मजीठिया वेजबोर्ड संघर्ष : अपने ही जाल में फंसते जा रहे हैं भास्कर के साहेबान

हिसार : मजीठिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस करने वाले कर्मचारी अब भास्कर प्रबंधन के गले की फांस बनते जा रहे हैं। एक तरफ तो अधिकारियों को कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट में पार्टी बनाने की योजना बना रहे हैं वहीं आला अधिकारी डर के मारे लेबर कोर्ट में चल रही सुनाई में भी स्वयं न आकर अपने जूनियरों को भेज रहे हैं ताकि उनका दामन और गला दोनों सेफ रहे। सोमवार को हुई लेबर कोर्ट की सुनवाई में बाहर से कोई भी अधिकारी नहीं पहुंचा।

एचआर के कार्यकारी मैनेजर को फिर से लेबर कोर्ट में भेज दिया गया। पिछली बार तो वो कर्मचारियों से पहले जाकर टाइम लेने को तैयार हो गए थे। इस बार कर्मचारियों ने पहले ही डेरा जमाया हुआ था। लीलाधर ने लेबर कोर्ट से कागजात पेश करने के लिए फिर एक महीने का समय मांगा। इस पर लेबर कोर्ट ने साफ तौर से मना कर दिया। पहले आपको चार दिन का समय दिया गया था अब और समय नहीं दिया जा सकता। बार बार प्रार्थना किए जाने पर लीलाधर को 48 घंटे का समय दिया गया है, जिस पर सुनवाई बुधवार को होनी है।

उधर, मंगलवार को मजीठिया न लेने के लिए शपथ पत्र पर साइन न करने वाले 8 माह पूर्व टर्मिनेट किए गए महाबीर सिंह की तारीख थी। शिकायत पर हिसार की लेबर कोर्ट की सुनवाई के दौरान चंडीगढ़ से प्रबंधन ने अपने अपने जूनियर अधिकारी को भेज दिया। उसके साथ हिसार एचआर विभाग के कार्यकारी मैनेजर लीलाधर जांगिड़ को भी कदमताल करने पड़ी। इस दौरान चंडीगढ़ से आए भास्कर के एक जूनियर अधिकारी पर लीलाधर को इतना कुछ सुनना पड़ा, जितनी इन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी।

दोनों साहेबान ने फिर से एक महीने का समय मांगा। लेकिन लेबर कोर्ट ने कोई समय नहीं दिया। सुनवाई के दौरान भास्कर के अधिकारी से टर्मिनेट के कागजात मांगे गए। ये अधिकारी बार बार समय देने की मांग करता रहा। लेबर कोर्ट में अधिकारी का कहना था कि हमें एक महीने की मोहल्लत दे दो भोपाल में कागजात पड़े हैं ढूंढ़ कर जमा करा दिए जाएंगे। लेबर इस्पेक्टर का कहना था कि 8 घंटे में भोपाल जाया जा सकता है और 8 घंटे में वापस भी आया जा सकता है। फिर एक महीना किस लिए। जूनियर अधिकारी को मेल पर कागजात मंगवाने की बात भी इंस्पेक्टर ने कही। लेकिन जूनियर अधिकारी को तो चंडीगढ़ के आकाओं ने एक महीने के समय की पट्‌टी जो पढ़ा रखी थी। वो बार बार बस यही बात दोहराए जा रहा था।

जूनियर अधिकारी से पूछा कि आप कह रहे हैं कि मजीठिया न लेने वालों ने शपथ पत्र दिया हुआ है तो फिर महाबीर सिंह ने तो उस पर साइन ही नहीं किया जिसकी एवज में भास्कर प्रबंधन ने उसे टर्मिनेट कर दिया। जिस दिन आप लोगों ने इसे टर्मिनेट किया, उस तारीख के वो कागजात दिखाओ जिसमें महाबीर सिंह के खाते में आप द्वारा डाली गई ग्रेच्यूटी, पैसे का बाकी हिसाब है। बैंक स्टेटमेंट के कागज तो होंगे आपके पास। अगर पैसे नहीं डाले गए तो इतने दिन तक इनका पैसा आप लोगों ने कैसे रखा। इस पर अधिकारी के पास कोई जवाब नहीं था। फिर लेबर इंस्टेक्टर ने कहा कि अगर इसने मजीठिया न लेने वाले शपथ पत्र पर साइन ही नहीं किए तो आप लोगों ने इसे मजीठिया की रकम दी होगी। उसकी डिटेल पेश करो। जूनियर अधिकारी ने इस बात पर अपने आपको अनजान बताया। लेबर इंस्पेक्टर ने जूनियर अधिकारी को बुधबार सुबह फिर से पेश होने के आदेश दिए क्योंकि बुधवार को दूसरे कर्मचारियों द्वारा कोर्ट को दी गई मानसिक प्रताड़ना की शिकायत पर भी सुनवाई होनी है।

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कोर्ट ने भास्कर प्रबंधन को लगाई लताड़, 17 तक मजीठिया वेज बोर्ड का हिसाब पेश करने को कहा

दैनिक भास्कर, होशंगाबाद के दर्जनों कर्मचारियों की याचिका पर बीते दिनों गुजरात हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. ये याचिका मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी व एरियरर देने के लिए दायर की गई है. याचिका दायर होने के बाद भास्कर प्रबंधन लगातार अपने कर्मियों का उत्पीड़न कर रहा है पर कर्मी भी न्यायिक व कानूनी तरीके से डटकर लड़ाई लड़ रहे हैं और प्रबंधन के कागजों नोटिसों का जवाब उसी तरह मजबूत कागजी कानूनी कार्रवाई के जरिए दे रहे हैं.

गुजरात हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान जज ने भास्कर के वकीलों से पूछा कि होशंगाबाद यूनिट में किन किन लोगों को मजीठिया दिया गया है और जिन लोगों ने याचिका दायर की है, इन्हें क्यों नहीं दिया गया है, इसका पूरा हिसाब दीजिए. इस पर दैनिक भास्कर के वकीलों ने तीन महीने का समय कोर्ट से मांगा. जज ने इतना ज्यादा समय मांगने का कारण पूछा तो वकील ने कहा कि हिसाब लगाने में समय लग जाएगा. जज ने तब कहा कि इतना समय मेरे पास नहीं है, आप साल भर से क्या कर रहे थे. जज ने वकील की मांग अनसुनी करते हुए 17 मार्च तक का समय दिया है. जज ने कहा कि 17 मार्च तक अपना पूरा हिसाब मेरे सामने पेश करिए.

होशंगाबाद यूनिट के जिन जिन कर्मियों का तबादला किया गया है, कोर्ट ने उनके तबादले का कारण प्रबंधन से पूछा है और जवाब वकील के माध्यम से कोर्ट में भिजवाने को कहा है. इन आदेशों से भास्कर प्रबंधन की नींद उड़ी हुई है. जवाब देने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया है. बताया जा रहा है कि इतना कम समय देखकर भास्कर प्रबंधन ने ट्रांसफर किए गए लोगों की ज्वायनिंग डेट बदल दी है. अदालत ने भास्कर के वकील की कोई बात नहीं मानी और मजीठिया को लेकर जमकर फटकार लगाई. कोर्ट ने भास्कर के वकील से कहा कि अगर आप लोग मजीठिया वेज बोर्ड इन्हें दे देते तो ये लोग कोर्ट नहीं आते. जज ने ये भी कहा कि आपकी सभी प्रेस यूनिट से लोग कोर्ट आ रहे हैं, ये सारे लोग तो गलत नहीं हैं.  कोर्ट के रुख को देखकर भास्कर कर्मियों में उत्साह की लहर है. कोर्ट की अगली डेट 17 मार्च है जिस दिन भास्कर को मजीठिया का हिसाब कोर्ट में पेश करना है.

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कोटा के बाद दैनिक भास्कर भीलवाड़ा में भी बगावत, प्रबंधन पीछे हटा

मजीठिया वेज बोर्ड के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने वाले कर्मियों को लगातार परेशान करने के कारण भास्कर ग्रुप में जगह-जगह विद्रोह शुरू हो गया है. अब तक प्रबंधन की मनमानी और शोषण चुपचाप सहने वाले कर्मियों ने आंखे दिखाना और प्रबंधन को औकात पर लाना शुरू कर दिया है. दैनिक भास्कर कोटा में कई कर्मियों को काम से रोके जाने के बाद लगभग चार दर्जन भास्कर कर्मियों ने एकजुटता दिखाते हुए हड़ताल कर दिया और आफिस से बाहर निकल गए.

बाएं से दाएं : आंदोलनकारी मीडियाकर्मियों के साथ बात करते भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह, अजमेर के वरिष्ठ पत्रकार रजनीश रोहिल्ला और जर्नलिस्ट एसोसिएशन आफ राजस्थान (जार) के जिलाध्यक्ष हरि बल्लभ मेघवाल.

यह सब कोटा में चल ही रहा था कि बगल के भीलवाड़ा एडिशन से खबर आई कि वहां भी प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट जाने के कारण दो लोगों को काम पर जाने से रोका तो दर्जनों मीडियाकर्मियों ने एकजुट होकर आफिस जाने से मना कर दिया. इससे प्रबंधन के हाथ पांव फूल गए. इन्हें अंदाजा नहीं था कि किसी एक को रोकने से दर्जनों लोग काम पर न जाने का ऐलान कर देंगे. ऐसे में कोटा एडिशन की बगावत से निपट रहे भास्कर प्रबंधन ने फौरन पांव पीछे खींचना ही बेहतर समझा और सभी को काम पर जाने की अनुमति दे दी. इस तरह भास्कर प्रबंधन की रणनीति भीलवाड़ा में फेल हो गई.

भीलवाड़ा एडिशन में बगावत की खबर सुनकर कोटा पहुंचे भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने भीलवाड़ा का रुख कर लिया और वहां पहुंचकर आंदोलित मीडियाकर्मियों के साथ बैठक की. उन्हें आगे की रणनीति और प्रबंधन से लड़ने-भिड़ने के तरीके समझाए. साथ ही स्थानीय लेबर आफिस में प्रबंधन की मनमानी के खिलाफ शिकायत करने के लिए फार्मेट दिया. भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के साथ दैनिक भास्कर अजमेर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत रहे और सुप्रीम कोर्ट जाकर मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अपना हिस्सा भास्कर प्रबंधन से छीन लेने में सफल रहे पत्रकार रजनीश रोहिल्ला भी दैनिक भास्कर कोटा और भीलवाड़ा के कर्मियों से मिलते जुलते रहे और लड़ने पर ही हक मिलने की बात समझाते रहे. उन्होंने बताया कि मीडिया के मालिकान सिर्फ सुप्रीम कोर्ट से ही डरते हैं. वे लेबर आफिस से लेकर निचली अदालतों तक को मैनेज कर पाने में कामयाब हो चुके हैं. ये मालिकान डरा धमका कर किसी तरह सुप्रीम कोर्ट से केस वापस कराना चाहते हैं. जो इस वक्त डर गया, साइन कर गया, झुक गया, वह जीवन भर पछताएगा. यही वक्त है डटे रहने का. ये प्रबंधन आप का कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

इस बीच, भास्कर प्रबंधन की तरफ से तरह-तरह की अफवाहें फैलाई जा रही हैं. भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने भास्कर कर्मियों से अपील की कि वे प्रबंधन की बातों पर भरोसा न करें क्योंकि प्रबंधन की अंतिम कोशिश यही होगी कि किसी तरह झूठ बोलकर, बरगला कर, अफवाह फैला कर, डरा कर, धमका कर सुप्रीम कोर्ट जाने वालों से फर्जी कागजातों पर साइन करा लें. साथ ही मीडियाकर्मियों की एकजुटता को खत्म कर दें. यशवंत ने कहा कि एकजुटता और संगठन ही वो ताकत है जो मालिकों को घुटनों पर बिठाने में सफल हो सकेगा.

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दैनिक भास्कर होशंगाबाद के 25 कर्मचारी मजीठिया के लिए गए हाईकोर्ट, नोटिस जारी

दैनिक भास्कर से सबसे ज्यादा मीडियाकर्मी मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी एरियर पाने के लिए कोर्ट की शरण में गए हैं. ये संख्या हजारों में हो सकती है. ताजी सूचना होशंगाबाद यूनिट से है. यहां के करीब 25 मीडियाकर्मियों ने गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी है. जब इसकी खबर भास्कर के वरिष्ठ पदाधिकारियों को मिली तो इन्होंने हाईकोर्ट जाने वालों कर्मियों को एक एक कर अलग अलग केबिन में बुलाया और धमकाना शुरू कर दिया. इन्हें नौकरी से निकाल दिए जाने की धमकी भी दी गई है. कर्मचारियों से कहा गया कि उन्हें सात दिन गैर-हाजिर दिखाकर नौकरी से टर्मिनेट कर दिया जाएगा.

इन सभी कर्मियों को एक प्रोफार्मा पर साइन करने को कहा गया जो पचास रुपये के स्टैंप पेपर पर बना हुआ है. कर्मचारियों ने इस कागज पर साइन करने से इनकार कर दिया. कर्मचारी इस तरह की गीदड़भभकियों से डर नहीं रहे हैं और कोर्ट के जरिए प्रबंधन को सबक सिखाने का मूड बनाए हुए हैं. सभी कर्मचारी जोश के साथ प्रबंधन से दो दो हाथ करने को आतुर हैं. सभी कर्मियों का उत्साह बराबर बना हुआ है. कई कर्मचारियों ने भास्कर के अधिकारियों से उनकी सेलरी तक पूछ ली और अपनी खुद की सेलरी बताई. साथ ही यह भी कहा कि हम लोग कितनी कम सेलरी में अपना जीवन चलाते हैं. जब सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी देने को कह दिया है तो प्रबंधन क्यों नया वेतनमान न देकर गैर-कानूनी काम कर रहा है.

भास्कर होशंगाबाद के कर्मियों को बहलाने फुसाने धमकाने में जिन आला अधिकारियों की भूमिका बेहद घटिया रही, उनके नाम हैं- एमपी प्रोडक्शन हेड विनय शुक्ला, भोपाल के हेड ललित जैन, एचआर हेड जया आजाद, अतुल छावड़ा, अविनाश कोठारी, नवनीत गुर्जर आदि. इस बीच, गुजरात हाईकोर्ट ने याचिका को संज्ञान लेते हुए भास्कर के मालिकों को नोटिस जारी कर दिया है. गुजरात हाईकोर्ट में यह मामला केस नंबर 2384 पर दर्ज है. ज्ञात हो कि दैनिक भास्कर का रजिस्टर्ड आफिस अहमदाबाद में है. इस कारण भास्कर के मालिकों के खिलाफ केस गुजरात हाईकोर्ट में किया गया है.

इस बीच, दैनिक भास्कर होशंगाबाद के एक कर्मचारी ने भड़ास को मेल कर अंदर की स्थिति के बारे में यह जानकारी भेजी है: ”Hoshangabad bhaskar ke karmchariyo ko milne Lagi barkhast karne ki dhamki, stamp pr jabran karva rhe sign. Dainik bhaskar hoshangabad unit me karmchariyo dvyara majithiya ko lekar lagaye gaye case ko wapas lene ke liye bhaskar prabandhan har tarike apna rha hai. Budhwar ko dainik bhaskar ke state head navneet gujar, hr head jaya aazad, atul chabda sahit anya adhikarion ne hoshangabad me apna dera dal liye hai. Or we ek niji hotal me sabhi ko ek-ek karke bulakar case wapas lene ka kaha rhe hai sath hi eo stamp paper par singnacher le rhe hai. Jisme likha hai ki hamara samjhota ho gya hai or ham apna case wapas le rhe hai. Karmchariyo ke nhi manne par unko naokri se barkhast karne ka dawab banaya ja rha hai.”’

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दैनिक भास्कर प्रबंधन नीचता पर उतारू, आंदोलन का नेतृत्व कर रहे कर्मियों के खिलाफ थाने में झूठी शिकायत

दैनिक भास्कर कोटा में मजीठिया वेज बोर्ड के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने पर प्रबंधन द्वारा किए जा रहे दमनात्मक कार्यवाहियों का सिलसिला थमा नहीं है. पांच छह कर्मियों को आफिस आने से मना करने के बाद अब इनके खिलाफ प्रिंटिंग मशीन खराब करने की शिकायत स्थानीय थाने में दर्ज कराई है. इससे कर्मचारियों में रोष फैल गया. सभी आंदोलनकारी कर्मचारियों ने प्रबंधन की इस नीचता के खिलाफ एकजुट रहने और आखिरी दम तक लड़ने का संकल्प लिया है. इस बीच भास्कर प्रबंधन ने अपने सभी विभागों के राजस्थान हेड को कोटा भेज दिया है और संकट से निपटारे की कोशिश शुरू कराई है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के साथ बैठक के बाद ग्रुप फोटो खिंचाते दैनिक भास्कर कोटा के हड़ताली मीडियाकर्मी.

 

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के साथ बैठक कर आगे की रणनीति पर विचार-विमर्श करते दैनिक भास्कर कोटा के मीडियाकर्मी.

भास्कर के वरिष्ठ पदाधिकारी एक-एक हड़ताली कर्मी से मिलकर फोन कर काम पर आने का अनुरोध कर रहे हैं. कर्मियों में सबसे ज्यादा गुस्सा उस लेटर पर जबरन साइन कराने को लेकर है जिस पर लिखा गया है कि मुझे किसी ने बरगला कर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करवा दिया है और मैं इसे वापस ले रहा हूं. मजीठिया वेज बोर्ड न देने वाला भास्कर प्रबंधन अब सुप्रीम कोर्ट जाने पर कर्मचारियों से जबरन लिखवा रहा है कि उन्हें बहला-फुसला कर कोर्ट ले जाया गया. इसके पहले मजीठिया नहीं चाहिए वाले कागजात पर कर्मचारियों से साइन कराए थे. भास्कर प्रबंधन के ऐसे बेवकूफी भरे कदम पर सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा का कहना है कि इस तरह के अनैतिक पत्रों पर जबरन साइन कराने से सुप्रीम कोर्ट में भास्कर को कोई राहत नहीं मिलने वाली है. अब तो भास्कर को सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देना होगा कि उसने सभी कर्मियों को मजीठिया दे दिया है. अगर उसका शपथ पत्र झूठ निकला तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भास्कर के मालिकान जेल जाने को तैयार रहें.

इस बीच, भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने कोटा पहुंचकर हड़ताली कर्मियों के साथ बैठक की. उन्होंने कर्मचारियों के साथ आगे की रणनीति पर विचार-विमर्श कर भास्कर प्रबंधन से निपटने की ठोस योजना बनाई. यशवंत ने कर्मचारियों से कहा कि वे कागज-पत्तर के मामले में ठोस रहें. रोजाना वह आफिस जाने और आफिस के भीतर न घुसने देने की मेल से शिकायत भास्कर के मालिकों सहित वरिष्ठ पदाधिकारियों, मैनेजरों से करें. इसकी एक कापी लेबर कोर्ट से लेकर पुलिस थाने में दें. यशवंत की सलाह पर भास्कर कोटा के हड़ताली कर्मियों ने स्थानीय थाने में पहले ही शिकायत दर्ज करा दी थी कि भास्कर प्रबंधन उन लोगों पर झूठे आरोप लगा सकता है और उनके जान-माल का नुकसान करा सकता है. इस आवेदन के कारण भास्कर प्रबंधन द्वारा मशीन खराब करने की थाने में की गई कंप्लेन की हवा निकल गई है.

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सलाखों के भय से ‘चंडीगढ़ इंडियन एक्सप्रेस’ ने मजीठिया आधा-अधूरा लागू किया, …लेकिन भास्कर कर्मियों का क्या होगा?

सबके दुख-सुख, विपदा-विपत्ति, परेशानी-मुसीबत, संकट-कष्ट, मुश्किल-दिक्कत, आपत्ति-आफत आदि-इत्यादि को अपनी कलम-लेखनी, कंप्यूटर के की-बोर्ड से स्टोरी-आर्टिकल, समाचार-खबर की आकृति में ढाल कर अखबारों, समाचार पत्रों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने की अनवरत मशक्कत-कसरत करने वाले मीडिया कर्मियों को अपने ही गुजारे के लिए मिलने वाली पगार अमृत समान हो गई है। हां जी, अमृत समान! मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लेकर अखबारों के कर्मचारियों और मालिकान के बीच चल रही लड़ाई शायद इसी पौराणिक कथा का दूसरा, पर परिवर्तित रूप लगती है।

लंबे और अथक संघर्ष के बाद कर्मचारियों के समक्ष मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियां प्रकट हुईं लेकिन उस पर अमल कराने, उसे हासिल करने के लिए कर्मचारियों को फिर सर्वोच्च अदालत की शरण में जाना पड़ा। ठीक है, गए। सर्वोच्च अदालत ने कर्मचारियों-कामगारों की पीड़ा को समझते हुए मालिकान को तत्काल आदेश दिया कि दो महीने में मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से कर्मचारियों को वेतन, बकाया और उससे जुड़े समस्त लाभ अदा करो और अपने किए का लेखा-जोखा अगली तारीख 2 जनवरी, 2015 को हमारे समक्ष प्रस्तुत करो। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश इंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ़, दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण के कर्मचारियों की अवमानना याचिकाओं पर बीते 13 अक्टूबर को दिया था। अपने को कानून-व्यवस्था, यहां तक कि भगवान से भी स्वयं को ऊपर समझने वाले अखबार मालिकों के होश इस आदेश ने उड़ा दिए क्यों कि इसका पालन नहीं करने का अर्थ है सलाखों के पीछे भेजे जाने की सजा।

इससे डरे इंडियन एक्सप्रेस के मालिक विवेक गोयनका ने आखिरकार मजीठिया लागू कर दिया है। क्यों कि दो महीने की अवधि 13 दिसंबर को समाप्त हो रही है और इसी अवधि में लागू करना है। चलिए, लागू तो कर दिया है, पर जिस तरह, जिस तरीके से लागू किया है उससे वेतन की स्थिति कहीं और बिगड़ गई है। इस वेज बोर्ड के सुझावों के मुताबिक वेतन-पगार कई गुना बढऩी चाहिए, लेकिन इंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ़ के इस वेज बोर्ड की परिधि में आने वाले 69 कर्मचारियों में से 38 का वेतन पहले से हजारों रुपए कम हो गया है, उनका वेतन माइनस में चला गया है। यही नहीं क्लासीफिकेशन के हिसाब से पहले यह अखबार क्लास 2 में था, जिसे अब क्लास में 3 में कर दिया है। इसके पीछे वही चिरपरिचित दलील कि अखबार की कमाई घट गई है और ऊपर मजीठिया की तलवार लटक गई है। जब कि सच तो यह है कि विवेक गोयनका की बेहद मोटी गर्दन और उससे भी कहीं मोटी खाल को मजाल क्या कि ये तलवार खरोंच भी लगा सके! फिर भी रोना वही का वही। हालांकि इन घडिय़ाली आंसुओं की हकीकत किसी से छिपी नहीं है।

इस वेज बोर्ड में कर्मचारियों को नियमित पदोन्नति देने, इन्क्रीमेंट देने का पूरा बंदोबस्त किया गया है, लेकिन एक्सप्रेस प्रबंधन की आंखों में यह चुभ रहा है। वह इस पर अमल से विमुख होती दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक चार समान किस्तों में एरियर का भुगतान करना है, पर विवेक गोयनका साहब का इस पर रत्ती भर भी ध्यान नहीं है। माननीय मजीठिया जी ने कर्मचारियों को उनकी योग्यता, काबिलियत के हिसाब से एश्योर्ड करिअॅर डेवलपमेंट का प्रावधान किया है। लेकिन स्व.रामनाथ गोयनका के महामहिम दत्तक पुत्र को यह प्रावधान निरर्थक, बेमतलब, बेकार लगता है। यही नहीं, प्रबंधन ने मजीठिया देने के एवज में कर्मचारियों को पहले से मिल रहीं अनेक या कहें कि वो तमाम भत्ते-सुविधाएं छीनने की तैयारी कर ली है, या कि छीन ली है जिसे कर्मचारियों ने लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया है। इन सुविधाओं-सहूलियतों में कई तो ऐसी हैं कि जिनके बगैर अखबार का काम हो ही नहीं सकता। खासकर इंडिसन एक्सप्रेस की जिसके लिए, जिसकी बिना पर एक अलग पहचान है, वह तो इन संबंधित सुविधाओं के छिन जाने के बाद एक्सप्रेस की छवि मटियामेट हो जाएगी। विवेक साहब का न जाने कैसा विवेक है कि इस सच को नहीं जान-समझ पा रहा है कि मात्र मशीनों-टेक्नोलॉजी से अखबार नहीं छपते-निकलते हैं। उसमें मानवीय श्रम, मस्तिष्क, ऊर्जा, ज्ञान, समझ, विवेक आदि की खपत होती है तब कहीं अपने पाठकों तक पहुंचता है। और तब लोग उसे लपक कर पढ़ते हैं और अपने मतलब-रुचि की पाठ्य सामग्री में गोता लगाते हैं।

चंडीगढ़ इंडियन एक्सप्रेस इंप्लाई यूनियन ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के क्रियान्वयन के लिए अपने साथियों के संग मिलकर बहुत मजबूत, अटल-अटूट लड़ाई लड़ी है। लेकिन मैनेजमेंट की नई बदमाशियों, करतूतों, शरारतों से नए सिरे से लडऩे की कटिबद्धता, तत्परता एक बार फिर अनिवार्य हो गई है। हालांकि प्रबंधन फूट डालो और अपना हित साधो की प्राचीन रीति, डगर पर चलने से पीछे नहीं हटेगी। ऐसे में कर्मचारियों का अपने बुनियादी हक के लिए फिर से मैदान में उतरना लाजिमी लगने लगा है।

… लेकिन दैनिक भास्कर कर्मियों का क्या होगा?
 अब यह गोपनीय नहीं रह गया है कि दैनिक भास्कर के महामहिम मालिकान भी अपने कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों से उपकृत करने जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार एक जनवरी 2015 से इन संस्तुतियों पर क्रियान्वयन की मंशा-नीयत उन्होंने जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार दो महीने की मियाद तो 13 दिसंबर को खत्म हो रही है। तो फिर जनवरी में अमल का ऐलान भास्कर के महानुभावों ने जो किया उसका अर्थ-निहितार्थ क्या है, क्या हो सकता है, इसे भास्कर का कोई भी कर्मचारी बता पाने, व्याख्यायित कर पाने में असमर्थ है। वैसे भी, खासकर चंडीगढ़ संस्करण के कर्मचारियों को मजीठिया से शुरू से कोई मतलब नहीं रहा है। यदि दबे-छिपे किसी को रहा भी है तो वह समझ ही नहीं पाया कि मजीठिया है क्या बला। क्यों कि यहां जिसको भी जो और जितनी पगार मिलती है, वह वेज बोर्ड के नियमों के अनुसार-अनुकूल नहीं होती है। बल्कि वह पहुंच-पहचान और सिफारिश के मुताबिक होती है। एक ही पद के व्यक्तियों-शख्सों का वेतन अलग-अलग होता है। यहां अनुभव, वरिष्ठता, कनिष्ठता, योग्यता आदि का कोई मतलब नहीं होता है। यहां का माहौल-कल्चर है मानव रूपी कर्मचारी को मशीन-यंत्र में तब्दील कर देना। बुदबुदाते रहो, पर खुल कर बोलना मना है। ऐसा करना गंभीर गुनाह के समान है। अफसरों को सर, सर कहते रहो। जो कहें सुनते-गुनते रहो।

बहरहाल मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने में उससे संबद्ध सभी नियमों-कानूनों को मानना-पालन करना होगा मालिकान को। ऐसे में इस वेज बोर्ड के मुताबिक कर्मचारियों को कितना वेतन मिलना चाहिए, इसकी जानकारी कर्मचारियों को भी होना अनिवार्य है। तभी तो वे वेतन वृद्धि-वेतन संशोधन, वेतन निर्धारण, उससे जुड़े दूसरे लाभों को अर्जित करने के तरीके-उपाय अपनाने में सक्षम होंगे कर्मचारी। लेकिन जितनी जानकारी उपलब्ध है, भास्कर के अधिकांश पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को पढ़ा ही नहीं है। सबसे अहम यह है कि भास्कर क्लासिफिकेशन के अनुसार किस क्लास में आता है, यह भी शायद ही किसी को पता हो। क्यों कि मैंने जितने लोगों से पूछा है किसी ने भी इस बारे में कुछ नहीं बताया। सबने कहा – हमें नहीं मालूम है। हां, भास्कर के नंबर वन होने की बात सभी सगर्व कहते हैं।

चलिए हमीं बता देते हैं। दैनिक भास्कर के 67 संस्करण प्रकाशित होते हैं। डीबी कार्प की मार्च 2014 तक की कुल सालाना आमदनी 1850 करोड़ रुपए से अधिक है। इस हिसाब से दैनिक भास्कर तो क्लास 1 में आता है क्योंकि इस श्रेणी में 1000 करोड़ रुपए या इससे अधिक के अखबार मजीठिया के अनुसार क्लास 1 में आते हैं। ऐसे में भास्कर के किसी उप संपादक या रिपोर्टर का मासिक वेतन 42-45 हजार रुपए से कम नहीं होना चाहिए। यह भी लागू होना है 11 नवंबर 2011 से। यानी इधर के वर्षों में इन्क्रीमेंट एवं अन्य लाभ भी जुड़ेंगे। साफ है कि इस हिसाब से काफी एरियर भी मिलना चाहिए। स्पष्ट है कि कर्मचारियों को अपना हिसाब किताब बहुत चुस्ती से बनाना होगा तभी भास्कर मैनेजमेंट से निपट पाएंगे।

इससे जुड़ा एक और बड़ा सवाल है कि मैनेजमेंट कितने कर्मचारियों को उपकृत करने के मूड है? कहीं ऐसा तो नहीं है चुनिंदा लोगों को मजीठिया का चॉकलेट थमा दिया जाए और बाकी लोग हमको भी- हमको भी कहते ही रह जाएं और मालिकान अंतत: तेज निगाहों से घूर कर उन्हें खामोश करा दें। 

इस संदर्भ में अब वह यूनियन भी याद हो आई है जिसे भास्कर मालिकान ने चंडीगढ़ संस्करण के शुरुआती काल में अपने खास खुशामदियों की अगुआई एक दैनिक भास्कर कर्मचारी यूनियन बनवा दी थी। जो कागजों में अभी भी है। वैसे वह सक्रिय ही कब थी कर्मचारियों के हित में। हां, मौजूदा परिस्थिति में उन यूनियन नेताओं को चुप्पी तोडक़र वाचाल हो जाना चाहिए, तभी उनके यूनियन नेता होने की सार्थकता उजागर-साबित होगी। अब भी खामोश रह गए तो यह अवसर फिर कभी नहीं पकड़ पाएंगे। हाथ रह जाएगी निराशा-पछतावा।

सूरमा रजनीश रोहिल्ला:
एक सूरमा है रजनीश रोहिल्ला, जिसने दैनिक भास्कर प्रबंधन की बदमाशियों के आगे नहीं झुका। उन्हें ‘मजीठिया नहीं चाहिए’ फार्म पर दस्तखत कराने के अनेक उपक्रम प्रबंधन की ओर से किए गए। पर उन्होंने साइन नहीं किए। इसी खफा मैनेजमेंट ने उनका तबादला कर दिया। लेकिन वे नहीं गए। आखिर में उन्होंने मजीठिया के लिए सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगा दी। उनकी फरियाद सुनी गई और मालिकों से साफ कह दिया गया- दो महीने में लागू करो। नहीं लागू करेंगे तो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के जुर्म में जाना होगा सलाखों के पीछे।

चंडीगढ़ से भूपेंद्र प्रतिबद्ध की रिपोर्ट. संपर्क: 09417556066

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दैनिक भास्कर ने कुछ संस्करणों में ‘जेड प्लस’ फिल्म के लेखक रामकुमार सिंह का नाम रिव्यू से हटाया

Ajay Brahmatmaj : जयप्रकाश चौकसे के कॉलम ‘पर्दे के पीछे’ से दैनिक भास्‍कर के जयपुर समेत कुछ संस्‍करणों में फिल्म के लेखक Ramkumar Singh का नाम हटा दिया गया। पत्रकार बिरादरी की तुच्‍छता है यह। यह शर्मनाक और दुखद है। फिलहाल जयप्रकास चौकसे को पढ़ें और कल फिल्‍म देखने का फैसला करें। शेयर करें और दूसरों को पढ़ाएं।

मुंबई के वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज के फेसबुक वॉल से.

Vineet Kumar : दैनिक भास्कर ने अपने कुछ संस्करण में जेड प्लस के लेखक रामकुमार सिंह का नाम इसलिये हटा दिया क्योंकि वो उस अखबार के लिये काम करते हैं जो भास्कर का कॉम्पिटिटर है… मतलब भास्कर के पाठक को जानने का अधिकार ही नहीं है कि जेड प्लस फ़िल्म के लेखक कौन हैं? तो ऐसे चलता है आपके लोकतंत्र के चौथे खम्भे का धंधा. अब सोचिये बड़े खेलों में क्या-क्या हटाया जाता होगा?

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हमने जेड प्लस फ़िल्म देख ली लेकिन आप हम जैसों के लिखे के चक्कर में मत पड़िए.. जिस तरह हर के हिस्से का सच अलग होता है,वैसे ही स्वाद का भी. और मेरे उस स्वाद में दोस्ती से लेकर फ़ोकट की प्रेस शो में फ़िल्म का देखना भी शामिल है.आपके देख लेने के बाद इसके मीडिया एंगल को लेकर अलग से लिखूंगा..बस इतना समझ लीजिये कि इस देश के किसी भी लफंदर टीवी रिपोर्टर का नाम दीपक होगा..फ़िल्म चाहे पीपली लाइव हो या फिर जेड प्लस..मतलब दीपक अब नाम नहीं एक सिंड्रोम है, मीडिया का चुत्स्पा…और न्यूज़ चैनल मतलब आजतक के आसपास का कोई भी अंडू-झंडू

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अच्छे दिन की पंचांग- फिल्म जेड प्लस… आम आदमी जब अपने हालातों के बीच जीते हुए अचानक से सरकार की रहमोकरम पर खास हो जाता है, उसकी किस्मत सांड जैसी हो जाती है तो वो प्रशासन की नजर में बहनचो..हो जाता है, वो अपनी जिंदगी न जीकर सरकार की जिंदगी जीने लग जाता है, वो अकेले में पर-पेसाब तक नहीं कर सकता, उसकी जिंदगी में सिक्यूरिटी और सियासत इस कदर घुस आती है कि वो समाज में बलून बनकर उड़ने लग जाता है..कितना कुछ हो जाता है एक आम आदमी के साथ जिसका खास होना उसकी खुद की कोशिश का हिस्सा न होकर सत्ता और सरकार के उस बेहूदे फैसले से तय होता है जिसका किसी भी हाल में गलत करार दिए जाने का सवाल ही नहीं उठता.

वैसे तो आम आदमी की कोई कहानी नहीं होती, बस हालात होते हैं..वो जिंदगी नहीं, हालातों को जीता है लेकिन सरकार उसके बीच अचानक से एक कहानी ढूंढ लेती है जिसमे वो टू इन वन हीरो पैदा करती है. एक हीरो वो खुद और दूसरा वो आम आदमी. सरकार का हीरो होना रोजमर्रा की घटना है, उसके रोज अच्छे दिन आते हैं लेकिन आम आदमी का हीरो होना एक्सक्लूसिव है और अच्छे दिन भी सीजनल होते हैं.

फिल्म जेड प्लस जिसे मिजाज से बेहद ही स्वीट लेकिन व्यंग्य के अंदाज में बेहद ही तीखे अपने ही दोस्त रामकुमार( Ramkumar Singh) ने लिखी है, की प्रोमो पिछले कई दिनों से वर्चुअल स्पेस पर तैर रही है..आपको इन प्रोमो को देखकर हंसी आएगी, लेकिन रिप्ले करेंगे तो गुस्सा, फिर से देखना चाहेंगे तो अफसोस और अगर उसी वीडियो को एक बार और देख लिया तो लगेगा हम दरअसल किसी नाम के काल में नहीं बल्कि उस बिडंबना काल में जीने जा रहे हैं, जिसकी अभी कुछ ही किस्त चुकाई है, पहाड़ जैसी किस्त बाकी ही है की वृतांत है..इस पूरे वृतांत से तो कल ही गुजरना हो सकेगा लेकिन प्रोमो को साक्ष्य मानते हुए इतना तो कहा ही जा सकता है कि एक तो अच्छे दिन आए नहीं है, विज्ञापन की चौखट से लांघने में पता नहीं कितना वक्त लग जाए और गर ये “अच्छे दिन” सचमुच में आ गए तो फिर यातना के लिए आम आदमी कौन सा शब्द ढूंढेगा. आम आदमी के जातिवाचक संज्ञा और हालात से एक्सक्लूसिव कहानी में तब्दील होने की पूरी घटना के कई छोर, कई पेंच हैं जिन्हें कि हम अपनी-अपनी हैसियत की समझदारी की स्क्रू डाइवर से कल फिल्म देखने के बाद खोलने की कोशिश करेंगे..

युवा मीडिया और फिल्म विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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बिहार विस चुनाव से पहले भास्कर का प्रकाशन गया, भागलपुर और मुजफ्फरपुर से करने की तैयारी

: बिहार में छा जाने की भास्कर की योजना : देखते-देखते सम्पूर्ण बिहार में छा जाना है। भास्कर इसी रणनीति के तहत काम कर रहा है। भास्कर ने बिहार-झारखंड में ‘हिन्दुस्तान‘ को चमकाने वाले वाइस प्रेसिडेट वाईसी अग्रवाल को अपने साथ क्या जोड़ा, पटना के सभी अखबारों में हड़कंप मचा हुआ है। ‘हिन्दुस्तान‘ की दुर्गति तो अपने आप हो रही है। कंटेंट खत्म और भराउ मैटर ज्यादा। यही है हिन्दुस्तान की दशा। बिहार में अगले साल नवंबर में विधान सभा का चुना होना है। भास्कर प्रबंधन की मंशा है कि इसके पूर्व ही गया, भागलपुर और मुजफ्फरपुर से इसका प्रकाशन प्रारंभ कर दिया जाये।

इसकी पूरी तैयारी का जिम्मा वाईसी अगवाल को ही सौंपे जाने की सूचना है। वाईसी ने पत्रकारिता के मंजे, अनुभवी और पुराने खिलाड़ियों को अपने साथ जोड़ने की योजना बनायी है। इस पर काम भी शुरू हो गया है। जागरण से अरूण अषेश को तोड़ कर वाईसी ने भास्कर का हिस्सा बनाया है। पुराने हिन्दुस्तानी रहे अरूण फिलहाल दिल्ली में बैठेंगे। इससे पूर्व पटना जागरण से ही रांची के स्थानीय संपादक रहे शशि को तोड़ा गया है। शशि फिलहाल पटना कार्यालय में बैठ रहे है। जागरण से ही एक-दो और वरीय लोगों के टूटने के आसार है। ज्यादा वेतन मिलने के कारण कई अखबारों के वरीय साथी भी भास्कर की ओर ताक-झांक कर रहे है। दूसरी ओर वाईसी ने अपने विश्वस्त एजेंटों से भी सम्पर्क साधना प्रारंभ कर दिया है जिसे उन्होंने खाकपति से करोड़पति बनाया है। मीडिया मार्केटिंग के एक्सपर्ट भी खोजे जा रहे है।

पटना से एक पत्रकार की रिपोर्ट

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दैनिक भास्कर को औकात दिखाने वाले सीनियर रिपोर्टर रजनीश रोहिल्ला को आप भी सलाम करिए

रजनीश रोहिल्ला


9950954588. ये मोबाइल नंबर रजनीश रोहिल्ला का है. अजमेर में हैं. यहीं से प्रकाशित दैनिक भास्कर अखबार में सीनियर रिपोर्टर हैं. इन्होंने भास्कर प्रबंधन की आंख में आंख डालकर कहा- ”मजीठिया दो”. न मिलना था सो न मिला. उल्टे ट्रांसफर और प्रताड़ना का दौर शुरू. तब फिर रजनीश रोहिल्ला ने भास्कर प्रबंधन की आंख में आंख डालकर कहा- ”तुझे तेरी औकात दिखाउंगा”. ठान लिया तो पूरी कायनात रजनीश रोहिल्ला के लक्ष्य को पाने-दिलाने में जुट गई.

अजमेर के इस सीनियर रिपोर्टर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. मजीठिया वेज बोर्ड न देने को लेकर कंटेंप्ट आफ कोर्ट. सुप्रीम कोर्ट ने कुबूल किया इसे. केस रजिस्टर किया. अब साले भास्कर वाले गिड़गिड़ा रहे हैं रजनीश रोहिल्ला के आगे.. ”…आ जाओ भाई… सेटल कर लो… पैसे ले लो.. सब कर लो पर आ जाओ.. बस याचिका वापस ले लो.. कह दो कि सब ठीक है…. ” टाइप की बातें कहते करते हुए.

रजनीश रोहिल्ला का कल मेरे पास फोन आया. बोले- यशवंत भाई, ये स्थिति है अब. मैंने कहा- मित्र, आप अब खुद अकेले नहीं है. देश भर के पत्रकारों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. पूरे प्रकरण वाकये पर लिखकर भेजिए. इसे प्रकाशित किया जाएगा ताकि भास्कर वालों का हरामजदगी और एक पत्रकार के साहस की कहानी सबके सामने रखी बताई जा सकी. रजनीश रोहिल्ला ने वादा निभाया और आज जब सुबह मैंने भड़ास का मेल चेक करना शुरू किया तो उनका ये आर्टकिल पड़ा मिला. पढ़िए, और कुछ न कर पाइए तो कम से कम फोन करके रजनीश रोहिल्ला को उनकी इस बहादुरी / मर्दानगी पर बधाई सराहना शाबाशी दे डालिए…

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


मेरी कंपनी के कई बड़े अधिकारी समझौते के लिए मेरे ऊपर अलग-अलग तरह का दबाव बना रहे हैं

नमस्कार

9 साल तक पत्रकारों के लंबे संघर्ष के बाद बने मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई निणार्यक दौर में है। हमारी कंपनियां हमें मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देना नहीं चाहती। हालांकि वे खुद शुद्ध व्यवसायिक लाभ कमा रही है। हमारे शोषण को जारी रखकर हमें आर्थिक रूप से कमजोर बनाए रखना चाहती हैं। कुछ मैनेजर टाइप के लोगों को जरूर अच्छा पैसा दिया जा रहा है। ये वो लोग हैं जो केवल मालिकों के हितों के बारे में ही सोचते हैं। हम पत्रकारों को तो बेचारा समझकर लालीपॉप देने का सिलसिला चला रखा है। लेकिन अब देश के सुप्रीम कोर्ट ने हमारे पक्ष में फैसला सुना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने हम पत्रकारों की परिभाषा और वेतन का स्ट्रक्चर भी बना दिया है। अब मालिक मनमाना रवैया नहीं अपना सकते हैं। इन मालिकों की हिमत देखिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी मानने के लिए तैयार नही है। उसे भी मजाक समझ रहे हैं।

मालिकों ने तुगलकी फरमान जारी कर अधिकांश पत्रकारों से दबाव डालकर  लिखवाया कि उन्हें मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ नहीं चाहिए। मालिकों की नजर में पत्रकार वर्ग असहाय, मजबूर और बेचारा है। मालिकों की सोच के अनुसार पत्रकारों ने उस काले आदेशों पर हस्ताक्षर कर दिए। जबकि एक स्वर में उस काले आदेश का विरोध किया जाना चाहिए था। पर, पत्रकार सोच रहे थे  कि नौकरी खतरे में पड़ जाएगी।  परिवार पर आर्थिक संकट आ जाएगा। लेकिन जरा सोचिए एक रणनीति बनाकर सारे  पत्रकार एक साथ मजठिया की मांग कर दें तो कंपनियां क्या बिगाड़ पाएगी। वो भी उस समय जब देश का सुप्रीम कोर्ट हमारे पीछे बैठा हो।

दोस्तों मैंने मालिकों द्वारा भेजे गए काले फरमान को मानने से मना कर दिया। मैंने लाख दबाव के बावजूद भी काले आदेश वाले कागज पर हस्ताक्षर नहीं किए। मुझे इसकी कीमत चुकानी पड़ी। मेरा ट्रांसफर महाराष्ट्र के जालना में मराठी भाषी अखबार में कर दिया लेकिन मैं बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ। कंपनी के मैनेजर सोच रहे थे कि मै उनके पैरों में पड़ूंगा गिड़गिड़ाउंगा। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

मैंने मजीठिया वेजेज को लागू करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में कंटेप्ट पीटीशन दायर की। मुझे उस समय बहुत खुशी हुई जब जानकारी मिली की कंटेप्ट पीटीशन को सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्टर कर लिया। यह मजीठिया की लड़ाई की पहली बड़ी जीत थी। मेरी पीटीशन का रजिस्टर नंबर 21773 है। दो महीने बाद मुझे केस नंबर 401 मिला। यह आप सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर देख सकते हैं। 13 अक्टूबर को दीपावली के समय सुप्रीम कोर्ट ने हम पत्रकारों को बड़ा तोहफा देते हुए देश के सभी मीडिया हाउस मालिकों को दो महीने में मजीठिया वेज बोर्ड की पालना रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं।

मित्रों, यह दो महीने 13 दिसंबर को पूरे होंगे। अगर इस दिनांक तक मालिक पालना रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर पाए तो उनके खिलाफ कंटेंप्ट की कार्रवाई शुरू होगी। लड़ाई महत्वपूर्ण दौर में पहुंच चुकी है। मैं इसका असर देख और महसूस कर पा रहा हूं। मेरी कंपनी के कई बड़े अधिकारी मुझसे संपर्क साध रहे हैं। समझौते के लिए मेरे ऊपर अलग-अलग तरह का दबाव बना रहे हैं। समझौता किस बात का, कैसा समझौता। मैने स्पष्ट कर दिया है कि मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कीजिए। मैं आगे की लड़ाई के लिए पूरी तरह तैयार हूं। मैं जानता हूं कि मालिक किसी भी हद तक जा सकते हैं। मेरी जिंदगी के साथ खिलवाड़ या फिर किसी भी तरह का नुकसान भी पहंचा सकते हैं लेकिन मैं सुपीम कोर्ट  और आप सब के भरोसे पर लड़ाई लड़ रहा हूं। इसलिए मझे कोई चिंता नहीं है। क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ मेरे अकेले की नहीं बल्कि सब पत्रकार भाइयों की है।

मित्रों मैं पिछले सात महीनों से बिना वेतन के चल रहा हूं। निश्चित रूप से मुझे कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। महीने में कई दिन मेरे कोर्ट में बीत रहे हैं। मजीठिया नहीं मिलने तक लड़ाई जारी रहेगी। मेर आप से अपील है इस संघर्ष में आप जैसा भी सहयोग कर सकते हैं। जरूर कीजिए। सुप्रीम कोर्ट हमारे साथ है। हमारी जीत निश्चित है।  मेरा निवेदन है कि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को इंटरनेट पर आप एक बार जरूर पढ़ें और ज्यादा से ज्यादा पत्रकार साथियों को इसकी जानकारी देकर उन्हें जागरूक बनाएं। सुप्रीम कोर्ट में अगली तारीख 2 जनवरी है।

आपका
रजनीश रोहिल्ला
9950954588
सीनियर रिपोर्टर
दैनिक भास्कर
अजमेर संस्करण

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दैनिक भास्कर अजमेर ने छापी ईद की एक साल पुरानी फोटो

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हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा अखबार होने का दावा करने वाला दैनिक भास्कर अब लगता हैं बासी व पुरानी फोटोज़ से ही अपनी गुजर बसर कर रहा हैं। भास्कर के कर्मचारियों के आलस्य का अनुमान आप इसी बात से लगा सकते हैं कि एक फोटो जो साल भर पहले भास्कर ने ही अपने अखबार में छापी थी उसे फिर से आज अखबार में छाप दिया गया। अगर कोई खड्ड़ा या कोई ऐसी समस्या की फोटो होती जो साल भर पूर्व भी ऐसी थी और अब भी वैसी हैं तो समझ आता हैं मगर फोटो तो थी ईद पर नमाज अदा कर रहे अकीदतमंदों की।

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पिछले वर्ष छपी फोटो

मामला अजमेर जिले का है जहां केकड़ी डेडलाईन से ईद की खबर फोटो सहित छपी। लेकिन फोटो वही जो पिछले साल ईद पर छपी थी। ऐसे में सवालों के घेरे में भास्कर के स्थानीय पत्रकार व डेस्क इंचार्ज ही हैं, मगर हां डेस्क इंचार्ज तो यह कह कर निकल जायेगें कि भई एक साल पुरानी फोटो उन्हे याद थोड़ी हैं जो स्थानीय पत्रकार ने भेजी उसे ही लगा दी गई। अब स्थानीय पत्रकार क्या जवाब देंगें यह देखने वाली बात होगी। ज्ञात रहे कि केकड़ी के भास्कर के पत्रकार को पिछले दिनों ही जयपुर में भास्कर प्रबंधन द्वारा उत्कृष्ठ विज्ञापन कार्य के लिये सम्मानित किया गया था।

इसके बाद उन्होने अगले ही दिन क्षेत्रीय विधायक की फोटो के साथ फुल पेज का एड लगवा दिया था जिसके बाद उन्हे भास्कर ने कुछ दिनों के लिये सस्पेंड भी कर दिया गया था और लिखित माफीनामा भी लिखवाया था। भास्कर के अजमेर संस्करण संपादक की मेहरबानी से इनकी नौकरी बच पाई थी। अब फिर से ये मुसिबत में नजर आ रहे हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

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