दैनिक जागरण के नोएडा कार्यालय में बाउंसर लगा दिए गए!

Fourth Pillar : अब इनकी इज्‍जत होगी बाउंसरों के हवाले… इज्‍जत बहुत बड़ी बात होती है। आम आदमी कमाता है इज्‍जत के लिए। कहा जाता है कि आम आदमी की इज्‍जत लाख रुपये की होती है। अखबार मालिकों की तो करोड़ों में आंकी जाएगी। लेकिन दैनिक जागरण प्रबंधन ने पैसे के लिए अपनी इज्‍जत को दांव पर लगा दिया है। अखबार की प्रोफाइल और छवि दोनों खराब हो गई है, फिर भी संजय गुप्‍ता साहब मस्‍त हैं। उन्‍हें शायद यह नहीं पता है कि वह उसी छवि की रोटी खा रहे हैं। कहावत तो वही चरितार्थ हो रही है कि चमड़ी भले ही चली जाए पर दमड़ी न जाए। दमड़ी से आशय मजीठिया वेतनमान से है।

मजीठिया वेतनमान न देना पड़े, उसकी एवज में भले ही कोई उनकी इज्‍जत लूट ले जाए। मोटी चमड़ी हो गई है उनकी। न लाज रह गया है और न ही लिहाज। जिद किस बात की है, कर्मचारियों का वाजिब हक मार ले जाएं और उन्‍हें कोई कुछ न कहे। बता दें कि मजीठिया वेतनमान के लिए कर्मचारियों का प्रदर्शन लगातार जारी है। कर्मचारियों के आंदोलन को कुचलने के लिए दैनिक जागरण के नोएडा कार्यालय में बाउंसर लगा दिए गए। अब कर्मचारी 21 नवंबर को उनके निवास पर प्रदर्शन करने वाले हैं। जाहिर है कि वहां भी बाउंसर तैनात होंगे। सोचने वाली बात यह है कि मजीठिया वेतनमान की धनराशि इतनी ज्‍यादा नहीं है कि संजय गुप्‍ता उसे न दे सकें।

आखिर कहां-कहां बाउंसर तैनात कराएंगे। उनके कर्मचारी तो संस्‍कारशाला झेलते-झेलते चरित्रवान हो गए है पर बाउंसरों को संस्‍कार कौन सिखाएगा। ऐसा पहले भी हो चुका है कि बाउंसर सुरक्षा के लिए जब भी घरों पर तैनात किए जाते हैं, वे घर की बहू-बेटियों की इज्‍जत लूटने से बाज नहीं आते। यह भी हो सकता है कि ये बाउंसर सीजीएम नीतेंद्र श्रीवास्‍तव और विष्‍णु त्रिपाठी के भी निवास पर तैनात किए जाएं। अब इसमें कर्मचारियों का क्‍या जाता है। वे तो बाउंसरों को शुभकामना ही देंगे कि ठीक है भैया, छानों अधिकारियों के घर का नरम-नरम ‘माल’।

फेसबुक के ‘फोर्थ पिलर’ पेज से साभार.

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जागरण कर्मियों का आंदोलन जारी, दूसरे दिन भी बैनर-पोस्टर के साथ बैठे धरने पर (देखें तस्वीर)

दैनिक जागरण धर्मशाला यूनिट के आंदोलनकारी जागरणकर्मियों ने दूसरे दिन भी धरना प्रदर्शन जारी रखा. मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी देने, इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्गत आदेशों को मानने, कर्मचारियों को बहाल करने संबंधी कई मांगों को लेकर दैनिक जागरण धर्मशाला के मीडियाकर्मी इन दिनों हड़ताल पर चल रहे हैं. यह हड़ताल नोएडा से लेकर हिसार, पानीपत, जम्मू, जालंधर, धर्मशाला आदि जगहों पर है. प्रबंधन जैसे तैसे अखबार छाप पा रहा है.

मीडिया का मामला होने के कारण इस बड़े आंदोलन को न कोई न्यूज चैनल दिखा रहा है और न ही कोई अखबार इस बारे में छाप रहा है. इसे ही कहते हैं चिराग तले अंधेरा. दूसरों की पीड़ा के बारे में लिखने बताने वाले मीडियाकर्मी जब खुद की पीड़ा को लेकर आंदोलनरत हैं तो अब उन पर किसी की कलम नहीं चल रही और न ही कोई इस बारे में चर्चा कर रहा है. यहां तक कि मीडिया मालिकों के दबाव में पीएम, सीएम तक हैं जो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लागू नहीं करवा पा रहे हैं. पूरे प्रकरण को समझने जानने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें>>

हक के लिए आवाज उठाने वाले 18 जागरण कर्मी सस्पेंड, प्रेस के बाहर धरना-प्रदर्शन शुरू

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धर्मशाला जिला मुख्यालय में दैनिक जागरण के खिलाफ निकला जुलूस, लगे नारे (देखें तस्वीरें)

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दैनिक जागरण से सैकड़ों लोग इसलिए सस्पेंड कर दिए गए क्योंकि वे प्रबंधन से सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानने का आग्रह कर रहे हैं

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जागरण प्रबंधन ने धर्मशाला यूनिट के 12 मीडियाकर्मियों को किया सस्पेंड

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अभी भी कुछ कुत्‍ते चाट रहे हैं जागरण मैनेजमेंट के तलवे, सुनिए विष्णु त्रिपाठी के श्रीमुख से

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जागरण प्रबंधन के खिलाफ दैनिक जागरण लुधियाना के दर्जनों कर्मियों ने किया प्रदर्शन (देखें तस्वीरें)

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Dainik Jagran Govt Advertisement Scandal Case reaches Patna High Court

By ShriKrishna Prasad

: RTI  activist, Raman Kr.Yadav files the Revision Petition to quash the A.D.J(V) ‘s order of Muzaffarpur court : New Delhi, Oct. 16. An R.T.I activist, Raman Kumar Yadav, son of Sri Dev Narayan Yadav, a resident of Safi Daudi Market, Motijheel, P.S-Town, District-Muzaffarpur, State-Bihar,  has filed a Criminal Revision Petition, bearing No. 965 of 2014, in the Patna High Court, and has prayed to the court to quash the impugned order of the Additional District & Sessions Judge of Muzaffarpur in the Criminal Revision Petition No. 188 of 2013 , dated 21 June, 2014.

Raman Kumar Yadav, in  his Criminal Revision No.965 of 2014, has prayed to the Patna High Court, “ I pray that the Lordships may graciously be pleased to issue notices to accused persons to show cause as to why the impugned order of the A D J (V), Muzaffarpur in Criminal Reivison No.188 of 2013, dated 21 June, 2014,  be not quashed and after hearing the parties pleased to allow the relief prayed in Para -01 of the petition for the end of justice in the matter and the Lordships may be further pleased to stay  the proceeding till the final hearing of this petition.”

What is in the court order of Additional District & Sessions Judge(V),Muzaffarpur, Subodh Kr Srivastava?

The A.D.J(V),Muzaffarpur, learned Subodh Kr Srivastava , in the Criminal Revision Petition No. 188 of 2013, filed by the Chief General Manager, Dainik Jagran(Patna), Anand Tripathi and the Associate Editor, Dainik Jagran, Shailendra Dixit, on June, 21, 2014, ordered, “ So, the Code does not authorize private person to bring a case or suit for offences u/s 420/471/476 , if he is himself not cheated or forgery committed against him. There is statutory binding against the person for bringing such private complaint directly before the court which is not against  the society but only limited to party either between persons or person and state. Moreover, the Judicial Magistrate is not authorized to hear ‘ public interest litigation’. In the instant case, complainant is not himself aggrieved  by the conduct of newspaper management, if they have not made declaration or obtained  registration from Press Registrar, in such matters, Govt. authority like  D.M a representative of the State may take action or file case against the erring publication firm. The court should be circumspect and judicious in exercise of discretion and to take all the relevant facts and circumstances into consideration before issuing process, less it would be instrument in the hands of private complainant as vendetta to harass  persons ( AIR 1992 S.C 1815).

On the basis of above discussions, I come to the conclusion that the order of the learned Magistrate is not based on sound legal principles. So, it is not sustainable in the eye of law, as such the order dated  30 May 13, passed by the learned Judicial Magistrate, is hereby set aside and accordingly, the revision petition is  allowed. The learned court below is directed to pass fresh order in consonance with law.”

Now, what is in the order of the learned Judicial Magistrate (Ist Class), Deepanshu Srivastawa (Muzaffarpur)?

The Ist Class Judicial Magistrate(Muzaffarpur), the learned Deepanshu Srivastawa, in the complaint case No. 2638 of 2012(Trial Case No.4309 of 2013) ( Raman Kumar Yadav Vs Mahendra Mohan Gupta & others) passed a historical order,

”I heard the learned lawyer  in he complaint Case No. 2638 of 2012 in details ,and examined the documents. I find that there are seemingly prima-facie evidences against all seventeen named accused persons under sections  420/471 & 476 of Indian Penal Code  and sections 8(B),14 & 15 of the Press & Registration of Books Act. I order the court clerk to issue ‘summons’ to all the named accused persons  in the Complaint Case No. 2638 of 2012.”

Who are the named accused persons in the Muzaffarpur Complaint Case No. 2638 of 2012?

The named accused persons include (1) Mahendra Mohan Gupta (Chairman cum Managing Director, Mess. Jagran Prakashan Limited, Kanpur (2)  Sanjoy Gupta, C.E.O cum Director (3) Dhirendra Mohan Gupta (Director) (4) Sunil Gupta (Director cum Regional Editor), Dainik Jagran (5) Shailesh Gupta (Director) (6) Bharat Jee Agrawal (Director), (7) Kishore Biyani (Director) (8) Naresh Mohan (Director) (9) R.K. Jhunjhunwala (Director) (10) Rashid Mirza (Director) (11)  Shashidhar Narayan Sinha (Director) (12) Bijoy Tandon (Director) (13)  Vikram Bakhshi (Director) (14) Amit Jaisawal (Company Secretary) (15) Anand Tripathi (The General Manager) (16) Devendra Roy (Regional Editor) & (17) Shailendra Dixit (News Editor). all belonging to Mess. Jagran Prakashan Limited (Kanpur).

What are the allegations against all 17 named accused persons in the Complaint Case No. 2638 of 2012?

In the Complaint Case No. 2638 of 2012, all the  above named accused persons  have been accued of illegally printing, publishing and distributing the edition/publication of Dainik Jagran( a Hindi daily)  from the Muzaffarpur based new printing location in Bihar from April, 18, 2005 to June ,28, 2012 continuouly. They have also been charged with  gobbling the government revenue of the Union and the state governments to the tune of several millions by illegally amd fraudulently  procuring and publishing the govt. advertisements  through the Public Relation Departments of Bihar and the Directorate of Advertising & Visual Publicity (DAVP), the Govt. of India,(New Delhi) from April, 18, 2005 to June 28,2012 without a break.

By ShriKrishna Prasad
Advocate
Munger
Bihar
India
09470400813
skp919470400813@gmail.com

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धर्मशाला जिला मुख्यालय में दैनिक जागरण के खिलाफ निकला जुलूस, लगे नारे (देखें तस्वीरें)

धर्मशाला, 15 अक्तूबर। मजीठिया वेज बोर्ड के तहत वेतनमान व एरियर की मांग करने पर दैनिक जागरण से सस्पेंड किए गए धर्मशाला यूनिट के कर्मियों ने आज जिला मुख्यालय में रैली निकाल कर दैनिक जागरण के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। जगरण प्रबंधन की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाने पर सस्पेंड किए गए 18 कर्मियों ने पहले दैनिक जागरण की पठानकोट-मनाली एनएच किनारे शाहपुर के बनोई में स्थित प्रेस के बाहर धरना-प्रदर्शन शुरू किया था। वीरवार को वे जिला मुख्यालय में पहुंचे और यहां दैनिक जागरण के मालिक संजय गुप्ता और प्रबंधन के खिलाफ नारे लिखी तख्तियां लेकर जमकर नारेबाजी की।

दैनिक जागरण कर्मी आज सुबह एजूकेशन बोर्ड के पास से नारेबाजी करते हुए कचहरी अड्डा में पहुंचे। यहां उन्होंने मिनी सचिवालय के आसपास रैली निकाली और नारेबाजी की। इसके बाद वे उपायुक्त कार्यालय गए। यहां कुछ देर तक धरना देते हुए नारेबाजी की गई। इसके बाद वे जिला न्यायालय परिसर से होते हुए जिला श्रम कार्यालय पहुंचे। यहां उन्होंने कार्यालय के बाहर काफी देर तक प्रबंधन के खिलाफ नारे लगाए।

प्रदेश के इतिहास में यह पहली बार है, जबकि किसी अखबार के कर्मियों ने उसकी प्रबंधन के खिलाफ नारेबाजी की हो। अब तक बाकी कर्मचारियों व अन्य लोगों की रैलियों की कवरेज करने वाले जिला मुख्यालय के अधिकारी व कर्मचारियों सहित यहां पहुंचे लोग एक अखबार के खिलाफ निकली रैली से काफी हैरान थे। जनता के हितैषी होने और उनके हक की आवाज उठाने का दावा करने वाली अखबारों के अंदर हो रहे शोषण व कर्मचारियों के दमन के बारे में सुन कर हर कोई अखबार मालिकों को कोसता नजर आया। हालांकि इस रैली से केवल दैनिक जागरण की ही इज्जत सरेआम नीलम हुई है। वह दिन दूर नहीं जब बाकी अखबारों के कर्मचारी भी अपने हक के लिए सड़कों पर नजर आएंगे।

तस्वीरें देखने के लिए नीचे लिखे Next पर क्लिक करें>>

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दैनिक जागरण वाले चोर ही नहीं, बहुत बड़े झुट्ठे भी हैं… देखिए इनका ये थूक कर चाटना

दैनिक जागरण के मालिक किसिम किसिम की चोरियां करते हैं. कभी कर्मचारियों का पैसा मार लेते हैं तो कभी कानूनन जो देय होता है, उसे न देकर फर्जी लिखवा लेते हैं कि सब कुछ ठीक ठाक नियमानुसार दिया लिया जा रहा है. ऐसे भांति भांति के फर्जीवाड़ों और चोरियों का मास्टर दैनिक जागरण समूह अब तो बहुत बड़ा झुट्ठा भी घोषित हो गया है. यही नहीं, जब इसका झूठ पकड़ा गया तो इसे थूक कर चाटने को मजबूर किया गया और इसे ऐसा करना भी पड़ा.

जागरण वालों ने बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में बड़ी बड़ी होर्डिंग लगाकर खुद को नंबर वन बता रहे थे. अचानक एक रोज इन्होंने अपने ही अखबार में बड़ा बड़ा माफीनामा छापा कि हम लोगों को मालूम नहीं था कि हम लोग इस जिले में नंबर वन नहीं हैं इसलिए गलती से गलती हो गई भाइयों! नीचे पढ़िए वो माफीनामा जो जागरण के 13 अगस्त के मुजफ्फरपुर एडिशन में पेज नंबर दस पर बड़ा बड़ा प्रकाशित किया गया है. उपर अखबार का वो पेज नंबर दस है जिसमें नीचे दाहिने साइड बड़ा सा माफीनामा छपा दिख रहा है.

ऐसा नहीं है कि दैनिक जागरण के मालिकों को पता नहीं था कि वे मुजफ्फरपुर में नंबर वन नहीं हैं. इन्हें खूब पता था लेकिन चोरी और सीनाजोरी इनकी आदत है. सत्ता, कानून, सिस्टम सब कुछ को ये ठेंगे पर रखकर चलते हैं. पर जब दूसरे अखबारों ने जागरण के झूठे दुष्प्रचार पर आपत्ति कर वाद ठोंका तो जागरण को अपनी चोरी कबूल करनी पड़ी और मजबूरन माफीनामा छापना पड़ा.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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प्रतिमा भार्गव केस में प्रेस काउंसिल ने दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट को दोषी ठहराते हुए लताड़ा, …लेकिन बेशर्मों को शर्म कहां!

आगरा की रहने वाली प्रतिमा भार्गव ने मीडिया के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीत ली है. लेकिन दुख इस बात का है कि बेशर्म मीडिया वाले इस खबर को कतई नहीं छापेंगे. अगर इनमें थोड़ी भी नैतिकता होती तो प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के इस फैसले को न सिर्फ प्रकाशित करते बल्कि खुद के पतने पर चिंता जताते, विमर्श करते. प्रतिमा भार्गव के खिलाफ एक फर्जी खबर दैनिक जागरण आगरा और आई-नेक्स्ट आगरा ने प्रमुखता से प्रकाशित किया. अनाप-शनाप आरोप लगाए.

प्रतिमा से कोई पक्ष नहीं लिया गया. खबर छपने के बाद जब प्रतिमा ने अपना पक्ष छपवाना चाहा तो दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों ने इनकार कर दिया. प्रतिमा ने लीगल नोटिस भेजा अखबार को तो इसकी भी परवाह नहीं की. अंत में थक हारकर प्रतिमा ने प्रेस काउंसिल आफ इंडिया में केस किया और वकीलों के साथ प्रजेंट हुई. अपनी पूरी बात बताई. प्रेस काउंसिल ने कई बार दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों को बुलाया लेकिन ये लोग नहीं आए.

अब जाकर प्रेस काउंसिल ने आदेश किया है कि दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट ने प्रतिमा भार्गव के मामले में पत्रकारिता के मानकों का उल्लंघन किया है. इस बाबत उचित कार्रवाई के लिए RNI एवं DAVP को आर्डर की पूरी कापी प्रेषित की है. साथ ही आदेश की कापी दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों-मालिकों को भी रवाना कर दिया है. क्या दैनिक जागरण का संपादक संजय गुप्ता और आई-नेक्स्ट का संपादक आलोक सांवल इस फैसले को अपने अखबार में छाप सकेंगे? क्या इनमें तनिक भी पत्रकारीय नैतिकता और सरोकार शेष है? क्या ये एक पीड़ित महिला ने सिस्टम के नियम-कानून को मानते हुए जो न्याय की लड़ाई लड़ी है और उसमें जीत हासिल की है, उसका सम्मान करते हुए माफीनामा प्रकाशित करेंगे व उसकी खराब हुई छवि को दुरुस्त करने के लिए प्रयास करेंगे?

शायद नहीं. इसलिए क्योंकि इसी को कहते हैं कारपोरेट जर्नलिज्म, जहां सरोकार से ज्यादा बड़ा होता है पैसा. जहां पत्रकारिता के मूल्यों से ज्यादा बड़ा होता है धन का अहंकार. जहां आम जन की पीड़ा से ज्यादा बड़ी चीज होती है अपनी खोखली इज्जत. प्रतिमा ने जो लड़ाई लड़ी है और उसमें जीत हासिल की है, उसके लिए वह न सिर्फ सराहना की पात्र हैं बल्कि हम सबका उन्हें एक सैल्यूट भी देना बनता है. अब आप सब सजेस्ट करें कि आगे प्रतिमा को क्या करना चाहिए.

क्या उन्हें दिल्ली आकर पूरे मामले पर प्रेस कांफ्रेंस करना चाहिए? क्या उन्हें सुप्रीम कोर्ट में इस बात के लिए केस करना चाहिए कि अगर ये दोषी अखबार माफीनामा नहीं छापते हैं तो कोई पीड़ित क्या करे? आप सभी अपनी राय दें, सुझाव दें क्योंकि ये कोई एक प्रतिमा का मामला नहीं है. ऐसे केस हजारों की संख्या में हैं लेकिन लोग लड़ते नहीं, देर तक अड़े नहीं रह पाते, लड़ाई को हर स्टेज तक नहीं ले जा पाते. प्रतिमा ने ऐसा किया और इसमें उनका काफी समय व धन लगा, लेकिन उन्होंने अपने पक्ष में न्याय हासिल किया. अब उन्हें आगे भी लड़ाई इस मसले पर लड़नी चाहिए तो कैसे लड़ें, कहां लड़ें या अब घर बैठ जाएं?

कहने वाले ये भी कहते हैं कि संजय गुप्ता और आलोक सांवल दरअसल संपादक हैं ही नहीं, इसलिए इनकी चमड़ी पर कोई असर नहीं पड़ता. संजय गुप्ता चूंकि नरेंद्र मोहन के बेटे हैं इसलिए जन्मना मालिक होने के कारण उन्हें संपादक पद दे दिया गया, पारिवारिक गिफ्ट के रूप में. आलोक सांवल मार्केटिंग और ब्रांडिंग का आदमी रहा है, साथ ही गुप्ताज का प्रियपात्र भी, इसलिए उसे थमा दिया गया आई-नेक्स्ट का संपादक पद.

यही कारण है कि इनमें संपादकों वाली संवेदनशीलता और सरोकार कतई नहीं हैं. ये सिर्फ अपनी कंपनी का बिजनेस इंट्रेस्ट देखते हैं और अखबार का प्रसार अधिकतम बना रहे, इसकी चिंता करते हैं. इनके पहाड़ जैसे अवैध साम्राज्य के नीचे हजार दो हजार आम जन दम तोड़ दें तो इनको क्या फरक पड़ने वाला है. खैर, न्याय सबका होता है, सिस्टम नहीं करेगा तो प्रकृित करेगी. वक्त जरूर लग सकता है लेकिन प्राकृतिक न्याय का सामना तो करना ही पड़ेगा. जिस कदर ये महिला प्रतिमा भार्गव पेरशान हुई है, उससे कम परेशानियां ये दोनों शख्स न झेलेंगे, ये तय है, मसला चाहे जो रहे. जै जै. 

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


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दैनिक जागरण नोएडा में यूनियन ने सीजीएम को बता दी औकात, महिला कर्मियों को करना पड़ा बहाल

इसे कहते हैं यूनियन की ताकत. दैनिक जागरण नोएडा के चीफ जनरल मैनेजर नीतेंद्र श्रीवास्तव ने मार्केटिंग से दो महिला कर्मियों को निकाल बाहर किया तो ये महिला कर्मी दैनिक जागरण की नई बनी यूनियन तक पहुंच गईं और अपनी आपबीती सुनाई. यूनियन ने सीधे सीजीएम नीतेंद्र श्रीवास्तव की केबिन पर धावा बोला और नीतेंद्र को घेर कर दोनों कर्मियों को बहाल करने का आदेश जारी करने के लिए मजबूर कर दिया. नीतेंद्र को लोगों ने जमकर खरी खोटी सुनाने के बाद भांति भांति के विशेषणों से नवाजा. बस केवल मारा नहीं. उधर, नीतेंद्र भी कहां बाज आने वाला था. बहाली के अगले रोज दोनों कर्मी जब काम पर आईं तो इन्हें साइन यानि कार्ड पंचिंग करने से रोक दिया गया और इन्हें कैंपस में इंटर नहीं करने दिया गया. इसके बाद यूनियन की पहल पर दोनों कर्मियों ने नोएडा पुलिस स्टेशन और लेबर आफिस में शिकायत डाल दी है या शिकायत करने की तैयारी कर ली है.

जागरण मैनेजमेंट मनमानी करने का आदी हो चुका है. दैनिक जागरण मैनेजमेंट नियम-कानून से चलना भी नहीं चाहता और कर्मचारियों का रोष भी बर्दाश्त नहीं कर पाता. साथ ही कर्मियों को चैन से काम भी नहीं करने देना चाहता. विगत महीने कर्मचारियों द्वारा दिए गए दस सूत्रीय मांगों पर डीएलसी आफिस में समझौता हो गया था. इसके बाद सब कुछ शांतिपूर्वक चल रहा था. लेकिन जागरण प्रबंधन ने मार्केटिंग विभाग की दो महिला कर्मचारियों को निकाल बाहर किया. उनके विभाग के इंचार्ज ने उनसे बदसलूकी की. महिलाएं रोने लगीं तो सारे कर्मचारी जुट गए और यूनियन के कई प्रतिनिधि भी आ गए. सब लोग सीजीएम के पास पहुंचे. पता चला कि पहले इन लड़कियों से इस्तीफा देने को कहा गया था. जब इस्तीफा नहीं दिया तो उनकी इंट्री और पंचिंग रोक दी गई. सीजीएम ने खुद को हर तरफ से घिरा देख और हड़ताल की नौबत आती देख महिला कर्मियों को बहाल कर दिया. सूत्रों के मुताबिक बाद में फिर इन महिलाओं की इंट्री रोकी गई तो इन महिलाओं ने पुलिस और लेबर आफिस में शिकायत डाल दी है या शिकायत की तैयारी कर ली है.

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दैनिक जागरण के फोटो जर्नलिस्ट मदन मौर्य की ये तस्वीरें बहुत बड़ी खबर बन सकती थी लेकिन आफिस वाले मैनेज हो गए!

मेरठ में एक फोटोग्राफर हैं मदन मौर्या. सीनियर फोटो जर्नलिस्ट हैं. जमाने से दैनिक जागरण की ही सेवा में है. बेहद मुंहफट और बेबाक. चोर के मुंह पर चोर कह देना उनका रोज का नियम है. चोर चाहे सीनियर पत्रकार हो या सीनियर पुलिस / प्रशासनिक अधिकारी. मदन मौर्य की इमानदारी और मुंहफटई के कारण सब चुपचाप उनकी सुनते, उन्हें झेलते रहते हैं. दैनिक जागरण, मेरठ के मालिकान बहुत अच्छे से मदन के इमानदार स्वभाव को जानते हैं, इसलिए वो मदन के खिलाफ ढेर सारी प्रायोजित शिकायतों को डस्टबिन में डालते रहते हैं, मदन के आफिस के लोगों के बारे में कड़वे बोल को सुन कर अनसुना करते हुए भी उस पर चुपचाप अमल करते जाते हैं. मदन का काफी समय से सबसे बड़ा दुख ये कि जिनके कंधों पर सिटी की रिपोर्टिंग का जिम्मा है, उन्होंने निजी स्वार्थवश पूरे पत्रकारिता के तेवर को धंधेबाजी में तब्दील कर रखा है. मदन अपने कैमरे के जरिए जिस सरोकारी व तेवरदार पत्रकारिता को अंजाम देते हैं, उसे उनके आफिस वाले कुछ लोग बेच खाने को तत्पर हो जाते हैं. ये सारी बातें और भूमिका मदन के स्वभाव-संस्कार के बारे में बताने के लिए थीं. अब आते हैं असली खबर पर.

दैनिक जागरण मेरठ के सीनियर फोटो जर्नलिस्ट मदन मौर्य

((पहली बार किसी फोटो जर्नलिस्ट ने विधानसभा टिकट खरीदने के लिए नोटों का कार्टन ले जाते नेता की तस्वीर खींची लेकिन यह खबर नेशनल न्यूज इसलिए नहीं बन पाई क्योंकि अखबार के स्थानीय सीनियर जर्नलिस्टों ने नेताओं से सौदा कर लिया.))

पिछले दिनों मदन मौर्य ने अपने कैमरे से एक ऐसा काला सच पकड़ा जिसे बड़े बड़े पत्रकार और फोटो जर्नलिस्ट नहीं पकड़ पाए. सियासी गणित के वास्ते नोटों के लेन-देन की नंगी तस्वीर और इससे संबंधित फोटो की पूरी सीरिज मदन मौर्य ने दुस्साहसिक तरीके से अपने कैमरे में कैद किया. यह सब कुछ मेरठ सर्किट हाउस के इर्द-गिर्द हुआ. असल में मेरठ सर्किट हाउस के एक कमरे में बसपा नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी रुके हुए थे. दूसरे अलग कमरे में सपा सरकार के कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर थे. उसी दौरान पीछे के गेट से काले रंग की एक जेलो कार आती है. उसमें से कुछ लोग उतरते हैं. ये लोग नोटों से भरा एक कार्टन हाथ में लिए थे. इनमें से एक था मेरठ कैंट का भावी बसपा प्रत्याशी शैलेंद्र चौधरी. कार्टन से नोट साफ नजर आते हैं. मदन मौर्य तुरंत एलर्ट होकर कैमरा चलाने लगते हैं. कैमरे की फ्लैश देख नोट लाने वालों के बीच भगदड़ मच जाती है. ये लोग कार्टन को गाड़ी में रखते हैं और गायब हो जाते हैं. नसीमुद्दीन सिद्दीकी तुरंत कह देते हैं कि ये लोग बसपा से जुड़े नहीं हैं और पैसे से उनका कोई लेना देना नहीं है. शाहिद मंजूर भी कहते हैं कि वे नहीं जानते कौन लोग हैं और उनसे मिलने का कोई कार्यक्रम नहीं था.

मदन मौर्य के पास पूरी स्टोरी मय फोटो थी. करोड़ों रुपये देकर आगामी विधानसभा चुनाव के लिए बसपा कोटे का टिकट खरीदने का कार्यक्रम चल रहा था जो कैमरे में क्लिक हो जाने के कारण खटाई में पड़ गया. मदन ने सब कुछ अपने आफिस के हवाले कर दिया लेकिन आफिस के कुछ गणमान्य लोगों ने खेल कर दिया. सेलेक्टेड तरीके से तस्वीरें छापी. किसी को बचाया, किसी को छुपाया. मतलब ये कि मदन ने जो स्टोरी जान पर खेलकर की, उसको उनके आफिस वालों ने ही बेच खाया. कायदे से ये स्टोरी आल एडिशन फर्स्ट पेज की लीड थी. पहली बार टिकट खरीद की तस्वीर और पूरी स्टोरी पब्लिक डोमेन में आई थी, एक साहसी फोटो जर्नलिस्ट की कोशिशों के कारण. लेकिन आरोप है कि सिटी इंचार्ज से आरोपी नेता ने मिलकर मामला सेट कर लिया और पूरी खबर की हत्या हो गई. खबर को जिस रूप में डेवलप करके उछाल कर छापना था, वह नहीं हुआ. सब कुछ लीपापोती सा करके निपटा दिया गया. 

लोगों ने तो इस गेम में लाखों कमा लिए लेकिन मदन मौर्य को बदले में मिल रही है धमकियां. जिन सज्जन को मेरठ कैंट से बसपा का टिकट मिलना था और जो पैसे लेकर जा रहे थे, उनने धमकाना शुरू कर दिया है कि अगर उन्हें टिकट न मिला तो मदन मौर्य का हिसाब किया जाएगा. मदन को ऐसी जाने कितनी धमकियां मिलती है लेकिन मदन अकेले ही अपनी बाइक पर रोज काम के लिए निकलते हैं और देर रात घर वापस लौटते हैं.

सूत्र बताते हैं कि दैनिक जागरण ने पहले दिन प्रत्याशी की फोटो नहीं छापी. सिर्फ नोट भरे कार्टन का ही फोटो छापा. नेता को बचा लिया जाता है, लाखों लेकर, ऐसा आरोप लगता है. प्रबंधन के पास जब शिकायत जाती है तो प्रबंधन की फटकार के बाद सिटी इंचार्ज अगले रोज से छापना शुरू करते हैं लेकिन सबको पता है कि अगर मंशा ओबलाइज करने और धंधा करने की हो तो किस तरह व कितना छाप पाएंगे. आफर मदन मौर्य को भी मिला था, लाखों का, लेकिन उन्होंने पत्रकारिता और सरोकार को सर्वोच्च रखा, संस्थान के प्रति निष्ठा व ईमानदारी को सर्वोच्च रखा. लेकिन मदन मौर्य का ठुकराया आफर उनके आफिस के उनके कुछ सीनियर्स ने लपक लिया. बस, खेल हो गया. इस घटनाक्रम से संबंधित मदन मौर्य द्वारा खींची गई नोटों की गड्डी वाले कार्टन की तस्वीर सबसे उपर है, और अन्य तस्वीरें यहां नीचे पेश हैं. और हां, आपको मदन मौर्या को बधाई देना बनता है, उनके मोबाइल नंबर 09837099512 को डायल करके. कोई अच्छा काम कर रहा है तो उसे सराहने में क्या कंजूसी करना.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com


मदन मौर्या के साहस की एक पुरानी कहानी इस शीर्षक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं:

शाबास मदन मौर्या, जुग-जुग जियो

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जब निशिकांत ठाकुर ने पहला शिकार रामजीवन गुप्ता को बनाने की चाल चली थी…

साथियों, मजीठिया वेजबोर्ड के संघर्ष में हम एकजुट होकर विरोधस्वरूप काली पट्टी बांधकर जागरण प्रबंध तंत्र की मजबूत नींव को हिलाने में कामयाब जरूर हुए लेकिन वर्तमान की एकता से घबराए प्रबंध तंत्र अंदर ही अंदर किसी भयानक षड्यंत्र को रचने से बाज नहीं आएंगे। 1991 की बात है। 8-10-1991 की मध्यरात्रि में हड़ताल का बिगुल बजने पर तात्कालिक सुपरवाइजर प्रदुमन उपाध्याय ने एफ-21, सेक्टर-8 (मशीन विभाग) में ले जाकर यूनियन से अलग होने और यूनियन का बहिष्कार करने के एवज में नकदी की पेशकश की थी।

साथियों, लालच को मैंने दरकिनार कर दिया था। मेरे अंदर यूनियन का एक नशा था, जुनून था, जज्बा था, ईमानदारी थी। गद्दारी ना करने की सोच थी। कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व करने के दौरान मैंने कभी अपने जमीर को शर्मसार नहीं होने दिया। 1991 में यूनियन के दबंग अध्यक्ष अनिल कुमार शर्मा की यादें ताजा हो आईं। उनके अंदर भी दैनिक जागरण के प्रति नफरत की चिंगारी ज्वलंत देखी थी। सोच अच्छी रहती किंतु निर्णायक मोड़ पर प्रश्नचिन्ह लग जाता। मैं यूनियन उपाध्यक्ष पद रहते हुए उनकी कुछ बातों से सहमत नहीं हो पाता था। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के तालमेल ना होने का नतीजा ही यूनियन टूटने का सबब बना। चंदमिनटों में बाजी पलट गई। नतीजा- जागरण मैनेजमेंट को भीख में जीत हासिल हो गई। स्व. नरेंद्र मोहन द्वारा जीत की खुशी में कुछ देने की मंशा पर झट से मैंने सर्वहित में परमानेंट लेटर मांग लिया। एकाएक स्तब्ध होकर सोचने को विवश नरेंद्र मोहन वचनबद्ध स्वरूप को तात्कालिक प्रबंधक अरूण महेश्वरी को आदेश देना पड़ा। यहां मेरा निर्णय सर्वहित में था।

साथियों, मा. सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार 2011 में मजीठिया वेजबोर्ड की सुगबुगाहट होते ही 1991 में छोटे ओहदे से शुरूआत कर महाप्रबंधक का सफर तय करने वाले निशिकांत ठाकुर ने पहला शिकार फिर मुझे यानि रामजीवन गुप्ता (पीटीएस, आईएनएस) को यह सोचकर बनाया कि 1991 में यह बंदा कभी शेर था, अब तो गीदड़ बन गया होगा, शिकार आसानी से हो जाएगा। 2012 में सुस्त पड़े शेर को जगाने की भूल करने वाले जागरण को अपनी संपत्ति समझने वाले महाप्रबंधक के साथ संलिप्त समस्त अधिकारीगण अब संस्थान से विदा हो गए। बाद में आए अधिकारीगण भी उत्पीड़न की कला में माहिर एक से बढ़कर एक शातिर चालों में पारंगत चापलूस टीम मालिकों को भ्रम में रखकर अपनी गोटियां सेंक रहे हैं। मालिक भी धृतराष्ट बने बैठे हैं। महाभारत होने का इंतजार कर रहे हैं। महाभारत का परिणाम पता है- केवल पतन। वही अब दैनिक जागरण का होने वाला है, ऐसा प्रतीत होता है।

दोस्तों, युद्ध होने में कुछ दिन बाकी हैं। सहयोगी रूपी यूनियन के पदाधिकारियों का कुछ कहना है। मैं भी इनका शिकार मई-2012 से बना हुआ हूं। वाद-विवाद के चलते मैं (रामजीवन गुप्ता, पीटीएस, आईएनएस) जीविकोपार्जन हेतु मोहताज हूं। बिछुड़े कर्मचारियों के बारे में वर्तमान यूनियन ने कोई जिक्र नहीं किया। केवल वर्तमान की आधारशिला पर किला फतेह करना आसान नहीं होगा। मेरी जंग आज भी धारदार है, किंतु भूखे पेट क्या खाक लड़ा जाएगा। यूनियन के पदाधिकारियों से गुजारिश है- जब भी मैनेजमेंट और वर्कर की बात आती है तो हम भी पलकें बिछाए बैठे हैं सनम आपकी राहों में, जरा इधर भी निगाहें करें। हम भी तो आपके ही सिपाही हैं। भले ही सीट छिन गई, पर दम तो बाकी है। यह बातें सब आपबीती हैं।

रामजीवन गुप्ता

पीटीएस

आईएनएस

rahulguptan9@gmail.com

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जागरण के साथियों! एकजुट रहना, प्रबंधन पर भरोसा मत करना, सब कुछ लिखित में लेना

साथियों, मजीठिया वेजबोर्ड के मामले को लेकर दैनिक जागरण की दमनकारी नीतियों से निजात पाने का अवसर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। आपको संगठित रहकर एक-दूसरे पर भरपूर विश्वास रखना होगा। विश्वास भी ऐसा कि जैसे फरवरी माह की भरी सर्दी में कर्मचारियों में गर्मी लगी और जागरण के एयरकंडीशन की ठंडी हवा का दम निकल गया, सर्दी में भी गर्माये शरीर को ठंडा करने के लिए सभी एकजुट होकर जागरण परिसर से बाहर सड़कों पर आ गए। उस एकता की गर्मी ने आला अधिकारियों को पसीने से तरबतर कर दिया, वहीं मालिकों को गहरी नींद से जगाकर रातभर सोचने के लिए विवश कर दिया- अरे! यह क्या हो गया? एकता का बिगुल बजा कैसे? दबे-कुचले कर्मचारियों में गर्मी कैसे आ गई? जोंक की तरह खून तो हम चूस रहे थे? कंकाल शरीर को मांस कहां से चढ़ गया। सोचो साथियों, शरीर में गर्म खून नहीं फिर भी आग भड़क गई। यही गर्माहट अब जागरण के सभी संस्करणों के कर्मचारियों में लाना है।

दोस्तों, हमें इस मिसाल को मसाल बनाकर सभी संस्करणों में जलाना है। इस मसाल में दमनकारी नीतियों से ओतप्रोत जागरण प्रबंधक की हर चाल को दफन करना है। हमारे अंदर जलती हुई ज्वाला को ज्वारभाटा का रूप देना होगा, तभी पहाड़ जैसे विशालकाय दैनिक जागरण के अहंकार और अधिकारियों के भ्रम की आहूति देने में कामयाबी मिलेगी। 1991 में इसी विशालकाय जागरण प्रबंधकतंत्र ने अपनी नीतियों को कामयाब होते देखा है। तभी से जागरण की दमनकारी नीतियों ने अपने पांव पसारते हुए हर निष्ठावान, ईमानदार और मेहनती कर्मचारी की आहूति लेने में कभी कोताही नहीं बरती। उसी कुचक्र में फंसकर मुझे भी यूनियन की हार और मैनेजमेंट की जीत का विषपान करना पड़ा था। लेकिन मेरे जेहन में रह-रहकर एकता बनाने, कर्मचारी के हितार्थ कुछ करने और संगठित रहने की चिंगारी ज्वलंत होते देख तात्कालिक प्रबंधक ने षड्यंत्र रचकर मुझे (रामजीवन गुप्ता) 6-5-1994 को आईएनएस, दिल्ली में तबादला कर ज्वलंत होती आग को फिर ठंडा कर दिया।

साथियों, आज मैं फिर कहूंगा, इनसे लिखित के अलावा किसी बात पर विश्वास नहीं करना। आज आपकी एकता के आगे नतमस्तक होने को मजबूर हैं, जागरण की दूरदर्शी कुनीतियां जगजाहिर हैं- बदलते मौसम में बरसने में देर नहीं लगाते हैं। मजीठिया वेजबोर्ड की इस आर-पार की लड़ाई में दिल्ली सरकार के सहयोग की अपेक्षा से बल मिला, वहीं आपकी लड़ाई में विभिन्न संस्करणों के कर्मचारियों की भावनाएं शामिल हो रही हैं, भावनाएं भगवानरूपी सत्य के साथ है। हमे अपनी हद में, मर्यादा में, एकता में रहकर मुस्कुराकर इनकी हर बात का इजहार करना है।

साथियों, एकजुटता का असर रंग लाने लगा है। विरोधस्वरूप काली पट्टी बांधने मात्र से जागरण प्रबंधन को हमारी एकता में अनैकता का बल दर्शाता है। यही फर्क जमीन और आसमान में होता है। जागरण में दसावतार का पर्दापण हो चुका, हमारी एकता ही उनका बल है। बलशाली कर्मचारी का संगठन है। सो आप और हम भी गौरवान्वित हैं कि मजीठिया वेजबोर्ड शक्ति परीक्षण में यूनियन पदाधिकारीगण शक्तिमान कहलाएंगे।

रामजीवन गुप्ता
पीटीएस
आईएनएस
दिल्ली

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जागरण के सीजीएम का कहना है- कर्मचारियों का हक मारने पर शाबासियां देगा मालिक!

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सलाम जागरणकर्मियों, किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था दैनिक जागरण में यूनियन बनेगी

: यूनियन के रूप में अवतरित दसावतार, जागरण कर्मियों की एकता मिसाल बनेगी : आपके हौसले, आपकी एकजुटता, आपका जुनून रंग ला रहा है। इस जुनून के आगे पहाड़ जैसा जागरण प्रबंधन की कोई चालबाजी कामयाब नहीं हो रही। यही पहली जीत है। दैनिक जागरण में कार्यरत सभी भाइयों से आग्रह है- आपकी एकता, धैर्य और संगठित रहना अन्य संस्थान के कर्मियों के लिए मिसाल बनती जा रही है। कभी जागरण में यूनियन बनेगी- ऐसा किसी ने सपने में भी नहीं सोचा।

कभी कोई वेजबोर्ड जागरण देने को मजबूर होता दिखाई देगा- कभी नहीं सोचा। बछावत वेजबोर्ड और मानीसाना वेजबोर्ड के वक्त लोगों में डर समाया था, तभी तो पुछल्ले अधिकारी भी तेवर दिखाने से बाज नहीं आते। वर्करों पर अपनी दबंगई, ज्यादतियां, उत्पीड़न करने जैसी कहानियां मालिकों  को सुनाकर अपनी नौकरी बचाए रखते और अन्य लाभ उठाने से चूकते नहीं। मालिक भी इन लालीपॉप जैसी कहानियां सुनकर खुषी से झूम उठते और वरदानस्वरूप पुछल्ले अधिकारियों को इस कुकृत्य पर डांटने, डपटने की बजाए मेहरबानियों की बौछार करने से नहीं चूकते। पीएफ/हाजिरी और अन्य छोटे-मोटे कार्य देखने वाले जीएम बनने का सपना संजोए बैठे हैं।

साथियों, 1991 में दी गई कुर्बानियां अब एक बड़ा वृक्ष बन गया। पुराने कर्मचारी जागरण की एक-एक चाल से वाकिफ हैं। अपना अनुभव नवनियुक्त कर्मियों को बताना, सावधान करना इनकी प्रत्येक चालों से। डरने की कोई बात नहीं, जो डरते हैं वो खाक जिया करते हैं। डरते-डरते तो 24 साल का लंबा सफर तय कर लिया, वरर्ना जागरण में कहां दम था कि 21 दिन झेल पाता। आज आपकी एकता, एकजुटता और आपके प्रत्येक निर्णय पर जागरण की गिद्धों वाली निगाह होगी, जागरण ने इतनी ऊंचाईयां हम मेहनतकश कर्मियों के बल पर तय की। जो संस्थान पुराने कर्मचारियों को अपनाता है, उनकी सेवाकाल को सेवाश्रम समझता है, उनकी इज्जत करता, तवज्जो देता है, वही संस्थान तरक्की करता है। उम्र के 51 वर्श पूरे होने पर इधर-उधर भटकते हुए मैं हमेषा एक अर्जुन अवतरित होने की कामना के साथ जी रहा था, भगवान ने मेरी सुन ली और ला खड़ा किया- यूनियन के रूप में अवतरित दसावतार को।

मैंने भी सेवाभाव से जीवन के अमूल्य 21 साल दैनिक जागरण को अर्पित किया। सोचा था- अब यहीं से खुशी-खुशी साथियों के सामने सेवामुक्त हो जाऊंगा। लेकिन दैनिक जागरण ने इस उम्र में सहारा देने के बजाए एक झटके में मेरा सपना चकनाचूर कर मुझे दर-दर भटकने, ठोकरे खाने, रोटी-रोटी को मोहताज कर दिया। एक पल में मेरा भविष्य जम्मू जाने का फरमान सुनाकर तय करके अंधकार में धकेल दिया। मेरा सारा परिवार तितर-बितर होकर तिनके की तरह बिखर गया। आत्मा बहुत रोई, दुखी भी हुआ पर हार नहीं मानी और आज भी इनसे दो-दो हाथ कर रहा हूं। मेरे साथियों, आपके बीच एक श्रेष्ठ कर्मचारी रामजीवन गुप्ता (पीटीएस, आईएनएस) अपनी व्यथा सुनाकर आपका मनोबल बढ़ा रहा। मैं आज आपकी संगठित एकता को देखकर गदगद हूं। मैंने भी सोच रखा है- जिंदगी रहे या नहीं पर संजय गुप्ता बनाम जागरण से हार नहीं मानूंगा। तुम गुप्ता से गुप्त लिखने लगे और अब लुप्त होने का वक्त आ गया। दूसरों का भविष्य तय करने वाले जागरण का भविष्य मजीठिया वेजबोर्ड लेने के पश्चात तय होगा।

रामजीवन गुप्ता

पीटीएस

आईएनएस

rahulguptan9@gmail.com

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दैनिक जागरण के कर्मचारी अब आरपार की लड़ाई के मूड में, काली पट्टियां बांधी, 17 को हड़ताल

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जागरण के जिंदा और हिन्दुस्तान-अमर उजाला के मुर्दा पत्रकार

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कर्मचारियों से निपटने के लिए दमन की रणनीति बनाने में जुटा जागरण प्रबंधन, कोई भी कार्रवाई भारी पड़ना भी तय

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कर्मचारियों से निपटने के लिए दमन की रणनीति बनाने में जुटा जागरण प्रबंधन, कोई भी कार्रवाई भारी पड़ना भी तय

दैनिक जागरण नोएडा का प्रबंधन अब आंदोलन की धमक से सहम चुका है। अब वह बड़ी कार्रवाई पर मंत्रणा में मशगूल हो गया है। कर्मचारी बहादुरी से अपनी मांगों पर अटल रहते हुए पूरी तरह आरपार की लड़ाई के लिए कमर कस चुके हैं। ताजा सूचना ये मिल रही है कि जागरण मालिक और प्रबंधक अब संस्थान के आंदोलित पुराने कर्मचारियों को हटा कर नई भर्ती करने की योजना बना रहे हैं। नई भर्ती के लिए इंटरव्यू लिए जा रहे हैं। जो लोग यूनियन में शामिल हैं,  उनको हटाने की तैयारी की जा रही है। हालाँकि ये भी कहा जा रहा है की यह चर्चा यूनियन की एकता तोड़ने के लिए प्रबंधन द्वारा फैलाई जा रही है।

दैनिक जागरण नोएडा में काली पट्टियां बांधकर प्रबंधन की नीतियों का विरोध जताते कर्मचारी

मीडिया जगत की एक बहुत बड़ी खबर भड़ास के पास आई है। दैनिक जागरण नोएडा के कर्मचारियों ने जिस तरह आंदोलन की राह पर पूरी एकता के साथ कदम बढ़ा दिया है, उससे जागरण प्रबंधन बुरी तरह डर गया है। उसके पास अब बस एक ही रास्ता बचा है कि वह कर्मचारियों का दमन शुरू कर दे। इसकी पहली कड़ी के रूप में अंदोलनकारियों की पहली कतार में शामिल कर्मचारियों की नौकरी छी ली जाए। इसके लिए व्यूह रचना हो चुकी है। इससे तय माना जा रहा है कि आने वाले दिनो में टकराव कोई भी रूप ले सकता है। मजीठिया मामले पर सुप्रीम कोर्ट और यूनियन के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेशों के आईने में कर्मचारियों का पलड़ा भारी हो सकता है और आज के हालात में उनके खिलाफ कोई भी कार्रवाई जागरण प्रबंधन के लिए बहुत भारी पड़ सकती है।  

गौरतलब है कि दैनिक जागरण प्रबंधन की कर्मचारी विरोधी नीतियों, दंडात्मक कार्रवाइयों, मजीठिया वेतनमान पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को न मानने आदि से नाराज कर्मचारी अब आमने सामने की लड़ाई में उतर चुके हैं। जागरण कर्मचारियों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक सीधे टकराव की लामबंदी के साथ नोएडा और दिल्ली में जागरण कर्मचारी काली पट्टियां बांधकर काम कर रहे हैं। वह 17 जुलाई को 24 घंटे की हड़ताल पर रहेंगे। उसके बाद आगे के संघर्ष की रूपरेखा लागू की जाएगी। कर्मचारियों की तरफ से 8 जून 2015 को दैनिक जागरण प्रबंधन को नोटिस देकर पूर्व सूचना दे दी गई थी कि उनके मांग पत्र पर कोई विचार करने की बजाय प्रबंधन कर्मचारियों का लगातार उत्पीड़न कर रहा है। इसलिए अब वे एक जुलाई 2015 से काली पट्टियां बांध कर कार्य करेंगे। यह सिलसिला 16 जुलाई तक जारी रहेगा। अगले दिन 17 जुलाई को 24 घंटे तक कार्य बहिष्कार कर हड़ताल पर रहेंगे। यह भी पता चला है कि अखबार की अन्य यूनिटों में भी ये आंदोलन पैर पसार सकता है। पूरे ग्रुप में कार्यरत कर्मचारी अखबार मालिकों के कट्टरतापूर्ण एवं उत्पीड़नात्मक रवैये से बुरी तरह आजिज आ चुके हैं। जागरण प्रबंधन, प्रशासन और सरकारों में अपनी जड़े जमाने के भरोसे ये उम्मीद पालकर चल रहा है कि वह कर्मचारियों की मांगों पर कत्तई विचार नहीं करेगा, चाहे उसे सुप्रीम कोर्ट ही क्यों न सीधे आदेशित करे। कर्मचारी भी इस बार अपना इरादा ठान कर मैदान में उतर रहे हैं कि अब लड़ाई आर या पार होगी, चाहे कुछ भी हो जाए, इस दमनकारी अखबार मालिक की हरकतों के आगे कत्तई नहीं झुकना है। स्थिति काफी गंभीर नजर आ रही है। कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिन अखबार के लिए बड़े ही चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। 

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जागरण के जिंदा और हिन्दुस्तान-अमर उजाला के मुर्दा पत्रकार

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Dainik Jagran and Zee News are blot to Indian media…

दिव्य जोशी : Dainik Jagran and Zee News are blot to Indian media. Both these media houses have stripped themselves completely in front of Modi. The way in which they are supporting absconder Lalit Modi is utterly shameful but “shame” word no longer exist in the dictionary of one section of Indian media. One channel showing “sushma-vasundhra ne madad hi to ki h, hungama h q barpa”.

While, self proclaimed number one hindi daily dainik jagran is writing – na hi apradhi aur na hi bhagode h lalit modi (lalit is neither absconder nor accused). Both these media groups are not seeing anything wrong in the unique business model which Vashundhra’s son discovered all of a sudden( 1 lakh rs premium on 10 rs share). Media which was seeing every land deal of vadra as a big fraud, is now suddenly finding everything all right in the fraudlent transactions between Raje and Lalit Modi.

According to jagran and zee, there is no quid pro quo. Well, everyone knows that zee group chairman Subhash Chandra openly campaigned for BJP during Haryana assembly polls and Dainik’s Jagran’s founder was sangh pracharak. So, it will be stupidity on our part if we expect any neutral journalism from them but they should also remove the mask of “independent media” from their faces. Despite being a govt channel, even DD news is much neutral than zee news. Dainik Jagran is even worse than bjp’s mouthpiece.

पत्रकार दिव्य जोशी के फेसबुक वॉल से.

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यौन शोषण के आरोपी प्रशांत मिश्र को गिरफ्तार करो, गृहमंत्री से गुहार, पत्रकारों ने काले झंडे दिखाए

(प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करते दैनिक जागरण के मालिकान के साथ सबसे दाएं प्रशांत मिश्र एवं यूनियन का मांग पत्र)


दैनिक जागरण के राजनैतिक संपादक प्रशांत मिश्र पर यौन शोषण के आरोप का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। कहीं पर उनकी गिरफ्तारी और मामले की निष्‍पक्ष न्‍यायिक जांच की मांग की जा रही है तो कहीं पर उन्‍हें काले झंडे दिखाए जा रहे हैं। पटना से खबर मिली है कि प्रशांत मिश्र दैनिक जागरण कार्यालय भवन के उद्घाटन अवसर पर पटना पहुंचे तो उन पर लगे आरोपों से पत्रकारों में इतना रोष रहा कि वहां उन्‍हें काले झंडे दिखाए गए और उनकी गिरफ्तारी की मांग की गई।

उधर, यूपी न्‍यूज पेपर इंप्‍लाइज यूनियन के प्रदेश उपाध्‍यक्ष आरपी सिंह ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिख कर प्रशांत मिश्र को गिरफ्तार किए जाने की मांग की है। उन्‍होंने आश्‍चर्य जताया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निकट ऐसे लोग भी हैं, जो अपनी सहयोगी महिला का यौन शोषण करते हैं और अपने पद और प्रतिष्‍ठा का दुरुपयोग कर मामले को दबा दिए जाने का कुचक्र रचते हैं। उन्‍होंने कहा है कि जब तक प्रशांत मिश्र को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, यौन शोषण की शिकार महिला के मामले की निष्‍पक्ष न्‍यायिक जांच नहीं हो सकेगी।

मूल खबर…

दैनिक जागरण के राजनैतिक संपादक प्रशांत मिश्रा पर यौन शोषण का आरोप

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी के करीबी और दैनिक जागरण के राजनैतिक संपादक प्रशांत मिश्रा पर यौन शोषण का आरोप लगाया गया है। आइर्एनएस में काम करने वाली एक महिला कर्मचारी ने इस संबंध में संसद मार्ग थाने में जनवरी के पहले सप्ताह में एक तहरीर भी दी। इस महिला ने अपने साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ राष्ट्रीय महिला आयोग में भी शिकायत दर्ज कराई है। महिला की शिकायत पर राष्ट्रीय महिला आयोग ने दैनिक जागरण के सीईओ और प्रधान संपादक संजय गुप्ता को इस शिकायत पर कार्रवाई कर आयोग को 15 दिनों में जवाब देने को कहा है।

एक पेज के शिकायती पत्र में महिला ने प्रशांत मिश्रा पर कई तरह के संगीन आरोप लगाए हैं। महिला का आरोप है कि प्रशांत मिश्रा उससे (शिकायतकर्ता) अपने व्यक्तिगत मेल पर अश्लीाल मेल मंगाकर पढ़वाते थे। इस तरह के मेल को डिलीट कर देने पर गुस्सा करते थे और अपने कमरे में बुलाकर अश्लील हरकत करते थे। महिला का हाथ तक पकड़ने का आरोप लगाया गया है। कहा गया है कि इस तरह की हरकत करने से मना करने पर उसे नौकरी से निकालने की प्रशांत मिश्रा दिया करते थे।

अपनी शिकायत में महिला ने कहा कि इसकी जानकारी सीएमडी, सीईओ सहित सभी वरिष्ठं अधिकारियों को उसने दी लेकिन प्रशांत मिश्रा के खिलाफ कार्रवाई होने के बजाय उसे ही नौकरी पर न आने को कह दिया गया। गौरतलब है कि प्रशांत मिश्रा को प्रधानमंत्री के काफी करीब माना जाता है और 19 दिसंबर को जो प्रधानमंत्री राहत कोष में दैनिक जागरण की ओर से चार करोड़ रुपये दिए गए थे उसके लिए उन्होंने (प्रशांत मिश्रा) ही मालिकों को प्रधानमंत्री मोदी से मिलवाया था। इस मुलाकात के दौरान प्रशांत मिश्रा भी मालिकों के साथ ड्राफ्ट देने साथ गए थे।

दैनिक जागरण के अधिकारियों पर यह पहला अवसर नहीं है जब उनपर यौन शोषण का आरोप लगा है। इससे पहले कानपुर, नोएडा और पटना के कई संपादकों मैनेजरों पर यौन शोषण का आरोप लग चुका है। इस दौरान संस्थान में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार विशाखा समिति गठित करने की मांग उठती रही है लेकिन दैनिक जागरण के मालिकान को न तो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की परवाह है और न ही देश के नियम-कानून की। उन्हें लगता है उनकी ऊंची पहुंच के कारण उनका कोई बाल बांका नहीं कर सकता।

फोर्थ पिलर एफबी वॉल से

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छापे को लेकर भ्रम फैला रहे हैं दैनिक जागरण प्रबंधन के गुर्गे

दैनिक जागरण के नोएडा कार्यालय में एक ऐतिहासिक घटना घटी। चार-चार श्रम पर्यवेक्षकों ने कंपनी दफ्तर पर बुधवार की रात में छापा मार दिया। यह घटना ऐतिहासिक इसलिए है कि जहां अखबार के दफ्तर में लेबर आफिस का चपरासी भी नहीं फटकता था, वहां अधिकारियों ने छापा मार कर यह संदेश दिया है कि श्रम अधिकारी अब अखबार की भौकाल में आने वाले नहीं हैं। इस घटना से बौखलाए दैनिक जागरण प्रबंधन ने कर्मचारियों में भ्रम फैलाने के लिए अपने कुछ गुर्गों को छोड़ दिया है।

ये गुर्गे जगह-जगह यह कहते फिर रहे हैं कि दैनिक जागरण दफ्तर पर जो छापा पड़ा है, वह कर्मचारियों के हित में नहीं है। उसकी आड़ में डीएलसी के अधिकारी गलत रिपोर्ट दे सकते हैं। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में दैनिक जागरण प्रबंधन के खिलाफ और भी बड़े-बड़े धमाके हो सकते हैं। जैसे जैसे असली क्रांतिकारियों का दल सक्रिय हो रहा है, फर्जी क्रांतिकारी बेनकाब होने लगे हैं। अब कर्मचारियों को यह तय करना होगा कि उनका असली हितैषी कौन है। इसलिए अब कर्मचारियों को भ्रमित होने की जरूरत नहीं है। आराम से तमाशा देखते रहें और मजीठिया का महाभारत शुरू होने से पहले अपनी निष्‍ठा तय कर लें, क्‍योंकि जीत तो अंत में सत्‍य की ही होती है।

मूल खबर…

दैनिक जागरण नोएडा कार्यालय पर श्रम पर्यवेक्षकों का छापा, टीम को बैरंग लौटाया

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Newspapers readership IRS 2014 Download

Download Topline Newspapers Readership numbers… देश के बड़े अखबारों, मैग्जीनों आदि की लैटेस्ट या बीते वर्षों की प्रसार संख्या जानने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों या लिंक्स पर क्लिक करें…

IRS 2014 Topline Findings
https://bhadas4media.com/pdf/irs2014.pdf

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IRS 2013 Topline Findings
https://bhadas4media.com/pdf/irs2013.pdf

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IRS 2012 Q4 Topline Findings
https://bhadas4media.com/pdf/irs2014q4.pdf


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कई दिन चुप्पी साधे रहे जागरण और अमर उजाला का आज एक साथ आईआरएस रिपोर्ट पर अटैक, निशाने पर ‘हिंदुस्तान’

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रीडर सर्वे : जागरण, हिंदुस्तान, भास्कर की शीर्ष अग्रता बरकरार, पत्रिका चौथे, अमर उजाला पांचवें पायदान पर

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हिंदुस्‍तान ने लिखा – बड़े अखबारों का विरोध बेकार, इंडियन रीडरशिप सर्वे की रिपोर्ट सही

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मजीठिया वेज बोर्ड : सुप्रीम कोर्ट में आज की सुनवाई, भविष्य की रणनीति और लड़ने का आखिरी मौका… (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : सुप्रीम कोर्ट से अभी लौटा हूं. जीवन में पहली दफे सुप्रीम कोर्ट के अंदर जाने का मौका मिला. गेट पर वकील के मुहर लगा फार्म भरना पड़ा जिसमें अपना परिचय, केस नंबर आदि लिखने के बाद अपने फोटो आईडी की फोटोकापी को नत्थीकर रिसेप्शन पर दिया. वहां रिसेप्शन वाली लड़की ने मेरा फोटो खींचकर व कुछ बातें पूछ कर एक फोटो इंट्री पास बनाया. पास पर एक होलोग्राम चिपकाने के बाद मुझे दिया. जब तक कोर्ट नंबर आठ पहुंचता, केस की सुनवाई समाप्त होने को थी.

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में भड़ास यानि Bhadas4Media.com की पहल पर दायर सैकड़ों याचिकाओं की सुनवाई आज थी. जो साथी छुपकर लड़ रहे हैं, उनको मैं रिप्रजेंट कर रहा हूं. कोर्ट नंबर आठ में आइटम नंबर तीन था. दूसरे कई पत्रकार साथी और उनके वकील भी आए हुए थे. मामले की सुनवाई शुरू होते ही टाइम्स आफ इंडिया की तरफ से आए एक वकील ने कहा कि उनके खिलाफ जिस कर्मचारी ने याचिका दायर की थी, उसने वापस लेने के लिए सहमति दे दी है. इस पर कर्मचारी के वकील ने विरोध किया और कहा कि ये झूठ है. इसको लेकर न्यायाधीश ने लड़-भिड़ रहे दोनों वकीलों को फटकार लगाई और इस प्रकरण को अपने पास रोक लिया. इसी तरह वकील परमानंद पांडेय के एक मामले में जब दूसरे पक्ष के वकील ने कहा कि मजीठिया मांगने वाला कर्मी इसके दायरे में आता ही नहीं तो न्यायाधीश ने परमानंद पांडेय से पूछ लिया कि क्या ये सही है. पांडेय जी फाइल देखने लगे. तुरंत जवाब न मिलने पर न्यायाधीश ने इस मामले को भी होल्ड करा लिया. बाकी सभी मामलों में  कोर्ट ने सभी मालिकों को नोटिस भेजने का आदेश दिया है. इस नोटिस में कहा गया है कि क्यों न अखबार मालिकों के खिलाफ अवमानना का मुकदमा शुरू किया जाए. मामले की सुनवाई की अगली तारीख 28 अप्रैल है.

दोस्तों, एक मदद चाहिए. सभी अखबारों की डीएवीपी में दिखाई जाने वाली प्रसार संख्या, आरएनआई में दायर किए जाने वाले रिटर्न का डिटेल और कंपनी बैलेंस शीट आदि के आंकड़े चाहिए. जो साथी इसे मुहैया करा सकता है वह मुझे yashwant@bhadas4media.com पर मेल करे. अखबार मालिक अपने बचाव के लिए जो नई चाल चल रहे हैं, उसका काउंटर करने के लिए ये आंकड़े मिलने बहुत जरूरी हैं ताकि आम पत्रकारों को उनका हक दिलाया जा सके. मालिकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख बहुत तल्ख है. आज की सुनवाई से यह लग रहा है कि 28 अप्रैल की डेट पर सुप्रीम कोर्ट अखबार मालिकों के खिलाफ कोई कड़ा आदेश जारी कर सकता है. अगली डेट पर मालिकों की तरफ से क्या क्या नई चाल चली जाने वाली है, इसके कुछ डिटेल हाथ लगे हैं. उसी के तहत आप से सभी अखबारों की डीएवीपी में दिखाई जाने वाली प्रसार संख्या, आरएनआई में दायर किए जाने वाले रिटर्न का डिटेल और कंपनी बैलेंस शीट आदि के आंकड़े मांगे जा रहे हैं. आप लोग जिन-जिन अखबारों में हो, उन उन अखबारों के उपरोक्त डिटेल पता लगाएं. मैं भी अपने स्तर पर इस काम में लगता हूं.

दोस्तों बस कुछ ही दिनों का खेल है. जी-जान से सबको लग जुट जाना है. ये नहीं देखना है कि उसका वकील कौन है मेरा वकील कौन है. जो भी हैं, सब अच्छे हैं और सब अपने हैं. जो साथी अब तक इस लड़ाई में छुपकर या खुलकर शरीक नहीं हो पाए हैं, उनके लिए अब कुछ दिन ही शेष हैं. आप सिर्फ सात हजार रुपये में सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से बनने वाली अपनी सेलरी व अपना एरियर का हक पाने के लिए एडवोकेट Umesh Sharma​ के मार्फत केस डाल सकते हैं. एडवोकेट उमेश शर्मा से उनकी मेल आईडी legalhelplineindia@gmail.com या उनके आफिस के फोन नंबर 011-2335 5388 या उनके निजी मोबाइल नंबर 09868235388 के जरिए संपर्क कर सकते हैं.

आज यानि 27 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई को लेकर एडवोकेट उमेश शर्मा ने जो कुछ मुझे बताया, उसे मैंने अपने मोबाइल से रिकार्ड कर लिया ताकि आप लोग भी सुनें जानें और बूझें. क्लिक करें इस लिंक पर: https://www.youtube.com/watch?v=KTTDbkReQ1k

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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प्रदीप श्रीवास्तव और विनोद शील का विरोध करने के कारण मैं निशीकांत ठाकुर का चहेता बन गया

: दैनिक जागरण के चिंटू, मिंटू और चिंदीचोर : अवधी की एक कहावत है-केका कही छोटी जनी, केका कही बड़ी जनी। घरा लै गईं दूनौ जनी। अर्थात किसे छोटी बहू कहूं और किसे बड़ी बहू कहूं। घर तो दोनों बहुओं ने बर्बाद किया है। यह बात दैनिक जागरण पर सटीक बैठती है। 1995 की बात है, जब टीवी चैनलों की धूम मची थी। अखबार इस बात से डर गए थे कि कहीं इलेक्ट्रानिक मीडिया उन्हें निगल न जाए। ऐसे समय में मैं इलेक्ट्रानिक मीडिया से काम छोड़ कर दैनिक जागरण में नौकरी के लिए आ गया था।

ज्वाइनिंग का पहला दिन था। नोएडा के सेक्टर-8 वाले कार्यालय में गेट पर एक सज्जन मिले। उन्होंने कहा, भाई आज ही ज्वाइन कर रहे हो। मैंने हां में सिर हिला दिया। उन्होंने कहा, मत ज्वाइन करो। यहां तो बिहार के लोगों का बोलबाला है। बड़ा दुख पाओगे। इसे मैंने चुनौती के रूप में लिया और मन ही मन में तय किया कि इस संस्थान में कम से कम एक दशक बिताऊंगा। इससे पूर्व मैं किसी भी संस्थान में कुछ महीनों से ज्यादा नहीं टिका था। शायद मेरे संकल्प का ही असर है कि इस समय दैनिक जागरण में मेरे दो दशक पूरे हो रहे हैं।

संस्थान के अंदर कुछ ही दिनों बाद पता चल गया कि यहां तो प्रदीप श्रीवास्तव की तूती बोलती है, जो उस समय समाचार संपादक हुआ करते थे। यह अलग बात है कि कुछ वर्षों बाद निशीकांत ठाकुर अनाड़ी से खि‍लाड़ी और फिर खि‍लाडि़यों के खि‍लाड़ी बन चुके थे। प्रदीप श्रीवास्तव और विनोद शील का विरोध करने के कारण मैं कब निशीकांत ठाकुर का चहेता बन गया, मुझे पता तक नहीं चला। मुझे निशीकांत ठाकुर ने तो कभी कोई कष्ट नहीं दिया, लेकिन उनके आदमियों के कारण समय-समय पर मेरा दम जरूर घुटा है। इस घुटन का मेरे पास ठीक उसी तरह कोई जवाब नहीं था, जैसे निशीकांत ठाकुर का संस्थान में कोई जवाब नहीं था। अगर किसी ने जवाब देने का प्रयास भी किया तो वह तत्काल वीरगति को प्राप्त हो गया। 

निशीकांत ठाकुर पर आरोप लगते रहे हैं कि वह आदमी तो कम दाम में लाते हैं, लेकिन वे होते हैं दो कौड़ी के। यह अलग बात है कि निशीकांत ठाकुर ऐसे काबिल लोगों का सम्मान करते रहे, जो उनके आदमियों को खींच खांच कर चला देते थे। फिर भी यह विडंबना तो रही ही कि फोन का बिल पाने के लिए निशीकांत ठाकुर का आदमी होना अनिवार्य था। मेरी और निशीकांत ठाकुर की दोस्ती दुश्मन का दुश्मन दोस्त वाली ही थी। इसलिए मुझे आज तक संस्थान से फोन का बिल नहीं मिला। यह अलग बात है कि मैंने अपने मारुति वैन के ड्राइवर को भी फोन दे रखा था।

खैर, निशीकांत ठाकुर का दौर पूरा हुआ और कमान आ गई विष्णु त्रिपाठी के हाथ में। उन्होंने जो बैठकें लीं, उनसे ऐसा लगा, जैसे पत्रकारिता का नया दौर आने वाला है, जिसमें राजा भोज की प्रजा के समान सभी काबिल होंगे और लोगों को अपनी योग्यता का फल मिलेगा। लेकिन यह क्या, चिंटू, मिंटू और चिंदी चोरों की ऐसी भीड़ लगी कि निशीकांत ठाकुर द्वारा एकत्र किए गए रत्नों की वाट लग गई। 

अब आप यह गर्व से कह सकते हैं कि दैनिक जागरण पूरी तरह से प्रतिभा शून्य हो रहा है। काबिल और नाकाबिल लोगों की जो कॉकटेल निशीकांत ठाकुर ने बनाई थी, उसे साफ कर विष्णु त्रिपाठी ने चिंटू, मिंटू और चिंदी चोरों का ऐसा विलयन बनाया है, जो पूरी तरह से नीट है। उसमें आप को प्रतिभा की कोई मिलावट नहीं मिलेगी। उन्होंने ऐसी बाड़ तैयार कर दी है, जो खुद फसल उजाड़ रही है।

दैनिक जागरण में कार्यरत चीफ सब एडिटर श्रीकांत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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पत्रकार श्रीकांत सिंह ने जागरण वालों पर यूं मारी पिचकारी, देखें वीडियो

दैनिक जागरण नोएडा से जुड़े हुए वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत सिंह काफी समय से बगावती मूड में हैं. इन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अपना एरियर व सेलरी पाने के लिए मुहिम छेड़ रखी है. साथ ही दर्जनों कर्मचारियों को इस मुहिम से जोड़ रखा है. पिछले दिनों नाराज प्रबंधन ने श्रीकांत का तबादला जम्मू कर दिया. बाद में वे नोएडा बुलाए गए लेकिन उन्हें आफिस में नहीं घुसने दिया गया. साथ ही जागरण के गार्डों ने उनसे मारपीट व छिनैती की. इस पूरे मामले को लेकर वे लेबर आफिस गए लेकिन उनका आरोप है कि अफसर ने सेटिंग करके रिपोर्ट जागरण के पक्ष में दे दी है.

श्रीकांत सिंह ने पूरे मामले को लेकर होली के दिन जागरण पर पिचकारी मारी है. अपने क्रिएटिव अंदाज में उन्होंने विजुवल्स के साथ होरी गीत को यूट्यूब पर लोड किया है. उनके होरी गीत की एक बानगी देखिए…

संजय गुप्ता का दिल भर आया
विष्णु त्रिपाठी देखो मुंहकी खाया
ओम वर्मा हड़के
रंग बरसे
भीगे कर्मचारी
रंग बरसे

पूरे वीडियो को देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=_NfFADVM9zQ

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दैनिक जागरण के महाप्रबंधक समेत चार के खिलाफ यौन उत्पीड़न का मुकदमा

पटना से एक बड़ी खबर आ रही है. दैनिक जागरण के महाप्रबंधक आनंद त्रिपाठी समेत चार लोगों के खिलाफ पटना कोतवाली में यौन उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कराया गया है. ये मुकदमा दैनिक जागरण में कार्यरत एक महिला पत्रकार ने दर्ज कराया है. 24 फरवरी को दर्ज मुकदमें में आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता यानि आईपीसी की धाराएं 341, 354, 506, 509, 504, 34 लगाई गई हैं.

जो चार आरोपी हैं उनमें महाप्रबंधक आनंद त्रिपाठी के अलावा शिड्यूलिंग के राजेश कुमार, मार्केटिंग के प्रभांशु शेखर सिंह और प्रवीण जौहरी हैं. ज्ञात हो कि दैनिक जागरण पटना में सेक्स स्कैंडल लगातार छाया हुआ है. इसके पहले संपादक सदगुरु शरण पर यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया गया था और पुलिस ने जागरण आफिस पहुंचकर जांच पड़ताल की थी.

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विष्णु त्रिपाठी का खेल, दैनिक जागरण की बन गई रेल

दैनिक जागरण में संपादक पद की शोभा बढ़ाने वाला स्वनामधन्य विष्णु त्रिपाठी किस प्रकार गेम करके अखबार को क्षति पहुंचा रहा है उसकी एक बानगी हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। मजीठिया मामले में मालिकों से बुरी तरह लताड़े जाने के बाद अब मालिकों के बीच अपनी छवि चमकाने के लिए विष्णु त्रिपाठी रोज नई नई चालें चल रहे हैं।पिछले दिनों रेल बजट और आम बजट के दौरान सेंट्रल डेस्‍क को नीचा दिखाने और अपनी वाहवाही करवाने की अपने गुर्गों के सहारे चली चालें उल्‍टी पड़ गई लगती हैं। प्‍लान ये था कि बजट और रेल बजट से सेंट्रल डेस्‍क को अलग कर यह दिखाया जाए कि इन महत्‍वपूर्ण अवसरों पर सेंट्रल डेस्‍क की भूमिका न के बराबर है। और इस तरह सेंट्रल डेस्‍क पर अपने चपाटियों के हवाले करने की साजिश कुछ इस तरह रची गई।

रेल बजट से चार दिन पहले नेशनल ब्यूरो के सदस्यों के साथ सेंट्रल डेस्क और नोएडा एडीशन के साथियों की प्लानिंग और तैयारियों के सिलसिले में बैठक हुई थी। मीटिंग में हर साल की तरह पूर्ववत सब कुछ तय हुआ था। सेंट्रल डेस्क का पूरा रोल था। एक्जीक्यूटिव एडीटर विष्णु ने अपनी मंशा जाहिर नहीं होने दी। इसलिए नेशनल ब्यूरो के लोगों तक को पता नहीं चल पाया कि एडीटर के दिमाग में क्या चल रहा है, हां नोएडा एडीशन के प्रभारी बृज चौबे, प्रतीक चटर्जी और सर्वेश को जरूर बता दिया गया था। अचानक रेल बजट वाले दिन अपने गेमप्लान के मुताबिक उसने पूरी प्लानिंग ही बदल दी। सेंट्रल डेस्क को परिदृश्य से लगभग गायब कर दिया। नेशनल ब्यूरो की खबरें पास करने, उन्हें पन्ने पर लगाने और ब्यूरो के साथ कोऑर्डिनेशन सब कुछ नोएडा मदर एडीशन के हाथ में दे दिया गया। सेंट्रल डेस्क सिर्फ प्रतिक्रियाएं बनाकर रह गई। इसका नतीजा यह हुआ कि जागरण पन्ने काले-पीले करने में तो प्रतिस्पर्धियों से आगे था, मगर अमर उजाला और दैनिक भास्कर ने कंटेंट व प्रजेंटेशन में जागरण को जमकर धोया।

यही प्रक्रिया बजट के दिन 28 फरवरी को दोहराई गई। सेंट्रल डेस्क जो रेल और आम बजट का पूरा जिम्मा संभालती थी, बस ट्विटर कमेंट और टिप्पणियां बनाकर रह गई। उन्हें कुछ पता ही नहीं था कि क्या करना है और क्या हो रहा है। कंटेंट में गलती पर गलती देखने के बावजूद हाथ पर हाथ धरे बैठी रही, क्योंकि सख्त आदेश था कि सेंट्रल डेस्क को नेशनल ब्यूरो की खबरों या किसी अन्य महत्वपूर्ण कंटेंट में हाथ नहीं लगाना है। यानी, लगभग कोई भूमिका ही नहीं बची। नतीजा उसी रात को दिखने लगा, जालंधर, पटना, रांची और लखनऊ जैसी यूनिटों में बन रहे पन्ने देरी से संस्करणों को मिल पाए।

गलतियों की तो कमी थी ही नहीं, मगर खबरें भी पन्नों में रिपीट हुईं। मगर परवाह किसे थी, विष्णु के गेमप्लान को अंजाम देने में उनके सिपहसालार जुटे हुए थे। इसलिए पन्ने काले-पीले कर दिए गए। इस काम में मुस्तैदी से जुटे प्रतीक और बृज चौबे। मगर विष्णु त्रिपाठी के भक्तों से रहा नहीं गया और उनका खामोश गेमप्लान कमोबेश उजागर हो ही गया। चौबे जी को बाहर की यूनिटों के अपने साथियों से कहते सुना गया कि अगर बजट ठीक-ठाक निकल जाए तो सेंट्रल डेस्क पर भी अपना कब्जा हो जाएगा। वैसे विष्णु के निकटस्थ सूत्र भी बता रहे हैं कि बीबीसी या प्रतीक में से किसी को सेंट्रल डेस्क कम नेशनल एडीशन की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। वैसे, ज्यादा संभावना चौबे की है, जबकि उनकी जगह पर प्रतीत को प्रमोट किया जा सकता है। इस खेल में विष्णु त्रिपाठी कितना कामयाब हो पाता है, यह तो समय ही बताएगा। मगर इतना पक्का है कि किसी भी सूरत में नुकसान दैनिक जागरण का ही होगा, क्योंकि हमेशा से ही विष्णु त्रिपाठी का फंडा रहा है कि जागरण को चाहे जितना नुकसान पहुंचे, उसकी गोटियां बस लाल हो जाएं। लगे रहो भाई, तुम्हारी हरकत तुम्हें मुबारक।

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दैनिक जागरण में लोगों को परेशान कर विष्णु त्रिपाठी ने टीम को इतना कमजोर और असहाय बना दिया है कि अब गलतियों की भरमार हर पेज पर दिखने लगी है और अखबार से पाठकों का विश्वास उठने लगा है। शायद यही वजह है कि अखबार की प्रसार संख्या दिनोंदिन गिर रही है और उसी के साथ गिर रहा है विष्णु त्रिपाठी का आत्म विश्वास। उसे सिर्फ अपनी खुराफात की चिंता रहती है अखबार की नहीं। यकीन नहीं आता तो अखबार के बजट का पेज देख लीजिए, जिसमें लीड खबर ही रिपीट है।

जागरण के दो कर्मियों द्वारा भड़ास को मिली दो मेल पर आधारित.

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जागरण के पत्रकार ने नोएडा के उप श्रमायुक्त की श्रम सचिव और श्रमायुक्त से की लिखित शिकायत

मजीठिया मामले में अपने को पूरी तरह से घ‍िरा पाकर दैनिक जागरण प्रबंधन इतना बौखला गया है कि अब वह हमला कराने, घूसखोरी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने पर उतर आया है। इस बात के संकेत उस जांच रिपोर्ट से मिल रहे हैं, जिसके लिए जागरण के पत्रकार श्रीकांत सिंह ने उप श्रम आयुक्त को प्रार्थना पत्र दिया था। जांच के लिए पिछले 21 फरवरी 2015 को श्रम प्रवर्तन अध‍िकारी राधे श्याम सिंह भेजे गए थे। यह अफसर इतना घूसखोर निकला कि उसने पूरी जांच रिपोर्ट ही फर्जी तथ्यों के आधार पर बना दी। उसने जांच रिपोर्ट में बतौर गवाह जिन लोगों के नाम शामिल किए हैं, उनमें से कोई भी घटना के मौके पर मौजूद नहीं था।

इस बात के पुख्ता प्रमाण श्रीकांत सिंह के पास हैं, क्योंकि उन्होंने मौके की फोटोग्राफी भी अपने स्मार्ट फोन से कर ली थी। इन गवाहों में दो लोग तो घटना के दिन बरेली में थे और एक सहयोगी अवकाश पर थे। नोएडा के उप श्रम आयुक्त कार्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार से लोगों में रोष व्याप्त है क्योंकि इसी विभाग पर सताए जा रहे श्रमिकों को राहत पहुंचाने की जिम्मेवारी होती है। यह जानकारी सीबीआई को भी दे दी गई है। अब देखना यह है कि इन भ्रष्ट अफसरों पर कब और कहां से कार्रवाई होती है। श्रम आयुक्त से जो श‍िकायत की गई है, वह मूल रूप में नीचे दी जा रही है। श्रम प्रवर्तन अध‍िकारी की जांच रिपोर्ट आप खुद देखें, सच का पता अपने आप चल जाएगा। 

सेवा में,
श्रम आयुक्त महोदय
विषय : दैनिक जागरण प्रबंधन के इशारे पर मुझे नौकरी से निकाले जाने की साजिश की गलत जांच रिपोर्ट देने के बारे में
मान्यवर,

निवेदन है कि मैं पिछले 20 वर्षों से दैनिक जागरण की नोएडा यूनिट में कार्य कर रहा हूं और इस समय मुख्य उपसंपादक के पद पर कार्यरत हूं। मजीठिया वेतन आयोग के अनुसार वेतन देने से बचने और इस संदर्भ में माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का खुला उल्लंघन करने के लिए दैनिक जागरण प्रबंधन मुझे नौकरी से निकालने की साजिश रच रहा है। इस संदर्भ में मैंने जब नोएडा के उप श्रम आयुक्त कार्यालय में अर्जी दी तो उसकी गलत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। जब मैंने जांच रिपोर्ट पर एतराज जताया तो मुझे उप श्रम आयुक्त कार्यालय में अपमानित किया गया। इसलिए मजबूर होकर मुझे आपको आवेदन देना पड़ रहा है। आशा है मेरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की अनुकंपा करेंगे। मामला इस प्रकार है-

1-28 दिसंबर 2013 को मेरा तबादला जम्मू कर दिया गया, लेकिन मेरे तबादले की कोई सूचना अथवा डाटा जम्मू नहीं भेजा गया और उसके लिए मुझे अप्रैल 2014 तक परेशान किया गया। इस दौरान मुझे कोई वेतन नहीं दिया गया, जिससे मेरी माली हालत बहुत खराब हो गई। परिवार और सामान के साथ जम्मू जाने के लिए मुझे न तो कोई खर्च दिया गया और न ही कोई पदोन्नति अथवा वेतन बढ़ोतरी दी गई। ऐसी हालत में परिवार के साथ जम्मू स्थानांतरित होना संभव नहीं था। मुझे इस समय मात्र 25 हजार रुपये वेतन दिया जा रहा है, जिसमें जम्मू का 10 हजार रुपये खर्च और बढ़ गया। मुझे इस आश्वासन के साथ जम्मू भेजा गया कि मेरी माली हालत सुधारने के लिए क्षतिपूर्ति की जाएगी, जिस पर आज तक कोई विचार नहीं किया गया।

2-नोएडा कार्यालय के इशारे पर मुझे जम्मू कार्यालय में उठवा लेने की धमकी दी गई और मुझे अशुद्ध पानी पीने के लिए मजबूर किया गया। मेरी तबीयत खराब होने लगी तो मैंने पानी की शुद्धता पर सवाल उठाया। इस पर वहां के महाप्रबंधक ने मुझे धमकाया और पानी के मामले में माफीनामा लिखवा लिया। यह बात मैंने नोएडा कार्यालय को बताई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस बात की जांच जम्मू कार्यालय के कर्मचारियों और मेरी मेडिकल जांच रिपोर्ट से की जा सकती है।

3-इसी बीच 7 फरवरी 2015 को जागरण प्रबंधन की प्रताड़ना के विरोध में नोएडा कार्यालय के कर्मचारियों ने काम बंद हड़ताल कर दी। हड़ताल वापस लेने के लिए दैनिक जागरण प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच समझौता हुआ। समझौते के तहत प्रताडि़त करने के लिए हाल में किए गए तबादले वापस लिए जाने थे। उसी के तहत मुझे 10 फरवरी 2015 को बातचीत के लिए बुलाया गया था। जब मैं कार्यालय में प्रवेश करने लगा तो गार्डों से मुझ पर हमला करा दिया गया और मेरी जेब से 36 हजार रुपये निकाल लिए गए। मैंने मौके पर पुलिस पीसीआर वैन बुला ली, लेकिन गार्डों ने कार्यालय का गेट अंदर से बंद कर लिया और पुलिस को जांच में कोई सहयोग नहीं दिया गया।

4-मेरे आवेदन पर उप श्रम आयुक्त कार्यालय, नोएडा से 21 फरवरी 2015 को श्रम प्रवर्तन अफसर राधे श्याम सिंह को जांच के लिए भेजा गया, लेकिन उन्होंने ठीक से पूछताछ किए बगैर दैनिक जागरण प्रबंधन को क्लीन चिट दे दी और मेरी समस्या पर कोई विचार नहीं किया। मैंने दैनिक जागरण, नोएडा के महाप्रबंधक श्री नीतेंद्र श्रीवास्तव और कार्मिक प्रबंधक श्री रमेश कुमार कुमावत को मेल भेज कर अपने पक्ष से अवगत कराया, लेकिन मुझे न तो मेल का कोई जवाब दिया गया और न ही मुझे कार्यालय में प्रवेश करने दिया जा रहा है। इस प्रकार मुझे गैरहाजिर दिखा कर और वेतन से वंचित रखकर दैनिक जागरण प्रबंधन मुझे नौकरी से निकालने की साजिश रच रहा है।

भवदीय
श्रीकांत सिंह
मुख्य उपसंपादक
संपादकीय विभाग, दैनिक जागरण  
नोएडा

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मजीठिया संघर्ष : जागरण प्रबंधन ने तबादला किया तो श्रीकांत ने मैनेजमेंट को भेजा नोटिस

दैनिक जागरण के नोएडा कार्यालय से जम्मू स्थानांतरित मुख्य उपसंपादक श्रीकांत सिंह ने जागरण प्रबंधन को दिया नोटिस. कार्मिक प्रबंधक रमेश कुमार कुमावत ने श्रम प्रवर्तन अध‍िकारी राधे श्याम सिंह को दिए थे भ्रामक, गुमराह करने वाले और अपूर्ण बयान. जागरण प्रबंधन की दुर्भावनापूर्ण नीतियों के कारण श्रीकांत सिंह को ड्यूटी करने में पहुंचाई जा रही है बाधा. प्रबंधन की हठधर्मिता के विरोध में श्रीकांत सिंह लेंगे अदालत की शरण. पढ़ें, नोटिस में क्या लिखा गया है… 

From: shrikant@jmu.jagran.com

To: rkumawat@nda.jagran.com

CC: sanjaygupta@jagran.com,  neetendra@jagran.com,  vishnu@jagran.com,  abhimanyu@jmu.jagran.com,  personnel@jmu.jagran.com,  prashant@jmu.jagran.com,  dilip@jmu.jagran.com,  sudhirjha@jmu.jagran.com,  om@jmu.jagran.com,  yogita@jmu.jagran.com,  rakesh@jmu.jagran.com,  akhilesh@jmu.jagran.com

Subject: Notice

श्री रमेश कुमार कुमावत जी

कार्मिक प्रबंधक, दैनिक जागरण

डी-210,11, सेक्टर-63, नोएडा।

मान्यवर,

दैनिक जागरण के नोएडा कार्यालय में आपके निर्देश पर मुझ पर हमला कराए जाने के संदर्भ में मुझे श्रम प्रवर्तन अधि‍कारी श्री राधेश्याम सिंह की जांच रिपोर्ट मिली है। उसमें आपके द्वारा दिए गए बयान भ्रामक और अपूर्ण हैं। आपने यह बताया ही नहीं है कि दैनिक जागरण के नोएडा कार्यालय में मेरे प्रवेश पर रोक किसने और क्यों लगाई है। आपने अधि‍कारी को बताया है कि मेरा तबादला दो वर्ष पूर्व किया गया और प्रतिष्ठान द्वारा स्थानांतरण रोके जाने संबंधी निर्देश से मैं आच्छादित नहीं हूं। आपका यह बयान भी असत्य, भ्रामक और गुमराह करने वाला है। मुझे तबादले का पत्र 28 दिसंबर 2013 को दिया गया, लेकिन आपकी लापरवाही, ढुलमुल रवैया और स्थानांतरण संबंधी डाटा समय पर जम्मू कार्यालय न भेजे जाने के कारण मैं वर्ष 2014 में जम्मू कार्यालय में ज्वाइन कर सका। इस आधार पर अभी मेरे तबादले के एक वर्ष भी पूरे नहीं हुए हैं। दूसरी बात यह कि प्रधान संपादक आदरणीय संजय गुप्त और महाप्रबंधक श्री नीतेंद्र श्रीवास्तव के निर्देशों का संदर्भ लें तो उससे यह कतई पुष्ट नहीं होता है कि मैं तबादला वापसी संबंधी निर्देशों से आच्छादित नहीं हूं। इस प्रकार आपके बयान मेरे प्रति आपकी दुर्भावना पुष्ट करते हैं।

पुन: बताना चाहता हूं किे जम्मू कार्यालय में मुझे तरह-तरह से प्रताडि़त किया गया और धमकाया गया, जिसके बारे में प्रबंधन को समय-समय पर अवगत कराता रहा हूं, लेकिन मेरी प्रताड़ना को रोकने के लिए प्रबंधन ने कोई कदम नहीं उठया। प्रताड़ना के कारण ही जम्मू में मेरा स्वास्थ्य बुरी तरह से खराब हो गया, जिसकी मेडिकल जांच रिपोर्ट मैंने दैनिक जागरण के नोएडा और जम्मू कार्यालय के प्रबंधन को उपलब्ध करा दी है। प्रबंधन की दुर्भावनापूर्ण नीतियों के कारण इस समय मैं ड्यूटी नहीं कर पा रहा हूं। इसलिए यह मेल मिलने के 24 घंटों के भीतर मुझे मेरे सवालों का जवाब दें और नोएडा कार्यालय में मेरी ज्वाइनिंग संबंधी मेल जारी करें, नहीं तो मेरा एक भी दिन का वेतन काटा गया तो मैं संपूर्ण क्षतिपूर्ति हासिल करने के लिए अदालत की शरण लेने को मजबूर हो जाऊंगा।

भवदीय

श्रीकांत सिंह
मुख्य उपसंपादक
संपादकीय विभाग, दैनिक जागरण

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दैनिक जागरण नोएडा हड़ताल : देखिए और पढ़िए जीत के इस निशान को, सलाम करिए मीडियाकर्मियों की एकजुटता को

जो मालिक, जो प्रबंधन, जो प्रबंधक, जो संपादक आपको प्रताड़ित करता है, काम पर आने से रोकता है, तनख्वाह नहीं बढ़ाता है, बिना कारण ट्रांसफर करने से लेकर इस्तीफा लिखवा लेता है, वही मालिक प्रबंधन प्रबंधक संपादक जब आप एकजुट हो जाते हैं तो हारे हुए कुक्कुर की तरह पूंछ अपने पीछे घुसा लेता है और पराजित फौज की तरह कान पकड़कर गल्ती मानते हुए थूक कर चाटता है. जी हां. दैनिक जागरण नोएडा में पिछले दिनों हुई हड़ताल इसका प्रमाण है. कर्मचारियों की जबरदस्त एकजुटता, काम का बहिष्कार कर आफिस से बाहर निकल कर नारेबाजी करना और मैनेजरों के लालीपॉप को ठुकरा देना दैनिक जागरण के परम शोषक किस्म के मालिक संजय गुप्ता को मजबूर कर गया कि वह कर्मचारियों की हर मांग को मानें.

जब संजय गुप्ता ने लिखित तौर पर मांग मानने की बात कही, मजीठिया मांगने के कारण उत्पीड़ित करते हुए ट्रांसफर किए गए लोगों से भूल सुधार करते हुए ट्रांसफर रद करने की बात कही तो कर्मचारी शांत हुए व काम पर लौटे.

ये लेटर असल में मीडियाकर्मियों की एकजुट ताकत के भय से पैदा असर का प्रतीक है. आप अलग अलग रहोगे, अलग अलग अपना भविष्य तलाशोगे, अलग अलग अपना करियर बनाओगे तो आपको एक एक कर मालिकों मैनेजरों द्वारा मार दिया जाएगा, नष्ट कर दिया जाएगा. जब एकजुट रहोगे, एकजुट होकर अपनी ताकत के साथ अपने मुद्दों पर भिड़ोगे तो इन्हीं मैनेजरों-मालिकों को झुका पाओगे और अपनी शर्त के साथ नौकरी कर पाओगे.

ये मालिक और मैनेजर हम मीडियाकर्मियों को अपना गुलाम, अपना दास, अपना सेवक, अपना धंधेबाज, अपना बाडीगार्ड, अपना चेला, अपना चिंटू, अपना मेठ बनाकर रखना चाहते हैं. जबकि भारत की शासन व्यवस्था में मीडियाकर्मियों को कई अतिरिक्त अधिकारों से लैस किया गया है. ये मालिक उन अधिकारों को नहीं देना चाहते. ये नहीं चाहते कि हम आप समृद्ध हो सकें, तार्किक हो सकें, लोकतांत्रिक हो सकें. ये अपने पर निर्भर रखना चाहते हैं. इसी कारण कम से कम सेलरी देकर आपको मजबूर बनाए रखना चाहते हैं. भारत सरकार ने बहुत पहले से व्यवस्था की हुई है कि वेज बोर्डों के जरिए मीडियाकर्मियों की आजादी को बरकरार रखा जा सके. आप तभी आजाद रह पाएंगे जब आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हों. लेकिन सैकड़ों करोड़ मुनाफा कमाने वाले मीडिया मालिक किसी भी दशा में वेज बोर्ड न देना चाहते हैं और न देने की मंशा रखते हैं. सुप्रीम कोर्ट तक से इन्हें डर नहीं लगता. अब गेंद हमारे आपके पाले में है. आपको हमको संगठित होना पड़ेगा और गुंडई करने वाले मालिकों मैनेजरों को सबक सिखाना पड़ेगा. कहीं किसी यूनिट में अगर किसी भी मीडियाकर्मी को मजीठिया वेज बोर्ड मांगने के कारण परेशान किया जाता है तो सभी को मिलकर काम ठपकर गेट से बाहर आ जाना चाहिए ताकि मालिकों मैनेजरों को औकात पर लाया जा सके. दैनिक जागरण नोएडा ने रास्ता दिखा दिया है. 

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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लिखित आश्‍वासन के बाद काम पर लौटे हड़ताली जागरणकर्मी

(दैनिक जागरण, नोएडा के कर्मियों द्वारा हड़ताल की जानकारी मिलने पर जनपक्षधर पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव कैमरे समेत मौके पर पहुंचे और फोटोग्राफी में जुट गए)


अरसे से अपने पत्रकारों, कर्मचारियों को अपना दास समझने वाले दैनिक जागरण समूह के मालिकों पहली बार सामूहिक शक्ति के सामने झुकना पड़ा है. दैनिक जागरण के मीडिया कर्मचारी इस मीडिया हाउस के समूह संपादक व सीर्इओ संजय गुप्‍ता के लिखित आश्‍वासन के बाद ही हड़ताल समाप्‍त करने को राजी हुए और काम पर वापस लौटे. मैनेजर टाइप लोगों के लालीपाप थमाकर हड़ताल खत्म कराने के तमाम प्रयास फेल होने के बाद संजय गुप्‍ता को मजबूरी में लिखित आश्‍वासन देकर मामला सुलझाना पड़ा. बताया जा रहा है कि दिल्‍ली चुनाव के चलते गुप्‍ता एंड कंपनी ने तात्‍कालिक तौर पर यह रास्‍ता अपनाया है और किसी को परेशान न करने का लिखित वादा किया है.  

संजय गुप्‍ता ने लिखित तौर पर आश्‍वासन दिया है कि वे मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर दूसरे यूनिटों में ट्रांसफर किए गए लोगों को उनकी मंशा के अनुरूप यूनिटों में भेजा जाएगा. हड़ताल में शामिल किसी कर्मचारी को किसी भी कीमत पर परेशान नहीं किया जाएगा. साथ ही मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर जो कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट या अन्‍य कोर्ट गए हैं, उनके साथ कोई दुर्व्‍यवहार नहीं होगा, उन्‍हें निकाला नहीं जाएगा. संजय गुप्‍ता के इन तमाम आश्‍वासनों के बाद नोएडा समेत हिसार के कर्मचारी भी काम पर लौट गए हैं. 

बताया जा रहा है कि कर्मचारियों ने ऐसे मौके पर हड़ताल कर दिया था कि प्रबंधन को न तो उगलते बन रहा था और न निगलते. दिल्‍ली चुनाव होने के चलते मालिकों की सांस फूलने लगी थी. वे किसी भी कीमत पर हड़ताल खत्‍म कराकर अखबार प्रकाशित करवाने में जुटे हुए थे. संजय गुप्‍ता के आश्‍वासन तथा वरिष्‍ठों के हाथ-पांव जोड़ने के बाद कर्मचारी काम पर वापस लौटे हैं. हालांकि संभावना जताई जा रही है कि कर्मचारियों की एकता से डरा प्रबंधन अभी भले ही कुछ ना करे, लेकिन धीरे-धीरे वाले इन्‍हें प्रताडि़त कर सकता है. 

हड़ताल स्थल पर मोबाइल कैमरे के जरिए शूट किया गया वीडियो देखें: https://www.youtube.com/watch?v=EA32dSYnbgY

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दैनिक जागरण, नोएडा के हड़ताल की आंच हिसार तक पहुंची

दैनिक जागरण, नोएडा में कर्मचारी सड़कों पर उतर गए हैं. प्रबंधन की दमनकारी और शोषणकारी नीतियों के खिलाफ कर्मचारियों का सालों से दबा गुस्‍सा अब छलक कर बाहर आ गया है. मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर एक संपादकीय कर्मचारी का तबादला किए जाने के बाद सारे विभागों के कर्मचारी एकजुट होकर हड़ताल पर चले गए हैं. मौके पर प्रबंधन के लोग भी पहुंच गए हैं, लेकिन कर्मचारी कोई बात सुनने को तैयार नहीं हैं. प्रबंधन ने सुरक्षा के मद्देनजर पुलिस बल को बुला लिया है, लेकिन प्रबंधन के शह पर सही गलत करने वाली नोएडा पुलिस की हिम्‍मत भी कर्मचारियों से उलझने की नहीं हो रही है. 

कई सौ कर्मचारी सड़कों पर उतर गए हैं. ये लोग मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन नहीं दिए जाने और कर्मचारियों को प्रताडि़त करने के लिए तमाम तरह के प्रयास किए जाने से नाराज थे. प्रबंधन के कुछ एक खास लोगों को छोड़कर सभी कर्मचारी हड़ताल में शामिल हो गए हैं. नोएडा की हड़ताल का असर हरियाणा की हिसार यूनिट तक भी पहुंच गया है. हिसार यूनिट के जागरण कर्मचारी भी प्रबंधन के खिलाफ हड़ताल पर उतर गए हैं. माना जा रहा है कि सूचना मिलने के साथ जागरण समूह के अन्‍य यूनिटों के कर्मचारी भी प्रबंधन की हरामखोरी के खिलाफ सड़कों पर उतर जाएंगे. 

हड़ताल की सूचना मिलते ही दैनिक जागरण के मालिक और संपादक संजय गुप्ता के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी हैं. वे हड़ताल की जानकारी मिलने के बाद सारे कार्यक्रम स्थगित कर किसी तरह हड़ताल तुड़वाने की कोशिशों में जुट गए हैं और कर्मचारियों में फूट डलवाने के लिए अपने चेले टाइप के मैनेजर नीतेंद्र को लगा दिया है. इस मैनेजर की सारी कोशिशें बेकार हो रही हैं. कर्मचारी प्रबंधन की कोई बात सुनने को तैयार नहीं हैं. उनकी मांग है कि मजीठिया मांगने वालों का तबादला रद्द करने के साथ सभी को वेज बोर्ड के हिसाब से सैलरी देने की लिखित घो‍षणा की जाए. साथ ही कर्मचारियों को हटाने या अन्‍यत्र भेजे जाने की कोशिश ना की जाए. 

कर्मचारियों की नाराजगी इस बात को लेकर है कि उनकी मेहनत से प्रबंधन अरबों रूपए कमाता है और जब उनका हक देने की बारी आती है तो उन्‍हें तरह तरह से प्रताड़ित किया जाने लगता है. वैसे भी जागरण कर्मचारियों की सैलरी अन्‍य बड़े अखबारों की सैलरी से काफी कम है. संभावना जताई जा रही है कि कर्मचारी बिना अपनी मांगों के हड़ताल किसी भी कीमत पर खत्‍म नहीं करने वाले हैं. कई अन्य पत्रकार भी मौके पर मौजूद हैं. भड़ास के संपादक यशवंत सिंह समेत पत्रकार राजीव शर्मा, अभिषेक श्रीवास्तव, पंकज श्रीवास्तव, प्रशांत टंडन आदि हड़ताली जागरण कर्मियों के समर्थन में मौके पर डटे हुए हैं.

हड़ताल स्थल पर मोबाइल कैमरे के जरिए शूट किया गया वीडियो देखें: https://www.youtube.com/watch?v=EA32dSYnbgY

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दैनिक जागरण, नोएडा में हड़ताल, सैकड़ों मीडियाकर्मी काम बंद कर आफिस से बाहर निकले

मीडिया जगत की एक बहुत बड़ी खबर भड़ास के पास आई है. दैनिक जागरण नोएडा के करीब तीन सौ कर्मचारियों ने काम बंद कर हड़ताल शुरू कर दिया है और आफिस से बाहर आ गए हैं. ये लोग मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन नहीं दिए जाने और सेलरी को लेकर दैनिक जागरण के मालिकों की मनमानी का विरोध कर रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक हड़ताल की शुरुआत मशीन यानि प्रिंटिंग विभाग से जुड़े लोगों ने की और धीरे-धीरे इसमें सारे विभागों के लोग शामिल होते गए. सिर्फ संपादक विष्णु त्रिपाठी और इनके शिष्यों को छोड़कर बाकी सारे लोग हड़ताल के हिस्से बन गए हैं.

हड़ताल की सूचना मिलते ही दैनिक जागरण के मालिक और संपादक संजय गुप्ता के पांव तले से जमीन खिसक गई. वह हांफते दौड़ते नोएडा आफिस पहुंच रहे हैं, ऐसी अपुष्ट सूचना है. उधर, दैनिक जागरण नोएडा के मैनेजर लोगों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि वह गुस्साए हड़तालियों को टैकल कैसे करें. खबर है कि जागरण प्रबंधन ने हड़ताल को देखते हुए दिन के शिफ्ट के लोगों को काम करने के लिए आफिस बुलाया है.

प्रबंधन की कोशिश है कि किसी तरह अखबार छप जाए ताकि हड़ताल को फ्लॉप साबित किया जा सके. लेकिन हड़ताली कर्मियों ने अपने यहां के बाकी सभी कर्मियों को कह दिया है कि जो भी काम करेगा, वह अपने साथियों के स्वाभिमान से खिलवाड़ करेगा क्योंकि जागरण के मालिक हर तिमाही सैकड़ों करोड़ का मुनाफा कमाते हैं लेकिन जब नियम-कानून के हिसाब से कर्मियों को सेलरी देने की बारी आती है तो एक पैसा नहीं बढ़ाकर देते, उल्टे सादे कागज पर मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी मिलने और सेलरी से संतुष्ट होने की फर्जी बात लिखवा कर उस पर साइन करवा लेते हैं.

बताया जा रहा है कि हड़ताल की तात्कालिक वजह एक मीडियाकर्मी रतन भूषण का तबादला किया जाना है. तबादले के पीछे मकसद दंडात्मक कार्रवाई करना है. दैनिक जागरण नोएडा के सैकड़ों कर्मियों ने मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई है. जागरण प्रबंधन को जिन-जिन पर कोर्ट जाने का शक होता है, उन-उन को प्रताड़ित परेशान करता रहता है. इसी क्रम में कई लोगों का तबादला किया गया और कई लोगों को डराया-धमकाया गया. इसी के खिलाफ ये सारे मीडियाकर्मी गुस्से में काम बंद कर सड़क पर आ गए.

हड़ताल स्थल पर मोबाइल कैमरे के जरिए शूट किया गया वीडियो देखें: https://www.youtube.com/watch?v=EA32dSYnbgY

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संजय गुप्ता को रात भर नींद नहीं आई, जागरण कर्मियों में खुशी की लहर

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जागरण प्रबंधन से अपील, श्रवण गर्ग के बाद नई दुनिया के संपदाकीय पृष्ठ को भी मुक्ति दिलाये

Awadhesh Kumar : आजकल मैं यह देखकर आश्चर्य में पड़ रहा हूं कि आखिर नई दुनिया में जागरण के छपे लेख क्यों छप रहे हैं। जागरण इस समय देश का सबसे बड़ा अखबार है। उसका अपना राष्ट्रीय संस्करण भी है। जागरण प्रबंधन ने नई दुनिया को जबसे अपने हाथों में लिया उसका भी एक राष्ट्रीय संस्करण निकाला जो रणनीति की दृष्टि से अच्छा निर्णय था। पर उस अखबार को जागरण से अलग दिखना चाहिए।

जब तक श्रवण गर्ग रहे उन्होंने नई दुनिया के संपदाकीय पृष्ठ को ऐसा बना दिया जिसे आम पाठक पढ़ ही नहीं सकता था। उसका पहला लेख केवल अंग्रेजी लेखकों का छपने लगा। इससे उसके परंपरागत पाठक दूर हुए। लोगों ने नाक भौं सिकोड़ी, पर श्रवण गर्ग को कोई असर नहीं पड़ा। अंग्रेजी में ऐसे पत्रकारों के लेख भी छपते रहे जो पत्रकारिता की मुख्य धारा से भी दूर हो चुके हैं। ऐसे भी हैं जिनके पास विषयों की अद्यतन जानकारी नहीं होती। विचार तो होते भी नहीं। कोई क्यों पढ़े उसे।

स्वयं नई दुनिया के बहुसंख्य पत्रकार इसके विरुद्ध थे, पर श्रवण जी का आतंक ऐसा था कि कोई बोल नहीं सकता था। इसलिए वे जैसा चाहे होता रहा। उन्होंने साफ कर दिया कि अंग्रेजी लेखकों का लेख पहला लेख होगा और हिन्दी के कुछ लेखकों का दूसरा। उसमें भी उन्होंने कुछ नामों को वहां प्रतिबंधित कर दिया। इसका कोई कारण नहीं था। इन सबसे नई दुनिया की छवि को, उसके प्रसार को, विश्वसनीयता को भारी धक्का लगा है।

मुझे आश्चर्य होता था कि जागरण के मालिकान श्री संजय गुप्ता, श्री महेन्द्र मोहन गुप्ता आदि कैसे ऐसा होने दे रहे थे। लेकिन अब जब उन्होंने श्रवण गर्ग जी से इस्तीफा ले लिया तो उनके ऐसे गलत निर्णयों को भी बदलना आवश्यक है। जागरण प्रबंधन से मेरी कुछ अपील है। सबसे पहले तो यह आरक्षण तत्काल खत्म होनी चाहिए कि केवल अंग्रेजी के लेखक जो घास भूसा लिख दें उसे ही पहले लेख के रुप में छापा जाए। नई दुनिया की यह तासीर नहीं रही है। इसलिए वह एकीकृत मध्यप्रदेश का सबसे चहेता और विश्वसनीय अखबार था। इसी तरह जागरण के लेखों को छापने से भी परहेज करना चाहिए। पाठक इसे पसंद नहीं कर रहे हैं। नई दुनिया की स्वतंत्र पहचान कायम रहे।

जागरण प्रबंधन को अवश्य इसका इल्म होगा और उम्मीद है तुरत वे इस पर निर्णय करेंगे। जो लोग वहां अभी संपादकीय पृष्ठ पर काम कर रहे हैं उनके पास श्रवण जी के सामने अपनी सोच समझ को अपने तक सीमित रखने के अलावा कोई चारा नहीं था। ऐसा न करने पर उनका कोपभाजन बनते जैसे अनेक लोग बने। लेकिन उनके अंदर भी ऐसी समझ होगी कि उसका संपादकीय पृष्ठ कैसा होना चाहिए। मुझे उम्मीद है कि उन्हें यदि स्वतंत्रता दी जाए तो वे बेहतर संपादकीय पृष्ठ निकाल सकते हैं जो सर्वसाधारण पाठक के लिए भी पठनीय होगा। इसलिए जागरण प्रबंधन विवेकशील निर्णय ले और नई दुनिया को उसके मूल स्वरुप में लाने के लिए अंग्रेजी के जूठन और जागरण के लेखों से मुक्त करे।

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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बिना पूर्व सूचना दाम बढ़ाने पर हॉकर संघ ने जागरण के खिलाफ खोला मोर्चा

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गोंडा। श्रमजीवी समाचार पत्र सेवा संस्थान के अध्यक्ष सुधीर यादव ने स्थानीय गांधी पार्क में हुई बैठक के दौरान बताया कि दैनिक जागरण द्वारा शनिवार एवं रविवार को पेपर का रेट 5 रूपये किये जाने के कारण सभी वितरकों ने निर्णय लिया है कि पेपर का रेट प्रतिदिन 5 रूपये किया जाय यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो आने वाले शनिवार एवं रविवार को दैनिक जागरण का वितरण नहीं किया जायेगा। साथ ही यह भी निर्णय लिया गया है कि यदि सभी वितरकों को एक-एक चांदी का सिक्का एवं एक-एक साइकिल नहीं दी जायेगी तो दिपावली के दिन से सभी समाचार पत्रों का वितरण बन्द कर दिया जायेगा।

दैनिक जागरण समाचार पत्र द्वारा बिना किसी पूर्व सूचना के रेट बढ़ाने से सभी समाचार पत्र वितरकों के भीतर आक्रोष व्याप्त कर रहा है और क्योंकि दैनिक जागरण समाचार पत्र को जब भी रेट बढ़ाना होता था तो एक सप्ताह पहले सरकुलर आ जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं होता है जो नियम के खिलाफ है। इस दौरान रविन्द्र कुमार तिवारी, जसलाल मिश्रा, पिन्टू पाण्डेय, नरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव उर्फ झब्बू सहित कई वितरक उपस्थित रहे।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

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सर, सपा नेता हमारे खलियान पर कब्जा कर रहा है, हमारी ख़बर दैनिक जागरण में नहीं आती मगर उन लोगों की आ जाती है

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सर, मैं ग्राम सुल्तानपुर सेक्टर 128 नोएडा का मूल निवासी हूँ। हमारे अपने ग्राम की खलियान की जमीन का खसरा नं. 598 है। इस ज़मीन पर सपा का एक नेता उच्चाधिकारियों के साथ मिलकर अवैध कब्ज़ा कर रहा है। हमारी कहीं भी सुनवायी नहीं हो रही है। मीडिया वाले भी मेरी सुनवायी नहीं कर रहे हैं। अतः मैं आपको पत्र लिख सब कुछ बता रहा हूँ। हमारी खबर दैनिक जागरण पेपर में नहीं आती मगर उन लोगों की आ जाती है।

सर, कल हमारे गाँव में उपजिलाधिकारी महोदय आये और उन्होंने मौके का मुआयना किया तथा परिस्थिति को समझने कर प्रयत्न किया। परन्तु सपा के नेताओं के दबाव में उन्होंने गलत फैसला कर दिया है जिससे पूरा गाँव सहमत नहीं है। अगर मीडिया मेरी मदद कर सुनवाही करती है तो पूरा ग्राम सुल्तानपुर गवाही देने को तैयार है। 

सर, इस विषय में हमारी मदद कीजिए।

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बंटी त्यागी। buntytyagi4@gmail.com

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