पहाड़ के जंगल

पहाड़ समस्त प्राणी जगत के मूलाधार हैं। पारिस्थितिकी और जैव विविधता के आश्रय स्थल हैं। बशर्ते कि पहाड़ विविध प्रजाति के जंगलों से आच्छादित हों। ‘पहाड़’ शब्द की कल्पना मात्र से मस्तिष्क में बर्फ की सफेद चादर से ढके हिमालय, श्रृंखलाबद्ध पहाड़ियों में गहनों की भांति सजे हरे वृक्ष, झरने, गाड़-गधेरे और कल-कल करती नदियों का चित्र उभर आता है। पेड़ ,पानी और पहाड़ का वजूद एक-दूसरे से गहरे तौर पर जुड़ा है। पहाड़ हैं तो पेड़ हैं और पेड़ हैं तो पानी। ये सब मिलकर पहाड़ को ‘पहाड़’ बनाते हैं। इनके बगैर पहाड़, पानी और पर्यावरण की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इनमें से एक भी पक्ष के कमजोर होने से पूरा पहाड़ बिखर जाता है। वन विहीन पहाड़ के कोई मायने नहीं होते। पर अनियोजित और लापरवाह प्रबंधन तथा निहित स्वार्थों के चलते आज पहाड़ की पहचान और वजूद दोनों संकट में हैं। उत्तराखंड के जंगलों में साल -दर-साल आग लगने की घटनाओं से यहाँ के जंगल और पहाड़ों के ऊपर मंडरा रहे खतरों की आहट को महसूस किया जा सकता है। इस बहाने मनुष्य और जंगलों के बीच आदिम युग से चले आ रहे अटूट रिश्तों के बिखरने की वजहों की पड़ताल की जानी जरूरी है।