याकूब मेमन: ”विस्‍थापित आक्रोश” का ताज़ा शिकार

1993 के मुंबई बम धमाकों में उसकी भूमिका के लिए याकूब मेमन को अगर फांसी पर चढ़ाया जाता है, तो यह एक बहुत भारी नाइंसाफी होगी और इससे बड़ी राष्ट्रीय त्रासदी और कुछ नहीं होगी। फिलहाल, मेमन की दया याचिका पर महाराष्ट्र के राज्यपाल का फैसला और सुप्रीम कोर्ट में तीसरी अपील ही उसकी गरदन और जल्लाद के फंदे के बीच खड़ी दिखती है।

(लेख प्रकाशित होने के वक्‍त यही स्थिति थी। याकूब को आज सुबह 7 बजे फांसी दे दी गई- मॉडरेटर)

आज अचानक उभर कर सामने आ रहे (या दोबारा सार्वजनिक हो रहे) तमाम तथ्य यह दिखा रहे हैं कि मेमन के मामले में हमारी कानून प्रणाली किस कदर नाकाम रही है। मेमन की वापसी से जुड़े रहे गुप्तचर विभाग के एक पूर्व अधिकारी बी. रमन का लिखा और अब रीडिफ डाॅट कॉम द्वारा प्रकाशित एक पत्र तथा बम धमाकों के बाद याकूब की भारत वापसी पर मसीह रहमान नाम के पत्रकार द्वारा 2007 में लिखी गई एक रिपोर्ट साफ तौर पर बताती है कि बम धमाकों में मेमन परिवार का सक्रिय हाथ नहीं था।

सुरेंद्र कोली को फांसी पर चढ़ाए जाने की जल्दी वाजिब नहीं

निठारी कांड हमारे समाज का एक बहुआयामीय संकट है। अगर वह मात्रा सुरेंद्र कोली नाम के एक आदमी का अपराध है तो सवाल है कोई आदमी क्यों कर इस हद तक गिर सकता है कि आदमी ही को मारकर खाने लगे। ऐसे उदाहरण तो हैं कि आदमी ने आदमी को खाया, पर ये उदाहरण सामान्यतः भूख से जुड़े हैं। इस संदर्भ में भी जो किस्सा सबसे ज्यादा चर्चित है वह है लातिन अमेरिकी देश उरुगुए की एयर फोर्स की फ्लाट नंबर 571 का एंडीज पर्वत श्रृंखला में 13 अक्टूबर 1972 को दुर्घटनाग्रस्त होना। इसमें कुल 45 यात्री सवार थे। इन में से आधे से ज्यादा तत्काल मारे गए तथा कई और बाद में ठंड आदि से मर गए। पर 72 दिन बाद भी 16 यात्री बचा लिए गए। यह मिरेकल आफ एंडीज यानी एंडीज का चमत्कार कहलाता है। सवाल उठा कि लगभग 11 हजार फिट की ऊंचाई पर जहां खाने को घास तक नहीं थी ये कैसे बचे। जांच करने पर पता चला कि इन बचे लोगों ने अपने मरे हुए साथियों को खाकर अपना जीवन बचाया था।