दीपक चौरसिया जैसे पत्रकारों के लिए भारतीय संविधान की जगह नागपुरी संविधान ने ले ली है!

दीपक चौरसिया का ‘उन्माद’ और फ़ासीवाद के ख़ूनी पंजों में बदलता मीडिया! जेएनयू में चंद सिरफिरों की नारेबाज़ी को राष्ट्रीय संकट के तौर पर पेश कर रहे न्यूज़ चैनल और अख़बार आख़िर किसका काम आसान कर रहे हैं। हर मोर्चे पर नाकाम मोदी सरकार, संकट से ख़ुद को निकालने के लिए ऐसा करे तो समझ में आता है, लेकिन संपादकों का आलोचनात्मक विवेक कहाँ चला गया ? ऐसा क्यों लग रहा है कि उन्होंने तर्क और विवेक के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया है?