Live खुदकुशी फिल्माते मीडियाकर्मी, स्टेज पर खड़ा अहंकारी मुख्यमंत्री, पुलिस से गुहार लगाते शातिर नेता, अविचल मुस्काते पुलिसवाले…

Nadim S. Akhter : फिल्म ‘पीपली लाइव’ Anusha Rizvi ने बनाई थी और आज देश की राजधानी दिल्ली में ‘पीपली लाइव’ साकार हो कर जी उठा. सब कुछ वैसा ही. वही खुदकुशी की सनसनी, गर्म तवे पर रोटी सेंकने को आतुर मीडिया-नेता-प्रशासन की हड़बड़ी और दर्शकों-तमाशाइयों का वैसा ही मेला, वही हुजूम. सब कुछ जैसे एक लिखी स्क्रिप्ट की तरह आंखों के सामने होता रहा. एक पल को तो समझ ही नहीं आया कि मनगढंत फिल्म पीपली लाइव देख रहा हूं या फिर हकीकत में ऐसा कुछ हमारे देश की राजधानी दिल्ली के दिल यानी जंतर-मंतर पर हो रहा है !!!

किसान की खुदकुशी पर पाणिनी आनंद की कविता…

Panini Anand : यह नीरो की राजधानी है. एक नहीं, कई नीरो. सबके सब साक्षी हैं, देख रहे हैं, सबके घरों में पुलाव पक रहा है. सत्ता की महक में मौत कहाँ दिखती है. पर मरता हर कोई है. नीरो भी मरा था, ये भूलना नहीं चाहिए.

जंतर मंतर पर किसान आत्महत्या से अधिग्रहण अध्यादेश तक

आज दिल्ली में जंतर मंतर पर केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान दौसा (राजस्थान) का किसान गजेंद्र सिंह पेड़ पर फांसी से झूल गया। अपने पीछे छोड़े एक सुसाइड नोट में वह लिख गया कि ‘दोस्तों, मैं किसान का बेटा हूं। मेरे पिताजी ने मुझे घर से निकाल दिया क्योंकि मेरी फसल बर्बाद हो गई। मेरे पास तीन बच्चे हैं….जय जवान, जय किसान, जय राजस्थान।’ घटना के समय मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, आप के नेता संजय सिंह, कुमार विश्‍वास मौके पर मौजूद थे। राममनोहर लोहिया अस्पताल के मुताबिक उसको मृत अवस्था में अस्पताल ले जाया गया था। 

जंतर मंतर पर आत्महत्या से पूर्व गजेंद्र सिंह

यूपी में किसान की मौत और आदिवासी नेता पर पुलिसिया फायरिंग से मुलायम-अखिलेश का असली चेहरा उजागर

लखनऊ 14 अप्रैल 2015। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के लोकसभा क्षेत्र आजमगढ़ के गांव सरायसादी में हुई किसान की मौत को रिहाई मंच ने सपा सरकार की किसान विरोधी नीति का एक और उदाहरण बताते हुए कहा कि इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सूबे में किसान और उसके प्रति सरकार का रवैया क्या है। मंच ने सोनभद्र में कन्हार बांध के नाम पर गैरकानूनी ढ़ंग से किए जा रहे अधिग्रहण के खिलाफ अंबेडकर जयंती पर ‘संविधान बचाओ’ प्रदर्शन पर पुलिस फायरिंग की कड़ी भर्त्सना करते हुए दोषी पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

यूपी में जंगलराज : एक और अन्नदाता ने की आत्महत्या, एक और किसान के सीने में घुसी पुलिस की गोली

यूपी में एक महीने में 67 किसानों ने की आत्‍महत्‍या कर ली। ये आंकड़ा झूठा है क्योंकि ये पिछले मार्च महीने में हुई किसान मौतों का जोड़ है। आज तो आधा अप्रैल भी गुजर रहा है। संख्या सैकड़ा पार कर चुकी है। बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और उसके साथ ही किसानों की सदमे से मौत और खुदकुशी का सिलसिला भी थम नहीं रहा है। मौसम लगातार फसलों पर कहर बन कर टूट रहा है। करोड़ों अन्नदाताओं के घरों में अंधेरा पसरता जा रहा है। उन्हें अपनी मुसीबतों का कोई पारावार नहीं सूझ रहा है। अखबारी सूचनाओं पर यकीन करें तो सबसे खराब हाल उत्तर प्रदेश के मध्यक्षेत्र और बुंदेलखंड का है। यहां रोजाना मौतों की गिनती बढ़ती जा रही है। 

जीवन जीने की आजादी देने वाले किसान की चिंता न सरकार को है, न विपक्षी नेताओं को और न शहरी मध्यवर्ग को

Shambhunath Shukla : हिंदुस्तान में पढ़ाई मंहगी है, इलाज मंहगा है और ऐय्याशी (शराबखोरी, होटलबाजी, शौकिया पर्यटन आदि-आदि) मंहगी है। लेकिन सबसे सस्ता है भोजन। आज भी मंहगे से मंहगा गेहूं का आटा भी 45 रुपये किलो से अधिक नहीं है और गेहूं 28 से अधिक नहीं। रोजमर्रा की सब्जियां भी 40 से ऊपर की नहीं हैं। अगर आप दिन भर में एक स्वस्थ आदमी की तरह 2400 कैलोरी ग्रहण करना चाहें तो भी अधिक से अधिक 50 रुपये खर्चने होंगे। मगर जो किसान आपको इतना सस्ता जीवन जीने की आजादी दे रहा है उसकी चिंता न तो सरकार को है न विपक्षी नेताओं को और न ही शहरी मध्यवर्ग को।

यूपी में किसान आत्महत्याओं का दौर और हरामी के पिल्लों द्वारा महान लोकतंत्र का जयगान

Yashwant Singh : कौन इनकी मौत को मुद्दा बनाएगा। ये ना पूंजीपति हैं। ये ना टीआरपी हैं। ये ना शहरी हैं। ये ना संगठित हैं। हम सब अपने अपने खेल में उलझे हैं और हम सबकी निहित स्वार्थी खेलकूद से उपजे अभावों की जेल में ये आम किसान कैद हैं। इस कैद की नियति है मौत। शायद तभी इनकी मुक्ति है। सिलसिला जारी है।  मनमोहन रहा हो या मोदी, माया रही हो या मुलायम। सबने पूंजी के खिलाडियों को सर माथे बिठाया। किसानों को सबने मरने के लिए छोड़ दिया। ये मरते थे। मर रहे हैं। मरेंगे। कभी बुंदेलखंड में। कभी विदर्भ में। जहाँ कहीं ये पाये जाते हैं वहीँ मौत का फंदा तैयार पड़ा है। कब कौन कहाँ लटक रहा है, हम सब नपुंसक की भाति चुपचाप इसका इंतज़ार कर रहे हैं। महान लोकतंत्र और अदभुत राष्ट्र की जयगान करने वाले हरामी के पिल्लों पर थूकता हूँ।

महत्वपूर्ण कौन… किसान या क्रिकेट?

यह कतई आश्चर्य की बात नहीं है कि आजकल अखबार व दृश्य श्रव्य मीडिया का पहला समाचार क्रिकेट है, फिर राजनीतिक उठापटक और अपराध या फ़िल्मी सितारों की चमक दमक वगैरह। जंतर मंतर पर लाखों किसान देश के दूर दराज इलाकों से आकर अपनी समस्याएं बताना चाहते हैं लेकिन मीडिया लोकसभा और राज्यसभा में किसानों के चिंतकों की बात तो सुन रहा है परन्तु यहां मौजूद किसानों की नहीं। खड़ी फसलों की भयानक तबाही क्या महज एक खबर है ? यह बात एक किवदंती सी बहु-प्रचलित है कि देश में सत्तर प्रतिशत किसान हैं लेकिन मीडिया में उन पर चर्चा एक प्रतिशत से भी कम होती है।

उन्नाव के किसानों पर लाठी चार्ज और मुकदमा अखिलेश सरकार को पड़ेगा महंगा

लखनऊ : रिहाई मंच ने उन्नाव के शंकरपुर गांव में उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम (यूपीएसआइडीसी) द्वारा जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आवाज उठाने वाले किसानों पर लाठी चार्ज और मुकदमा दर्ज करने को प्रदेश सरकार की किसान विरोधी नीति करार देते हुए किसानों पर दर्ज मुकदमा तत्काल वापस लेने और दोषी शासन-प्रशासन के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। मंच ने सपा सरकार को उसका चुनावी वादा याद दिलाते हुए कहा है कि वादे के मुताबिक वह अधिग्रहण की गई जमीन का मूल्य 6 गुने से अधिक दे तथा अधिग्रहण के दौरान किसानों की सहमति के बिना कोई जमीन अधिग्रहीत न की जाए।

मीडिया का मोतियाबिंद : इसके आपरेशन का समय आ गया है…

Ambrish Kumar : कल जंतर मंतर पर जन संसद में कई घंटे रहा. दस हजार से ज्यादा लोग आए थे जिसमें बड़ी संख्या में किसान मजदूर थे. महिलाओं की संख्या ज्यादा थी. झोले में रोटी गुड़ अचार लिए. मंच पर नब्बे पार कुलदीप नैयर से लेकर अपने-अपने अंचलों के दिग्गज नेता थे. अच्छी सभा हुई और सौ दिन के संघर्ष का एलान. बगल में कांग्रेस का एक हुल्लड़ शो भी था. जीप से ढोकर लाए कुछ सौ लोग. मैं वहां खड़ा था और सब देख रहा था. जींस और सफ़ेद जूता पहने कई कांग्रेसी डंडा झंडा लेकर किसानों के बीच से उन्हें लांघते हुए निकलने की कोशिश कर रहे थे जिस पर सभा में व्यवधान भी हुआ.  एक तरफ कांग्रेस में सफ़ेद जूता और जींस वालों की कुछ सौ की भीड़ थी तो दूसरी तरफ बेवाई फटे नंगे पैर हजारों की संख्या में आये आदिवासी किसान थे.

‘टाइम्स नाऊ’ चैनल का बॉयकाट होगा, सोशल एक्टिविस्टस की तरफ से अरनब गोस्वामी को खुला पत्र

Dear Mr Arnab Goswami,

We, the undersigned, who have on many occasions participated in the 9:00 p.m. News Hour programme on Times Now, anchored by you, wish to raise concerns about the shrinking space in this programme for reasoned debate and the manner in which it has been used to demonize people’s movements and civil liberties activists.

BJP Continues to Mislead Farmers and their Supporters in Various Parties

: The Real Battle is between Farmers and Land Grabbing Corporates and BJP, not between Bharat and Pakistan! :  BJP is Hiding Behind the Poor in its Defence :  The Ordinance now Bill is Bringing Back the Colonial Legacy: Unacceptable : Delhi : Forcible land acquisition has always been an issue of life and death for millions of people in India, not only farmers but also agricultural laborers and fish workers. With the Land Ordinance it has become a political hot-potato. More than 350 people’s organizations gathered at the Parliament Street on February 24th, with 25,000 people from Gujarat to Orissa to Assam, and from Himachal Pradesh to Tamil Nadu and Kerala. It has forced the political parties to take a stand on the issue and leading to heated debate and discussion on the floor of the Parliament. It is certainly a result of the anti-farmer and anti-poor move of undemocratically amending the 2013 Act on Land Acquisition and Rehabilitation to the extent of killing its very spirit and purpose.

किसान मर रहे हैं, मोदी सपने दिखाते जा रहे हैं, मीडिया के पास सत्ता की दलाली से फुर्सत नहीं

Deepak Singh :  प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री बनने के बाद कौन सुध लेता हैं किसानों की? महाराष्ट्र में और केंद्र में दोनों जगह भाजपा की सरकार पर हालत जस के तस। यह हाल तब हैं जब नरेंद्र मोदी को किसानों का मसीहा बता कर प्रचार किया गया। आखिर क्यों नई सरकार जो दावा कर रही हैं की दुनिया में देश का डंका बज रहा हैं पर उस डंके की गूंज गाँव में बैठे और कर्ज के तले दबे गरीब और हताश किसान तक नहीं पहुँच पाई? क्यों यह किसान आत्महत्या करने से पहले अपनी राज्य सरकार और केंद्र सरकार पर भरोसा नहीं कर पाया की सरकार आगे आएगी और कुछ मदद करेगी?

गाजीपुर से तीन खबरें : बाजरा बनाम डाई, गो तस्कर बनाम भाजपा नेता, मंत्री बनाम ठाकुर साहब

Yashwant Singh : गाजीपुर से तीन खबरें सुना रहा हूं. पहली खेती किसानी की. बाजड़ा पिछले साल 1100 रुयये क्विंटल था, इस साल 900 रुपये हो गया है. वहीं, डाई खाद का दाम 600 रुपये बोरी से बढ़कर 1150 रुपये हो गया है. कितनी तेज देश तरक्की कर रहा है और कितना तेज गांवों किसानों का विकास हो रहा है, इसकी ये एक बानगी है. ये जानकारी मुझे पिताजी ने दी, चिंतिंत लहजे में ये कहते हुए कि ”अब खेती-किसानी में कुछ रक्खा नहीं है”.

दिवाली की पूर्व संध्या पर विदर्भ के छह किसानों ने आत्महत्या की.. कहां है नेशनल मीडिया.. किधर हैं राष्ट्रीय नेता…

विदर्भ (महाराष्ट्र) में किसानों की आत्महत्याओं का दौर जारी है. कांग्रेस की सरकार से विदर्भ के लोग नाराज थे क्योंकि वह किसानों के राहत के लिए कुछ नहीं कर रही थी और ऋण जाल में फंसकर किसान लगातार आत्महत्याएं करते जा रहे थे. लोगों ने बड़ी उम्मीद से बीजेपी और नरेंद्र मोदी को वोट दिया था. लेकिन किसानों की समस्या जस की तस है. भाजपा और नरेंद्र मोदी को अभी बड़े-बड़े मुद्दों और बड़ी-बड़ी बातों से फुरसत नहीं है कि वे किसानों की तरफ झांकें. काटन और सोयाबनी की खेती-किसानी से जुड़े छह किसानों ने दिवाली की पूर्व संध्या पर खुदकुशी की है. कार्पोरेट मीडिया को नमो नमो करने से फुरसत नहीं है कि वह आम जन और आम किसान की खबरें दिखाए. किसी इलाके में खेती के संकट के कारण छह किसानों की आत्महत्या बड़ी खबर है और देश को हिलाने वाली है. लेकिन कोई मीडिया हाउस इन किसानों के घरों तक नहीं पहुंचा और न ही इनकी दिक्कतों पर खबरें दिखाईं. जिन घरों के मुखियाओं ने दिवाली से ठीक पहले आत्महत्या कर ली हो, उन घरों में दिवाली कैसी रही होगी, इसकी बस कल्पना की जा सकती है. विदर्भ खबर नामक एक ब्लाग पर विदर्भ जन आंदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी ने किसान आत्महत्याओं के बारे में विस्तार से लिखा है. इसे पढ़िए और सोचिए कि नेता जो बोलता है, मीडिया जो दिखाता है, क्या उतना ही देश है, क्या उतनी ही खबरें हैं, या बातें-खबरें और भी हैं जिन्हें लगातार दबाया, छुपाया, टरकाया जा रहा है.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

किसान चैनल साकार करेगा धरती से दौलत पैदा करने का सपना

भोपाल 12 सितम्बर । दूरदर्शन द्वारा प्रारम्भ किया जा रहा किसान चैनल धरती से दौलत पैदा करने का सपना साकार करेगा। हमारे देश में पुरातनकाल से यह मान्यता है कि किसान समृद्ध होगा तो देश समृद्ध होगा। खेती लाभ का धंधा बने, समस्त कृषि आधारित कार्यों को किसान से जोड़कर एक बड़ी इंडस्ट्री खड़ी की जा सके, किसानों को कृषि के संबंध में शिक्षा, सूचना एवं ज्ञान प्राप्त हो सके, ऐसे सभी प्रयासों में दूरदर्शन का किसान चैनल महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। यह विचार माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में मध्यप्रदेश के जनसंपर्क मंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने व्यक्त किये। वे विश्वविद्यालय द्वारा प्रसार भारती एवं मेपकॉस्ट के सहयोग से आयोजित “दूरदर्शन किसान चैनल: स्वरूप एवं रचना”  विषयक संविमर्श में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।

बकाएदार किसान को बेइज्जती की हवालात, आरोपी डाक्टर को सम्मान की कुर्सी, दैनिक जागरण का खबरों के साथ भेदभाव

: ये तस्‍वीरें बयां करती हैं देश के सत्‍ता-सिस्‍टम और बिके दैनिक जागरण की असलियत : चंदौली (यूपी) : कहते हैं कि एक तस्‍वीर की जुबां कई लाख शब्‍दों पर भारी होती है. चंदौली तहसील में दो-तीन दिन पहले खींची गई दो तस्‍वीरें एक साथ सत्‍ता, सिस्‍टम, मीडिया, न्‍याय, अमीरी-गरीबी सभी का पोल खोल गईं, जिसे शायद हम लाखों शब्‍द के जरिए भी उतने अच्‍छे बयां नहीं कर पाते. ये तस्‍वीरें यह बताने के लिए काफी हैं कि एक आम नागरिक, किसान, गरीब के साथ सत्‍ता-सिस्‍टम और मीडिया किस तरह का व्‍यवहार करता है, और अमीरों के साथ उसके व्‍यवहार में कितना परिवर्तन आ जाता है.

सलाखों के पीछे किसान

जल्द शुरू होंगे किसानों और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए टीवी चैनल

Dish tv

केन्द्र सरकार ‘डीडी किसान’ नाम का किसानों के लिए एक 24 घंटे का चैनल शुरू करने की योजना बना रही है। चैनल को जल्द से जल्द लॉन्च करने के लिए सरकार प्रसार भारती के साथ काम कर रही है। सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि चैनल क्षेत्रीय फ़ीड के साथ एक राष्ट्रीय चैनल हो या प्रत्येक क्षेत्र के लिए अलग चैनल होने चाहिए। नया चैनल मौसम और बीज संबंधित जानकारी कृषक समुदाय को देगा। दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) पहले से ही कृषि संबंधी कार्यक्रमों को चलाते हैं।