आरएसएस, एल्विन टॉफलर और मोदी

अगर आपने एल्विन टॉफलर को नहीं पढा है तो पढ़ लीजिये। शुरुआत थर्ड वेब से कीजिये। क्योंकि आने वाले दिनो में मोदी सरकार भी उसी तरह टेक्नालाजी को परिवर्तन का सबसे बडा आधार बनायेगी जैसे एल्विन टाफलर की किताबों में पढ़ने पर आपको मिलेगा। डिजिटल भारत की कल्पना मोदी यू ही नहीं कर रहे हैं बल्कि उनके जहन में भी एल्विन टाफलर है। दरअसल, यह संवाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भीतर स्वयंसेवको का हैं। और पहली बार सरसंघचालक मोहन भागवत को लग रहा है कि नरेन्द्र मोदी भारत की दिशा को बदल सकते हैं।

इसलिये संघ को भी अब मोदी पाठ ही पढ़ाया जा रहा है और संघ हर स्वयंसेवक को मोदी पाठ पढाने को ही कह रहा है। यानी हर स्वयंसेवक के लिये नेता अब एक ही है। और उसका नाम है नरेन्द्र मोदी। मसलन अब संघ का प्रांत अधयक्ष भी हर जगह अपने नेता के तौर पर जिक्र मोदी का ही करेगा। और किसान संघ से लेकर स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मजदूर संघ भी जो मोदी सरकार की नीतियों को लेकर कल तक रुठे नजर आते थे वह अब रुठ तो सकते है लेकिन उनके नेता का नाम भी नरेन्द्र मोदी ही होगा। इस सोच को कैसे विस्तार दिया जाये इस पर आरएसएस की प्रतिनिधी सभा और बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में चर्चा जरुर हुई लेकिन इसे अमली जामा कैसे पहनाना है, इसपर माथापच्ची जारी है । आरएसएस के दत्तात्रेय होसबोले और बीजेपी के महासचिव मुरलीधर राव गुरुवार यानी 9 मार्च को नागपुर में इसी पर चर्चा करने जुटे। खास बात यह है नरेन्द्र मोदी को संघ ने अब किस तरह ढील दी है या सर्वमान्य तौर पर मोदी की अगुवाई में ही हर मुद्दे को अमली जामा पहनाने पर मुहर लगा दी है, उसे आगे कैसे बढ़ाना है और बीते दस महीने में राजनीतिक तौर पर भी जो धुंधलापन है, उसे कैसे साफ करना है इसपर भी अब संघ-बीजेपी की मिलीजुली राणनीति काम कर रही है। यानी पहली बार वह दौर खत्म हो चला है कि संघ अपने एजेंडे के तहत प्रधानमंत्री को चेता सकता है। जैसा वाजपेयी के दौर में होता रहा। उल्टे राजनीतिक तौर पर अब मोदी जो कहे और जिस दिशा में चले उसी दिशा में संघ को भी चलना है। यानी फील्ड में काम करने वाले स्वयंसेवकों को भी समझना है कि अब उनका नेता भी नरेन्द्र मोदी है। खास बात यह भी है कि संघ की तर्ज पर ही नरेन्द्र मोदी को भी राजनीतिक तौर पर स्थापित करने की दिशा में बीजेपी ही नहीं स्वयंसेवकों को भी लगना है। 

राजनीति की यह बेहद महीन रेखा है कि संघ जिस तरह अपने विरोधियों को भी हिन्दुत्व के नाम पर अपने साथ खड़ा करने से नहीं कतराता यानी लगातार अपने विस्तार को ही सबसे महत्वपूर्ण मानता है उसी तर्ज पर नरेन्द्र मोदी की छवि को भी राष्ट्रीय नेता के तौर पर कैसे रखा जाये जिससे संघ के प्रचारक या बीजेपी के नेता के आवरण के बाहर मोदी को खड़ा किया जा सके। यानी आने वाले दिनों में स्वयंसेवकों की सक्रियता अब समाजवादी, वामपंथी या कांग्रेसियों के बीच भी महीन राजनीतिक मान्यता बनाने के लिये दिखायी देगी। क्योंकि संघ का मानना है कि अगर नरेन्द्र मोदी को अंतराष्ट्रीय नेता के तौर पर खड़ा करते हुये स्टेट्समैन की मान्यता मिलती है तो फिर सवाल 2019 या 2024 के चुनाव का नहीं रहेगा बल्कि खुद ब खुद संघ के विस्तार की तरह बीजेपी भी चुनावी राजनीति से आगे निकल जायेगी। चूंकि राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर कांग्रेस के अलावे दूसरा कोई दल है नहीं और प्रधानमंत्री मोदी ही नहीं बल्कि बीजेपी के तमाम नेता भी काग्रेस मुक्त भारत का जिक्र करते रहे हैं। लेकिन नई रणनीति के तहत पहली बार कांग्रेस मुक्त भारत की जगह नेहरु-गांधी परिवार मुक्त भारत की दिशा में सरकार और संघ बढ़ रही है। यानी जवाहरलाल नेहरु से लेकर राहुल गांधी पर हमले ना सिर्फ तेज होंगे बल्कि राजनीतिक तौर पर गांधी परिवार को खारिज करने और अतित के कच्चे-चिठ्ठों के आसरे गांधी परिवार को कटघरे में खडा करने में भी सरकार दस्तावेजों के आसरे जुटेगी तो स्वयंसेवक भारत के मुश्किल हालातो को जिक्र कर मोदी के रास्तों को राष्ट्रीय तौर पर मान्यता दिलाने में जुटेंगे। लेकिन यह रास्ता बनेगा कैसे और जिस एल्वीन टाफलर का जिक्र विज्ञान और तकनीक के आसरे देश की राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन का सपना संजोया जा रहा है उसके नायक क्या वाकई मोदी हो जायेंगे। क्योंकि संघ के भीतर एल्विन टाफलर को लेकर पहली बार चर्चा नहीं हो रही है। 

दरअसल दिसबंर 1998 में नागपुर में संघ की 5 दिन की चिंतन बैठक में एल्विन टाफलर के “वार एंड एंटी वार” और सैम्युल हटिंगटन की “क्लैशेस आफ सिविलाइजेशन” पर मदन दास देवी की अगुवाई में संघ के स्वयंसेवक परमेश्वरन और बालआप्टे ने बकायदा दो दिन बौद्दिक चर्चा की। और संयोग से उस वक्त भी मौजूदा पीएम मोदी की तर्ज पर संघ के प्रचारक रहे वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। लेकिन उस वक्त वाजपेयी को स्टेटसमैन के तौर पर संघ के खड़ा करने की सोच से पहले ही देश ने वाजपेयी को स्टेट्समैन के तौर पर मान्यता दी थी। तो फिर मोदी के दौर में संघ के भीतर यह सवाल कुलांचे क्यों मार रहा है, यह भी सवाल है। और संघ जिस तरह अपनी सारी ताकत प्रधानमंत्री मोदी को दे रहा है या लगा रहा है उससे भी पहली बार यह संकेत तो साफ तौर पर उठ रहे हैं कि संघ अपनी सीमा समझ रहा है। यानी वह सक्रिय ना हो या सरकार की नीतियों का विरोध करे तो वाजपेयी की तर्ज पर मोदी के लिये भी मुश्किलात हो सकते है। लेकिन जब राजनीतिक सत्ता ही नहीं रहेगी तो फिर संघ को कोई भी सत्ता कटघरे में खडा करने में कितना वक्त लगायेगी। जैसा मनमोहन सिंह के दौर हिनदू आतंक के दायरे में संघ को लाया गया । यानी आरएसएस अब 2004 की गलती करने कौ तैयार नहीं है और बीजेपी दिल्ली की गलती दोहराने को तैयार नहीं है। यानी स्वयंसेवको की कदमताल अब बिहार-यूपी चुनाव के वक्त मोदी के नायकत्व में ही होगी । और 2019 तक संघ के भीतर से मोदी सरकार की किसी नीति को लेकर कोई विरोध की आवाज सुनायी देगी नहीं । क्योंकि संघ को भरोसा है कि आधुनिक भारत के विकास के जनक के तौर पर मोदी की पहचान दुनिया में हो सकती है।

पुण्य प्रसून बाजपेयी

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