का अदभुत बयान

नीचे दो वीडियो लिंक हैं. पहले में बलिया के सुरेमनपुर रेलवे प्लेटफार्म पर बैंड बाजा डांस है. दूसरे में इस डांस और भीड़ पर स्टेशन मास्टर सुरेमन पुर टीएन यादव का बयान है. बलिया के सुरेमनपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर स्टेशन मास्टर की मौजूदगी में हुआ डांस चर्चा का विषय बन गया है. हजारों लोगों ने बिना प्लेटफार्म टिकट लिये स्टेशन पर नाच का खूब मजा लिया. जनता ने खुश होकर नाचने वाली को पैसे भी खूब दिए.

स्टेशन मास्टर ने कहा कि प्लेटफार्म पर जो नाच हो रहा है वह गैर-कानूनी है लेकिन नाच बहुत अच्छा हो रहा है, उसे होने दीजिये. ये डांस उस वक्त कराया गया जब BSP नेता मुक्तेश्वर सिंह ने BSP को छोड़ कर BJP का दामन थाम लिया. इसके बाद वह पहली बार बलिया आ रहे थे तो ट्रेन लेट हो गयी. स्वागत में खड़े हजारो लोगों की भीड़ को रोकने के लिए भाजपा के आयोजकों ने प्लेटफार्म पर ही अश्लील डांस शुरू करा दिया.

वीडियो देखने के लिए इन लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=tvBy-YrVPJ0

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https://www.youtube.com/watch?v=4o7-ZkfWgCA

बलिया से संजीव कुमार की रिपोर्ट.

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भारत को अपना 21वीं सदी का सबसे बड़ा झुट्ठा और सबसे बड़ा झूठ मिल गया है!

Yashwant Singh :  भारत को अपना 21वीं सदी का सबसे बड़ा झुट्ठा मिल गया है. वह हैं माननीय नरेंद्र मोदी. जाहिर है, जब झुट्ठा मिल गया तो सबसे बड़ा झूठ भी खोज निकाला गया है. वह है- ‘अच्छे दिन आएंगे’ का नारा. नरेंद्र आम बजट में चंदा देने वाले खास लोगों को दी गयी 5% टैक्स की छूट… इसकी भरपाई वोट देने वाले आम लोगों से 2% सर्विस टैक्स बढा कर की जाएगी.. मोदी सरकार पर यूं ही नहीं लग रहा गरीब विरोधी और कारपोरेट परस्त होने के आरोप. खुद मोदी के कुकर्मों ने यह साबित किया है कि उनकी दशा-दिशा क्या है. इन तुलनात्मक आंकड़ों को कैसे झूठा करार दोगे भक्तों… अगर अब भी मोदी भक्ति से मोहभंग न हुआ तो समझ लो तुम्हारा एंटीना गड़बड़ है और तुम फिजूल के हिंदू मुस्लिम के चक्कर में मोदी भक्त बने हुए हो. तुम्हारी ये धर्मांधता जब तुम्हारे ही घर के चूल्हे एक दिन बुझा देगी शायद तब तुम्हें समझ में आए. कांग्रेस की मनमोहन सरकार से भी गई गुजरी मोदी सरकार के खिलाफ हल्ला बोलने का वक्त आ गया है… असल में संघ और भाजपा असल में हिंदुत्व की आड़ में धनिकों प्रभुओं एलीटों पूंजीपतियों कार्पोरेट्स कंपनियों मुनाफाखोरों की ही पार्टी है। धर्म से इनका इतना भर मतलब है कि जनता को अल्पसंख्यक बहुसंख्यक में बाँट कर इलेक्शन में बहुमत भर सीट्स हासिल कर सकें। दवा से लेकर मोबाइल इंटरनेट घर यात्रा तक महंगा कर देना कहाँ के अच्छे दिन हैं मोदी जी। कुछ तो अपने भासड़ों वादों का लिहाज करो मोदी जी। आप तो मनमोहन सोनिया राहुल से भी चिरकुट निकले मोदी जी।

Badal Saroj : Budget 2015… “ये जो तुम्हारे चेहरे पर लाली है सेठ जी, तुमने मेरे लहू से चुरा ली है सेठ जी।” जो पैसा कार्पोरेट्स और धन्ना सेठों के लिए छोड़ दिया गया उसका विवरण Via Sunand Sunand. (उपर दोनों ग्राफ बारीकी से देखें.) ध्यान रहे, यह इनके बाबा जी का माल नहीं था- जनता का पैसा था !! और यह खैरात जनता – बेहद बदहाल जनता – को मिलने वाली कल्याणकारी योजनाओं में कटौती करके बांटी गयी है।

Dinesh Choudhary जय हो! साहेब ने चुनावी चंदे की एक और किस्त चुका दी है। (Corporate taxes are taxes against profits earned by businesses during a given taxable period; reduced from 30 % to 25%)I और मध्यमवर्गीय भक्तगण चुप- चुप से क्यों हैं? पहले सरकारें जनपक्षीय होने का दिखावा करती थीं और इसीलिए थोड़ी रियायत भी। ये पहली बेशर्म सरकार है जो सरमायेदारों के गलबहियां लगकर कीमत अदा कर रही है। इस बजट में हालांकि साहित्य अकादमी और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, क्योंकि उनके बजट में क्रमश: 54 और 44 फीसदी की कटौती की गई है। साहित्या अकादमी का आवंटन 21.23 फीसदी से घटाकर 9.76 फीसदी कर दिया गया है और एनएसडी का आवंटन 43.03 फीसदी से घटाकर 13.45 फीसदी कर दिया गया है। कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय सहायता योजना के लिए आवंटित धन में बहुत बड़ी कटौती की गई है। पहले इसका बजट 59.33 फीसदी था जो कि घटाकर 3.20 फीसदी कर दिया गया है।

Sheetal P Singh : दरअसल पहले दूसरे और तीसरे साल में सभी “लोकप्रिय सरकारें” अपने असल रंग में होती हैं। बाद के दो सालों में वे चुनाव की तैयारी में ग़रीब नवाज़ हो जाती हैं। यूपीए २ को याद करें। मोदी कुछ अलग नहीं कर रहे भक्तों ऽऽऽऽ। तेल के दाम बढ़ने से ख़फ़ा ख़फ़ा क्यूँ हो? अपनों के लिये जो भी कर गुज़रना है उसका वक़्त अभी ही है। टीवी चैनलों की डिबेट में गला फाड़ने के लिये जन धन स्वच्छ भारत दो लाख का बीमा आदि आदि आदि कितना तो किया है जेटली साब ने। लोग कुछ जादा नाशुक्रे हो चले हैं ……। मंहगाई न देखो उसके बढ़ने की दर देखो, कित्ती कम है ना ? देखो मुसलमानों की आबादी बढ़ी जा रही है, हिन्दू इसाई हुए जा रहे हैं , चीन चुमार में घुसने से रोक दिया गया है , पाक सीमा पर ५६” का सीना अड़ा दिया है । रामलला भी बुला रहे हैं । चार बच्चे ….नहीं छ: तो करो ही , मंहगाई की तुसी फ़िक्र ना करो । देखो देखो सामने आकाश में देखो … बिकासइ बिकास , टी वी में बिकास,अख़बार में बिकास बस सोशल मीडिया में ऐन्टी सोशलन के मारे कुछ गड्ड मड्ड चल रयो है । दो तीन साल तो यों बीतेंगे कि बस फुर्र…..

Mukesh Kumar : कार्पोरेट और अमीरों के लिए अच्छे दिन का बजट- सुपर बजट सुपर रिच के लिए। 10 में से 10 नंबर। कार्पोरेट को तमाम तरह की रियायतें। कार्पोरेट टैक्स में फिर से कमी। 10 में से 10 नंबर। इंडस्ट्री को तरह-तरह की राहते, रियायतें और नियामतें। 10 में से 9 नंबर। अपर मिडिल क्लास को भी कुछ हल्के-फुल्के तोहफे। 10 में से 5 नंबर। कृषि क्षेत्र के लिए कुछ नहीं। आम आदमी की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए कुछ नहीं। 10 में से 3 नंबर। बजट के साथ आए अच्छे दिन… पेट्रोल और डीज़ल दोनों की क़ीमतें एक झटके में लगभग तीन रुपए बीस पैसे बढ़ा दी गई है। फरवरी महीने में ही ये दूसरी बढोतरी है। ध्यान रहे अभी भी यूपीए सरकार के ज़माने के मुक़ाबले अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की क़ीमतें आधे से भी कम हैं, तब ये आलम है। ये भी मत भूलिएगा कि दो दिन पहले रेलमंत्री ने मालभाड़े में दस फ़ीसदी की बढोतरी की थी। स्वागत कीजिए अच्छे दिनों में बढ़ती महँगाई के तोहफे का।

Punj Prakash : कला, कलाकार और संस्कृति विरोधी है यह बजट… यह बात केवल इसलिए नहीं कही जा रही है कि इस बजट में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बजट में 44% और साहित्य अकादमी के बजट में 54% की कटौती की गई है बल्कि यह बात इसलिए कह रहा हूँ कि“अच्छे दिन” का वादा करके सत्ता में आई वर्तमान सरकार ने कला और संस्कृति को बढ़ावा देनेवाली बजट में क्रूरता पूर्ण कटौती करते हुए 59.33 करोड़ से घटाकर 3.20 करोड़ कर दिया है । मैं इस बात से भी भली-भांति परिचित हूँ कि कला और संस्कृति के नाम पर दिए जा रहे आर्थिक सहयोगों में घनघोर अराजकता है । यह अराजकता कलाकारों के नैतिक पतन की निशानी तो है लेकिन इससे ज़्यादा सरकारी महकमे की नाकामी भी है । जिसका उपाय उस अराजकता को ज़िम्मेदारी पुर्वक खत्म करके भी किया जा सकता था । समाज या सरकार का कोई अंग यदि बीमार हो जाता है तो उसका इलाज किया जाना चाहिए न कि उसकी निर्मम हत्या । इतिहास गवाह है कि बिना किसी आश्रय (जनता, सरकार व कारपोरेट आदि) के कला और कलाकार ज़्यादा समय तक ज़िंदा नहीं रह सकते । जो सरकार कला और संस्कृति के प्रति इतना निर्मम हो वह समाज के प्रति संवेदनशील होगी, इस बात पर मुझे संदेह है । सनद रहे, इस विषय पर कला संस्थानों और कलाकारों की यह शर्मनाक चुप्पी एक दिन कला और कलाकार दोनों के पतन का कारण बनेगीं । याद रखिए वो यह सब सोच समझकर, एक मुहीम के तहत कर रहें हैं, मासूमियत और अनजाने में नहीं।

Vikram Singh Chauhan : मैं सबसे ज्यादा लाचार, हताश और निराश इन दिनों मोदीभक्तों को देखता हूँ। ये चुपचाप कहीं दुबक गए है और कइयों ने अपनी आईडी डिलीट कर दिया है। ये साल भर पहले अपने नाम के आगे -पीछे नमो लिखते थे और हम लोगों को धमकाते थे। आज उनकी खुद की भी पहचान नहीं है। मोदी भी इन्हें व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानते सो अडानी की तरह इनको कोई लाभ मिलने से रहा। मैं इन लोगों से लंबे समय तक लड़ा। कई लोग मुझे खुलेआम मारने की धमकी देते थे ,कुछ जाननेवाले लोग तो मोदी आलोचना से ऐसे गुस्से में थे मुझे ट्रैन से फेंक देंगे तक बोलते थे। नाईट में ऑफलाइन होने के बाद ये लोग कमेंट में माँ -बहन की गाली लिख देते थे। कभी -कभी रात 3 -4 बजे उठ मैं इस कमेंट को डिलीट करता था। पर मैं अपने रास्ते पर अडिग रहा और सच लिखता रहा। आख़िरकार आज इनको मोदी की असलियत पता चला। है तो ये लोग भी हमारी तरह आम इंसान। लेकिन विचारधारा दूसरा और ज़हरीला। आज ये लोग हमसे नज़र नहीं मिला पाते। चुपचाप अब मुझे फॉलो कर रहे है और सभी पोस्ट को लाइक। पर कुछ कह नहीं पा रहे है। मैं आज भी इन्हें माफ़ करने को तैयार हूँ।

Dayanand Pandey : जनता के अच्छे दिन तो नहीं ही आए, न आने के आसार हैं पर हां, नरेंद्र मोदी की बदनसीबी के दिन शुरू हो गए हैं। और तय मानिए मंहगाई जो ऐसे ही अबाध रूप से बढ़ती रही तो मनमोहन सिंह से भी ज्यादा दुर्गति नरेंद्र मोदी की होगी! होनी ही है! यह सर्विस टैक्स, यह टोल टैक्स, वैट आदि का नाम बदल कर सरकार को डाका टैक्स या जबराना टैक्स रख देना चाहिए!
   
Sandeep Verma : बजट में जूते इसलिए सस्ते किये गए है कि वित्त मंत्री चाहते है कि हर वोटर जरनैल सिंह बन सके. देश के हर गरीब -अमीर पर सर्विस टैक्स का डेढ़ प्रतिशत अधिक कर देने का भार सिर्फ इसलिए बढ़ाया गया है ताकि मोदी जी की सरकार कारपोरेट को टैक्स में पांच प्रतिशत की छूट दे सकें. वैसे मोदी जी की सरकार ने थोड़ी बेईमानी भी की है. डेढ़ प्रतिशत की इस बढ़ोत्तरी से वे कारपोरेट का पूरा ही कर माफ़ कर सकते थे. मगर उन्होंने नहीं किया. इसलिए मोदी की सरकार को पूरी तरह कारपोरेट के हाथों में खेलने वाला नहीं कहा जा सकता है.

Daya Sagar : रेल बजट के बाद आज आम बजट भी आ गया। अनुकूल जलवायु, अनुकूल अंतरराष्ट्रीय बाजार, मजबूत जनादेश से आए राजनीतिक स्‍थायित्व के बावजूद इतनी निराशा। तेजस्वी प्रधानमंत्री के भाषणों की चमक इस बजट में कहीं नहीं दिख रही। कारपोरेट जगत खुशी के पटाखे फोड़ रहा है। यकीन मानिए गरीब और मध्यम वर्ग के लिए अच्छे दिन अभी बहुत दूर हैं।

Cartoonist Irfan : देश के सबसे खास दिन जब आम आदमी का अगले साल का जीना कैसा होगा, तय होता है. उस समय इस बार बार के बजट पर गंभीर चर्चा चल रही थी सभी न्यूज़ चैनलों पर. कि एंकर ने सभी विशेषज्ञों को रोक दिया कि बेर्किंग न्यूज़ आ रही है ‘भारत ने अभी-अभी शानदार जीत दर्ज की है यूएई पर. और सारा कार्यक्रम क्रिकर्ट पर शुरू हो गया। यह हर न्यूज़ चैनल का हाल था। जब देश इतनी गंभीर चर्चा हो रही हो तब क्या नीचे फलेश देकर ही इस ‘विशाल’ जीत का जश्न नहीं मनाया जा सकता थ. और वैसे भी रोज़ आप खेल पर अलग से कार्यक्रम करते ही हैं. क्या समझें कि देश के लिए दो वक्त की रोटी से बड़ा क्रिकेट है?

Suraj Sahu : लो जी सर्विस टैक्स 12.50% से बढ़ाकर 14%हुआ ।। लो जी आ गए अच्छे दिन ।। अब खाओ खाना होटल में । वाह आम बजट में आम आदमी को टैक्स में कोई छूट नही और कॉर्पोरेट कंपनियों को टैक्स में छूट… अबकी बार कॉर्पोरेट कंपनियों की सरकार

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आगे की कथा यहां पढ़ें…

बीजेपी के चंदे का काला धंधा देखिए… ऐसे में मोदी जी क्यों नहीं पूंजीपतियों के हित में काम करेंगे….

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बीजेपी के चंदे का काला धंधा देखिए… ऐसे में मोदी जी क्यों नहीं पूंजीपतियों के हित में काम करेंगे….

दिल्‍ली विधानसभा चुनावों से पहले आम आदमी पार्टी को चंदे के मुद्दे पर घेरने वाली बीजेपी के चंदे का खेल देखकर आप हैरान रह जाएंगे। खबरों के अनुसार भाजपा के खजाने में 92 फीसदी चंदा 2014 में लोकसभा चुनावों के ठीक पहले आया। बीजेपी को 20 हजार रुपए से अधिक 92 फीसदी चंदा बड़े कॉर्पोरेट घरानों ने दिया। उन घरानों में भारती समूह की सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट, स्टरलाइट इंडस्ट्रीज और केयर्न इंडिया ने 2014 में ही भाजपा को चंदा दिया। संयोग से 2014 से पहले इन घरानों ने भाजपा को चंदा दिया भी नहीं था। ये जानकारियां भाजपा द्वारा चुनाव आयोग में को दिए गए वर्ष 2013-14 के चंदो के आंकड़ों में सामने आई है। एसोशिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (ADR) ने आंकड़ों के विश्लेषण के बाद बताया है कि लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा को 157.84 करोड़ रुपए चंदा बड़े कॉर्पोरेट घराने ने ही दिया।

एडीआर के मुताबिक, 20 हजार रुपए से अधिक देने वालों में महज 8 फीसदी चंदा किसी व्यक्ति के नाम से आया। लगभग 772 व्यक्तियों ने भाजपा को 12.99 करोड़ रुपए चंदा दिया। उल्लेखनीय है कि 20 हजार रुपए या उससे अधिक चंदा देने पर ही व्यक्ति या संस्‍थान को पैन नंबर देना पड़ता है और चंदा देने वाले की पहचान ज‌ाहिर हो पाती है। मोबाइल कंपनी एयरटेल के मालिक भारती समूह के सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट ने भाजपा को सबसे अधिक 41.37 करोड़ चंदा दिया। उसके बाद स्टरलाइट इंडस्ट्रीज ने 15 करोड़ और केयर्न इंडिया 7.50 करोड़ की रकम दो चंदों के रूप में दी।

रोचक बात यह है कि सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट ने 2013-14 में कांग्रेस को 36.50 करोड़ रुपए चंदा दिया। कांग्रेस को सबसे ज्यादा चंदा देने वालों में ये ट्रस्ट भी था। भारती समूह का यही ट्रस्‍ट शरद पवार की पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को चंदा देने में भी आगे रहा। उसने एनसीपी को चार करोड़ का चंदा दिया, जो उस पार्टी का सबसे बड़ा चंदा दिया। 2013-14 में भाजपा, कांग्रेस, एनसीपी और सीपीआई के चंदों में 2012-13 की तुलना में 158 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। 2012-13 में भाजपा का चंदा 83.19 करोड़ रुपए था, अगले ही वर्ष यह 105 फीसदी की वृद्घि की साथ 170.86 करोड़ रुपए हो गया।

भाजपा ने 2013-14 में जो चंदा जुटाया, वह उसी साल में कांग्रेस, एनसीपी, सीपीआई और सीपीएम द्वारा ज़ुटाए गए कुल चंदे के दोगुने से भी ज्यादा था। सभी पार्टियों ने 20 हजार के चंदे से अधिक की जो रकम घोषित की उसका कुल योग 247.79 करोड़ रुपए है। कुल 2361 व्यक्तियों या संस्थानों के चंदों की घोषणा की गई है। बसपा का कहना है कि उसे 20 हजार से अधिक का एक भी चंदा नहीं मिला, इसलिए उसने अपने चंदे की घोषणा भी नहीं की। लोकसभा चुनावों में भाजपा को जो चंदा मिला, वह राष्‍ट्रीय पार्टियों को मिले कुल चंदे का 69 फीसदी था। भाजपा को औसतन हर एक चंदेदार से 13.19 लाख रुपए मिले, जबकि कांग्रेस के लिए यही आंकड़ा 11.‍70 लाख रुपए का है और एनसीपी एक करोड़ रुपए है। सीपीआई को औसतन हर चंदेदार से 3.23 लाख रुपए मिला, सीपीएम के लिए यह रकम 4.‍03 लाख रुपए थी दिल्‍ली वालों ने लोकसभा चुनावों में सर्वाधिक चंदा दिया। दिल्‍ली के 119 चंदेदारों ने भाजपा को 45.21 करोड़ रुपए दिए। कांग्रेस को भी दिल्‍ली से 39.05 करोड़ का चंदा मिला, जबकि सीपीआई को दिल्‍ली से 54.6 लाख और सीपीएम 1.88 करोड़ रुपए का चंदा मिला। सभी आंकड़े वित्त वर्ष 2013-14 के हैं। (साभार- न्यूज24आनलाइन)

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BJP Continues to Mislead Farmers and their Supporters in Various Parties

: The Real Battle is between Farmers and Land Grabbing Corporates and BJP, not between Bharat and Pakistan! :  BJP is Hiding Behind the Poor in its Defence :  The Ordinance now Bill is Bringing Back the Colonial Legacy: Unacceptable : Delhi : Forcible land acquisition has always been an issue of life and death for millions of people in India, not only farmers but also agricultural laborers and fish workers. With the Land Ordinance it has become a political hot-potato. More than 350 people’s organizations gathered at the Parliament Street on February 24th, with 25,000 people from Gujarat to Orissa to Assam, and from Himachal Pradesh to Tamil Nadu and Kerala. It has forced the political parties to take a stand on the issue and leading to heated debate and discussion on the floor of the Parliament. It is certainly a result of the anti-farmer and anti-poor move of undemocratically amending the 2013 Act on Land Acquisition and Rehabilitation to the extent of killing its very spirit and purpose.

The ordinance brought in by the NDA government just after the Winter session of the Parliament came to an end was an obvious imposition on the country’s common people of the same colonial legacy of the perverted vision of development through an unjust and undemocratic modus operandi. Ordinance is an attempt at opening of the land that is life support, source of livelihood and shelter for India’s toiling masses, to the wealthy investors, including big corporations and builders. It is to forcibly divert India’s agricultural land at the cost of food security giving a free hand with no ceiling to the private companies as well as private entities i.e. the private trusts and expensive profit making educational and health institutions. The intention is to benefit private interests in the name of public interest.

The 2013 Act which replaced the British Act on Land Acquisition, for the first time brought in the process of assessing Social Impact (SIA) along with environmental (EIA) in consultation with the affected people and the Gram Sabhas as well as appropriate urban units. As a precondition for the proper planning of rehabilitation including identifying, and listing of the affected population, the impact on their livelihood, culture, and an appropriate plan to compensate, this was a must if justice is to be done to those who are made to sacrifice in the name of development. Assessing options and seeking suggestions for alternatives to minimize impact and displacement would go a long way. The consent of land losers was also an important clause at least for private and PPP projects (The 2013 Act too left out government projects, unjustifiably) to respect and give our farmers due role, space and primacy in development planning as against ‘no level playing field’ situation between the monetary capitalists (the corporates) and the natural resource investors (farmers and others).

BJP’s Half Truths and Propaganda

The BJP leaders are now making false interpretations and unjustifiable arguments to accusing the people’s movements and pro people politicians and parties as indicated from the press conference held by Nitin Gadkari and statement by Arun Jaitley, the finance minister before the parliament, both of them the architects of the Ordinance and now the Bill. Without entering into dialogue with the agitating farmers’ organizations except members of their own ‘Parivar’, they are deliberately confusing the issues and presenting the struggle as a war between Bharat and Pakistan, drawing a false threat to India’s security.

“If the SIA process is carried out and consent is sought, taking some time for the same, Pakistan will come to know about the project and can sabotage it,” said Mr. Jaitley. This is a statement, an indicator of the frustration and fury among the ruling party led by the Prime Minister that wishes to save the Bill by misbriefing the people. How can seeking consent for a project developed by a private corporation, since government is allowing PPP and FDI in Defence as well, be threat to the national security but the private corporations involvement is not. Does that make any sense ?

The people’s movements, instrumental in getting the former UPA government to abolish the British Act of 1894 and to bring in the 2013 Act condemn this fake, communal appeal to disrespect the farmers and deny them the right to be partners in development. SIA and consent will not stop the projects but rather resolve the conflicts due to imposition of projects without rehabilitation.

The private and PPP projects have been grabbing land through forcible acquisition standing on the shoulders of the State. The SEZ of Ambani was to get 35000 hectares in Maharashtra, and DMIC is targeting 3,90,000 hectares. While the thousands of hectares of Sardar Sarovar command area land in Gujarat is diverted to companies, along with waters, Industrial Corridors to mining, tourism, water and power projects profiting companies are now proposed to be granted land that can be forcibly acquired from farmers. The 1894 British Act too was not permitted to be used for this, and no other country in the world has any such legal and legitimate way to forcibly transfer the farmers’, fishworkers’, and common peoples’ resources.

Mr. Gadkari is claiming the credit for including 13 acts under the purview of the 2013 Act but this is done after killing the spirit and main provisions in the Act. Mr. Gadkari and BJP spokespersons have also resorted to a farcical justification for the ordinance, referring to 31.12.2014 as the deadline, for including the acts. The fact is that Section 105 allowed 1 year to bring in these 13 acts so as to allow amendments in those and make land acquisition procedures and provisions therein, consistent with the new Act. Section 105 also elaborates the procedure of placing any amendment, notification before the parliament for 30 days, seeking approval. Instead of doing the same, the BJP government waited till the last day to include the Acts, only after excluding the main pro-people provisions.

The farmers in dam areas like Tata’s, Gosikhurd, Waang Marathwadi, Narmada or in industrial areas in Nandigram, POSCO or hill city project like Lavasa have experienced that the wasteland and previously acquired but unused land is ignored and more land, even irrigated, multiple crop land is forcibly acquired for non agricultural purposes. There is not less than 100,000 hectares of MIDC land, acquired for industries but left unutilized. The land acquired for Varasgaon Dam, 141 hectares were leased out for bungalows once Lavasa City came up, engulfing the dam itself!

The 2013 Act for the first time, brought in a restraint by suggesting a certain percentage to be decided by the state as a limit for acquiring multiple crop land in a district and a state. The movements believed no agricultural land should be acquired as today’s single crop land becomes multiple crop land tomorrow. But BJP doesn’t wish to put any limit to grabbing and destroying even prime agricultural land by changing the 2013 provision for the same.

The Penalty Clause (Section 87) in the 2013 Act is also changed to meet the heads of the departments sanctioning authorities as against holding them responsible for the violations by erring officials! The common persons cannot file a case (FIR) against the violators without a sanction, as per the Bill, 2015.

All this proves that the strong opposition to the Ordinance and the Bill 2015 by many an opposition parties and some of the NDA partners like Shiv Sena and LJD, is fully justifiable. We appreciate their taking a position in favor of the farming community in the country at this crucial juncture. Consideration including food security and no rehabilitation is possible without guaranteeing alternative livelihood (missing in the 2013 Act itself) has now led all those who support our food growers and toiling masses including small traders, artisans, to challenge the anti-people move, the Bill, 2013 which will lead to more suicides and make millions landless laborers.

We instead demand further pro-people amendments as recommended by the two Parliamentary Standing Committees in the 2013 Act to save farmers’ lives and livelihoods of millions.

श्री अरुण जेटली ने कल राज्य सभा ने भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, २०१५ के बचाव में जो अपना वक्तव्य दिया है वह सिर्फ गरीबों के पीछे छुपने वाली बात है।  मंत्री महोदय ने बार बार यही कहा की उन्होंने प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, सिंचाई और गरीबों के लिए घर बंनाने के लिए संशोधन प्रस्तुत किये। उन्होंने यह भी कहा की देश की सुरक्षा के लिए सरकार किसानो की सहमति और सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट नहीं करा सकती और इसलिए सुरक्षा और डिफेन्स से जुडी परियोजनाओं को इसमें से बाहर किया गया है।  हम कुछ बातें आपके सामने इस बाबत रखना चाहते हैं।

१. २०१३ के कानून में १३ केंद्रीय क़ानून, भूमि अधिग्रहण से जुड़े हुए, को अलग रखा गया था, लेकिन धरा १०५ में यह भी कहा गया था की, सरकार एक साल के अंदर इन कानूनों में जरूरी संशोधन करे ताकि इन्हे २०१३ के कानून के बराबर ला सके।  मुद्दा सिर्फ मुआवजा और पुनर्वास के प्रावधान लाने का नहीं था।  इसलिए NDA सरकार का दावा गलत है की वह कुछ नया नहीं कर रहे है, सहमति और SIA को लेकर।

२. २०१५ के बिल में धारा १० बी के तहत जो नए पांच श्रेणी को जोड़ा गया है, उनकी परिभाषा काफी विस्तृत है और सभी तरह के प्रोजेक्ट्स उसमे शामिल होंगे।  वित्त मंत्रालय के नोटिफिकेशन १३/६/२००९- INF २७ मार्च २०१२ में जो इंफ्रास्ट्रक्चर की परिभाषा दी गयी है वह बहुत ही बृहद है और इसमें शामिल है।  कारण बस अगर २०१५ बिल पास होता है तो किसानों से जबरन भूमि अधिग्रहण बढ़ेगा और पूरे देश में वापस सरकार के साथ टकराव बढ़ेगा।  यहाँ यह भी कहने की जरूरत है की NDA सरकार निजी कंपनियों को ही फायदा पहुंचाने का काम कर रही है और कुछ नहीं।  किसानों के पक्ष में एक भी प्रावधान हैं।

३. अरुण जेटली जी ने पाकिस्तान का हवाला देते हुए कहा की किसानों की सहमति पूछने से राष्ट्रहित को खतरा है, यह राष्ट्र हित  कैसा है, जो धरती माँ के बेटे को और जो पूरे देश को खिलाने के लिए अन्न पैदा करते हैं उनकी सहमति से राष्ट्रहित को खतरा पहुँचता है।  आज रक्षा के क्षेत्र में सरकार विदेशी  निवेश आमंत्रित कर रही है लेकिन किसानों को देश द्रोही बता रही है।

४. सरकार सिंचाई की परियोजनाओं का हवाला दे रही है, पर मालूम हो की गुजरात सरकार ने पिछले पंद्रह साल में आज तक ज़मीन मुहैया होते हुए भी २४% नहरें बनाएँ है, जिसके कारण से सरदार सरोवर बाँध के पानी का लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है।  और तो और पिछले दो सालों में ४ लाख हेक्टेयर खेती की ज़मीन को कमांड एरिया से बाहर कर औद्योगिक क्षेत्र घोषित कर दिया। भाजपा की सरकार अपने बचाव का रास्ता देख रही है और गरीबों को ढाल बना रही है।

५. यह भी एक भ्रान्ति MID से फैलाई जा रही है की, २०१३ के कानून से देश में विकास की  हुई है।  आज सभी सरकारों केंद्र और राज्य दोनों, के पास अकूत मात्रा में लैंड बैंक में ज़मीन पड़ी है।  मौजूदा जानकारी के आधार पर महाराष्ट्र में सिर्फ MIDC की १ लाख हेक्टेयर ज़मीन का आवंटन नहीं हुआ है, एक लाख आवंटित भूमि में भी आधे खाली पड़े हैं।  आंध्रा प्रदेश में ५० हज़ार एकर ज़मीन का आवंटन आज भी नहीं हुआ है, उत्तर प्रदेश में लगभग १७००० एकर, गुजरात में ५४ हज़ार एकर ज़मीन खाली पड़ी है।  इन सभी ज़मीनों का अधिग्रहण विकास के नाम पर औने पौने भाव में जबरदस्ती किया गया था।  २०१३ का कानून इस बात को रोकने के लिए था, खाली पड़ी हुई ज़मीन किसानों को वापस मिल सके और वो देश की खाद्य सुरक्षा निश्चित कर सके।  

Medha Patkar – Narmada Bachao Andolan and the National Alliance of People’s Movements (NAPM); Prafulla Samantara – Lok Shakti Abhiyan & Lingraj Azad – Samajwadi Jan Parishad – Niyamgiri Suraksha Samiti, NAPM, Odisha; Dr. Sunilam, Aradhna Bhargava – Kisan Sangharsh Samiti & Meera – Narmada Bachao Andolan, NAPM, MP; Suniti SR, Suhas Kolhekar, Prasad Bagwe – NAPM, Maharashtra; Gabriele Dietrich, Geetha Ramakrishnan – Unorganised Sector Workers Federation, NAPM, TN; C R Neelkandan – NAPM Kerala; P Chennaiah & Ramakrishnan Raju – NAPM Andhra Pradesh, Arundhati Dhuru, Richa Singh – NAPM, UP; Sister Celia – Domestic Workers Union & Rukmini V P, Garment Labour Union, NAPM, Karnataka; Vimal Bhai – Matu Jan sangathan & Jabar Singh, NAPM, Uttarakhand; Anand Mazgaonkar, Krishnakant – Paryavaran Suraksh Samiti, NAPM Gujarat; Kamayani Swami, Ashish Ranjan – Jan Jagran Shakti Sangathan & Mahendra Yadav – Kosi Navnirman Manch, NAPM Bihar; Faisal Khan, Khudai Khidmatgar, NAPM Haryana; Kailash Meena, NAPM Rajasthan; Amitava Mitra & Sujato Bhadra, NAPM West Bengal; B S Rawat – Jan Sangharsh Vahini & Rajendra Ravi, Madhuresh Kumar and Kanika Sharma – NAPM, Delhi

For details contact : Madhuresh Kumar 9818905316 | email : napmindia@gmail.com 

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इस भीषण जीत में कार्पोरेट और करप्ट मीडिया (जी न्यूज, इंडिया टीवी, आईबीएन7 आदि…) भी आइना देखे…

Yashwant Singh : दिल्ली में भाजपा सिर्फ तीन-चार सीट पर सिमट जाएगी और आम आदमी पार्टी 64-65 सीट तक पहुंच जाएगी, इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी. ये भारतीय चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी जीत है और भाजपा की सबसे बड़ी हार. कांग्रेस का तो खाता तक नहीं खुला. पर आप याद करिए. टीवी न्यूज चैनल्स किस तरीके से आम आदमी पार्टी के खिलाफ कंपेन चला रहे थे. कुछ एक दो चैनल्स को छोड़ दें तो सारे के सारे बीजेपी फंडेड और बीजेपी प्रवक्ता की तरह व्यवहार कर रहे थे. आम आदमी पार्टी को किस तरह घेर लिया जाए, बदनाम कर दिया जाए, हारता हुआ दिखा दिया जाए, ये उनकी रणनीति थी. उधर, भाजपा का महिमामंडन लगातार जारी था. बीजेपी की सामान्य बैठकों को ब्रेकिंग न्यूज बनाकर बताकर दिखाया जाता था. सुपारी जर्नलिज्म का जिस किदर विस्तार इन चुनावों में हुआ, वह आतंकित करने वाला है. हां, कुछ ऐसे पत्रकार और चैनल जरूर रहे जिन्होंने निष्पक्षता बरती. एनडीटीवी इंडिया, एबीपी न्यूज, आजतक, न्यूज नेशन, इंडिया न्यूज ने काफी हद तक ठीक प्रदर्शन किया. सबसे बेहूदे चैनल रहे इंडिया टीवी, आईबीएन7 और जी न्यूज.

(सबसे सही एक्जिट पोल इंडिया न्यूज का रहा लेकिन यह भी दस सीट पीछे रहा. इंडिया न्यूज ने सबसे ज्यादा 53 सीट दी थी ‘आप’ को लेकिन आप तो इस अनुमान से दस सीट से भी ज्यादा आगे निकल गई. कह सकते हैं कि न्यूज चैनलों में जनता का मूड भांपने में सबसे तेज ‘इंडिया न्यूज’ रहा.)

कोई बता रहा था कि जिस दिन मतदान हुआ, उस शाम रजत शर्मा को एंकरिंग करना था लेकिन चुनाव नतीजों के अनुमान का जो सिलसिला शुरू हुआ और सबमें ‘आप’ को भारी बढ़त मिलते दिखाया गया तो वो एंकरिंग करने ही नहीं आए. अजीत अंजुम को बिठाया दिया. पहले प्रोमो दिखाया गया कि रजत शर्मा एक्जिट पोल के बारे में बताएंगे लेकिन ऐन वक्त पर अजीत अंजुम को बिठाया गया. आम आदमी् पार्टी और अरविंद केजरीवाल को पानी पी-पी कर कोसने वाले रजत शर्मा को शायद यह तनिक भरोसा नहीं हो पा रहा था कि आखिर चुनाव नतीजों के अनुमान में उनके चैनल पर आम आदमी पार्टी को भारी बहुमत कैसे दिखाया जा सकता है. पर यह सच था और इस सच को देर में रजत शर्मा को कबूल करना पड़ा. अब वे फिर से बुझे मन से एंकरिंग करने आ पड़े हैं.

उन दो इंटरव्यू का, जिनने दिल्ली की चुनावी फिजा को बदला दिया, उल्लेख करना यहां जरूरी है. एनडीटीवी के लिए रवीश कुमार ने भाजपा सीएम पद प्रत्याशी किरण बेदी को एक इंटरव्यू किया. इस इंटरव्यू के बाद किरण बेदी एक्सपोज हो गईं और भाजपा के चुनावी अभियान का ग्राफ नीचे की ओर गिरना शुरू हो गया. बाकी कसर अमित शाह ने एबीपी न्यूज के अजय कुमार से बातचीत में यह कहकर पूरी कर दी कि काला धन लाकर हर व्यक्ति के एकाउंट में 15-15 लाख रुपये देने की बात महज चुनावी जुमला था. इस जुमले वाली बात से भारतीय जनता पार्टी का नाम लोगों ने भारतीय जुमला पार्टी रख दिया. एक बेहद घटिया और गंदा इंटरव्यू का यहां जिक्र जरूरी है. जो सुधीर चौधरी अगर मोदी को देख लेते हैं तो सेल्फी खिंचाने लगते हैं लेकिन केजरीवाल को देख लेते हैं तो केजरीवाल के स्वेटर के हुए छेद में उंगली डालकर कहते हैं कि आप पाखंड करते हैं, बिजनेस क्लास से चलते हैं और खुद को आम आदमी दिखाने के लिए फटा स्वेटर पहनते हैं. अरविंद केजरीवाल की विनम्रता देखिए कि वह अपमानित करने वाला इंटरव्यू छोड़कर जाने या गुस्सा करने की जगह उसे झेलते रहे.

आईबीएन7 इस देश का सबसे भ्रष्टतम और गंदा न्यूज चैनल बन चुका है. घोषित तौर पर अंबानी का न्यूज चैनल होने के कारण एक तो यहां जो लोग काम कर रहे हैं वे अपनी मानसिकता में करप्ट हो चुके हैं क्योंकि उन्हें पता है कि हमें अंबानी, अंबानी के धंधों, अंबानी के अर्थशास्त्र और अंबानी की राजनीति के खिलाफ कुछ नहीं बोलना लिखना दिखाना है. यहां तक तो ठीक था. इनकी करप्ट मानसिकता यह तक कनसीव कर चुकी है कि चूंकि चैनल अंबानी जी का है इसलिए हमें हर उस पार्टी, नेता का विरोध करना है जो अंबानी के खिलाफ बोलता लिखता है. इसका नतीजा रहा कि आईबीएन7 से ‘आप’ और केजरीवाल ब्लैकआउट रहे. फर्जी सर्वे के जरिए दिखाया गया कि चुनाव में भाजपा को 35 सीटें मिलने जा रही हैं. अमित शाह जैसे नेताओं का सुमित अवस्थी जैसा एंकर इंटरव्यू ऐसे लेता रहा जैसे माता अपनी गोद में बेटे को बिठाकर दूध-भात खिला रही हो.

आईबीएन7 की बेहूदगी देखिए. इस चैनल की तरफ से ट्विटर पर ये ट्वीट किया गया: ”#MissionDelhi हमारी अपील है कि सभी लोग वोट डालें, विश्वास है BJP की सरकार बनेगी, हमारी सरकार तो 5 साल की ही होती है। http://bit.ly/ZrZqi7 ”

क्या आप किसी न्यूज चैनल से ये उम्मीद कर सकते हैं कि वह किसी पार्टी विशेष का नाम लेकर उसके पक्ष में वोट डालने की अपील करे. लेकिन ऐसा दुष्कर्म किया है अंबानी के चैनल आईबीएन7 ने.

सबसे सही एक्जिट पोल इंडिया न्यूज का रहा लेकिन यह भी दस सीट पीछे रहा. इंडिया न्यूज ने सबसे ज्यादा 53 सीट दी थी ‘आप’ को लेकिन आप तो इस अनुमान से दस सीट से भी ज्यादा आगे निकल गई. कह सकते हैं कि न्यूज चैनलों में जनता का मूड भांपने में सबसे तेज ‘इंडिया न्यूज’ रहा.

असल में भारतीय अर्थव्यवस्था के बाजारू होने और भारी मात्रा में कालाधन इकट्ठा होने के कारण ढेर सारे कालाबाजारियों ने अपना पैसा चैनल में लगा दिया है और इस चैनल के जरिए अपने निहित हित लाभ साधने का काम करते हैं. ये कालाबाजारी आम तौर पर कार्पोरेट और बड़ी पूंजी से संबंध रखते हैं. बड़ी पूंजी और कार्पोरेट के प्रिय नेताओं व पार्टियों में इनका संबंध होता है. इस कारण कालाबाजारियों के न्यूज चैनल इन बड़ी पूंजी के समर्थक पार्टियों का खुलकर सपोर्ट करते हैं और जो दल या नेता बड़ी पूंजी के खिलाफ बोलता कहता करता है उसकी बखिया उधेड़ने, मीन-मेख निकालने में भिड़ जाते हैं. बीजेपी वर्सेज आम आदमी पार्टी के जंग में यही हुआ. इंडिया टीवी, जी न्यूज, आईबीएन7 जैसे करप्ट न्यूज चैनल्स में अगर थोड़ी भी शर्म बाकी हो तो इन्हें अपनी शकल आइने में फिर देखनी चाहिए और सोचना चाहिए कि अगर उनकी साख ही नहीं रहेगी तो फिर दर्शक कहां बचेगा, टीआरपी कैसे आएगी, रेवेन्यू कैसे मिलेगा.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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AAP determined to recover lost ground in Delhi

Consider the way the AAP’s fortunes plummeted after its spectacular show in 2013. It had won 28 of the 70 seats in its debut election in Delhi then and was second to the BJP’s 31, while the ruling Congress was routed and could win only eight seats. However, the AAP’s aspirations of stopping the BJP’s vote line in last summer’s general elections failed miserably and the most honest and anti-establishment party could not win a single seat from Delhi and win just four Lok Sabha seats from Punjab. It shows people are changing their moods accordingly. As the elections are heating up in Delhi, the political parties are coming up with their latest interviews and the comments, making tall poll promises. The BJP is banking on the popularity of Prime Minister Narendra Modi while its main challenger AAP has projected its supremo Arvind Kejriwal as the CM.

While giving interview to T.V reporter Ravish Kumar, Arvind Kejriwal said, ‘’A clear fight between BJP and AAP has taken the shape in the upcoming election. Unlike the BJP and the AAP, the Congress has been left behind in campaigning spree ahead of the 2015 Assembly polls in Delhi. It is only now that the party has started putting up hoardings with the slogan – ‘Toot gayi vikas ki dor, chalo ab Congress ki or’ – to remind about the break in the progress achieved in the 15 years of stable Congress government in the city state.’’ On being asked about the satisfaction and supporters of his party in Delhi, he said,’’ People of Delhi are happy with our 49 days of Governance. So this time we are likely to win more seats and will serve for complete five years.’’ He is pitted against the two women of Congress and BJP– a torch-bearer on women’s issues, Kiran Walia, and the iron lady Kiran Bedi. His choice of words to snub them was, “We are in politics for a reason, not to shoot and scoot. People of Delhi will support us though they were angry with me when I had left last time. But one thing I have learnt with my political experience that never to quit the party.’’

Another interview with the TV journalist Barkha Dutt, he fired back at BJP saying this party has done nothing except for opening up the bank accounts in the last eight months. So people are watching and this time they will confidently give them the opportunity to serve for complete five years. He also recalled all the work done by his party during his 49 days of regime. He said,’’ All the Government institutions were started without taking money. Electricity bills were lowered down, proper supply of water was given out to the people. We arrested rise in prices of vegetables and other commodities. There was a complete eradication of corruption, when we were in power.’’
Answering to how Jhadu ka Jaadu will counter Modi, he alleged that Modi is not in the race, media is creating hype, though it is true that BJP is fighting election on the Modi Wave. But we are confident this time of winning 45 seats.

Blaming Modi for calling him an anarchist and naxal, he said,’’ If I would have been a naxal, people wouldn’t have supported me and made me CM in the last elections. I have won the people trust in Delhi. I have been an honest social worker serving the nation for last 15 years. All the promises we had made were fulfilled during our regime. We didn’t show any conflict of interest and vested interest like Congress and BJP did.’’

Another interview with Deepak chaurasia on India news, he made allegation against BJP on their party funding, saying they do not have transparency in showing funds raised as we have on our website. We get our funds audited every year and disclose it to people. Asked about how he felt when some of brass leaders like Shazia ilmi, Vinod kumar Binny left the party and even Shanti Bhushan was praising Kiran Bedi, he replied,’’ We never forced people to join our party. It was their decision and might be correct to leave the party. If Kiran Bedi had to join BJP then why did she agitate with Annaji on corruption. She was one of the critics of BJP and today she has joined that party. About his political ambition, he said that he considered politics a temple to serve people.

This is written by Khushboo Agrahari, a student of IIMC. contact : khushbooagrahari05@gmail.com

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Will ’K’ factor be a boon for BJP in Delhi polls?

Delhi goes to the polls on February 7. The BJP is keen to win after 2013 loss when the AAP had formed a minority government and ruled the capital for 49 days before its leader Kejriwal resigned. Delhi has been under President’s rule since then. Manay political changes can be seen in the Delhi election. A desperate shift of the candidates fron one party to other is done. The major rivals are AAP and BJP.Congress is a distant third in the election. However, it pretends to be in the race. Above all, the entry of the first lady police officer Kiran Bedi into BJP has changed the whole political game, say the Delhites.

The induction of Kiran Bedi in the Bharatiya Janata Party (BJP) is an attempt by the party to fill the vacuum created after Dr. Harshvardhan was moved to the Centre, and to give a face to the poll campaign ahead of the Delhi Assembly Elections 2015. Since her entry into the BJP, speculations are rife that the former IPS officer may become the party’s chief ministerial face for Delhi.

The BJP mainly relied on the charisma of Prime Minister Narendra Modi in the previously held assembly polls in the country, but in Delhi it needs a face to counter Aam Aadmi Party (AAP) leader Arvind Kejriwal. No doubt, the selection of Kiran Bedi is yet another intelligent move by BJP’s poll strategist Amit Shah. But still doubt prevails over the clear mandate. For the same middle class who supports Modi also favours Arvind Kejriwal. So the competition is tough between the two parties. The million dollar question, however, is, will Kiran Bedi’s entry into the party come as a boon to the party, or will it spell disaster for it?

There are political interests and strategies that are put across in the public domain with certain perception.Like in the Lok Sabha elections 2014, BJP is trying to make the Delhi polls a battle of two faces. The BJP is projecting Kiran Bedi as a candidate with a clean image, but there has indeed been several blots on her career so far. Kiran Bedi, while joining the BJP, said that her administrative experience will help her to serve the nation politically. Questions were raised on her administrative career by the veteran journalist Karan Thapar who had written, “She didn’t complete her tenure as Superintendent of Police in Goa, DIG (Range) in Mizoram, Inspector General (Prisons), Tihar Jail and Inspector General of Police in Chandigarh.” 

Attacking Bedi, he said she left her post in Goa and Mizoram without permission. Would Bedi love to run away from responsibilities like Arvind Kejriwal did? Though Bedi denies all the charges, this actually works as the fuel to raise fire. People are in a confused state of mind. Media have also played their role in hyping the stories and extrapolating information. Questions like does she want to take on Kejriwal, or what made her change her mind so suddenly? or, is it the hunger for power? are being raised against her. At one time, Bedi and Kejriwal were together in the Anna Hazare-led India Against Corruption campaign for the Jan Lokpal Bill. But in August 2013, Bedi distanced herself from Kejriwal when he decided to jump into politics. She even said that she would not join politics ever. This has created political mess which is being churned out in the form of allegations from the political parties.

Recently in November 2014, Bedi had said, “I deny reports of joining the BJP. When did I say I would become a member of any political party? I have never said that I am joining BJP.’’ Now, less than two months later, she becomes the face of BJP’s poll campaign in Delhi. The difference between her words and actions speaks a lot about her credibility. People may come up with questions attacking her in politics.

But the worst part of the story is that the BJP is trying to confine the polls to a battle between two individuals – Modi and Arvind Kejriwal. However, Kejriwal is trying to distance himself from the image of Modi, thanks to the ‘good’ experience he had had in Lok Sabha election.

Delhi is suffering from problems that don’t have easy solutions, but the focus of the Delhi polls is being shifted from the problems of Delhi to only a battle between personalities. Issues and tall poll promises are being made by these political bigwigs in order to gain support of people.

A pre-conceived notion about clear mandate to any party may prove to be false. But it is clear roping in Kiran Bedi was the BJP’s compulsion on the political ground. With the ‘Broom’ giving a tough fight to the ‘Lotus’, Arvind Kejriwal’s strategy has been to turn the contest into a ‘Keriwal versus Modi’ affair. While Modi’s magic had worked in the last Lok Sabha elections as well as the subsequent state elections in Maharashtra, Haryana, Jharkhand and Jammu and Kashmir, on all the above instances, a strong anti-incumbency wave against the ruling governments. The same could not be the case in Delhi where there has been no government for the last one year.  Party insiders, therefore, concede that a CM face became necessary to insulate Modi from any post-poll embarrassment. And who else could fit the bill better than Bedi?  After all, it takes fire to fight fire!

This is written by Khushboo Agrahari, a student of IIMC. contact : khushbooagrahari05@gmail.com

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एक अकेले बंदे ने, एक अकेली शख्सियत ने पूरी की पूरी केंद्र सरकार की नींद उड़ा रखी है

दिल्ली चुनाव इन दिनों आकर्षण और चर्चा का केंद्र है. हो भी क्यों ना, एक अकेले बंदे ने, एक अकेली शख्सियत ने पूरी की पूरी केंद्र सरकार की नींद उड़ा कर रखी हुई है. आपको याद होगा कि 2013 में सरकार गठन पर अरविन्द केजरीवाल ने कहा था कि अन्य दलों को राजनीति तो अब आम आदमी पार्टी सिखाएगी. अब जाकर यह बात सही साबित होती हुई दिखाई दे रही है. जहाँ महाराष्ट्र, झारखंड, जम्मू कश्मीर और हरियाणा में बीजेपी ने बिना चेहरे के मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा और नए चेहरे को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन दिल्ली में उसे चेहरा देना ही पड़ा. अपने पुराने सिपहसालारों व वफादारों को पीछे करके एक बाहरी शख्सियत को आगे लाया गया. देखा जाए तो ये भी अपने आप में केजरीवाल और उनकी पार्टी की जीत है. कहना पड़ेगा, जो भी हो, बन्दे में दम है.

दिल्ली चुनाव में आवाम संस्था द्वारा उठाये गए सवालों पर भी कई सवाल हैं. सबसे पहले वक़्त और नीयत का है. क्या अगर आवाम की नीयत साफ़ थी तो लोक सभा चुनावों के वक़्त यह आरोप क्यों नहीं लगाए. फिर आवाम दावा करती है कि काले धन को चेक से सफ़ेद किया जा सकता है. इसका मतलब अगर मान लिया जाए यह काला धन था तो सवाल है कि क्या ‘आप’ पर सवाल उठाने वाली अन्य पार्टियां भी अपनी फंडिंग की जाँच कराने के लिए तैयार होंगी. ये अपने आप में एक बड़ा सवाल है. इसका जवाब ख़ास तौर पर बीजेपी और कांग्रेस को भी देना चाहिए. वो भी जब केंद्रीय बीजेपी नेतागण भी काले धन की चेक से फंडिंग की संभावना को मानते हैं.

आरोप लगाया जाता है कि अरविन्द दिल्ली छोड़ कर भाग गए. उन्हें भगोड़े का तमगा दिया गया, लेकिन यदि दिल्ली चुनाव में ‘आप’ दूसरी बड़ी पार्टी थी तो जम्मू काश्मीर में बीजेपी भी दूसरी बड़ी पार्टी है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जम्मू काश्मीर में सरकार गठन के सवाल पर बीजेपी भी रणछोड़ या भगौड़ी नहीं है. दिल्ली को सरकार विहीन बनाने के लिए ‘आप’ को जिम्मेवार मानने वाली पार्टी क्या खुद जम्मू कश्मीर के मौजूदा हालात के लिए जिम्मेवार नहीं है. जम्मू काश्मीर में दोबारा चुनाव की सुगबुगाहट के लिए क्या बीजेपी जिम्मेवार नहीं है.

यदि जनलोकपाल और भ्रष्टाचार रोकने जैसे गंभीर किसी मुद्दे पर इस्तीफ़ा देना रणछोड़ है तो क्या बीजेपी यह मानती है कि सरकार पूरे समय चलाओ और फिर चाहे इसके लिए कितना भी भ्रष्टाचार हो,  वो जायज़ है. चाहे जितने मर्ज़ी कारोबारियों को आम जनता की जेब काटकर फायदा दिया जाए. ये भी एक सवाल है क्योंकि मानें या ना मानें, दिल्ली में ‘आप’ की सरकार के दौरान भ्रष्टाचार पर लगाम तो लगी थी. मेरे खुद के राज्य हिमाचल प्रदेश के ड्राइवर भाई इस बात के गवाह हैं, जिन्हें पहले दिल्ली माल ले जाने पर सिर्फ एक चक्कर के हज़ार हज़ार रुपये रिश्वत देनी पड़ती थी, लेकिन अरविन्द सरकार के दौरान उन्हें इस प्रथा से मुक्ति मिली. तब वही ड्राइवर भाई जो पहले दिल्ली जाने से कतराते थे, अरविन्द सरकार के दौरान दिल्ली जाने के लिए उत्सुक और खुश होते थे. दिल्ली के अलावा अन्य राज्यों के लोग भी इस बात को मानते हैं. अब दिल्ली की जनता तय करे कि उसे किसे मौका देना है.

संदीप खड़वाल 
वरिष्ठ पत्रकार
ऊना, हिमाचल प्रदेश
088949-12501
stringerslife@gmail.com

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सच सामने आया : किरण बेदी नहीं, सुरजीत कौर आजाद भारत की पहली महिला आईपीएस अफसर

Sanjaya Kumar Singh : शीशे के घरों से चुनाव लड़ना… भारतीय जनता पार्टी में शामिल होकर पार्टी की ओर से दिल्ली की मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनना किरण बेदी के लिए काफी महंगा पड़ा। चुनाव अभी हुए नहीं है फिर भी उनके जीवन की दो प्रमुख कमाई इस चुनाव में खर्च हो गई। पहली कमाई थी इंदिरा गांधी की कार टो करने का श्रेय जो पिछले दिनों बुरी तरह खर्च हो गई। उनकी दूसरी कमाई थी – देश की पहली महिला आईपीएस होने का श्रेय। और अब यह कमाई भी खर्च होती दिखाई दे रही है।

एक पुराने अखबार के कतरन की यह तस्वीर बताती है कि देश की पहली महिला आईपीएस ऑफिसर पंजाब कैडर की सुरजीत कौर (1956) थीं जिनका 1957 में एक कार दुर्घटना में निधन हो गया था। जबकि हम लोग अभी तक किरण बेदी को ही देश की पहली महिला आईपीएस अफसर जानते-मानते रहे हैं। सुरजीत कौर के आईपीएस के लिए चुने जाने के बाद जल्दी ही निधन हो जाने और इसके करीब 16 साल बाद 1972 में किरण बेदी के आईपीएस बनने पर हो सकता है उस समय किरण बेदी को पहली महिला आईपीएस अधिकारी कहा और मान लिया गया होगा। और उनकी यही छवि बनी रही। अब अगर यह खुलासा हो रहा है तो इसका श्रेय सूचना और संचार क्रांति के साथ भारतीय चुनावों को भी देना पड़ेगा। अभी तक तो यही कहा जाता था कि शीशे के घरों में रहने वालों को दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए। पर बुलेट प्रूफ शीशे के जमाने में इसमें संशोधन की आवश्यकता लग रही है। शीशे के घरों से चुनाव नहीं लड़ना चाहिए।

किरण बेदी वाकई पहली महिला आईपीएस नहीं है वाले सच को छुपाए रखने के लिए कितने लोगों को दोषी माना जाए। जैसा कि नरेन्द्र मोदी ने कहा है कांग्रेस ने 67 साल कुछ नहीं किया – पर यह एक काम तो किया कि उनके (उनकी पार्टी) के लिए किरण बेदी तैयार करने में योगदान किया। खबर के मुताबिक दिल्ली में जाने-माने वेद मारवाह सुरजीत कौर के बैचमेट हैं, उन्होंने भी यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की तो क्या वेद मारवाह को इस काम में कांग्रेस पार्टी का सहयोगी माना जाए। इंदिरा गांधी की कार टो करने के जिस मामले से वे स्टार बनीं उस मामले में भी कांग्रेस ने सार्वजनिक तौर पर कुछ कहा हो ऐसा सुनने में नहीं आया। उसकी इस चुप्पी को क्या माना जाए।

यूपीएससी, जो लोगों के समान्य ज्ञान की परीक्षा लेकर आईएएस-आईपीएस चुनता बनाता है, इतने वर्षों तक इस जानकारी को छिपाए रहा या एक गलत सूचना को सही करने की जरूरत नहीं समझी। क्या उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है। इतना जबरदस्त सहयोग मिलने के बाद भी किरण बेदी की पसंद कांग्रेस पार्टी नहीं रही। पहले तो अन्ना आंदोलन में भाग लेकर वे कांग्रेस सरकार का विरोध करती हैं और फिर प्रमुख विरोधी दल भाजपा में शामिल हो जाती हैं। कांग्रेस का विरोध तो आम आदमी पार्टी भी कर रही थी पर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को चुना। क्या इसलिए कि उन्हें लगता है कि उनके जैसे लोगों की शरणस्थली भाजपा है। बहुत सारे सवाल हैं और मीडिया की भूमिका भी। पर उसकी चर्चा फिजूल है। कटघरे में सिर्फ किरण बेदी नहीं – देश की राजनीति, राजनीतिक पार्टियां, समाज और संस्थाएं और कुछ दूसरे प्रमुख नागरिक भी हैं। सिर्फ किरण बेदी को दोषी मानना मुझे ठीक नहीं लग रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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जानिए, उन वजहों को जिसके कारण दिल्ली में किरण बेदी फैक्टर अरविंद केजरीवाल को बहुमत दिला रहा है

Yashwant Singh : भाजपाई दिल्ली में गड़बड़ा गए हैं. जैसे भांग खाए लोगों की हालत होती है, वही हो चुकी है. समझ नहीं पा रहे कि ऐसा करें क्या जिससे केजरीवाल का टेंपो पंचर हो जाए, हवा निकल जाए… रही सही कसर किरण बेदी को लाकर पूरा कर दिया.. बेचारी बेदी जितना बोल कह रही हैं, उतना भाजपा के उलटे जा रहा है… आखिरकार आलाकमान ने कह दिया है कि बेदी जी, गला खराब का बहाना करके चुनाव भर तक चुप्पी साध लो वरना आप तो नाश कर दोगी…

ठेले खोमचे पान दुकान झुग्गी झोपड़ी वाले डरे इस बात से हैं कि ये जो सुपर काप किरण बेदी अगर सीएम बन गई तो दिल्ली को स्मार्ट बनाने के नाम पर गरीबों के ठिकानों पर बुलडोजर चलवा देगी… जाने कैसे ये अफवाह दिल्ली के गरीब लोगों में फैल गई है और सारे गरीब डरे हुए हैं और एकजुट होकर केजरीवाल को वोट देने की प्लानिंग कर चुके हैं…मेरा पानवाला पूरा किस्सा बता रहा था इस बारे में… ये वही गरीब तबका है जो पुलिस की वसूली से सबसे ज्यादा परेशान है और केजरीवाल के 49 दिनों में इस वसूली से मुक्त था… तो इनके लिए केजरीवाल को जिताना और किरण बेदी को हराना जीने मरने का सवाल बन गया है…

किरण बेदी जब तक सक्रिय राजनीति से दूर थीं, उनका ढेर सारा झूठ ढका हुआ था और स्वीकार्य था.. लेकिन राजनीति में आते ही ऐसी फंसी कि उनका सारा आभामंडल धुल गया… इंदिरा गांधी की कार उठाने से उनका जो सुपर काप वाली छवि बनी थी, उसे रवीश कुमार ने अपने इंटरव्यू के दौरान सच (पूरा जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: Goo.gl/OUfdcQ ) उगलवा कर मटियामेट कर दिया. दिल्ली के छोटे बड़े सब वकील लंगोट पहन कर किरण बेदी से इस बार दो-दो हाथ करने को तैयार हैं. कल मेरे पास दो वकील मित्रों के फोन आए. एक हाईकोर्ट में हैं और दूसरे सुप्रीम कोर्ट में. हाईकोर्ट वाले ने बताया कि किरण बेदी को भाजपाई गमछा लाला लाजपत राय को पहनाना महंगा (पूरा जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: Goo.gl/dtyiR0 ) पड़ गया है और कोर्ट ने पुलिस वालों से पूछा है कि इस मामले में किरण बेदी के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई.

सुप्रीम कोर्ट वाले वकील साहब ने पूछा कि किरण बेदी के खिलाफ कैसे अभियान सोशल मीडिया पर चलाया जा सकता है. मैंने पूछा- ऐसा क्यों करना चाह रहे हैं आप लोग? तब उन्होंने बताया कि इसी किरण बेदी ने एक जमाने में दिल्ली में वकीलों पर अब तक का सबसे बर्बर लाठीचार्ज करवाया था. तब वकीलों ने किरण बेदी के खिलाफ तब तक आंदोलन हड़ताल धरना प्रदर्शन चलाया जब तक कि उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो गई. वो गुस्सा, वो घाव वकीलों में फिर हरा हो गया है जब ये किरण बेदी सीएम पद के लिए भाजपा की तरफ से खड़ा हो गई है. कहने का आशय ये कि भाजपा का जो परंपरागत वोट बैंक है, वह तक किरण बेदी के चलते आम आदमी पार्टी के पक्ष में खिसक आया है. तो ये चमत्कार मत समझिएगा अगर दिल्ली में केजरीवाल सिर्फ इसलिए बहुमत में आ जाएंगे कि किरण बेदी को भाजपा ने सीएम पद का प्रत्याशी बना दिया. वैसे, कहने वाले ये भी कह रहे हैं कि ‘विकास’ के पापा का नौ महीने बाद जब डिलीवरी का दिन आया है तबसे कष्ट के मारे दिल-दिमाग काबू में रख नहीं पा रहे हैं.. कुछ भी कह कर दे रहे हैं… 🙂

और, एक आखिरी कारण. केजरीवाल को सबने टारगेट कर लिया है. बीजेपी ने हमेशा की तरह मीडिाय में बंपर पैसा झोंका है. इसलिए सब बीजेपी की छोटी छोटी बातों को ब्रेकिंग न्यूज बनाकर दिखा रहे हैं और केजरीवाल की आलोचना को परम कर्तव्य बनाए हुए हैं. बीजेपी वाले अखबारों में केजरीवाल को टारगेट करके बिलो द बेल्ट विज्ञापन छाप दिखा रहे हैं. इन सब कारणों से अरविंद केजरीवाल के प्रति आम जन में सहानुभूति पैदा हो रही है कि सारे चोर मिल कर (और आजकल की बिकाउ मीडिया चोरों के साथ रहती ही है ) एक ईमानदार जुझारू तेवरदार साहसी और विजनरी किस्म के नए नेता को निपटा देने में लगे हैं. तो, केजरीवाल के पक्ष में एक सहानुभूति लहर भी चल रही है अंदर ही अंदर. इस बात को बीजेपी और उनके नेता समझ नहीं पा रहे हैं और बालकोचित आरोपों कुतर्कों के जरिए केजरीवाल के खात्मे की जो रणनीति बनाए हुए हैं, उससे वे खुद अपनै पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं व केजरीवाल को मजबूत बना रहे हैं. तो भइया, दिल्ली में विकास के पापा का जम्बूद्वीप वाला रथ लगता है रुक जाएगा और इसे नाथने का काम करेंगे मफलरमैन केजरीवाल… जै हो

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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लाला लाजपत राय को भाजपाई पटका पहनाने के मामले में कोर्ट ने किरण बेदी के खिलाफ कार्रवाई का ब्योरा मांगा

किरण बेदी अपनी मूर्खताओं, झूठ, बड़बोलापन और अवसरवाद के कारण बुरी तरह घिरती फंसती जा रही है. पिछले दिनों नामांकन से पहले किरण बेदी ने स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय की प्रतिमा को भगवा-भाजपाई पटका पहना दिया. इस घटनाक्रम की तस्वीरों के साथ एक कारोबारी सुरेश खंडेलवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट के जाने-माने वकील हिमाल अख्तर के माध्यम से किरण बेदी को कानूनी नोटिस भिजवाया फिर कोर्ट में मुकदमा कर दिया. इनका कहना है कि लाला लाजपत राय किसी पार्टी के प्रापर्टी नहीं बल्कि पूरे देश के नेता रहे हैं. ऐसे में किसी एक पार्टी का बैनर उनके गले में टांग देना उनका अपमान है.

इस मामले में दायर मुकदमें को संज्ञान लेने हुए आज कोर्ट ने पुलिस को किरण बेदी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के संबंधि में पूछा है कि पुलिस ने क्या क्या किया है अब तक, इस बारे में रिपोर्ट पेश करे. सुनवाई की अगली तारीख 18 फरवरी है. उपर कोर्ट का आदेश है. नीचे पूरे मामले से संबंधित तस्वीर, अखबारी कटिंग, कंप्लेन और लीगल नोटिस का प्रकाशन किया जा रहा है. इस मामले में किसी अन्य जानकारी के लिए वरिष्ठ वकील हिमाल अख्तर से संपर्क उनके मोबाइल नंबर 09810456889 के जरिए किया जा सकता है.

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बजट के महीने में देश का वित्त मंत्री दिल्ली चुनाव के लिये बीजेपी हेडक्वार्टर में बैठने को क्यों है मजबूर

: दिल्ली फतह की इतनी बेताबी क्यों है? : बजट के महीने में देश के वित्त मंत्री को अगर दिल्ली चुनाव के लिये दिल्ली बीजेपी हेडक्वार्टर में बैठना पड़े… केन्द्र के दर्जन भर कैबिनेट मंत्रियों को दिल्ली की सड़कों पर चुनावी प्रचार की खाक छाननी पड़े… सरकार की नीतियां चकाचौंध भारत के सपनों को उड़ान देने लगे… और चुनावी प्रचार की जमीन, पानी सड़क बिजली से आगे बढ़ नहीं पा रही हो तो संकेत साफ हैं, उपभोक्ताओं का भारत दुनिया को ललचा रहा है और न्यूनतम की जरूरत का संघर्ष सत्ता को चुनाव में बहका रहा है।

दोनों खेल एक साथ कैसे चल सकते हैं या दो भारत को एक साथ जीने की कला जिस महारथी में होगी, वही मौजूदा वक्त में सबसे ताकतवर राजनेता होगा। सरकार उसी की होगी। क्योंकि यह वाकई कल्पना से परे है कि दिल्ली चुनाव के हर मुद्दे बिजली, पानी, सड़क, घर, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर कैबिनेट मंत्री हर प्रेस कान्फ्रेंस करने के लिये उपलब्ध है और महीने भर बाद जिस बजट का इंतजार देश कर रहा है, उस बजट से उस भारत को कुछ भी लेना देना नहीं होता है जो चुनाव में जीत हार तय करता है। और जो मंत्री दिल्ली के रायसीना हिल्स पर नार्थ या साउथ ब्लाक में बैठकर दुनिया को जिस भारत से रुबरु कराता है वही मंत्री जब चुनाव के लिये सड़क पर प्रचार के लिये उतरता है तो उसकी भाषा उस दुनिया से बिलकुल अलग होती है, जिस दुनिया के बीच भारत चहक रहा है। तो संकेत साफ है कि चुनावी जीत सरकार का पहला धर्म है. चुनाव की जीत हार देश के लिये मर मिटने की सियासत है। यानी सत्ता की ताकत सत्ता में बने रहने के उपाय खोजने से आगे जायेगी नहीं। यानी भारत में राजनीतिक सत्ता के आगे सारा ज्ञान बेमानी है और चुनाव जीतना ही ज्ञान के सागर में डुबकी लगाना है।

इस हाल दुनिया भारत की मुरीद हो और सत्ता हर जगह चुनावी जीत हासिल कर रही हो तो फिर एक भी हार कितनी खतरनाक साबित हो सकती है, यह डेढ़ बरस पहले दिल्ली में शीला दीक्षित सरीखे सीएम की हार के बाद काग्रेस का समूचे देश में लड़खड़ाने से भी समझा जा सकता है और मौजूदा वक्त में दिल्ली जीतने के लिये सरकार ही सड़क पर है इससे भी जाना जा सकता है। इन सारे अंतर्विरोध के बावजूद अगर दुनिया भारत की सत्ता पर लट्टू है तो दो संकेत साफ हैं। पहला, भारत की मौजूदा सत्ता जनादेश के आसरे कोई भी निर्णय लेकर उसे लागू कराने में सक्षम है जो 1991 के बाद से कभी संभव नहीं हुआ था। और दूसरा भारत का बाजार अमेरिका सरीखे देश की आर्थिक मुश्किलों को भी दूर कर सकता है।

भारत के भीतर बसने वाले इस दो भारत का ही कमाल है कि भारत दुनिया का एकमात्र देश है जहां आने वाले वक्त में रेलवे में 5 से 10 लाख करोड़ का निवेश होना है। सड़क निर्माण में 2 लाख करोड़ से ज्यादा का निवेश होना है। बंदरगाहों को विकसित करने में भी 3-4 लाख करोड़ लगेंगे। इसी तरह सैकडों एयरपोर्ट बनाने में भी 3 से 4 लाख करोड़ का निवेश किया जाना है। वहीं भारतीय सेना की जरुरत जो अगले दस बरस की है, वह भी करीब 130 बिलियन डॉलर की है। यानी पहली बार भारत सरकार की आस विदेशी निवेश को लेकर लगी है तो दुनिया की आस भारत में पैसा लगाने को लेकर जगी है। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने खुले संकेत दिये है कि भारत विकास के रास्ते को पकड़ने के लिये आर्थिक सीमायें तोड़ने को तैयार है और दुनिया भर के देश चाहे तो भारत में पूंजी लगा सकते हैं। असल में यह रास्ता मोदी सरकार की जरुरत है और यह जरुरत विकसित देशो को भारत में लाने को मजबूर करेगा। क्योंकि विकसित देशों की मजबूरी है कि वह अपने देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर का काम पूरा कर चुके हैं और तमाम विदेशी कंपनियों के सामने मंदी का संकट बरकरार है।

यहां तक की चीन के सामने भी संकट है कि अगर अमेरिका की आर्थिक हालात नहीं सुधरे तो फिर उसके यहा उत्पादित माल का होगा क्या। ऐसे में “मेक इन इंडिया” का रास्ता विदेशी निवेश के लिये खुलता है तो अमेरिका, जापान, फ्रांस या चीन सरीखे देश कमाई भी कर सकते है। अब जरा कल्पना कीजिये दुनिया के तमाम ताकतवर या कहें जो विकसित देश भारत में निवेश करना चाहते हैं, उनके आसरे दिल्ली की झुग्गी बस्तियों का कोई रास्ता निकलेगा नहीं। बिजली, पानी, सडक की लड़ाई थमेगी नहीं। बल्कि इसके बाद देश में खेती और ग्रामीण भारत के सामने अस्तित्व का संकट जरूर मंडराने लगेगा। क्योंकि मौजूदा सरकार जिस रास्ते पर निकल रही है उसमें वह गरीब भारत या फिर किसान, मजदूर या ग्रामीण भारत की जरुरतों को पूरा करने की दिशा में कैसे काम करेगी, यह किसी बालीवुड की फिल्म की तरह लगता है। क्योंकि फिल्मों में ही नायक तीन घंटे में पोयटिक जस्टिस कर देता है। वैसे यह तर्क दिया जा सकता है कि दुनिया की पूंजी जब भारत में आयेगी तो उसके मुनाफे से ग्रामीण भारत का जीवन भी सुधारा जा सकता है। यानी मोदी सरकार का अगला कदम गरीब भारत को मुख्यधारा से जोड़ने का होगा। और असल परीक्षा तभी होगी। लेकिन यह परीक्षा तो हर प्रधानमंत्री ने अपनी सत्ता के लिये दी ही है। और उसे कटघरे में खड़ा भी किया गया है।

नेहरु ने लालकिले से पहले भाषण में नागरिक का फर्ज सूबा, प्रांत, प्रदेश, भाषा, संप्रदाय, जाति से ऊपर मुल्क रखने की सलाह दी। और जनता को चेताया कि डर से बडा ऐब/ गुनाह कुछ भी नहीं है। वहीं 15 अगस्त 1947 को कोलकाता के बेलीघाट में अंधेरे घर में बैठे महात्मा गांधी ने गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी को यह कहकर लौटा दिया कि अंधेरे को रोशनी की जगमग से दूर कर आजादी के जश्न का वक्त अभी नहीं आया है। सत्तर के दशक में जिन खनिज संसाधनों को इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय संपत्ति माना उसे सोनिया गांधी के दौर में मनमोहन सिंह ने मुनाफे के धंधे के लिये सबसे उपयोगी माना। बाजार सिर्फ जमीन के नीचे ही नहीं बना बल्कि उपर रहने वाले ग्रामीण आदिवासियों, खेतिहर किसानों और मजदूरों को भी लील गया। लेकिन ताकतवर राजनीतिक सत्ता ने इसे दुनिया के बाजार के सामने भारत को मजबूत और विकसित करने का ऐसा राग छेड़ा कि देश के तीस फीसद उपभोक्ताओं को खुले तौर पर लगने लगा कि बाकि ७० फिसदी आबादी के जिन्दा रहने का मतलब क्या है। सरोकार तो दूर, संवाद तक खत्म हुआ। मोदी सरकार कुछ कदम और आगे बढी। लेकिन पहली बार उसने इस हकीकत को समझा कि चुनावी जीत से बड़ा कोई आक्सीजन होता नहीं है और चुनावी जीत ही हर कमजोरी को छुपाते हुये सत्ता का विकल्प कभी खड़ा होने नहीं देती है।

यानी बीते ६७ बरस की सबसे बड़ी उपलब्धि देश में राजनीतिक ताकत का ना सिर्फ बढ़ाना है बल्कि राजनीतिक सत्ता को ही हर क्षेत्र का पर्याय मानना भी है। असर यही है कि 1947 में भारत की जितनी जनसंख्या थी उसका तीन गुना हिन्दुस्तान 2015 में दो जून की रोटी के लिये राजनीतिक सत्ता की तरफ टकटकी लगाकर देखता है। असर इसी का है कि दिल्ली में जो भी सरकार बने या जिस भी राजनीतिक दल को जनता वोट दे । हर किसी को केन्द्र की सत्ता के पलटने के हर अंदाज तो याद है। फिर २०१४ के चुनाव में जिस जनादेश का गुणगान दुनिया भर में हो रहा है उसी जनादेश से बनी सरकार की सांस चुनाव के न्यूनतम नारों को पूरा करने में क्यों फूल रही है। और दिल्ली में न्यूनतम जरुरते पूरी हो जायेगी यह कहने के लिये और कोई नहीं उसी मोदी के कैबिनेट मंत्री और खुद प्रधानमंत्री मोदी चुनावी मैदान में क्यों उतर रहे हैं। जिन्हें सत्ता सौपी ही इसलिये गई कि वह विकास की नयी धारा देश में बहा कर अच्छे दिन ला दें।

जाने-माने पत्रकार और आजतक न्यूज चैनल के संपादक पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लाग से साभार.

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किरण बेदी का पुलिसिया अंदाज़ देखकर मैं हैरान था : रवीश कुमार

सुबह के 5 बज रहे थे तभी सुशील का फोन आया कि बैकअप प्लान किया है आपने। सुशील मेरे शो के इंचार्ज हैं। बैक अप प्लान? हो सकता है कि आधा घंटा न मिले। इंटरव्यू के लिए तैयार होकर चाय पी ही रहा था कि सुशील के इस सवाल ने डरा दिया। प्राइम टाइम एक घंटे का होता है और अगर पूरा वक्त न मिला तो बाकी के हिस्से में क्या चलाऊंगा। हल्की धुंध और सर्द भरी हवाओं के बीच मेरी कार इन आशंकाओं को लिए दफ्तर की तरफ दौड़ने लगी।

गाज़ीपुर से निज़ामुद्दीन पुल तक कांग्रेस, बीजेपी, आम आदमी पार्टी के होर्डिंग तमाम तरह के स्लोगन से भरे पड़े थे। सियासी नारों में सवालों की कोई जगह नहीं होती है। नारे जवाब नहीं होते हैं। मैं दफ्तर पहुंच गया। कैमरामैन मोहम्मद मुर्सलिन अपने साज़ों-सामान के साथ बाहर मेरा इंतज़ार कर रहे थे। जिस रास्ते से राष्ट्रपति ओबामा को सिरी फोर्ट आडिटोरियम पहुंचना था उसी से लगा है उदय पार्क जहां किरण बेदी रहती हैं। इसलिए हम सुरक्षा जांच के कारण जल्दी पहुंच जाना चाहते थे ताकि हमारी वजह से किरण बेदी को इंतज़ार न करना पड़े।

किरण बेदी समय पर ही बाहर आईं। इतनी तेज़ी से घर से निकलीं कि दुआ सलाम का भी ठीक से वक्त नहीं मिला। हम उनके साथ-साथ बल्कि पीछे-पीछे भागते चले गए। वैसे इनकी फुर्ती देखकर अच्छा लगा कि वे इस उम्र में भी फिट हैं। इसीलिए मेरा पहला सवाल ही यही था कि क्या आप राजनीति में खुद को फिट महसूस करने लगी हैं। जवाब में किरण बेदी खुद को पोलिटिकल साइंस का विद्यार्थी बताने लगीं। मुझे हैरानी हुई कि पोलिटिकल साइंस का स्टुडेंट और टीचर होने से ही क्या कोई राजनेता बनने की क्वालिटी रखता है या फिर इतनी जल्दी राजनीति में फिट हो जाता है। खैर किरण बेदी इस जवाब के बहाने अपने अतीत में चली गईं। उन्हें लग रहा था कि अतीत में जाने से कोई उन पर सवाल नहीं कर सकता। उनका अतीत ज़रूर अच्छा रहा होगा, लेकिन राजनीति तो आज के सवालों पर नेता का नज़रिया मांगती है।

दस मिनट ही इंटरव्यू के लिए मिला। मुश्किल से बारह मिनट हुआ, लेकिन मैंने बीस मिनट के लिए कहा, लेकिन वो भी नहीं मिला फिर इस भरोसे शुरू कर दिया कि नेता एक बार कहते हैं फिर इंटरव्यू जब होने लगता है कि पांच दस मिनट ज्यादा हो जाता है। मगर समय की पाबंद किरण बेदी बीच-बीच में घड़ी भी देखती रही हैं और इंटरव्यू के बीच में यह सोचने लगा कि प्राइम टाइम अब किसी और विषय पर करना होगा। सिर्फ किरण बेदी का इंटरव्यू चलाने का प्लान फेल हो चुका है। सुशील की बात सही निकली है। यह सब सोचते हुए मेरा ध्यान सवालों पर भी था। मेरे सवाल भी किरण बेदी के दिए वक्त की तरह फिसलते जा रहे थे। रात ढाई बजे तक जागकर की गई सारी तैयारी अब उस कागज में दुबकने लगी, जिसे मैं कई बार मोड़कर गोल कर चुका था।

हम दोनों भाग रहे थे। वो अपने वक्त के कारण और मैं अपने सवालों के कारण। सब पूछना था और सब जानना था। ऐसा कभी नहीं होता। आप पंद्रह मिनट में किसी नेता को नहीं जान सकते। किरण बेदी का पुलिसिया अंदाज़ देखकर हैरान था। इसलिए मैं बीच बीच में एक्सेलेंट बोल रहा था, मुलेठी का ज़िक्र किया। गला खराब होने पर मुलेठी खाई जाती है। देखने के लिए इस टोका-टाकी के बीच बेदी एक राजनेता की तरह बाहर आती हैं या अफसर की तरह। मुझे किरण बेदी में आज से भी बेहतर राजनेता का इंतज़ार रहेगा।

आपने इंदिरा गांधी की कार उठाई थीं। उनका पीछा करते-करते ये सवाल क्यों निकल आया पता नहीं। लेकिन किरण बेदी क्यों ठिठक गईं ये भी पता नहीं। नहीं, मैंने नहीं उठाई थी। बिजली की गति से मैं यह सोचने लगा कि तो फिर हमें बचपन से किसने बताया कि इंदिरा गांधी की कार किरण बेदी ने उठा ली थी। पब्लिक स्पेस में धारणा और तथ्य बहुरुपिये की तरह मौजूद होते हैं। अलग-अलग समय में इनके अलग-अलग रूप होते हैं। किरण बेदी ने कहा कि मैंने कार नहीं उठाई थी। निर्मल सिंह ने उठाई थी जो एसीपी होकर रिटायर हुए। तो फिर निर्मल सिंह हीरो क्यों नहीं बने। दुनिया निर्मल सिंह की तारीफ क्यों नहीं करती है। कोई राजनीतिक पार्टी निर्मल सिंह को टिकट क्यों नहीं देती है।

इस इंटरव्यू की कामयाबी यही रही कि एक पुराना तथ्य उन्हीं की जुबानी पब्लिक स्पेस में आ गया। किरण बेदी ने कहा कि कार निर्मल सिंह ने उठाई मगर मैंने निर्मल सिंह पर कोई कार्रवाई नहीं की। मैंने कोई दबाव स्वीकार नहीं किया, पर सवाल उठता है कि पीएमओ की कार का चालान होने के लिए कोई किरण बेदी या निर्मल सिंह पर दबाव क्यों डालेगा। किरण बेदी ने खुद कहा कि वह कार इंदिरा गांधी की नहीं थी। प्रधानमंत्री की नहीं थी। जिस वक्त निर्मल सिंह ने कार का चालान किया उसमें इंदिरा गांधी नहीं थी। जब मैंने किरण बेदी से पूछा कि क्या वो कार प्रधानमंत्री के काफिले में चलने वाली कार थी। तो जवाब मिला कि नहीं। तब वो कहती हैं कि वो कार पीएमओ की कार थी। कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि प्रधानमंत्री के दफ्तर में कितनी कारें होती होंगी।

बहुत दिनों से चला आ रहा एक मिथक टूट गया। अब हम इस सवाल के बाद फिर से भागने लगे। हम सबको समझना चाहिए कि चुनाव के वक्त नेता के पास बिल्कुल वक्त नहीं होता। किसी नेता इंटरव्यू के लिए वक्त दिया उसका शुक्रगुज़ार होना चाहिए। हर कोई करता है। तीस मिनट का समय देकर पांच मिनट कर देता है या अंत समय में इंटरव्यू देने से मना कर देता है। इस लिहाज़ से मैं उस वक्त हर बचे हुए समय में एक और सवाल कर लेना चाहता था।

आखिरी सवाल था सूचना के अधिकार से जुड़ा। जिसकी चैंपियन किरण बेदी भी रही हैं। अरुणा राय, शेखर सिंह, अरविंद केजरीवाल, जयप्रकाश नारायण इस बात को लेकर लड़ते रहे हैं कि राजनीतिक दलों को बताना चाहिए कि उन्हें चंदा कौन देता है और कितने पैसे मिलते हैं। जब ये सवाल हम प्राइम टाइम में पूछा करते थे कि ये सभी नाम जिनमें किरण बेदी भी शामिल हैं बीजेपी और कांग्रेस पर खूब हमला करते थे, लेकिन बीजेपी में आकर किरण बेदी ने तुरंत सर्टिफिकेट दे दिया कि पार्टी में फंडिंग की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी है। मुझे यह भी पूछना चाहिए था कि क्या बीजेपी अपने नेताओं को फंडिंग की प्रक्रिया की कोई फाइल दिखाती है। क्या किरण बेदी को ऐसी कोई फाइल दिखाई गई। पर खैर। जवाब यही मिला कि सूचना के अधिकार के तहत राजनीतिक दलों से चंदे और खर्चे का हिसाब मांगने के सवाल पर किरण बेदी पलट चुकी हैं।
 
पूरा इंटरव्यू इतने कम समय और इतनी रफ्तार के साथ हुआ कि मुझे भी पता नही चला कि मैंने क्या पूछा और उन्होंने क्या जवाब दिया। हम बस मोहम्मद और सुशील के साथ यही बात करते रहे कि कितने मिनट की रिकार्डिंग हुई है। अब हमें कितना और शूट करना होगा। किरण बेदी के पीछे भागते-भागते मेरा दिमाग़ इसमें भी अटका था कि कहीं कैमरे संभाले मोहम्मद गिर न जाएं। कैमरामैन की आंख लेंस में होती है। भागते हुए शूट करना आसान नहीं होता। शुक्रिया मोहम्मद मुर्सलिन। ट्वीटर पर इस इंटरव्यू को ट्रेंड करते हुए अच्छा भी लगा और डर भी। इस इंटरव्यू को लेकर ट्वीटर की टाइम लाइन पर डब्लू डब्लू एफ का मैच शुरू हो गया है। मैं इसे लेकर थोड़ा आशंकित रहता हूं। मैं सुपर जर्निलिस्ट नहीं हूं। मुझे इस सुपर शब्द से ताकत की बू आती है। मुझे ताकत या पावर पसंद नहीं है।

जाने-माने टीवी जर्नलिस्ट, मशहूर एंकर और एनडीटीवी के संपादक रवीश कुमार के ब्लाग से साभार.

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‘आप’ को जिताने में जुटा है ‘आजतक’ : अमित शाह

अब तक आरोप यह लगता रहा है कि 90 फीसदी न्यूज चैनल भाजपा के पैरोल पर चल रहे हैं लेकिन अमित शाह ने ‘आजतक’ पर आरोप लगाया है कि वह ‘आप’ को जिताने में मदद कर रहा है. इस आरोप से संबंधित खबर प्रभात खबर और टाइम्स आफ इंडिया में छपी है. पटना डेटलाइन से प्रभात खबर और टीओआई की खबर यूं है….

अमित शाह ने ‘आजतक’ पर ‘आप’ को जिताने के लिए काम करने का आरोप लगाया

पटना : भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लोकप्रिय हिंदी समाचार टीवी चैनल ‘आजतक’ पर आम आदमी पार्टी (आप) के पक्ष में एजेंडा लागू करने तथा दिल्ली चुनाव में अरविंद केजरीवाल को मदद करने का आरोप लगाते हुए जनता को उससे प्रसारित समाचारों के प्रति ‘सावधान’ रहने को कहा. पटना स्थित भाजपा के प्रदेश मुख्यालय में आज पत्रकारों से बातचीत के दौरान दिल्ली चुनाव में भाजपा की किरण बेदी को ‘बारो प्लेयर’ के तौर पर उतारे जाने के बारे में पूछे जाने पर शाह ने कहा, ‘‘आजतक का एजेंडा है आप पार्टी को लांच करने और दिल्ली चुनाव में जिताने का.पीत पत्रकारिता का इससे बडा कोई उदाहरण नहीं हो सकता.’’
 
जब कुछ मीडियाकर्मियों जिनमें अधिकतर टीवी चैनलों के रिपोर्टर शामिल ने पूछा कि यह आप कैसे तय कर सकते हैं कि जनता किस चैनल को देखे तो शाह ने कहा, ‘‘मुझे जो लगता है कहा, काफी और टीवी चैनल भी हमारे खिलाफ रिपोर्टिंग करते हैं और मैंने उनके बारे में नहीं कहा कि उनका एजेंडा तय है.  मैने यह नहीं कहा कि उक्त चैनल को न देखें बल्कि एजेंडा तय है जनता उसे सावधान होकर देखें.’’उन्होंने भाजपा में किरण बेदी को शामिल किए जाने के बारे में कहा कि उनकी पार्टी ‘बारो प्लेयर’ नहीं लाई है बल्कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर काम करने वालों को मंच प्रदान करती रही है और उसी के तहत उन्हें भी पार्टी में लाया गया है. पश्चिम बंगाल में ममता के खिलाफ क्रिकेटर सौरभ गांगुली को लाए जाने के बारे में पूछे जाने पर शाह ने कहा कि इस बारे में अभी निर्णय नहीं लिया गया है. पार्टी नेता सिर्धाथ नाथ सिंह सौरभ गांगुली को लेकर अपनी पहल के बारे में स्थिति पहले ही स्पष्ट कर दी है.

Private TV channel helping AAP to win Delhi poll: Shah

PATNA: BJP President Amit Shah on Saturday asked people to be “cautious” about the news dished out by a private Hindi TV channel apparently helping Aam Admi Party to win the Delhi assembly elections.

“The TV channel is having an agenda to launch Aam Admi Party and help Kejriwal win election in Delhi…there cannot be a bigger example of yellow journalism than this,” Shah told reporters here.

The BJP chief’s statement came in response to a question by the channel reporter as to why the party has “borrowed” Kiran Bedi for Delhi election.

When some media persons mostly of TV channels asked angrily as how he could decide which channel public should watch, Shah said “I have expressed my opinion and its on the people whether to take it or not.”

He defended inclusion of Kiran Bedi into the party and said BJP had always been in favour of inclusion of eminent personalities from different walks of lives into its fold.

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दिल्ली विस चुनाव में न्यूज चैनल खुल्लमखुल्ला ‘आप’ और ‘भाजपा’ के बीच बंट गए हैं

Dayanand Pandey : दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार टीवी चैनल खुल्लमखुल्ला अरविंद केजरीवाल की आप और भाजपा के बीच बंट गए हैं। एनडीटीवी पूरी ताकत से भाजपा की जड़ खोदने और नरेंद्र मोदी का विजय रथ रोकने में लग गया है। न्यूज 24 है ही कांग्रेसी। उसका कहना ही क्या! इंडिया टीवी तो है ही भगवा चैनल सो वह पूरी ताकत से भाजपा के नरेंद्र मोदी का विजय रथ आगे बढ़ा रहा है। ज़ी न्यूज, आईबीएन सेवेन, एबीपी न्यूज वगैरह दिखा तो रहे हैं निष्पक्ष अपने को लेकिन मोदी के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाने में एक दूसरे से आगे हुए जाते हैं। सो दिल्ली चुनाव की सही तस्वीर इन के सहारे जानना टेढ़ी खीर है। जाने दिल्ली की जनता क्या रुख अख्तियार करती है।

Sheetal P Singh : नरेन्द्र मोदी सचमुच में एक क़ाबिल राजनेता हैं बड़ी सफ़ाई से उन्होंने दिल्ली चुनाव को केजरीवाल बनाम मोदी को नेपथ्य में डाल केजरीवाल बनाम किरन बेदी कर दिया ! बीते कुछ दिनों की मीडिया कवरेज इसकी गवाह है ! किरन बेदी कोई बीस दिन पहले तक इंडिया टुडे ग्रुप के टी वी चैनलों पर चुनाव के दौरान होने वाली बहसों में panelist का contract डिस्कस कर रहीं थीं यानि कहीं से लूप में नहीं थीं और आज दिल्ली BJP की पूरी लीडरशिप परेड में है। केजरीवाल की जीत का माहौल बनते ही तलवारें म्यान से बाहर निकल आंईं हैं । शांतिभूषण ने किरन बेदी को उस समय ईमानदारी की सनद देना तय किया जब तीस हज़ारी में दिल्ली के वक़ील उनका पुतला फूँकने के लिये इकट्ठा हो रहे थे । कल जस्टिस हेगड़े ने बीजेपी/राजनीति में आने की अफ़वाहों पर पूर्णविराम लगाकर ऐसी ही एक कोशिश धराशायी की थी । अन्ना से किरन बेदी का समर्थन कराने की कोशिशें फलीभूत न होने से भी आप” का भूषण कैम्प समय से पहले किरन बेदी की सुरक्षा में उतर पड़ा। आश्चर्यजनक रूप से कवि कुमार विश्वास भले ही केजरीवाल के साथ न दिखे हों पर मनीष और दूसरे दोस्तों के लिये वे लगातार संभायें कर रहे हैं, मीडिया बहुत समय से उन्हे मोदी कैम्प में भेज रहा है। इस नये विकास से लगता है कि जितने लोग विरोध में होने की वजह से केजरीवाल को दिल्ली जीतते नहीं देखना चाहते उससे कुछ ही कम “आप” की ऊपरी लेयर में हैं जो मुख्यमंत्री बनने के बाद केजरीवाल की सामर्थ्य/राजनैतिक क़द बढ़ने के स्वप्न से घबराये हुए हैं!

Deepak Sharma : ये राजनीति है. दंगल नही. दंगल में आखिरी वक़्त पर चन्दगी राम के खिलाफ दारा सिंह को उतारकर कुश्ती जमाई जा सकती है. पर राजनीति में आखिरी वक़्त पर प्रत्याशी बदलना भारी पड़ सकता है. वैसे भी किरण बेदी प्रत्याशी है दारा सिंह नही. सवाल अब बस इतना है कि अगर किरण बेदी की कप्तानी में बीजेपी हार गयी तो क्या होगा ? इस हार का ठीकरा किस पर फूटेगा ? इस हार से हारेगा कौन ? 15 दिन की किरण बेदी को दोष दिया नही जा सकता. हर्षवर्धन पहले से ही हाशिये पर हैं. सतीश उपाध्याय का अध्याय ही समाप्त है. मुखी सुखी को जानता कौन है . तो क्या बारी अब वजीर की है? वजीर जिसने आखिरी वक़्त पर कजरी के खिलाफ किरण को उतारा. वजीर जिसने 48 घंटे में किरण को पार्टी में शामिल करवाया और 72 घंटो में मुख्यमंत्री की उमीद्वारी दे डाली. वजीर जिसने राजा से कजरी को कचरने की सुपारी ली है. मित्रों, अगर बीजेपी दिल्ली में हारी तो ये सच है कि केजरीवाल वजीर को मात देंगे और राजा को पहली बार शह. इस शह से बचने का अब एक ही रास्ता है. बाजी अब खुद राजा को लड़नी होगी. मोदीजी अब मिस बेदी का मुखौटा उतार दीजिये. आर पार खुद लड़िये केजरीवाल से. रोज़ रैली करिए गली गली. छोडिये ओबामा को. पहले इस टोपी से बचिए. आपने कभी टोपी नही पहनी .पर कहीं अब पहनने की नौबत न आ जाय. तो मोर्चा खुद संभालिये.क्यूंकि आपका वजीर फेल हो रहा है. इसलिए खुद ही कुछ करिए. जल्दी करिए . कहीं बनारस का स्कोर 1-1 न हो जाए.

वरिष्ठ पत्रकार त्रयी दयानंद पांडेय, शीतल पी. सिंह और दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

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एनडीटीवी प्राइम टाइम में Ravish Kumar और अभय दुबे ने भाजपा प्रवक्ता नलिन कोहली को पूरी तरह घेर लिया

Shambhunath Shukla : एक अच्छा पत्रकार वही है जो नेता को अपने बोल-बचन से घेर ले। बेचारा नेता तर्क ही न दे पाए और हताशा में अंट-शंट बकने लगे। खासकर टीवी पत्रकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। बीस जनवरी को एनडीटीवी पर प्राइम टाइम में Ravish Kumar और अभय दुबे ने भाजपा प्रवक्ता नलिन कोहली को ऐसा घेरा कि उन्हें जवाब तक नहीं सूझ सका। अकेले कोहली ही नहीं कांग्रेस के प्रवक्ता जय प्रकाश अग्रवाल भी लडख़ड़ा गए। नौसिखुआ पत्रकारों को इन दिग्गजों से सीखना चाहिए कि कैसे टीवी पत्रकारिता की जाए और कैसे डिबेट में शामिल वरिष्ठ पत्रकार संचालन कर रहे पत्रकार के साथ सही और तार्किक मुद्दे पर एकजुटता दिखाएं। पत्रकार इसी समाज का हिस्सा है। राजनीति, अर्थनीति और समाजनीति उसे भी प्रभावित करेगी। निष्पक्ष तो कोई बेजान चीज ही हो सकती है। मगर एक चेतन प्राणी को पक्षकार तो बनना ही पड़ेगा। अब देखना यह है कि यह पक्षधरता किसके साथ है। जो पत्रकार जनता के साथ हैं, वे निश्चय ही सम्मान के काबिल हैं।

Sanjaya Kumar Singh : आम आदमी पार्टी (अरविन्द केजरीवाल) नहीं होती तो दिल्ली का मुख्यमंत्री कोई मनोज तिवारी, जगदीश मुखी, विजय कुमार मल्होत्रा या स्मृति ईरानी हो सकता था। पर मोदी की दिल्ली रैली के बाद पार्टी को लगा कि बेहतर विकल्प की जरूरत है और किरण बेदी परिदृश्य में आईं। बेशक यह दिल्ली के लिए बेहतर विकल्प है। दूसरे संभावित उम्मीदवारों से अच्छी हैं। दिल्ली को लाभ हुआ है। भारतीय जनता पार्टी आम आदमी पार्टी से परेशान है। मोदी के नाम पर वोट मांगने की रणनीति बदलनी पड़ी। भाजपा को केजरीवाल से (बादल + चौटाला+पवार से भी) ज्यादा डर लग रहा है। यह अच्छी बात है। अरविन्द केजरीवाल के कारण ही हम देख रहे हैं कि संघ से बाहर का भी कोई व्यक्ति भाजपा का चेहरा बन पाया। और मोदी ही हर जगह भाजपा के चेहरा नहीं रहेंगे। यह भी अच्छी बात है, सकारात्मक है। अगर हम एक ईमानदार और अच्छी साख वाली ताकत बना सकें तो स्थापित राष्ट्रीय पार्टियां ईमानदार नए चेहरों को जोड़ने के लिए मजबूर होंगी। इस दबाव को बनाए रखने की जरूरत है। आप को समर्थन का मतलब है राष्ट्रीय दलों को जनता के प्रति अपना व्यवहार बदलने के लिए मजबूर करना।

Mukesh Kumar : केजरीवाल का कहना सही लगता है कि नरेंद्र मोदी ने अपनी नाक बचाने के लिए किरण बेदी को आनन-फानन में मुख्यंमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रोजेक्ट कर दिया है। अब अगर हारे तो ठीकरा बेदी के सिर फूटेगा और जीते तो कहा जाएगा मोदी बड़े रणनीतिकार हैं। लेकिन दिल्ली की हार मोदी एंड कंपनी के लिए बड़ी हार होगी और इसके ब़ड़े प्रभाव भविष्य की राजनीति पर देखने को मिलेंगे। आपको क्या लगता है, बेदी के कंधों पर रखकर बंदूक चलाने के इस प्रयोग से मोदी दिल्ली बचा पाएंगे?

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला, संजय कुमार सिंह और मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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दिल्ली चुनाव : भाजपा लगातार गल्तियां कर रही, ‘आप’ को 37 से 42 सीट मिलने के आसार

Girijesh Vashistha : My prediction- Aap 37-42 , Bjp 17-22, cong 5-7, others 2-3. Credit goes to last moment wrong decisions of BJP central leadership. Errors….

1. Wrong entry of kiran bedi and others.
2. Late ticket distribution
3. Aap support base ( much more strong then RSS)
4. Discouraging Attitude of kiran bedi.
5. Dragging campaign due to useless last moment changes in leadership and pole policies.

Peri Maheshwer : If AK wasn’t strong: Kiran Bedi would not find space in BJP. Shazia Ilmi will never be welcome in BJP. it will be Modi, Modi and more of Modi. we will have a rag of a CM in Delhi. petrol prices wouldn’t have been reduced today. Delhi statehood will not be on Modi’s agenda. corruption will not be an issue in politics. politicians will seek votes on caste and religion. We will be left with the alternative being Congress. Think. Hasn’t Arvind Kejriwal already made an impact?

Shambhunath Shukla : कमाल हो गया! एक्स डीजीपी किरण बेदी 15 जनवरी को बीजेपी में आईं और 20 जनवरी को वे मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित हो गईँ। इस लिहाज़ से कल को कोई एक्स सीएम बीजेपी ज्वाइन कर ले तो फट से पीएम घोषित कर दिया जाएगा। अमित शाह की यह फुर्ती तो मोदीजी के लिए भारी पड़ जाएगी।

Pankaj Singh : आदर्शवाद की आड़ में सबकी निगाहों से बच-बचकर फलने- फूलनेवाला अवसरवाद जब अपनी असली नीयत के साथ सामने आता है तो वह कितना घृणास्पद और वीभत्स दिखता है! (संदर्भ : शाजिया इल्मी तथा किरण बेदी की ‘ घर-वापसी’)

Deepak Sharma :  झुकती है दुनिया , झुकाने वाला चाहिए. चुनौती मुलायम और नितीश नही है …मोदी के लिए असली चुनौती केजरीवाल है. अराजक, नक्सल, बेख़ौफ़, बदमिजाज़. ताल ठोंकना, कुँए में कूदना , डंके की चोट पर भिड़ना और कहीं भी किसी भी वक़्त सामने वाले के कपडे उतार देना …ये कजरी बाबू की अदा नही कज़ा है. जो नेता क्रोनी कैपिटलिस्ट की गोद में बैठे है वो कजरी बाबू से वैसे ही घबराते है जैसे मुंबई के लम्पट बिल्डर छोटा शकील के फ़ोन से. क्या अजीब बात है कि जिसने पूरा देश जीता हो. जिसने लाल किला हर लिया हो. जिसने धरती पुत्र ओबामा से लेकर धवल ध्वजा धारी मोहन भागवत को जता दिया हो कि मोदी का मतलब क्या है …उसी चक्रवर्ती सम्राट को आज किरण बेदी के आगे झुकना पड़ा. मित्रों, बड़ी किरण बेदी नही हुई. बड़ा तो आज केजरीवाल हो गया. मोदी जानते है कि अगर कजरी दिल्ली “म्युनिसिपलटी” का मुख्य मंत्री बन गया तो उसे एक संवेधानिक ताकत मिल जाएगी. वो फिर से एक काडर खड़ा कर लेगा. वो फिर से अम्बानी और अदानी पर मुक़दमे ठोकेगा. वो नाक में दम कर देगा. और कहीं केजरीवाल ने पानी बिजली सस्ता करके दिल्ली दुरुस्त कर दी तो रायसीना के पहाड़ हिलने लगेंगे . शायद इसलिए अमित शाह किरण बेदी को लेकर मोदी के घर पहुंचे. शायद इसीलिए मोदी जी को मिसेज बेदी को हाथ जोड़कर प्रणाम करना पडा. ये पहली बार है जब प्रधानमंत्री मोदी किसी के आगे नतमस्तक हुए हैं. सुषमा, राजनाथ, गडकरी, जोशी और अडवानी के लिए अच्छी खबर. सात महीने में शाख झुकने लगी. अरे भाई शाख क्या, दुनिया भी झुकती है. झुकाने वाला चाहिए.

Satyendra Ps : अरविन्द केजरीवाल ने याद दिलाया तो मुझे याद आया, पता नहीं आपको याद हो या न हो। भाजपा ने 4 महीने पहले घोषणा की थी कि उसके 200 सांसद दिल्ली में प्रचार करेंगे। हवा निकल गई। फिर घोषणा की कि मंत्री प्रचार करेंगे, सिर्फ एक मंत्री अपने बयान से चर्चा में आईं, बकिया इनको भी सुनने पूछने वाला कोई नहीं आया। फिर नरेंद्र मोदी की मेगा रैली हुई। जैसा कि इन लोगों के प्रचार का तरीका होता है, 5 दिन पहले से खबरें आनी शुरू हो गईं कि ट्रैफिक किधर डायवर्ट किया जा रहा है, भीड़ कैसे मैनेज होगी। रैली के दिन हरियाणा और गाजियाबाद के कार्यकर्ताओ को जितनी भीड़ जुटाने का ठेका दिया गया उतनी ही भीड़ आई। किसी तरह कैमरों के क्लोज शॉट से आदमी दिखे, किसी। अखबार ने छापने लायक भीड़ की फोटो नहीं पाई। अब किरण बेदी, शाजिया इल्मी टाइप दगी क्या फुस्सकारतूस आजमा रहे हैं जिसमे से एक राजनीति में आने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थीं और एक हारती ही रहीं! दिल्ली की पब्लिक का रुख साफ़ ही नहीं हो रहा है!
 
Sanjaya Kumar Singh : अरविन्द केजरीवाल को चीजों को अपने पक्ष में करना आता है। कुछ दिन पहले मैंने लिखा था कि दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव के बाद ऐसा कुछ नहीं हुआ है जिससे आम आदमी पार्टी के नंबर कटें, बेहतर ही हुआ है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी अपने लोकलुभावन वादे को कितना सच कर पाई है, और करने के रास्ते पर है, इसे लेकर उसके नंबर कम ही होंगे, बढ़ेंगे नहीं। इस लिहाज से कांटे की टक्कर है। बर्खा दत्त से बातचीत में अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि पिछले चुनाव में उनकी पार्टी नई थी, उसे लोग गंभीरता से नहीं ले रहे थे। वोटकटवा समझ रहे थे। पर चुनाव परिणामों के बाद अब हमें गंभीर माना जा रहा है, जीतने वाली पार्टी माना जा रहा है। जनता मान रही है कि हम जीत सकते हैं। रही सही कसर भाजपा अपना डर और घबराहट दिखा कर पूरा कर दे रही है। किरण बेदी भाजपा में शामिल हो चुकी हैं। अरविन्द केजरीवाल से मुकाबले के लिए उनका नाम काफी समय से चल रहा है। अब यह सच होता दीख रहा है। इंदिरा गांधी से मुकाबला कर नाम कमाने वाली किरण बेदी अरविन्द केजरीवाल से लड़ेंगी। इससे कद तो अरविन्द का ही बढ़ेगा। राहुल से लड़ाकर स्मृति ईरानी का कद बढ़ाया गया अब केजरीवाल से भिड़ाकर किरण बेदी का कद घटाया जा रहा है। देखते रहिए बीजेपी की राजनीति। मजा आने की पूरी गारंटी है। किरण बेदी और अरविन्द केजरीवाल में कोई मुकाबला नहीं है। एक ने नौकरी शुरू में ही छोड़ दी दूसरे ने लगभग पूरी की, तमाम लाभ प्राप्त किए। दोनों में उम्र का अंतर भी इतना ही है। एक संघर्ष के लिए ही जाना जाता है दूसरे ने संघर्ष कोई नहीं किया और जो सेवा की वह एक्जीक्यूटिव क्लास का टिकट लेकर इकनोमी में यात्रा करके। दिल्ली का पुलिस प्रमुख नहीं बनाए जाने पर इस्तीफा तो दे दिया पर खुद से कम कई लोगों को बिना नाक रगड़े राज्यपाल बनाए जाने के कई मामलों के बावजूद मुख्यमंत्री की अपेक्षाकृत छोटी कुर्सी के लिए पार्टी की सेवा करने को तैयार हो गईं। (शायद इसलिए कि मुख्यमंत्री ना भी बनें तो राज्यपाल जैसे पद की रेवड़ी सुरक्षित रहे)। इसके बावजूद किरण बेदी के भाजपा में शामिल होने के बाद से यह तुलनात्मक चार्ट व्हाट्स ऐप्प पर घूम रहा है।

क्या इसे बनाने और फॉर्वार्ड करने वालों को मालूम नहीं है कि किरण बेदी ने कमिशनर न बनाये जाने की वजह से समय पूर्व रिटायरमेंट ले ली थी और केजरीवाल ने समाजसेवा के लिए कमिशनर (आईआरएस की ही) नौकरी छोड़ दी थी। लोकपाल न बना तो केजरीवाल ने सीएम की कुर्सी छोड़ दी किरण बेदी को सीएम की कुर्सी दिखी तो लोकपाल की चिन्ता छोड़ दी। राजनीति इतनी आसान नहीं है। इससे जुड़ी राजनीति समझने के लिए पढ़िए – http://www.janadesh.in/InnerPage.aspx?Story_ID=6686

Sheetal P Singh : कुछ तो हो रहा है, रजत शर्मा का चैनल भी केजरीवाल को ४२% पर मान रहा है और ABP news ने तो आज “आप” को बी जे पी से एक% से आगे मान लिया। Debate से भाग खड़ी हुईं मैडम. ABP न्यूज़ ने मुख्यमंत्री पद के दो घोषित प्रत्याशियों के बीच live debate का प्रस्ताव किया था। किरन बेदी ने यह कह कर टाला कि “डिबेट फ़्लोर आफ द हाउस पर होगी”! केजरीवाल ने न सिर्फ़ इसका स्वागत किया बल्कि दूसरे चैनलों या सारे चैनलों के सामने जंतर मंतर / रामलीला मैदान में खुले में जनता के सामने डेढ़ दो घंटे की खुली डिबेट प्रस्तावित की। बीजेपी में शामिल होने से कुछ दिन पहले से टेली मीडिया केजरीवाल के पूर्व सहयोगियों की ओर से स्वत: ढोल बजाने लगता है, “केजरीवाल की खोलेंगी पोल” …… पिछले साल भर बिन्नी पोल खोलते रहे, फिर आप के स्वयंभू संस्थापक सदस्य अश्विनी उपधिया पोल खोलते रहे, चौरसिया जी का चैनल, भाजपा और कांग्रेस के प्रवक्तागण पोल खोलते रहे अब कुछ नये पोल खोल विशेषज्ञ मोर्चे पर लाये गये हैं fairer sex की ओर से क्योंकि मर्द विशेषज्ञ कामयाब नहीं हो पाये थे, किसी भी सूरत में जनता को अपनी “आय” का हिसाब न देने वाली पार्टियों की ओर से खुलेआम चंदे से चल रही पार्टी के “पोलखोल” की प्रतीक्षा…. ७०००साल पुराने विमानशास्त्र की मौजूदगी से कम कौतूहलकारी नहीं है !

(”मोदी जी का यह ऐलान, सारा अखबार हमारा है” शीर्षक से उपरोक्त तस्वीर सोशल मीडिया पर खासा वायरल है और धन के बल पर दिल्ली चुनाव जीतने की भाजपा की मंशा का प्रतीक है)

सिद्धार्थ विमल : तिहाड़ से सबसे ज्यादा फरारी भी तभी कटी जब ईमानदारी की ताई आईजी तिहाड़ थीं. दिल्ली महानगर में एक बार फिर गंजे की हेयर कटाई के साथ-साथ उसे कंघा बेच डालने की पूरी तैयारी है। यह केश कलाकारी ईमानदारी के ताऊ और ताई के जिम्मे है।  उधर, विकास के पापा ने स्वास्थ्य बजट में सालाना छः हज़ार करोड़ रूपये की कटौती कर यह निश्चित कर दिया है कि जन्म ले चुकी आबादी का ज़िन्दा रह पाना और दुष्कर होता जाएगा। जीने की ज़िद पर अड़े निर्धन अब अपना घर-ज़मीन सब बेचने को बाध्य होंगे। बच गए तो उन्हीं खरीददारों की चाकरी करेंगे। भयानक होते जाते अच्छे दिन। 

Vivek Kumar : मोदी जी ने कह दिया है कि पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे खराब. केंद्र सरकार ने शिक्षा के बजट में भारी कटौती कर दी है. 2014-15 के बजट में शिक्षा के लिये पहले 16900 करोड़ रुपये का प्रावधान था, जिसे घटकर 13000 करोड़ रुपये कर दिया गया है.  यानी करीब 3900 करोड़ रुपये की कटौती कर दी गई है. इस कटौती का सबसे ज्यादा असर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी पर पड़ेगा, जिन्हें इस साल अपने-अपने कैंपस में जाना था. 2014-15 में सरकार ने 16 नए आईआईटी संस्थानों के लिए 2500 करोड़ रुपये दिए थे जो अब 2337 करोड़ रुपये कर दिए गए हैं.

Yashwant Singh : चुनाव तक दोस्त दोस्त ना रहा वाला गाना गाना चाहता हूं… चुनाव के दिनों में राजनीति पक्षधरता के मामले में मैं किसी तरह का कोई समझौता नहीं कर सकता. देश को मोदी के आगे की सोचने की जरूरत है. जनता ने देश को मोदी के हवाले कर दिया. अभी तक सिवाय बकलोली के कुछ किया नहीं इस उल्लू के पट्ठे ने. अगर इसी समय से मोदी के आगे की राजनीति और विकल्पों के बारे में नहीं सोचा गया तो हमारी अंधभक्ति देश समाज को बर्बाद कर देगी. कांग्रेस से मुक्ति मिली है, बहुत अच्छी बात है. लेकिन देश को मोदी और भाजपा की कांग्रेसी किस्म की घटिया टुच्ची सांप्रदायिक और पूंजीपति परस्त राजनीति से भी मुक्ति मिलनी चाहिए. मोदी को तो मौका है पांच साल पूरा खेलने खाने के लिए. पर मोदी पर लगाम के लिए एक केजरीवाल बहुते जरूरी है दोस्त. मोदी को देश दे दिया. केजरी को सिर्फ लूली-लंगड़ी दिल्ली का राजपाठ दो. ये बंदा मोदी को ऐसी उंगली करता रहेगा कि मोदिया बाप बाप चिल्लाएगा कि इ केजरिया न जीने दे रहा है न मरने. समझदार प्रजा जनता वही होती है जो अपने नेताओं को सत्ता देकर उन पर अंकुश लगाना भी सीखे. वैसे भी लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष की अवधारणा है ताकि सत्ता पक्ष तानाशाही की ओर न अग्रसर हो सके, लगाम लगा रहे. संतुलन बना रहे. नजर हर एक की कायम रहे. इस देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए केजरीवाल जैसे क्रांतिकारी को दिल्ली का राजपाठ सौंपना है. अब अगर आपको कुछ दिख नहीं रहा , कुछ समझ में नहीं आ रहा है तो मैं यही कहूंगा का बहुते अंधभक्त हो रे… लगता है नमउवा से कउने बहुते गहराता नाता है रे…

कानाफूसी ये भी है कि केजरीवाल ने खुद किरण बेदी और शाजिया इल्मी को भाजपा में घुसाकर प्लांट किया है। संघियों भाजपाईयों की बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी जो कांग्रेसी कल्चर की तरह चुनाव के बीच पैराशूट लैंडेड कैंडिडेट को टिकट दे रहे हैं और इन्हें cm – minister बनाने का प्रलोभन दे रहे हैं। बेचारे भाजपा कार्यकर्ता, अब कैसे कहेगा की अलग चाल चेहरे चरित्र वाली पार्टी है उनकी। केजरीवाल फोबिया से ग्रस्त मोदी की बुद्धि गड़बड़ा गयी है और कजरी के ट्रैप में फंसते जा रहे हैं। सत्ता में आकर मोदी ने जो गडित खेलना शुरू किया है वो कांग्रेसी दिनों की याद दिला रही है। किरण और शाजिया को भाजपा में शामिल करना ज्वलंत उदाहरण है। तो मानना पड़ेगा कि केजरीवाल के भय में भाजपा अब कांग्रेस हो गयी है.

Surbhi Sondhi : Bhagora Kiran bedi Special… Delhi Assembly Polls 2015: Dear BJP, does Kiran Bedi’s past as a bhagora not matter? Kiran Bedi’s past is so full of many U-turns, controversies, spats with seniors, courts, lawyers and outbursts against Narendra Modi that an entire issue of Charlie Hebdo could be dedicated to satirizing her career.

Her opinion on Modi, before she inexplicably (or was it part of a political strategy?) changed her mind is well known, courtesy her tweets. Till a few months before Modi became the PM — a fact that must have inspired Bedi to rearrange her thoughts and realign her political philosophy — she was continuously attacking him for the Gujarat riots.

In March, Bedi tweeted: “One day NaMo will need to respond with clarity about riots massacre. Despite Courts clearing him so far.”

And in April 2012, she has argued that Modi may have passed the SIT exam but was yet to clear the test of ‘prevailing perception of serious incidents’ under his watch.
But, hey, now that the BJP desperately needs somebody to take on Arvind Kejriwal, all such past sins are forgiven.

The public spotlight that comes with an election may be less merciful. Now that she has taken the plunge into politics, Bedi will have to undergo a serious scrutiny of her career, persona and politics. There may not be Charlie Hebdo cartoons, but there will be uncomfortable questions.

Why was Bedi, for instance, bypassed for the post of Delhi’s police commissioner? And why was she not found suitable for a filed posting after being reprimanded by an enquiry committee for ordering a lathi charge on lawyers?

In July 2007, Bedi proceeded on a three-month ‘protest leave’ when she was overlooked for the Delhi commissioner’s post. Bedi claimed she was a victim of gender bias, and declared that she was weighing all ‘options including legal’. She instead suddenly changed her mind, cancelled her leave, resumed office and finally applied for voluntary retirement. The government accepted her application and relieved her immediately.

गिरिजेश वशिष्ट, पेरी महेश्वर, शंभूनाथ शुक्ल, पंकज सिंह, दीपक शर्मा, सत्येंद्र पीएस, शीतल पी. सिंह, सिद्धार्थ विमल, विवेक कुमार, यशवंत सिंह और सुरभि सोंधी के फेसबुक वॉल से.

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अटल जी की पार्टी आज संसद को धता बताकर एक के बाद एक दस अध्यादेश जारी कर रही है

Mukesh Kumar : संसद सजावट की वस्तु है? तेईस-चौबीस साल पहले एक दूरदर्शन के लिए एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी-संसद से सड़क तक। ये फिल्म बीजेपी और दूसरे विपक्षी दलों द्वारा संसद की कार्रवाई को हफ़्तों तक ठप करने को लेकर थी। उस समय पंडित सुखराम के टेलीकॉम घोटाले की गूँज चारों ओर थी और विपक्षी दल उत्तेजित थे। इस फिल्म के लिए मैंने भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का लंबा इंटरव्यू किया था, जिसमें उन्होंने संसद के बहिष्कार को जायज़ ठहराते हुए कहा था- संसद कोई सजावट की, प्रसाधन की वस्तु नहीं है।

आज उनकी पार्टी संसद को धता बताकर एक के बाद एक दस अध्यादेश जारी कर रही है। उसने सचमुच में संसद को प्रसाधन की वस्तु बना दिया है। ये परंपरा भी उसने मनमोहन सरकार से ही ग्रहण की है, क्योंकि उसने भी इसी तरह अध्यादेश-राज कायम कर रखा था। संसद को इस तरह से बाईपास करना बढ़ती निरंकुशता का द्योतक है। क्या इस निरंकुशता का कोई इलाज है हमारे पास?

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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दिल्ली विधानसभा चुनाव एफएम रेडियो पर : भाजपा की बुजुर्ग महिला का जवाब खुद केजरीवाल ने यूं दिया

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली विधानसभा चुनाव एफएम रेडियो पर अच्छा चल रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने रेडियो पर एक विज्ञापन चलाया जो इस प्रकार है, “गलती मेरी ही थी। आम आदमी, आम आदमी कहकर धोखा दे दिया। बड़े-बड़े वादे। पानी मुफ्त कर देंगे। आंसू दे गया। घर के काम छोड़कर उसके लिए मीटिंग करवाई, मोहल्लों में। पर बदले में क्या मिला। सब छोड़कर भाग गया। इनके अपने आदमी तक चले गए। गैर जिम्मेदारी का बदला लेंगे। अब इस नाकाम आदमी को वोट न देंगे। पूर्ण बहुमत से बदलें दिल्ली के हालात। चलो चलें मोदी के साथ।”

इसका जवाब अरविन्द केजरीवाल की आवाज में आ रहा है। रेडियो विज्ञापन में वे कहते हैं, “मैंने एफएम रेडियो पर एक बुजुर्ग महिला की आवाज सुनी। बहुत दुखी नजर आ रही थीं क्योंकि उन्होंने मुझे वोट दिया और मैंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उन्हें लगा, मैंने उनके वोट का सम्मान नहीं किया। आज मैं उन्हीं से मुखातिब हूं। मैं उन्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि माताजी, मैं कहीं भाग के नहीं गया कुछ ही दिनों में पूर्ण बहुमत लेके आपकी सेवा में फिर आ रहा हूं। आप अपना विश्वास बनाए रखिए। ना तो आपका वोट व्यर्थ गया ना आपका परिश्रम। कमी रह गई थी तो कुछ सीटों की आप विश्वास और आशीर्वाद बनाए रखिए हम पूर्ण बहुमत लेकर आपकी सेवा करने पूरे पांच साल के लिए फिर से वापस आ रहे हैं। आप नाराजगी छोड़िए, थोड़ा मुस्कुरा दीजिए।”

इसके अलावा, भाजपा और उसके सहयोगियों ने जो वोटबटोरू मुद्दे उठाए हैं (जीन्स पहनने, महिलाओं की नौकरी, लव जेहाद, गोड्से की मूर्ति) उनका मजाक उड़ाने वाला एक विज्ञापन आम आदमी पार्टी की ओर से आता है। हालांकि इसमें भाजपा का नाम नहीं लिया गया है। भाजपा के ज्यादातर विज्ञापन आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल को लक्ष्य करते हैं। मुद्दे उसके पास हैं नहीं या उन्हें अभी सामने नहीं ला रही है पर अभी जो तीर दागे जा रहे हैं उसका एक और नमूना देखिए…

“कुछ ना था वो। चार दिन की चांदनी दिखाकर भाग गया। तुम खुद सोचो, जो अपने लालच के लिए एक बार जनता का विश्वास तोड़ सकता है वो दोबारा क्या ऐसा नहीं कर सकता? मगर भाई … … अरे तू रहने दे। सरकारी बंगला ठुकराने के बाद बंगला ले लिया… गाड़ी ठुकराने के बाद वो भी ले ली। जो अपने वादों पर ना टिका वो अपने विश्वास पर क्या खाक टिकेगा? ऐसी बचकानी हरकत करने वाले को तू चाहता है कि मैं वोट दूं। बात करता है। पूर्ण बहुमत से बदलें दिल्ली के हालात। चलो चलें मोदी के साथ।”

देखना है जनता नाराजगी छोड़कर मुस्कुराती है या मुस्कुराते हुए मोदी के साथ चली जाती है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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तो IIT दिल्ली के प्रमुख रघुनाथ शिवगाँवकर ने इसलिए दिया इस्तीफा

Satyendra Ps : भाजपा और संघ के लुटेरे किसी भी सही आदमी को रहने नहीं देंगे। सुब्रहमन्यम स्वामी 1972 और 1991 के बीच पढाए का मेहनताना 70 लाख रुपये देने के लिए IIT दिल्ली के प्रमुख रघुनाथ शिवगाँवकर पर दबाव बनाए हुए थे। पढ़ाते क्या होंगे पता नहीं लेकिन केन्द्रीय संस्थानों में भुगतान को लेकर कोई दिक्कत नहीं होती, सब जानते हैं! साथ ही रघुनाथ से कहा जा रहा था कि सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट अकादमी खोलने के लिए iit कैम्पस में जगह दी जाए!

पढ़ाने का सबूत देने पर iit भुगतान देने को तैयार भी था! सबूत न दिखाने पर डायरेक्टर को कैग पकड़ता! iit परिसर में तेंदुलकर के गिल्ली डंडा को iit डायरेक्टर बिलकुल राजी न थे! आखिरकार उन्होंने इस्तीफा दे दिया। अब आज कच्छा बनियान गिरोह आरोप लगा रहा है कि विदेश में अवैध कैम्पस खोल रहे थे iit डायरेक्टर! ये गिरोह सोचता था कि गीदड़ भभकी देकर रघुनाथ से 70 लाख रूपये ऐंठ लेगा लेकिन उन्होंने इस्तीफा दे दिया!

अब स्वामी मानव संसाधन विकास मंत्री बन सकते हैं। वजह ये कि एम्स में दवा की दलाली पर अंकुश लगाने वाले संजीव को दवा कम्पनियों के दलाल (ब्रोकर या डीलर कहें सम्मान में) जेपी नद्धा के कहने पर हटाया गया। फिर नद्धा केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री बने। अब स्वामी की बारी है! देखते जाएं कि ये आरएसएस सरकार 5 साल में आम लोगों और उनके संस्थानों की क्या गति करती है!

अब तेंदुलकर कह रहे हैं कि मैंने कोई क्रिकेट अकादमी खोलने का प्रस्ताव नहीं किया! अगर iit जमीन दे देता तो महीन मुस्कुराते चले आते! आरएसएस भी चितपावन दबंगई दिखाने में कामयाब हो जाता! बहुत शातिर हैं सब।! संघी जो तर्क दे रहे हैं लचर है। अगर iit निदेशक चोर है और बचने के लिए इस्तीफा दिया तो क्या कच्छा बनियान गिरोह सरकार इस्तीफे के बाद जांच नहीं कराएगी? लेकिन भक्ति का चश्मा मोटा होता है।

पत्रकार सत्येंद्र प्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से.

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6 मिनट में 41 गाली बकने वाला BJP का MLA

..प्रह्लाद गुंजल को नहीं जानते? ये वैसे ही है जैसे पंखा चलाते हैं और पीएसपीए नहीं जानते। बीजेपी के पीएसपीओ। ऊपर से पार्टी सत्ता में है। तो दिसंबर की सर्दी में भी पारा जून की दोपहरी वाला था। सरोकार, संस्कार, धर्म, पूजा, वंदना, आराधना वाली भारतीय जनता पार्टी के विधायक श्री प्रह्लाद गुंजल मां-बहन-बेटियों के साथ ऐसे धारा प्रवाह संबंध बनाए जा रहे थे जैसे सत्यनारायण की कंठस्थ कथा का सस्वर वाचन कर रहे हों। ..

..मुंह मत बिचकाइए। गाली, धमकी, गलीजपन ये सब तो पीएम मोदी वाली पार्टी के विधायक जी ने अमृत समझकर दिल ही में उतार लिया था। एहसान है जो अमरत्व का जल फोकट में सीएमएचओ पर उलीचे जा रहे थे। ऐसा तेज तो पवन पुत्र हनुमान के अंदर भी न रहा होगा। सुमेरू पर्वत उठा लिया था तो क्या हुआ। 6 मिनट में 41 गाली..आप रिकॉर्ड पता कर लीजिएगा। माइकल शुमाकर इतनी तेजी से फॉर्मूला वन की कार नहीं दौड़ा पाता होगा।

..समय समय की बात है। नेता अब विद्वान नहीं पहलवान होना चाहता है। हर जगह की यही कहानी है। सिनेमा के डायलॉग पर हंसी न आए तो ये बात सोलह आने सच है कि थप्पड़ से डर नहीं लगता साहब विधायक से लगता है।..

..भतीजे तो तमाम हुए दुनिया में। आगे भी होंगे। द्वापर में धर्मराज युधिष्ठिर के भतीजे हुए। त्रेता में भरत-शत्रुघ्न के भतीजे हुए। द्रोणाचार्य और यागवल्क्य जैसे मुनियों के भतीजों का भी उल्लेख मिलता है। लेकिन ऐसा भतीजा किसी का नहीं हुआ जैसा समाजवादी पार्टी के विधायक बृजलाल सोनकर का हुआ। सत्ताधारी पार्टी का विधायक का भतीजा होना सारे भतीजो से खास होता है। विधायक का भतीजा भतीजा नहीं होता भगवान हो जाता है। और जैसे भगवान पर कोई सवाल नहीं उठा सकता वैसे विधायक जी के भतीजे पर भी कोई नहीं उठा सकता। ..

न्यूज24 पर रात 7.57 बजे प्रसारित रिपोर्टों के कुछ हिस्से. साभार, नवीन कुमार के फेसबुक वॉल से.

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वरिष्ठ पत्रकार अभय दुबे ने जी न्यूज और इसके एंकर रोहित सरदाना को लाइव ही धो डाला

जी न्यूज, इंडिया टीवी और इंडिया न्यूज जैसे न्यूज चैनलों की भाजपा परस्ती और मोदी स्तुति किसी से छिपी नहीं है. इसी कारण इन तीनों न्यूज चैनलों का आम आदमी पार्टी के प्रति भयंकर घृणा भी जग जाहिर है. ये तीनों न्यूज चैनल समय-समय पर केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को बदनाम करने के लिए फर्जी स्टिंग से लेकर फर्जी न्यूज एंगल और फर्जी प्रोग्राम तक बनाने पेश करने से नहीं चूकते. इसी क्रम में जी न्यूज ने अभी बीते कुछ दिनों पहले केजरीवाल को निशाने पर लिया. चूंकि अब दिल्ली में विधानसभा चुनाव नजदीक है इसलिए सारे भाजपा पोषित न्यूज चैनल केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को बदनाम करने में जुट गए हैं.

मजेदार यह रहा कि जी न्यूज पर केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को बदनाम करने के लिए जिस प्रोग्राम / डिबेट को आयोजित किया गया, उसमें वरिष्ठ पत्रकार अभय दुबे ने जी न्यूज और एंकर रोहित सरदाना को ऐसा धोया कि सब सकते में रह गए. अभय दुबे खरी खरी और जनता की बात कहने के लिए जाने जाते हैं. इस पूरे प्रकरण पर फेसबुक पर Sarvapriya Sangwan ने जो लिखा है, उसे पढ़िए और उसके बाद दिए गए वीडियो लिंक को क्लिक करके वीडियो चलने के पांच मिनट बाद के टाइम से शुरू करिए.

Sarvapriya Sangwan : अभय दुबे, एंकर रोहित सरदाना से : “हर आदमी एक बौद्धिक प्लेट सजाता है अपनी। आपने जो प्लेट सजा रखी है, जिस तरह से आप इंट्रो देते हैं अपना, वो प्लेट एकतरफा है। इसलिए आपके कार्यक्रम में आम आदमी पार्टी का प्रतिनिधि नहीं आता। अपनी आलोचना किसी को पसंद नहीं आती है। आपकी आलोचना मैं कर रहा हूँ। मैं चौथी पांचवी बार आपके इस कार्यक्रम में आया हूँ। आप जिस तरह से इस कार्यक्रम को बनाते हैं, उसमे आप लोगों की कोशिश ये होती है कि भई आते ही हम सबसे पहले भाजपा को इस देश की सर्वश्रेष्ठ पार्टी घोषित कर दें और दिल्ली की राजनीति को जीता हुआ घोषित कर दें। नंबर २, आम आदमी पार्टी देश की सबसे घटिया पार्टी है उसे ज़मीन खोद कर दफ़न कर देना चाहिए। आपको पूरा अधिकार है की आप भाजपा को सबसे अच्छी पार्टी मानें। आपको पूरा अधिकार है की आप मानें कि आम आदमी पार्टी एक ख़राब पार्टी है। लेकिन इन दोनों मान्यताओं को प्रोसेस करने के कुछ journalistic ethics हैं। आप कुछ तो लाज शर्म रखिये, कुछ तो ऐसा कीजिये कि लगे कि आप निष्पक्ष हैं। आम आदमी पार्टी की साख बाद में गिरेगी, पहले आप की गिरी जा रही है। आपने इनका पूरा परिचय नहीं दिया। आप भाजपा के सदस्य को आम आदमी पार्टी का संस्थापक बता रहे हैं। आप ये नहीं बता रहे कि उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली है अब।”

संबंधित वीडियो लिंक…

https://www.youtube.com/watch?v=0sGAslVGCgI

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इतनी खुली दलाली 56 इंच के सीने से ही मुमकिन है…

Sheetal P Singh : देखिये ब्रिटिश कंपनी वोडाफ़ोन को कौन मदद कर रहा है 4000 करोड़ गपकने में. इतनी खुली दलाली 56 इंच के सीने से ही मुमकिन है.

Yogendra Yadav : The Modi government’s top law officer Attorney General Mr Mukul Rohatgi has committed a gross impropriety by advising the Income Tax department not to file an appeal against the Bombay High Court judgment, which ruled that telecom company Vodafone was not liable to pay Rs 3,200 crore tax.

Mr Rohatgi, who as a private lawyer had appeared for Vodafone in May 24, 2012 in the Supreme Court should have recused himself from tendering an opinion in favour of the same company as the government’s top law officer. It is beyond any reasonable understanding that when the IT department wants to file an appeal in the Supreme Court for recovery of taxes from this British telecom company and the Solicitor General Mr Ranjit Kumar endorsed the department’s view, why did the finance ministry seek Mr Rohatgi’s opinion ?

It is equally surprising that Mr Rohatgi did not disclose his conflict of interest and went ahead to tender an opinion which favours Vodafone, his client in the past. The Aam Aadmi Party would like to know from the Narendra Modi government whether it will allow such conflict of interest of its highest law officer to trump public interest and the interest of tax revenues of the country ?

The Modi government also seems to be moving in the direction of the previous UPA government, which tried to undo its own amendment passed in parliament to help Vodafone escape its tax liability. The very argument that such moves will send a positive signal to foreign investors is a flawed logic, since helping global giants to escape tax liabilities in India will not prove beneficial for the Indian industry.

Arm twisting tax authorities by dishonest means will only prove counter-productive and will discourage clean investors from choosing India as a destination. The AAP demands that the Modi government should ignore Rohatgi’s opinion and proceed in consonance with the IT department’s view, which wants to challenge the October 10 judgment of the Bombay High Court. (ENDS)

Regards.
AAP Media Cell

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह और आम आदमी पार्टी के नेता योगेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

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कुछ मीडिया घराने बीजेपी के दलाल बन गए हैं : ममता बनर्जी

दुर्गापुर। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ बेबुनियाद खबरें दिखाने को लेकर मीडिया पर हमला किया। एक रैली में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष बनर्जी ने कहा कि जिस तरह खाने की सामग्री बेची जाती है, उसी तरह मेरी सरकार के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण गलत खबरें बेचना एक नया व्यापार बन गया है।

उन्होंने आरोप लगाया कि जिस तरह अच्छी और नकली दवाइयां होती हैं। उसी तरह अच्छा और गलत मीडिया भी होता है। कुछ मीडिया घराने बीजेपी के दलाल बन गए हैं। बनर्जी ने ये भी कहा कि हमने दुर्गापुर में हेलीकॉप्टर सेवा शुरू की है लेकिन कुछ मीडिया घरानों को इस बारे में कोई सूचना नहीं है। साथ ही बनर्जी ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर हम चाहें तो हम अनुचित कार्यों में लिप्त मीडियाकर्मियों का पर्दाफाश भी कर सकते हैं। वहीं उन्होंने केंद्र सरकार पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि व्यक्ति कुछ लोगों को कभी कभी मूर्ख बना सकता है लेकिन एक व्यक्ति हर बार मूर्ख नहीं बना सकता।

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दिल्ली में ‘आप’ अबकी पचास सीटें ले आएगी!

Jawahar Goel : कल के दिन हेयरकट करवाने की दुकान पर लोगों की चर्चा सुन रहा था। नाईयों का बहुत मज़बूती से ‘आप’ को पचास सीटें आने का दावा सुना। भाजपा यदि अपने वोटरों को वोट के दिन बाहर निकाल नही पाई तो केजरीवाल जी की ताजपोशी निश्चित है।

जी ग्रुप के मालिकों में से एक जवाहर गोयल के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ चुनिंदा कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Sarjana Sharama : Voters are secondary sir first of all delhi bjp leaders have to stip being aatam mugadh . They have to stop pulling each others legs and show ekjutta.
 
Sanjaya Kumar Singh : आम आदमी पार्टी ने पिछली बार सीटों की संख्या से सबको चौकाया था, इस बार उसे सिर्फ थोड़ी और मेहनत करनी है, अभी तक तो मुझे सही दिशा में बढ़ते लग रहे हैं। आप सही कह रहे हैं।
 
DrAmit Tyagi : Abhi log chamatkrat hain sir….main iske vipreet sochta huin
  
Pawan Kumar Bhoot : Aap will be below 20
   
Ishu Tyagi : सर पहले 70 प्रतियाशी निकलने मे मुसीबत हे ।। फिर कार्यकर्ता को मानाने में ।। फिर कही वोटर की बात आती हे ।।। विधान सभा चुनाव की तयारी कुछ नहीं हे खली टिकट की दावेदारी हे ।।।
    
Ramesh Paandey : Red -tapism in BJP may cause loss of Seat in New Delhi Assembly.
    
Shekhar Agrawal : Sorry. I do not agree.
    
Anuj Tripathi : 23 से 24 नही हो सकती।।
    
Yashwant Singh : पर एक तथ्य ये भी है कि पिछली बार बीजेपी के सपोर्टर पूरी तरह केजरीवाल के साथ थे और बड़े वोकल थे. इस बार ये बीजेपी सपोर्टर पूरी तरह केजरीवाल के खिलाफ हैं और केजरी विरोधी माहौल गढ़ रहे हैं. ऐसे में केजरी टीम को भी मोदी माहौल के बीच पिछली बार से ज्यादा सीट ला पाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी…. इतना आसान नहीं है केजरी का दिल्ली में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ पाना… मुझे अबकी ज्यादा शक है, पिछली बार मुतमइन था…
    
Devendra Yadav : नाई और चाय-पान की दुकानें “प्रीपोल सर्वे” की वे जगहें होती हैं जिसकी अनदेखी अभी तक मीडिया तबका करता आया है।अक्सर मीडिया द्वारा राय ऐसे लोगों से ली जाती है जो देश का “अनिर्णायक मध्यवर्ग” कहलाता है।यही कारण है कि मीडिया के चुनावी अनुमान अधिकांशतया गलत साबित होते हैं।
    
Jambu Chopra Jain : pichla record bhi kayam rakh le “Aap” to bhut badi baat hogi,
    
Saurabh Dwivedi : भाजपा के सामने यही समस्या रही है कि वह अपने वोटर नहीं निकाल पाती है आपका चिंतन सही है अगर भाजपा किरण बेदी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर दे तो चुनाव एकतरफा जीत सकते हैं
    
संतोष उपाध्याय : थोड़ा कठिन ही होगा इस बार केजरी को। यशवंत जी से पिरन सहमत हूँ। वैसे जवाहर सर , दिल्ली में अक्सर लोग डालते ही हैं। जागरूकता हैं अभी इस प्रदेश में। बस यहाँ , यदि केजरी जी के साथी , थोड़ी ढंग से मेहनत कर गए , तो कुछ भी संभव है।
 
DrAmit Tyagi : Right Saurabh…KIran bedi will ruin all equations of opposite parties
 
Abhi K Sharma किरण बेदी पर निर्णय न हो पाना बताता है कि कुछ काला है दाल में..
  
Rajesh Jha saurav ji aap sahi hai. Kiran Bedi ka naam ho. jaise MODI Ji ka naam jaruri tha.
   
Tirlok Bansal दिल्ली का वोटर upper and lower में divided है। bjp को बहुत मेहनत करनी होगी ।

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अमिताभ सिन्हा आजतक छोड़ आईबीएन7 पहुंचे, तुषार बनर्जी ने ‘बीबीसी’ और अभिषेक ने ‘खबर मंत्र’ छोड़ा

आजतक में कई वर्षों से कार्यरत पत्रकार अमिताभ सिन्हा ने दुखी मन से इस्तीफा दे दिया है. चर्चा है कि अमिताभ खुद की उपेक्षा से नाराज थे. पिछले तीन वर्षों से उनको प्रमोशन नहीं दिया गया था. वे भाजपा बीट कवर करते थे और नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू ले पाने में टीवी टुडे ग्रुप से अमिताभ सिन्हा ही सफल हो पाए थे. बताया जाता है कि नरेंद्र मोदी ने खुद इच्छा जताई थी कि वो अगर टीवी टुडे में किसी को इंटरव्यू देंगे तो वो अमिताभ सिन्हा होंगे.

अमिताभ सिन्हा ने जब अपना इस्तीफा चैनल प्रबंधन को भेजा तो कली पुरी से लेकर सुप्रिय प्रसाद तक उन्हें मनाने में जुट गए. भाजपा इन दिनों सत्ता में है और भाजपा बीट पर अमिताभ सिन्हा अच्छी पकड़ रखते हैं, इसलिए उन्हें खोने के लिए चैनल प्रबंधन तैयार न था. लेकिन अमिताभ सिन्हा नहीं माने. उनकी पहले ही बात आईबीएन7 में हो गई थी. उन्होंने राजनीतिक संपादक पद पर आईबीएन7 ज्वाइन किया है.

बीबीसी हिंदी आनलाइन में कार्यरत पत्रकार तुषार बनर्जी ने इस्तीफा दे दिया है. वे राघव बहल के नए लांच होने वाले आनलाइन न्यूज वेंचर के हिस्से हो गए हैं. तुषार ने बनारस स्थित बीएचयू से पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद कई संस्थानों के साथ कार्य किया. न्यूज और टेकनालजी की बेहतरीन समझ रखने वाले तुषार ने बीबीसी में कार्य के दौरान कई बड़ी खबरें ब्रेक की. बीबीसी में हुए विदाई समारोह के बारे में तुषार बनर्जी अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं: ”Big thanks to wonderful souls at the BBC for organising this lavish send-off…..My stint has been truly enriching and has helped me transform into a more professional individual. I will miss my office, colleagues, and those readers’ mails where I often got mentioned….But to move on is life….A short break awaits me before I take up the new responsibility at a newer place…Blessings awaited 🙂 ”

रांची के अखबार ‘खबर मंत्र’ से सूचना है कि अभिषेक कुमार राय ने सब एडिटर पद से रिजाइन दे दिया है. उन्होंने इस्तीफा देने के बाद अखबार के अंदर की तस्वीर को मेल के जरिए उजागर किया है. उन्होंने लिखा है कि एक बिल्डर अखबार का संपादक बनकर वहां अपने काले ब्लैक कारनामों को वाइट करने में जुटा है. चिरौंदी की जमीन, उसके द्वारा रैयतों को दिया गया चेक और उसमें गड़बड़ी, जमीन मामले में उनकी कंपनी को बचाने के लिए अखबार का यूज किया गया. जब सारा कुछ सध गया तो वे खुद संपादक बन बैठे हैं. अब वहां का माहौल काम करने लायक नहीं रहा है इसलिए प्रतिष्ठा के साथ वे बाहर आए गए, अपना त्यागपत्र देकर. अभिषेक ने लिखा है कि खबर मंत्र अब जी-हजूरी करनेवालों का दरबार बन गया है.

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गाजीपुर से तीन खबरें : बाजरा बनाम डाई, गो तस्कर बनाम भाजपा नेता, मंत्री बनाम ठाकुर साहब

Yashwant Singh : गाजीपुर से तीन खबरें सुना रहा हूं. पहली खेती किसानी की. बाजड़ा पिछले साल 1100 रुयये क्विंटल था, इस साल 900 रुपये हो गया है. वहीं, डाई खाद का दाम 600 रुपये बोरी से बढ़कर 1150 रुपये हो गया है. कितनी तेज देश तरक्की कर रहा है और कितना तेज गांवों किसानों का विकास हो रहा है, इसकी ये एक बानगी है. ये जानकारी मुझे पिताजी ने दी, चिंतिंत लहजे में ये कहते हुए कि ”अब खेती-किसानी में कुछ रक्खा नहीं है”.

दूसरी खबर गाजीपुर जिले के गहमर के आसपास की है. यहां एक युवा उत्साही भाजपाई कार्यकर्ता ने लगातार कई रात गाय लदे कई ट्रकों को रुकवा कर पकड़ा और पुलिस के हवाले करवा दिया. भाजपा ने इनके समर्पण को देखते हुए इन्हें गोरक्षा प्रकोष्ट का अध्यक्ष बना दिया और पुलिस ने इनके खलल करने की क्षमता को देखकर गो-तस्करों से कह दिया कि प्रति ट्रक सौ रुपया इस जोशीले नेताजी को देते रहो वरना ये मानेगा नहीं. इस तरह से इलाके में सब कुछ फिर रुटीन में आ गया है. ये जानकारी मुझे गहमर इलाके के एक सोशल एक्टिवस्ट मित्र ने दी जो कल भड़ास आश्रम पर मुझसे मिलने आए थे.

तीसरी खबर गाजीपुर शहर कोतवाली की है. एक ठाकुर साहब अपनी बाइक खोने की रिपोर्ट लिखाने गए तो कोतवाल ने कहा कि इस महीने क्राइम ज्यादा घटित हुआ है, सो क्राइम कम शो करने के लिए आपकी रिपोर्ट अगले महीने लिखूंगा. ठाकुर साहब अड़ गए और कोतवाल को समझाने लगे कि तुम्हारा क्राइम कम करने का ये तरीका सही नहीं है. तभी ठाकुर साहब ने देखा कि कोतवाली के बाहर दो गुट लड़भिड़ कर आए हुए हैं रिपोर्ट लिखाने पर रिपोर्ट लिखी नहीं जा रही. ठाकुर साहब ने इनकी रिपोर्ट लिखाने की जिम्मेदारी भी खुद ले ली. कोतवाल से बहस होती रही. तभी एडिशनल साहब आ गए. एडिशनल एसपी से ठाकुर साहब ने कोतवाल की शिकायत की और साहब के कहने पर कोतवाल को मजबूरन दोनों रिपोर्ट लिखनी पड़ी. बाद में पता चला कि दो लड़े भिड़े लोगों की रिपोर्ट इसलिए नहीं लिखी जा रही थी क्योंकि मंत्री जी ने कोतवाल को रिपोर्ट न लिखने का आदेश दे रखा था. मंत्री जी तक जब सूचना पहुंचाई गई कि फलां ठाकुर साहब के एडिशनल साब से शिकायत करने के कारण रिपोर्ट लिखनी पड़ी है मजबूरी में तो मंत्री साहब ने ठाकुर साहब को सबक सिखाने के वास्ते ठाकुर के खिलाफ ही इतनी धाराओं में फर्जी रिपोर्ट लिखने को कह दिया कि ठाकुर साहब को जेल जाना पड़े. कोतवाल ने बिलकुल देर नहीं की. बाहर जो दो पक्ष लड़े भिड़े थे, उसमें जो मंत्री जी समर्थित पक्ष था, उससे एक फर्जी कंप्लेन ठाकुर साहब के खिलाफ लिखवा ली गई और उसी आधार पर बलवा, महिला छेड़छाड़ समेत कई आरोपों में ठाकुर साहब के नाम एफआईआर हो गई. फिलहाल ठाकुर साहब गिरफ्तार तो नहीं हुए हैं लेकिन मामला सल्टाने में लगे हैं. मंत्री जी का नाम पंडित बिजय मिश्रा हैं जो वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र के भतीजे हैं और ठाकुर साहब का नाम चंद्रशेखर सिंह हैं जो लखनऊ विवि से एलएलबी हैं, छात्र नेता भी रहे हैं और काफी समय से गाजीपुर में अपना बिजनेस व्यवसाय कर रहे हैं.

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गाजीपुर में हुए ग्रामीण पत्रकार प्रशिक्षण समारोह में जब मैं मीडिया के भ्रष्टाचारियों को गरियाकर मंच से नीचे उतरा तो एक मित्र ने कान में कहा- ऐतना गरिया दिए हैं, कउनो अखबार अपनी कवरेज में आपका नाम भाषण नहीं छापेगा. तब मैंने कहा- भइया, अपना नाम भाषण छापने छपवाने का एतना ही शउक रहता तो हम सांप के बिल में काहे को हथवा डालते. Bhadas4media.com की शुरुआत करते वक्त यह कतई नहीं पता था कि एक दिन इस काम के कारण मेरा नाम होगा. सो, वही फिदाइन आस्था, आत्महंता प्रेरणा अब भी कायम रखता हूं जो भड़ास शुरू करते वक्त था. ग्रामीण पत्रकार प्रशिक्षण समारोह की उपर वाली तस्वीर Kripa Krishna के सौजन्य से.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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कैग का कहना है कि कांग्रेस सरकार की मदद से वाड्रा ने एक झटके में 44 करोड़ कूट लिए

Om Thanvi : देश के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) का कहना है कि कांग्रेस सरकार की मदद से रॉबर्ट वाड्रा ने एक झटके में ४४ करोड़ कूट लिए। गौर करें कि मोदी और भाजपा तो खुद वाड्रा के खिलाफ अभियान चलाते आए हैं। फिर भी कुछ होता क्यों नहीं?

और तो और, हवाई अड्डों पर नवाबजादे का नाम सुरक्षा छूट के लिए राष्ट्रपति, राजदूतों और न्यायाधीशों की श्रेणी में उत्कीर्ण है। ये बचाव हास्यास्पद ही होगा कि हम बदले की भावना से कुछ नहीं करेंगे या अभी हमारी सरकार को बने वक्त ही कितना हुआ…

जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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ठाकरे खानदान का सपना कल स्वाहा हो जायेगा!

: ठाकरे खानदान की सियासत हड़पना चाहेंगे अमित शाह और नरेन्द्र मोदी : बीते ४५ बरस की शिवसेना की राजनीति कल स्वाहा हो जायेगी। जिन सपनों को मुंबई की सड़क से लेकर समूचे महाराष्ट्र में राज करने का सपना शिवसेना ने देखा कल उसे बीजेपी हड़प लेगी। पहले अन्ना, उसके बाद भाई और फिर उत्तर भारतीयों से टकराते ठाकरे परिवार ने जो सपना मराठी मानुष को सन आफ स्वायल कहकर दिखाया, कल उसे गुजराती अपने हथेली में समेट लेगा। और एक बार फिर गुजरातियों की पूंजी, गुजरातियों के धंधे के आगे शिवसेना की सियासत थम जायेगी या संघर्ष के लिये बालासाहेब ठाकरे का जूता पहन कर उद्दव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे एक नये अंदाज में निकलेंगे। या फिर राज ठाकरे और उद्दव एक साथ खड़े होकर विरासत की सियासत को बरकरार रखने के आस्तित्व की लडाई का बिगुल फूंक देंगे।

दादर से लेकर चौपाटी और ठाणे से लेकर उल्लासनगर तक में यह सवाल शिवसैनिकों के बीच बड़ा होता जा रहा है कि एक वक्त अंडरवर्ल्ड तक पर जिन शिवसैनिकों ने वंसत सेना [महाराष्ट्र के सीएम रहे वंसत चौहाण ने अंडरवर्ल्ड के खात्मे के लिये बालासाहेब ठाकरे से हाथ मिलाया था तब शिवसैनिक वसंत सेना के नाम से जाने गये ] बनकर लोहा लिया । एक वक्त शिवसैनिक आनंद दिधे से लेकर नारायण राणे सरीखे शिवसैनिकों के जरीये बिल्डर और भू माफिया से वसूली की नयी गाथायें ठाणे से कोंकण तक में गायी गई। और नब्बे के दशक तक जिस ठाकरे की हुंकार भर से मुंबई ठहर जाती थी क्या कल के बाद उसका समूचा सियासी संघर्ष ही उस खाली कुर्सी की तर्ज पर थम जायेगी जो अंबानी के अस्पताल के उदघाटन के वक्त शिवसेना के मुखिया उद्दव ठाकरे के ना पहुंचने से खाली पड़ी रही। और तमाम नामचीन हस्तियां जो एक वक्त बालासाहेब ठाकरे के दरबार में गये बगैर खुद को मुंबई में सफल मानती नहीं थी, वह सभी एक खाली कुर्सी को अनदेखा कर मजे में बैठी रहीं।

असल में पहली बार कमजोर हुई शिवसेना के भीतर से शिवसैनिकों के ही अनुगुंज सुने जा सकते हैं कि शिवसैनिक खुद पर गर्व करें या भूल जाये कि उसने कभी मुंबई को अपनी अंगुलियों पर नचाया। लेकिन सवाल है कि मुंबई का सच है क्या और क्या भाजपा महाराष्ट्र को नये सिरे से साध पायेगी या फिर गुजराती और महाराष्ट्रीयन के बीच मुंबई उलझ कर रह जायेगी। क्योंकि जिस मुंबई पर महाराष्ट्रीयन गर्व करता है और अधिकार जमाना चाहता है, असल में उसके निर्माण में उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध के उन स्वप्नदृष्टा पारसियों की निर्णायक भूमिका रही, जो अंग्रेजों के प्रोत्साहन पर सूरत से मुंबई पहुंचे। लावजी नसेरवानजी वाडिया जैसे जहाज निर्माताओं ने मुंबई में गोदियों के निर्माण की शुरुआत करायी। डाबर ने 1851 में मुंबई में पहली सूत मिल खोली। जेएन टाटा ने पश्चिमी घाट पर मानसून को नियंत्रित करके मुंबई के लिये पनबिजली पैदा करने की बुनियाद डाली, जिसे बाद में दोराबजी टाटा ने पूरा किया। उघोग और व्यापार की इस बढ़ती हुई दुनिया में मुंबई वालो का योगदान ना के बराबर था। मुंबई की औद्योगिक गतिविधियों की जरूरत जिन लोगों ने पूरी की वे वहां 18वीं शताब्दी से ही बसे हुये व्यापारी, स्वर्णकार, लुहार और इमारती मजदूर थे। मराठियों का मुंबई आना बीसवीं सदी में शुरू हुआ। और मुंबई में पहली बार 1930 में ऐसा मौका आया जब मराठियों की तादाद 50 फीसदी तक पहुंची। लेकिन, इस दौर में दक्षिण भारतीय.गुजराती और उत्तर भारतीयों का पलायन भी मुंबई में हुआ और 1950-60 के बीच मुंबई में मराठी 46 फीसदी तक पहुंच गये। इसी दौर में मुंबई को महाराष्ट्र में शामिल कराने और अलग ऱखने के संघर्ष की शुरुआत हुई। उस समय मुंबई के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई थे, जो गुजराती मूल के थे। उन्होंने आंदोलन के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया। जमकर फायरिंग, लाठी चार्ज और गिरफ्तारी हुई। असल में मुंबई को लेकर कांग्रेस भी बंटी हुई थी। महाराष्ट्र कांग्रेस अगर इसके विलय के पक्ष में थी,तो गुजराती पूंजी के प्रभाव में मुंबई प्रदेश कांग्रेस उसे अलग रखने की तरफदार थी। ऐसे में मोरारजी के सख्त रवैये ने गैर-महाराष्‍ट्रीयों के खिलाफ मुंबई के मूल निवासियों में एक सांस्‍कृ‍तिक उत्पीड़न की भावना पैदा हो गयी, जिसका लाभ उस दौर में बालासाहेब ठाकरे के मराठी मानुस की राजनीति को मिला। लेकिन, आंदोलन तेज और उग्र होने का बड़ा आधार आर्थिक भी था। व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में गुजराती छाये हुये थे। दूध के व्यापार पर उत्तर प्रदेश के लोगों का कब्जा था। टैक्सी और स्पेयर पार्टस के व्यापार पर पंजाबियों का प्रभुत्व था। लिखाई-पढाई के पेशों में दक्षिण भारतीयों की भारी मांग थी। भोजनालयों में उड्डपी और ईरानियो का रुतबा था। भवन निर्माण में सिधिंयों का बोलबाला था। और इमारती काम में लगे हुये ज्यादातर लोग आंध्र के कम्मा थे।

मुंबई का मूल निवासी दावा तो करता था कि ‘आमची मुंबई आहे’, पर यह सिर्फ कहने की बात थी। मुंबई के महलनुमा भवन, गगनचुंबी इमारतें, कारों की कभी ना खत्म होने वाली कतारें और विशाल कारखाने, दरअसल मराठियों के नहीं थे। उन सभी पर किसी ना किसी गैर-महाराष्‍ट्रीय का कब्जा था। यह अलग मसला है कि संयुक्त महाराष्ट्र के आंदोलन में सैकड़ों जाने गयीं और उसके बाद मुंबई महाराष्ट्र को मिली। लेकिन, मुंबई पर मराठियो का यह प्रतीकात्मक कब्जा ही रहा, क्योंकि मुंबई को महाराष्ट्र में शामिल किये जाने की खुशी और समारोह अभी मंद भी नहीं पडे थे कि मराठी भाषियों को उस शानदार महानगर में अपनी औकात का एहसास हो गया। मुंबई के व्यापारिक, औद्योगिक और पश्चिमीकृत शहर में मराठी संस्‍कृति और भाषा के लिये कोई स्थान नहीं था। मराठी लोग क्‍लर्क, मजदूरों, अध्यापकों और घरेलू नौकरों से ज्यादा की हैसियत की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। यह मामूली हैसियत भी मुश्किल से ही उपलब्ध थी। और फिर मुंबई के बाहर से आने वाले दक्षिण-उत्तर भारतीयों और गुजरातियों के लिये मराठी सीखना भी जरूरी नहीं था। हिन्दी और अंग्रेजी से काम चल सकता था। बाहरी लोगों के लिये मुंबई के धरती पुत्रों के सामाजिक-सांस्‍कृतिक जगत से कोई रिश्ता जोड़ना भी जरूरी नहीं था।

 दरअसल, मुंबई कॉस्‍मो‍पोलिटन मराठी भाषियों से एकदम कटा-कटा हुआ था। असल में संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन और बाद में शिवसेना ने जिस मराठी मिथक का निर्माण किया, वह मुंबई के इस चरित्र को कुछ इस तरह पेश करता था कि मानो यह सब किसी साजिश के तहत किया गया हो। लेकिन, असलियत ऐसी थी नहीं। अपनी असफलता के दैत्य से आक्रांत मराठी मानुस के सामने उस समय सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रश्‍न यह था कि वह अपनी नाकामी की जिम्मेदारी किस पर डाले। एक तरफ 17-18वीं सदी के शानदार मराठा साम्राज्य की चमकदार कहानियां थीं जो महाराष्‍ट्रीयनों को एक पराक्रामी जाति का गौरव प्रदान करती थी और दूसरी तरफ1960 के दशक का बेरोजगारी से त्रस्त दमनकारी यथार्थ था। आंदोलन ने मुंबई तो महाराष्ट्र को दे दिया, लेकिन गरीब और मध्यवर्गीय मुंबईवासी महाराष्ट्रीय अपना पराभव देखकर स्तब्ध था। दरअसल, मराठियों के सामने सबसे बडा संकट यही था कि उनके भाग्य को नियंत्रित करने वाली आर्थिक और राजनीतिक शक्तियां इतनी विराट थीं कि उनसे लड़ना उनके लिये कल्पनातीत ही था। उसकी मनोचिकित्‍सा केवल एक ही तरीके से हो सकती थी कि उसके दिल में संतोष के लिये उसे एक दुश्‍मन दिखाया-बताया जाये। यानी ऐसा दुश्मन जिससे मराठी मानुस लड़ सके। बाल ठाकरे और उनकी शिवसेना ने मुंबई के महाराष्‍ट्रीयनों की यह कमी पूरी की और यहीं से उस राजनीति को साधा जिससे मराठी मानुस को तब-तब संतोष मिले जब-जब शिवसेना उनके जख्मों को छेड़े। ठाकरे ने अखबार मार्मिक को हथियार बनाया और 1965 में रोजगार के जरिये मराठियों को उकसाना शुरू किया। कॉलम का शीर्षक था-वाचा आनी ठण्ड बसा यानी पढ़ो और चुप रहो। इस कॉलम के जरिये बकायदा अलग-अलग सरकारी दफ्तरों से लेकर फैक्ट्रियों में काम करने वाले गैर-महाराष्‍ट्रीयनों की सूची छापी गई। इसने मुंबईकर में बेचैनी पैदा कर दी। और ठाकरे ने जब महसूस किया कि मराठी मानुस रोजगार को लेकर एकजुट हो रहा है, तो उन्होंने कॉलम का शीर्षक बदल कर लिखा- वाचा आनी उठा यानी पढ़ो और उठ खड़े हो। इसने मुंबईकर में एक्शन का काम किया। संयोग से शिवसेना और उद्दव ठाकरे आज जिस मुकाम पर हैं, उसमें उनके सामने राजनीतिक अस्तित्‍व का सवाल है । लेकिन सत्ता भाजपा के हाथ होगी । नायक अमित शाह या नरेन्द्र मोदी होंगे तो शिवसेना क्या पुराने तार छडेगी मौजूदा सच से संघर्ष करने की सियासत को तवोज्जो देगी। क्योंकि महाराष्ट्र देश का ऐसा राज्य है, जहां सबसे ज्यादा शहरी गरीब हैं और मुबंई देश का ऐसा महानगर है,जहां सामाजिक असमानता सबसे ज्यादा- लाख गुना तक है। मुंबई में सबसे ज्यादा अरबपति भी हैं और सबसे ज्‍यादा गरीबों की तादाद भी यहीं है। फिर, इस दौर में रोजगार का सवाल सबसे बड़ा हो चला है, क्योंकि आर्थिक सुधार के बीते एक दशक में तीस लाख से ज्यादा नौकरियां खत्म हो गयी हैं। मिलों से लेकर फैक्ट्रियां और छोटे उद्योग धंधे पूरी तरह खत्म हो गये। जिसका सीधा असर महाराष्ट्रीयन लोगों पर पड़ा है।

और संयोग से गैर-महाराष्ट्रीय इलाकों में भी कमोवेश आर्थिक परिस्थिति कुछ ऐसी ही बनी हुयी है। पलायन कर महानगरों को पनाह बनाना समूचे देश में मजदूर से लेकर बाबू तक की पहली प्राथमिकता है। और इसमें मुबंई अब भी सबसे अनुकूल है, क्योंकि भाषा और रोजगार के लिहाज से यह शहर हर तबके को अपने घेरे में जगह दे सकता है। इन परिस्थितियों के बीच मराठी मानुस का मुद्दा अगर राजनीतिक तौर पर उछलता है, तो शिवसेना और उद्दव ठाकरे दोनों ही इसे सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से जोड़, फायदा लेने से चूकेंगे नहीं। लेकिन, यहीं से संकट उस राजनीति के दौर शुरू होगा जो आर्थिक नीतियों तले देश के विकास का सपना अभी तक बेचती रही हैं। और जिस तर्ज पर दो लाख करोड के महाराष्ट्र को-ओपरेटिव पर कब्जा जमाये शरद पवार ने भाजपा को खुले समर्थन का सपना बेच कर ठाकरे खानदान की सियासत को ठिकाने लगाया उसने यह तो संकेत दे दिये कि शरद पवार के खिलाफ खडे होने से पहले अमित शाह और नरेन्द्र मोदी दोनों ठाकरे खानदान की सियासत को हड़पना चाहेंगे।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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