कन्हैया और जेएनयू प्रकरण के नकली टेप चलाने वाले न्यूज चैनलों पर कार्रवाई की हिम्मत छप्पन इंच सीने वाली मोदी सरकार में है?

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय यानि जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को एक ऐसे वीडियो टेप के आधार पर फंसा दिया गया जिसे छेड़छाड़ कर तैयार किया गया. छेड़छाड़ किए गए टेप के बिना जांच पड़ताल के प्रसारण से कई न्यूज चैनलों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. इनमें से दो अंग्रेजी न्यूज चैनल हैं- टाइम्स नाऊ और न्यूज एक्स. हिंदी के कई न्यूज चैनल हैं- जी न्यूज, इंडिया न्यूज, इंडिया टीवी आदि. इन चैनलों पर प्रसारित टेप में कन्हैया को कश्मीर अलगाववाद के समर्थन में नारे लगाते दिखाया गया है जबकि एबीपी न्यूज ने सही माने जा रहे टेप को दिखाया जिसमें भारत विरोधी बातें नहीं बल्कि गरीबी, सामंतवाद आदि से आजादी संबंधी नारे लगाए जा रहे हैं.

कुछ रुपयों के लिए इतना नीचे गिर कर पत्रकारिता न ही करें तो अच्छा

बस्ती। कुछ पत्रकार साथी कुछ रुपए के लिए अपना ईमान बेचने से पीछे नहीं हटते हैं। मैं मानता हूँ कि कोई भी मीडिया संस्थान इतना रुपया नहीं देता कि पेट्रोल तक का खर्च निकल सके। पैसा लेना गलत नहीं है। आज कल बिना पैसे का कुछ नहीं होने वाला है। लेकिन कुछ रुपयों के लिए इतना नीचे गिर जाना शोभनीय नहीं है, कुछ पत्रकार साथी तो ऐसे है की 100 रु भी मांग लेते है, क्या करे वो भी मज़बूरी है परिवार और बाल – बच्चे का खर्च भी इसी पत्रकारिता से चलाना पड़ता होगा।

यह अखबार मालिक रोज सड़क पर बैठ कर प्रेस कार्ड की दुकान चलाता है

बनारस में एक सज्जन हैं जो ‘दहकता सूरज’ नामक अखबार के मालिक हैं. बुढ़ापे में जीवन चलाने के लिए ये अब रोज सुबह सड़क पर बैठ जाते हैं और दिन भर अपने अखबार का प्रेस कार्ड बेचते रहते हैं. रेट है पांच सौ रुपये से लेकर हजार रुपये तक. ये महोदय खुद को पत्रकार संघ का पदाधिकारी भी बताते हैं. कई लोगों को इनके इस कुकृत्य पर आपत्ति है और इसे पत्रकारिता का अपमान बता रहे हैं लेकिन क्या जब बड़े मीडिया मालिक बड़े स्तर की लायजनिंग कर पत्रकारिता को बेचते हुए अपना टर्नओवर बढ़ा रहे हैं तो यह बुढ़ऊ मीडिया मालिक अपना व अपने परिवार का जीवन चलाने के लिए अपने अखबार का कार्ड खुलेआम बेच रहा है तो क्या गलत है?

पैसा कमाने के चक्कर में हत्या जैसे अपराध में सहभागी बन रहे हैं अखबार मालिक : डा. नरेश त्रेहन

भोपाल। पैसा कमाने के चक्कर में हत्या जैसे अपराध में सहभागी बन रहे हैं अखबार मालिक। यह बात  मेदांता सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के सीएमडी डॉ. नरेश त्रेहन ने भोपाल में आयोजित सेन्ट्रल प्रेस क्लब के प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में कही। इस अवसर पर डॉ. त्रेहन ने कहा कि अख़बार मालिक लुभावने विज्ञापन देते समय यह बात भूल जाते हैं कि उनके अख़बार में छपे विज्ञापन से प्रभावित होकर यदि कोई व्यक्ति अमुक अस्पताल में इलाज कराने जाता है और यदि उस व्यक्ति की सुविधाओं के आभाव में मृत्यु हो जाती है तो उसके लिए अख़बार मालिक भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं जितना लुभावना विज्ञापन देने वाला व्यक्ति या अस्पताल।

पैसे मांग कर इस न्यूज चैनल ने युवा पत्रकार का दिल तोड़ दिया (सुनें टेप)

सभी भाइयों को मेरा नमस्कार,

मैं एक छोटा सा पत्रकार (journalist) हूँ और 4 वर्षों से पत्रकारिता कर रहा हूँ। इस बदलते दौर में मुझे नहीं लगता कि मैं कभी अच्छा पत्रकार बन पाउँगा। मेरा सपना था कि मैं भी एक सच्चा पत्रकार बनूँगा पर अब तो पत्रकारिता का मतलब ही बदल चुका है। पहले पत्रकारिता एक मिशन था परन्तु अब ये करप्ट व कारपोरेट बन चुकी है। सभी जानते हैं कि मीडिया में काम करने के लिए अच्छी पहचान या बहुत पैसा होना चाहिए। आज पत्रकार बनना बहुत ही आसान हो गया है क्योंकि पत्रकार बनने के लिये चैनल को आप के तजुर्बे और आपकी योग्यता की जरूरत नहीं है। उन्हें तो जरूरत है आप से मिलने वाले मोटे पैसे की।

मीडिया पहले कमजोर आदमी की आवाज उठाता था, आज मजबूत आदमी की आवाज बन चुका है

आज देश में जो अच्छे चैनल मौजूद हैं, उनके ऊपर भी लगातार खराब होने का दबाव बढ़ रहा है

नई दिल्ली। 30 जनवरी को हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा दो सत्रों में ‘प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता’ और ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया की विश्वसनीयता’ पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। त्रिवेणी सभागार में आयोजित समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा कि मीडिया की विश्वसनीयता का सवाल आज से 50 साल पहले भी था और आज भी है। दरअसल, विश्वसनीयता की यह बहस मीडिया को और विश्वस्त बनाती है। पाठकों और दर्शकों की मनोविज्ञान और दिलचस्पी से अलग जाकर विश्वसनीयता पर अलग से कोई बहस नहीं हो सकती, बल्कि यह सारी बहस इसके सापेक्ष ही होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार मीडिया से नैतिक और अति नैतिकता की उम्मीद की जाती है, जो वास्तविकताओं से बहुत परे है। गांव के स्तर पर भी पत्रकारिता को लेकर किये जा रहे प्रयोग उम्मीद जगाते हैं।

ये कौन लोग हैं जो पीएम के साथ सेल्फी लेकर अपने जीवन पर फ़क्र महसूस कर रहे हैं?

भईया Yashwant, ये कौन लोग हैं जो पीएम के साथ सेल्फी लेकर अपने जीवन पर फ़क्र महसूस कर रहे हैं। और क्यों ले रहे हैं वो सेल्फी। क्या इसलिए कि ये कोई फोटो अपार्चुनिटी है? या इसलिए कि वो इसे सोशल मीडिया पर चमका सकें? वो अपने रीअल और वर्चुअल मित्रों को इस बात का अहसास दिला सकें कि वो कितने बड़े तीस मार खां हैं? वो उन्हें बता सकें कि उनकी पहुंच कितने ऊपर तक है? उन्हें अहसास दिला सकें कि वो कितने खास हैं?

इंग्लैंड में मोदी : भारतीय मीडिया कुछ तो छुपा रहा है…

वैसे तो मोदी जी की विदेश यात्रायें आपका सुख चैन खबर बाखबर सब नियंत्रित कर लेती हैं, आप चाह कर भी मोदीमय होने से बच ही नहीं सकते। सारे चैनल उनका ही मुखड़ा दिखाते मिलते हैं और सारे अख़बार उन्हीं पर न्योछावर। सोशल मीडिया पर भी वही छाये रहते हैं पक्ष हो या विपक्ष! पर इस बार यह सब होते हुए भी कुछ और भी है जिसकी परदेदारी तो है पर वह परदे में समा नहीं रहा! इस बार लंदन में मोदी का भारी विरोध हुआ और अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया में और सोशल मीडिया में उसने खासी हलचल पैदा की।

बीते दो दशकों में मीडिया की दशा-दिशा में आए बदलावों का वरिष्ठ पत्रकार एलएन शीतल द्वारा विस्तृत विश्लेषण

मीडिया के बदलते रुझान-1 : इन नवकुबेरों ने मिशन शब्द का अर्थ ही पागलपन कर दिया

 

अगर हम मीडिया के रुझान में आये बदलाव के लिए कोई विभाजन-रेखा खींचना चाहें तो वह विभाजन-रेखा है सन 1995. नरसिंह राव सरकार के वित्तमन्त्री मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गयी खुली अर्थव्यवस्था के परिणामस्वरूप अख़बारी दुनिया में व्यापक परिवर्तन हुए. पहला बदलाव तो यह आया कि सम्पादक नाम की संस्था दिनोदिन कमज़ोर होती चली गयी, और अन्ततः आज सम्पादक की हैसियत महज एक मैनेजर की रह गयी है.

बिहार की जनता ने इस मीडिया को भी हरा दिया है

भरोसा खोने के एक समान क्रम में इस चुनाव में भाजपा के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भी हार हुई है। अपने एक मित्र ने हताशा में सुबह 9 बजे से पहले ही टीवी बंद कर दिया। मुझे ये कहने की छूट दें कि मैं जरा समझदार निकला और अन्य चैनलों की तुलना में राज्य सभा टीवी पर ज्यादा ध्यान रखा। ये खबर पहले ही आ चुकी थी कि एक चैनल ने एक सर्वे को इसलिए प्रसारित नहीं किया क्योंकि वह महागठबंधन को भारी बहुमत बता रहा था।

मोदी और केजरी स्टाइल का ‘आदर्श’ मीडिया… जो पक्ष में लिखे-बोले वही सच्चा पत्रकार!

: मीडिया समझ ले, सत्ता ही है पूर्ण लोकतंत्र और पूर्ण स्वराज! : मौजूदा दौर में मीडिया हर धंधे का सिरमौर है। चाहे वह धंधा सियासत ही क्यों न हो। सत्ता जब जनता के भरोसे पर चूकने लगे तो उसे भरोसा प्रचार के भोंपू तंत्र पर होता है। प्रचार का भोंपू तंत्र कभी एक राह नहीं देखता। वह ललचाता है। डराता है। साथ खड़े होने को कहता है। साथ खड़े होकर सहलाता है और सिय़ासत की उन तमाम चालों को भी चलता है, जिससे समाज में यह संदेश जाये कि जनता तो हर पांच बरस के बाद सत्ता बदल सकती है। लेकिन मीडिया को कौन बदलेगा? तो अगर मीडिया की इतनी ही साख है तो वह भी चुनाव लड़ ले… राजनीतिक सत्ता से जनता के बीच दो-दो हाथ कर ले… जो जीतेगा, उसी की जनता मानेगी!

कुछ मीडिया हाउसों पर कारपोरेट्स का दबाव है : राजदीप सरदेसाई

अजमेर : यहां आयोजित साहित्य सम्मेलन के गुफ्तगू सत्र के दौरान वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई कहा कि मैं नहीं मानता कि पूरी मीडिया बिकी हुई है. ये देश बेइमानों का देश नहीं है. इस देश की अधिकांश जनता ईमानदार है. ईमानदारी के कारण ही देश तरक्की कर रहा है. मीडिया जनता पर निर्भर है, किसी कॉर्पोरेट पर निर्भर नहीं है. हां कुछ मीडिया हाउस में कॉर्पोरेट के कारण समस्या है लेकिन उनका भी समाधान होगा. उन्होंने माना कि कुछ मीडिया हाउस पर कॉर्पोरेट्स का दबाव है.

यादवगेट में फंस रहे कुछ बड़े टीवी चैनल और पत्रकार, पीएमओ को रिपोर्ट भेजी गई

दलाली करते थे नोयडा-लखनऊ के कई मीडियाकर्मी

नई दिल्ली:  नोयडा के निलंबित चीफ इंजीनियर यादव सिंह ने ठेकेदारी में कमीशनखोरी और कालेधन को सफेद करने के लिए कागज़ी कंपनियों का संजाल बिछाकर उसमें मीडिया को भी शामिल कर लिया था। इस राज का पर्दाफाश कर रही है, यादव सिंह से बरामद डायरी। यादव सिंह से तीन चैनलों के नाम सीधे जुड़ रहे हैं। एक में तो उनकी पत्नी निदेशक भी है। डायरी में मिले सफेदपोशों, नौकरशाहों और पत्रकारों के नामों को लेकर सीबीआई काफी संजीदा है और उसकी रिपोर्ट सीधे पीएमओ को भेजी जा रही है। इस सिलसिले में यादव सिंह और उसके परिवार से कई परिवार से कई बार पूछताछ हो चुकी है। समाज को सच का आईना दिखाने का दम भरने वाले ये पत्रकार अपने लिए मकान-दुकान लेने के अलावा ठेका दिलाने को भी काम करते थे और उसके लिए मोटी करम वसूलते थे।

भारत को बदनाम करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा क्यों बन जाता है भारतीय मीडिया!

 

(देर आए, दुरुस्त आए… गलत प्रचारित खबर की सच्चाई अब सामने ला रहा भारतीय मीडिया.. एक अखबार के मेरठ-बागपत संस्करण में प्रकाशित खबर…)


भारतीय मीडिया किस तरह अपने ही देश को बदनाम करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा जाने-अनजाने बन जा रहा है, इसे जानना-समझना हो तो आपको बागपत के साकरोद गांव का मामला समझ लेना चाहिए. इस गांव के बारे में इंग्लैंड समेत कई देशों में खबर प्रचारित प्रसारित कर दी गई कि यहां की खाप पंचायत ने दो बहनों के साथ रेप कर उन्हें नंगा घुमाए जाने का आदेश दिया है. इसका कारण यह बताया गया कि लड़कियों का भाई ऊंची जाति की शादीशुदा औरत के साथ भाग गया था, इसलिए बदले में लड़कियों को दंडित करने हेतु दोनों बहनों से रेप करने का फरमान सुनाया गया.

दसवीं पास हैं तो तीन महीने में पत्रकार बनें!

जी हां. ये दावा है एक विज्ञापन का. विज्ञापन में बताया गया है कि उन्हें तीन महीने में क्या क्या सिखाया जाएगा ताकि पत्रकार बन सकें. साथ ही पांच सौ रुपये अलग से देने पर उन्हें क्या अलग ज्ञान दिया जाएगा. सोचिए. दसवीं पास अगर तीन महीने की ट्रेनिंग के बाद पत्रकार बन गया तो वह क्या देश समाज को दिशा देगा और सच्चाई को क्या कितना समझ पाएगा. जिनको खुद अपने ज्ञान को अपडेट करने की जरूरत है, वही जब पत्रकार बनकर सही गलत का फैसला करेंगे तो जाहिर तौर पर उनका दकियानूसी माइंडसेट आम जन और समाज का बहुत नुकसान करेगा. दसवीं पास पत्रकार बनने का यह विज्ञापन आजकल सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया जा रहा है और लोग पत्रकारिता के गर्त में गिरने को लेकर चिंता जता रहे हैं.

लखनऊ के रेलवे बीट देखने वाले पत्रकारों को नए आए रेल अफसर का सम्मान क्यों करना पड़ा?

Gulam Jeelani : How times change! There was a time when journalists would be known for stories and here we are felicitating a newly posted railway official in Lucknow. And don’t tell me you don’t know why.

गुलाम जिलानी के फेसबुक वॉल से.

गंभीर पत्रकारिता का एक ताजा नमूना देखिए

ये तस्वीर पिछले 12 घंटे से सोशल मीडिया पर खूब शेयर हो रही है. इस तस्वीर के जरिए आजकल के न्यूज चैनलों की मूढ़ता फिर जगजाहिर हुई है. हालांकि इस तस्वीर में चैनल का नाम दिख नहीं रहा है लेकिन मीडिया में थोड़ी बहुत रुचि रखने वाला भी जान जाता है कि ये किस चैनल की ब्रेकिंग न्यूज है.

क्या मीडिया वाले इंद्राणी-पीटर कांड के इस पक्ष ‘shady ownership of News brands in India’ पर भी स्टोरी कर सकेंगे?

Dear Sir,

Hope you are doing great.

I just want to share some story idea with you on Ownership of News Brands. Below is the background on the same.

Background…  

The ongoing murder case involving Indrani & Peter Mukerjea has once again brought to discussion on the shady ownership of News brands in India. The duo owned NewsX. In addition a lot of other news brands have ownership by politicians, builders and others without much credibility in journalism.

इंद्राणी मुखर्जी ने पांच शादियां कीं… देह व्यापार में अरेस्ट भी हो चुकी हैं…

कभी आईएनएक्स मीडिया की संस्थापिका के तौर पर चर्चित रहीं और आजकल अपनी बेटी की हत्या के आरोपों में कुख्याति झेल रहीं इंद्राणी मुखर्जी उर्फ परी बोरा के बारे में पता चला है कि उन्होंने कुल पांच शादियां की हैं. स्टार इंडिया के पूर्व सीईओ पीटर मुखर्जी असल में इंद्राणी के पांचवें पति हैं. अब तक पीटर मुखर्जी को तीसरा पति बताया जा रहा था.  इंद्राणी ने पहली शादी खुद से दोगुनी उम्र के वकील से की थी. उस वक्त वो 16 वर्ष की थी और सेंट मेरीज स्कूल में पढ़ती थीं. 

पत्रकारिता के नाम पर सूदखोरी कर रहा डिंडोरी (एमपी) का नित्यानंद!

जिन सज्जन नित्यानंद के बारे में अखबार में खबर छपी है और उस खबर की कटिंग यहां लगाई गई है, उन्हें हरिभूमि अखबार का प्रतिनिधि भी बताया जा रहा है. सोचिए, पत्रकारिता क्षेत्र में कैसे कैसे लोगों को घुसाया गया है. मध्य प्रदेश के डिंडोरी की ये खबर है. नित्यानंद कटारे निगरानी शुदा बदमाश हैं. पढ़िए इनकी दास्तान…

छह माह पहले स्टिंग कर चुके अशोक पांडेय सौदेबाजी करने के लिए सीडी दबाए बैठे रहे?

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात आईएएस मोहम्मद शाहिद का खुफिया कैमरों से स्टिंग आपरेशन कर सुर्खियां में आए अशोक पांडेय भी सवालों को घेरे में हैं। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जिस तरह इस सीडी के सामने आने के बाद जांच कराने से ही बचने की कोशिश की, वह उनको तो कठघरे में खड़ा करता ही है, लेकिन भाजपाई और मीडिया का एक हिस्सा पांडेय के निर्माणाधीन भवन को गिराने को लेकर जिस तरह हायतौबा मचा रहा है, वह इस पूरे प्रकरण से खड़े सवालों को नेपथ्य में धकेल रहा है। पहली बात तो यह कि इस सीडी के सामने आने से मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे नौकरशाह किस तहर दलाली का खेल खेल रहे हैं, सबके सामने आ गया। दूसरे सवालों को थोड़ी देर के लिए किनारे रख दें तो इस सीडी का यह एक उजला पक्ष है। लेकिन इस उजले पक्ष के पीछे जो भी अंधेरा है उस पर भी रोशनी डाली जानी चाहिए।

हिंदुस्तान और डीएलए पेपर की स्ट्रिंगरशिप लेते ही अपने क्षेत्र का वो बेताज बादशाह हो गया!

अभी तक आदमी पुलिस के आंतक से परेशान सुना जाता था लेकिन अब पत्रकारों का आतंक भी जीने नहीं दे रहा है। ये हाल है रायबरेली के लालगंज तहसील और आसपास के गांव वालों का। दरअसल मानवेंद्र पांडेय नाम के एक शख्स ने किसी तरह से हिंदुस्तान और डीएलए नाम के पेपर की स्ट्रिंगरशिप ले ली। इसकी बाद से मानो वो अपने क्षेत्र का बेताज बादशाह हो गया है। किसी को भी सरेआम गाली देना, मुकदमे में फंसाने की धमकी देना, पुलिस से प्रशासन से बेइज्जती कराने की धमकी देना उसकी आदत हो गई है। 

पंजाब केसरी के मालिक का हाल देखिए, मोदी के सामने हाथ बांधे डरते कांपते खड़े हैं!

ये हैं बीजेपी के सांसद और पंजाब केसरी अखबार के मालिक. क्या हाल है बिकी हुई मीडिया का, खुद ही देखिये.  जब अख़बारों / चैनलों के मालिक / संपादक लोग अपनी पूरी उर्जा लोकसभा / राज्यसभा की सीट और पद्मभूषण आदि के लिये खर्च करते हुए इस चित्र में दिखाई मुद्रा में जा पहुंचें हों तब मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खम्भा कैसे माना जा सकता है? ये तो सत्ता के चारणों की मुद्रा है.

दिल्ली में ‘पीपली लाइव’ : वो फांसी लगाता रहा और तुम लाइव रिपोर्टिंग में लगे रहे…

Sheetal P Singh : दौसा, राजस्थान से दिल्ली आकर एक किसान ने केजरीवाल की रैली के दौरान पेड़ पर फन्दा डालकर आत्महत्या की कोशिश की। राजस्थान और केन्द्र में पूर्ण बहुमत की बीजेपी की सरकारें हैं पर वहाँ का किसान भी आत्महत्या कर ले तो टीवी चैनल केजरीवाल को कैसे दोषी सिद्ध कर सकते हैं, बीजेपी का नाम भी लिये बिना, यह इस समय देखने लायक है! किसान “आप” की रैली में फाँसी चढ़ा : इसको तो रिपोर्ट करो, गढ़ो, फैलाओ… लेकिन किसान फाँसी क्यों चढ़ा : इसे पूरी तरह गोल कर जाओ… मीडिया के पाखंड का सूक्त…

Ajay Bhattacharya : वो फांसी लगाता रहा और तुम लाइव रिपोर्टिंग में लगे रहे. कैमरा छोड़कर उसे थाम लेते तो एक जिंदगी बच जाती. जो तुम्हारी खबर से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण थी. खुद को मीडिया वाले कहते हो?

इसीलिए तो ये PRESSTITUTE कहलाते हैं… फिर सारे क्यूं दिल पर ले रहे हैं…

Rajat Amarnath : जब पत्रकार कलम के ज़रिऐ चैनल के अख़बार के मालिक बन जाते हैं और दो नंबर का धंधा करने वाले मालिक अपना धंधा बचाने के लिऐ पत्रकार बन जाते हैं (वो भी शामिल हैं जो जोड़तोड से सरकार का गुणगान करके इनाम लेते हैं) तभी वो “PRESSTITUTE” कहलाते हैं. सारे क्यूं दिल पर ले रहे हैं.

मीडिया का मोतियाबिंद : इसके आपरेशन का समय आ गया है…

Ambrish Kumar : कल जंतर मंतर पर जन संसद में कई घंटे रहा. दस हजार से ज्यादा लोग आए थे जिसमें बड़ी संख्या में किसान मजदूर थे. महिलाओं की संख्या ज्यादा थी. झोले में रोटी गुड़ अचार लिए. मंच पर नब्बे पार कुलदीप नैयर से लेकर अपने-अपने अंचलों के दिग्गज नेता थे. अच्छी सभा हुई और सौ दिन के संघर्ष का एलान. बगल में कांग्रेस का एक हुल्लड़ शो भी था. जीप से ढोकर लाए कुछ सौ लोग. मैं वहां खड़ा था और सब देख रहा था. जींस और सफ़ेद जूता पहने कई कांग्रेसी डंडा झंडा लेकर किसानों के बीच से उन्हें लांघते हुए निकलने की कोशिश कर रहे थे जिस पर सभा में व्यवधान भी हुआ.  एक तरफ कांग्रेस में सफ़ेद जूता और जींस वालों की कुछ सौ की भीड़ थी तो दूसरी तरफ बेवाई फटे नंगे पैर हजारों की संख्या में आये आदिवासी किसान थे.

दिल्ली की मीडिया इंडस्ट्री में हर रोज पत्रकार होने का दर्द भोग रहे हैं ढेर सारे नौजवान

: इंतजार का सिलसिला कब तक….  : दूर दराज के इलाकों से पत्रकार बनने का सपना लिए दिल्ली पहुंचने वाले नौजवान अपने दिल में बड़े अरमान लेकर आते हैं। उन्हे लगता है कि जैसे ही किसी न्यूज चैनल में एन्ट्री मिली तो उनका स्टार बनने का ख्वाब पूरा हो जाएगा. लेकिन जैसे ही पाला हकीकत की कठोर जमीन पर होता है वैसे ही सारे सपने धराशायी होते नजर आते हैं. अभी चंद रोज पहले मेरे पत्रकार मित्र से बात हुई तो पता चला कि उनके संस्थान में पिछले चार महीने से तनख्वाह नहीं दी गई है। हैरानी की बात ये है कि फिर भी लोग बिना किसी परेशानी के न केवल रोज दफ्तर आते हैं बल्कि अपने हिस्से का काम करते हैं।  जब बात सैलरी की होती है तो मिलता है केवल आश्वासन या फिर अगली तारीख.

न्यूज24 में कंसल्टेंट मयूर शेखर झा पर भी एस्सार घराना रहता है मेहरबान

प्रसिद्ध उद्योगपति रुईया परिवार द्वारा संचालित एस्‍सार समूह की मेहरबानी पत्रकार मयूर शेखर झा पर भी रही है. पीआईएल में 26 अक्‍टूबर 2012 का एक ईमेल शामिल किया गया है जिसमें पत्रकार मयूर शेखर झा के 15 दोस्‍तों के लंच के लिए साउथ एक्‍सटेंशन स्थित गेस्‍ट हाउस बुक करने का आग्रह किया गया है. एनडीटीवी प्राफिट और हेडलाइंस टुडे में वरिष्‍ठ पद पर काम कर चुके मयूर शेखर झा इन दिनों न्यूज24 में कंसल्टेंट हैं.

एचटी समिट के लिए एक करोड़ के प्रायोजक जुगाड़ने की जिम्मेदारी मुझे दी जाती थी : अनुपमा

Mukesh Kumar : एस्सार मामले में केवल शांतनु सैकिया का ही नहीं सात पत्रकारों के नाम लिए जा रहे हैं। इनमें से एक अनुपमा हिंदुस्तान टाइम्स की एनर्जी एडिटर हैं जिन्हें अख़बार ने निलंबित कर दिया है। लेकिन अनुपमा ने उलटवार करते हुए कहा है कि उनका अख़बार और संपादक उन्हें लगातार इस्तेमाल करता रहा है और एचटी सम्मिट के लिए एक करोड़ के प्रायोजक जुगाड़ने की जो ज़िम्मेदारी उसे दी जाती थी, वह उसे निभाती भी थी। इसी तरह दैनिक भास्कर के भी एक पत्रकार के इसमें शामिल होने का शक़ है। बाक़ी पत्रकारों के नाम अभी मिले नहीं हैं मगर पूरा मामला खुले तो राडिया कांड-2 जैसा होगा।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

एस्सार के ‘रिश्तेदार’ तीन पत्रकारों की नौकरी गई, लेकिन ‘बड़े वाले रिश्तेदार’ नितिन गडकरी का मंत्री पद बरकरार

Deepak Sharma : एस्सार ग्रुप की टैक्सी इस्तेमाल करने वाले तीन बड़े पत्रकारों को नौकरी छोडनी पड़ी है. लेकिन एस्सार ग्रुप का हेलीकाप्टर और याट इस्तेमाल करने वाले केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी कुर्सी पर विराजमान हैं. एस्सार का फायदा लेने वाले दिग्विजय सिंह और श्री प्रकाश जायसवाल भी मजे में हैं. सवाल कॉर्पोरेट की टैक्सी और हेलीकाप्टर में बैठने का नहीं है. सवाल ये है कि जिन मीडिया समूह या राजनीतिक पार्टियों ने अपने फायदे के लिए कॉर्पोरेट का खुला इस्तेमाल किया है, वो क्या दूध के धुले हैं? क्या उनके खिलाफ एक शब्द भी नहीं लिखा जा सकता? क्या कॉर्पोरेट, मीडिया और राजनीति की ये तिकड़ी हर जगह लूटपाट नहीं कर रही है?