स्थानीय संपादक प्रदीप कुमार की मीटिंग से पहले और बाद में ये साहब ठंढ में भी पसीना साफ करते नजर आते थे

छायाकार साथी मंसूर आलम के इंतकाल की खबर अंदर तक हिला गई। हिंदुस्तान की लांचिंग के वक्त हमने साथ काम किया था। बेहद सरल और भावुक मंसूर को कभी किसी भी कवरेज के लिए कह दीजिए, ना मना करते थे और ना ही चेहरे पर कोई शिकन लाते। ऐसे शख्स को कोई संपादक टेंशन कैसे दे सकता है। वैसे संपादक को ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता। कारण पुराना है। फौज में जिस तरह ट्रेनिंग होती है और फिर वो रंगरूट ट्रेनर बनता है तो वही करता है। कुछ ऐसा ही उसके साथ है।

यह शख्स जहां रहा वहां या तो बंटवारा हुआ, या वो अखबार तबाह होता चला गया!

Deshpal Singh Panwar : अगर ये खबर सच है कि हिंदुस्तान टाइम्स समूह को मुकेश अंबानी खरीद रहे हैं तो तय है कि अच्छे दिन (स्टाफ के लिए पीएम के वादे जैसे) आने वाले हैं। वैसे इतिहास खुद को दोहराता है… कानाफूसी के मुताबिक एक शख्स जो इस समूह के हिंदी अखबार में चोटी पर है वो जहां रहा वहां या तो बंटवारा हुआ, या वो अखबार तबाह होता चला गया।