उनकी डिग्रियां भी जाली हो सकती हैं मगर उन्हे शर्म क्यों नहीं आती !

क्यों नहीं सभी विधायकों, सांसदों, मंत्रियों व नौकरशाहों की डिग्रियों का सत्यापन करके देखा जाये? हो सकता है, काफी लोगों की डिग्री फर्जी निकले। कुछ तो नेता व मंत्रियों के फर्जी डिग्री के मामले आज कल चर्चा में भी है, यहां तक कि तमाम ऐसे लोग विदेशी डिग्री भी लिए फिरते हैं। लोक सेवा आयोग, इलाहाबाद के अध्यक्ष, अनिल यादव की डिग्री/मार्कशीट का सत्यापन कराया जाये, हो सकता है कि अवश्य फर्जी निकले ! आम आदमी क्या करे, उसे तो जेल में डालना आसान है, इन बड़ों को कौन पकड़े?

सियासतदानों की फर्जी डिग्री के मामले में उत्तर प्रदेश शायद देश में अव्वल आ सकता है। काफी नेताओं व नौकरशाहों को शायद जांच होने पर गद्दी छोड़नी पड़ जाए। आपराधिक मामलों की तो बात ही नहीं कहिये। सजायेअफ्ता नेता व नौकरशाह तमाम कुर्सियों पर जमे बैठे हैं, कौन हटाएगा ? तभी तो हम कहते हैं – ” ऐसे सब लोग …….. मस्त और जनता त्रस्त !

कुछ राजनेता हाई स्कूल/इंटरमीडिएट तक में अध्यापन किए होंगे परन्तु प्रोफेसर लिखते है। क्या ये सही है? प्रोफेसर का पद उच्च शिक्षा धारक काफी मशक्कत और सहायक प्रोफेसर के रूप में 26 साल के अनुभव, प्रोन्नति के बाद प्राप्त होता है । यहां तो कोई भी मंत्री/विधायक/सांसद झूठी शान बघारने के लिए अपने नाम के पहले प्रोफेसर साहब लिखे फिरता है। कोई शर्म नहीं आती उन्हें। प्रोफेसर का पद बड़ा उच्च व सम्मानजनक होता है। विदेशों में बड़ी इज्जत होती है । कुछ राजनेता मानद पीएचडी या डीलिट पा जाते हैं, Vice Chancellors की चमचागिरी की बदौलत।

कोई मेरी ‘मंत्री’ तोमर के प्रति सहानभूति नहीं है परन्तु यह कोई पहला या अंतिम मामला ऐसा नहीं। उत्तर प्रदेश में तो नक़ल माफिया/शिक्षा माफिया से जो डिग्री, जिस स्तर तथा जिस श्रेणी की फर्जी मार्कशीट या डिग्री लेना चाहो ले लो, बाज़ार खुला है, बोली लगाने वाला चाहिए। ट्रान्सफर/पोस्टिंग/प्रमोशन सबकी बोली लगती है यंहा तो।

“फर्स्ट एडवांटेज” नामक संस्था द्वारा सर्वे में बताया गया कि भारत में नौकरी पाने के लिए आवेदनकर्ताओं में 50% अभ्यर्थी फर्जी डिग्री/अनुभव प्रमाण पत्र/पहचान पत्र के साथ आते हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत में 2500 फर्जी विश्वविद्यालय और 7500 नकली कंपनियां हैं। उत्तर प्रदेश इस मामले में सर्वाधिक खराब साख वाले राज्यों में से एक है। CBCID द्वारा हाल ही में 18 लखनऊ यूनिवर्सिटी के फर्जी डिग्री धारकों को BTC के एडमिशन के बाद पकड़ा गया। मुज़फ्फरनगर की एक अदालत ने लखनऊ विश्वविद्यालय के 9 अधिकारियों के खिलाफ इस मामले में गैर जमानती वारंट जारी किया।

मई 2015 में लखीमपुर खीरी में 29 फर्जी डिग्री धारक, शारीरिक शिक्षा प्रशिक्षकों को पकड़ा गया । इन्ही पदों के लिए 47 अभ्यर्थी BPED की फर्जी मार्क शीट तथा 45 फर्जी BA की डिग्री के साथ पकड़े गए। 2010 में मुजफ्फरनगर में District Institute of Education & Training (DIET) में 19 कर्मचारी लखनऊ विश्वविद्यालय की फर्जी डिग्री के साथ CBCID ने पकड़े। इलाहाबाद विश्वविद्यालय जो गुणवत्तापरक उच्च शिक्षा के लिए जाना जाता है, में भी चालू शैक्षणिक सत्र में ही कम से कम 129 फर्जी डिग्री के मामलों का पता चला है ।

मई १४, २०१४ को फर्जी तरीके से परिषदीय विद्यालय में नौकरी करने वाले एक शिक्षक की सेवा बीएसए ने समाप्त कर दी। पूर्व माध्यमिक विद्यालय शेखूपुर अजीत में तैनात सहायक अध्यापक की बीएड डिग्री फर्जी निकल आने पर बीएसए ने शिक्षक की सेवा खत्म कर दी।

जम्मू एवं कश्मीर उच्च न्यायालय में एक गुरुजी की काबिलियत को लेकर सवाल उठा तो जज मुजफ्फर हुसैन अतर ने बरोज बीते जुमा सुनवाई करते हुए हकीकत से खुद ही रूबरू होने का फैसला लिया और गुरुजी को खुली अदालत में ही गाय पर निबंध लिखने का हुक्म दे दिया। गुरुजी हक्का-बक्का और पसीने-पसीने हो गए। कहने लगे कि अदालत कक्ष के बाहर लिखने की इजाजत दी जाए। वह भी जज साहब ने कुबूल कर ली (शायद जज साहब को लगा हो.. अदालत में इसे घबराहट हो रही होगी)। दरअसल, मामला यह था कि शिक्षक मो. इमरान खान ने बोर्ड ऑफ हाइयर एजूकेशन दिल्ली, नागालैंड ओपन यूनिवर्सिटी से डिग्रियां ले रखी थीं जो मान्यता प्राप्त नहीं हैं। इन्हीं के आधार पर उसे शिक्षक की नौकरी दे दी गई, क्योंकि डिग्री में गुरुजी को उर्दू में 74, अंग्रेजी में 73, गणित में 66 अंक मिले थे यानी डिग्रियों के मुताबिक वो टॉपर हैं, सो नौकरी मिल गई। इसी पर एक याचिका प्रस्तुत की गई और यह सच्चाई सामने आई ।

सबसे सनसनीखेज मामला अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय का है , जंहा से कुख्यात आतंकवादी मोहम्मद आतिफ के कब्जे से अलीगढ़ विश्वविद्यालय की फर्जी स्नातक की डिग्री मिली । उत्तर प्रदेश में नकल माफिया की पोल तो ‘वास्ट’ नामक संस्था खोलती ही रहती है । उसके श्रोत हैं : http://indianexpress.com/…/fake-degree-row-delhi-court-den…/

http://timesofindia.indiatimes.com/…/articlesh…/47621423.cms

http://www.mapsofindia.com/…/educational-frauds-in-india-fa…

मास्साब की बीएड डिग्री फर्जी, बर्खास्त Tue, 14 Jan 2014 – पूर्व माध्यमिक विद्यालय शेखूपुर अजीत का प्रकरण – सात साल…

Posted by उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा समाचार on Monday, January 13, 2014

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फर्जी डिग्री व रिमाण्ड तो एक बहाना है… असल में कुछ और निशाना है…

दिल्ली के कानून मंत्री जीतेन्द्र सिंह तोमर की गिरफ्तारी ने कई विवाद खड़े कर दिए हैं। गिरफ्तारी की अन्दरूनी सच्चाई भले ही कुछ भी हो लेकिन देश हित में जीतेन्द्र सिंह तोमर की गिरफ्तारी ने सवालों की झड़ी लगा दी है। सवाल यह नहीं कि देश की राजधानी का कानून मंत्री खुद शिकंजे में है। सवाल यह भी नहीं कि डिग्री फर्जी है या नहीं। सवाल यह है कि गिरफ्तारी का जो तरीका अपनाया गया वह कितना जायज है। 

संविधान के अनुच्छेद 226ए 227 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में डिग्री को फर्जी घोषित कराने के लिए याचिका भी पहले से प्रस्तुत है ऐसे में दिल्ली पुलिस ने उसी मामले में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 420ए 467ए468ए471 और 120 बी के तहत अलग से फौजदारी मुकदमा कायम किया है। चूंकि सिविल मामलों में धोखाधड़ी से जुड़े ऐसे मामलों का बारीकी से विवेचन किया जाता है जबकि फौजदारी मामलों अपनाई जाने वाली प्रक्रिया थोड़ी अलग है और संक्षिप्त है। सिविल नेचर के मामलों के अदालत मे चलते रहने के बावजूद उसी पर पुलिस फौजदारी प्रकरण कायम कर सकती है, इसको लेकर पुलिस ने जरूर कानून की बाध्यताओं को दृष्टिगत रखा है लेकिन सवाल फिर वही कि इसकी जरूरत क्यों पड़ गई। जाहिर है कि इस समय केन्द्र और दिल्ली सरकार के बीच प्रशासन संबंधी अधिकारों को लेकर तनातनी चल रही है। यहां हमें यह नहीं भूलना होगा कि अभी कुछ ही दिन पहले सलमान खान को सजा मिलने के कुछ ही घण्टों में उसी दिन हाईकोर्ट से जमानत मिली थी। तब भी कानून के उपयोग के साथ ही अमीर और गरीब को कानून का अपनी सुविधाए रुतबे और सम्पन्नता के हिसाब से उपयोग को लेकर अच्छी खासी बहस हुई थी।  

कुछ वैसे ही स्थिति लेकिन बदले परिदृश्य जीतेन्द्र सिंह तोमर के मामले में दिखे। यहां पुलिस द्वारा गिरफ्तारी को लेकर सवाल खड़े हो गए। इसके चलते इस बार बहस राजनैतिक प्रतिशोध को लेकर चल पड़ी है। जीतेन्द्र सिंह तोमर सम्मानित व्यक्ति तो हैं, वो विधायक हैं। मंत्री भी हैं। कहीं भाग भी नहीं रहे थे। उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है। फरार भी नहीं थे। फिर कैसी जल्दबाजी, जबकि वो खुद मामले में सहयोग कर रहे थे। सिविल प्रकृति का प्रकरण पहले से ही उच्च न्यायालय में विचाराधीन भी है। ऐसे में आनन फानन में गिरफ्तारी और मामला विशेष होने के बावजूद भी सौजन्यता के चलते दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष को भी हाथों हाथ जानकारी न देना खुद ही सवालों को जन्म देता है। ऐसा नहीं है कि दिल्ली पुलिस ने इस गिरफ्तारी की पटकथा जल्दबाजी में लिखी होगी। यदि ऐसा होता तो दिल्ली पुलिस की ओर से यह सफाई नहीं आती कि उसने दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष को बीती रात ही फैक्स कर जानकारी दे दी थी।

सबको पता है कि अभी न तो विधानसभा का सत्र ही चल रहा है न ही कोई जरूरी वजह ही है जिसके चलते अध्यक्ष का दफ्तर रात को भी खुला रहे जबकि फैक्स किए जाने वाला दिन छुट्टी यानी रविवार का भी था। इसी तरह से दिल्ली के मुख्यमंत्री को भी सौजन्यता आधारों पर उनके मंत्री की गिरफ्तारी की सूचना देनी थी। इस तरह की परंपरा रही है और माननीयों के मामले में इसे पहले भी अपनाया गया है। 

पुलिस ने 5 दिन की रिमाण्ड के लिए साकेत कोर्ट में यह आवेदन दिया है कि मुंगेर ले जाकर इनकी डिग्री की जांच करेंगे। पुलिस का तर्क हास्यास्पद है। डिग्री कई वर्ष पुरानी है। डिग्री की जांच मुंगेर में आरोपी के बिना भी हो सकती है। जांच में आरोपी की उपस्थिति की कोई आवश्यक्ता भी नहीं है। जांच दस्तावेज की होनी है न कि व्यक्ति की। न्यायालय ने भी उक्त आधार मानकर 4 दिन की पुलिस रिमाणड दी। यह न्यायालय अधिकारिता है।

इस देश में सर्वोच्च न्यायलय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के कई ऐसे न्याय दृष्टांत हैं जो यह अवधारित करते हैं कि सिविल प्रकरण के लंबित के रहते उसी आधार पर क्रिमिनल प्रकरण आता है तो उसे रोक दिया जाए क्योंकि इसमें आरोपी को अपना बचाव उजागर करना पड़ता है और संविधान के तहत हर नागरिक को यह अधिकार और सुरक्षा प्राप्त है कि वह अपने बचाव को जब इच्छा पड़े तभी उजागर करे। 

इस प्रकरण का अंत चाहे जिस प्रकार से हो लेकिन इस संबंध में उपर्युक्त बिन्दुओं पर की गई विवेचना तथा माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्याय दृष्टांतों को दृष्टिगत रखते हुए स्थापित स्थिति से हटकर आरोपी को सजा देने के लिए क्या नई स्थिति का निर्माण किया जा सकेगा,  भारतीय लोकतंत्र यह जानने को आतुर है।

ऋतुपर्ण दवे से संपर्क : rituparndave@gmail.com

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