जनसत्ता अखबार में देवी प्रसाद त्रिपाठी की प्रशस्ति पढ़कर मुझे घोर आश्चर्य हुआ

जनसत्ता 2 मई के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर मुकेश भारद्वाज द्वारा रचित भाई डी पी त्रिपाठी की प्रशस्ति पढ़ी। मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि जो पत्र किसी भी बड़े लेखक, वैज्ञानिक, कलाकार के बारे में अवसर विशेष पर भी कोई टिप्पणी छापने से गुरेज करता है उसमें इस तरह की प्रशस्ति कैसे छप गई। संभव है मुकेश भारद्वाज की जनसत्ता में अलग हैसियत हो। बहरहाल मेरी नजर में देवी प्रसाद त्रिपाठी का व्यक्तित्व बेहद रहस्यमय है। इसमें कोई दो राय नहीं कि साहित्य और समाज की गहरी समझ के साथ ही उनकी राजनीतिक समझ भी काबिले तारीफ़ है। लेकिन जैसा कि मुकेश भारद्वाज इंगित करना चाहते हैं देवी प्रसाद त्रिपाठी की प्रतिबद्धता न तो सिंह वाली है न मिमियाती हुई है बल्कि भारतीय राजनीति के अवसरवादी यथार्थ से ही संचालित है।