वरिष्ठ पत्रकार बहादुर सिंह सरूपरिया का निधन

उदयपुर : प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार बहादुर सिंह सरूपरिया का गुरुवार को निधन हो गया। वे 78 वर्ष के थे। सन् 1958 में उन्होंने जयपुर से प्रकाशित ‘गणराज्य’ से पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा। इससे पूर्व उन्होंने भारतीय लोककला मण्डल, आयुर्वेद सेवाश्रम और गांधी सेवा सदन, राजसमन्द में भी विभिन्न पदों पर कार्य किया। 22 अगस्त, 1937 को एडवोकेट ख्यालीलाल सरूपरिया के घर जन्मे श्री सरूपरिया को स्कूली जीवन से ही साहित्य, कला एवं पत्रकारिता से गहरी रूचि थी। आगे चलकर उन्होंने पत्रकारिता को ही अपना कर्म-धर्म बनाया।

वे अणुव्रत मासिक कलकत्ता, राष्ट्रदूत, अमर राजस्थान, देशदूत जयपुर, जनगण जोधपुर, पन्द्रह अगस्त, कोलाहाल, प्रगति, उदयपुर से भी लम्बे तक जुडे रहे। नवभारत टाइम्स में संवाददाता के रूप में सेवाएं देने के बाद वे कपूर्रचंद कुलिश के आग्रह पर राजस्थान पत्रिका से जुडे और लम्बे कालखण्ड तक सेवाएं दी। पत्रकारिता जगत में पांच दशक तक सक्रिय रहे सरूपरिया की दृष्टि पत्रकारिता के आधारभूत मुद्दों पर बिल्कुल स्पष्ट थी। उनके कई समाचार और आलेख काफी चर्चित और परिणाममूलक रहे। उन्होंने कई बार खतरे भी मोल लिए लेकिन किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया। सरूपरिया का पत्रकारिता जगत को महत्वपूर्ण योगदान ‘साधना इन्फोर्मेशन सर्विस’ की स्थापना था। नियमित संवाद सेवा के साथ ही इस संस्थान ने विभिन्न विषयों पर कई महत्वपूर्ण प्रकाशन किए। वे अपने पीछे शोकाकुल पत्नी उगमदेवी, पुत्र भूमित्र, हर्ष मित्र, पुत्रियां साधना व कविता का भरापूरा परिवार छोड गए हैं

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लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार बजरंग शरण तिवारी नहीं रहे

लखनऊ। आपातकाल में अहम भूमिका निभाने वाले वयोवृद्ध पत्रकार बजरंग शरण तिवारी का बुधवार को लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नाकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में देर शाम इलाज के दौरान निधन हो गया। वह 92 वर्ष के थे। वह अपने पीछे अपने दो पुत्र एडवोकेट कृष्ण कुमार तिवारी व वरिष्ठ पत्रकार प्रदुम्न तिवारी समेत भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनका अंतिम संस्कार आज लखनऊ गोमती बैराज स्थित भैंसा कुंड श्मशान घाट पर किया गया।

बजरंग शरण तिवारी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के साथ आपातकाल में हुए संघर्षरत रहे। उन्होंने तरुण भारत, राष्ट्रधर्म जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के संस्थापकों में रहे, उन्होंने इन पत्रिकाओं में समय-समय पर संपादन व विशेष भूमिकाएं निभाई। शुरू से क्रांतिकारी स्वभाव के बजरंग शरण ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़कर देश के उत्थान में अहम योगदान दिया। उन्होंने राष्टभाषा हिंदी के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए।

आपातकाल के समय 26 जून 1975 को तरुण भारत समाचार पत्र में कार्यरत थे और वहीं से उन्हें जेल भेजा गया। पं. दीनदयाल उपाध्याय के साथ प्रसिद्ध पत्रिका राष्ट्रधर्म के संस्थापकों में से एक थे। इसी पत्रिका के संपादक के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी बाजपेयी ने कार्य किया। बचपन से ही क्रांतिकारी स्वभाव के स्व. बजरंग शरण कलाकुंज पत्रिका से भी लंबे समय तक जुड़े रहे। अपने युवावस्था से हिंदी भाषा के लिए कार्य करने वाले स्व. बजरंग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहे।

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पत्रकार कार समेत दलपतसागर में गिरा, मौत

जगदलपुर। कोंडागांव निवासी पत्रकार धीरेंद्र दत्ता(43) की कार कोतवाली थाना क्षेत्र अंतर्गत दलपतसागर में रविवार देर रात कार असंतुलित होकर गिर गई। इससे कार चला रहे श्री दत्ता की मौके पर ही मौत हो गई। श्री दत्ता कोंडागांव में एक दैनिक के प्रतिनिधि थे। धीरेंद्र का विवाह धरमपुरा निवासी प्रशांत विश्वास के सुपुत्री दीपमाला से हुई थी। हाल में ही पहले ही उनकी पत्नी का प्रसव हुआ था। वह एक निजी नर्सिंग होम में भर्ती हैं। श्री दत्ता बीते चार दिन से यहां आए हुए थे। रविवार रात वह शहर के किसी होटल भोजन करने गए थे।

रात करीब 11 बजे मोबाइल पर ससुराल वालों को घर आने की बात कही थी। देर रात वापस नहीं लौटने पर परिजनों ने बार-बार मोबाइल पर काल किया लेकिन रिसीव नहीं होने पर उन्हें चिंता हुई। आसपास प्रशांत विश्वास व उनके परिजनों ने दामाद की पतासाजी की।  सुबह दलपतसागर में एक कार पलटी हुई हालत में देखे जाने पर राहगीरों ने पुलिस को इत्तला दी। कोतवाली पुलिस ने मौके से क्रेन की सहायता से कार बाहर निकाला। भीतर एक शव पाया गया। इसकी शिनाख्ती धीरेंद्र दत्ता के रूप में की गई। पुलिस ने आशंका जताई है कि घटनास्थल के पास मो़ ड है जिसमें कार अनियंत्रित होकर सीधे तालाब में जा गिरी। कार के चारों पहिए ऊपर हो जाने से उसमें पानी भर गया और धीरेंद्र गाड़ी से बाहर निकलने में नाकाम रहे। प्रथम दृष्टया दम घुटने से उनकी मौत हो गई। मृतक का एक चार वर्ष का पुत्र भी है। घटना की खबर लगते ही शिशु जन्म की खुशिया मातम में बदल गई। पुलिस ने मर्ग कायम कर पीएम उपरांत शव परिजनों के सुपुर्द किया है।

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रेहाना ! हमें माफ़ करना…

एक लड़की जो जीना चाहती थी… अरमानों के पंखों के साथ आसमान में उड़ना चाहती थी, लेकिन हवस के भूखे एक वहशी दरिन्दे ने उसकी जान ले ली. एक चहकती-मुस्कराती लड़की अब क़ब्र में सो रही होगी… उसकी रूह कितनी बेचैन होगी… सोचकर ही रूह कांप जाती है… लगता है उस क़ब्र में रेहाना जब्बारी नहीं हम ख़ुद दफ़न हैं…

रेहाना ! हमें माफ़ करना… हम तुम्हारे लिए सिर्फ़ दुआ ही कर सकते हैं…

ग़ौरतलब है कि तमाम क़वायद के बावजूद दुनियाभर के संगठन 26 साल की ईरानी महिला रेहाना जब्बारी को नहीं बचा सके. रेहाना को 25 अक्टूबर को फांसी दे दी गई. रेहाना पर इल्ज़ाम था कि उसने 2007 में अपने साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश करने वाले ख़ुफ़िया एजेंट मुर्तजा अब्दोआली सरबंदी पर चाक़ू से वार किया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी. रेहाना को साल 2009 में क़त्ल का क़ुसूरवार पाया गया था. क़ानून मंत्री मुस्तफ़ा पी. मोहम्मदी ने अक्टूबर में इशारा किया था कि रेहाना की जान बच सकती है, लेकिन सरबंदी के परिजनों ने रेहाना की जान बचाने के लिए पैसे लेने से इंकार कर दिया. रेहाना की मां ने जज के सामने अपनी बेटी रेहाना की जगह ख़ुद को फांसी दे दिए जाने की गुहार लगाई थी.

पेशे से इंटीरियर डिज़ाइनर रेहाना को फांसी से बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुहिम चलाई गई, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी. मानवाधिकार संगठन ऐमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस आदेश को बिल्कुल ग़लत ठहराते हुए कहा कि हालांकि रेहाना ने सरबंदी को रेप की कोशिश करते वक़्त चाक़ू मारे जाने की बात मानी, लेकिन उसका क़त्ल कमरे में मौजूद एक अन्य व्यक्ति ने किया था.

रेहाना ने फांसी से पहले अपनी मां को एक ख़त लिखकर अपनी मौत के बाद अंगदान की ख़्वाहिश ज़ाहिर की. इस ख़त को रेहाना की मौत से दूसरे दिन 26 अक्टूबर को सार्वजनिक किया गया.  अपने ख़त में रेहाना लिखती है-

मेरी प्रिय मां,

आज मुझे पता चला कि मुझे किस्सास (ईरानी विधि व्यवस्था में प्रतिकार का क़ानून) का सामना करना पड़ेगा. मुझे यह जानकर बहुत बुरा लग रहा है कि आख़िर तुम क्यों नहीं अपने आपको यह समझा पा रही हो कि मैं अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी पन्ने तक पहुंच चुकी हूं. तुम जानती हो कि तुम्हारी उदासी मुझे कितना शर्मिंदा करती है. तुम क्यों नहीं मुझे तुम्हारे और अब्बा के हाथों को चूमने का एक मौक़ा देती हो?

मां, इस दुनिया ने मुझे 19 साल जीने का मौक़ा दिया. उस मनहूस रात को मेरा क़त्ल हो जाना चाहिए था. मेरी लाश शहर के किसी कोने में फेंक दी गई होती और फिर पुलिस तुम्हें मेरी लाश को पहचानने के लिए लाती और तुम्हें मालूम होता कि क़त्ल से पहले मेरा रेप भी हुआ था. मेरा क़ातिल कभी भी पकड़ में नहीं आता, क्योंकि हमारे पास उसके जैसी ना ही दौलत है, और ना ही ताक़त. उसके बाद तुम कुछ साल इसी तकलीफ़ और शर्मिंदगी में गुज़ार लेतीं और फिर इसी तकलीफ़ में तुम मर भी जातीं, लेकिन किसी अज़ाब की वजह से ऐसा नहीं हुआ. मेरी लाश तब फेंकी नहीं गई, लेकिन इविन जेल के सिंगल वॉर्ड स्थित क़ब्र और अब क़ब्रनुमा शहरे-जेल में यही हो रहा है. इसे ही मेरी क़िस्मत समझो और इसका इल्ज़ाम किसी पर मत मढ़ो. तुम बहुत अच्छी तरह जानती हो कि मौत ज़िन्दगी का अंत नहीं होती.

तुमने ही कहा था कि आदमी को मरते दम तक अपने मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए. मां, जब मुझे एक क़ातिल के तौर पर अदालत में पेश किया गया, तब भी मैंने एक आंसू नहीं बहाया. मैंने अपनी ज़िन्दगी की भीख नहीं मांगी. मैं चिल्लाना चाहती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया, क्योंकि मुझे क़ानून पर पूरा भरोसा था.

मां, तुम जानती हो कि मैंने कभी एक मच्छर भी नहीं मारा. मैं कॉकरोच को मारने की जगह उसकी मूंछ पकड़कर उसे बाहर फेंक आया करती थी. लेकिन अब मुझे सोच-समझकर क़त्ल किए जाने का मुजरिम बताया जा रहा है. वे लोग कितने पुरउम्मीद हैं, जिन्होंने जजों से इंसाफ़ की उम्मीद की थी. तुम जो सुन रही हो कृपया उसके लिए मत रोओ. पहले ही दिन से मुझे पुलिस ऑफ़िस में एक बुज़ुर्ग अविवाहित एजेंट मेरे स्टाइलिश नाख़ून के लिए मारते-पीटते हैं. मुझे पता है कि अभी ख़ूबसूरती की कद्र नहीं है. चेहरे की ख़ूबसूरती, विचारों और आरज़ुओं की ख़ूबसूरती, ख़ूबसूरत लिखावट, आंखों और नज़रिये की ख़ूबसूरती और यहां तक कि मीठी आवाज़ की ख़ूबसूरती.

मेरी प्रिय मां, मेरी विचारधारा बदल गई है, लेकिन तुम इसकी ज़िम्मेदार नहीं हो. मेरे अल्फ़ाज़ का अंत नहीं और मैंने किसी को सबकुछ लिखकर दे दिया है, ताकि अगर तुम्हारी जानकारी के बिना और तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी में मुझे फांसी दे दी जाए, तो यह तुम्हें दे दिया जाए. मैंने अपनी विरासत के तौर पर तुम्हारे लिए कई हस्तलिखित दस्तावेज़ छोड़ रखे हैं.

मैं अपनी मौत से पहले तुमसे कुछ कहना चाहती हूं. मां, मैं मिट्टी के अंदर सड़ना नहीं चाहती. मैं अपनी आंखों और जवान दिल को मिट्टी बनने देना नहीं चाहती, इसलिए प्रार्थना करती हूं कि फांसी के बाद जल्द से जल्द मेरा दिल, मेरी किडनी, मेरी आंखें, हड्डियां और वह सबकुछ जिसका ट्रांसप्लांट हो सकता है, उसे मेरे जिस्म से निकाल लिया जाए और इन्हें ज़रूरतमंद व्यक्ति को तोहफ़े के तौर पर दे दिया जाए. मैं नहीं चाहती कि जिसे मेरे अंग दिए जाएं, उसे मेरा नाम बताया जाए और वह मेरे लिए प्रार्थना करे.

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वरिष्ठ पत्रकार राधेश्याम दुबे का निधन

पुराने कम्युनिस्ट, वरिष्ठ लेखक, पत्रकार, रेडियो प्रस्तोता, अनुवादक और विचारक राधेश्याम दुबे (91वर्ष) का देहान्त हो गया। दुबे जी की बेटी भारती मास्को से भारत आ गई हैं। मूल रूप से इटावा (उ.प्र.) के निवासी दुबेजी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम०ए० और एल०एल०बी० की पढाई की और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े।

पिछली सदी के पांचवे दशक के मध्य में वह बम्बई में पार्टी के मुख्यालय पहुँच कर हिंदी साप्ताहिक के सम्पादकीय विभाग में काम करने लगे। 1955 में उन्होंने मास्को रेडियो में हिन्दी कार्यक्रमों के प्रस्तोता की ज़िम्मेदारी संभाली और लगभग तीन दशक तक यहाँ कार्य करने के बाद भारत आ गए। दुबे जी ने अनेक रूसी रचनाओं का हिन्दी में अनुवाद किया। लोक प्रकाशन गृह,दिल्ली ने उनके लेखों के दो संग्रह प्रकाशित किये हैं-“कहानी एक मजमून की” और “बदलती तस्वीरें”।

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रूसी मोदी बड़े फख्र से कहते थे- मैं फोरमैन से चेयरमैन बना हूं…

Sumant Bhattacharya : अशोक तोमर भाई का एसएमएस आया, खबर बुरी थी, लिखा था सुमंत, रूसी मोदी नहीं रहे। आज की पीढ़ी रूसी मोदी से वाकिफ ना होगी..टाटा के चेयरमैन रहे रूसी जमशेद टाटा के बाद इंडियन एअरलाइंस और एअर इंडिया के ज्वॉइंट चेअरमैन भी रहे हैं। रूसी से मेरी पहली औपचारिक मुलाकात तब हुई, जब वो टाटा के चेयरमैन थे और कोलकाता के टाटा बिल्डिंग में रूसी ने चिलिका में झींगा मछली प्रोजेक्ट पर बुलाई थी….। रूसी दुबारा मिले जब रतन टाटा और जेजे ईरानी की वजह से रूसी को टाटा छोड़ना पड़ा और रूसी खुल्ला कहते थे, मुझे टाटा से किक आउट किया गया।

रूसी मोदीरूसी मोदी

कोलकाता में पार्क स्ट्रीट की जीवन ज्योति बिल्डिंग में रूसी का नया ऑफिस खुला-मोबार इंडिया, जो शिप ब्रेकिंग के बिजनेस में उतरा। रूसी से मेरी यहीं दूसरी मुलाकात हुई..जनसत्ता में नौकरी करते थे। कोलकाता यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर रही भारती राय की बेटे जिष्णु प्रताप राय ने रूसी से मिलवाया..पांच फुटे रूसी से जिष्णु बोला- सर यह सुमंत है…बंगभाषी है पर हिंदी अखबार में है। रूसी ने हाथ मिलाया और आगे बढ़ गए…चार या पांच कदम आगे बढ़ने के बाद लौटे और मेरे मुंह पर सवाल दागा, तुमको गुजराती आएंगा। अकबका कर दागे सवाल पर मैंने कहा..नहीं, बिल्कुल नहीं। चौहत्तर साल के रूसी के चेहरे पर मुस्कराहट आई और बोले..हमको आएंगा। और आगे बढ़़ गए।

बाद में सोचा, रूसी ने ऐसा क्यों किया..फिर समझ आया, दरअसल चौहत्तर

साल का यह बुजुर्ग 25-26 साल के एक युवा से प्रतिस्पर्धा कर रहा था और कहीं अपने को कमतर मानने को राजी नहीं था..दर के दर ही निपटाने में यकीन था उस शख्स को।

रूसी के बड़े भाई पीलू मोदी नामचीन सांसद और छोटे भाई काली मोदी वो इंसान है, जिसने डायनर्स क्लब की शुरुआत की थी। संयुक्त प्रांत के गवर्नर रहे सर होमी मोदी के दूसरे बेटे रूसी की जिंदगी का फलसफा अलहदा ही था… ऑक्सफोर्ड से हिस्ट्री में बीए आनर्स की डिग्रीधारी रूसी को बीबीसी ने दुनिया के छह शीर्ष इंडस्ट्रियल मैनेजर के खिताब से नवाज था। आइंस्टीन के साथ पियानो बजा चुके इस शख्स ने जब नौकरी की सोची तो बाप ने पारसी परंपरा के तहत जमशेदजी के पास भेज दिया..जमशेद ने होमी से पूछा कि भाई तेरे बेटे को कौन सी नौकरी दूं…होमी ने पूछा कि सबसे निचली नौकरी कौन सी है, जमशेद बोले फोरमैन की। रूसी बड़े फख्र से कहते थे, मैं फोरमैन से चेयरमैन बना हूं। रूसी से एक रोज मैंने पूछा, आपके मैने मैनेजमेंट के बुनियादी उसूल क्या हैं तो वाकई मुझे सीख मिली..। रूसी बोले..मैं बायबल के छह स्टैंजा पर अपने मैनेजमेंट को चलाता हूं। सारे तो याद नहीं, पर कुछेक साझा कर सकता हूं। रूसी ने कहा, इंसान को कभी मशीन मत समझो, मशीन की तरह मत हांको, वो भी इंसान है, उसके भीतर भी वहीं अहसास और जज्बात है जो आपके भीतर है, दूसरे, कभी सिपाही को मत मारो, जरनल को जिबह कर दो, क्योंकि सिपाही तो जरनल बन सकता है पर एक जरनल कभी सिपाही नहीं बन सकता है,

अशोक भाई की वजह से रूसी का बड़ा साथ मिला…खाना बनाने और खिलाने के गजब के शौकीन..सोलह अंडों का आमलेट तो कई बार मैं खुद खाते देखा। बहुत कम लोग जानते हैं कि रूसी ने विवाह भी किया था, और उनकी पत्नी की कब्र जमशेदपुर में हैं, रूसी जब भी जमशेदपुर जाते तो जरूरी अपनी पत्नी (नाम शायद सोनिया था) की कब्र पहुंचते और काफी देर तक सोनिया से बातें करते..हमें लगता था कि यह संवाद एकतरफा है..पर रूसी को यकीन था किय यह संवाद दोतरफा चल रहा है…। रूसी पर आरके लक्ष्मण ने जितना काम किया, उसका गवाह मैं भी रहा हूं, भारत में प्रगतिशील आर्टिस्ट ग्रुप (पैग) के नाम पर चला कला आंदोलन शायद वो शोहरत या मुकाम हासिल ना कर पाता, यदि रूसी पीछे ना होते..और संभवतः फिदा हुसैन, रजा, हैदर वगैरहा नामचीन आर्टिस्टों का संघर्ष कितना ही लंबा हो जाता…यही रूसी उस वक्त फिदा पर बेहद नाराज हो गए, जब फिदा ने विजर्सन नाम से अपनी पेंटिंग की सीरिज को मदर टेरेसा की संस्था को सौंपने से मना कर दिया, दर पर मैं भी मौजूद था, और मुझे नहीं लगता है कि रूसी ने फिर कभी फिदा से बात भी की होगी…

फिर 1996 में कोलकाता से दिल्ली आ गया..कुछ सालों में मोबार भी बंद हो गया, यदाकदा अशोक भाई से रूसी के बारे में बातचीत होती रही… पता चलता था कि रूसी अपनी याददाश्त खोते जा रहे हैं, फिर सुना कि उनका बंगला एनडीटीवी के प्रणव राय ने खरीद लिया, पर रूसी उसी में रहते रहे..आज रूसी नहीं, और उस बंगले में दो कब्र में दफन दो रूहें जरूर रूसी की मौत पर रुदन कर रही होंगी, बिस्मार्क और गैरी बाल्डी की, जर्मनी और इटली को संयुक्त करने वाले इन दो नायकों के नाम रूसी ने अपने प्यारे कुत्तों को दिए थे……. कारोबार में मानवीय इस चेहरे को मेरा विनम्र नमन….

वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्य के फेसबुक वॉल से.

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श्रद्धांजलि : न्यायमूर्ति मेरी प्यारी बहन शिप्रा… मौत के मामले में भी अव्वल रहकर मेरे साथ अन्याय कर गई

शिप्रा ने अचानक मुझे फोन किया- मैंने शंकराचार्य से दीक्षा ले ली है और उन्होंने कहा है तुम्हें इसी जन्म में मोक्ष मिल जाएगा. तुम्हारा अगला जन्म नहीं होगा. मैं सुनती रही और झिड़ककर कहा कि कि ऐसी ऊटपटांग बाते मुझे मत सुनाओ. पर  मन माना नहीं. दिन भर रोती रही. पता नहीं कैसी बातें करती है शिप्रा. मेरे पति  वरिष्ठ पत्रकार अनंत मित्तल ने समझाया कि तुमने उसका अगला जनम देखा है क्या, जो दुखी हुए जा रही हो. पर मन तो मन है. शिप्रा उन दिनों नरसिंहपुर की डीजे यानी डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन्स जज थी. मेरी सगी बहन. मुझसे सवा साल छोटी, लिहाजा जमकर लड़ते अ‍ैर दोस्ती ऐसी कि कभी बड़ी-छोटी का लिहाज नहीं, परदा नहीं.

दिन भर नोंक-झोंक चलती रहती. और हमेशा मैं ही शुरुआत करती और उसे दबाती. बड़ी थी लिहाजा मेरी दबंगई चलती थी. घर की हर अच्छी चीज मेरी थी और लड़ाई में मेरी जीत तय थी. शिप्रा की लड़ाई भी बड़ी मीठी हुआ करती थी. सचमुच वह बहुत मीठा बोलती थी. बचपन में उससे पापा पूछते कि तुम इतना मीठा कैसे बोलती हो, बड़े ही मधुर अंदाज में कहती ‘हम बहुत शक्कर (चीनी) खाते हैं ना पापा इसलिए.’ वह एकदम मुझसे उलट थी. बेहद कोमल और मधुर. ‘शर्मीली’ फिल्म की दो बहनों में से भली बहन की तरह.

हम साथ स्कूल जाते, साथ घूमते और सोते. साथ-साथ कम से कम पांच सौ फिल्मी गाने गा देते. उसकी आवाज में ही नहीं, पूरे व्यक्तित्व में गजब का सम्मोहन था और मुस्कान ऐसी मोहक कि हमारे डाक्टर मित्र ने उसका नाम ही ‘रहस्यमयी’ रख दिया था. शिप्रा रही नहीं इसलिए नहीं वह जीते जी भी मेरे लिए गुणों की खान थी और शायद यही वजह है कि कई बार उससे मैं बहुत ईर्ष्या करती थी. जैसे वह कभी दूसरे नंबर पर नहीं आती थी. हमेशा अव्वल. मुझे अच्छे से याद है कि वह नन्ही सी थी तो फाइनल एक्जाम के नतीजे से पहले सिल बट्टे पर घिसकर चाकू तेज किया करती थी. पापा ने पकड़ लिया तो बड़े ही सौम्य अंदाज में बोली- अगर फस्ट नहीं आई तो पेट में घोंप लूंगी और भगवान ने उसकी हर चाहत पूरी की.

अपनी मृत्यु तक वो मध्यप्रदेश उच्च न्यायिक सेवा की सीनियर मोस्ट जज थी और जल्द ही हाई कोर्ट की जज बनती. जाने से चंद घंटे पहले रात सवा बारह बजे उससे लंबी बात होती रही. मेरा मन दरअसल सुबह से उसके लिए फड़फड़ा रहा था और मैंने ही डरते-डरते मैसेज छोड़ा था. वजह यही कि वह बहुत व्यस्त रहती थी. शनिवार को अलसुबह सवा पांच बजे उसकी छोटी बेटी देवीना का फोन था कि मम्मी बहुत सीरियस हैं मौसी. असल में उसका देहांत हो गया था. कैसे भरोसा करती मैं. हम रात सवा बारह तक गपिया रहे थे. दुनिया जहान की बातें की थी उसने.  कहा  था कि शपथ ग्रहण के लिए तैयार रहना. उस दिन कितना मन चाहा था कि उसे बचपन के नाम से टप्पू कहकर पुकारुं पर पुकार नहीं पाई.

सवा तीन बजे तो वह स्टेशन से अपनी बेटी देवीना को लेकर लौटी थी. उसने चौबीस घंटे पहले पापा को भी फोनकर कहा था  कि पापा मैं जब शपथ लूं तो आप सामने हों. स्वस्थ रहना उस समय तक. कितना अच्छा लगेगा जब पिता के सामने मैं हाई कोर्ट जज बनूंगी. हम सब उसके इलेवेशन के गौरवमयी पल का इंतजार कर रहे थे. हम सबका अरमान था उसे काला चोगा पहने हाईकोर्ट जज का शपथ ग्रहण करते देखना. वह हमारे परिवार, समाज और महिला जाति का ही नहीं, पूरी न्यायपालिका का गौरव होती. मध्यप्रदेश न्यायपालिका के कई जजों ने कहा कि हमें उसके इलेवेशन का इंतजार था. पिछले पंद्रह बरसों में पहली बार कोई ऐसा शख्स हाईकोर्ट जा रहा था जो ट्रू (वास्तव में ) जज था. पर शिप्रा ने सबकी मुरादों पर पानी फेर दिया इस तरह असमय दुनिया छोड़कर.

शिप्रा मौत के मंह से लौटी थी. यह किस्सा जगदलपुर में बहुत लोग जानते हैं. 18 माह की उम्र में वह चली गई थी और बड़े चमत्कारिक तरीके से लौट आई थी. तब डाक्टरों के लिए यह अजूबी घटना थी. शिप्रा बड़ी सौम्य थी. जैसे गुड़िया के वेश में कोई बुढिया. गुड़िया सी संदर और बुढिया सी समझदार. उसके पास हर समस्या का हल बचपन से ही होता था. वह किसी को भी टालती नहीं थी, चुटकियों में उसका हल बता देती. मुझे हैरत होती थी कि वो पढती कब है. क्योकि वो बहुत होशियार थी, इतनी कि टीचर भी उसकी होशियारी का लोहा मानते थे. वह तीसरी-चौथी में तो सातवीं तक के सवाल हल कर लेती थी. मुझसे हमेशा आगे रहती थी लिहाजा मैं उसे पढने भी नहीं देती थी. कभी उसका लैंप आफ कर देती कभी चिल्ला-चिल्ला के गाने लगती और मकसद यही कि इसे लोगों की नजर में चढने से कैसे रोका जाए.

वो जरा भी फैशन नहीं करती. इतनी सुंदर जो थी. कोर्ट में हमेशा सफेद साड़ी पहनती. शायद बीस बरस की उम्र में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डीपी वाधवा की जूनियर रहने के दौरान उसने साड़ी पहनना शुरू किया था और मेरी जानकारी में कभी कोई दूसरी पोशाक नहीं पहनी. पैसा पावर क्या नहीं था उसके पास. जो चाहे कर सकती थी. बीएससी फाइनल में उसे जब मिस भोपाल चुना गया था तो मैं तो जल मरी थी. भला ये मुझसे अच्छी कैसे. उसकी लंबाई मुझसे कम थी और मैंने अपनी मां को उस दिन यह पूछ-पूछ कर हलकान कर डाला था कि ठिगनी लड़की कैसे भोपाल सुंदरी बन सकती है. हालांकि उस प्रतियोगिता से मेरा कुछ लेना-देना नहीं था.. गजब का कंपटीशन भी था और प्रेम भी था हम दोनों मे.

जब वह सिविल जज बनी तो मुझे बड़ा गर्व  हुआ था अपनी बहन पर.. उसने जैसे पापा के सपनों को अंजाम देने का बीड़ा उठा लिया था. हमने काम भी लगभग साथ शुरू किया था. उसने मार्च 1983 में न्यायिक सेवा ज्वाइन की थी और मुझे मई में दिल्ली प्रेस में नौकरी मिल गई थी. उस बार भी अव्वल वही थी. हम दोनों ने साथ-साथ लॉ किया था. उसमें भी वह फर्स्ट डिवीजन आई थी. हम दोनों  प्रोफेशन से परिवार तक बहुत सी बातें शेयर किया करते थे. दोनों जमकर निंदा रस का भी सुख लेते थे. मुंह बनाकर लोगों की नकल करते. तरह-तरह की ड्रेस डिजाइन में दिमाग खपाते.

पूरे दिन पुस्तक मेले में साथ-साथ घूमते. वह मुझे बहुत भेली कहती थी पर वह बहुत भली थी.  आलराउंडर थी. मेरे प्रोफशन में भी उसका गहरा दखल था. हिंदी और अंग्रेजी की बढिया लेखक थी. बढिया नाटककार थी. कॉलेज के दिनों में वह ड्रामे किया करती थी. आप उसे जब कहें वह छलछलाते आंसू निकाल लेती और जब कहें ठठाकर  हंस सकती थी. किसी ने बताया कि वह न्यायिक सेवा में भी ड्रामे के लिए ईनाम पा चुकी थी. मुझसे एकदम उलट थी वो. मैं बेहद नटखट तो वो अनुशासित रानी बिटिया. मैं महा नास्तिक टाइप तो वह बेहद  स्पिरिचुअल. मैं  फैशन की महा शौकीन तो एक उम्र के बाद वह साड़ी में सीमित रहने वाली अफसर.. मेरी छुट्टियों के माने थे देश विदेश और शॅपिंग वगैरह तो उसकी छुटट्यिां सावंरिया जी, सिद्धि विनायक, महाकाल में कटती.

इसी 15 अक्टूबर को अपने देहांत से तीन दिन पहले उसने अपनी बड़ी बेटी सौम्या के बीसवें जन्मदिन पर रूद्राभिषेक कराया था, यह कहकर कि अब हर सदस्य के जन्मदिन पर कराएंगे. मैं आर्थिक तौर पर उतनी समर्थ न होते हुए भी फिजूल खर्च हूं तो वह बेहद मितव्ययी थी.. वह बहुत मितभाषी और कम बोलने वाली तो मैं बेहद हड़बड़िया बड़बड़िया. शायद हमारे प्रोफशन का तकाजा भी था. वह फितरतन जज थी और मैं पत्रकार. अपनी शादी के लिए भी उसने बड़ा वक्त लगाया. पहले वह शादी नहीं करना चाहती और मन बनाया तो न जाने कितने युवक खारिज किए. उसके आदर्श पति की कसौटी पर खरा उतरना किसी  के लिए आसान नहीं था. वह खास रूप और गुण तलाशती थी. हम मजाक करते मुस्कान, आंखों की लंबाई- चौड़ाई वगैरह की पैमाइश बता दो तो वैसे ही विज्ञापन दे देंगे.

बचपन से वह कृष्ण की अनन्य भक्त थी. मेरी मौसी अर्चना से कृष्ण की तस्वीर को लेकर अकसर उसका मनमुटाव हो जाता था. हमारा घर तो पूरी नौटंकी था. सुबह से ही शिप्रा कृष्ण बनकर तैयार रहती थी. पीतांबरी पहने मुकुट लगाए और हांथ में पीतल की बासुरी थामे कृष्ण बने घर में किसी कोने में बैठे रहना शिप्रा का प्रिय शगल था. मेरी एक और बहन शेफाली ढेर चूडियां पहने घर में राधा बनी गीत रचती फिरती रहती थी. बहुत हिम्मती थी शिप्रा.. उसे कभी किसी भी प्रकार का डर नहीं लगता था. वह अपनी सेहत का बड़ा खयाल रखती.

मुझे लगता है कि उसने कोई बीस पचीस साल से बदपरहेजी नहीं की होगी. वो रोजाना छह किलोमीटर चलती थी. उसने अपने बंगले में वॉकिंग ट्रेल बनवा रखी थी. दिन में दो बार देर तक शंख बजाती थी. ऐसे संपूर्ण इंसान को उसका भगवान असमय क्यों ले गया. माना उसे भी अच्छे दिन के वास्ते अच्छी शिप्रा चाहिए थी पर उसने ये भी नहीं सोचा कि अब मै किससे लडूंगी… किससे बतियाउंगी… किसे लाड करूंगी. हम पांच बरस से मिले नहीं थे पर हर दूसरे-तीसरे दिन बात होती थी. कभी लगा ही नहीं कि वह मुझसे दूर है. दूर तो अब भी नहीं है वह. उसकी यादें मेरी दौलत है. इरा शिप्रा एक ही नाम हैं. आपस में जुडे और समाहित. पर अफसोस इस बात का है कि शिप्रा ने फिर बाजी मार ली.  मौत के मामले में अव्वल रहकर मुझसे अन्याय कर गई. न्यायमूर्ति मेरी प्यारी बहन शिप्रा.

इरा झाइरा झा

लेखिका इरा झा दिल्ली में नवभारत छत्तीसगढ की ब्यूरो चीफ हैं. उनकी बहन शिप्रा शर्मा नीमच मध्यप्रदेश में डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन्स जज थीं. शिप्रा का 18 अक्तूबर को देहांत हो गया है. इरा झा से संपर्क उनके मोबाइल नंबर 09818566808 के जरिए किया जा सकता है.

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आकाशवाणी, लखनऊ के महिला एनाउंसर का शव पंखे से लटकता मिला

लखनऊ से एक दुखद खबर आ रही है. आकाशवाणी में एनाउंसर के पद पर कार्यरत खुर्शीद अब्बास ने सुसाइड कर लिया है. वे इंदिरानगर के सेक्टर डी क्षेत्र में रहती थीं. उनका शव कल उनके कमरे से लटकता मिला. खुर्शीद कल सुबह अपनी बेटी हिबा को गोमतीनगर स्थित उसके स्कूल छोड़ने गई थीं. वापस आने के बाद उनका शव फंदे पर लटकता मिला.  खुर्शीद के भाई ने हत्या की आशंका जताई है. उधर, पुलिस का कहना है कि महिला मानसिक रूप से परेशान थीं, नींद की गोलियां खाया करती थीं, संभव है उन्होंने सुसाइड किया होगा. बाकी कार्रवाई पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद होगी. 

ज्ञात हो कि खुर्शीद के पति आबिद अब्बास का दो साल पहले इंतकाल हो चुका है.  खुर्शीद के सगे भाई का आरोप है कि कुछ रोज पहले खुर्शीद के ससुर और ननद ने उनकी बहन का गला दबाकर हत्या करने का प्रयास किया था. संभव है, इन्हीं लोगों ने खुर्शीद की हत्या कर शव फांसी पर लटका दिया होगा. खुर्शीद की बेटी का कहना है कि उनकी मां डिप्रेशन में रहती थीं, इसके कारण उन्होंने जान दे दी.

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यूट्यूब पर ‘संतोष आनंद’ टाइप किया तो वही एपिसोड फिर से आँखों को नम कर गया

याद है मुझे जब पहली बार ‘शोर’ फिल्म का गाना ‘एक प्यार का नगमा’ सुना था तो बरबस ही आँखों में आँसू आ गए थे। उसके बाद यह मेरे पसंदीदा गानों की सूची में आज भी मेरे मोबाइल में है। बुधवार की सुबह मथुरा से अपने न्यूज चैनल के माध्यम से पता चला कि कोसीकलां में एक दम्पति ने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली। कई अन्य ख़बरों की तरह ये भी आई गयी हो गयी। लेकिन जब थोड़ी देर बाद तस्वीर सामने आयी, तो उस ४ साल की बच्ची को देखकर बड़ा दुःख हुआ जो बच गयी थी, कितनी प्यारी है… बस यही शब्द निकले मेरे जेहन से, और कुछ देर बाद सामान्य हो गया।

एक झटका तब लगा जब मथुरा में जिस दम्पति ने आत्महत्या की उसके बारे में पता चला कि वो मशहूर गीतकार संतोष आनंद के जीवन की वो लड़ी थी जो अब जीवन के इस आखिर पड़ाव में आकर टूट गयीं। एक प्यार का नगमा है… जिंदगी की ना टूटे लड़ी… जैसे कई मशहूर गीत जिन्होंने लिखे, और ये जो गीत आज भी दिलों में छाए हुए हैं, वो तनहा हो गए, बुरी तरह तनहा। फिल्म ‘प्रेमरोग’ का गीत की वो पंक्तियाँ ‘कल भी सूरज निकलेगा कल भी पंछी गाएंगे सब तुझको दिखाई देंगे पर हम ना नजर आएंगे’ लिखते समय उन्होंने कभी सोचा न होगा की यही पंक्तियाँ उम्र के आखिरी पड़ाव में उनका इकलौता पुत्र उनकी झोली में डालकर दुनिया से अलविदा कह देगा। 

लेकिन अभी कुछ ऐसा और देखा जिससे दिल में चुभन हुई। मथुरा के पोस्टमार्टम गृह पर संतोष आनंद और उनकी पत्नी की तन्हा बैठे हुए तस्वीर… और जो भी वहां मौजूद था उससे यही कह रहे थे कि कोई डीएम से कह दो जल्दी करा दें। याद रहे मथुरा की सांसद वही हेमामालिनी जी हैं जिन्होंने उनके लिखे ‘क्रांति’ के एक गीत पर अपने कदम थिरकाये थे, जहाँ तक मुझे मालूम है उनकी तरफ से अभी तक कोई सांत्वना नहीं आई है। कहाँ गए थे कृष्ण की नगरी के वो साहित्य प्रेमी जो उस हंसमुख गीतकार को सहारा देने आगे ना आ पाये। सभी प्रमुख समाचार चैनलों पर खबर चली लेकिन क्या बॉलीवुड से किसी ने जिंदगी की उस टूटती लड़ी को जोड़ने की कोशिश की।

‘वाह वाह क्या बात है’ के मंच पर उन्हें मैंने सुना था। आज मेरी उँगलियों ने यूट्यूब पर संतोष आनंद टाइप किया तो वही एपिसोड फिर से आँखों को नम कर गया। नीचे लिंक डाल रहा हूँ। समय निकाल कर सुनियेगा जरूर। कैसे इस हंसमुख गीतकार की जिंदगी की कहानी एकदम थम सी गयी।

http://www.youtube.com/watch?v=zzle3bpnAng

मथुरा से मोहित गौड़ की रिपोर्ट.

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वरिष्ठ पत्रकार अतहर अली अब्बासी का निधन

बुलंदशहर  : वरिष्ठ पत्रकार अतहर अली अब्बासी का बीमारी के बाद यहां निधन हो गया। वह 87 साल के थे। वह राष्ट्रीय सहारा उर्दू के दिल्ली संस्करण में काम करते थे। 1954 से पत्रकारिता कर रहे अब्बासी पूर्व में दिल्ली से प्रकाशित ‘दावत’ और ‘अलजमियत’ में भी काम कर चुके थे। वह 2012 में विधानसभा चुनाव के दौरान पेड न्यूज पर नजर रखने के लिए उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा बनायी गयी दो सदस्यीय कमेटी के सदस्य थे।

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हमें विजय गुप्ता के सपनों और परिवार को संभालना है

विजय गुप्ता को पुरखों ने संभाल लिया है. अब हमें उसके सपनों और परिवार को संभालना है. इसी संकल्पबद्धता के साथ युवा फिल्ममेकर विजय गुप्ता की याद में आयोजित स्मृति जुटान संपन्न हुआ. सूचना एवं जन संपर्क विभाग, रांची के सभागार में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में फोटोग्राफी, फिल्म, कला-साहित्य और उसके परिवार से जुड़े कलाकार, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता और संस्कृतिकर्मी शामिल हुए. इस अवसर पर प्रो. सुशील अंकन ने कहा कि विजय गुप्ता सेल्फलर्निंग प्रोसेस की मिसाल हैं जिन्होंने झारखंड के फोटोग्राफी और सिने कला को आगे ले जाने में महती भूमिका निभाई.

छोटानागपुर सांस्कृतिक संघ की शची कुमारी ने कहा कि अपने साथी को खो देने का दर्द एक स्त्री से बेहतर कोई नहीं जानता. साथी के नहीं रहने से या तो वह टूट जाती है या और मजबूत होकर उभरती है. मानवाधिकारकर्मी अरविंद अविनाश ने विजय को याद करते हुए कहा कि वे जितने विनम्र और मृदुभाषी थे, झारखंडी अस्मिता के सवाल पर उतने ही प्रतिबद्ध. वरिष्ठ पत्रकार और बहुचर्चित उपन्यासकार विनोद कुमार ने बताया कि विजय जैसे लोग बिरले होते हैं जो अपने व्यक्गित सपने को सार्वजनिक सपना बना देते हैं. उन्होंने ‘सोनचांद’ फिल्म की परिकल्पना कर यह भी साबित किया कि समुदाय के सहयोग से बाजारवाद का मुकाबला किया जा सकता है. टीम सोनचांद के निर्देशक अश्विनी कुमार पंकज ने कहा कि विजय गुप्ता ने आदिवासी संस्कृति को आत्मसात करते हुए झारखंडी कला-संस्कृति के विकास में अभिनव योगदान किया.

स्मृति जुटान की शुरुआत में झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की महासचिव वंदना टेटे ने विजय गुप्ता के बारे में विस्तार से जानकारी दी और उनकी पत्नी मनोनीत तोपनो से लोगों का परिचय कराया. उन्होंने कहा कि अखड़ा की ओर से विजय गुप्ता के जीवन संघर्ष और फोटाग्राफ पर अगले वर्ष एक पुस्तक का प्रकाशन तथा फोटो प्रदर्शनी आयोजित की जाएगी. श्रीमती टेटे ने यह भी बताया कि विजय के ड्रीम प्रोजेक्ट फिल्म ‘सोनचांद’ की शूटिंग फरवरी 2015 में होगी और सितंबर तक उसे रिलीज कर दिया जाएगा. अंत में अखड़ा के अध्यक्ष डा. करमचंद्र अहीर ने कहा कि विजय गुप्ता को पुरखों ने संभाल लिया है अब हमें उनके सपनों और परिवार को संभालना है.

इस अवसर पर संत जेवियर कॉलेज के हिंदी प्राध्यापक और कथाकार डा. सुनील भाटिया, आलोचक डा. सावित्री बड़ाइक, चित्रकार शेखर, फिल्मकार रंजीत उरांव, वरिष्ठ साहित्यकार मनरखन किस्कू, युवा संस्कृतिकर्मी अजीत रोशन टेटे, एक्टिविस्ट शेषनाथ वर्णवाल, कृष्णमोहन मुंडा सहित अन्य कई लोग उपस्थित थे. स्मृति सभा बहुत ही सादगी से और बिना किसी आडंबर के आयोजित हुआ. आयोजन स्थल पर विजय गुप्ता द्वारा ली गई झारखंडी संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को फोकस करती फोटो प्रदर्शनी भी लगाई गई थी.

कृष्णमोहन मुंडा

प्रवक्ता

झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा

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पत्रकार विजय कुमार वर्मा का निधन

समस्तीपुर। बिहार में समस्तीपुर जिले के सरायरंजन प्रखंड के नरघोघी गांव में पत्रकार विजय कुमार वर्मा का ह्वदय गति रूक जाने से निधन हो गया । वह 50 वर्ष के थे । वर्मा पटना, रांची और कोलकता से प्रकाशित एक हिन्दी दैनिक से जुड़े हुए थे। नरघोघी स्थित आवास पर ह्वदय गति रूक जाने से उनका निधन हो गया।

वर्मा के दो पुत्र और एक पुत्री है । वर्मा के निधन पर बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के जिलासंयोजक कृष्ण कुमार, वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव सोलंकी, शिव शंकर वर्मा, शिवचंद्र झा, गौरी शंकर झा समेत अन्य पत्रकारों ने शोक व्यक्त किया और कहा कि वर्मा युवा पत्रकारों के मार्गदर्शक थे। गौरतलब है कि एक माह पूर्व वर्मा के पिता और जिले के वरिष्ठ पत्रकार भोला प्रसाद वर्मा का भी निधन हो गया था।

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झारखंड के प्रतिभाशाली सिनेमेटोग्राफर और युवा फिल्ममेकर विजय गुप्ता का असामयिक निधन

झारखंड के प्रतिभाशाली सिनेमेटोग्राफर और युवा फिल्ममेकर विजय गुप्ता का असामयिक निधन हो गया है. विजय गुप्ता झारखंड के एक बेहतरीन फोटोग्राफर, कैमरामैन और फिल्ममेकर थे. झारखंडी कला-संस्कृति के फोटोग्राफिक दस्तावेजीकरण में उनका योगदान महती है. उन्होंने रांची दूरदर्शन पर प्रसारित ‘जोहार झारखंड’ के लिए बतौर कैमरामैन और एडिटर काम किया व सुप्रसिद्ध झारखंडी लोकगायक मधु मंसुरी हंसमुख के जीवन पर अशरफ हुसैन के साथ मिलकर डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई. इस साल जनवरी में उनकी एक और डॉक्यूमेंट्री रिलीज हुई ‘टापरी स्कूल’. इसके अलावा मध्यप्रदेश के कोरकु आदिवासियों पर एक फिल्म निर्माणाधीन है.

2 अक्टूबर को जब उनका निधन हुआ उस समय वे फुल लेंथ फीचर फिल्म ‘सोनचांद’ के शूट की तैयारी में व्यस्त थे.   झारखंड मीडिया फेलेशिप व फोटोग्राफी के लिए अन्य कई सम्मानों से विभूषित विजय गुप्ता  ने झारखंड के गैर-मीडिया फोटोग्राफरों के कल्याण और विकास के लिए पिछले साल झारखंड फोटोग्राफिक एसोसिएशन (जेपीए) की भी स्थापना की जिसका पहला वार्षिकोत्सव इसी 21 सितंबर को आयोजित हुआ. वे जेपीए के संस्थापक सचिव थे. झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा के प्रतिबद्ध संस्कृतिकर्मी विजय गुप्ता मात्र 35 वर्ष के थे. लोहरदगा जिला के कुटमू गांव में 5 जनवरी 1979 को उनका जन्म हुआ था और पिछले 15 वर्षों से वे रांची में रह रहे थे. उन्होंने मनोनीत तोपनो के साथ अंतरनस्लीय और अंतरधार्मिक विवाह किया था. उनके दो बच्चे हैं, एक 3 साल का और दूसरा 8 साल का.

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अस्वस्थ होने के बाद भी पत्रकारिता फील्ड में सक्रिय रहते थे चचा राजकुमार गर्ग

मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार और उपजा के संस्थापक सदस्य राजकुमार गर्ग का  मंगलवार 14 अक्टूबर को निधन हो गया। वह लगभग 75 वर्ष के थे। गत काफी समय से अस्वस्थ थे तथा दिल्ली एम्स में उनका इलाज चल रहा था। अन्तिम संस्कार बुधवार को ब्रजघाट में गंगा तट पर किया गया। स्व. श्री गर्ग उप्र जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन में उपजा में विभिन्न पदों पर रहे। वह मेरठ के इकाई के भी कई बार अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे।  उन्होंने मेरठ में समाचार भारती, अमर उजाला, डीएलए, मयराष्ट्र और प्रभात के साथ जुड़कर लगभग पांच दशक से अधिक पत्रकारिता की। वह अत्यन्त सक्रिय और जुझारु पत्रकार थे।

अपनी दृढ इच्छा शक्ति और जीवट के बल पर वह पिछले दिनों अस्वस्थ होने के बाद भी पत्रकारिता में सक्रिय रहे। गर्ग जी अमर उजाला के उस समय से संवाददाता थे जब यह समाचार पत्र केवल आगरा और बरेली से प्रकाशित होता था। मेरठ से प्रकाशन के बाद भी वह काफी समय तक अमर उजाला के संवाददाता के रूप में कार्यरत रहे। राजकुमार गर्ग एसोसिएशन की गतिविधियों में भी काफी सक्रिय रहते थे। वह प्रतिवर्ष 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस का आयोजन करते थे। यह आयोजन वृहद स्तर पर आयोजित होता था।  उन्होंने मेरठ में उपजा और एनयूजे के कई प्रांतीय और राष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित किये। 1978 में उनके संयोजकत्व में उपजा का प्रांतीय अधिवेशन समम्पन्न हुआ था।

राजकुमार गर्ग के निधन से न केवल मेरठ की पत्रकारिता को अपूर्णीय क्षति हुई है बल्कि यूपी जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ने अपने एक ऐसे जूझारू नेता को खो दिया जिसने हमेशा पत्रकार हित में संघर्ष किया। गर्ग जी से मेरे अत्यधिक निकटतम सम्बन्ध थे। एसोसिएशन में उनका स्थान मार्गदर्शक का था। यूनियन के कार्य संचालन में मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। उनके निधन का समाचार आज सुबह मेरठ से मुझे उपजा के वरिष्ठ सहयोगी श्री पवन मित्तल ने दिया। समाचार सुनकर बेहद कष्ट हुआ। मैं उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

सर्वेश कुमार सिंह

उपाध्यक्ष
उपजा
लखनऊ 

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लखनऊ में उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार नाफे किदवाई का निधन

लखनऊ, 15 अक्टूबर, 2014। उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार श्री नाफे किदवाई के निधन पर उ0प्र0 जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन की लखनऊ इकाई लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ला ने गहरा शोक व्यक्त किया है और दिवंगत आत्मा की शांति की कामना करते हुए शोक संतप्त परिजनों के प्रति अपनी संवेदना  व्यक्त की है।

ज्ञातव्य है कि श्री किदवाई का कल यहां लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया था। वे 56 वर्ष के थे। श्री किदवाई ने उर्दू दैनिक कौमी आवाज और रोजनामा उर्दू राष्ट्रीय सहारा सहित विभिन्न समाचार पत्रों से सम्बद्ध रहने के साथ-साथ स्वतंत्र पत्रकार के रूप में भी अपनी सेवाएं उपलब्ध कराईं ।

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वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार गर्ग ने कैंसर जैसी बीमारी को अपने पर कभी हावी नहीं होने दिया

लखनऊ : उ0प्र0 जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के सस्थापक सदस्य व  मेरठ के  वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार गर्ग के निधन पर उपजा की लखनऊ इकाई लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ला ने गहरा दुखः व्यक्त करते हुए शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदनाए प्रकट की है और ईश्वर से प्रार्थना की है कि वह दुःख की इस घड़ी में परिजनों को सांन्त्वना प्रदान करे। उपजा के प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित ने भी वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार गर्ग के निधन पर गहरा दुखः व्यक्त किया है।

वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार गर्ग का निधन आज प्रातः मेरठ में हो गया। वे लगभग 75 वर्ष के थे तथा कैंसर जैसे असाध्य रोग से पीडित थे।  उनका अन्तिम संस्कार कल मेरठ में सम्पन्न होगा । राजकुमार गर्ग ने अपना कैरियर दैनिक अमर उजाला मेरठ से प्रारम्भ किया था तथा सेवानिवृत्ति होने के बाद उन्होने दैनिक प्रभात में भी कार्य किया था।

वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार गर्ग के निधन पर उपजा के प्रान्तीय कार्यालय में आज एक शोकसभा का आयोजन हुआ। पी0टी0आई0 के ब्यूरो प्रमुख प्रमोद गोस्वामी ने उपजा के संस्थापक सदस्य के निधन पर कहा कि उन जैसे सक्रिय और निष्ठावान साथी के निधन से संगठन की नींव की ईंट खिसक गई है। उनका निधन असहनीय है। उपजा के प्रान्तीय महामंत्री रमेश चन्द जैन ने गर्ग के निधन पर उनके विचारों को आगे बढाने की बात कही।  वरिष्ठ पत्रकार राजीव शुक्ल ने कहा कि उनका जीवन जीवनपर्यन्त जीवन्त था, उनकी अनुपस्थिति खलेगी। पत्रकार सर्वेश कुमार सिंह ने कहा कि 75 वर्ष की आयु मे भी वे स्कूटर चलाते थे। गर्ग ने कैंसर जैसी बीमारी को अपने ऊपर कभी हावी नहीं होने दिया। पत्रकार वीर विक्रम बहादुर मिश्र ने उन्हे अच्छा पत्रकार बताया।

एल0जे0ए0 के महामंत्री के0के0वर्मा, उपाध्यक्ष सुशील सहाय, भरत सिंह, रत्नाकर मौर्य, कोषाध्यक्ष मंगल सिंह, मंत्री अनुराग त्रिपाठी, एस0बी0सिह, विकास श्रीवास्तव सहित वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार, पूर्व सूचना आयुक्त वीरेन्द्र सक्सेना, प्रभाकर शुक्ल, डाॅ0मत्स्येन्द्र प्रभाकर, रवीन्द्र जयसवाल,सुनील टी त्रिवेदी व तारकेश्वर मिश्र ने भी वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार गर्ग के निधन पर गहरा दुखः व्यक्त किया है।

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मेरठ के पत्रकार राजकुमार गर्ग का निधन

मेरठ से एक दुखद खबर आ रही है कि वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार गर्ग का इंतकाल हो गया है. उन्हें लोग प्यार से ‘चचा’ कहा करते थे. सरल, सहज और हंसमुख स्वभाव के राजकुमार गर्ग पत्रकारीय मसलों को लेकर सक्रिय रहा करते थे. इन दिनों वह मेरठ से प्रकाशित अखबार प्रभात में कार्यरत थे.

लंबे समय तक अमर उजाला में काम किया. मेरठ के पत्रकारों ने चचा के निधन पर गहरा शोक जताया है और उन्हें श्रद्धांजलि दी है. राजकुमार गर्ग को पत्रकार बिरादरी हमेशा एक जज्बाती, हिम्मती, बेबाक और बेलौस शख्स के रूप में याद करते रहेंगे.

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सीओ की सरकारी गाड़ी से लगी टक्कर के कारण मौत हुई पत्रकार नीरज की!

बिहार के मधेपुरा से खबर है कि बीते आठ अक्टूबर को थाना क्षेत्र के हरैली गाव के निकट एनएच 106 पर सड़क हादसे में हिन्दी न्यूज चैनल के पत्रकार नीरज समेत दो युवकों की मौत मामले में परिजनों ने ठोकर मारने वाले वाहन के पहचान का दावा किया है। परिजनों की मानें तो उदाकिशुनगंज के सीओ के वाहन से ठोकर लगी थी। परिजनों ने थाना में आवेदन देकर वाहन के नंबर सहित पूरी जानकारी देते हुए कार्रवाई की गुहार लगाई है। आवेदन में जिस गाड़ी का उल्लेख किया गया है वह उदाकिशुनगंज के सीओ का बताया जा रहा है।

सीओ श्यामानंद झा का कहना है कि उन्हें भी इस बात की जानकारी मिली है। सच तो यह है कि उन्होंने ही घायल अवस्था में पत्रकार नीरज कुमार सहित दोनों युवकों को अपने वाहन से अस्पताल पहुंचाया। जिस तरह उन पर आरोप मढ़ा जा रहा है उससे तो कोई भी मदद को आगे नहीं आएगा। मालूम हो कि गत आठ अक्टूबर को मधेपुरा में एक न्यूज चैनल के पत्रकार नीरज कुमार और उसके साथी आजाद टोला निवासी राजू उर्फ अमर सिंह बाइक से उदाकिशुनगंज जा रहे थे। आवेदन देने वाले ने पुलिस से कहा है कि जरूरत पडने पर प्रत्यक्षदर्शी अपनी गवाही देंगे। इस संबंध में थानाध्यक्ष आरसी उपाध्याय का कहना है कि रजिस्टर्ड गाड़ी के संबंध में डीटीओ को लिखा जाएगा। जिसकी जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।

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मनोज श्रीवास्तव के निधन की खबर अमर उजाला कानपुर ने एक लाइन नहीं छापी

Zafar Irshad : अफ़सोस–शर्मनाक–निंदनीय… जिन वरिष्ठ पत्रकार मनोज श्रीवास्तव ने अपनी पूरी ज़िन्दगी अमर उजाला अखबार को समर्पित कर दी, और नौकरी पर जाते समय जान दे दी..उन मनोज के निधन के बारे में आज अमर उजाला कानपुर ने एक लाइन नहीं छापी, कितने शर्म की बात है… “सही कहते है कि पत्रकार अपने आप में एक खबर है, लेकिन वो दूसरों का दुःख-दर्द तो लिखता है, लेकिन उसकी अपनी दर्द भरी कहानी लिखने वाला कोई नहीं हैं “…

लखनऊ में खबर तो अच्छे से छपी लेकिन कानपुर और दूसरे एडिशन में क्यों नहीं छापा गया… मनोज श्रीवास्तव की लिखी खबर तो आल एडिशन छपती थी लेकिन उनकी खुद की मौत की खबर सिर्फ एक एडिशन में ही सिमट कर क्यों रह गई?

पीटीआई कानपुर में कार्यरत पत्रकार जफर इरशाद के फेसबुक वॉल से.

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अमर उजाला ने मनोज श्रीवास्तव की मौत पर विस्तार से और सकारात्मक खबरें छापकर शानदार काम किया है

: संवाददाता के निधन की खबरें छापकर पत्रकारिता मे नए युग का सूत्रपात : उपजा की लखनऊ इकाई में आयोजित हुई शोकसभा : लखनऊ 9 अक्टूबर। वरिष्ठ पत्रकार मनोज श्रीवास्तव को यू0पी0 जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के कार्यालय में भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। वक्ताओं ने उन्हें खबरों पर पैनी नजर रखने वाला स्वाभिमानी किन्तु अहंकार रहित पत्रकार बताया। उल्लेखनीय है कि अमर उजाला के विशेष संवाददाता स्वर्गीय मनोज श्रीवास्तव का 7अक्टूबर को दिल का दौरा पड़ने से वाराणसी में निधन हो गया था।

यू0पी0जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन की लखनऊ इकाई द्वारा आयोजित शोक सभा में पूर्व सूचना आयुक्त व पत्रकार वीरेन्द्र सक्सेना ने कहा कि मनोज उन लोगों में थे जिनमें दूरदृष्टि थी। वे प्रतिक्रियावादी नहीं, अंतरमुखी थे। उनकी लेखनी से व्यक्त किये भाव अहंकार रहित थे। उनमें व्यापक विषयों की गहरी समझ थी। सक्सेना ने कहा कि मनोज की खबर पर पकड़ बहुत अच्छी थी। वे बड़ी ईमानदारी और निष्ठा से काम किया करते थे। मनोज श्रीवास्तव वास्तव में मस्त और फक्कड स्वभाव के थे।

पी0टी0आई0 के ब्यूरो प्रमुख प्रमोद गोस्वामी ने कहा कि मनोज श्रीवास्तव ने जीवन में पीड़ा भले ही झेली हो किन्तु उन्होंने खबरों में प्रतिशोध का कोई भाव नहीं जगने दिया। गोस्वामी ने उनके संस्थान अमर उजाला की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस पत्र ने अपने संवाददाता के निधन की सकारात्मक खबरें छापकर पत्रकारिता के इतिहास में राजधानी ही नहीं देश में एक नए युग का सूत्रपात किया है। 

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर ने मनोज श्रीवास्तव से जुडे कई संस्मरण सुनाये और कहा कि वे बडों का सम्मान और बडी साफगोई से बात करते थे। कल्पतरू एक्सप्रेस के समाचार सम्पादक सर्वेश सिंह  ने कहा कि उनमें अद्भुत एकाग्रता थी। उनकी रिपोर्टिग सदैव संतुलित रही। वीर विक्रम बहादुर मिश्र ने उन्हे आध्यात्मिक क्षमताओं वाला व्यक्ति बताया। अमर उजाला के समाचार संपादक शिशिर द्विवेदी ने कहा कि वह अपना पूरा जीवन उत्सव तरह जिये।

कृष्ण मोहन मिश्र ने कहा कि वह खबर की विश्वसनीयता पर विशेष ध्यान देते थे। रवीन्द्र जायसवाल ने कहा कि उन्होने जीवन तो जिया लेकिन उन्होंने अपने स्वास्थ्य की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। रवीन्द्र जायसवाल ने उन्हे सहज व्यक्ति करार दिया।

उपजा की लखनऊ इकाई के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ला,ने कार्यक्रम का संचालन किया। इस मौके पर पत्रकार के0 के0 वर्मा, डाॅ0 मत्स्येन्द्र प्रभाकर, शक्तिधर यादव, डी0के0 सिन्हा, सुनील त्रिवेदी, मंगल सिंह, अनुराग मिश्र, विकास श्रीवास्तव, कैलाश वर्मा, डाॅ0 पूनम, राजेश सिंह, डाॅ0 सतीश अग्रवाल, विनीत राय,राजपाल यादव, सहित बड़ी संख्या में पत्रकारों ने शोक सभा मे ंउपस्थित होकर चित्र पर फूल अर्पित किए। सभा के बाद दो मिनट का मौन धारण कर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गयी।

अरविन्द शुक्ला

अध्यक्ष

लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन

प्रेस रिलीज

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एबीपी न्यूज के मधेपुरा संवाददाता नीरज कुमार की सड़क हादसे में मौत

एबीपी के मधेपुरा संवाददाता नीरज कुमार की सड़क हादसे में हुई मौत पर पत्रकार जगत में शोक का माहौल है। मौत की खबर मिलते ही सभी पत्रकार अस्पताल और अन्त्यपरीक्षण कक्ष के सामने जुट गये। स्वभाव से शांत और सदा प्रसन्नचित रहने वाले नीरज समाचार संकलन में सदा आगे रहते थे। शोक व्यक्त करने वालों में धर्मेन्द्र भारद्वाज, दिनेश सिंह, अमिताभ कुमार, प्रदीप कुमार झा, विनय कुमार अजय, डॉ. सुलेन्द्र कुमार, प्रवीण कुमार सिंह, पृथ्वीराज यदुवंशी, सुकेश राणा, सुभाष कुमार, विनोद विनित, राकेश रंजन, नीरज झा, राकेश सिंह, मनीष कुमार सहाय, सुभाष सुमन, मनीष वत्स, बंटी सिंह, देवेन्द्र कुमार आदि शामिल थे।

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वरिष्ठ पत्रकार एम.वी. कामत का निधन

मुंबई से एक दुखद खबर है कि वरिष्ठ पत्रकार एम.वी. कामत नहीं रहे. उनका गुरुवार सुबह अपने पैतृक स्थान कर्नाटक के मणिपाल में निधन हो गया. वह 94 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे. उनके भतीजे जयराम कामत ने यहां बताया कि उन्होंने सुबह करीब 6.30 बजे अंतिम सांस ली.

जयराम ने बताया, “वह लंबी उम्र के कारण पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे, जिसे देखते हुए उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार हम उनके शव को अधिक समय तक नहीं रखेंगे और आज ही (गुरुवार) उनका अंतिम संस्कार कर देंगे.”

प्रसार भारती के पूर्व चेयरमैन और वरिष्ठ पत्रकार एम वी कामत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आधिकारिक रूप से जीवनी लिखी है ‘नरेंद्र मोदी द आर्किटेक्ट ऑफ मॉडर्न स्टेट’. यह किताब काफी चर्चित रही. 

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मनोज श्रीवास्तव ने पत्रकारिता का रोब दिखाकर अपनी पत्नी का तबादला लखनऊ नहीं कराया, बल्कि वह स्वयं वाराणसी चले गये

लखनऊ । वरिष्ठ पत्रकार मनोज श्रीवास्तव को आज यू.पी. प्रेस क्लब में भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। वक्ताओं ने उन्हें उसूलों से समझौता न करने, खबरों पर पैनी नजर रखने और जल्द ही लोगों को दोस्त बना लेने वाला स्वाभिमानी पत्रकार बताया। अमर उजाला के विशेष संवाददाता स्वर्गीय मनोज श्रीवास्तव का परसों दिल का दौरा पड़ने से वाराणसी में निधन हो गया था। कल सुबह यहां बैकुण्ठ धाम पर उनके इष्ट मित्रों, राजनेताओं ओर पत्रकारों की भारी भीड़ के बीच अन्त्येष्टि की गयी।

शोक सभा में आई.एफ.डब्ल्यू.जे. अध्यक्ष के. विक्रम राव ने कहा कि मनोज उन लोगों में थे जिन्होंने पत्रकारिता का रोब दिखाकर अपनी पत्नी का तबादला लखनऊ नहीं कराया, बल्कि वह स्वयं वाराणसी चले गये। डी.एन.ए. के संपादक निशीथ राय ने कहा कि समझौता न करना उनकी आदत में शामिल था। अमर उजाला के समाचार संपादक शिशिर द्विवेदी ने कहा कि वह अपना पूरा जीवन उत्सव की तरह जिये। वह कभी भी बड़े आदमी से प्रभावित नहीं होते थे। यू.पी. वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी ने कहा कि वह नई नस्ल के उन पत्रकारों में थे जिन्हें पढ़ने का शौक था और जो पत्रकारिता पर बात करते थे। यू.पी. प्रेस क्लब के अध्यक्ष रवीन्द्र सिंह और सचिव जे.पी. तिवारी ने  कहा कि बहुत कम लोग इस आयु में पत्रकारिता में वह स्थान बना पाते हैं, जो मनोज ने बनाया। क्लब के उपाध्यक्ष गोविन्द पंत राजू ने कहा कि वह खबर की विश्वसनीयता पर विशेष ध्यान देते थे। लखनऊ श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के अध्यक्ष सिद्धार्थ कलहंस ने शिकायत की कि वह अलमस्त जीवन तो जिये लेकिन उन्होंने अपने स्वास्थ्य की ओर कोई ध्यान नहीं दिया।

वरिष्ठ पत्रकार राकेश पाण्डेय ने कहा कि लोगों ने मनोज को कभी उदास नहीं देखा। सुरेश बहादुर सिंह ने सुझाव दिया कि इस प्रकार की परिस्थितियों का शिकार होने वाले पत्रकार के परिवार की मदद के लिए कोई स्थायी व्यवस्था होना चाहिए। पूर्व सूचना आयुक्त और वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र सक्सेना ने कहा कि मनोज की खबर पर पकड़ बहुत अच्छी थी। वरिष्ठ पत्रकार उत्सकर्ष सिन्हा ने कहा कि मनोज पढ़ने के इतने शौकीन थे कि धर्मयुग की अन्तिम प्रति तक उन्होंने सुरक्षित रखी थी।  पत्रकार सुश्री सरिता सिंह ने मनोज के साथ की गयी पत्रकारिता की यादों में खोते हुए कहा उनकी व्यक्तियों के बारे में राय सही होती  थी ओर जल्द ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेना उनका गुण था।

उपजा की लखनऊ इकाई के अध्यक्ष अरविनद शुक्ला ओर सपा नेता दीपक मिश्र ने भी श्रद्धांजलि अर्पित की। सभा में उ.प्र. श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महामंत्री पी.के.तिवारी, कोषाध्यक्ष आर.एन. बाजपेयी, लखनऊ इकाई की मंत्री विनीता रानी ‘विन्नी’’ और पत्रकार मुदित माथुर, सर्वेश सिंह, जावेद काजिम, संजय शर्मा, राकेश वर्मा, विजय शर्मा, हरीश मिश्रा सहित बड़ी संख्या में पत्रकारों ने शोक सभा में उपस्थित होकर चित्र पर फूल अर्पित किए। सभा के बाद दो मिनट का मौन धारण कर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गयी।

बी.सी. जोशी
कार्यालय सचिव

प्रेस रिलीज

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मनोज श्रीवास्तव के व्यक्तित्व में एक आवारापन रहा… जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरने का आवारापन….

alok paradkar : हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं… मनोज श्रीवास्तव जी को पहले भी जब याद करता था, उनके द्वारा दोहरायी जाने वाली दुष्यन्त कुमार की पंक्ति ‘जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में, हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं’ की याद हो आती। पत्रकारों, खासकर अपने से जूनियर पत्रकारों, की आपसी भेंट-मुलाकातों में वे इसे अक्सर कहा करते थे और जब कभी नहीं कहते तो हम उन्हें इसकी याद दिला देते। फिर अपनी पीड़ा की इस अभिव्यक्ति पर हम सभी ठहाका लगाते। यह उस सामूहिक पीड़ा की अभिव्यक्ति थी जो किसी मीडिया संस्थान में प्रशिक्षु उपसम्पादक से लेकर विशेष संवाददाता तक की होती है। alokparadkar

( File Photo Alok Paradkar )

मनोज जी के भीतर जो फक्कड़पन था उसके कारण वे इसे कहीं भी कह सकते थे और कहा भी करते थे। पत्रकार के तौर पर मीडिया संस्थानों में आदमी से झुनझुने बनते जाने की नियति और उसके प्रतिरोध का द्वंद्व उनके चेहरे से जाहिर नहीं होता था, तो क्या उनकी दिमाग की नसों ने फटकर इसे जाहिर किया है?  कुछ समय पूर्व कोई भी इस बात को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि आखिर बनारस जाने की उनकी वास्तविक वजह पारिवारिक ही थी? वे एक बड़े समाचार पत्र के विशेष संवाददाता थे और समाजवादी पार्टी जैसी महत्वपूर्ण बीट देखते थे। प्रदेश में सपा का शासन था। राजधानी की राजनीतिक चकाचौंध छोड़कर बनारस बस जाने का उनका फैसला एक पत्रकार और उसके कैरियर के तौर पर निश्चय ही बड़ा फैसला था लेकिन वह उस मन:स्थिति में पहुंच चुके थे जहां उन्होंने अपने ढंग से जीवन को कैरियर पर तरजीह देनी चाही। बनारस का माहौल उन्हें रास भी आया। वे संगीत समारोहों में नजर आने लगे। कलाकारों-साहित्यकारों के बनारस से किए गये उनके साक्षात्कार अक्सर दिख जाते थे। कुछेक कलाकारों के बारे में उन्होंने मुझसे पूछताछ भी की थी।

वास्तव में वे आज उन दुर्लभ होते जाते पत्रकारों में थे जिसे राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों के साथ ही साहित्य और कला भी अच्छी समझ थी। इनका मिलाप उनकी पत्रकारिता को धार देता था। सस्ती सनसनी की जगह संवेदना उनकी रिपोर्टों की आधार होती थी। चुनावों की रिपोर्टों में भी वे गली-मोहल्ले की चकल्लस और मानवीय पहलुओं से जान डाल देते। उनके साप्ताहिक साक्षात्कारों में सवालों में विविधता होती थी। वे मुलायम सिंह यादव या शिवपाल यादव से विस्तार से बातचीत कर सकते थे तो गिरिजा देवी और काशीनाथ सिंह से भी। श्रीलाल शुक्ल जी को मृत्यु के पूर्व जब कई पुरस्कार मिले थे तो उन्होंने एक लम्बा साक्षात्कार किया था।

मेरा उनसे परिचय बहुत कम अवधि का रहा। हालांकि मैं उन्हें पत्रकार के तौर पर पहले से जानता था लेकिन भेंट 2011 में अमर उजाला आने पर ही हुई। बाद में अमर उजाला छोड़ने से पहले जब मैंने लम्बी छुट्टी ली तो वे कार्यालय के उन थोड़े से लोगों में थे जो फोन से हालचाल लिया करते थे। वे जब बनारस रहने लगे तो मेरे बनारस बराबर आने- जाने के कारण उनसे मुलाकात हो ही जाती थी। अमर उजाला में काम के दौरान वे मेरी रिपोर्टिंग के बारे में अक्सर राय दिया करते थे। मुझे अच्छी तरह याद है कि एक बार मजाज पर लिखे मेरे आलेख पर उन्होंने यह कहते हुए नाराजगी जाहिर की थी कि मजाज पर इतना ही काफी नहीं है! और जब वे ऐसा कह रहे थे मैंने महसूस किया कि मजाज के प्रति उनके मन में कितना स्नेह और सम्मान है। उनके मित्र बताते हैं कि लम्बे समय तक उनके व्यक्तित्व में एक आवारापन रहा, जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरने का आवारापन। मजाज की तरह वे भी अल्पायु हुए। कोई भी नहीं जानता था कि वे मजाज की इन पंक्तियों को भी भीतर ही भीतर कहीं गुनगुना रहे थे-‘जिन्दगी साज दे रही है मुझे, सहरो-एजाज दे रही है मुझे, और बहुत दूर आसमानों से, मौत आवाज दे रही है मुझे..!’

(पत्रकार आलोक पराड़कर की फेसबुक वाल से)

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श्रद्धांजलि : यकीन नहीं हो रहा कि मनोज श्रीवास्तव हम लोगों के बीच में नहीं हैं

Yashwant Singh : जब मैंने लखनऊ से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की तो जिन कुछ पत्रकारों का सानिध्य, संग, स्नेह, मार्गदर्शन मिला उनमें से एक मनोज श्रीवास्तव जी भी हैं. पर इनके आज अचानक चले जाने की सूचना से मन धक से कर के रह गया. लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार साथियों ने मुझे फोन पर सुबकते हुए मनोज के निधन की सूचना दी. मनोज श्रीवास्तव शख्स ही ऐसे थे कि वे सभी के प्रिय थे. तभी तो वे लखनऊ की अच्छी खासी पत्रकारिता को त्यागकर बनारस रहने के लिए तबादला लेकर चले गए थे.

अपनी पिछली कुछ लखनऊ यात्राओं में मैंने मनोज जी के संग कई घंटे प्रेस क्लब में गुजारे थे. उनके गीत सुने, उनके-अपने जीवन के अनुभव-संस्मरण साझा हुए. क्या पता था कि ये मुलाकात आखिरी मुलाकात में तब्दील होने जा रही है. मनोज श्रीवास्तव के जाने से अब ऐसा लगने लगा है कि अपने आसपास के लोग, अपने समय के लोग, अपने साथी-संगी लोगों के जाने की बारी आ गई है. कब कौन कहां कैसे चला जाए, कुछ नहीं पता.. मनोज भाई, आपके साथ तो अभी बनारस की गलियों में घूमना था… मस्ती करनी थी.. बतियाना था.. गाना था… पर आप अचानक ऐसे सब संगी साथियों को छोड़कर चले जाओगे, यकीन नहीं हो रहा… बेहद भारी मन से श्रद्धांजलि दे रहा क्योंकि यकीन अब तक नहीं हो रहा कि आप नहीं हो हम सभी के बीच. 

(भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.)

Golesh Swami : dosto mera sabse pyara dost manoj shrivastava mujhe akela chodkar chala gaya. manoj mere saath amar ujala mai tha. mai 2003 mai hindustan aa gaya lekin meri aur monoj ki dosti nahi tuti. hum dono har dukh shuk ki baate karte the. aise dost jeewan mai kam hi milte hai. pichle hafte hi to ham mile the. maine pooch tha ab kab aoge to kahne laga deewali par mulakat hogi. par yeh nahi malum tha ki tumhare shareer se tumhari aatma gayab hogi. aise jeewant aadmi ko khamosh dekhna wakai kashtkaari hai.alwida dost. lekin dost tumhari kami hamesha khalegi.

(लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार गोलेश स्वामी के फेसबुक वॉल से.)

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गाजीपुर जिले के युवा पत्रकार राजेश दुबे का निधन

गाजीपुर जिले के प्रतिभाशाली युवा पत्रकार राजेश दुबे का बुधवार को निधन हो गया। राजेश लंबे अर्से से इलेक्ट्रानिक मीडिया में बतौर संवाददाता काम कर रहे थे। उन्होंने सहारा न्यूज चैनल से अपने करियर की शुरुआत की थी। करीब पांच वर्षों तक सहारा न्यूज चैनल के लिए काम करने के साथ ही उन्होंने लाइव इंडिया, पी7 और एबीपी न्यूज के लिए भी पत्रकारिता की थी। कम समय में ही उन्होंने इलेक्ट्रानिक मीडिया के क्षेत्र खास मुकाम बनाया था। राजेश दो वर्षों तक गाजीपुर पत्रकार एसोसियेशन के अध्यक्ष भी रहे।

शहर के फुल्लनपुर मुहल्ले मे रहने वाले राजेश अपने नम्र स्वभाव और जिंदादिली के लिए दोस्तों के बीच काफी लोकप्रिय थे। उन्होंने अपने करियर के दौरान गाजीपुर मऊ बलिया और वाराणसी में काम करते हुये की महत्वपूर्ण खबरें की थी। राजनैतिक, क्राइम और सम सामयिक खबरों को लेकर राजेश दुबे की लेखनी और दृष्टिकोण के लोग कायल थे। जिले का ये युवा प्रतिभाशाली पत्रकार पिछले कुछ समय से बीमार चल रहा था। गंभीर रूप से पीलिया और अन्य कई बीमारियों से ग्रसित राजेश पिछले दिनों कोमा मे चले गये थे जिसके बाद उन्हें इलाज के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

बीएचयू में इलाज के दौरान बुधवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। राजेश की मौत की खबर के साथ ही उनके दोस्तों शुभचिंतकों के साथ-साथ पत्रकारिता से जुड़े लोगों के बीच शोक का माहौल है। गाजीपुर श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जायेगा। वे अपने पीछे एक पुत्र और पुत्री छोड़ गये हैं।

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अमर उजाला, लखनऊ के पत्रकार मनोज श्रीवास्तव का हार्ट अटैक से निधन

एक दुखद खबर बनारस से आ रही है. अमर उजाला में कार्यरत पत्रकार मनोज श्रीवास्तव का हार्ट अटैक से निधन हो गया. मनोज अमर उजाला लखनऊ में लंबे समय से कार्यरत थे और कुछ माह पहले ही तबादला कराकर बनारस आए थे. मनोज की पत्नी बनारस में शिक्षिका हैं. सिगरा महमूरगंज में मनोज और उनकी पत्नी ने एक फ्लैट खरीदा और इसी में रह रहे थे. पत्नी पढ़ाने गई हुई थीं. मनोज की इकलौती संतान उनकी बिटिया झांसी से एमबीबीएस कर रही हैं. घर पर मनोज अकेले थे और अमर उजाला आफिस जाने के लिए तैयार होकर निकल रहे थे.

फ्लैट का ताला लगाते वक्त उन्हें हार्ट अटैक हुआ और वहीं गिर पड़े. करीब घंटे भर बाद लोगों ने उन्हें गिरे देखा तो अस्पताल ले गए जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. बताया जा रहा है कि मनोज का शव लखनऊ लाया जा रहा है जहां उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा. मनोज श्रीवास्तव विशेष संवाददाता के पद पर अमर उजाला में कार्यरत थे और यूपी के मान्यता प्राप्त पत्रकार थे. अभी तक उन्होंने हजारों बाइलाइन खबर लिखी होंगी जिसमें सैकड़ों खबरें फ्रंट पेज पर आल एडिशन छपी हैं.

मनोज बेहद विनम्र, मृदुभाषी, मिलनसार और लो प्रोफाइल जर्नलिस्ट थे. वे अपने काम से काम रखते थे और अपने काम को पूरी तल्लीनता से करते थे. पत्रकारिता में सरोकार और आम जन की आवाज को प्रमुखता से उठाने वालों में से थे. लखनऊ में लंबे समय से रहने के कारण वह अब अपने परिवार के साथ बनारस रहना चाह रहे थे इसी कारण उन्होंने बनारस तबादला कराने के लिए अमर उजाला प्रबंधन को अर्जी दी. अमर उजाला प्रबंधन मनोज को  लखनऊ से मुक्त नहीं करना चाह रहा था लेकिन उनकी जिद के कारण उनका तबादला बनारस कर दिया.

न्यूज कवरेज के दौरान यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ वरिष्ठ पत्रकार मनोज श्रीवास्तव. (फाइल फोटो)

RIP :  मनोज के निधन की सूचना से लखनऊ और बनारस के मीडिया जगत के लोग स्तब्ध हैं. मनोज की उम्र करीब 50 वर्ष के आसपास रही होगी. लखनऊ के पत्रकारों प्रद्युम्न तिवारी, सिद्धार्थ कलहंस आदि ने मनोज के निधन पर शोक जाहिर किया है. इन लोगों का कहना है कि उन्हें अभी तक भरोसा नहीं हो रहा कि मनोज उनके बीच से चले गए. लखनऊ के पत्रकार Siddharth Kalhans अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं : ”प्रिय साथी मनोज श्रीवास्तव, अमर उजाला का देहावसान हो गया है। वाराणसी में अमर उजाला में फिलवक्त काम कर रहे मनोज जी का निधन आज सुबह 11 बजे कार्यालय जाते समय हुआ। मनोज जी की पत्नी राजघाट कालेज में रीडर हैं और परिवार में एक पुत्री है। मनोज श्रीवास्तव के माता-पिता का निधन पहले हो चुका है। मनोज श्रीवास्तव नवजीवन, दैनिक जागरण, करंट वीकली, आयडियल एक्सप्रेस में काम कर चुके थे। बीते दो दशक से वो अमर उजाला ब्यूरो में कार्यरत थे।”

लखनऊ के पत्रकार Utkarsh Sinha का कहना है कि मनोज का जाना उनके लिए बहुत ही निजी क्षति है …श्रद्धांजलि.  पत्रकार Hemant Tiwari फेसबुक पर लिखते हैं- ”मनोज का जाना अत्यंत दुखद है। परमपिता परमेश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें। एक उच्च कोटि के पत्रकार का असमय अवसान पत्रकारिता जगत के लिए अपूरणीय क्षति है और मेरे लिए तो नितान्त निजी। श्रद्धांजलि।”

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ व जाने माने पत्रकार मनोज श्रीवास्तव के देहावसान पर उत्तर प्रदेश राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने दुख व्यक्त करते हुए उनके शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना जतायी है. समिति के सचिव सिद्धार्थ कलहंस ने कहा कि मनोज श्रीवास्तव अपनी जनपक्षधर, मानवीय संवेदना से परिपूर्ण और तथ्यपरक रपटों के लिए हमेशा जाने जाएंगे. मनोज की अयोध्या, बाबरी मस्जिद विवाद की खबरें हमेशा इतिहास का हिस्सा रहेंगी. मनोज श्रीवास्तव उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के कार्यकारिणी के सदस्य रह चुके हैं. मनोज जी की पत्नी राजघाट कालेज में रीडर हैं और परिवार में एक पुत्री है. मनोज श्रीवास्तव के माता-पिता का निधन पहले हो चुका है. मनोज श्रीवास्तव नवजीवन, दैनिक जागरण, करंट वीकली, आयडियल एक्सप्रेस में काम कर चुके थे. बीते दो दशक से वो अमर उजाला ब्यूरो में कार्यरत थे.

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अस्‍पताल की मर्चुरी में 5581 का टैग लगा आपका शरीर

अपने हाथों अपने ही जीवन को समाप्‍त करने का ऐसा कोई दूसरा उदाहरण मैंने नहीं देखा, बावजूद इसके कि, आप खुद चाहते तो ऐसा नहीं होता, पर यह राह आपने ही चुनी थी… आपका अक्‍खड़पन टेढमिजाजी सब कुछ उतनी बुरी नहीं थी, बल्‍कि थी ही नही, और ना ही इससे जीवन समाप्‍त होता है… आपको शराब और नशे की गोलियां खा गई… और यह दोनों चीजें आपके लिए कतई जरूरी ना थी… आप वे शख्‍स, जिसकी दहाड़ से बड़े बड़े तुर्रम कांपते थे… आप इस मौत के काबिल नहीं थे जैसी मौत आपने चुनी… आप ठहर सकते थे, आप मान सकते थे, पर आप माने नहीं… घर कहीं पीछे छूट गया, कोई इर्द गिर्द ना रहा…

अस्‍पताल की मर्चुरी में 5581 का टैग लगा आपका शरीर अकेले ढंका पड़ा था… मैं आपको आपके सुनहरे अक्षरों की लिखावट और बेबाक लेखनी के लिए याद करना चाहता हूं…. एक शख्‍स ऐसा जिसकी जिद पर सब सहमते थे… एक शख्‍स ऐसा जिसने सत्‍ता के सवारों को तलवों पर ला गिराया… भीड़ कुछ कहे पर करना कहना अपने मन की… पर जानता हूं कि मैं आपको याद करूंगा कि, अपने हाथों बगैर वजह और बुरी तरह अपनी लाइफ नष्ट करने वाला आपके अलावा कोई दूसरा ना देखा मैंने…,और प्रार्थना है कि, देखूं भी ना… कई मुलाकातें है जेहन में… हर मुलाकातों में आपके अंदाज वाले किस्‍सों की भी कमी नहीं… पर यह जो आज के पैतालिस मिनट थे न … जब अस्‍पताल के रिसेप्‍शन से लेकर मर्चुरी तक मैं भटकता रहा, यह मुलाकात मुझे हमेशा याद रहेगी…

टैग नंबर 5581 के रूप में मौजूद आपसे यह मुलाकात आखिर भूलना भी चाहूं तो भुलूंगा कैसे… दीदादिलेर, बला का हठी और शब्‍दों का कुशल चितेरा यह आपके भीतर का वह पत्रकार था जिसे आपने शराब और गोलियों के पीछे ढांप दिया… दबा दिया… वह पत्रकार जिसकी हमेशा से हम सबको जरूरत थी, आपने हमसे हमारा नायाब पत्रकार छीन लिया… आप ऐसा क्‍यूं करते थे जैसा कि आप करते थे, वह सवाल तब भी आपके लिए कोई मायने नहीं रखता था जबकि आपसे संवाद होता था, पर हां अब जबकि संवाद संभव नहीं है तो स्‍वप्‍न में ही सही अगर आ कर आप मुझे यह बता सकें कि, आपने ऐसी मौत क्‍यूं चुनी, तो कम से कम यह बताइएगा जरूर…

पत्रकार याज्ञवल्क्य वशिष्ठ के फेसबुक वॉल से.

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वरिष्ठ पत्रकार नईम शीरो के निधन पर मुख्यमंत्री रमन सिंह ने गहरा दुःख व्यक्त किया

राजधानी रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार नईम शीरो का निधन हो गया. नईम शीरो ने राजधानी रायपुर के विभिन्न दैनिक समाचार पत्रों सहित प्रदेश के अन्य कई अखबारों को पत्रकार के रूप में अपनी सेवाएं दी.  मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है. नईम शीरो का परसों निधन हुआ. मुख्यमंत्री ने कल  जारी शोक संदेश में कहा कि नईम शीरो ने 40 वर्ष से भी अधिक समय तक एक सजग और सक्रिय पत्रकार के रूप में समाज को अपनी मूल्यवान सेवाएं दी.

अपने जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वह पत्रकारिता की राह से विचलित नहीं हुए. डॉ. सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा. वह एक अच्छे कहानीकार भी थे और स्थानीय साहित्यिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों से भी जुड़े हुए थे.

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बरेली में संपादक कंवलजीत सिंह का निधन, कानपुर में पत्रकार प्रदीप के पिता का दुर्घटना में निधन

बरेली से एक दुखद खबर है. जनमोर्चा अखबार के बरेली संस्करण के संपादक सरदार कंवलजीत सिंह का आज सुबह देहांत हो गया. कंवलजीत काफी समय से बीमार चल रहे थे. उनके निधन पर जिले के पत्रकारों ने शोक व्यक्त किया है. उधर, कानपुर से खबर है कि अमर उजाला में कार्यरत पत्रकार प्रदीप अवस्थी के पिता राजकुमार अवस्थी का 65 साल की उम्र में एक मार्ग दुर्घटना में निधन हो गया.

राजकुमार अवस्थी साईकिल से किसी कार्य से गए हुए थे. उनकी साईकिल में पीछे से डीसीयम ने टक्कर मार दी जिससे उनकी घटनास्थल पर ही  मौत हो गई. उनका अंतिम संस्कार आज प्रात: 11 बजे कानपुर के भैरव घाट पर किया गया.

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