इस्तीफा देने को मजबूर करने पर मीडियाकर्मी ने भास्कर प्रबंधन की लेबर आफिस में शिकायत की!

अन्यथा पेमेंट और ग्रेच्यूटी रोकने की धमकी देता है…

जिद से दुनिया बदलने वाले दैनिक भास्कर के बिलासपुर प्रबंधन द्वारा एक मीडियाकर्मी से जबरन इस्तीफा लेने का केस सामने आया है। यह हम उस शिकायत पत्र के आधार पर कह रहे हैं जो सहायक श्रमायुक्त, बिलासपुर को पीड़ित द्वारा दिया गया है। इस शिकायत पर सहायक श्रमायुक्त कार्यालय से जवाब तलब हेतु नोटिस भी जारी किया गया है।

क्या है शिकायती पत्र में…

मैं अमित कश्यप पिता दयाराम कश्यप, 16 सितंबर 2008 से दैनिक भास्कर, बिलासपुर में कार्यरत हूं। 21 फ़रवरी 2017 को यकायक स्थानीय यूनिट हेड अभिक सूर और एच.आर. हेड सुबोध पंडा द्वारा केबिन में बुलाकर नौकरी से इस्तीफा देने बोला गया। जिस पर असहमति जताने पर मेरी पेमेंट और ग्रेजुएटी रोक देने की धमकी दी गई। जिस दबाव के चलते मैंने इस्तीफ़ा दिया है। अतः महोदय से निवेदन है कि प्रबंधन को आदेशित कर मुझे मेरी नौकरी वापस दिलवायें। अथवा नौ साल का मजीठिया वेज बोर्ड के तहत रकम व अन्य सुविधायें दिलवाने की कृपा करें।

अब जो बड़ा सवाल मुंह बायें खड़ा है वो यह कि सर्वोच्च न्यायालय के मुताबिक मीडिया मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड की जानकारी नहीं थी। तो फिर यह छंटाई किस वजह से? या फिर यह समझा जाये कि कर्मचारी कमजोर कड़ी होता है शायद इसलिये इन्साफ का पलड़ा मालिकों की तरफ झुक गया? खैर हकीकत जो भी हो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मजीठिया वेज बोर्ड का खतरा मंडराता देख ही अमित जैसे सैंकड़ों पत्रकारों को घर बिठाया गया है।

पत्रकार आशीष चौकसे की रिपोर्ट. संपर्क : 8120100064 / journalistkumar19@gmail.com

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भास्कर ग्रुप के चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी

पेशी से कन्नी काटने पर पंजाब की कोर्ट ने ‘आज़ाद सोच’ के दावे वाले अखबार दैनिक भास्कर ग्रुप चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल के खिलाफ अंततः नॉन बेलएबल वारंट जारी किए. पंजाब से जल्द रवाना होगा विशेष तामीली टीम. हत्थे चढ़े तो लाकर कोर्ट में पेश किए जाएंगे चेयरमैन रमेश अग्रवाल. एक मासूम आरोपी की पहचान उजागर करने के मामले में कोर्ट ने किया है तलब.

आरोपी रमेश ने राहत के लिए हाइकोर्ट में भी लगा रखी है मामला निरस्त करने की याचिका. पूरा मामला क्या है, इसे जानने के लिए नीचे जय हिंद अखबार में प्रकाशित एक खबर की कटिंग दी जा रही है जिसे पढ़ कर सब समझ सकते हैं….

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भास्कर प्रबंधन को तमाचा : लेबर ट्रिब्यूनल ने छह कर्मियों की बर्खास्तगी को गैर-कानूनी करार दिया

दैनिक भास्कर, जालंधर के छह मीडियाकर्मियों को जीत मिली है. लेबर ट्रिब्यूनल ने भास्कर प्रबंधन द्वारा इन छह कर्मियों की बर्खास्तगी को गैरकानूनी करार दिया है. ट्रिब्यूनल ने इनकी सेवाओं को बर्खास्तगी की डेट से ही बहाल करने के आदेश दिए हैं. जिन लोगों को इस आदेश से लाभ मिला है उनके नाम हैं- पत्रकार वीना जोशी, नीलांबर जोशी (अब दिवंगत), अनिल शर्मा, जतिंदर कुमार, जतिंदर चौहान व संजय शर्मा.

ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि बिना उचित कारण के किसी कर्मचारी को एक महीने का नोटिस देकर नहीं निकाल जा सकता है. ट्रिब्यूनल ने अखबार प्रबंधन को निर्देश दिया है कि वह इन सभी लोगों को टर्मिनेशन से लेकर अभी तक की सेलरी तुरंत दे. जिन नीलांबर जोशी की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो गई, उनके आश्रितों को उनके जीवित रहने तक का लाभ देने के आदेश हुए हैं. इनकी पत्नी वीना जोशी को रिटायरमेंट आयु तक के समस्त लाभ मिलेंगे. हालांकि 4 अन्य कर्मचारियों का केस अभी लंबित है. प्रबंधन ने इन कर्मचारियों को साल 2009 में एकाएक नौकरी से निकाल दिया था. इसके बाद सभी ने प्रबंधन के नाजायज फैसले को ट्रिब्यूनल में चुनौती दी थी. प्रबंधन के पास इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने का विकल्प खुला है. हालांकि ऐसे मामलों में प्रबंधन की पहले भी हाईकोर्ट में कई बार किरकिरी हो चुकी है.

ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद नौकरी ज्वाइन करने गए कर्मचारियों ने स्थानीय प्रबंधन पर ज्वायनिंग न कराने का आरोप लगाते हुए अवमानना का केस दायर करने की बात कही है. कर्मचारी अनिल शर्मा ने बताया कि वह केस जीतने के बाद कोर्ट के आदेश पर अपने अन्य साथियों के साथ दैनिक भास्कर अखबार में नौकरी ज्वाइन करने गए थे लेकिन डिप्टी मैनेजर नरेश कुमार दुआ ने प्रबंधन का आदेश न होने का हवाला देते हुए वापस लौटा दिया. कर्मचारियों के केसों की पैरवी करने वाले श्रम सलाहकार राम सिंह का कहना है कि प्रबंधन ने ऐसा करके खुद को अदालती अवमानना की श्रेणी में ला खड़ा किया है.

इस पूरे प्रकरण को जालंधर के एक तेवरदार अखबार जय हिंद ने प्रकाशित किया है, जो इस प्रकार है…

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इस ग़ज़ब की खबर के लिए भास्कर के महान मालिकों और संपादकों को एक सलाम तो बनता है :)

दैनिक भास्कर अखबार के मालिक और संपादक लोग महानता की ऐसी राह पर चल पड़े हैं जहां उन्हें लगता है कि वे जो भी कह कर देंगे, वही दुनिया फालो करेगी, उसी राह पर चलेगी और उसी को पत्रकारिता मानेगी. तभी तो इस अखबार के मालिक और संपादक ऐसी ऐसी खबरें छापने लगे हैं जिसे पढ़ देखकर लोग कहते हैं क्या अब ऐसी ही खबरें छापने के लिए अखबार बचे रहेंगे? इससे अच्छा तो है कि ये अखबार बंद हो जाएं ताकि पेड़ पर्यावरण बचे और झूठ की दुकान का कारोबार कम हो जाए.

भास्कर ने ये खबर अखबार के अलावा अपनी वेबसाइट पर भी प्रकाशित किया है. अखबार और वेबसाइट, दोनों ही जगहों पर प्रकाशित इस खबर का स्क्रीनशाट देखिए….

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‘नो नेगेटिव’ के नाम पर झूठे तथ्य पढवा रहा लुधियाना भास्कर

एक रोज सुबह सैर के बाद हम दोस्त पार्क में चाय पी रहे थे. तभी दैनिक भास्कर अखबार आया. हम सब नियमित पाठक हैं. खासकर सोमवार ‘नो नेगेटिव’ एडिशन के. लेकिन बड़ा अफसोस हुआ पढके. लुधियाना भास्कर में मुख्य खबर लगी कि सिंधवा नहर में विश्व का पहला सोलर‌ प्लांट‌ लग रहा है. हमने जब यह पढा तो गुजरात में कारोबार के सिलसिले में जाने वाला मेरा दोस्त बोला कि ये तो गलत है, गुजरात में तो नर्मदा नदी पर ऎसे‌ अनेक सोलर‌ प्लांट लग चुके हैं वो भी तब जब प्रधानमन्त्री नरेंदर मोदी वहां के मुख्यमंत्री थे. अब तो वो तीन साल से पीएम हैं.

दूसरे दोस्त ने बताया कि पटियाला में घगर पर भी ऎसा प्लांट है. भास्कर हमेशा हमारा ज्ञान बढाता है लेकिन अब डर लग रहा है कि कहीं हम‌ें झूठी जानकारियां तो नहीं पढ़ाई जा रही हैं.  सकारात्मक खबरों का विचार वाला‌ आइडिया अच्छा है परंतु उसके बहाने झूठ पढाना तो बिल्कुल‌ ही ठीक नहीं लग रहा. हमने कितनों से अखबार के मालिक का नंबर मांगा परंतु एक जानकार ने कहा कि भड़ास को भेज देंगे तो भास्कर के मालिकों तक खुद पहुंच जाएगा. इसलिए हम ये भड़ास के पास भेज रहे हैं.

पहले भी कितने दोस्त बहस करते थे परंतु हम लुधियाना भास्कर में छपे होने की बातें कहते हुए अड़ जाते थे. लेकिन आगे से अड़ने से पहले सोचना पड़ेगा कि लुधियाना भास्कर जो बता रहा है वह कितना सही है. हमें उम्मीद है कि पाठकों की परेशानी आप जरूर भास्कर के मालिक तक पहुंचाएंगे. संबंधित खबर की कटिंग भी भेज रहे हैं.

एक पाठक
लुधियाना

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भास्कर ग्रुप का घोटाला खोलने वाले ‘स्वराज एक्सप्रेस’ चैनल के रिपोर्टर को देना पड़ा इस्तीफा

मेरे सभी सम्मानीय मित्रों एवमं मेरे सभी सहयोगियों… 

यह बताते हुए मुझे अत्यंत ख़ुशी हो रहा है कि मैंने अपने पूरे होश में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के रीजनल न्यूज चैनल ‘स्वराज एक्सप्रेस’ के खरसिया रिपोर्टर के पद से त्यागपत्र दे दिया है। कारण यह हैं कि यह चैनल एक समय पत्रकारों का चैनल हुआ करता था किन्तु आजकल इसमें भी कुछ दलाल किस्म के लोग सक्रिय हो गए हैं। मैंने पिछले 1 वर्ष से बिना कोई पेमेंट प्राप्त किये खुद के व्यय से अपना कैमरा, अपना कैमरामेन, अपना इंटरनेट लगाकर काम किया। सबसे ज्यादा कीमती अपना बहुमूल्य एक वर्ष का समय है जिसके मूल्य का आकलन मैं स्वयं नहीं कर सकता हूँ।

मैंने सुबह 6 बजे से रात्रि 12 बजे तक हमेशा सक्रिय होकर लगातार खबर, स्क्रॉल, ब्रेकिंग, पैकेज स्टोरी भेजा लेकिन बदले में हमें आज तक चैनल से एक रुपये भी पारिश्रमिक नहीं मिला। मैंने ग्राम कुनकुनी खरसिया में 300 एकड़ जमीन घोटाला मामले की खबर बनाई। प्रधानमंत्री कार्यालय से मुख्य सचिव छत्तीसगढ़ शासन को कार्यवाही का पत्र भेजा गया। इस पत्र की छाया प्रति मुझे मिली। इसमें कुनकुनी में दैनिक भास्कर ग्रुप की कंपनी डीबी पॉवर द्वारा गरीब भोले भाले आदिवासियों की जमीन को अपने मीडिया हाउस के ड्राइवर के नाम से खरीदे जाने का जिक्र है। गरीब आदिवासियों के ऊपर मीडिया घराने का धौन्स दिखा के अवैध रूप से ब्रिज एवं रेलवे ट्रैक बनाये जाने का मामला उजागर किया। लेकिन चैनल ने मेरे इस साहसिक खबर को नहीं चलाया। उल्टे छत्तीसगढ़ के एडिटर शैलेश पाण्डेय ने कहा कि तुम डी बी पावर मीडिया घराने के खिलाफ खबर कवरेज करते हो। ऐसा झूठा लांछन लगाया गया।

चैनल के एक जिम्मेदार अधिकारी ने मुझे कहा कि दैनिक भास्कर के खिलाफ लिखोगे तो वह हमारे चैनल की बैंड बजा देगा। ऐसे में मुझे अहसास हुआ कि किसी व्यक्ति के द्वारा 100 रु के घोटाला को दिनभर खबर बना के चलाने वाले लोगों के पास सैकड़ों करोड़ के घोटाले की खबर चलाने की हिम्मत नहीं है और ऐसे लोगों के साथ काम करना अपने समय एवं नैतिक मूल्यों की बर्बादी है। जो लोग दूसरे मीडिया हॉउस के 100 एकड़ से ज्यादा के आदिवासी भूमि की बेनामी खरीदी एवं अवैध निर्माण पर पर्दा डालना चाहता हैं, ऐसे लोगों के साथ काम करना बेकार है।

जो व्यक्ति दूसरा चैनल छोड़ के इस चैनल में आया हो उनके द्वारा मुझ पर झूठा लांछन लगाते हुए डीबी के खिलाफ खबर बनाने पर बदनाम करने की धमकी देने वाले को करारा जवाब देते हुए मैं स्वयं स्वराज एक्सप्रेस चैनल के खरसिया रिपोर्टर का पद छोड़ रहा हूँ। चैनल में हमारे साथ 1 वर्ष तक खबर के बदले पारिश्रमिक दिए जाने के नाम पर धोखा ही किया गया। मांड प्रवाह अख़बार एवं सोशल मीडिया के माध्यम से हमेशा गरीबों एवं शोषितों की आवाज उठाता रहूंगा। गरीबों को लूटने वालों का फर्दाफाश करता रहूंगा।

सत्यमेव जयते

आपका

भूपेंद्र किशोर वैष्णव

(स्वतंत्र पत्रकार)

खरसिया

9754160816

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मजीठिया जंग : हेमकांत को स्टे के बावजूद ऑफिस में न घुसने देने वाले दैनिक भास्कर प्रबंधन पर कोर्ट ने शुरू की अवमानना कार्रवाई

मजीठिया मांगने वाले हेमकांत चौधरी को ट्रांसफर पर स्टे के बावजूद ऑफिस में नहीं घुसने देने वाले दैनिक भास्कर के अफसरों पर कोर्ट ने शुरू की अवमानना कार्रवाई… तीन महीने जेल की सजा और 5000 जुर्माना होना तय, भास्कर के अफसरों में हड़कंप… मजीठिया मामले में अब तक की सबसे बड़ी खबर महाराष्ट्र के औरंगाबाद से प्रकाशित होने वाले दैनिक भास्कर के मराठी अखबार दिव्य मराठी से आई है। यहाँ प्रबंधन की लगातार धुलाई कर रहे हेमकांत चौधरी ने अबकी बार प्रबंधन के चमचों को पटखनी देते हुए एक ही दांव में न केवल धूल चटा दी है बल्कि चारों खाने चित्त कर दिया है।

मजीठिया वेजबोर्ड के लिए सुप्रीम कोर्ट में केस लगाने पर दैनिक भास्कर मैनेजमेंट ने चौधरी का डेपुटेशन के नाम पर रांची ट्रांसफर कर दिया था। इसके खिलाफ औरंगाबाद इंडस्ट्रियल कोर्ट से चौधरी को स्टे मिल गया था। इसके बावजूद ताकत के खोखले नशे में चूर भास्कर के अहंकारी अफसरों ने चौधरी को ऑफिस में घुसने नहीं दिया और धक्के देकर बाहर कर दिया था। इससे आहत चौधरी ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से कोर्ट की अवमानना का केस दायर किया था।

मामले में भास्कर के वकील पिछले लगभग एक साल से तारीख पर तारीख ले रहे थे। कुछ दिन पहले हुई सुनवाई में भी जब भास्कर के वकीलों ने तारीख लेने की कोशिश की तो हेमकांत चौधरी के वकीलों ने जोरदार विरोध करते हुए आरोपियों पर अवमानना कार्रवाई शुरू करने की अपील कोर्ट से की थी। तब कोर्ट ने बाद में आदेश जारी करने की बात कहते हुए सुनवाई स्थगित कर दी थी। अंततः पिछले हफ्ते कोर्ट ने दिव्य मराठी महाराष्ट्र के सीओओ निशित जैन और सीनियर एचआर एग्जीक्यूटिव अनवर अली को अवमानना का दोषी मानते हुए दोनों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने का आदेश जारी कर दिया।

आगामी दिनों में आरोपियों की गिरफ्तारी होगी और कोर्ट की अवमानना मामले में दोनों को तीन महीने जेल की सलाखों के पीछे काटना पड़ेंगे साथ ही 5 हजार रुपए जुर्माना भी भरना पड़ेगा। उधर, जब से इस आदेश की खबर आरोपियों और कर्मचारियों का शोषण कर रहे भास्कर प्रबंधन के दूसरे चमचों को लगी है उनके खेमे में हड़कंप मचा हुआ है। अब उन्हें भी जेल जाने का डर सता रहा है।

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मजीठिया मांगने वाले को फंसाने वाला दैनिक भास्कर का मैनेजर अपने ही बुने जाल में फंसने जा रहा!

खबर जालंधर से है. दैनिक भास्कर के मैनेजर को एक पत्रकार के लिए जाल बुनना महंगा पड़ने जा रहा है. यह खबर दूसरे अखबारों और अन्य मैनेजरों के लिए भी चेतावनी है कि वे मजीठिया वेज बोर्ड मांगने के लिए लड़ रहे साहसी मीडियाकर्मियों से टक्कर न लें वरना उन्हें एक न एक दिन ऐसे जाल में फंसना पड़ेगा जिससे वे निकल न सकेंगे और उनके अखबार मालिक भी उनकी कोई मदद न कर पाएंगे.

जालंधर में दैनिक भास्कर के पत्रकार राजेश को फंसाने के लिए एचआर मैनेजर इंद्र सूजी, मैनेजर नरेश दुआ और झूठी गवाही देने वाले एक पत्रकार को कोर्ट ने सम्मन जारी किया है. इन तीनों ने पत्रकार राजेश के खिलाफ साल 2011 में साजिशन झूठी एफआईआर दर्ज करवाई थी. कोर्ट से सम्मन जारी होने के बाद अब तीनों को अपने अपने बेल बांड भरकर ट्रायल फेस करना होगा. पूरी खबर जालंधर के एक अखबार ‘जय हिंद’ ने विस्तार से प्रकाशित की है, जो इस प्रकार है…

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मजीठिया की जंग : झूठ लिख कर बुरा फंसा डीबी कॉर्प!

‘जिद करो दुनिया बदलो’ का नारा देने वाला डीबी कॉर्प अब ‘झूठ बोलो और बुरे फंसो’ के पैटर्न पर काम कर रहा है। मंगलवार को मुंबई के श्रम आयुक्त कार्यालय में डी बी कॉर्प की महिला रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया शेख के मजीठिया वेज बोर्ड बोर्ड मामले की सुनवाई थी। लतिका और आलिया ने मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतन और एरियर न मिलने पर 17 (1) के तहत रिकवरी का क्लेम श्रम आयुक्त कार्यालय में किया था।

आज कंपनी ने अपने वकील के जरिये सुनवाई में जवाब दिया कि ये दोनों महिला कर्मचारी मजीठिया वेज बोर्ड के दायरे में नहीं आती हैं जिस पर इन महिला कर्मचारियों के साथ गए पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकान्त सिंह ने तुरंत भारत सरकार की 11 नवंबर 2011 को जारी अधिसूचना की कॉपी का संबंधित पेज खोल कर इस मामले की सुनवाई कर रही असिस्टेंट लेबर कमिश्नर के सामने रख दिया जिसमें ये साफ लिखा है कि रिसेप्शनिस्ट भी मजीठिया वेज बोर्ड के दायरे में आती हैं।

इसके बाद डीबी कॉर्प और वकील की बोलती बंद हो गयी। उन्होंने अगला डेट लेने का प्रयास किया मगर उस समय मौजूद शशिकान्त सिंह और धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने कड़ा एतराज जताया और साफ़ कह दिया कि हमारे दिए गए तथ्य को रिकार्ड में लाया जाए और डीबी कॉर्प को इस मामले को साबित करने के लिए कहा जाय क्योंकि उन्ह लोगों ने लिखित रूप से कहा है कि ये कर्मचारी मजीठिया वेज बोर्ड के दायरे में नहीं आतीं। इसके बाद नीलांबरी भोसले ने इसे स्टेटमेंट में नोट किया और डीबी कॉर्प को 48 घंटे बाद का 27 अक्टूबर का डेट दिया और कहा कि आप प्रूफ लेकर आइये कि रिसेप्शनिस्ट मजीठिया वेज बोर्ड के दायरे में नहीं आतीं।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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जानिए, आजकल क्यों खुद को मरियल और फिसड्डी बताने में जुटा है दैनिक भास्कर!

जो अपनी क्लास में ही पांचवे या दसवें नंबर पर हो क्या वह शहर में अव्वल आने का दावा कर सकता है? कर तो नहीं सकता लेकिन हिंदी का एक बड़ा अखबार ऐसा ही करता आया है, आज से नहीं लंबे समय से… भारत का सबसे तेज बढ़ता, सबसे ज्यादा सर्कुलेशन वाला और भी न जाने क्या क्या दावा करने वाला अखबार दैनिक भास्कर… पर समय की गति देखिए कि कल तक खुद के बारे में बड़े बड़े दावे करने वाला यह अखबार अब खुद को मरियल और फिसड्‌डी बताने की जुगत में है। यहां तक कि ये अखबार अपने कर्मचारियों को अपनी गरीबी की दुहाई भी देने लगा है। है न अचरज की बात? चलिए आपको बताते हैं कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि दैनिक भास्कर जैसा दुनिया के सबसे बड़े अखबारों में खुद को शामिल बताने वाला अखबार अब जगह जगह यह दावा सरकारी विभागों में दावा करता फिर रहा है कि वह तो फलां जगह आठवें और अमुक जगह दसवें नंबर का अखबार है।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भी (भास्कर समेत कई अखबारों पर सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का केस चल रहा है) कार्यरत पत्रकारों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से पैसा नहीं दे रहे अखबारों को अब बकाए की भी राशि देना है जो हर कर्मचारी के लिए लाखों रुपए में बन रही है। चूंकि इस वेज बोर्ड की अनुशंसाओं में वर्गीकरण टर्नओवर के हिसाब से है इसलिए अब भास्कर खुद को पिद्दू सा अखबार बताने की चालबाजी कर रहा है। वैसे तो मजीठिया वेतन व बकाया न देने के लिए कई हथकंडे अपनाए जा रहे हैं जिनमें डराने धमकाने से लेकर नौकरी से निकालने और हजारों किलोमीटर की दूरी पर तबादला करना भी शामिल है लेकिन इसके बावजूद बकाया वाला मामला तो सैटल करना ही होगा और यही राशि प्रति कर्मचारी लाखों रुपए तक पहुंच रही है।

ऐसे में अखबार मालिक चाह रहे हैं कि खुद को इतना मरियल, फिसड्‌डी और कंगाल बता दें कि कम से कम पैसा देना पड़े। वैसे अच्छा था कि अखबार किसी भी दबाव के बिना ही खुद की हकीकत पर नजर डालते लेकिन इसी बिंदु पर नया पेंच आ खड़ा हुआ है जहां भास्कर खुद को श्रम विभाग के सामने दीन हीन बता रहा है वहीं सरकारी विज्ञापन लेने के लिए खुद को इतना बड़ा और फैला हुआ बताता है जितना कि वह हकीकत में है ही नहीं। यानी एक ही सरकार के दो अलग अलग विभागों के सामने खुद को अलग अलग तरह से पेश किया जा रहा है।

यही हाल जनता के सामने भी है जब डीबी कॉर्प लिमिटेड अपने शेयरहोल्डर्स के सामने रिपोर्ट पेश करता है तो करोड़ों के मुनाफे और अरबों के नए प्रोजेक्ट्स दिखाता है लेकिन जब अपने ही कर्मचारियों की बारी आती है तो बार बार यही कहा जाता है कि मंदी का असर हो रहा है और  फलां क्वार्टर तो बहुत ही बुरा गया है इसलिए इस बार इंक्रीमेंट भी दिया जा सकेगा या नहीं यह सोचना पड़ेगा। थाेड़ा सा और गहराई में जाएंगे तो पता चलेगा कि भास्कर जितने राज्य और जितने संस्करण बताता है उतने की तो मालिकी ही इनके पास नहीं है, जैसे मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में मालिकी रमेशचंद्र अग्रवाल के चेयरमेन वाले ग्रुप की है लेकिन वहीं जबलपुर सहित कई बड़े एडिशन मनमोहन अग्रवाल के मालिकी वाले हैं।

महाराष्ट्र को डीबी कॉर्प अपनी मालिकी में बताकर कॉर्पोरेट विज्ञापन लेता है लेकिन पूरे महाराष्ट्र में ‘दैनिक भास्कर’ के नाम से सुधीर अग्रवाल हिंदी अखबार नहीं निकाल सकते क्योंकि टाईटल को लेकर समझौता ही ऐसा हुआ है। अब सवाल यह कि किस विभाग को दी गई जानकारी स्टैंडर्ड मानी जाए और किस विभाग को दी गई झूठी जानकारी के आधार पर इस पर केस लगाया जाए? यदि डीएवीपी, शेयरहोल्डर्स और कॉरपोरेट विज्ञापन के लिए दी गई जानकारी को सही मानें तो उन जानकारियों का क्या जो अखबार श्रम विभाग को उपलब्ध करा रहा है और जिसमें वह खुद को फिसड्‌डी बताने में कमाल कर रहा है।

हां, एक दूसरा कमाल भी चल रहा है कि सालोंसाल संपादकीय में रहे व्यक्ति को यह दस्तावेज दिए जा रहे हैं कि वह तो मैनेजर या सुपरवाइजर स्तर का है। कुछ मामले तो ऐसे हो गए हैं जिनमें एक ही व्यक्ति यह साबित करने की स्थिति में आ गया है कि वह एक ही समय में संपादकीय दायित्व भी संभाल रहा था और उसे मैनेजेरियल जिम्मदारियां भी दे दी गई थीं। कोई तो इन्हें बताए कि झूठे दस्तावेज पेश करने की सजा क्या हो सकती है। यदि ये दस्तावेज सुप्रीमकोर्ट में पेश कर दिए जाएं तो इनका खुद को मरियल, फिसड्‌डी और कंगाल बताने वाला झूठ, सच में भी बदल सकता है।

लेखक आदित्य पांडेय वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क adityanaditya@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

आदित्य पांडेय की अन्य रिपोर्ट्स भी पढ़ें…

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भास्कर को झटके पर झटका, पत्रकार धर्मेंद्र के बाद अब रिसेप्शनिस्ट लतिका के भी ट्रांसफर पर कोर्ट ने लगाई रोक

भारत में ‘ज़िद करो दुनिया बदलो’ का नारा देने वाले डीबी कॉर्प को लगातार झटके लग रहे हैं, किंतु भास्कर प्रबंधन है कि सुधरने का नाम नहीं ले रहा है। दैनिक भास्कर ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर मांगने पर अपने प्रिंसिपल करेस्पॅान्डेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का मुम्बई से सीकर (राजस्थान) ट्रांसफर कर दिया। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह अदालत की शरण में गए और इंडस्ट्रियल कोर्ट ने इस ट्रांसफर पर रोक लगा दी। इसके बाद अब भास्कर की सहायक महाप्रबंधक (कार्मिक) अक्षता करंगुटकर ने डी बी कॉर्प के मुम्बई के माहिम स्थित कार्यालय में कार्यरत महिला रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण का सोलापुर में ट्रांसफर कर दिया।

लतिका ने भी मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर तथा प्रमोशन की मांग को लेकर 17(1) के तहत कामगार आयुक्त कार्यालय में रिकवरी क्लेम लगाया हुआ है। इस बात का पता जैसे ही भास्कर प्रबंधन को चला कि लतिका ने रिकवरी क्लेम लगाया है, भास्कर प्रबंधन ने उन्हें कुछ ले-दे कर क्लेम वापस लेने को कहा। जब लतिका ने इनकार कर दिया तो अक्षता करंगुटकर ने उन्हें सीधे तौर पर धमकी दी कि ‘मैं तुम्हारा करियर बर्बाद कर दूंगी!’ यहां बताना आवश्यक है कि लतिका ने इसकी लिखित शिकायत कामगार विभाग में भी की है। यह बात और है कि लतिका के फैसले से गुस्साई अक्षता करंगुटकर ने उसी दिन उनका ट्रांसफर सोलापुर में कर दिया और घर पर ट्रांसफर लेटर भेज दिया।

यही नहीं, अगले दिन से लतिका चव्हाण के डीबी कॅार्प (माहिम) दफ्तर में प्रवेश पर रोक तक लगा दी गई! प्रबंधन के इस मनमाने रवैये से क्षुब्ध लतिका ने मजीठिया वेज बोर्ड हेतु पत्रकारों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा से बात की। तत्पश्चात उन्हीं की सलाह पर इंडस्ट्रियल कोर्ट में डीबी कॉर्प के एमडी सुधीर अग्रवाल और सहायक महाप्रबंधक (कार्मिक) अक्षता करंगुटकर के साथ-साथ डी बी कॉर्प को भी पार्टी बनाते हुए एक केस फ़ाइल कर दिया।

इस मामले में लतिका चव्हाण का इंडस्ट्रियल कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखा युवा एडवोकेट महेश शुक्ला ने। मामले की सुनवाई न्यायाधीश सूर्यवंशी जी ने किया। न्यायाधीश ने लतिका आत्माराम चव्हाण के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके ट्रांसफर पर रोक लगा दी। इस आदेश की जानकारी मिलते ही भास्कर कर्मियों में जहां एक बार फिर ख़ुशी फैल गई, वहीं भास्कर प्रबंधन इस दोहरे झटके से सकते में है! वैसे आपको बता दूं कि भास्कर प्रबंधन ने एक साल पहले भी अपने पत्रकार इंद्र कुमार जैन का ट्रांसफर किया था, मगर तब भी उसे मुंहकी खानी पड़ी थी। फिर 10 अक्टूबर को धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के ट्रांसफर और उस पर लगी अदालती रोक के बाद तो भास्कर की पूरे भारत में थू-थू हो रही है!

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मोबाइल: 09322411335

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भास्कर के पत्रकार ने प्रबंधन को दिया जोरदार झटका, अदालत से ट्रांसफर रुकवाया

मजीठिया वेज बोर्ड मांगने के कारण भास्कर प्रबंधन ने अपने पत्रकार धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का कर दिया था ट्रांसफर…

मुम्बई के तेज-तर्रार पत्रकारों में से एक धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का दैनिक भास्कर ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर मांगे जाने पर राजस्थान के सीकर में ट्रांसफर कर दिया था। मुम्बई में दैनिक भास्कर में एंटरटेनमेंट बीट के लिए प्रिंसिपल करेस्पांडेंट पद पर कार्यरत धर्मेन्द्र प्रताप सिंह को भास्कर प्रबंधन ने पहले उन्हें लालच दिया कि कुछ ले-दे कर मामला ख़त्म करो। फिर उन्हें भास्कर की सहायक महाप्रबंधक अक्षता करंगुटकर (कार्मिक) ने धमकी दी, जिसकी शिकायत धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने श्रम आयुक्त से की।

जब धमकी से भी धर्मेन्द्र प्रताप सिंह नहीं डरे तो उनका राजस्थान के सीकर में एंटरटेनमेंट पेज के लिए ट्रांसफर कर दिया गया। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का ट्रांसफर लेटर ठीक उस दिन उन्हें घर पर मिला, जब वे मजीठिया वेज बोर्ड की सुप्रीम कोर्ट में हो रही सुनवाई के लिए दिल्ली गए थे। दिल्ली से वापस आये तो उन्हें दफ्तर में जाने नहीं दिया गया। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में पत्रकारों की तरफ से मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा से सलाह ले कर इंडस्ट्रियल कोर्ट की शरण ली, जहां इंडस्ट्रियल कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखा युवा एडवोकेट महेश शुक्ल ने।

इस बहस के दौरान इंडस्ट्रियल कोर्ट के जज श्री एस. डी. सूर्यवंशी ने मौखिक टिप्पणी की कि मजीठिया वेज बोर्ड आज देश का सबसे गर्म मामला है। माननीय न्यायाधीश ने साफ़ कहा कि डी बी कॉर्प ने धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का ट्रांसफर गलत तरीके से किया है। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने डीबी कॉर्प के एम. डी. सुधीर अग्रवाल और कार्मिक विभाग की सहायक महाप्रबंधक अक्षता करंगुटकर सहित कंपनी को भी अदालत में पार्टी बनाया है। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह की मदद की रविन्द्र अग्रवाल सरीखे देश के दूसरे पत्रकारों ने, जिन्होंने ऐन वक्त पर उन्हें तमाम जरूरी दस्तावेज उपलब्ध करवाए। अदालत द्वारा धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के ट्रांसफर पर रोक लगाने से मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर की लड़ाई लड़ रहे मीडियाकर्मियों में खुशी का माहौल है, जबकि भास्कर प्रबंधन के खेमे में निराशा है।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार एवं आरटीआई कार्यकर्ता
मुंबई
संपर्क : 9322411335

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चपरासियों से इस्तीफे साइन कराए भास्कर ने

अपने आपको देश का सबसे बड़ा अखबार बताने वाला दैनिक भास्कर भी मजीठिया आयोग से घबराने लगा है। पहले उसने सभी कर्मचारियों से सामूहिक इस्तीफे लिए। कोर्ट ने इसे नामंजूर कर दिया और कहा कि कुछ भी कर लो लेकिन मजीठिया देना पड़ेगा।

अब भास्कर ने वही गलती दोहराते हुए ग्रुप के सभी चपरासियों से इस्तीफे पर साइन करवा लिया है। कुछ चपरासी तो ऐसे हैं जो पिछले 25-30 साल से नौकरी कर रहे हैं। सावधान हो जाइए, अब अगली बारी एडिटोरियल की हो सकती है या प्रोडक्शन पर भी गाज गिर सकती है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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दैनिक भास्कर को गुमराह करने की सजा, सुरजीत दादा का इंदौर ट्रांसफर

पिछले दिनों दैनिक भास्कर लुधियाना के खिलाफ और यहां कार्यरत कर्मचारी प्रीतपाल सिंह संधू के पक्ष में ट्रिब्यूनल कोर्ट द्वारा दिए फैसले में नया मोड़ आया है। सूत्रों के अनुसार जिस सुरजीत दादा के कारण कंपनी को इतनी फजीहत सहनी पड़ी है, उसे मैनेजमेंट ने इंदौर ऑफिस ट्रांसफर कर दिया है। वहां सुरजीत दादा को फिलहाल कोई बड़ा काम नहीं दिया गया। इससे पहले वह अपने आप को पंजाब का क्रिएटिव हेड मानकर लगभग दस साल से अपनी मनमानी चलाता रहा है। अपने भाईयों और रिश्तेदारों को दैनिक भास्कर में भर्ती करवाकर उन्हें मोटी तनख्वाहें दिलाईं।

सीनियर ग्राफिक डिजाइनर प्रीतपाल सिंह संधू का चार साल पहले प्रबंध को लिखा पत्र भी हमें मिला है जिसमें उन्होंने सुरजीत दादा की करतूत प्रबंधन को बताने की कोशिश की थी। लेकिन दादा प्रबंधन की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब रहा और प्रीतपाल जैसे कर्मचारियों को तंग करता रहा। सूत्रों के अनुसार सुरजीत दादा का इतनी देर बचने का कारण तब के स्टेट एडीटर कमलेश सिंह थे क्योंकि सुरजीत दादा खुद को उनका करीबी मानता था जिस कारण वह सुरजीत को बचाते रहे।

प्रीतपाल सिंह संधू द्वारा भास्कर के मैनेजिंग डायरेक्टर को लिखा गया पत्र पढ़ने के लिए अगले पेज पर जाने हेतु नीचे क्लिक करें….

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कोर्ट में भास्कर प्रबंधन को मिली करारी हार, मीडियाकर्मी के हक में आया फैसला, नौकरी बहाल करने के आदेश

दैनिक भास्कर लुधियाना से सूचना आ रही है कि यहां के एक सीनियर डिजाइनर के हक में इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल कोर्ट ने फैसला दिया है. फैसले में कहा गया है कि डिजायनर की नौकरी बहाल की जाए और इतनी देर से हैरसमेंट के एवज में हर्जाना भी अदा किया जाए। सूचना के अनुसार लुधियाना के एक सीनियर डिजाइनर को डिजाइनिंग हेड सुरजीत दादा ने रंजिश के कारण बिना किसी वजह ऑफिस में उसकी एंट्री बंद करा दी थी।

इसके खिलाफ डिजाइनर ने केस दायर किया था। इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल ने भास्कर प्रबंधन को नोटिस भेजा। अब जाकर फैसला मीडियाकर्मी के हक में आया है। जब यह मामला शुरू हुआ था तो पीड़ित डिजाइनर ने सभी अधिकारियों को अपने साथ हो रही ज्यादती के बारे में बताया था, लेकिन किसी ने कोई सुनवाई नहीं की। डिजायनर का नाम प्रीतपाल सिंह संधू है। लेबर कोर्ट में चली पूरी कार्रवाई में भास्कर मैनेजमेंट की तरफ से कोई नहीं आया। डिजायनर प्रीतपाल सिंह संधू ने अपने केस के लिए अपने पक्ष में सारे कागजात और सुबूत कोर्ट को मुहैया कराए। इस आधार पर कोर्ट ने प्रीतपाल की नौकरी बहाल किए जाने और मुआवजा देने का आदेश दिया।

दैनिक भास्कर लुधियाना के एक सीनियर डिजाइनर सुरजीत दादा के कारण कई बार भास्कर मैनेजमेंट बदनाम हुआ है लेकिन वह जाने किन वजहों से भास्कर में बने हुए हैं। सुरजीत पर यह आरोप भी लगातार लगते रहे हैं कि उन्होंने दैनिक भास्कर में भाई भतीजावाद को बढ़ावा दिया। सुरजीत के अंडर में ही उनके छोटे भाई भी काम कर रहे हैं। उनके विभाग में काम करने वाले कई दूसरे कर्मचारी भी उनके रिश्तेदार हैं। पहले जब यह बात उठी थी तो भास्कर के लोकल मैनेजमेंट ने सुरजीत को बचाने के लिए उनके भाइयों की बदली दूसरी यूनिटों में कर दी थी। कहा जाता है कि सुरजीत ने अपने भाइयों को भास्कर में ज्यादा सेलरी पर ज्वॉइन करवाकर यहीं पर काम सिखाया।

फैसले की कापी देखने पढ़ने के लिए अगले पेज पर जाने हेतु नीचे क्लिक करें…

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भास्कर वालों ने महिला के मरने पर उसे चरित्रहीन लिख दिया, परिजनों ने ठोंका संपादकों पर मुकदमा

अखबार वाले किस कदर संवेदनहीन होते जा रहे हैं, इसके उदाहरण तो आए दिन मिलते रहते हैं लेकिन राजस्थान के भीलवाड़ा में एक ऐसा मामला हुआ है जिसे सुनकर पूरे पत्रकार समुदाय का सिर शर्म से झुक जाता है. दैनिक भास्कर वालों ने एक महिला के मरने के बाद उसे चरित्रहीन और व्यभिचारी बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा. इससे नाराज परिजनों ने अखबार के संपादकों पर मुकदमा ठोंका है और कड़ी से कड़ी कार्रवाई की अपील की है.

परिजनों ने भीलवाड़ा एडिशन के पत्रकारों ओम प्रकाश शर्मा, संजय शर्मा और श्यामलाल शर्मा के खिलाफ भीलवाड़ा स्थित अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में परिवाद दायर किया है जिसे सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया गया है. शिकायत की इस कापी को हम नीचे दे रहे हैं, जिसे पढ़कर पूरे प्रकरण को समझा जा सकता है.


आईनेक्स्ट वालों ने समाजसेविका पर किस तरह लांछन लगाया और समाजसेविका ने कैसे आई-नेक्स्ट वालों को सबक सिखाया, जानने के लिए नीचे क्लिक करें >

समाज सेविका ने आई-नेक्स्ट वालों को सबक सिखाया

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पंजाब में डीआईजी ने दैनिक भास्कर के खिलाफ क्रिमिनल केस किया

पंजाब से खबर है कि डीआईजी कुंवर विजय प्रताप सिंह ने अपनी छवि धूमिल किए जाने और गलत खबरें छापने को लेकर दैनिक भास्कर अखबार के खिलाफ क्रिमिनल केस दायर किया है. इस बारे में विस्तार से खबर पंजाब के एक स्थानीय अखबार में छपि है, जिसकी कटिंग नीचे दी जा रही है. अगर पढ़ने में दिक्कत हो तो न्यूज कटिंग के उपर क्लिक कर दें…

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भास्कर समूह का नया अंग्रेजी दैनिक ‘डीबी पोस्ट’ लांच

भास्कर समूह ने अपना नया अंग्रेजी अखबार लांच किया है. भोपाल में लांच इस अखबार का नाम डीबी पोस्ट है. अखबार की प्रिंट लाइन में मुद्रक के रूप में नाम मनीष शर्मा और संपादक के रूप में नाम श्याम पारेख का जा रहा है. भोपाल में स्थानीय संपादक अंकित शुक्ला हैं. अखबार कुल दस पन्ने का है जिसे आनलाइन भी पढ़ा जा सकता है. इ-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: 

http://epaper.dbpost.com

अखबार की लांचिंग के मौके पर डीबी पोस्ट के पहले पन्ने पर भास्कर समूह की कंपनी डीबी कार्प के चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल का पाठकों के नाम संपादकीय छपा है. इसकी कटिंग पढ़ने के लिए नीचे दिया जा रहा है…

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अजमेर में भास्कर और पत्रिका ने दाम बढ़ाया तो अखबार वितरकों ने शुरू किया बहिष्कार, नवज्योति की बल्ले बल्ले

अजमेर में दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका ने एक राय होकर विगत 22 फरवरी को अचानक अखबार की कीमत 4.50 रुपए प्रति कॉपी कर दी। उस दिन तो हॉकर ने अखबार उठा लिया लेकिन अगले दिन उन्होंने बढ़ी कीमत वापस लेने की मांग करते हुए अखबार उठाने से मना कर दिया। उस दिन से वे लगातार दोनों अखबारों का बहिष्कार कर रहे हैं। इससे अखबार प्रबंधन में हड़कम्प मचा हुआ है।

प्रबंधन बढ़ी कीमत वापस लेने और हॉकर्स का कमीशन बढ़ाने को तैयार नहीं हैं। अखबार नहीं उठने से परेशान प्रबंधन ने 10000 रुपए वेतन पर नए हॉकर्स की भर्ती शुरू कर दी है। साथ ही तांगों-जीपों में स्टाफ से अखबार बिकवाया जा रहा है। रातभर काम करने के बाद स्टाफ को सुबह गली-गली भटककर अखबार बांटने को कहा गया है। मगर ऐसा हो नहीं रहा। पांच-छह दिन से शहर में भास्कर-पत्रिका की कॉपियां देखने को नहीं मिल रही है। जाहिर है जो थोड़ी-बहुत कॉपी छापी जा रही है, वह भी रद्दी हो रही है।

दैनिक नवज्योति की पौ-बारह

हॉकर द्वारा भास्कर-पत्रिका का बहिष्कार करने का सीधा फायदा दैनिक नवज्योति को मिल रहा है। शहर में नवज्योति की रिकार्ड तोड़ कॉपियां बिक रही हैं। नवज्योति आजादी पूर्व से निकलने वाला राजस्थान प्रदेश का एकमात्र अखबार है।

अजमेर में भारतीय समाचार पत्र उप वितरक संघ के जिला महासचिव पर हमला

अजमेर। भारतीय समाचार पत्र उप वितरक संघ के जिला महासचिव गोविंद सिंह जादम पर शुक्रवार देरशाम अज्ञात नकाबपोश हमलावरों ने जानलेवा हमला कर दिया। रामगंज थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर हमलावरों की तलाश शुरू कर दी है। इस हमले को हॉकरों की हड़ताल से जोडक़र देखा जा रहा है। इससे माहौल गरमाने की आशंका है।

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क्या वाकई दैनिक भास्कर दुनिया का चौथा सबसे ज्यादा प्रसार वाला अखबार है?

दैनिक भास्कर ने 4 जनवरी को पहले पेज पर मत्थे के नीचे बड़ी खबर छाप कर खुद के विश्व का चौथा सबसे ज्यादा प्रसार वाला अखबार होने का दावा ठोंक दिया है। अखबार ने दुनियाभर मे सबसे ज्यादा बिकने वाले पाँच अखबारों की सूची प्रकाशित की है जिसमे तीन अखबार जापान के और एक-एक अमेरिका और भारत का है। चूंकि दावा अंतर्राष्ट्रीय स्तर का है इसलिए वर्ल्ड एसोसियशन ऑफ न्यूज़पेपर्स एंड न्यूज़ पब्लिशर्स नामक संस्था की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। खबर में दोहराया गया है एबीसी की जनवरी-जून, 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक भास्कर लगातार तीसरी बार देश का सर्वाधिक प्रसार वाला दैनिक बना हुआ है।

इसके उलट रजिस्ट्रार ऑफ न्यूज़ पेपर्स इन इंडिया की वर्ष-2014-2015 की रिपोर्ट जनसत्ता ने प्रेस ट्रस्ट के हवाले से 30 दिसंबर को छापी है। यह कहती है कि देश का सर्वाधिक प्रसार वाला दैनिक आनंद बाजार पत्रिका है। इसके बाद हिंदुस्तान टाइम्स और पंजाब केसरी को दूसरे और तीसरे स्थान पर रखा गया है। यहाँ सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब भास्कर देश के सर्वाधिक प्रसार वाले तीन अखबारों मे ही शामिल नहीं है तो बिक्री के मामले मे विश्व के पाँच बड़े अखबारों मे शुमार कैसे हो सकता है..? अब या तो भारत सरकार की रिपोर्ट गलत है या फिर दैनिक भास्कर का दावा खोखला है..! उधर दैनिक भास्कर, भोपाल की प्रिंटलाईन से पिछले पाँच दिनो से समाचार चयन के लिए जिम्मेदार संपादक का नाम ही गायब है, जबकि पीआरबी एक्ट के तहत ऐसा करना अनिवार्य है।

भोपाल से श्रीप्रकाश दीक्षित की रिपोर्ट.

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भास्कर डाट काम ने नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर अजित डोभाल का झूठा इंटरव्यू छापा

भास्कर डाट काम की जिस खबर पर बवाल मचा है, उसके बारे में कुछ तथ्य साझा करना चाहता हूं. भास्कर डाट काम ने नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर अजित डोभाल का झूठा इंटरव्यू छापा था. जिसका डोभाल ने तत्काल  खंडन कर दिया लेकिन भास्कर बेशर्मी से इंटरव्यू को अभी तक चलाये जा रहा है. कोई भी हिंदी मीडिया को गंभीरता से नहीं लेता उसका ये फायदा उठाते हैं. अगर यह इंटरव्यू किसी अंग्रेजी अखबार की साइट पर होता तो अब तक बवाल मच गया होता.

हकीकत यह है कि डोभाल साहब से कुछ मिनट की अनौपचारिक बातचीत में इस संवाददाता रोहिताश्व मिश्र ने सहमे अंदाज के एक दो सवाल पूछे उसके बाद पूरा इंटरव्यू मनगढ़ंत लिख के चला दिया. डोभाल साहब ने इस पर कारर्वाई करने को कहा है. इससे पहले भी यह संवाददाता पाकिस्तान जाकर दाउद के घर से खबर करने का झूठा दावा कर चुका है जबकि यह आज तक इंडिया से बाहर नहीं गया.

उस वक्त उसने जो खबर की थी वह कई महीने पहले एक्सप्रेस व हिंदू में छप चुकी थी. इंटरव्यू पढ़कर देखिये. क्या एनएसए इस भाषा में बात करता है. यह दसवीं पास पत्रकार की भाषा है. इस पत्रकार से ज्यादा तरस तो इस अखबार के मालिकों व संपादकों पर आता है जो ऐसे चोर व फर्जी पत्रकारों को अपने यहां जगह दिये हैं. इतना ही नहीं, एनएसए के खंडन के बाद उसे गाड़ी व सुरक्षा भी भास्कर प्रबंधन ने मुहैया करायी है. जय हो.

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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भास्कर कोई छोटा-मोटा अखबार नहीं, नया भी नहीं, फिर यह क्या और क्यों कर रहा है…

: यह कैसी पत्रकारिता : दैनिक भास्कर कोई छोटा-मोटा अखबार नहीं है। नया भी नहीं है। फिर यह क्या और क्यों कर रहा है। मीडिया के कॉरपोरेटीकरण में इस बात का कोई मतलब नहीं है कि संपादक कौन है या अखबार किसका है। मतलब ब्रांड का है और ब्रांड की ऐसी फजीहत। वह भी तब जब आसानी से स्थिति सुधारी और अपने अनुकूल की जा सकती है। इसके बावजूद अगर ब्रांड नाम की फजीहत हो रही है तो उद्देश्य बड़े होंगे या ब्रांड खोखला है। अभी मैं इस बाबत कुछ कह नहीं सकता और यही मानकर चल रहा हूं कि अखबार चलाने वालों को जो परिपक्वता और सूझ-बूझ दिखाना चाहिए वह कहीं नहीं दिख रहा है।

देश में पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों की जो स्थिति और स्तर है उसके मद्देनजर संभावना इस बात की भी है कि मीडिया मालिकों को यह मुगालता हो जाए कि हमारे कर्मचारी जब प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी खिंचवाते हैं तो एसपी की क्या औकात। पर यह सब ठीक नहीं है और निरंकुशता थोड़ी देर चल जाए, चलती नहीं रह सकती है। आप जानते होंगे कि दैनिक भास्कर ने एक ऐसी खबर प्रकाशित की जो सांप्रदायिक सौहार्द के लिहाज से संवेदनशील थी और निश्चित रूप से खबर को प्रकाशित करने में संपादकीय विवेक का उपयोग नहीं किया गया था।

अव्वल तो वह खबर वैसे जानी ही नहीं चाहिए थी जैसे गई और अगर जानी ही थी तो उसे खबर के बुनियादी सिद्धांतों के अनुरूप आरोपी के पक्ष के साथ लगाया जाना चाहिए था। इससे खबर संतुलित भी हो जाती। खबर में लिखा है कि एसपी ने कहा कि मामले की जांच कराई जाएगी। अगर ऐसा था तो इंतजार किया जाना चाहिए था पर जल्दी या पहले खबर देने की प्रतिस्पर्धा के लिहाज से इंतजार संभव नहीं था तो भी दूसरे पक्ष का बयान तो होना ही चाहिए था। खबर जिस ढंग से छपी वह निश्चित रूप से आपत्तिजनक है और सोशल मीडिया पर उसका विरोध होना था, हुआ। इसके बाद हो सकता है एसपी पर कार्रवाई के लिए दबाव भी बना हो।

मैंने भी इस खबर पर प्रतिक्रिया में यही लिखा था कि अगर किसी के घर पर पाकिस्तानी झंडा फहराए जाने पर एतराज था या यह खबर थी तो जिसने लगाया था उससे बात की जानी चाहिए थी और तब खबर लिखना चाहिए था। बात की जाती तो पता चल जाता कि रिपोर्टर और फोटोग्राफर जिसे पाकिस्तानी झंडा समझ रहे थे वह पाकिस्तानी नहीं है, कुछ और है। दूसरे झंडा फहराने वाले का पक्ष जाता तो खबर संतुलित हो जाती है। पर ऐसा नहीं किया गया और अगर यह मान लिया जाए कि खबर छापने के पीछे कोई गलत भावना नहीं थी तो भी लापरवाही साफ दिखाई दे रही है और खबर छापने से पहले इस बात की परवाह नहीं की गई कि खबर छपने से सांप्रदयिक सौहार्द बिगड़ सकता है – और ऐसा करना अपराध है। मैंने लिखा था यह मामला दंगा भड़काने या सांप्रदायिक सद्भाव खराब करने की कोशिश में आएगा। भारत में कोई मीडिया से पंगा नहीं लेता वरना एफआईआर होनी चाहिए।

एफआईआर इसलिए भी होनी चाहिए थी कि पहली नजर में यह मामला चूक का नहीं था। पुलिस जांच का इंतजार किया जाता या झंडा फहराने वाले या मुसलिम समुदाय के किसी व्यक्ति से पक्ष जानने की कोशिश की गई होती तो मामला स्पष्ट हो जाता है। जरा सी बुद्धि लगाई जाती तो समझ में आता कि आज के सहिष्णु बताए जा रहे माहौल में कौन मुसलमान हिम्मत करेगा अपने घर पर पाकिस्तान का झंडा लगाने का या ऐसा करके पंगा करना चाहेगा। फिर भी लगा था तो कोई कारण होगा। उसे पता किया जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि अति उत्साह में पहले गलतिया नहीं हुई हैं और जो हुई हैं वे पत्रकारों को मालूम ना हो। जैसे, उपराष्ट्रपति योग समारोह में नहीं गए थे तो कारण था – पर इंतजार नहीं करके जल्दबाजी में किया गया ट्वीट वापस लेना पड़ा था। ऐसे और भी मामले हैं। कार्रवाई किसी मामले में नहीं हुई।

दौसा के इस मामले में एफआईआर तो अखबार के संपादक और मुद्रक के खिलाफ भी होनी चाहिए और कार्रवाई कायदे से उनके खिलाफ भी होनी चाहिए। क्योंकि छोटी मछलियों के खिलाफ कार्रवाई मामले की लीपापोती भर है समस्या का निदान नहीं। अपराध रोकने का उपाय नहीं। अखबार में अगर नालायक, अक्षम या गैर जिम्मेदार लोग हैं तो ऐसा होगा ही। और भविष्य में इस और दूसरे अखबार में ऐसा न हो इसलिए संपादक और मुद्रक को गिरफ्तार किया जाना चाहिए कार्रवाई उनके खिलाफ भी होनी चाहिए। असली जिम्मेदारी उनकी ही होती है। हो सकता है एसपी ने मामले को स्थानीय स्तर का ही माना हो और ज्यादा तूल न देने के लिए नीचे के लोगों को गिरफ्तार किया हो। अखबार इतने पर संभलने और गलती मानने की बजाय दंबई दिखा रहा है। एसपी को धमकाने की ही कोशिश नहीं कर रहा है उनपर आरोप लगा रहा है और बातें छिपा रहा है।

अखबार ने जो खबर छोपी उसका शीर्षक है, “एसपी का गुंडाराज, चार बजे एफआईआर, डेढ़ घंटे बाद ही पत्रकार गिरफ्तार”। अव्वल तो यह प्रशंसनीय है कि आरोप लगने पर डेढ़ घंटे में ही दौसा जैसे शहर में भास्कर के पत्रकार जैसी प्रभावशाली हस्ती को गिरफ्तार कर लिया गया पर अखबार इसे गुंडाराज बता रहा है जबकि खुद गुंडई कर रहा है। अखबार ने आगे लिखा है, “दौसा में पुलिस अधीक्षक योगेश यादव के गुंडाराज के आगे जनता बेबस नजर रही है। अब तो शहर में हालात यह हो गए कि मामलों में बिना जांच के ही एसपी के हुक्म से पुलिस निर्दोष लोगों को गिरफ्तार करने लगी है। शहर में बढ़ रहे अपराधों पर अंकुश लगाने में नाकाम एसपी के खिलाफ जब भास्कर ने लगातार खबरें प्रकाशित की तो बौखलाए एसपी ने पत्रकार भुवनेश यादव को ही गिरफ्तार कर लिया।

गिरफ्तारी से पहले एसपी के निर्देश पर शुक्रवार शाम चार बजे पत्रकार के खिलाफ साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने का आरोप लगा मामला दर्ज किया गया। मामला दर्ज होने के महज डेढ़ घंटे बाद ही करीब साढे़ पांच बजे पत्रकार को गिरफ्तार कर लिया। वह भी तब जब पत्रकार यादव सूचनाएं एकत्र करने के लिए एसपी ऑफिस गए थे।” यह सरासर बदमाशी है और अखबार या खबर देने के अधिकार का दुरुपयोग। कायदे से अखबार को गलती स्वीकार कर माफी मांगनी चाहिए पर वह उल्टे धौंस जमा रहा है।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम करने के बाद इन दिनों सेल्फ इंप्लायड के बतौर अनुवाद का काम संगठित तौर पर करते हैं. संजय से संपर्क anuvaadmail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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दैनिक भास्कर को घुटने टेकने पड़े, माफीनामा प्रकाशित किया

Mohammad Anas :   हजरात हजरात .. दैनिक भास्कर वालों ने आज दौसा मामलें में माफ़ी मांग ली. और इसी के साथ सांप्रदायिक, जातिवादी, कट्टरपंथी मीडिया घराने को टेकने पड़े घुटने. मैंने पहले ही दिन कहा था जनता इस लोकतंत्र में सबसे बड़ी होती है. करोड़ो/अरबों रुपये के भास्कर का नकली दंभ, अकड़ ढीली करने के लिए दौसा के एसपी योगेश यादव को बेहद शुक्रिया. योगेश जी से बात हुई थी मेरी, मैंने कहा था उनसे कि चढ़ कर रहिएगा, दबाव बनेगा लेकिन वो कोहरे की तरह हट जाएगा.

उन्होंने कहा कि कानून ही डर जाए तो अपराधी बेलगाम हो जाते हैं. मैं डरने वाला नहीं.

तो भास्कर वालों, अपने पत्रकार की जमानत की फ़िक्र करो. न्यायिक हिरासत में जा चुका है. भेजो वकील. और, भविष्य में दुबारा ऐसी गलती न करना. चलो, अब मामला ख़त्म मेरी तरफ से.

विशेष- कार्यकारी संपादक मुकेश माथुर और नेशनल एडिटर कल्पेश याग्निक ने न तो कभी बाइक चोरी की है न तो चेन स्नैचिंग की है. मुकेश जी तो बहुत प्यारे इंसान हैं और कल्पेश जी भी. मुकेश जी से जब बात हुई मेरी तो उन्होंने यही कहा मुझसे, ‘अनस जी मैं बाइक चोर नहीं हूँ.’ ऐसे में उन पर यह आरोप लगाने का कोई औचित्य नहीं. यदि भास्कर परिवार को इस आरोप से पीड़ा पहुंची हो तो खेद व्यक्त करता हूं.

धन्यवाद!

युवा पत्रकार मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.

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दैनिक भास्कर ने आग लगाने का पूरा इंतज़ाम किया, लेकिन दादरी इस देश का अपवाद है, दौसा मुख्यधारा है

Dilip C Mandal : भारत में पत्रकारिता, किसी अबोध बच्चे के, हाथों की, जूजी है। (कवि धूमिल से प्रेरित, संग्रह- संसद से सड़क तक) । दैनिक भास्कर ने 17 दिसंबर की डेटलाइन से एक फड़कती हुई, सनसनीख़ेज़ खबर छापी। राजस्थान के दौसा शहर में एक घर की छत पर पाकिस्तानी झंडा। पत्रकार ने इस बारे में पुलिस कप्तान को बताया तो उन्होंने कह दिया गंभीर मामला है। बस बन गई खबर। अब आप तस्वीर देखिए। इस इस्लामी धार्मिक झंडे को देश में कौन नहीं जानता? हर धार्मिक मौक़े पर दुनिया भर के मुसलमान इसे घरों और धार्मिक स्थलों पर लगाते हैं। किसी को कभी दिक़्क़त नहीं हुई।

लेकिन पत्रकार नाम का अबोध बच्चा उत्तेजित हो गया। पत्रकार अगर अबोध बच्चा है, तो घर के मालिक से पूछ सकता था। चाहता तो मोबाइल से फोटो खींचकर पुलिस को दिखा सकता था। Google पर पाकिस्तानी झंडे की तस्वीर से मिला कर देख सकता था। लेकिन इतनी मशक़्क़त कौन करे? अपनी अक़्ल के हिसाब से पत्रकार तो सर्वज्ञानी होता है। यही उसकी ट्रेनिंग है। रिपोर्टर ने खबर दी, डेस्क ने ले ली और संपादक ने छाप दी। किसी को कुछ भी नहीं खटका।

भोलापन कहिए या शरारत कि खबर के साथ मोहल्ले का नाम और घर के मालिक का नाम भी छाप दिया। यानी अपनी तरफ़ से आग लगाने का पूरा इंतज़ाम। लेकिन ख़ैरियत है कि दादरी इस देश का अपवाद है और दौसा मुख्यधारा है। इस खबर के बावजूद शहर में अमन चैन है और यह खबर स्टेटस लिखे जाते समय भी भास्कर की वेब साइट पर मौजूद है। 1990 के दौर में ऐसी आग लगाऊ खबरों की वजह से दंगे हो जाते थे और लोग मारे जाते थे। संपादकों ने उस दौर में खूब ख़ून बहाया।

Facebook समेत सोशल मीडिया ने इस मामले में पत्रकारों की दंगाई ताक़त को अब कम कर दिया है। दौसा को लेकर भी सोशल मीडिया ने शानदार भूमिका निभाई। बधाई। अबोध पत्रकारों और बाल संपादकों के लिए मैं नई दिल्ली के पाकिस्तानी हाई कमीशन में लगा पाकिस्तान का झंडा लगा रहा हूँ। देख लो, ऐसा होता है। पेशे की संवेदनशीलता को देखते हुए आवश्यक हो गया है कि हर संपादक और पत्रकार अपने जीवन में कम से कम एक बार ही सही, लेकिन प्रेस कौंसिल की उस गाइडलाइन को पढ़े, जो सांप्रदायिकता से जुड़ी खबरों के बारे में जारी की गई है और प्रेस कौंसिल की वेब साइट पर मौजूद है।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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भास्कर की झूठी खबर से दंगा होते-होते बचा, सोशल मीडिया पर कल्पेश याज्ञनिक की थू-थू

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उन्माद फैलाने में भास्कर का रिपोर्टर गिरफ्तार, प्रबंधन को लगी मिर्ची, एसपी को दबाव में लेने की कोशिश

Mohammad Anas : इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि गैरज़िम्मेदार पत्रकारिता और भड़काऊ लेख पर भास्कर की गर्दन दबोची गई है। शर्म करो भास्कर। ब्रांड को तगड़ा झटका लगा है। एसपी योगेश यादव को दैनिक भास्कर कर रहा है ब्लैकमेल। अख़बार की ताक़त दिखाने की कोशिश। एसपी के खिलाफ ख़बर लिख कर दबाव बनाने की कोशिश। आज भास्कर अपने दलालों के साथ सीएम शिवराज से मुलाकात करेगा। हम सब एसपी योगेश यादव के साथ हैं। उन्होंने कानूनी दायरे में रह कर उचित कार्यवाई की है। यदि उनका ट्रांसफर या कुछ और किया जाएगा तो ठीक नहीं होगा। कुल मिलाकर दंगा भड़काने की दैनिक भास्कर की साज़िश हो गई है बेनक़ाब, जिसके बाद भास्कर प्रबंधन खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तर्ज पर अब एसपी को निशाना बना कर दबाव में लेने की कोशिश कर रहा है।

 

 

हां, यह भी सुन लो भास्कर वालों। तुम अपने अख़बार से बदनाम करोगे तो हम तुम्हें सोशल मीडिया पर कहीं का नहीं छोड़ेंगे। छीछालेदर कर देंगे। मध्य प्रदेश और राजस्थान के मीडिया दफ्तरों में कल शाम से जो सबसे ज्यादा चर्चा में बात रही वो है,’क्या कल्पेश याग्निक ने सच में चेन स्नैचिंग की है।’ ‘क्या मुकेश माथुर सच में बाइक चोरी के आरोप में दो महीने की सज़ा काट चुका है।’ मीडिया साथियों ने चाय की चुस्कियों के बीच दिन भर इस बात पर मौज लिया। धन्यवाद फेसबुक। ये भी एक तरीका है, यदि अख़बार और संपादक को लगता है कि उन्होंने दौसा में कोई गलत काम नहीं किया है तो हमें भी लग रहा है कि हमने कुछ गलत नहीं लिखा। शोषितों का दर्द है, महसूस शायद ऐसे ही हो।

 

Rishi Kumar Singh : दौसा में भास्कर के रिपोर्टर ने ईद मिलादुननबी के झंडे को पाकिस्तानी झंडा बता दिया। इससे याद आया कि क्यों पिछली मुलाकात में कुछ लोग दावा कर रहे थे कि बहराइच के फलां मुस्लिम बाहुल्य मोहल्ले में पाकिस्तानी झंडा लहराया जाता है। हालांकि उस वक्त मुझे ऐसी किसी गफलत का अंदाजा नहीं हुआ था, क्योंकि वे इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए थे कि क्या आपने खुद अपनी आंखों से देखा है या किसी की कही दोहरा रहे हैं। जाहिर है कि उन्होंने खुद ऐसा कुछ नहीं देखा था या कहें कि कभी ऐसे मोहल्लों से गुजरे भी न थे। यह सांप्रदायिक विभाजन के साथ संवाद व भरोसे के घटने व अफवाह व आशंका की बढ़ोतरी का भी संकेत है। वैसे दौसा का मामला उन सभी पत्रकारों के लिए सबक है, जो खबर करते समय भक्त शिरोमणि बन जाते हैं।

Sabyasachi Sen : पत्रकारिता के नाम पर जहर फैलाने वाले दैनिक भास्कर के नेशनल संपादक कल्पेश याग्निक को इस्तीफा देकर किसी सनातन संस्था टाईप कट्टरपंथी समुह ज्वॉइन कर लेना चाहिऐ। इस तस्वीर को पाकिस्तानी झंडा बनाने के साथ साथ गृहस्वामी का नाम पता छाप कर दादरी जैसे घटना को दोहराने की कोशिश करने वाले पर सख्त कारवाई की जानी चाहिए। भारतीय मीडिया कल्पेश याग्निक जैसे असमाजिक तत्वो से भड़ा पड़ा है, ऐसे तत्वो और ऐसे अखबारो का सार्वजनिक बहिष्कार हमसब को करना होगा। ये सिर्फ मुसलमानो का ही नही हर जिम्मेदार नागरिक का है जो इस देश मे शांति से जीना चाहता है। किसी भी न्यूज पर प्रतिक्रया देने से पहले उसकी विश्वसनीयता को अच्छी तरह से परख लेना चाहिए।

पत्रकार मोहम्मद अनस, ऋषि कुमार सिंह और सब्यसाची सेन के फेसबुक वॉल से.

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भास्कर की झूठी खबर से दंगा होते-होते बचा, सोशल मीडिया पर कल्पेश याज्ञनिक की थू-थू

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भास्कर ने आग लगाने का पूरा इंतज़ाम किया, लेकिन दादरी इस देश का अपवाद है, दौसा मुख्यधारा

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भास्कर की झूठी खबर से दंगा होते-होते बचा, सोशल मीडिया पर कल्पेश याज्ञनिक की थू-थू

 

 

Mohammad Anas : सेवा में,
कल्पेश याग्निक,
नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

श्रीमान,

जैसा कि कुछ लोगों ने मुझे बताया कि आप दैनिक भास्कर नाम के हिंदी अखबार के नेशनल एडिटर भी हैं तो मुझे आश्चर्य हुआ कि आप एक साथ दो काम कैसे कर लेते हैं. पहला काम ये कि अपने अखबार के माध्यम से इस्लाम और मुस्लिम विरोध की मुहीम चलवाते हैं और दूसरा काम सम्पादक जैसा निरपेक्ष और सम्मानित पद पर बने हुए हैं. यह दोनों तो अपने आप में ही विपरीत लगते हैं. या तो आप अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति घृणा ही करें और उसे फैलाएं या फिर सम्पादक पद से इस्तीफा दे कर सनातन संस्था जैसे कट्टर प्रवृत्ति के लोगों की कलम की स्याही ही बने रहें.

महोदय, यह जोधपुर शहर दैनिक भास्कर के अखबार की क्लिप है. जिसमें एक मुसलमान के घर पर ईद मिलादुननबी के अवसर पर होने वाले जश्न की तैयारियों के तहत इस्लामी झंडा लगाया गया है जिसे आपने अपने पत्रकारों और संपादकों के जरिये पाकिस्तानी बता कर न सिर्फ जोधपुर के मुसलमानों बल्कि पूरे देश के मुसलमानों की देश के प्रति निष्ठा,सेवा भाव एवं प्रेम पर न सिर्फ संदेह पैदा करने का काम किया है बल्कि अपमानित करने का घृणित कार्य भी किया है.

कल्पेश याग्निक जी, आप और आपका अखबार मुसलमानों से इतनी नफरत करता है की उसे उसके उत्सवों और खुशियों, उसकी पहचान, प्रतिष्ठा, सम्मान की ज़रा भी फ़िक्र नहीं. आपका अखबार है या फिर सनातन संस्था का जहर बुझा पत्र जिसमें नफरत की खेती की जाती है.

 

यह आपको पाकिस्तान का झंडा दिखाई दे रहा है? मुझे पता है आपके ऊपर और नेशनल न्यूज़ रूम के संपादकों पर इसका कुछ असर नहीं पड़ेगा लेकिन इतनी बेईमानी और नफरत के साथ कैसे नींद आती है आप लोगों को. इतनी लुच्चई और लफंगई के बाद भी आप लोगों को पत्रकार कैसे मान लिया जाता है. ऐसी नफरत की कमाई से अपने बच्चों को क्या खिला रहे हैं, कभी सोचा है? वो बच्चे इंसानी गोश्त और लहू का नाश्ता कर रहे हैं और आप उनको ख़ुशी ख़ुशी खिला रहे हैं. आप लोग जिस हवा में सांस ले रहे हैं वो हवा नहीं है ,वो तो आपके द्वारा उड़ाई गयी नफरतों से भरी अफवाहें हैं जिसके असर से रातों की नींद गायब रहती है और आपको लगता है की आप मज़े से सो रहे हैं.

चूँकि, किसी अदालत या कानून में फंसने लायक आप लोगों की गर्दन नहीं है इसलिए मैं आपके जमीर को ललकार रहा हूँ. जिस असाध्य रोग की चपेट में आप सब हैं उसका इलाज ऐसे ही होता है. यह पाकिस्तान का झंडा है कल्पेश याग्निक और उसके संपादकों? इतनी समझ आज तक नहीं हासिल कर सके, अरे जिन मुसलमानों के बीच सैकड़ों साल से रह रहे हो, उनकी पहचान, उनकी तहजीब से इतने कटे हो और दावा करते हो की पत्रकार हो. आप लोग तो दंगाई हैं, बिल्कुल वैसे दंगाई जो तलवार और पेट्रोल से महिलाओं /बच्चों /बूढ़ों का क़त्ल करते हैं. आपकी कलम और आपकी तस्वीरें हिन्दुस्तान का मुस्तकबिल बिगाड़ रही हैं.

कल्पेश याग्निक, शर्म आनी चाहिए आपको. एक समुदाय के खिलाफ समाज में नफरत फैलाते हुए लेकिन आपको क्यों आएगी ? आपने तो उसी दिन सब कुछ बेच दिया था जिस दिन दैनिक भास्कर के सम्पादक बन कर कुर्सी संभाली थी. कल्पेश याग्निक, इतनी नफरत बटोर कर कहाँ खर्च करते हो ? कितना फायदा होता है इंसानों के बीच मन मुटाव बढ़ा कर, क्या उस फायदे से कुछ हासिल भी हो रहा है? नहीं मिलेगा कुछ, बता रहा हूं.

कल्पेश याग्निक, ऐसे लाखों-करोड़ों झंडे भारत में मुसलमानों के घरों पर लगे हुए हैं. इतने परचम लहरा रहे हैं कि सबकी तस्वीर छापते छापते बुढ़ापा आ जाएगा तब भी नहीं ख़त्म होगी कहानी. सिर्फ एक घर नहीं है कल्पेश, पूरे हिन्दोस्तान में कई करोड़ घर हैं. आपकी माने तो वे सारे मुसलमान पाकिस्तानी हुए. तो भेज दो हमें पाकिस्तान कल्पेश याग्निक. बताओ कब और कैसे भेज रहे हो.

मैं तुम्हें और तुम्हारी राजस्थान दैनिक भास्कर टीम को दंगाई कहता हूं. मैं तुम्हें कट्टरता का दलाल कहता हूं. मैं तुम सबको मुल्क के अमन चैन से खिलवाड़ करने वाला कहता हूँ. असल में तुम्हारी एक गैंग है, जिसमें समाज का सुख चैन छिनने वाले डकैत काम करते हैं.

लगाओ देशद्रोह की धारा मुझ पर.

 

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दादरी में अख़लाक की हत्या करने के लिए भीड़ को मंदिर के लाउडस्पीकर से आवाज़ देकर इकट्ठा किया गया था। आरोप था गाय का गोश्त फ्रिज में रखा गया है। जांच में यह आरोप झूठा पाया गया। दौसा, राजस्थान में एक घर पर लगे ईद मिलादुननबी के जश्न वाले हरे झंडे को दैनिक भास्कर ने पाकिस्तानी झंडा कहते हुए राजस्थान एडिशन में अफवाह फैलाई है। अख़बार के नेशनल एडिटर कल्पेश याज्ञनिक समेत राजस्थान डेस्क के हेड और दौसा के इंचार्ज़, कॉपी एडिटर और रिपोर्टर पर दंगा भड़काने के लिए झूठी अफवाह फैला कर समाज में नफरत का कारोबार करने का केस दर्ज किया जाना चाहिए। दादरी और दौसा की दोनों घटनाओं में कोई अंतर नहीं है। दादरी में हत्या हो गई थी, दौसा में हत्याकांड का पूरा प्लान कल्पेश याज्ञनिक और उसके लोगों ने तैयार कर लिया था। बस कामयाबी हाथ नहीं लगी। दैनिक भास्कर का बहिष्कार करें।

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राजस्थान में दैनिक भास्कार द्वारा मुसलामानों के खिलाफ समाज में विद्वेष फैलाने के मकसद से एक फर्जी और भड़काऊ ख़बर लिखी गई. दैनिक भास्कर के नेशनल हेड कल्पेश याग्निक के इशारों पर राजस्थान के दौसा एडिशन में स्थानीय सम्पादक, कॉपी एडिटर और रिपोर्टर तथा फोटोग्राफर की मिली जुली साज़िश को सोच समझ कर अंजाम तक पहुंचाया गया. दौसा से शुरू हुआ प्रोपगंडा पूरे राजस्थान के दैनिक भास्कर एडिशन में पब्लिश किया गया. हजरत मुहम्मद के जन्मदिवस के अवसर पर ईद मिलादुन्नबी के तहत मुसलमान अपने घरों पर हरे रंग का झंडा लगाते हैं. इस झंडे को दैनिक भास्कर ने पाकिस्तानी झंडा बताते हुए पुलिस से कार्यवाई की मांग कर डाली. तो कल्पेश याग्निक और उसके डकैत देश भर के करोड़ों मुसलमानों को जेल भेजना चाहते हैं. जयपुर के कुछ लोग आई जी से मिल कर दैनिक भास्कर के खिलाफ ज्ञापन दे चुके हैं. कार्यवाई न होने तक प्रदर्शन होते रहेंगे. देश भर में भास्कर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की ख़बर मिल रही है. राजस्थान के जोधपुर में इस अखबार को जलाया जाएगा.

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इस्लामी झंडे को पाकिस्तानी झंडा बता कर सांप्रदायिकता फैलाने वाले दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर कल्पेश याग्निक और राजस्थान दैनिक भास्कर के कार्यकारी संपादक मुकेश मधुर के खिलाफ तब तक लिखते रहिए जब तक ये अख़बार के माध्यम से अपमानित करने वाली अफवाह पर माफी न मांग लें। ईद मिलादुननबी के जश्न पर घरों पर लगने वाले हरे रंग के झंडे को पाकिस्तानी बता कर न सिर्फ एक मुस्लिम परिवार की सुरक्षा और भरोसे के साथ खिलवाड़ किया गया है बल्कि देश भर के मुसलमानों को अपमानित किया गया है।

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ये रहा वो दंगाई कार्यकारी संपादक और उसकी पूरी टीम जिसने राजस्थान के दौसा के एक घर पर लगे हरे रंग के झंडे जिसमें चाँद तारा बना हुआ था को पाकिस्तानी झंडा बता कर पूरे राजस्थान में प्रचारित करने का अपराधिक कार्य किया है। इसका नाम है Mukesh Mathur. बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध प्रदर्शन के बाद भास्कर के नेशनल एडिटर कल्पेश याग्निक ने आज के अख़बारों में पूरा मामला पुलिस के कंधे पर डाल खुद को बचाने जैसी स्टोरी लगाई है। हमारी मांग है कि मुकेश माथुर के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाई की जाए और संपादक जैसे महत्वपूर्ण पद से हटाया जाए। मुकेश माथुर के फेसबुक वॉल पर इस्लाम विरोधी कुप्रचार सामाग्री की भरमार है और हाल ही में उसने शाहरुख खान द्वारा दिए गए असहिष्णुता सम्बंधित बयान पर शाहरूख की आलोचना करती हुई पोस्ट लगाई है। ऐसे पूर्वाग्रही और दंगाई प्रवृत्ति के व्यक्ति ही बेहतर समाज और खुशहाल राष्ट्र निर्माण की राह में सबसे बड़े बाधक के रूम में गिने जाते हैं।

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दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर कल्पेश याग्निक, राजस्थान दैनिक भास्कर के सम्पादक लक्ष्मी प्रसाद पंत, कार्यकारी सम्पादक मुकेश मधुर ने आज अपने अखबार में फर्जी अफवाह फैलाने और मुसलमानों को बदनाम करने की ख़बर वापस ले ली है. भास्कर ने राजस्थान में हिन्दू और मुसलमान दंगा करवाने की साज़िश के तहत जानबूझ कर ईद मिलादुन्नबी के जश्न के तौर पर एक घर पर लगे हरे रंग के झंडे को पाकिस्तानी बता कर अपमानित करने का काम किया था. भास्कर ने मकान मालिक का नाम भी छापा, जो प्रथम दृष्टया मानहानि और सुरक्षा को ख़तरे में डालने का मामला बनता है. मुस्लिम परिवार को पाकिस्तानी कहना और उसके मुखिया का नाम छाप कर उसकी सुरक्षा को खतरे में डालना, एक मुसलमान के प्रति अन्य समुदाय में यह भ्रम पैदा करवाना की वह पाकिस्तान समर्थक है, एक मुसलमान को समाज से अलग थलग करने की यह कोई अंजाने में लिखी गई ख़बर नहीं है. स्थानीय सम्पादक मुकेश मधुर और नेशनल एडिटर कल्पेश याग्निक को शर्म आनी चाहिए. उनका भेद खुल गया है.

माखनलाल विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई किए और आजकल सोशल मीडिया पर अल्पसंख्यकों के हितों को लेकर सक्रिय मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से

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‘दैनिक भास्कर’ ने जिन्दा थानेदार को मार डाला!

हत्या बेलसर ओपी प्रभारी की हुई खबर छपी लालगंज थानाध्यक्ष की

अपने को देश का सबसे विश्वसनीय और नंबर-1 होने का दावा करने वाला ‘दैनिक भास्कर’ के पटना संस्करण ने पाठकों को अचंभित कर देने वाली एक खबर छापी है। 19 नवम्बर को प्रकाशित यह खबर भास्कर के पहले पन्ने पर सेकेंड लीड खबर है। बुधवार को वैशाली के लालगंज में उपद्रवियों के हमले में बेलसर के ओपी प्रभारी अजीत कुमार की हत्या कर दी गई थी पर ‘दैनिक भास्कर’ ने गुरुवार को अपने प्रकाशित खबर में जो हेडिंग ‘लालगंज के थानाध्यक्ष को उग्र भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला।’

यह खबर अखबार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करने वाला है। गौरतलब है कि फिलवक्त लालगंज के थानाध्यक्ष सुमन कुमार हैं जो सही सलामत हैं पर देश का सबसे विश्वसनीय और नंबर-1 होने का दावा करने वाले इस अखबार ने एक जिन्दा थानेदार को मृत घोषित कर दिया। लालगंज के थानाध्यक्ष सुमन कुमार को जानने वाले व उनके परचितों ने जब इस अखबार को पढ़ा तो सभी विचलित हो गए। ऐसे विचलितों के फोन से सलामत सुमन कुमार सुबह से ही परेशान हैं।

पटना के वरिष्ठ पत्रकार विनायक विजेता की रिपोर्ट.

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मोबाइल टावर्स लगाने का लालच और विज्ञापन के भूखे लालची अखबार… पढ़िए एक युवा ने क्यों कर लिया सुसाइड

Vinod Sirohi : जरूर शेयर करें —मोबाइल टावर्स लगाने का लालच और विज्ञापन के भूखे लालची अखबार — आप पर कोई बंदिश नहीं है आप इस मैसेज को बिना पढ़े डिलीट कर सकते हैं। अगर आप पढ़ना चाहें तो पूरा पढ़ें और पढ़ने के बाद 5 लोगों को जरूर भेजें।

मेरा नाम राहुल है। मैं हरियाणा के सोनीपत जिले के गोहाना का रहने वाला हूँ। आप भी मेरी तरह इंसान हैं लेकिन आप में और मुझमें फर्क ये है कि आप जिन्दा हैं और मैंने 19 अगस्त, 2015 को रेल के नीचे कटकर आत्महत्या कर ली।

चौकिये मत, नीचे पढ़िये।

मेरा परिवार गरीबी से जूझ रहा था। एक दिन मैंने एक हिन्दी के अख़बार में (अपने आप को हिन्दी जगत का प्रमुख अखबार बताने वाला ) मोबाईल टावर लगाने सम्बन्धी विज्ञापन पढ़ा। इसमें 45 लाख एडवांस, 50 हजार रूपये महीना किराया तथा 20 हजार रूपये प्रतिमाह की सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी देने की बात कही थी। मैनें दिये गये नम्बर पर फोन किया तो उन्होंने हमारे प्लाट का पता ले लिया जहाँ मैं टावर लगवाना चाहता था। अगले दिन उन्होंने मुझे फोन करके मुबारकबाद दी और कहा कि मेरा प्लाट टावर लगने के लिए पास हो गया है। उन्होंने मुझे रजिस्ट्रेशन फ़ीस के तौर पर 1550 रूपये स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के खाता 20266209852 ब्रांच लाजपत नगर नई दिल्ली में डालने के लिए कहा। मैंने 1550 रूपये डाल दिये तो उन्होंने मुझे रिलायंस कम्पनी का ऑफर लेटर तथा एक लेटर सूचना और प्रोद्द्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार का मेरी ईमेल पर भेजा जिसमें 27510 रूपये सरकारी टैक्स जमा करवाने की बात कही गई थी।

मैंने 27510 रूपये भी जमा करवा दिये तो उन्होंने मुझसे 13500 रूपये डिमांड ड्राफ्ट चार्जेज के तौर पर जमा करवाने के लिए कहा। मैंने ये रूपये भी जमा करवा दिए तो उन्होंने मेरे फोन उठाने बंद कर दिये। जो पैसे मैंने इस खाते में जमा करवाये वह पैसे मेरी बहन की शादी के लिए रखे थे। मैं अपने परिवार को 45 लाख रूपये का सरप्राइज देना चाहता था, लेकिन जब मुझे ठगी का एहसास हुआ तो मैं अपने परिवार को मुहँ दिखाने के लायक नहीं बचा और मैंने रेल के नीचे कटकर आत्महत्या कर ली।

मेरी असमय मौत के बाद मेरी रूह धरती पर ही भटक रही है और लोगों को ठगी के इस जंजाल के प्रति जागरूक कर रही है। मेरे दावे की सत्यता के लिये आप ऊपर दिये गये बैंक खाते की 11 अगस्त से 18 अगस्त की स्टेटमेंट देख सकते हैं। ऐसे लगभग 300 फ्रॉड ग्रुप अख़बारों में फर्जी विज्ञापन देकर भोले-भाले लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। इनके झांसे में ना आयें। आप 5 लोगों को 2 मिनट में ये सन्देश जरूर भेजें और पार्क, बैठक, घर और दफ्तर के लोगों को मौखिक तौर पर इस ठगी के खेल के बारे में जरूर बतायें। मेरी रूह को शान्ति मिलेगी और आपको आत्मसंतुष्टि।

यूपी पुलिस में इंस्पेक्टर विनोद सिरोही के फेसबुक वॉल से.

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रिपोर्टर सर्वेश कुकरा ने दैनिक भास्कर के फरेबी मालिकों रमेश अग्रवाल और सुधीर अग्रवाल के खिलाफ दायर किया धोखाधड़ी का केस

: टारगेट पूरा करने के बावजूद विदेश भेजने का वादा पूरा न करने पर रिपोर्टर ने दायर किया केस, कोर्ट ने पुलिस को जांच के निर्देश दिए, अगली सुनवाई 19 अक्टूबर को : हरियाणा में हिसार जिले के हांसी शहर में दैनिक भास्कर के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दायर किया गया है। इसमें दैनिक भास्कर के चेयरमैन रमेश अग्रवाल, एमडी सुधीर अग्रवाल समेत कई लोगों को पार्टी बनाया गया है। दैनिक भास्कर के पूर्व रिपोर्टर सर्वेश कुकरा ने कोर्ट में दायर की गई शिकायत में कहा है कि दैनिक भास्कर ने उन्हें विज्ञापन का एक टारगेट पूरा करने के एवज में विदेश टूर का वायदा किया था।

इस बारे में उन्हें लेटरहैड पर ऑफर भी दिया गया था लेकिन टारगेट पूरा होने पर भास्कर ने उन्हें धोखा दे दिया तथा टूर नहीं दिया। इस केस में दैनिक भास्कर के चेयरमैन रमेश अग्रवाल, एमडी सुधीर अग्रवाल के अलावा हिसार के संपादक हिमांशु घिल्डियाल, मार्केटिंग हैड अशोक शर्मा तथा धीरज त्रिपाठी को भी पार्टी बनाया गया है। कोर्ट ने इस मामले में पुलिस को जांच के निर्देश दिए हैं। सर्वेश कुकरा ने कोर्ट में दायर की गई शिकायत में तमाम ऑफर लैटर तथा बैंक की स्टेटमेंट भी लगाई है जिनके द्वारा भास्कर को पेमेंट किए जाने की बात सत्यापित होती है। मामले की अगली सुनवाई 19 अक्तूबर को होगी।

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दैनिक भास्कर ने भागलपुर के बाद गया से भी लांच किया एडिशन, अब मुजफ्फरपुर की बारी

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले दैनिक भास्कर बिहार के प्रमुख शहरों में विस्तार करो अभियान के तहत अब गया जिले से भी एडिशन लांच कर दिया है. इसके पहले भागलपुर से एडिशन शुरू किया था. दैनिक भास्कर का संचालन करने वाली कंपनी डीबी कॉर्प ने बिहार में अपने नेटवर्क का विस्तार का क्रम जारी रखा हुआ है. गया में दैनिक भास्कर का एडिशन लांच होने के बाद गया दैनिक भास्कर का 60वां एडिशन हो गया है.

सोमवार को एक समारोह में शहर के प्रबुद्ध नागरिक, राजनीतिज्ञ, साहित्यकार और प्रशासनिक अफसरों की मौजूदगी में अखबार का लोकार्पण किया गया है. पटना में दैनिक भास्कर को मिली सफलता के बाद गया बिहार में भास्कर का तीसरा पड़ाव है. 7 अगस्त को दैनिक भास्कर के मुजफ्फरपुर एडिशन का भी शुभारंभ हो जाएगा. चार एडिशन के बाद दैनिक भास्कर संपूर्ण बिहार का अखबार होगा.

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