कान फिल्म फेस्टविल पर मीडिया के तौर-तरीके से शबाना नाराज

कान फिल्म फेस्टिवल एक गंभीर आयोजन माना जाता है. इस तरह के महोत्सव से फिल्म बनाने वाले और अभिनय के क्षेत्र में नाम कमाने वाले लोगों को बढ़ावा मिलता है. ऐसे में मीडिया की कवरेज कैटरीना कैफ के लाल रंग के गाऊन पर फोकस रहने से शबाना नाराज हैं.  

अनुराग कश्यप मुम्बई छोड़कर चले ही जाएं तो बेहतर

‘बॉम्बे वेलवेट’ अनुराग कश्‍यप की भारत में रहते हुए बनायी शायद आखिरी फिल्‍म होगी क्‍योंकि इसी महीने वे बोरिया-बिस्‍तर समेटकर पेरिस शिफ्ट हो रहे हैं। इस लिहाज से दो बातें कही जा सकती हैं। एक तो यह, कि बॉम्‍बे वेलवेट बंबई को दी गयी उनकी श्रद्धांजलि है। दूसरे, इस फिल्‍म के बजट और इसकी महत्‍वाकांक्षी योजना के चलते यह कश्‍यप के सिनेमाई विकास का पैमाना भी है। मेरे खयाल से इसकी जो भी आलोचना बनेगी, वह फ्रेम ऑफ रेफरेंस के फर्क से पैदा होगी। 

पीकू, तुम इतनी देर से क्यों आई…?

कल पीकू देखी…कान्स्टीपेशन, लूज़-मोशन…ऐसे, शब्द जिनका हिंदी शब्द इस्तेमाल करने में भी हमें हिचक महसूस होती है, शुजीत सरकार ने उसे ही केंद्र बनाकर फिल्म बना डाली…एक ऐसी फिल्म जो आपको किसी एक मोशन में नहीं रखती है, बल्कि आपके भीतर पल रहे सैकड़ों इमोशन्स से आपको जोड़ती है.

फिल्म ‘Piku’ इस सभ्यता के पाखंड का निषेध

हर बनारसी के दैनिक जीवन का अंतिम उद्देश्‍य एक ही होता है जिसे दिव्‍य निपटान कहते हैं। अगर यह उद्देश्‍य पूरा न हुआ, तो जीवन किचकिचाया रहता है। पेट का कब्‍ज़, दिमागी कब्‍ज़ में तब्‍दील हो जाता है। ठीक वैसे ही अगर दिमाग में कब्‍ज़ है, तो वह पेट का रास्‍ता ले लेता है। जो जितना सभ्‍य, वो उतना चुप्‍पा और उतना ही कब्‍ज़ी- जैसे अमेरिकी लोग। हमें बचपन से अमेरिकी होना यानी सभ्‍य होना सिखाया जाता है- जोर से मत छींको, खांसो, पादो, इत्‍यादि। यही सब कुंठा बनकर भीतर जम जाता है। सभ्‍यता का दूसरा नाम कब्‍ज़ता भी रखा जा सकता है। 

अब अरशद वारसी ने पत्रकारों से अभद्रता की, ‘बेवकूफाना सवाल’ और ‘आपका दिमाग खराब’ जैसे वाक्य इस्तेमाल किए

ऋषि कपूर के बाद अब अरशद वारसी ने पत्रकारों से अभद्रता कर दी. अरशद वारसी ने अपनी आने वाली फ़िल्म ‘वेलकम टू कराची’ के पत्रकार सम्मलेन में मज़ाक की सीमा लांघते हुए मीडियाकर्मियों के साथ काफ़ी बदतमीज़ी की. हालांकि इसके बाद अरशद ने ट्वीट कर कहा है, “आज मैंने अपने सेंस ऑफ़ ह्यूमर से दो पत्रकारों का दिल दुखा दिया…लगता है मुझे मेरा ह्यूमरस साइड अपने दोस्तों तक ही रखना होगा.”

महाराष्ट्र सरकार के ‘मराठी फिल्म फरमान’ पर पत्रकार, फिल्मकार, लेखक नाराज

नई दिल्ली : ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी एनके सिंह, फिल्म निर्माता मुकेश भट्ट, लेखिका शोभा डे, फिल्मकारों और कलाकारों ने मुंबई के सभी मल्टीप्लेक्स में शाम छह से नौ बजे के शो टाइम पर एक मराठी फिल्म दिखाने के महाराष्ट्र सरकार के फरमान को गैरकानूनी और संविधान के खिलाफ करार दिया है।

भोजपुरी में नए सिनेमा के दरवाजे खोलती एक फिल्म ‘नया पता’

वाराणसी : अक्सर यही होता है, बड़े शहरों, महानगरों में काम के बहाने टिके रहने के बाद जब हम अपने घर, अपनी जमीन पर अपने होने का एहसास तलाशने के लिए लौटते हैं, तो मिलने वाले हर एक के जुबान पर यही सवाल होता है, कब जायेका बा। इसी दर्द को बयां करती है, मेरी फिल्म ‘नया पता’। 

बीबीसी डॉक्‍यूमेंट्री से पाबंदी हटाने पर दिल्ली हाईकोर्ट का इनकार

दिल्ली : हाईकोर्ट ने दिल्ली गैंगरेप पीड़िता ‘निर्भया’ पर बनाई गई बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री के प्रसारण पर लगे प्रतिबंध को हटाने से इनकार कर दिया है। इस मामले में अपील सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे में ये केस प्रभावित हो सकता है। मामले में बीते 9 मार्च को हाई कोर्ट ने लॉ स्टूडेंट विभोर आनंद, अरूण मेनन व कृतिका की अलग-अलग दो जनहित याचिकाओं पर जल्द सुनवाई से इन्कार कर दिया था। हाईकोर्ट ने मामले को मुख्य न्यायाधीश की अदालत में भेजा है। अब इस मामले में सुनवाई 18 मार्च को होगी।

किसको मूर्ख बनाना चाहता है डेरा प्रमुख? फिल्म की कमाई को लेकर बोला बड़ा झूठ

सिरसा । डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह ने अपनी फिल्म से व्यक्तिगत तौर पर बेशक 100 करोड़ से अधिक की कमाई कर ली हो लेकिन फिल्म अभी तक 10 करोड़ रुपए का बिजनेस ही कर पाई है। जी हां, फिल्म की कमाई का निर्धारण करने वाले बॉक्स ऑफिस के आधिकारिक आंकड़ों की मानें तो फिल्म ने पहले सप्ताह में केवल 9.92 करोड़ रुपए की कमाई की। बड़ी बात यह है कि फिल्म निर्माण करने वाली कंपनी के प्रवक्ता द्वारा चार दिन में 61 करोड़ से अधिक कमाई कर लिए जाने संबंधी प्रेस नोट जारी कर दिया गया। इसके बाद छह दिन में 82 करोड़ व एक सप्ताह में 100 करोड़ से अधिक कमाई कर लिए जाने की जानकारी फिल्म के प्रोडक्शन हाउस की तरफ से दी गई।

पत्रकार ज़ैग़म इमाम की फिल्म ‘दोज़ख़ इन सर्च ऑफ़ हेवेन’ 20 मार्च को रिलीज होगी, पेश है सिनॉप्सिस और ट्रेलर

पत्रकार ज़ैग़म इमाम की फिल्म दोज़ख़ इन सर्च ऑफ़ हेवेन 20 मार्च को रिलीज होगी। दोज़ख़ पीवीरं के बैनर तले प्रदर्शित की जा रही है।  ‘दोज़ख – इन सर्च ऑफ हैवेन’ कहानी है वाराणसी स्थित एक छोटे से गांव में बसे एक कट्टरपंथी मुस्लिम नमाज़ी तथा उसके बारह वर्षीय बेटे जानु के साथ उसके रिश्ते की. फिल्म की शुरूआत होती है रोज़मर्रा होनेवाली सुबह की नमाज़ और पुजारी की प्रार्थना से उपजे विवाद से. पडोस में रहनेवाला मुस्लिम नमाज़ी अपने पडोसी हिंदू पुजारी से काफी दुखी है लेकिन उससे भी ज़्यादा दुखी है अपने बारह वर्षीय बेटे के व्यवहार से जिसकी पुजारी के बेटे से घनिष्ट मित्रता है.

‘फरिश्‍ता’ के लेखक ने फिल्‍म ‘पीके’ पर किया साहित्‍य चोरी का मुकदमा

‘‘मैंने 1 जनवरी, 2015 को पीके फिल्‍म देखी तो मैं हैरान हो गया। पीके फिल्‍म मेरे उपन्‍यास फरिश्‍ता की कट /कॉपी /पेस्‍ट है।’’ –कपिल ईसापुरी

अपने इन शब्‍दों में लेखक कपिल ईसापुरी काफी मर्माहत दिखते हैं। प्रेस कॉन्‍फेरेंस कर अपना दर्द बयान करते हैं। लेकिन मीडिया में एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है- लिखता कोई है, दिखता कोई और है, बिकता कोई और है। इस कहावत का व्‍यावहारिक रूप प्रसिद्ध लेखक निर्देशक बी आर इसारा विविध भारती को दिए एक साक्षात्‍कार में इस प्रकार समझाते हैं- ‘‘कम चर्चित साहित्‍यकारों के साहित्‍य की चोरी फिल्‍मी दुनिया में खूब होती है। जब मैं फिल्‍मी दुनिया में आया था। मुझसे कम चर्चित उर्दू साहित्‍यकारों का साहित्‍य पढ़वाया जाता और उसको तोड-मरोड़ कर इस्‍तेमाल कर कर लिया जाता।’’

फिल्मों ने किया देश को एकजुट : लेख टंडन

मुम्बई। भारतीय सिनेमा ने देश को एकजुट करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पहले फ़िल्मों में एक बड़ा उद्देश्य होता था, लेकिन अब उददेश्य को लेकर नहीं, व्यावसायिक दृष्टि से फिल्में बनाई जा रही हैं, इससे आम आदमी सिनेमा से दूर होता जा रहा है। यह बात प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक एवं पटकथा लेखक श्री लेख टंडन ने “भारतीय सिनेमा और सामाजिक यथार्थ” विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन अपने संबोधन में कहीं। मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन 5-6 जनवरी को महाविद्यालय के सभागार में किया गया। अपने संबोधन में निर्देशक लेख टंडन ने कहा कि फिल्में समाज पर अपना गहरा प्रभाव छोडती हैं। भारत एक महान देश है जहां व्यक्ति को अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है। अब यह तो फिल्मकार या साहित्यकार पर निर्भर है कि वह इस स्वतंत्रता का प्रयोग कैसे करता है।

‘पीके’ डाउनलोड कर देखने पर सीएम अखिलेश यादव के कार्यालय ने दी सफाई

लखनऊ : आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘पीके’ को कम्प्यूटर पर ‘डाउनलोड’ करके देखे जाने को लेकर उठे विवाद के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यालय ने आज इस पर सफाई देते हुए अपने कदम को जायज ठहराया है। मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस मामले में ट्विटर पर आधिकारिक बयान पोस्ट किया है, जिसमें कहा गया है कि अखिलेश ने फिल्में डाउनलोड करके देखने की सेवा देने वाले ‘क्लब एक्स मीडिया सर्वर’ की सदस्यता ले रखी है और उन्होंने लाइसेंस लेकर इस सेवा का उपयोग कर ‘पीके’ फिल्म देखी है। ऐसे में उन पर फिल्म के ‘पाइरेटेड’ स्वरूप को देखने के लगाये जा रहे इल्जाम निराधार हैं।

अखिलेश यादव हैकर! : ‘पीके’ फिल्म डाउनलोड कर देखने पर थाने में दी गई तहरीर

यूपी के सीएम अखिलेश यादव ही जब खुद कानून तोड़ने लगे तो प्रदेश में भला कानून का राज कैसे कायम हो सकता है. यही कारण है कि यूपी में जंलराज की स्थितियां सदा बनी रहती हैं. गरीब-गुरबों का बुरा हाल रहता है. ताजी सूचना अखिलेश यादव से जुड़ी है. उन्होंने फिल्म पीके सिनेमा हॉल में जाकर देखने की बजाय इसे अवैध तरीके से इंटरनेट से डाउनलोड कर देखा. फिल्म ‘पीके’ को इंटरनेट से डाउनलोड करके देखने का मामला ‘पायरेसी’ का होता है. इसको लेकर लखनऊ के सोशल और आरटीआई एक्टिविस्ट संजय शर्मा ने विभिन्न जगहों पर शिकायत की है और अखिलेश यादव के खिलाफ एफआईआर लिखाने के लिए लखनऊ के थाना हजरतगंज में तहरीर दी है.

‘ओएमजी’ के आस-पास भी नहीं फटक सकी ‘पीके’

तीन दिन पहले हमने आमिर खान की फिल्म पीके देखी। उसी दिन इस पर लिखने का मन था, पर अचानक हमारे इंटरनेट ने बेवफाई कर दी और तीन के लिए वह मौत के आगोश में चला गया। अब जाकर उनका पुनर्जन्म हुआ है और हमें समय मिला है तो सोचा चलो यार उस दिन की कसर पूरी कर ली जाए। पीके को लेकर लंबा विवाद प्रारंभ हो गया है। वैसे तो इस फिल्म को लेकर पहले से ही आमिर की पहली तस्वीर को लेकर  विवाद हुआ है, लेकिन फिल्म देखने के बाद जहां लगा कि उस तस्वीर को लेकर ऐसा विवाद करना बेमानी है, वहीं इस बात को लेकर अफसोस हुआ कि आमिर की यह फिल्म परेश रावल की फिल्म ओ माय गाड के आस-पास भी नहीं फटक सकी।

Short film ‘Ek Bharatiya Aatma’ by Journalism University gets PRSI Award

: The film was adjudged as the ‘Best Corporate Film’ by PRSI at 36th All India Public Relations Conference held at Jaipur : Bhopal : A short film made by Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism and Communication, ‘Ek Bharatiya Aatma’ was adjudged as the ‘Best Corporate Film’ at 36th All India Public Relations Conference held at Jaipur and was awarded with Public Relations Society of India (PRSI) award. The university has made a film on Makhanlal Chaturvedi’s life and the educational and academic activities of the university titled, ‘Ek Bharatiya Aatma’. The conference was organized at Jaipur from December 19 to 21. The award, on the university’s behalf, was received by the head of Advertising and Public Relations Department, Dr Pavitra Shrivastava and head of Management Department Dr Avinash Bajpai.

विनोद कापड़ी की फिल्म को लेकर परेशान तमाम अशुभचिंतकों और विघ्नसंतोषियों के लिए कुछ जरूरी खबरें…

Ajit Anjum : विनोद कापड़ी की फ़िल्म को लेकर परेशान तमाम अशुभचिंतकों और विघ्नसंतोषियों के लिए ये ज़रूरी ख़बर है. विनोद की फ़िल्म को FOX STAR रिलीज़ करेगा, स्टार इंडिया ने सेटेलाइट का अधिकार ख़रीद लिया है, ये कम बड़ी उपलब्धि नहीं है. न्यूज़रूम से निकलकर फ़िल्म बना लेना उसकी क्रिएटिविटी का एक मुक़ाम है. मैं विनोद कापड़ी को क़रीब बीस सालों से जानता हूँ. क़रीब दस साल तक दूर-दूर से सिर्फ़ उनके काम के बारे में सुनकर और देखकर जानता रहा.

पीके धरती से तीन चीज़ें सीखकर लौटा: भ्रष्‍ट भाषा, झूठ बोलना और अपने बचाव में भगवान का इस्‍तेमाल

Abhishek Srivastava : पीके एलियन था, दूसरे ग्रह का वासी, इस बात को गांठ बांध लीजिएगा। उलट कर कहता हूं:- पीके जैसी बातें करेंगे तो आपको एलियन समझा जाएगा। दूसरे ग्रह पर भेज दिया जाएगा। दुनिया में रहना है तो दुनिया के जीके से चलो, पीके से नहीं।

‘हिंदी समय’ का इस बार का अंक सिनेमा पर केंद्रित

मित्रवर, सिनेमा एक ऐसी कला है जिसमें सारी कलाएँ आकर गलबहियाँ करती हैं। साहित्य, संगीत, चित्रकला, नृत्य, फोटोग्राफी सभी कलाएँ यहाँ मिल-जुलकर काम करती हैं। यही नहीं, सिनेमा में तकनीकि भी आकर कला के साथ ताल से ताल मिलाती नजर आती है। किसी एक फिल्म में दिखने वाले और न दिखने वाले हजारों लोगों की मेहनत शामिल होती है। ऐसी सामूहिकता किसी भी अन्य कला विधा में संभव नहीं। इसलिए यह अनायास नहीं है फिल्मों का जादू हम सब के सिर चढ़ कर बोलता है। हमने हिंदी समय (http://www.hindisamay.com) का इस बार का अंक सिनेमा पर केंद्रित किया है। हमें उम्मीद है कि हमारी यह विनम्र कोशिश आपको अपनी सी लगेगी।

स्मृति शेष : अंग्रेजी भाषा की मोहताज रही सिने पत्रकारिता को श्रीराम ताम्रकर ने हिंदी के जरिए नयी उड़ान दी

वरिष्ठ फिल्म समीक्षक श्रीराम ताम्रकर पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे.  ताम्रकर की अंतिम इच्छानुसार उनके नेत्रदान कर दिए गए ताकि उनकी आंखें फिल्म देखती रहे. 9 नवंबर 1938 को जन्मे ताम्रकर की कलम से लगभग 50 किताबें निकलीं. उन्होंने हिन्दी फिल्मों के ज्ञान कोश की पाण्डुलिपि कुछ ही दिन पहले तैयार की थी. वह अपनी इस महत्वाकांक्षी पुस्तक पर कई वर्षों से काम कर रहे थे. ताम्रकर ने गुजरे 50 वर्षों में अलग-अलग अखबारों और पत्रिकाओं में फिल्मी विषयों पर लगातार स्तंभ लेखन और संपादन किया. वह इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में पिछले दो दशक से सिनेमा विषय पढ़ा रहे थे. ताम्रकर अपने प्रशंसकों के बीच ‘फिल्म जगत के इनसाइक्लोपीडिया’ के रूप में मशहूर थे. उन्हें मुंबई की दादा साहेब फालके अकादमी का ‘वरिष्ठ फिल्म पत्रकार सम्मान’ (2010) और मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म आलोचक’ सम्मान (1992) समेत कई अलंकरणों से नवाजा गया था. ताम्रकर प्रदेश के आदिम जनजाति प्रथम अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के जूरी तथा लता मंगेशकर अलंकरण समिति के बरसों तक सदस्य भी रहे हैं. अंतिम संस्कार जूनी इंदौर मुक्तिधाम पर उनका किया गया, जहां वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा, प्रभु जोशी, तपन भट्‍टाचार्य, सरोज कुमार, कृष्ण कुमार अष्ठाना तथा वेबदुनिया डॉट कॉम के संपादक जयदीप कर्णिक समेत कई गणमान्य नागरिकों व फिल्म समीक्षकों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी.

कलम के जरिए रंगदारी वसूल करने वालों का गिरोह बनती जा रही है मीडिया

: फूलन ने बिना रुपया दिए फोटो लेने वाले दिल्ली के पत्रकार को थप्पड़ जड़ दिया था! : भिंड में ‘दद्दा मलखान सिंह’ फिल्म की इन दिनों चल रही शूटिंग कई पुरानी स्मृतियों को कुरेद गई। मलखान सिंह के समर्पण के समय पत्रकारिता मुनाफा कमाने के धंधे में तब्दील नहीं हो पाई थी। व्यवसायीकरण की चपेट में आने के बाद समाज में वैचारिक चेतना के विकास की जरूरत पूरी करने के लिए अवतरित की गई यह विधा किस तरह से सच के लिए संघर्ष के दावे के तले फरेब और झूठ का व्यापार बन गई, उन दिनों इसकी पहली झलक मुझे देखने को तो मिली लेकिन यह बात उस दौर में इतनी अनजानी थी कि उस समय लोग बहुत गंभीरता से इसे संज्ञान में नहीं ले सके थे।

दैनिक भास्कर ने कुछ संस्करणों में ‘जेड प्लस’ फिल्म के लेखक रामकुमार सिंह का नाम रिव्यू से हटाया

Ajay Brahmatmaj : जयप्रकाश चौकसे के कॉलम ‘पर्दे के पीछे’ से दैनिक भास्‍कर के जयपुर समेत कुछ संस्‍करणों में फिल्म के लेखक Ramkumar Singh का नाम हटा दिया गया। पत्रकार बिरादरी की तुच्‍छता है यह। यह शर्मनाक और दुखद है। फिलहाल जयप्रकास चौकसे को पढ़ें और कल फिल्‍म देखने का फैसला करें। शेयर करें और दूसरों को पढ़ाएं।

मुंबई के वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज के फेसबुक वॉल से.

सुभाष घई जब इस लड़की को हमबिस्तर करने के लिए राजी नहीं कर पाता तो उसके सामने masturbation करने लगता है!

Chandan Srivastava : इजराइल मूल की रीना गोलान ने इस किताब में बताया है कि बॉलीवुड में किस हद तक एक लड़की को सेक्स प्रोडक्ट समझा जाता है. बड़े-बड़े सितारे कितने रीढविहीन होते हैं. चाहे वो नचनिया शाहरुख हो या कोई और. परदेस जैसी फिल्म बनाने वाला सुभाष घई जब इस लड़की को हमबिस्तर करने के लिए राजी नहीं कर पाता तो कैसे उसकी आंखों के सामने ही masturbation करने लगता है.

‘हैदर’ जैसी फिल्में भारतीय लोकतंत्र में ही संभव है : आशीष विद्यार्थी (इंटरव्यू)

आशीष विद्यार्थी आला दर्जे के कलाकार होने के साथ-साथ सबसे घुल-मिल कर रहने वाले एक आम इंसान भी हैं। बीते 12 दिनों से आशीष इस्पात नगरी भिलाई में यहीं के पले-बढ़े युवा निर्देशक केडी सत्यम की फिल्म ‘बॉलीवुड डायरी’ की शूटिंग में व्यस्त थे। शूटिंग कभी सुबह 10 बजे से रात 12 बजे तक चली तो कभी अगली सुबह 6 बजे तक। शूटिंग के बीच-बीच में जब भी वक्त मिला, आशीष ने टुकड़ों-टुकड़ों में बातचीत की। इस बीच वह सबसे खुल कर मिलते भी रहे। इसके बाद मुंबई रवाना होने से पहले उनके साथ बातचीत का फाइनल दौर चला। आशीष विद्यार्थी मानते हैं कि बीते तीन दशक के मुकाबले आज ज्यादा बेहतर फिल्में बन रही हैं। फिल्मों की व्यस्तता के बीच उन्हें थियेटर को कम वक्त देने का मलाल भी है। हाल की अपनी फिल्म ‘हैदर’ को लेकर वह खुल कर प्रतिक्रिया देते हैं। उनका मानना है कि ‘हैदर’ जैसी फिल्में भारतीय लोकतंत्र में ही संभव है। आशीष विद्यार्थी से हुई पूरी बातचीत सवाल-जवाब की शक्ल में-

‘हैप्पी न्यू इयर’ : लगता है कि यह किंग खान अब उन्हीं दो गलतियों के साथ रह जाएगा…

Ramji Tiwari : ‘हैप्पी न्यू इयर’ उतनी ही महान फिल्म है, जितनी कि ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘ओम शान्ति ओम’, ‘ डान’ और ‘रा.वन’। वैसे पचीस साल के कैरियर में इस किंग खान ने जो दो गलतियाँ (पूरा चक दे इंडिया- आधा स्वदेस और आधा देवदास ) की हैं, लगता है कि यह खान अब उन्ही दो गलतियों के साथ रह जाएगा।

आम आदमी का आक्रोश फूटा ‘सरकारी दफ्तर’ में

आम दिनों की तरह ‘सरकारी दफ्तर’ में गहमा-गहमी का माहौल था। बाबू अपने ढर्रे पर काम कर रहे थे। तभी परेशानहाल एक आम आदमी आया। सरकारी दफ्तर का चक्कर काटते परेशान हो चुके इस आम आदमी आक्रोश अचानक फूट पड़ा। आम आदमी के इस तेवर को देखकर सरकारी दफ्तर के तमाम लोग भी सन्न रह गए। दरअसल यह एक छोटा सा दृश्य था छत्तीसगढ़ भिलाई में पले-बढ़े युवा निर्देशक केडी सत्यम की हिंदी फिल्म ‘मुंबई डायरी’ का।

यूट्यूब पर ‘संतोष आनंद’ टाइप किया तो वही एपिसोड फिर से आँखों को नम कर गया

याद है मुझे जब पहली बार ‘शोर’ फिल्म का गाना ‘एक प्यार का नगमा’ सुना था तो बरबस ही आँखों में आँसू आ गए थे। उसके बाद यह मेरे पसंदीदा गानों की सूची में आज भी मेरे मोबाइल में है। बुधवार की सुबह मथुरा से अपने न्यूज चैनल के माध्यम से पता चला कि कोसीकलां में एक दम्पति ने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली। कई अन्य ख़बरों की तरह ये भी आई गयी हो गयी। लेकिन जब थोड़ी देर बाद तस्वीर सामने आयी, तो उस ४ साल की बच्ची को देखकर बड़ा दुःख हुआ जो बच गयी थी, कितनी प्यारी है… बस यही शब्द निकले मेरे जेहन से, और कुछ देर बाद सामान्य हो गया।