The plot was not ‘gifted’ directly to each and every journalist…

Abhinandan Mishra

The confession of just another presstitute

Recently, the Caravan magazine brought out an article detailing how almost 300 Madhya Pradesh based journalists cutting across every newspaper, channels and what not, were allotted plots in Bhopal by the Shivraj Singh Chouhan government in the early years of 2000.

The plot was not ‘gifted’ directly to each and every journalist, rather a cooperative was created that was headed by some journalists, who had more accessibility in the government than their fellow brothers, and later it was distributed ‘unequally’ among all the journalists. What Caravan did not mention was that the bigger journalists got themselves allotted more than one plot while many of them, who earn less than Rs 25000 per month and are on their last curve of their career, did not get even one plot. (I did not get any plot, nor I applied for).

Caravan also did not mention that even if these poor journalists would have got the plot, they would have to again seek government’s help to build a house on these plots. It would have been an even bigger eye opener if Caravan or for that any media houses had done a story on the salaries the journalists get.

Those who swear by ‘presstitutes’ and  prefer painting every journalists with the same brush  might not know that the salary of a journalist is barely enough to cover his household expense and I am not referring to the fresh graduates who are just out of college but those who have been slogging it out for 15 -20 years. The situation is worse for those who are working in Hindi newspaper.

Let me try to bring this out by an example. A Bhopal based bureau chief of a well known Hindi newspaper who is in his late 50s and had been in journalism for more than 20 years now was getting a salary of Rs 53000 when I last met him in January this year. His junior colleague, who was around 42, was getting Rs 42000.  Now keep yourself in the place of these two people and imagine the expenses that they have to incur to run their house, finance the study of their children and eventually arrange for the expense of their marriage.

Let me bring you to English media. Someone like me, who is in the middle position, will be fortunate enough if his annual package is Rs  6-7 lakhs. I have many friends who are not getting even that. By the time I step into my 40s, after giving 12-14 years of time into journalism, my only desire would be that my annual salary at least reaches upto Rs 10 lakhs.

Do keep in mind that media in India is a highly unregulated field, except two or three organizations, the concept of basic employee welfare, like annual appraisal, good hike, yearly paid leaves, bonuses, something that people working in other fields treat as their fundamental rights, does not exist for journalists working in Media.

Today, the recommendation of the 7th pay commission were cleared by the cabinet and the hike that the government employees will get is something that a journalist can only think  of and sometime wish for. There is no pay commission for the journalists, only a holy albatross round the neck that they represent the esteemed ‘fourth estate’ and hence are prone to more public abuse and scrutiny.

Neither the government, this one included, nor the Maalik log are interested in increasing the salaries of journalists. When the recommendation of the Majithia pay commission for print media were to be executed, the Maalik log, showing great solidarity, pressed the best legal mind of the country into their service to make sure that the salaries of the ‘presstitutes’ remain abysmally low and despite the recommendations being finally upheld by the Supreme court in 2014, it has yet not been executed in almost 80 percent of the newspaper.

Forget the shouting and suave anchors and presenters you have been watching on the TV. Forget the stories, sometimes fictitious, mostly real that you read and hear about the personal wealth of these star reporters and editors. They represent a miniscule of the journalists fraternity because the rest of the journalists, who do not have the inclination and the guts to seek money through other means, they pass into oblivion with a small retirement send off party and if they are lucky enough, they can spend their remaining time in a small house that they might have been able to build with their modest income.

No Member of parliament, no minister and no PM has ever spoken about the abysmally low salaries the majority of journalists get. I wish the government would make it mandatory for every journalist to declare their income, for at least then there will be some sense of clarity among the readers and the viewers.

No high profile journalists does a show on why Majithia is not being implemented, Ravish and Goswami alike. Maybe they are not allowed to do so by the maalik log or maybe they do not need a pay hike. When I had asked the ever active ‘Justice Katju” when he was the chairman of Press council of India that why did he not push for the implementation of Majithia and what did he do in his tenure as the PCI chairman except berating the same journalists whom he was expected to support, the man did the easiest thing, he blocked me on Twitter.

So next time you use the word bikau media and presstitutes, do say a prayer for a majority of the journalists because the only thing that they are paid their whole life is a salary that swings between modest and low.

पत्रकार Abhinandan Mishra के ब्लाग से साभार. संपर्क :

मूल खबर….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आजतक और न्यूज नेशन के दलाल पत्रकार गिरीश नागर पर लाखों की ठगी का आरोप

बूंदी में लगातार पत्रकारिता का स्तर गिरता जा रहा है. पिछले कुछ दिनों में 5 से अधिक पत्रकार चौथवसूली करने तथा आम जन के साथ लाखों की ठगी करने के मामले में जेल की हवा खा चुके हैं. आज बूंदी में एक बार फिर आज तक, न्यूज़ नेशन और राजस्थान से संचालित फर्स्ट इंडिया न्यूज़ का एक रिपोर्टर गिरीश नागर विवादों में है. इस बार आरोपी गिरीश नागर के खिलाफ सदर थाना पुलिस ने अवैध चिटफंड कंपनी का संचालन करने के आरोप में मामला दर्ज किया है.

पत्रकार गिरीश नागर पर आम जनता से इनामी कंपनी की लॉटरी में कार, एंड्रायड फोन देने जैसी स्कीम दिखाकर पैसे ऐंठने का भी आरोप है. इस स्कीम को लेकर लोगों ने पुलिस में शिकायत की. पुलिस ने आजतक सहित दो न्यूज़ चैनलों के रिपोर्टर गिरीश नागर के नैनवा रोड स्थित ऑफिस में दबिश दी लेकिन आरोपी सूचना लगने के तुरंत बाद मौके से फरार हो गया था. पुलिस ने परफेक्ट डील कंपनी के नाम से संचालन करने वाले गिरीश नागर के खिलाफ मामला दर्ज किया है और मौके से 4 लोगों को इस मामले में गिरफ्तार किया है.

इस मामले में गिरीश नागर और एक अन्य आरोपी फरार हैं जिनकी तलाश बूंदी पुलिस कर रही है. पुलिस ने जल्द गिरफ्तारी के संकेत दिए हैं. अब सवाल यह है कि क्या आज तक, न्यूज़ नेशन, फर्स्ट इंडिया अपने रिपोर्टर को पैसे नहीं देते जो कि आये दिन कुछ न कुछ धोखाधड़ी करता रहता है. इस बार तो पत्रकार ने 4 हजार से अधिक लोगो के साथ ठगी की है और ठगी की राशि लगभग 50 लाख रुपये है. इसने 15 सौ रुपये प्रत्येक व्यक्ति से लाटरी में इनाम निकलने के नाम पर लिए हैं. फिलहाल पुलिस ने सभी आरोपियों को कोर्ट में पेश किया है जहां से कोर्ट ने 14 दिन की जेल भेज दिया है। आरोपी गिरीश नागर पुलिस गिरफ्त से दूर है. इस मामले में जारी पुलिस प्रेस नोट और अख़बार में छपीं खबरें संलग्न हैं.

बूंदी से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

ई-कचरे में तब्दील हो जाएंगे रिलायंस के 50 लाख मोबाइल!

सीडीएमए सिम बंद होने से डब्बा हो रहे हैं रिलायंस मोबाइल, 4 जी के लिये नये मोबाइल खरीदने पर ग्राहकों का डबल नुकसान

4जी नेट की तकनीक लेकर आ रहे रिलायंस कम्यूनिकेशन ने मोबाइल मार्केट में हलचल मचा रखी है लेकिन उससे भी ज्यादा परेशान उसके वे ग्राहक हो रहे हैं जो अभी तक रिलायंस सीडीएमए सेवा का उपयोग कर रहे थे। कम्पनी अपने 50 लाख से ज्यादा सीडीएमए ग्राहकों की सिम को 4 जी में अपग्रेड कर रही है। इसके चलते इसके ग्राहकों को जहाँ नया मोबायल खरीदना पड़ रहा है वहीं उनके पुराने सीडीएमए मोबाइल डब्बों में तब्दील हो रहे हैं। इन मोबाइल में कोई भी जीएसएम सिम प्रयोग में नहीं लायी सकती है।

ग्राहकों के सामने दूसरी कम्पनियों की सीडीएमए सेवा उपयोग के भी ज्यादा विकल्प मौजूद नहीं हैं। अभी टाटा इंडिकॉम, एमटीएस के साथ कहीं-कहीं बीएसएनएल, एमटीएनएल ही सीडीएमए सेवा दे रहे हैं, इनमें भी जल्द ही इस सेवा के बंद होने के आसार हैं। बाकि रिलायंस के बहुत सारे मोबाइल में केवल रिलायंस की ही सिम प्रयोग में लायी जा सकती है। एैसे में सीडीएमए सिम ऑपरेट कर रहे यह रिलायंस मोबाइल केवल ई-कचरा बनकर रह जायें तो कोई आश्चर्य नहीं है।

कम्पनी ने नहीं किया किसी योजना का खुलासा

रिलायंस ने सीडीएमए सेवा बंद करने के चलते बेकार हुये मोबाइल सेट्स को लेकर अभी किसी योजना का खुलासा नहीं किया है। फिलहाल इसमें ग्राहकों का भारी नुकसान हो रहा है। उन्हें ना चाहते हुये भी दूसरा जीएसएम मोबाइल खरीदना पड़ रहा है। अपुष्ट सूत्रों का कहना है कि कम्पनी किसी एैक्सचैंज ऑफर के तहत अपने सीडीएमए मोबाइल को लेकर अपने ग्राहकों को राहत दे सकती है।

बीएसएनएल ने बदले हैं अपने सीडीएमए सेट्स

हॉल ही में झारखण्ड में बीएसएनएल ने अपनी सीडीएमए सेवा बंद करने से पहले अपने ग्राहकों के मोबाइल फोन मुफ्त में बदलकर दिये हैं। जानकारों का कहना है कि इन बेकार सेटों का उचित प्रकार से नष्ट होना पर्यावरण हित में जरूरी है। प्रयोग में ना आने के चलते यह ई-प्रदूषण बढ़ाने में सहायक होंगे। कम्पनी ही इनका उचित निपटान कर सकती है।

उपभोक्ता पूछ रहे हैं पुराने फोन का क्या करें?

एक वेबसाईट पर रिलायंस सेवा के बारे में लिखी अपनी पीड़ा में मुंबई के एक कस्टमर ने कहा कि रिलायंस के अपने बेसिक फोन पर भी सीडीएमए सेवा बंद करने से उसका फोन डिब्बा बन गया है। कम्पनी 1800 रूपये में नया फोन दे रही है अब वह इस फोन का क्या करें। उसके नुकसान की भरपाई कौन करेगा । एक उपभोक्ता का प्रश्न था कि किसी सेवा को बन्द करने के चलते होने वाली असुविधा व नुकसान के लिये क्या कम्पनी की कोई जिम्मेदारी नहीं है। हमने केवल रिलायंस के लिये छः माह पहले महंगा एचसीटी का सीडीएम मोबायल सेट खरीदा है अब यह सिम बंद होने से वह कूड़ा बन जायेगा। ऐसे में इस फोन का क्या करें।

ई-कचरे से बचना जरूरी

संयुक्त राष्ट की संस्था ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनीटर 2014 के अनुसार भारत ई-कचरा पैदा करने वाला विश्व में पाँचवा सबसे बड़ा देश है। 2015 के आकड़ों के अनुसार भारत में इलेक्ट्रानिक्स एवं इलेक्ट्रिकल्स आदि का 17 लाख टन ई-कचरा निकला था। इसमें 5 प्रतिशत कम्पयूटर उपकरण एवं मोबाइल आदि का ई-कचरा शामिल था। रिलायंस के माजूदा कनैक्शन ग्राहक संख्या 11 करोड़ के करीब है। उसमें सबसे पुराने जुड़े हुये सीडीएमए ग्राहक 50 लाख से ज्यादा हैं। ऐसे में 50 लाख से ज्यादा मोबायल सैट ई-कचरा बन जायगें। उचित निपटान ना होने से यह पर्यावरण के लिये नुकसानदेय साबित हो सकते हैं। गौरतलब है कि इनमें सिलीकॉन, केडमियम, सीसा, क्रोमियम, पारा व निकल जैसी भारी धातुओं का उपयोग किया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार पर्यावरण में असावधानी व लापरवाही से इस कचरे को फेंका जाता है, तो इनसे निकलने वाले रेडिएशन शरीर के लिए घातक होते हैं। इनके प्रभाव से मानव शरीर के महत्वपूर्ण अंग प्रभावित होते हैं। कैंसर, तंत्रिका व स्नायु तंत्र पर भी असर हो सकता है।

लेखक जगदीश वर्मा ‘समन्दर’ से संपर्क के जरिए किया जा सकता है.

इसे भी पढ़ें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बड़ौदा ग्रामीण बैंक ने एक निजी कंपनी का बीमा अपने ग्राहकों को जबरन बेचना शुरू किया

अटल पेंशन योजना व प्रधानमन्त्री बीमा योजना को ठेंगा दिखाकर आजकल बड़ौदा ग्रामीण बैंक एक निजी कंपनी का बीमा अपने ग्राहकों को जबरन बेंच रही है। इसके लिये शाखा प्रबन्धकों पर जबरन पॉलिसी बेचने का दबाव है। जो प्रबन्धक इस बीमा कंपनी इंडिया फर्स्ट की पॉलिसी नहीं बेचेंगे उन्हें चार्जशीट मिलेगी। उत्पीड़न होगा और इन्क्रीमेंट रुकेगा। इस बीमा कंपनी का कोई कर्मचारी नहीं, अधिकारी नहीं व अभी तक यूपी में कोई कार्यालय भी नहीं।

बैंकों पर दबाव डालकर बड़ौदा यूपी ग्रामीण बैंक के चेयरमैन ने अब तक ग्राहकों की मर्जी के बिना उनके खातों से पैसा सीधा इस बीमा कंपनी के खाते में डाल दिया। शिकायत यह भी है कि बड़ी संख्या में इस बीमा कंपनी के बॉन्ड ग्राहकों को नहीं मिल रहे हैं। सवाल उठता है कि बैंक जहां अधिकारियों कर्मचारियों की संख्या पहले से कम है, वहां कोई निजी बीमा कंपनी अगर बैंक संसाधनों व अधिकारियों से अपना व्यवसाय कराएगी तो आम उपभोक्ताओं का क्या होगा।

ये वो संदेश है जो सभी ब्रांच मैनेजरों को भेजा गया है…

All BH’s are advised to login atleast 2 new indiafirst mahajivan policies and maximum renewels on login days, scheduled on 19-5-2016 & 20-5-2016

रिपोर्ट- अनिल मधुकर, संपर्क :

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राजस्थान के गृहमंत्री कटारिया पड़ गए ‘भूत’ के चक्कर में!

दिल्ली से प्रकाशित ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ नामक मैगजीन के सम्पादक पवन कुमार भूत ने पैसों में प्रेस कार्ड बेचकर देशभर में हजारों पत्रकार बना दिए है। किरण बेदी सहित देशभर के कई बड़े पुलिस अधिकारियों को चकमा देकर उनके नाम का इस्तेमाल कर चुके इस भूत के चक्कर से राजस्थान के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया भी बच नहीं सके।  हाल ही में पवन कुमार भूत ने उदयपुर स्थित विज्ञान समिति हॉल में अपनी मैगजीन ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ का लोकापर्ण किया। यहां यह बताना जरूरी है कि यह मासिक पत्रिता एक दशक से अधिक समय से यदाकदा प्रकाशित होती रही है। साथ ही यह भी बताना अत्यन्त आवश्यक है कि इस प्रकार के लोकापर्ण समारोह के लिए इसका प्रकाशन अधिक हुआ है। उदयपुर में आयोजित हुए लोकापर्ण समारोह में पवन कुमार भूत ने राज्य के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया को बतौर मुख्य अतिथि बुला लिया। कटारिया भी बना जाने भूत के चक्कर में पड़ गए और लोकापर्ण समारोह में चले गए।

पुलिस व प्रेस के नाम पर ठगी का गोरखधंधा
यूं तो हिन्दूस्तान की जनता को कई शातिर लोग विभिन्न तरीकों से ठग रहे है। इस मामले में प्रेस (मीडिया) के माध्यम से जनता को ठगा जा रहा है। पवन कुमार भूत द्वारा क्रमशः 2500 और 10,000 रुपए में प्रेस कार्ड दिए जाते रहे है। यूं तो पवन कुमार भूत बताता हैं कि उसकी मासिक पत्रिका के माध्यम से भारत में बढ़ रहे अपराध के ग्राफ को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। वह बताता हैं कि पुलिस व पब्लिक के बीच सामंजस्य स्थापित करने लिए उसकी मासिक पत्रिका एक पहल है। पर सच्‍चाई इससे अलग है। पवन भूत अपनी मासिक पत्रिका (जो कि कभी कभार ही छपती है) के रिपोर्टर बनाने के नाम पर लोगों से 2500 और 10,000 रुपए लेकर प्रेस कार्ड देता है। ऐसे ऐसे लोगों को प्रेस कार्ड दिए गए है जो पत्रकारिता से कोई ताल्लुक नहीं रखते है। ड्राइवर हो या व्यापारी, मिस़्त्री हो या ठेकेदार, सभी को प्रेस कार्ड दिए जा रहे है।

एक ही शहर में सैकडों रिपोर्टर
एक शहर में किसी समाचार पत्र अथवा पत्रिका के 1, 2, 3 या 4 संवाददाता होते है, जो अलग-अलग मुद्दों पर लिखने का काम करते है लेकिन ’’पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के एक ही शहर में सैकड़ों-सैंकड़ों रिपोर्टर है। गुजरात के सूरत, बड़ोदा, गांधीनगर, महाराष्ट्र के मुम्बई, कोलकत्ता, दिल्ली, फिरोजाबाद, रांची, धनबाद में 100-100 से अधिक प्रेस कार्डधारी संवाददाता है। राजस्थान भी इससे अछूता नहीं रहा है, राजस्थान के जयपुर, भीलवाड़ा, अजमेर, पाली के बाद अब उदयपुर जिले में इसने रूपए लेकर प्रेस कार्ड बांटने का कार्य आरम्भ किया है।

ऐसे की जाती है ठगी
पवन भूत विभिन्न माध्यमों से ‘‘संवाददाताओं की आवश्यकता’’ के आशय का विज्ञापन प्रकाशित करवाता है। पहले विज्ञापन में किरण बेदी के साथ वाला फोटो प्रकाशित करवाता था। इसने समय-समय पर किरण बेदी सहित कई आईपीएस अधिकारियों, मंत्रियों व नामीगिरामी हस्तियों के हाथों अपनी मासिक पत्रिका का विमोचन करवाकर उनके फोटोग्राफ का इस्तेमाल विज्ञापनों में किया। इसके कारनामों के बारे में जब किरण बेदी को अवगत कराया गया तो किरण बेदी ने पवन कुमार भूत को लताड़ लगाकर इतिश्री कर ली। विज्ञापन देखकर जरूरतमंद लोग विज्ञापन में दिए पते पर सम्पर्क करते है। अमूमन लोग ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ को किरण बेदी का उपक्रम समझ कर भी सम्पर्क करने चले जाते थे। जहां उनसे रिपोर्टर फीस के नाम पर रुपए वसूल कर संवाददाता का फार्म भरवाया जाता और मैगजीन के सदस्य बनाने का काम सौंपा जाता।

रुपए देकर रिपोर्टर बना व्यक्ति मैगजीन के सदस्य बनाना शुरू करता है। उसे सदस्यता राशि का 25 प्रतिशत दिया जाता है। 1 वर्ष, 2 वर्ष और आजीवन सदस्यता के नाम पर लोगों से रुपए लिए जाते है और वादा किया जाता है कि उनकी सदस्यता अवधि तक उन्हें डाक द्वारा मैगजीन भेजी जाएगी और दुर्घटना बीमा करवाया जाएगा। लेकिन उन्हें ना तो मैगजीन भेजी जाती है और ना ही किसी प्रकार का दुर्घटना बीमा करवाया जाता है। सदस्य बने लोगों को दिया जाता है तो महज सदस्यता कार्ड। जिस पर बड़े अक्षरों में ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ भी लिखा होता हैं, जिसे लोक ‘‘प्रेस कार्ड’’ समझकर खुश हो लेते है।

सब कुछ जानते हुए चुप हैं किरण बेदी
इस धोखाधड़ी के बिजनेस में पवन भूत ने किरण बेदी के नाम का खूब उपयोग किया। लम्बे समय तक किरण बेदी को अपनी कंपनी का पार्टनर बताकर लोगों को विश्‍वास में लेता रहा। जानकारी के अनुसार उसने किरण बेदी द्वारा पुलिस पब्लिक प्रेस का विमोचन करवाया तथा कई सेमीनारों में मुख्यवक्ता के रूप में बुलाया। विमोचन व सेमीनारों में किरण बेदी के साथ खिंचवाई गए फोटोग्राफ को पवन भूत ने पेम्पलेट, अखबारों आदि में प्रकाशित करवाया ताकि लोग ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ पर विश्‍वास करे और उससे जुड़े।

यही नहीं पवन भूत ने नेशनल टॉल फ्री नंबर 1800-11-5100 का आरंभ भी किरण बेदी के हाथों करवाया। हालांकि यह नंबर दिखावा मात्र है। पवन भूत का कहना था कि पुलिस अगर किसी की जायज शिकायत पर कार्यवाही नहीं करती है तो वो हमारे टोल फ्री नंबर पर कॉल कर सकता है, तब पुलिस पब्लिक प्रेस द्वारा उसकी मदद की जाएगी। यह लोगों को आकर्षित करने का तरीका महज है। पवन भूत ने अपनी वेबसाइट, अपनी मैगजीन व विभिन्न अखबारों इत्यादि में दिए गए विज्ञापन में किरण बेदी का फोटो प्रकाशित कर किरण बेदी के नाम को खूब भूनाया है। इस पूरे मामले में किरण बेदी से सम्पर्क कर जानने की कोशिश की तो उन्होंने केवल इतना कह कर कॉल डिस्कनेक्ट कर दिया कि – ”मैं ‘पुलिस पब्लिक प्रेस‘ के साथ नहीं हूं।”

पवन भूत के खिलाफ ठगी की कई शिकायतों के बावजूद किरण बेदी का महज यह कह देना कि मैं उसके साथ नहीं हूं . . क्या पर्याप्त है ? किरण बेदी द्वारा पवन भूत के खिलाफ कोई कार्यवाही करवाने की बजाए चुप रहना किरण बेदी की भूमिका पर सवालिया निशान है।

18 से अधिक बैंकों में खाते
कई राज्यों के लोगों को मूर्ख बनाकर अब तक करोड़ो रुपए ऐंठ चुके पवन कुमार भूत के देशभर के 18 से भी अधिक बैंकों में खाते है। सारे नियमों व सिद्धान्तों को ताक में रख कर व कानून के सिपाहियों की नाक के नीचे पवन कुमार भूत देश की जनता को ठग रहा है। जनता को भी प्रेस कार्ड का ऐसा चस्का लगा है कि बिना सोचे समझे रुपए देकर प्रेस कार्ड बनवा रहे है। जानकारी के अनुसार पवन कुमार भूत ने 2006 में ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ नाम की मासिक पत्रिका आरंभ की थी। शुरू में वह 1000 रुपए लेकर अपनी मासिक पत्रिका के रिपोर्टर नियुक्त करता था तथा रिपोर्टर के माध्यम से लोगों से 200 रुपए लेकर पत्रिका के द्विवार्षिक सदस्य बनाता था। आजकल वो राशि कई गुना बढ़ गई है। इतने बैंकों में खाते खुलवाने के पीछे पवन भूत का मकसद है कि जिस रिपोर्टर के क्षेत्र जो भी बैंक हो उस बैंक में वो सदस्यता शुल्क तुरन्त जमा करवा सके।

ना बीमा करवाए और ना ही मैगजीन भेजी
5 साल पहले पवन भूत ने रिपोर्टर फीस बढ़ाकर 1000 रुपए से 2500 रुपए कर दी तथा पत्रिका के सदस्य बनाने के लिए भी दो प्लान बनाए। अब वह प्लान के अनुसार रिपोर्टरों से पत्रिका के सदस्य बनाने लगा। 400 रुपए में द्विवार्षिक सदस्यता व 3000 रुपए में आजीवन सदस्यता दी जाने लगी। द्विवार्षिक सदस्य को 1 वर्ष की अवधि के लिए 1 लाख रुपए का दुर्घटना मृत्यु बीमा देने, पुलिस पब्लिक प्रेस का सदस्यता कार्ड व पुलिस पब्लिक प्रेस के 24 अंक डाक द्वारा भिजवाने का एवं आजीवन सदस्य को 1 वर्ष की अवधि के लिए 2 लाख रुपए का दुर्घटना मृत्यु बीमा देने का वादा किया गया।

रिपोर्टर बने सैंकड़ों लोगों द्वारा बनाए गए सदस्यों को महज ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के सदस्यता कार्ड के अलावा कुछ नहीं दिया गया। हां कभी कभार मैगजीन भेजी गई। प्रेस कार्ड व सदस्यता कार्ड की मार्केट में जबरदस्त मांग के चलते 2012 में पवन भूत ने पुलिस पब्लिक प्रेस की सदस्यता राशि बढ़ा दी, वार्षिक सदस्यता शुल्क 400 रुपए, द्विवार्षिक सदस्यता शुल्क 1000 रुपए व आजीवन सदस्यता शुल्क 3000 रुपए कर दिए गए। एसोसिएट रिपोर्टर की फीस 10,000 रुपए कर दी, जिसे आजीवन सदस्यता मुफ्त दी जाने लगी।

भीलवाड़ा जिले के कोशीथल गांव के प्रवीण दमामी, उमर मोहम्मद, पालरां निवासी मोहन लाल तेली, मोखुन्दा निवासी अशोक पोखरना, मो. कमरूद्दीन सहित सैकड़ों लोगों ने ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ की दो वर्ष की सदस्यता ली थी। दो वर्ष बीत गए लेकिन किसी को मैगजीन नहीं भेजी गई और ना ही किसी का दुर्घटना बीमा करवाया गया। 

किन्हीं कारणों से मैं मैगजीन नहीं भेज पता हूं
पवन भूत का कहना है कि मेरी कमजोरी रही है कि मैं सदस्यों को मैगजीन नहीं भेज पाता हूं। पाली निवासी रमेश राणा का कहना है कि क्या हजारों लोगों से मैगजीन के नाम से लाखों रुपए लेकर महज इतना कह देना कि किन्हीं कारणों से मैं मैगजीन नहीं भिजवा पा रहा हूं पर्याप्त है ? 5000 रुपए प्रतिमाह का झांसा देकर बेरोजगार युवाओं से हजारों रुपए लेकर उन्हें रिपोर्टर कार्ड प्रदान करने वाले पवन भूत के खिलाफ पुलिस कोई कार्यवाही करेगी या देश के लोगों को यूं ही लुटते हुए देखती रहेगी ?

‘‘मैं अकेला क्या कर सकता हूं, हर तरफ भ्रष्टाचार फैला हुआ है, मैंनें भी ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के कई सदस्य जोड़े लेकिन पवन भूत ने उन सदस्यों को मैगजीन नहीं भेजी। चूंकि लोगों से सदस्यता राशि लेकर मैंनें पवन भूत को भिजवाई थी इसलिए लोगों ने मैगजीन के लिए मुझ पर दबाव बनाया। अंत में मुझे अपनी जेब से पैसे वापस लौटाने पड़े।’’ दिनेश सिंह-ज्ञानगढ़, भीलवाड़ा। 

सदस्यों की मैगजीन न मिलने की शिकायतों से परेशान होकर भीलवाड़ा के रिपोर्टर रवि व्यास को अपना क्षेत्र छोड़कर अन्यत्र जाकर रहना पड़ रहा है। अकेले भीलवाड़ा शहर में सैकड़ों लोगों को पुलिस पब्लिक प्रेस की सदस्यता दिलवा चुके युवा रवि व्यास का कहना है कि सदस्यता फार्म में लिखा होता है कि डाक द्वारा मैगजीन भेजी जाएगी और दुर्घटना बीमा करवाया जाएगा। लेकिन जब मैगजीन नहीं आती है और बीमा नहीं करवाया जाता है तो लोग सदस्यता फार्म भरने वाले को पकड़ते है ना कि मैगजीन के मालिक और सम्पादक को।

पीड़ितों ने की थी प्रधानमंत्री से शिकायत और गृहमंत्री ने दिया लोकापर्ण
ठगी के शिकार हुए लोगों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री पी. चिदम्बरम व प्रेस कांउसिल ऑफ इंडिया को शिकायत पत्र भेजकर ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। धोखाधड़ी के शिकार हुए देश भर के कई लोगों ने फरीदाबाद, कोलकत्ता के थाने में एफआईआर दर्ज करवाई लेकिन नतीजा सिफर रहा है। अभी तक पवन भूत के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। इससे ऐसा लगता है कि पवन भूत पुलिस व पब्लिक के बीच में भले ही सामंजस्य स्थापित ना करवा पाया हो, लेकिन पुलिस व प्रेस में सामंजस्य जरूर स्थापित किया है। इस सामंजस्य का ही परिणाम है कि राजस्थान के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया ने ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ का लोकापर्ण कर दिया।

पवन भूत ने अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए भीलवाड़ा में कार्यालय संचालित कर रखा हैं, इस कार्यालय का संचालन तमन्ना अहमद करते है। तमन्ना अहमद कई बरसों से पवन कुमार भूत के साथ है, जिसे भूत ने मैनेजिंग एडिटर बना रखा है। उदयपुर में आयोजित हुए लोकापर्ण समारोह के बाद पवन कुमार भूत ने तमन्ना अहमद के जरिए उदयपुर में अपनी गतिविधियों को तेज कर दिया हैं, उम्मीद है तमन्ना अहमद की जानिब से कुछ दिनों बाद शहर की सड़कों पर दौड़तें चौपहिया वाहनों पर ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ लिखा नजर आने लगेगा और जिले में प्रेस कार्डधारी पत्रकारों की जमात की संख्या भी अवश्य बढ़ जाएगी।

लेखक लखन सालवी से संपर्क +91 98280-81636 या के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मोदी जी के पास डिग्री है तो सत्यमेव जयते के साथ ट्वीट क्यों नहीं कर दे रहे?

Sanjaya Kumar Singh : मोदी जी के पास डिग्री है तो सत्यमेव जयते के साथ ट्वीट क्यों नहीं कर दे रहे हैं। और नहीं कर रहे हैं तो भक्तों ने जैसे कन्हैया को नेता बनाया वैसे ही अरविन्द केजरीवाल की पार्टी को पंजाब चुनाव जीतने का मौका क्यों दे रहे हैं। भक्तों के उछलकूद का लाभ अरविन्द केजरीवाल को मिल रहा है। अलमारी में रखी डिग्री अंडा-बच्चा तो देती नहीं। ना बीमार होकर अस्पताल जाती है। आमलोगों की डिग्री तो पत्नी कहीं रख देगी, चूल्हा जला चुकी होगी या बच्चों के टिफिन पैक करके दे देगी। मोदी जी के साथ तो ये सब लफड़ा भी नहीं है। फिर इतनी देर?

डिग्री के मामले में अरविन्द केजरीवाल के दावे में दम लगता है। रही सही कसर चुप्पी से पूरी हो जा रही है। रेत में सिर छुपाने से काम नहीं चलता है। जितनी देर करेंगे उतने फंसेंगे। फिर इस्तीफा देने से कम में बात नहीं बनेगी। केजरीवाल को एक और श्रेय मिल जाएगा।

नरेन्द्र मोदी की डिग्री पर उठ रहे सवाल भाजपा के लिए बहुत मामूली हैं और सोनिया गांधी के रिश्वत लेने का मामला बहुत बड़ा। छप्पन ईंची सरकार की सीमा खुद तय हो रही है। ना सोनिया के खिलाफ कार्रवाई करेंगे ना मोदी पर आरोप का जवाब देंगे। आम आदमी पार्टी को तो अपना ही स्तर नहीं पता है। जय हो। यही हाल रहा तो देश की राजनीति में मजा ही नहीं रहेगा। एकदम गोबर हो जाएगी।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

Mukesh Kumar : इधर केजरीवाल बढ़-चढ़कर, ऐलानिया, खुल्लमखुल्ला, ताल ठोंकते हुए, डंके की चोट पर मोदी जी की डिग्रियों को फर्जी बता रहे हैंऔर उधर सरकार तथा बीजेपी दुबकी हुए है। वह चुप्पी धारण किए हुए है और इस कोशिश में है कि अगस्ता वेस्टलैंड के शोर-शराबे में केजरीवाल की आवाज़ दब जाए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। दूसरे इससे संदेह और भी पक्के होते जा रहे हैं कि मोदी ने फर्ज़ी डिग्रियाँ हासिल कीं और देश को उल्लू बनाया। प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति के बारे में ऐसी राय बने ये न लोकतंत्र के लिए अच्छा है और न ही देश के लिए। ये उस हिंदुत्ववादी राजनीति पर भी कलंक होगा जो सदाचार को खुद की बपौती मानकर सबको दुषचरित्र साबित करने पर आमादा रहती है। इसलिए पार्टी और सरकार को सबूतों के साथ केजरीवाल के आरोपों का जवाब देना चाहिए, बल्कि उन पर क्रिमिनल डेफेमेशन का केस भी दायर कर देना चाहिए।

मोदीजी को दिल्ली सरकार और केजरीवाल टीम से निपटने की अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने उनको काम न करने देने की चालें चलकर फुरसतिया बना दिया। अब ये तो सबको पता ही है कि खाली दिमाग़ शैतान का घर होता है। यही वजह है कि वे अपना वक़्त उनको परेशान करने के नए नए तरीके खोजने में लगा रहे हैं। अब अगर मोदीजी और उपराज्यापाल साहब इस रणनीति को उलट दें तो केजरीवाल सरकार काम में उलझकर रह जाएगी और उसके पास इतना समय ही नहीं रहेगा कि आपके खिलाफ़ खुराफ़ात में ही लगे रहें।

ये दिल्ली यूनिवर्सिटी भी केजरीवाल एंड कंपनी के साथ साज़िश में शामिल है। ये जान-बूझकर पीएम और आपकी डिग्रियों के बारे में भ्रम की स्थिति बनाकर अफवाहों और दुष्प्रचार को हवा दे रही है। स्मृति जी वीसी को तुरंत बर्खास्त करिए और न माने तो विवि ही बंद कर दीजिए। और अभी तक आपने सूचना आयुक्त को क्यों छोड़ रखा है? उसे भी उसके किए की सज़ा दीजिए। आरटीआई क्या इसी के लिए बनाई गई है कि आप हर कोई पीएम को बदनाम करने के लिए उसका इस्तेमाल करता फिरे। कड़ा सबक सिखाइए सबको।

अब तो प्रधानमंत्री को अपनी डिग्रियां निकालकर इन स्यूडो सेकुलरिस्टों और आपवालों के मुँह पर मारकर दिखा देना चाहिए कि ये लोग उनके बारे में जो अनर्गल प्रचार करते रहते हैं वह कितना झूठा है, कितना दुराग्रहों से प्रेरित है। स्मृति ईरानी आप भी मत छोड़िए इन नामुरादों को। वैसे तो ये नरक में जाएंगे ही और इनको कीड़े भी पड़ेंगे मगर ज़रूरी है कि आप लोगों की उज्ज्वल छवि देशवासियों और दुनिया के सामने और भी निखर करआए। आखिर आप देश के दो महत्वपूर्ण पदों पर बैठी महान विभूतियाँ हैं और आप लोग देश का नया इतिहास लिख रहे हैं। आपसे देशभक्तों को कितनी आशाएं हैं। उन्हें आप पर कितना विश्वास है ये आपसे बेहतर भला कौन जानता है। वे आप पर उछाले जा रहे कीचड़ से बहुत आहत हैं और उद्वेलित भी हैं। अगर संविधान और कानून न होता इस देश में तो वे एक को भी न छोड़ते। उम्मीद है आप लोग उनकी उम्मीदों पर खरा उतरेंगे और विरोधियों को धूल चला देंगे। उन सबकी और मेरी भी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दैनिक जागरण के मालिक और मैनेजर भगवान से नहीं डरते लेकिन जनता को भगवान के नाम पर डराते हैं, देखें तस्वीरें

ये तस्वीरें दैनिक जागरण लखनऊ कार्यालय के बाहर की हैं. इसे कहते हैं- ”पर उपदेश कुशल बहुतेरे” यानि जो लोग भगवान से ना डरते हुए अपने कर्मियों को उनका मजीठिया वेज बोर्ड वाला कानूनी, न्यायिक और संवैधानिक हक नहीं दे रहे हैं, वे ही लोग जनता को ईश्वर की नजर में होने का भय दिखाकर पेशाब न करने, कूड़ा न फेंकने की अघोषित हिदायत दे रहे हैं.

नोएडा और आसपास की कई यूनिटों में कुल मिलाकर 300 लोगों को जागरण प्रबंधन ने इसलिए बर्खास्त कर रखा है क्योंकि ये लोग अपना कानूनी हक मांग रहे थे, ये लोग मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अपना एरियर व सेलरी की मांग कर रहे थे. इसी तरह दैनिक जागरण लखनऊ में भी उपर से नीचे तक किसी को मजीठिया वेज बोर्ड का हक दिए बिना उनसे जबरन लिखवा लिया गया कि उन्हें यह वेज बोर्ड नहीं चाहिए और वे अपनी सेलरी से संतुष्ट हैं. ऐसे धतकरम करने वाला जागरण प्रबंधन अगर खुद ईश्वर से नहीं डर रहा तो फिर जनता को ईश्वर के नाम से क्यों डरा रहा. वो कहते हैं न कि असल में ईश्वर और धर्म अमीरों के लिए हथियार है जिसका इस्तेमाल गरीबों को डराने और बांटने के लिए किया जाता है. जागरण के मामले में तो यह बिलकुल सही जान पड़ता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दलाल पीआर और फ्रॉड बिल्डर के फेर में फंसे लखनऊ के पत्रकार

लखनऊ की पत्रकारिता रो रही है….इस शहर में बड़े-बड़े संपादक हुए देश दुनिया में नाम कमाया….बीबीसी से लेकर रायटर्स और कई चैनलों में बड़े ओहदों पर पहुंचे पत्रकार इसी शहर की देन हैं….इतना ही नहीं वालस्ट्रीट जर्नल और गल्फ टुडे जैसे बड़े समूहों में अच्छे पदों पर पहुंचे कई नामचीन पत्रकार लखनऊ के पत्रकारिता से ही ककहरा सीखकर आगे बढ़े हैं..लेकिन अब जो यहां देखने को मिल रहा है उससे लग रहा है ज़हर खाकर जान दे दूं या पत्रकारिता को अलविदा कह दूं…..

यही दिन बाकी थे कि चिटफंडिया टाइप बिल्डर शाइन सिटी और एक लोकल पीआर कंपनी के संचालक के पैसे से मीडिया के लिए टी-20 कप क्रिकेट कप आयोजित किया जा रहा है….पीआर कंपनी का संचालक प्रेस कांफ्रेस में बता रहा है कि मैच किससे के बीच खेला जाएगा…कौन विजेता होगा किसको टी शर्ट और ट्राउजर मिलेगा…किसने नरलॉप का किचेन सेट …..छी-छी…

हजारों गरीब निवेशकों के पैसे जमा करा कर प्लॉट देने का वादा करने वाली शाइन सिटी का मालिक अपने पैसे से लखनऊ की पत्रकारिता से जुड़े लोगों को दारू पिलाकर नशे में कर रहा है ताकि उसके काले कारनामों का कोई चिट्ठा न खोल दे और उसका साथ देता रहे….  जेल की हवा खा चुका एक पीआर कंपनी का संचालक…. बताया तो यहां तक जा रहा है कि यह पीआर संचालक कुछ पत्रकारों की सीडी भी बना चुका है क्योंकि जो भी मुंह खोलता है उसको संपादक के जरिये नौकरी से निकवालने की धमकी देता है…

लखनऊ से नरेंद्र कुमार की रिपोर्ट. संपर्क:

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जानिए, दीपक चौरसिया समेत कई पत्रकारों के खिलाफ सीबीआई ने क्यों दर्ज की एफआईआर

Vishwanath Chaturvedi : धरा बेच देगे, गगन बेंच देगे, कलम बिक चुकी है, वतन बेच देगे! पैसे खाकर फर्जी खबर चलाने के आरोपी दीपक चौरसिया, भूपेंद्र चौबे, मनोज मित्ता सहित अन्य के खिलाफ सीबीआई ने दर्ज की एफ़आईआर… मुलायम के आय से अधिक संपत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट में 10 फ़रवरी 2009 को सुनवाई से पहले फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मुलायम कुनबे को क्लीन चिट दिए जाने की खबर प्राइम टाइम में प्रमुखता से चलाकर सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने और सीबीआई की इमेज को नुकसान पहुंचाने के आरोप में सीबीआई की डीआईजी रहीं तिलोतिमा वर्मा ने लिखाई एफआईआर.

मीडिया द्वारा बिना सबूतों के अमर सिंह के टुकड़ों पर पलने वाले कथित अधिवक्ता प्रदीप कुमार राय जो कि फोन टेपिंग और ब्लैक मेलिंग, फर्जी रिपोर्ट तैयार करने के मास्टर हैं, 2005 में भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे एसबी सिन्हा का बेटा बताकर गोवा राज भवन में गोवा के राज्यपाल की सीडी बनाने की नीयत से रुके. असलियत खुलने पर पणजी थाने में राज भवन द्वारा एफआईआर दर्ज कराकर प्रदीप राय को पुलिस को सौंप दिया गया. उक्त प्रकरण आज भी विचाराधीन है.

सीबीआई की डीआईजी रहीं तिलोतिमा वर्मा के फर्जी हस्ताक्षर से पैसे के साथ प्रदीप राय द्वारा बांटी गई रिपोर्ट को बिना कनफर्म किये, चैनलों द्वारा मनमाने तरीके से चलाई गई ख़बर के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में हमने 20 फरवरी 2009 को अप्लीकेशन फ़ाइल कर एसआईटी गठित कर फर्जी रिपोर्ट चलाने वालों की जाँच कराने की मांग कर दी. घबराई सीबीआई ने आनन फानन में प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया, सचिव सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, सचिव डीओपीटी को शिकायती पत्र लिखकर उक्त पत्रकारों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की. सुप्रीम कोर्ट में 30 मार्च की डेट फिक्स थी, सीबीआई ने 16 मार्च 2009 को एफआईआर दर्ज करा दी. इसे District new Delhi ps Cbi/stf year 2009 FirNo rc/Dst/2009/s/0001 date: 16.3.2009… act Ipc section 120b/r/w 465,469/500&471 and the subatantive offences thereof other acts& sections. suspected offences: criminal conspiracy forgery, forgery for the purpose of harming reputation use ing as genuine a fored document and printing or engrabing matter know to be defamatory के जरिए खोजा देखा पढ़ा जा सकता है.

जाने-माने वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी के एफबी वॉल से.

इस प्रकरण से संबंधित सीबीआई के कई पन्नों के दस्तावेजों को पढ़ने के लिए अगले पेज पर जाने हेतु नीचे क्लिक करें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

विजय माल्या की राह पर महुआ टीवी के पीके तिवारी!

महुआ चैनल के प्रमोटर पी.के. तिवारी पर अब प्रवर्तन निदेशालय ईडी का शिकंजा कसता नजर आ रहा है। 14 राष्ट्रीय बैंकों को अरबों रुपये का चूना लगाने वाले तिवारी पर आरोप है कि चैनल के स्टूडियो बनाने के नाम पर फर्जी तरीके से पांच कंपनियां बनाकर अलग-अलग बैंकों से लोन लेकर अरबों रुपये का चूना लगाया। तिवारी के खिलाफ ईडी और सीबीआई के आलावा आयकर विभाग की भी जांच चल रही है।

सूत्रों के मुताबिक जी न्यूज और आज तक के बगल में स्टूडियो की खाली पड़ी जमीन पर महुआ चैनल के मालिक पीके तिवारी ने स्टूडियो तो नहीं बनाया, लेकिन इमारतें जरूर खड़ी कर दी। बताया जाता है पहुंच वाले तिवारी ने बैंक अधिकारियों से सांठगांठ कर बिना मौके का मुआयना किये लोन ले लिया।  जिसके चलते बैंक भी अपने कर्जे की वसूली को लेकर उसके खिलाफ कोई करवाई नहीं कर सके।

गौरतलब है कि तिवारी ने बैंकों से लोन लेने के लिए 150 पेज  वाली जो प्रोजेक्ट रिपोर्ट एसबीआई काप्स से तैयार कराई, उसमें लिखा 101.59 करोड़ शेयर मार्केट से लायेंगें और बाकी का बैलेंस 203.18 करोड़ रुपये तीन अन्य बैंकों से फाइनेंस करायेंगे। इन बैंकों में पीएनबी, बैंक ऑफ बड़ोदा और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया शामिल हैं। एसबीआई काप्स की रिपोर्ट में डिजटल स्टूडियो की जगह का जिक्र नहीं है, लेकिन इस जगह के नाम पर 300 करोड़ रुपये का बैंक से कर्ज महुआ के मालिक पी. के तिवारी ने ले लिया। यही हाल पीएनबी का हुआ। फिलहाल इस मामले की जाँच कर रही एजेंसियों का कहना है कि करोड़ों का लोन देने से पहले किसी भी बैंक के फील्ड अफसर ने महुआ चैनल के नोएडा कार्यालय जाने की जरुरत भी नहीं समझी।

इन दिनों अपने आंगन में एक ‘विजय माल्या’ के अवतरण से बेचैन है। वैसे यह पहली घटना प्रकाश में आई है, अनेक अभी अंधकार में छिपे हैं। चर्चा का बाजार गर्म है कि क्या शराब कारोबारी विजय माल्या की तरह यह चैनल कारोबारी माल्या भी कानून को ठेंगा दिखा विदेश भाग जाएगा या ऊपरी ‘कृपा’ से पाक साफ बच जाएगा?

सूत्रों के मुताबिक कभी इंडिया टीवी के मालिक रजत शर्मा के खास रहे पी के तिवारी ने रजत शर्मा से अलग हो जाने के बाद नोएडा की फिल्म सिटी में अलग-अलग टीवी लांच करने के नाम पर 14 राष्ट्रीय बैंकों को अरबों रुपये का चूना कर्ज लेकर लगाया। मिसाल के तौर पर महुआ टीवी की कंपनी सेंचुरी काम्युनिकेशन थी। इसी कंपनी को लांच करने के लिए 760 करोड़ रुपये लिए गए। इसी तरह एडिटिंग के लिए तिवारी ने पिक्शन विजन कंपनी बनाई। इसके लिए बैंकों से 195 करोड़ ऐंठ लिए। इतना ही नहीं महुआ के एक ओर चैनल के लिए 234 करोड़ की टोपी बैंकों को पहनाई। बताया जाता है कि तिवारी ने प्रोजेक्ट की फर्जी रिपोर्ट बनाकर नोएडा और कोलकाता में देश का सबसे आधुनिक डिजटल स्टूडियो बनाने की प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की और स्टेट बैंक से लेकर पंजाब नेशनल बैंक तक के अधिकारियों को खिला-पिला कर 304.77 करोड़ रुपये वसूल लिए।

लेखक एसएन विनोद वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Reliance Fresh doing Fraud with Consumers, charged more than MRP

Reliance Fresh charged more than MRP (Appx 10% Extra Charged)

Dear Yashwant Singh Jee,

My Namarskar to you. Hope you are & doing well.

I am informing the message to you to publish & aware to the peoples through your website that how  Reliance Fresh (Reliance Retails Ltd) doing fraud & charging extra from the MRP. I have attached the Copy of proof where mentioned Retails Price Rs.32/ on product, But in Bill they have taken Rs.35/-. (Appx 10% Extra).

Its a small item only, But since a long time we have been purchasing the products from Reliance, it count not give guarantee they would take right price. Even now a day they are may be taking more price than MRP. We all should aware this matter.  We should once check before purchasing any thing from Reliance Fresh. 


I Purchased Two Pack EGG from Reliance Fresh (Reliance Retail Ltd) which rate was Rs.32/-, But They charged Rs.35/.  Its Rs. 3/- extra from MRP i.e appx 10% extra from MRP.  You can find how Reliance doing Fraud with Consumers. I think they might taken extra amount some more items in past year back. It should be inquiry properly.

Yours truely

Gajendra Kabat


Bhubaneswar, Odisha

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

साधना न्यूज (एमपी-सीजी) के ठग संचालकों से बच कर रहिए, पढ़िए एक पीड़ित स्ट्रिंगर की दास्तान


मुझसे साधना न्यूज (मध्यप्रदेश छत्तीसगढ) के नाम पर 8 माह पूर्व विनोद राय के निजी खाते में 20 हजार रुपये ट्रांसफर कराए गए थे. इस रकम को खुद मैंने अपने खाते से भेजा था. परन्तु साधना न्यूज ने एक माह बाद ही किसी दूसरे को नियुक्त कर दिया. विनोद राय (इन्दौर, डायरेक्टर, साधना न्यूज) से रुपये वापस मांगने पर वे नये नये तरीके से टालते रहते हैं और आज कल करके कई प्रकार के बहाने से मुझे राशि लौटने से इनकार कर रहे हैं. मैं इसके लिए कई बार इन्दौर का चक्कर काट चुका हूं.

इस विषय में आदित्य तिवारी और एमके तिवारी को सूचित कर चुका हूं जो कि लोकायत पत्रिका एवं साधना न्यूज़ मध्य प्रदेश छत्तीसग़ढ के संचालक हैं. परन्तु मुझे राशि नहीं लौटाई जा रही है. मेरे द्वारा मोबाइल से फोन किए जाने पर फोन नहीं उठाया जाता और अब मेरा नंबर ब्लैक लिस्ट में डाल दिया गया है. इसके पहले शिवराज सिंह के भोपाल कार्यक्रम के लिए मैंने 80 हजार रुपये साधना न्यूज में दिया था, वह भी मैंने विज्ञापनदाता को वापस किया था, उसका भी कुछ निर्णय नहीं हो रहा.

विनोद राय के कहे अनुसार मैंने किसी को चेक दे दिया था परन्तु अब मेरे उपर वह व्यापारी चेक बाउन्स का केस कर देगा. बडी मुश्किल से शुक्रवार को विनोद राय से मेरी बात हुई थी  जिसमें उन्होंने सोमवार को राशि डालने का वादा किया था परन्तु आज भी समय निकल गया है. फोन नम्बर रिजेक्शन लिस्ट में डाल दिया है. मेरे पास तमाम सबूत हैं जिसके सहारे मैं इन सभी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने जा रहा हू. साथ ही पूरे मामले की जानकारी मीडिया जगत को भड़ास4मीडिया के माध्यम से देने जा रहा हूं.

राजेंद्र अग्रवाल
छिन्दवाडा, मध्य प्रदेश
मोबाइल नंबर : 9479906598, 810972555 , मेल :

ठगी का सुबूत यह आडियो है जिसमें विनोद राय पैसे लौटाने की बात तो करता है लेकिन लौटाता नहीं है… इस यूट्यूब लिंक पर क्लिक करके सुनिए…

ये हैं कुछ चैट जिससे साफ पता चलता है कि विनोद राय पैसे हड़पने का आरोपी है और पैसे लौटाने से इनकार कर रहा है….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

भगोड़े विजय माल्या ने बड़े चैनलों और अखबारों के संपादकों को पैसे खिला रखा है, निगेटिव खबर चलाने पर दी धमकी

हम लोगों के देश के जो बड़े अखबार हैं और जो बड़े टीवी चैनल हैं, उसके मालिकों व संपादकों को विजय माल्या ने जमकर पैसे खिलाए हैं. पैसे खिलाने के अलावा कई तरह से उपकृत किया है और यह सब लिखत पढ़त में किया है. सोशल मीडिया के दबाव में जब चैनलों व अखबारों में विजय माल्या के खिलाफ देश से भाग जाने की खबरें चलनी शुरू हुई तो तिलमिलाए विजय माल्या ने कारपोरेट व करप्ट मीडिया की औकात बता दी. उन्होंने ट्वीट करके जो कहा उसका मतलब यही है कि संपादक लोग औकात में रहो, ज्यादा निगेटिव लिखा व निगेटिव दिखाया तो पूरी पोल पट्टी खोल देंगे जो आन पेपर है. इस ट्वीट के बाद बिकाऊ मीडिया के संपादकों को सांप सूंघ गया है. लोग अब माल्या से मांग करने लगे हैं कि उनमें अगर दम हो तो मीडिया के दलाल संपादकों के नाम सार्वजनिक कर देने चाहिए.

बैंकों से 9000 करोड़ का लोन लेकर अचानक देश छोड़कर भाग जाने वाले विजय माल्या ने ट्विटर पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कई बड़े संपादकों को धमकाया है कि उनके खिलाफ अगर एक शब्द भी लिखा तो वह उनकी पोल पट्टी सार्वजानिक कर देंगे. उन्होंने कहा कि वह भगोड़े नहीं है. उन्होंने कहा कि वह एक अंतरराष्ट्रीय कारोबारी हैं और अक्सर विदेश यात्राएं करते रहते हैं.

माल्या ने ट्वीट करके कहा, ‘मैं भागा नहीं हूं, न मैं भगोड़ा हूं. मैं अंतरराष्ट्रीय कारोबारी हूं. विदेश आता-जाता रहता हूं.’ उन्होंने कहा कि मीडिया में उन्हें जबरन बदनाम किया जा रहा है. इसके साथ ही ट्वीट कर उन्होंने यह भी कहा, ‘मेरे खिलाफ अगर अब किसी ने कुछ लिखने का साहस किया तो वह उन संपादकों को बेनकाब कर देंगे जो कल तक उनके पिछलग्गू बनकर लाभ लेते रहे हैं. उन्होंने कहा है कि सबके कारनामों कि कुंडली उनके पास है.” इसके आलावा विजय माल्या ने ट्वीट करके यह भी कहा, ‘मैं एक सांसद हूं और मुझे कानून पर भरोसा है. हमारी कानून व्यवस्था मजबूत है और मैं उसका सम्मान करता हूं.’ मालूम हो कि विजय माल्या के पास स्टेट बैंक ऑफ इंडिया समेत 17 बैंकों का करीब 9,000 करोड़ रुपये बकाया है. किंगफिशर एयरलाइंस के घाटे में जाने के बाद वो लोन की ये रकम चुकाने में नाकामयाब रहे. मामला लाइमलाइट में आने के बाद बैंकों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हालांकि बाद में जानकारी मिली कि माल्या 2 मार्च को ही देश से जा चुके हैं.

मीडिया पर भड़के विजय माल्या

विवादों में घिरे उद्योगपति विजय माल्या ने मीडिया के सिर पर आरोप मढ़ने की कोशिश करते हुए कहा कि एक बार मीडिया किसी के पीछे पड़ जाता है तो वह एक ऐसी प्रचंड आग पैदा कर देता है, जिसमें सत्य और तथ्य जलकर खाक हो जाते हैं। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि मीडिया के मालिक उस मदद, अहसानों और सुविधाओं को ना भूलें, जो मैंने उन्हें कई साल तक उपलब्ध करवाए हैं। इनके दस्तावेज हैं। अब टीआरपी हासिल करने के लिए झूठ बोल रहे हैं?’ माल्या ने ट्वीट करके कहा, ‘मैं अंतरराष्ट्रीय उद्योगपति हूं। मैं भारत और वहां से बाहर अक्सर जाता रहता हूं। मैं भारत से भागा नहीं हूं और न ही मैं कोई भगोड़ा हूं। सब बकवास है।’

माल्या ने आगे कहा, ‘भारतीय सांसद होने के नाते मैं देश के कानून का पूरा सम्मान करता हूं और उसका पालन करूंगा। हमारी न्यायिक प्रणाली सुदृढ़ और सम्मानित है। लेकिन मीडिया की ओर से कोई ट्रायल नहीं होना चाहिए।’ माल्या ने उन खबरों पर भी सवाल उठाया, जिनमें कहा गया कि उन्हें अपनी संपत्ति की घोषणा करनी चाहिए। माल्या ने कहा, ‘क्या इसका यह अर्थ है कि बैंकों को मेरी संपत्ति की जानकारी नहीं थी या उन्होंने मेरी संसदीय घोषणाएं नहीं देखी थीं?’ अपने उद्योग समूह के नौ हजार करोड़ रुपए के ऋण चुकाने में कथित तौर पर विफल रहने पर कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहे शराब उद्योग के इस 60 वर्षीय दिग्गज ने दो मार्च को देश छोड़ दिया था। जबकि बैंकों ने माल्या को विदेश जाने से रोकने के आदेश जारी करने के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाया था।

इन्हें भी पढ़ें….




कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एक भूतपूर्व सांसद व प्रसिद्व पत्रकार ने विजय माल्या के लिए दलाली करते हुए उनके साथ उत्तराखंड में नेताओं की बैठकें करवाई…

मालामाल माल्या की कंगाली कथा

-निरंजन परिहार-

अब आप इसे ख्याति कहें या कुख्याति, कि संसार में शराब के सबसे बड़े व्यापारियों में से एक भारत में कभी अमीरों की जमात के सरदार रहे विजय माल्या कंगाली की कगार पर देश छोड़ कर फुर्र हो गए हैं। यह जगविख्यात तत्य है कि है कि ज्ञान, चरित्र और एकता का दुनिया को पाठ पढ़ाने वाले संघ परिवार की दत्तक पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने ही संसार में शराब के सबसे बड़े व्यापारियों में से एक माल्या को कर्नाटक से राज्यसभा में फिर से पहुंचाया था। और माल्या कभी देश की जिस संसद में बैठकर भारत के भाग्य विधाता बने हुए थे, वह संसद भी सन्न है। क्योंकि लुकआउट नोटिस के बावजूद वे गायब हो गए। पर, इस बात का क्या किया जाए कि जिस लाल रंग से माल्या को बहुत प्यार है, सरकार उस लाल रंग की झंडी किंगफिशर के कंगाल को दिखाए, उससे पहले ही विजय माल्या बचा – खुचा माल बटोरकर सर्र से सरक गए।

मालामाल होने के बावजूद माल्या कोई पांच साल से अपने कर्मचारियों को तनख्वाह नहीं दे पा रहे थे।  क्यूंकि कड़की कुछ ज्यादा ही बता रहे थे और यह भी बता रहे थे कि जेब पूरी तरह से खाली हो गई है। लेकिन पांच साल की की कंगाली के बावजूद माल्या के ठसक और ठाट भारत छोड़ने के दिन तक वही थे। वैसे कहावत है कि मरा हुआ हाथी भी सवा लाख को होता है, लेकिन उनकी किंगफिशर एयरलाइन अब पूरी तरह से फिस्स है। विजय माल्या संकट में कोई आज से नहीं थे। चार साल पहले ही यह तय हो गया था कि वे कंगाल हो गए है। दुनिया के सबसे सैक्सी कलेंडर छापने वाले विजय माल्या को सन 2012 में ही फोर्ब्स ने अपनी अमीरों वाली सूची से बाहर का दरवाजा दिखा दिया था। बीजेपी के सहयोग से माल्या राज्यसभा में पहुंचे थे और बाद में बीजेपी को ही भुला दिया। लेकिन अब बीजेपी के राज में देश से भागकर बीजेपी की सरकार को एक और बदनुमा दाग भी दे गए हैं। 

विजय माल्या अपने काम निकालने के लिए किस तरह के फंडे अपनाते रहे हैं, इसका अंदाज लगाने के लिए यह उदाहरण देश लीजिए। बात उन दिनों की है, जब उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार हुआ करती थी। एक भूतपूर्व सांसद और प्रसिद्व पत्रकार विजय माल्या के दलाल बने और उनके साथ उत्तराखंड के नेताओं की बैठकें भी करवाई। माल्या के वहां के बंगले पर लगा 27 करोड़ रुपए टैक्स फट से माफ हुआ। और जैसा कि होना था, माल्या ने तत्काल बाद में वह बंगला बेच दिया और मोटा मुनाफा कमाया। मोटा इसलिए, क्योंकि जब 50 साल पहले विजय माल्या की मां ने यह बंगला खरीदा था, तब देहरादून में प्रॉपर्टी के दामों में आज की तरह कदर आग लगी हुई नहीं थी। मतलब यही है कि विजय माल्या को कितनी कमाई, किसके जरिए, कैसे निकालनी है, और जिन रास्तों से निकालनी है, उन रास्तों की रपटीली राहों तक के अंदाज का पता है। राज्यसभा में जाने के लिए बीजेपी का सहयोग तो एक बहाना था। बाद में तो खैर बीजेपी को भी समझ में आ गया कि माल्या ने जो सौदा किया, वह सिर्फ राज्यसभा मे आने के लिए नहीं था।

बहुत सारे हवाई जहाजों और दो बहुत भव्य किस्म के आलीशान जल के जहाजों के मालिक होने के साथ साथ अरबों रुपए के शराब का कारोबार करनेवाले विजय माल्या की हालत इन दिनों सचमुच बहुत पतली हैं। यहां तक कि उनकी किंगफिशर विमान सेवा के सारे के सारे विमान तीन साल से जमीन पर खड़े हैं। और जैसा कि अब तक कोई उनकी मदद को नहीं आया, इसलिए सारे ही विमान जो बेचारे आकाश में उड़ने के लिए बने थे, वो स्थायी रूप से जमीन पर खड़े रहने को बंधक हो गए है। क्योंकि कोई विमान जब बहुत दिनों तक उड़ान पर नहीं जाता, जमीन पर ही खड़ा रहता है, तो जैसा कि आपके और हमारे शरीर में भी पड़े पड़े अकड़न – जकड़न आ जाती है, विमानों में भी उड्डयन की क्षमता क्षीण हो जाती है। फिर से उड़ने के लिए तैयार होने का खर्चा बहुत आता है। पैसा लगता है। और कंगाल माल्या व उनकी किंगफिशर पर तो अपार उधारी है। बेचारे विमान।

संपत्तियों के आधार पर माल्या की कुल निजी हैसियत आज भी भले ही अरबों डॉलर में आंकी जाती रही हो। और उनकी एयरलाइंस के कर्मचारियों की दुर्दशा के बाद कइयों के आत्महत्या के हालात से माल्या की असलियत को भले ही कोई कुछ भी समझे। लेकिन असल में ऐसा है नहीं। अपन पहले भी कहते रहे हैं कि उंट अगर जमीन पर बैठ भी जाए, तो भी वह कुत्ते से तो कई गुना ऊंचा ही होता है। माल्या को शराब का कारोबार और पूरा का पूरा यूबी ग्रुप अपने पिता विट्ठल माल्या से विरासत में मिला। मगर स्काटलैंड की मशहूर शराब फैक्टरी वाइट एंड मेके को एक अरब सवा करोड़ रुपए में खरीदने के बाद माल्या का यूबी ग्रुप दुनिया का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा शराब निर्माता ग्रुप बन गया। जीवन में माल्या की हर पल कोशिश रही है कि वे अपने कारोबार का दायरा बढ़ा कर अलग अलग व्यवसायों को इसमें शामिल करें, ताकि उन्हें महज़ शराब उद्योग के दिग्गज के तौर पर ही नहीं, एक बड़े उद्योगपति के रूप में उन्हें देखा जाए। इसी कारण उन्होंने एयरलाइंस शुरू की।

और बाद में तो राजा – महाराजाओं की शान को भी मात देने वाले माल्या ने अपने किंगफिशर ब्रांड को बढ़ावा देने के लिए नंगी – अधनंगी लड़कियों को इकट्ठा करके दुनिया के सबसे सैक्सी कैलेंडर भी बनवाए और उनमें छपनेवाली कन्याओं को मशहूर मॉडल होने के खिताब भी बांटे। कुछ को तो हीरोइन तक बनवाने में मदद की। एयरलाइन भी शुरू की। जो नखरे- लटके – झटके दिखाने थे, वे सारे ही दिखाए और उनसे बाकी एयरलाइंसों को खूब डराया भी। और माल्या के खुद को बड़ा बनाने के शौक की उस घटना ने तो कॉर्पोरेट जगत में सबको चौंका दिया था जब किंगफ़िशर एयरलाइन को अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनी बनाने के लिए माल्या ने समुद्र के बीच सफर कर रहे अपने यॉट से कैप्टेन गोपीनाथ को फ़ोन किया कि वो एयर डेकन ख़रीदना चाहते हैं। गोपीनाथ ने कहा,  कीमत एक हज़ार करोड़ रुपए। और माल्या ने एयर डेकन की बैलेंस शीट तक नहीं देखी और गोपीनाथ को डिमांड ड्राफ़्ट भिजवा दिया था।

कंगाल के रूप में बहुप्रचारित माल्या के बारे में ताजा तथ्य यह है कि वे अपनी अरबों रुपए की संपत्ति बचाने की कोशिश में कंगाली का नाटक करते हुए भारत में ज्यादा दिन जी नहीं सकते थे, इसी कारण भारत छोड़कर गायब हो गए हैं। लेकिन, मालामाल माल्या, दरअसल दुर्लभ किस्म के शौकीन आदमी हैं। वे जहां भी रहेंगे, अपने शौक पूरे करते रहेंगे। नंगीपुंगी बालाओं के बीच जीने के अपने सपने को स्थायी बनाने के शौक की खातिर ही, कामुक कैलेंडर निकाले। आलीशान क्रूज पर जिंदगी गुजारने और हवाई में उड़ने के शौक को स्थायी बनाने के लिए हवाई सेवा किंगफिशर भी शुरू की। बाद में तो खैर, कामुक कैलेंडरों की बालाओं की जिंदगी की असलियत नापने की कोशिश में मधुर भंडारकर ने कैलेंडर गर्ल्स शीर्षक से एक फिल्म भी बनाई और बरबाद बिजनेसमैन के क्रूज पर दुनिया की सैर करने को लेकर भी एक फिल्म बनी। लेकिन सच्चाई यह है कि शौक के लिए खड़े किए गए कारोबारों का अंत अकसर शोक पर हुआ करता है। माल्या के विभिन्न शौक के शोकगीत और उनकी किंगफिशर की शोकांतिका का कथानक भी कुछ कुछ ऐसा ही है। शौकीन माल्या ने भारत की सत्रह बैंकों से बहुत सारा माल लिया, मगर धेला भी वापस नहीं किया। नौ हजार करोड़ रुपए का आंकड़ा लिखने में कितने शून्य लगते हैं, यह देश के सामान्य आदमी को समझने मैं बी बहुत वक्त लग जाता है। लेकिन अपनी इतनी बड़ी धनराशि को डूबते हुए सारी बैंकें देखती रही और माल्या शौक पूरे करने लंदन की फ्लाइट लपक कर निकल गए। शौक कभी मरते नहीं। सो, अब साठ साल की ऊम्र में माल्या वहां अपने सारे शौक फिर से जागृत करेंगे। लेकिन कोर्ट, कचहरी और कानून का शिकंजा जिस तरह से कसता जा रहा है, ऐसे में    उनके शौक का क्या हश्र होगा, अंदाज लगाचया जा सकता है। 

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

डिफाल्टर और भगोड़े विजय माल्या के लिए न्यूज चैनल्स ऐसे खबर पढ़ रहे हैं जैसे वो भारत का राष्ट्रपति हो!

Dhiraj Kumar Bhardwaj : 9000 करोड़ का कर्ज लेकर विजय माल्या तो भाग गया.. लेकिन न्यूज चैनल्स उसके लिये ऐसे खबर पढ़ रहे हैं जैसे वो भारत का राष्ट्रपति है.. “किंग ऑफ गुड टाइम्स विजय माल्या देश छोड़ कर जा चुके हैं.” शायद विज्ञापनों के अहसानों का बोझ अभी भी दबाये हैं.

Satyendra Ps : विजय माल्या सरकारी बैंकों का 9000 करोड़ रुपये लेकर विदेश चम्पत हो गए। कांग्रेस सरकार ने एयरलाइंस को बचाने के लिए सरकारी बैंकों से कर्ज दिलाकर बेल आउट कराया। बीजेपी सरकार ने सुरक्षित निकल जाने दिया! इसी काम के लिए है करदाताओं का पैसा! छात्रों को 5000 रुपये स्कालरशिप देने में जान निकल रही है और अपने बाप को मालामाल कर दिया?

Vijender Masijeevi : कहाँ तो ब्लैक मनी देश में आनी थी। उलटा हुआ ये कि ब्लैक मनी वाला ही फुर्र हो गया ऊपर से किंगफिशर कलैण्डरों की तस्वीरों से और हमेशा के लिए हाथ धो बैठा ये देश।

S.a. Naqvi : सरकारी बैंकों का 9000 करोड़ रूपया ड़कार कर चोर उद्योगपति विजय माल्या देश छोड़ कर भाग गया । राष्ट्रभक्त सरकार के वकील नें एफिडेविट देकर सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया।

Vikram Singh Chauhan : एक किसान जब कर्ज लेने बैंक जाता है तब उसे दूसरे बैंकों से अनापत्ति प्रमाण पत्र ,जमीन के कागजात , हलफनामा और बांड जमा करवाया जाता है। इसके बावजूद उन्हें लोन पास नहीं होता है। बैंक अफसर और किसान के बीच दलाली करने वाला एक बड़ा पैसा उनसे पहले ही ले लेता है। किसान के हाथ में सीधा पैसा भी नहीं आता। उन्हें किसी वस्तु की खरीदी करनी होती है तो ये पैसा व्यापारी के पास चला जाता है। फिर जैसे ही एक -दो माह हुआ बैंक किसान से वसूली के लिए दबाव बनाना शुरू करता है। उन्हें डराया जाता है कि अगर आप पैसा जल्दी जमा नहीं करोगे तो आपकी संपत्ति कुर्क हो जाएगी। डरा सहमा किसान अपने घर के दीगर खर्च को छोड़ गांव में अपनी इज़्ज़त बचाने फसल आते ही मज़बूरी में उसे व्यापारी के पास औने पौने दाम में बेच देता है। और जब फसल नहीं होती तो आत्महत्या के सिवा दूसरा विकल्प नहीं होता। उस देश में 9000 करोड़ का कर्जदार विजय माल्या को चुपचाप विदेश भेजना मोदी सरकार के लिए देशद्रोह से बड़ा अपराध है।

Ashutosh Ujjwal : विजय माल्या का नाम लेते ही सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों को हड़का दिया. जब पता था वो बॉल लेकर भाग जायेगा तो उसे साथ क्यों खेलाया?

(फेसबुक से)

ये भी पढ़ें…


कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

विजय माल्या को विदेश भाग जाने देने को लेकर सोशल मीडिया पर मोदी की थू-थू शुरू

Sanjiv Bhatt : Government informs Supreme Court that Rajya Sabha MP Vujay Mallya left India on 2 March. Top five defaulters in India… Ambani, Adani, Anil Agarwal of Vedanta, Jaypee Group, and Sajjan Jindal (The one who arranged Modi’s impromptu meeting with Nawaz in Pakistan)

Vivek Satya Mitram : वाह भाई मोदी जी, कमाल करते हो ‘माल-लिया’ भाग लिया और तुम्हारी पुलिस, तुम्हारा आईबी, तुम्हारा ईडी और आदरणीय श्री सुब्रमण्यम स्वामी तक को भनक ना लगी। बढ़ियां है, खूब कृपा बरस रही है भक्तों पर, वैसे किस दुकान का समोसा खा रहे हैं भक्त? अब ये न कहना कि माल्या कौन है? लाखों करोड़ का कर्ज़ा माफ़ करते हुए तो ज़रूर पता रहा होगा कि कृपा कहां बरसने वाली है। खामखा लोग नहीं गरिया रहे। हैंडिल नहीं होता पॉवर तुम लोगों से। बीजेपी के बूते की बात नहीं इस देश पर शासन करना, हाज़मा ख़राब हो जाता है।

Nadim S. Akhter : तो आपको क्या लगता है कि विजय माल्या ब्रिटेन से भारत वापस आने वाले हैं!!??? एक नदीम नाम का संगीतकार था, टी सीरीज वाले गुलशन कुमार की हत्या में उनका नाम आया था, वो भी इंग्लैंड ही गए थे। आज तक नहीं लौटे, पब्लिक की मेमोरी से बात भी मिट गयी। पता नहीं आजकल कहाँ हैं! वैसे सुब्रत रॉय यानि सहारा श्री से सबक लेकर बाकियों की भी ऑंखें खुल गयी हैं। सुना है सहारा श्री के परिवार वालों ने विदेश के किसी देश की नागरिकता ले ली है ताकि मौका आने पे यहाँ से कूच कर सकें। माल्या के बारे में भी पता करिये।

Gyaneshwar Vatsyayan : किसे बहादुर मानें, नरेन्द्र मोदी को या विजय माल्या को? माल्या ने देश का 9000 करोड़ रुपया हड़पा। फिर विदेश भागने का एलान किया। आज भाग भी गए। अब बहादुर कौन, तय कर दें। माल्या द्वारा हड़पे गये 9000 करोड़ की भरपाई केन्द्र से नहीं, आम जनता पर कर बोझ से होगी।

Kanhaiya Kumar JNU : देशभक्ति का प्रतीक “विजय माल्या” ग़रीबों के अरबों रुपय को लेकर देश से भाग गया लेकिन ख़ुफ़िया एजेन्सी को ख़बर तक नहीं। और किसी भी देशभक्त कि देशभक्ती नहीं जागी। भारत माता के ‘सच्चे’ सपूतों को तो इसमें कुछ गलत भी नहीं नजर आयेगा फिर जोर की देशभक्ती लगना तो बहुत दूर की बात है। वह देशभक्ती जो “आजादी” का नाम सुनते ही जाग जाती है आज वही देशभक्ती एक फ्राॅड के विदेश भाग जाने पर भी सोती रही। ये कैसा चौकीदार रखा है, जिसकी नाक के नीचे से एक चोर हजारों करोड़ रुपये लेकर चंपत हो गया? अब ये काला धन तो आया नाही सफ़ेद धन भी चला गया.. हरी बोल… भक्तों… इस विजय मालया पर कौन से बाबा की कृपा आ रही है जो ये आदमी देश के आम आदमी के 9000 करोड़ खा कर आराम से विदेश चला गया?

Dilip C Mandal : पंडित विजय माल्या की किंगफिशर दुनिया की अकेली एयरलाइंस है, जिसके पहले विमान के उद्घाटन के लिए एयरपोर्ट के रनवे पर यज्ञ और हवन हुआ था. एयरलाइंस डूब गई और माल्या भारतीय जनता का बैंकों में जमा 9,000 करोड़ रुपया हड़प कर सरकार के सहयोग से विदेश भाग गया. देश की जनता का बैंकों में जमा 9,000 करोड़ रुपया हड़प कर सरकार के सहयोग से विदेश भाग लेने से पहले पंडित विजय माल्या ने देश के कई मंदिरों में पूजा अर्चना की थी.

फेसबुक से.

इसे भी पढ़ें…


कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पब्लिक का हजारों करोड़ रुपया दबाए विजय माल्या सरकार की नाक के नीचे से भाग गया!

Sheetal P Singh : वो हू ला ला ला करके देश को दस हज़ार करोड़ का प्रत्यक्ष चूना लगा कर निकल गया। देशभक्त प्रोफ़ाइलों का मुँह आटोमेटिकली तालाबन्द हो गया है “नो कमेंट”! वे सेना और सैनिक बहुत बेचते हैं, ख़ासकर जब कोई सैनिक या सैन्य अफ़सर बार्डर पर शहीद हो जाय तो तुरंत उसके फ़ोटो लाइक/ शेयर करने के मर्सिये पढ़ने लगते हैं। पन्द्रह दिन बाद उसके घर परिवार के दुख लापता हो जाते हैं! हेमराज (जिसका सर पाकिस्तानियों ने नहीं लौटाया) का परिवार कहाँ किस हाल में है किसी को पता है? और, सेना श्री श्री के लिये फ़्री में प्लांटून पुल बनाने में लगा दी गई है। ध्यान से नोट करते रहिये देशभक्ति को।

Nadim S. Akhter : पब्लिक का हजारों करोड़ रुपया दबाए शानोशौकत की जिंदगी जीने वाला विजय माल्या सरकार की नाक के नीचे से भाग गया और ईडी, वित्त मंत्रालय, आईबी, पुलिस, मंत्री, प्रधानमंत्री, कोर्ट…सब देखते रह गए. सरकार की तरफ से अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने आज कोर्ट को बताया कि माल्या 2 मार्च को ही देश छोड़ चुका है. अब कौन कहता है कि इस देश में सहिष्णुता नहीं है? और कितनी सहिष्णुता चाहिए? पब्लिक सब सह ही तो रही है. किसान खेती के लिए बैंक से कुछ हजार रुपये लेता है और फसल बर्बाद होने पर नहीं चुका पाता, तो ये बैंक वाले और पूरा सरकारी सिस्टम उसे इतना परेशान करता है कि बेचारा खुदकुशी कर लेता है. लेकिन माल्या जैसे लोग हजारों करोड़ रुपये गटक कर डकार भी नहीं लेते और देश का पूरा सिस्टम डिस्को-डांडिया करता रहता है. Total safe passage. काला धन नहीं ला सके मोदी जी, कम से कम पब्लिक का पैसा-देश का पैसा हड़पने वाले को तो पकड़कर रखते !!! सब मिले हुए हैं जी.

Ajay Prakash : विजय माल्या जी गए। मोदी जी की सरकार ने उन्हें विदेश गमन करा दिया। परदेस गमन। बहुते बड़े देशभक्त थे माल्या जी। और भारतीय संस्कृति के अव्वल रक्षक तो थे ही। बैंकों का जो वह 9 हजार करोड़ लेकर भागे हैं, वह जनता का पैसा तो है नहीं। हमारा टैक्स तो बिल्कुले नहीं। वह तो बीयर बेचकर कमाए थे सो लुटा दिया छमिया की नाच में। है कि नहीं।

(सौजन्य : फेसबुक)

आगे पढ़ें…


कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इस लुटेरे मीडिया मालिक इकबाल सिंह अहलूवालिया से रहें सावधान, टीवी 24 में नौकरी देने के नाम पर कइयों को लगा चुका है करोड़ों का चूना

चंडीगढ़ में एक न्यूज चैनल ‘टीवी 24’ का मालिक है लाभ सिंह और उसका बेटा है इकबाल सिंह. ये दोनों ठग अपने चैनल टीवी 24 में नौकरी देने के नाम पर जमकर पैसे वसूलते हैं. ताजा मामले में इन्होंने विदेश में स्पेशल न्यूज रिपोर्टर बनाने के नाम पर एक आदमी से 21 लाख रुपया ठग लिया. पीड़ित ने चंडीगढ़ के सेक्टर 39 में साजिश और धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज कराई है. पीड़ित का नाम गौरव गुप्ता है.

पंजाब के फतेहगढ़ साहिब के गांव मंडी गोबिंदगढ़ निवासी गौरव ने बताया कि वह वर्ष 2011-12 में रिपोर्टिंग के लिए निजी चैनल टीवी 24 के मालिक लाभ सिंह अहलूवालिया और उसके बेटे इकबाल सिंह अहलूवालिया से मिला. दोनों ने टीवी 24 के लिए विदेश में स्पेशल न्यूज रिपोर्टर बनाने के वास्ते 21 लाख रुपये मांगे. गौरव ने 19 लाख रुपया कैश दिया और डेढ़ लाख रुपया चेक के जरिए दिया. रुपये लेने के बाद आरोपी इकबाल सिंह अहलूवालिया ने अपनी ईमेल आईडी के जरिए उसे गारंटी के बतौर 100 करोड़ रुपये की एफडीआर व टोकन गारंटी के तौर पर अपने पासपोर्ट व पैन कार्ड की कापी भेजी.

जब गौरव चैनल मालिकों से मिलने आफिस गया तो उसे मिलने नहीं दिया गया. थोड़े दिन बाद जब रुपये मांगने वह आफिस गया तो चैनल मालिक इकबाल सिंह अहलूवालिया और लाभ सिंह अहलूवालिया ने बंदूक तानकर जान से मारने की धमकी दे डाली. गौरव ने जब छानबीन की तो पता चला कि इन बाप बेटे ने तो दर्जनों लोगों को ठगा हुआ है और इनके खिलाफ पहले से ही कई मुकदमें हैं. नौकरी देने के नाम पर पैसे लेना इनका धंधा है. इनके जाल में सैकड़ों लोग फंसे हैं जो अपना पैसा गंवाकर चुप बैठे हुए हैं. ये शो रूम पर कब्जे के मामले में पहले भी पुलिस के हत्थे चढ़ चुके हैं. गौरव ने इकबाल और लाभ के खिलाफ कई धाराओं में मामला दर्ज करा दिया है.

इन दोनों पिता पुत्रों ने कैप्टन गुरशरण सिंह नामक शख्स से 3.90 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की. पिता पुत्रों लाभ और इकबाल ने कैप्टन गुरशरण से टीवी24 के लिए महाराष्ट्र का ब्यूरो चीफ बनाने के नाम पर ये पैसे ठग लिए. इस मामले की जांच अभी आर्थिक अपराध शाखा पुलिस के पास है. तो भाइयों, आप भी रहो सावधान. जहां भी लाभ सिंह अहलूवालिया या इकबाल सिंह अहलूवालिया या इनके चैनल टीवी 24 का नाम आए तो तुरंत सावधान हो जाएं. बाजार में ऐसे ही कई सारे चैनल और ठग बैठे हुए हैं जो पांच हजार रुपये से लेकर पांच करोड़ रुपये तक की वसूली के लिए भांति भांति के प्रस्ताव तैयार लिए हुए हैं और आदमी की शक्ल देखकर उसकी औकात के मुताबिक प्रस्ताव खोलते व बांचते हैं. जो भी चैनल आपसे पैसे लेकर या सेक्युरिटी मनी लेकर या बैंक गारंटी लेकर या माइक आईडी के लिए टोकन मनी की बात कह कर नौकरी देने की बात करे तो समझो वो फ्रॉड है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

स्मार्टफोन ‘फ्रीडम 251’ : आइए इस फ्रॉड फोन के कुछ प्रमुख फीचर्स के बारे में जानें

-देश के सभी बड़े अख़बारों में इस फोन का डबल साइड विज्ञापन छापा गया है जिसमें करोड़ों रूपए खर्च हुए. कंपनी के मालिकों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं कि वो इतना पैसा खर्च करें विज्ञापन में.  कंपनी के तीनों डायरेक्टर गांव से आनेवाले सामान्य परिवार के लोग है। तीनों मुजफ्फरनगर के शामली तहसील के रहनेवाले वाले हैं। रिंगिंग बेल्स के डायरेक्टर मोहित गोयल का बैकग्राउंड भी ऐसा नहीं है कि वो इतनी बड़ी मात्रा में फ़ोन का उत्पादन कर सकें. उनके पास मोबाइल फोन इंजीनियरिंग का भी अनुभव नहीं है.

-अगर डायरेक्टर इतने सामान्य परिवार के लोग हैं तो करोड़ों रुपये का विज्ञापन अखबार में कैसे दे रहे हैं? यह पैसा कहां से आ रहा है? डायरेक्टरों की हैसियत तो अखबार में मैट्रिमोनियल एड छपवाने की भी नहीं दिख रही है। अगर डायरेक्टरों की माली हालत यब है तो फिर उनकी फैक्ट्री कहां है? वे कह रहे हैं कि नोएडा और उत्तराखण्ड में उनकी फैक्ट्री है। लेकिन न तो उस फैक्ट्री का पता बता रहे हैं और न ही फैक्ट्री होने का कोई सबूत दे रहे हैं। दावा है कि ये मेक इन इन्डिया प्रोडक्ट है लेकिन जब उत्पादन इकाई नहीं है तो ये मेक इन इण्डिया फोन कैसे हो गया?

-इस फोन को बुक करने वाली रिंगिंग बेल्स कंपनी की वेबसाइट लगातार क्रैश हो जा रही है. पता चला है कि वेबसाइट पर किसी दूसरे स्मार्टफोन की फोटो लगा रखी थी जिसे लांच होने के बाद हटा दिया गया। सूत्रों का कहना है कि दरअसल फ्रीडम 251 फोन चीन की चीप कंपनी एडकॉम का आईकॉन-4 फोन है. इसे ही नए नाम से इण्डिया में बेचा जा रहा है. यह फोन ढाई हजार का होता तो भी मंहगा सौदा नहीं होता. लेकिन कीमत के दसवें हिस्से में चड्ढा साहब की यह कंपनी फोन क्यों बेच रही है? लांचिंग के बाद फोन को खुरचने पर चीनी कंपनी एडकॉम का लोगो सबके सामने आ गया जबकि एडकॉम का कहना है कि उन्होंने रिंगिंग बेल से कोई समझौता ही नहीं किया. तो क्या चोरी छिपे एडकॉम के कुछ फोन खरीदकर उसपर तिरंगा पेन्ट कर दिया गया और लोगो पर पेन्ट लगाकर उसे फ्रीडम 251 बना दिया गया?

-फ्रीडम-२१५ की वेबसाइट सबसे बड़ा शक पैदा कर रही है जहां फोन के लिए सीधे पेमेन्ट किया जाना है वह वेबसाइट सिक्योर गेटवे (HTTPS) पर नहीं है. क्या कोई ईकॉमर्स कंपनी इतनी नादान हो सकती है कि अपने पेमेन्ट गेटवे के साथ इतना बड़ा खिलवाड़ करे कि हैकर आसानी से वहां दर्ज होनेवाले क्रेडिट और डेबिट कार्ड की पहचान में सेंध लगा दे? आर्डर बुकिंग होने पर डिलिवरी का टाइम तीन से छह महीने का दिया जा रहा है। यानी जून से नवंबर के बीच डिलिवरी दी जाएगी। बुकिंग के बाद वे इतना टाइम क्यों मांग रहे हैं? आनलाइन बुकिंग पर जो डिलवरी आमतौर पर तीन से छह दिन में आ जाती है उसके लिए तीन से छह महीने क्यों मांग रहे हैं? अगर फ्रीडम इतनी बड़ी डिजिटल क्रांति है तो फिर फ्लिपकार्ट, अमेजन जैसी किसी ट्रस्टेड ईकामर्स रिटेल कंपनी का इन्वाल्वमेन्ट क्यों नहीं है? क्या इसलिए कि पोल खुलने का डर है? आनलाइन आर्डर के वक्त पेमेन्ट का एक आप्शन कैश पेमेन्ट का भी होता है डिलिवरी के वक्त। फिर यह कंपनी सारा पैसा एडवांस में क्यों ले रही है? कैश आन डिलिवरी का आप्शन क्यों नहीं है?

-250 रुपए में 4 इंच डिस्प्ले, 1.3 GHz प्रोसेसर, 1GB RAM,8 GB स्टोरेज, फ्रंट और रियर कैमरा जैसे फीचर वाले एंड्रायड स्मार्टफोन की कल्पना ही नामुमकिन है. रिंगिंग बेल्स कंपनी का कहना है कि फोन के लिए कोर्इ सरकारी सब्सिडी नहीं ली गर्इ है. कंपनी प्रेसिडेंट चड्ढ़ा ने कटआफ कैपेसिटी 2.5 से 3 लाख फोन बतार्इ है लेकिन कंपनी के मालिक मोहित गोयल ने बताया है कि कंपनी 25 लाख आर्डर लेगी। मीडिया को जो फोन दिखाया गया है वह दिल्ली स्थित एक आयातक एडकाम का लोगो लिए है. फोन की डिजाइन आर स्पेसिफिकेशन काफी हद तक एडकाम आइकन 4 फोन जैसे ही हैं.  लेकिन कंपनी का कहना है कि यह एक प्रोटोटाइप है और केवल बाडी आर लोगो एडकाम से मिलता है अन्यथा फ्रीडम 251 के इंटरनल कंपोनेंट्स एकदम अलग होंगे.

-इसका मतलब यह है कि कंपनी बिना डिजाइन और कंपोनेंट्स फाइनल किए ही फोन बेच रही है. यूजर्स को यह भी नहीं पता कि जिस फोन पर वे अपना पैसा खर्च कर रहे हैं वह आखिर दिखता कैसा है. रिंगिंग बैल्स की अभी तक खुद की कोर्इ फैक्ट्री नहीं है जहां यह फोन बनाया जाएगा. कंपनी की नोएडा में केवल असेंबली यूनिट है जहां इसे असेंबल किया जाएगा. मीडिया में कंपनी के मालिक मोहित गोयल ने बताया है कि डिलीवरी मार्च के अंत या अप्रेल तक शुरू हो जाएगी, तो क्या केवल डेढ़ महीने में ही कंपनी फैक्ट्री प्रोडक्शन आैर टैस्टिंग का काम कर लेगी?

-मोबाइल मैन्यूफैक्चरर्स को भारत में फोन बेचने से पहले ब्यूरो आफ इंडियन स्टैंडर्ड से सर्टिफिकेशन लेना जरूरी होता है. यह तय करता है कि प्लास्टिक बाडी, बैटरी और फोन रेडिएशन स्वास्थय के लिए हानिकारक तो नहीं है. लेकिन रिंगिंग बैल्स बीएसआर्इ की मैन्यूफैक्चरर्स की लिस्ट में शामिल नहीं है. सर्टिफिकेशन प्रोसेस बेहद लंबा और पेचीदा है. तो सवाल उठता है कि क्या रिंगिंग बैल्स डिलीवरी देने से पहले सर्टिफिकेशन ले सकेगा।

-फ्रीडम 251 एक दिन भारत में बनाया जाएगा लेकिन फिलहाल इसके कंपोनेंट्स आयात हो रहे हैं. लान्च के समय कंपनी प्रेसिडेंट चड्ढ़ा ने बताया था कि इसके पार्ट्स चीन से आयात होंगे. इसके बाद उन्होंने एक मीडिया वार्ता में कहा कि रिंगिंग बैल्स ने एडकाम से इसलिए कंपोनेंट्स लिए हैं क्योंकि यह एक भारतीय कंपनी है और इसके सभी पार्ट्स भारतीय होंगे. इसका मतलब यह निकलता है कि अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि रिंगिंग बैल्स अपने फोन के लिए कंपोनेंट्स कहां से मंगाएगा. मतलब कि फोन ग्राहक को नहीं पता है कि उसे क्या बेचा जाएगा.

-रिंगिंग बैल्स ने लान्च के समय बताया था कि वह 2.5 लाख फोन बेचना चाहती है. इसके बाद कंपनी के मालिक मोहित गोयल ने 25 लाख फोन बेचने का इरादा जताया. कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर छह लाख हिट पर सेकंड का दावा किया. इसके बाद दिए एक इंटरव्यू में कंपनी प्रेसिडेंट ने कहा कि वेबसाइट पर 63 लाख प्रति सेकंड हिट मिल रहे हैं. ऐसा क्यों हो रहा है कि हर बार कंपनी की ओर से बताया जा रहा डाटा बदल रहा है. फ्रीडम 251 में कर्इ आइकन इस्तेमाल किए गए हैं जो सीधे एप्पल से उठाए गए लगते हैं. ऐसा करना कापीराइट कानून का साफ-साफ उल्लंघन होगा.

-इस तमाशे के बाद हरकत में आई कारपोरेट मिनिस्ट्री ने भी अपनी जांच आरंभ कर दी है. कुछ बीजेपी नेताओं तक ने ट्राई को चिट्ठी लिखी है और सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग करते हुए इसकी बुकिंग रोकने की अपील की है. सभी लोगों का कहना है कि पूरी जांच पड़ताल के बाद ही फोन बेचने की इजाजत देनी चाहिए नहीं तो ढाई सौ रुपये का फोन किसी को मिले या न मिले, अगर एकाध करोड़ लोगों ने भी बुकिंग कर ली ये ठग ढाई तीन सौ करोड़ के मालिक बन जाएंगे.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यूपी यूके केंद्रित एक नए लांच होने वाले रीजनल न्यूज चैनल के मालिक की कारस्तानी

एक नया रीजनल न्यूज चैनल आने वाला है. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड केंद्रित. इसके मालिकान ने प्रोडक्शन हाऊस के नाम पर नोएडा के सेक्टर 18 के कॉरपोरेशन बैंक से 23 करोड़ का लोन लेने की योजना बनाई थी. उसमें खूब सारे फर्ज़ी कागज़ात लगाए गए थे.

जांच पड़ताल के बाद धोखाधड़ी पता चली. इस कारण लोन तो पास हुआ नहीं, उल्टे बैंक के द्वारा निर्धारित की गई बैंक लिमिट भी कैंसल कर दी गई है. ज्ञात हो कि ये चैनल काफी समय से लांच होने वाला है और लांच से पहले ही इसके कई एडिटर बदल चुके हैं. चैनल के मालिक चाहते हैं कि हर स्ट्रिंगर से वे पहले ही पैसे ले लें सिक्योरिटी मनी के नाम पर ताकि उनकी जेब से कोई पैसा न जाए. इस कंजूसी मक्खीचूसी के कारण चैनल लांच होने से पहले ही काफी बदनाम हो गया है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पर्ल ग्रुप की संपत्तियों की नीलामी के लिए सुप्रीम कार्ट ने कमेटी बनाई

हाल ही में करीब 50,000 करोड़ रूपये की हेराफरी के मामले में केंद्रीय जांच एजेंसी ने पर्ल ग्रुप के मालिक निर्मल सिंह भंगू को गिरफ्तार किया था. उन पर निवेशकों के साथ धोखाधड़ी का आरोप लगा था. अब खबर आ रही है कि पर्ल ग्रुप की संपत्तियों की नीलामी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी बना दी है. कोर्ट ने पूर्व जज आर एम लोढा की अध्यक्षता में कमेटी बनाई. सेबी के जरिये लोगों को पैसे लौटाया जाएगा और यह कमेटी इस बात की निगरानी रखेगी कि किस तरह अगले 6 महीनों में लोगों के कर्ज को चुकाया जा सके. सेबी को इस केस से जुड़े सारे दस्तावेज़ इस कमेटी को सौंपना होगा.

कंपनी पर पोन्जी योजना के जरिए निवेशकों के 55 हजार करोड़ रुपये की ठगी का आरोप है. P7 न्यूज़ चैनल और पर्ल्स ग्रुप के चेयरमैन निर्मल सिंह भंगू के साथ सीबीआई ने 4 दूसरे लोगों को भी गिरफ्तार किया है. कंपनी पर आरोप है कि इसने करीब 6,00,00,000 निवेशकों से 49,100 करोड़ रुपए जुटाये हैं. सेबी के आदेश के मुताबिक अगर पीएसीएल ब्याज समेत ये रकम रिफंड करती है तो उसे करीब 55,000 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था करनी होगी.

इस मामले की जांच सेबी के अलावा सीबीआई और ईडी भी कर रहे हैं. सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि कंपनी के चारों कार्यकारियों को सीबीआई के मुख्यालय पर गहन पूछताछ के बाद गिरफ्तार किया गया। पूछताछ के दौरान उन्होंने बिना तालमेल वाले जवाब देने शुरू किए और साथ ही सहयोग करना भी बंद कर दिया, जिसके बाद उन्हें अरेस्ट कर लिया गया। इनके खिलाफ IPC की धारा 120B (आपराधिक साजिश) तथा 420 (धोखाधड़ी) की धाराओं में मामला दायर किया गया है। निवेशकों को भारी रिटर्न का लालच देकर उनसे धन जुटाया गया था.

सीबीआई ने 19 फरवरी, 2014 को पर्ल्स के 60 साल के संस्थापक निर्मल सिंह भंगू पर देश के इतिहास में सबसे बड़े चिटफंड घोटाले को चलाने की आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी करने के आरोप में मामला दर्ज किया था। करीब 2 साल बाद अब उसे सीबीआई गिरफ्तार करने में सफल हुई है। घोटाले की रकम 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 5 करोड़ से ज्यादा छोटे निवेशकों से पर्ल्स एग्रोटेक कॉर्पोरेशन लिमिटेड और पर्ल्स गोल्डन फॉरेस्ट लिमिटेड के नाम पर धोखे से ली गई थी। पर्ल्स की ये दोनों कंपनियां जमीन-जायदाद का कारोबार करती दिखाई गईं थीं।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

INS NEWS TV Channel की आड़ में जुआ सट्टा का कारोबार!

INS NEWS TV Channel चैनल की आड़ में मुम्बई चैनल आफिस में जुआ सट्टा का कारोबार चलता है. यह जानकारी आईएनएस संचालक एवं यूपी चैनल हेड गोविन्द मिश्रा ने दी. उनसे बातचीत की पूरी रिकार्डिंग सुरक्षित है. INS NEWS TV Channel के नाम से पूरे देश के युवाओं और पत्रकारों को गुमराह किया जा रहा है. इनके द्वारा पहले चैनल के बारे में व्हाट्सएप पर जानकारी दी जाती है.  यह काम के सी शर्मा द्वारा किया जाता है. फिर चक्रव्यूह में फंसाने का काम INS NEWS का संचालक एवं यूपी चैनल हेड गोविन्द मिश्रा करते हैं.

INS NEWS चैनल को ये लोग सैटेलाईट चैनल बताते हैं जबकि यह कोई सैटेलाईड चैनल नहीं है. फ्रिक्वेंसी मांगे जाने पर वे महीनों गुमराह करते रहे. चैनल में काम देने के नाम पर गोविन्द मिश्रा का उप्र का बैक एंकाउट का नंम्बर दिया जाता है. ये लोग लुभावने फोटोग्राफ दिखाते हैं. फर्जी ओवी वैन का प्रदर्शन करने से भी नहीं कतराते. इन दिनों मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार आदि प्रदेशों में INS TV NEWS के नाम पर लाखों रुपये की वसूली की जा रही है.

मप्र में प्रदेश ब्यूरो चीफ बनाकर लाखों रुपयों धोखाधड़ी करने का मामला देश में छाया हुआ है. रुपये वसूल कर यह गुट पार्टियों का फोन उठाना बंद कर देता है और नया शिकार तलाशने निकल पड़ते हैं. इस घोटाले की शीघ्र जांच की जाना चाहिए एवं गोविन्द मिश्रा का उप्र का बैक एंकाउट नंम्बर की भी जांच की जाना चाहिए. INS NEWS TV Channel के एम डी अजय परिहार भी इस खेल में भागीदारी निभाते हैं और अनेकों बहाने बनाकर उल्लू सीधा करने में माहिर हैं. इनके द्वारा मप्र में शिकार हुए व्यक्ति ने बताया कि गोविन्द मिश्रा के एकाउंट में रुपये जमा किए थे. गोविन्द मिश्रा, केसी शर्मा और अजय परिहार लगातार छ: माह तक गुमराह करते रहे.

भोपाल से विनय जी डेविड की रिपोर्ट. संपर्क: 09893221036

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘लाइव इंडिया’ चैनल के मालिक मुंबई पुलिस से छूटे तो उड़ीसा पुलिस धर ले गई

समृद्ध जीवन नामक चिटफंडिया कंपनी का मालिक महेश मोतेवार जो लाइव इंडिया नामक न्यूज चैनल भी चलाता है, पिछले दिनों मुंबई पुलिस के हत्थे चढ़ गया था. उस पर जनता को भरमाने, धोखा देने, पैसा हड़पने, गैर कानूनी चिटफंडी योजनाएं चलाने समेत कई आरोप हैं और वह काफी समय से फरार चल रहा था. सूत्रों का कहता है कि महेश मोतेवार ने कई वरिष्ठ पत्रकार और संपादक पाल रखे हैं जो उनके लिए लाइव इंडिया चैनल की आड़ में दलाली व लायजनिंग करते हैं.

इन संपादकों और चिटफंड कंपनी के मैनेजरों ने पैसे व संपर्क के बल पर तीन तिकड़म से महेश मोतेवार को मुंबई पुलिस के चंगुल से छुड़वा तो लिया लेकिन इंतजार में बैठी उड़ीसा पुलिस महेश मोतेवार को पकड़ कर ले कर चली गई. सूत्र बताते हैं कि लाइव इंडिया चैनल व इसके अन्य मीडिया उपक्रमों में दो महीने से सेलरी नहीं आई है. महेश मोतेवार ने कह रखा था कि वह जल्द छूट जाएगा, सेटिंग हो गई, और तब सेलरी आ जाएगी. लेकिन अब जब उड़ीसा पुलिस से ले गई तो लोग चर्चा कर रहे हैं कि आखिर यह दुकान कितने दिन चल पाएगी?

पूरे मामले को समझने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर एक-एक कर क्लिक करते जाएं>

लाइव इंडिया का मालिक महेश मोतेवार चिटफंड घोटाले में गिरफ्तार


महेश मोतेवार दो दिन के रिमांड पर, 58 जगहों पर छापे, सतीश के सिंह भी नपेंगे


Samruddha Jeevan Fraud : महेश किशन मोटेवार समेत तीन डायरेक्टरों की संपत्ति कुर्क करने के आदेश


चिटफंड के ‘चैनलों’ से सावधान! मीडियाकर्मियों की जिंदगी नरक बना देते हैं ये

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

भंगू का हाल में ही किडनी बदला गया है, जेल प्रशासन रखेगा ध्यान

देश के सबसे बड़े पौंजी घोटाले में गिरफ्तार पर्ल्स समूह के सीएमडी निर्मल सिंह भंगू का अभी हाल में ही किडनी ट्रांसप्लांट हुआ है. इस बात का उल्लेख उनके दो वकीलों ने कोर्ट में सुनवाई के दौरान किया. भंगू के अधिवक्ता मनीष जैन और विजय अग्रवाल ने अदालत से कहा कि भंगू का हाल में किडनी प्रत्यारोपण हुआ है इसलिये जेल में उनकी नियमित जांच होनी चाहिये. साथ ही उनकी मेडिकल कंडीशन के मुताबिक इलाज व दवाइयां दिए जाने की मांग की. अदालत ने इस पर कहा कि जेल प्रशासन इसका ध्यान रखेगा. वकीलों की यह मांग भी कोर्ट ने मान ली कि उन्हें रोजाना एक घंटे अपने क्लाइंट यानि भंगू से मुलाकात की अनुमति दी जाए.

पर्ल्स समूह के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक निर्मल सिंह भंगू और तीन अन्य को 45,000 करोड़ रुपए की कथित धोखाधड़ी मामले में एक स्थानीय अदालत ने 14 दिन की न्याययिक हिरासत में भेज दिया. मुख्य महानगर दंडाधिकारी सुगंधा अग्रवाल ने सीबीआई के यह कहने पर कि अब हिरासत में उनसे पूछ-ताछ की जरूरत नहीं है, आरोपियों को छह फरवरी तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया. अदालत ने कहा, ‘आरोपियों को 14 दिन के पुलिस रिमांड के बाद अदालत में पेश किया गया. अब 14 दिन की न्यायिक हिरासत के लिए एक याचिका दायर की गई है. आवेदन में दी गई वजहों के तहत इसकी मंजूरी दी जाती है.’

इस प्रकार ये लोग 6 फरवरी तक के लिए जेल भेज दिए गए. इन पर आपाराधिक साजिश रचने और धोखाधड़ी के आरोप हैं. सीबीआई ने इन आरोपियों को आठ जनवरी को दो साल की लंबी जांच पड़ताल के बाद गिरफ्तार किया था. जांच के आदेश उच्चतम न्यायालय ने दिये थे.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

तिहाड़ जेल के हवाले हुए चिटफंड के सरगना भंगू और उनके गिरोह के प्रमुख सदस्य

चिटफंड कंपनियों पीएसीएल और पर्ल्स ग्रुप के मालिक भंगू समेत कई घपलेबाजों को 14 दिन के लिये दिल्ली की तिहाड़ जेल में भेज दिया गया है। अदालत ने उसे और उसके साथियों को न्यायिक हिरासत में रखने का फैसला किया है। पर्ल्स समूह के सीएमडी और प्रबंधक निदेशक निर्मल सिंह भंगू और उसके तीन अन्य साथियों को 45,000 करोड़ रूपये की धोखाधड़ी मामले में अदालत ने 14 दिन के लिए जेल भेजा है। अदालत ने कहा, ‘आरोपियों को 14 दिन के न्यायिक रिमांड के बाद अदालत में पेश किया गया। अब अगले 14 दिन की न्यायिक हिरासत के लिए एक याचिका दायर की गई है। आवेदन में दी गई वजहों के तहत इसकी मंजूरी दी जाती है।’

सीबीआई ने बताया कि निर्मल सिंह भंगू के अलावा जिन आरोपियों को जेल भेजा गया है उनमें सुखदेव सिंह एमडी तथा प्रमोटर डायरेक्टर पर्ल्स एग्रोटेक कॉरपोरेशन, गुरमीत सिंह एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर वित्त तथा सुब्रत भट्टाचार्य हैं। चारों आरोपियों को गत आठ जनवरी को गिरफ्तार किया गया था। इस बीच महाराष्ट्र की पुलिस ने एक दूसरे मामले में निर्मल सिंह भंगू की हिरासत की मांग की है।

पर्ल्स गोल्डन फारेस्ट लिमटेड (पीजीएफ) के चेयरमैन एंव प्रबंध निदेशक तथा पर्ल्स आस्ट्रेलिसिया प्रा. लिमिटेड के पूर्व चेयरमैन भंगू के अलावा पीएसीएल के प्रबंध निदेशक और प्रवर्तक-निदेशक सुखदेव सिंह, कार्यकारी निदेशक (वित्त) गुरमीत सिंह और पीजीएफ एवं पीएसीएल में कार्यकारी निदेशक सुब्रत भट्टाचार्य को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। दो साल से इस मामले की जांच चल रही थी जिसमें सीबीआई अधिकारियों ने पर्ल्स कंपनी के 1300 बैंक खातों का पता लगाया और 108 करोड़ रुपये हाईकोर्ट में जमा कराए थे। सीबीआई ने भंगू तथा कंपनी से संबंधित संपत्तियों के 20 हजार दस्तावेज बरामद किए थे। इनका मूल्य करीब पांच हजार करोड़ आंका गया है। दिल्ली में भंगू की 583 एकड़ भूमि भी मिली है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Blunder by HT : Mitali is not the only women gallantry awardee…

Dear Mr Singh,

Hope you doing well!

This mail is in regards to the misinterpretation of facts by HT which has defamed an army officer (Capt CR Leena) from being the first Indian lady to get a gallantry award in the Indian Army.

I came to know about this blunder by HT when i met Major Sanjay Dhadhwal, office manager for an MNC in India and also  defamed officer’s husband. He showed me the article written by Bhadra Sinha of Hindustan times on oct 16th 2015 stating “Lt Col Mitali Madhumita is the Army’s only woman gallantry awardee in the country”.  If going according to facts she is not the only women gallantry awardee in our country in-fact she is second to Capt (Miss)C R Leena.

Mails have been already sent to HT and also to the journalist seeking corrigendum but they are not replying back. I would be highly obliged if you can be of any help in this matter.

I am attaching with mails the link of the article by HT and some facts, which proves that Capt C R Leena was felicitated with the award before Lt Col Mitali.

Hope you will be help the officer in getting back her pride.

Thanks and Regards,

Darshan Pandey

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नई दुनिया, बस्तर के ब्यूरो प्रमुख भंवर बोथरा के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज

बस्तर छत्तीसगढ़ में नई दुनिया के ब्यूरो प्रमुख भंवर बोथरा के खिलाफ जगदलपुर के सिटी कोतवाली में धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया है। इस मामले में इनके परिवार की चार महिलाओं और चार पुरुषों को आरोपी बनाया गया है। थाना प्रभारी बी एस खूंटिया ने बताया कि इस मामले में बलदेव बोथरा बिल्डर्स के मुख्य कर्ताधर्ता भंवर बोथरा समेत कुल पंद्रह लोगों को आरोपी बनाया गया है। इसमें नगर पालिक निगम जगदलपुर के आयुक्त रमेश जायसवाल, कार्यपालन अभियंता एसबी शर्मा, नगर एवं ग्राम निवेश (टाऊन प्लानिंग) के सहायक संचालक एस आर असगरा और पटवारी सत्यनारायण सेठिया शामिल हैं। 

बस्तर महाराजा दलपत देव भंजदेव ने करीब 600 वर्ष पूर्व इस ऐतिहासिक तालाब का निर्माण करवाया था। उस समय इसका रकबा 1000 एकड़ था। अब यह रकबा सिमट कर 300 एकड़ तक पहुँच चुका है। नई दुनिया के ब्यूरो प्रमुख भंवर बोथरा ने तालाब के कैचमेन्ट एरिया की भूमि को अपनी कंपनी बलदेव बोथरा डेवलपर्स के नाम करवाया। करीब सात एकड़ भूमि पर आठ मंज़िला कॉलोनी बनाने की तैयारी शुरू की गई। शासन के नियमानुसार आठ मंज़िला कॉलोनी के लिए साठ फीट चौड़ी सड़क का होना अनिवार्य है। इस अनिवार्यता को पूरा करने राजस्व रिकॉर्ड में छेड़छाड़ की गई। फ़र्ज़ी तरीके से नक़्शे में कूटरचना कर सड़क प्रदर्शित कर नक्शा स्वीकृत करवाया गया।

तालाब को पाटते हुए नगर निगम ने 3 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली इस सड़क का ठेका भी भंवर बोथरा की कंपनी को दे दिया। अर्थात सरकारी पैसों से निजी कॉलोनी की सड़क बनने लगी वो भी ऐतिहासिक धरोहर को मिटाते हुए। शहर के 75 वर्षीय समाजसेवी मदन दुबे ने दलपत सागर बचाओ आंदोलन की शुरुवात की। अतिक्रमण के साक्ष्य पुलिस को देकर एफ आई आर दर्ज करने का निवेदन किया गया। बिल्डर अखबार की आड़ लेकर लगातार बचता गया। फिर जगदलपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश भदौरिया ने मदन दुबे की तरफ से जगदलपुर न्यायलय में परिवाद पेश किया।

चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट विजय कुमार साहू ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का आदेश 30 दिसंबर को जारी किया। न्यायालयीन आदेश के बाद जगदलपुर पुलिस ने 3 जनवरी को मामला कायम कर लिया है। भा .द. वि. की धारा 409, 420, 467, 465, 471 और 120 (बी) के तहत सभी के खिलाफ नामजद मामला कायम कर लिया गया है। छत्तीसगढ़ के सभी प्रमुख दैनिक अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता से छापा है। नई दुनिया अखबार ने हमेशा ही इस मामले पर पर्दा डालने की कोशिश की है और इस मामले में भी ब्यूरो चीफ की खबर न छाप कर अपनी तथाकथित विश्वसनीयता में थोड़ा और इज़ाफ़ा कर लिया है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अंतत: अरेस्ट हो गए चिटफंड कंपनियों पीएसीएल और पर्ल्स ग्रुप के दिग्गज निर्मल सिंह भंगू, सुखदेव सिंह, गुरमीत सिंह और सुब्रत भट्टाचार्य

सीबीआई ने 45 हजार करोड़ रुपये के घोटाले में पीएसीएल व पर्ल्स ग्रुप के सीएमडी निर्मल सिंह भंगू तथा इनके तीन सहयोगी एमडी सुखदेव सिंह, गुरमीत सिंह, सुब्रत भट्टाचार्य को गिरफ्तार कर लिया है। इन्हें पोंजी स्कीम केस के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया। बताया जा रहा है कि ये लोग लगातार बयान बदल रहे थे और जांच में सहयोग नहीं कर रहे थे। सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार भंगू के साथ पीएसीएल के प्रमोटर-डायरेक्टर तथा एमडी सुखदेव सिंह, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर (फाइनेंस) गुरमीत सिंह तथा ईडी सुब्रत भट्टाचार्य से शुक्रवार को एजेंसी के मुख्यालय में विस्तृत पूछताछ की गई।

इसके बाद सभी को गिरफ्तार कर लिया गया। आरोप है कि इन लोगों ने कृषि भूमि के विकास तथा बिक्री के नाम पर देश भर के 5.5 करोड़ निवेशकों से 45 हजार करोड़ रुपये एकत्रित किए थे। निवेशकों को भारी रिटर्न का लालच दिया गया था। जांच में पता चला है कि आरोपियों ने पीड़ितों को फर्जी भूमि आवंटन पत्र दिए थे। सीबीआई सूत्रों के मुताबिक छानबीन में भारत तथा विदेश में करोड़ों रुपये की बेनामी संपत्ति के भी दस्तावेज मिले हैं। यह भी पता चला है कि पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने जब पर्ल्स गोल्डेन फॉरेस्ट लिमिटेड (पीजीएफ) को स्कीम बंद करने तथा निवेशकों का रुपया वापस करने का आदेश दिया तो पर्ल्स एग्रोटेक कारपोरेशन लिमिटेड (पीएसीएल) के नाम से वैसी ही दूसरी फर्जी योजना चला दी गई।

इसका ऑफिस नई दिल्ली के बाराखंभा में खोला गया और पीएसीएल से मिले रुपये पीजीएफ के निवेशकों को लौटाने में इस्तेमाल किए गए। लोगों से पैसा ऐंठने के लिए पूरे देश में लाखों कमीशन एजेंट का जाल बिछाया गया था। इन एजेंटों को मोटा कमीशन दिया जाता था। पीएसीएल और इसके प्रमोटर रहे निर्मल सिंह भंगू के खिलाफ ईडी और सीबीआई का शिकंजा लगातार कसता जा रहा था. पिछले महीने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने देश के कई शहरों में पीएसीएल के दफ्तरों पर छापे मारे थे.

मनी लांड्रिंग रोकथाम कानून के तहत दिल्ली, मुंबई, मोहाली, चंडीगढ़ और जयपुर में छापे मारे गए थे. सन् 2015 में सीबीआई की एफआईआर के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने पीएसीएल के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज किया था. इसके बाद जांच शुरू कर दी थी. पीएसीएल ने रीयल एस्टेट प्रोजेक्ट के नाम पर बिना पूंजी बाजार नियामक की मंजूरी लिए सामूहिक निवेश योजनाएं यानी पोंजी स्कीम चलाई. इसके जरिए निवेशकों से करीब 45 हजार करोड़ रुपये जुटाए गए, जिसे वसूलने का आदेश दिया गया था.

सीबीआई जांच से पता चला कि इन्होंने पांच करोड़ निवेशकों को लूटा. कुल 45 हजार करोड़ रुपये निवेशकों से इकठ्ठा किए. बटोरी गई बेहिसाब दौलत को निजी फायदे के लिए इस्तेमाल किया. इस दौलत का बड़ा हिस्सा विदेश ले गए. ऑस्ट्रेलिया में कारोबार शुरू किया. यूपी में ठगे गए 1.30 करोड़ निवेशक. महाराष्ट्र में लुटे 61 लाख निवेशक. तमिलनाडु में लुटे 51 लाख लुटे निवेशक. राजस्थान में लुटे 45 लाख निवेशक. हरियाणा में लुटे 25 लाख निवेशक.

संबंधित खबरें>

पीएसीएल का फ्रॉड और भंगू का झूठ : इनके सामने सहाराश्री तो बेचाराश्री नजर आते हैं


भंगू, भट्टाचार्या समेत पीएसीएल के नौ प्रमोटरों-डायरेक्टरों के खिलाफ फ्राड-चीटिंग का मुकदमा चलेगा


बिहार में पीएसीएल के चार ठिकानों पर छापेमारी, बैकडेट में जमा करा रहे थे पैसे


‘PACL’ की असलियत : परिपक्वता अवधि पूर्ण होने के बाद भी एजेंट का लाखों रुपये दाबे बैठी है कंपनी


49 हजार करोड़ रुपये के PACL Chitfund Scam में CBI ने अब तक किसी की गिरफ्तारी क्यों नहीं की : ममता बनर्जी


PACL कंपनी दिवालिया, निवेशकों का धावा, मालिक भंगू फरार, सीबीआई टीमें कर रही तलाश


पीएसीएल ने भारतीय तंत्र को दिखाया ठेंगा, पाबंदी के बावजूद जमकर उगाही जारी


पीएसीएल के निवेशक परेशान, भंगू ने सम्मन फेंका कूड़ेदान में, एजेंसियां लाचार


पीएसीएल और पर्ल ग्रुप की संपत्ति बेचकर निवेशकों का पैसा लौटाने के आदेश, पेड मीडिया ने इस बड़ी खबर पर साधी चुप्पी


पीएसीएल वाले निर्मल सिंह भंगू के कई ठिकानों पर ईडी ने की छापेमारी


सुब्रत राय की राह पर निर्मल सिंह भंगू… SEBI ने दिया आदेश- निवेशकों को 50 हजार करोड़ रुपये PACL लौटाए


लाइव इंडिया का मालिक महेश मोतेवार चिटफंड घोटाले में गिरफ्तार


महेश मोतेवार दो दिन के रिमांड पर, 58 जगहों पर छापे, सतीश के सिंह भी नपेंगे

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Arise India Limited : पढ़िए इस नालायक कंपनी की कहानी एक पीड़ित पत्रकार की जुबानी

Sanjaya Kumar Singh : नाम अराइज Arise India Limited. – लक्षण चिर निद्रा में सोने वाले। मैंने पिछले साल आपकी कंपनी का एक गीजर चैम्पियन 25 लीटर खरीदा था। कुछ ही महीने उपयोग करने का बाद टपकने लगा। इस साल गीजर की जरूरत शुरू हुई तब से शिकायत करने की कोशिश करते हुए जब शिकायत दर्ज करा पाया तो मेकैनिक ने बताया कि टैंक बदलना पड़ेगा। मेरे पास खरीदने की रसीद थी, गारंटी कार्ड उस समय नहीं था। मेकैनिक फिर आने की कहकर गया और लापता रहा। दीवाली की छुट्टी के चक्कर में मैने फोन नहीं किया। फोन मिला तो बताया गया कि मैकेनिक ने कहा है कि मेरे पास गारंटी कार्ड नहीं है – इसलिए मामला खत्म।

कंपनी ने मुझे ना तो यह जानकारी देने और ना मुझसे कुछ पूछने की जरूरत समझी जबकि शिकायत करने पर मुझे एक कोड दिया गया था और शिकायत दूर हो जाने पर मुझे मेकैनिक को वह कोड बताना था। सुनने में यह व्यवस्था बहुत अच्छी लगी पर है सिर्फ दिखावा। मैंने बताया कि मेरे पास गारंटी कार्ड है और मैंने कहा भी था कि ढूंढ़ने पर मिल जाएगा। पर मेकैनिक तो कंपनी के निर्देशों का पालन कर रहा था और चूंकि काम लंबा है इसलिए मुफ्त में करने से बचने की कोशिश चल रही है। मैंने 16 नवंबर 2015 को दुबारा शिकायत कराई है जिसका नंबर है UP00115611055779 – पूरे दो दिन बाकायदा गुजर गए पर ना कोई आया ना फोन। गीजर के उपयोग का समय निकला जा रहा है और अराइज नाम से उत्पाद बेचने वाली कंपनी अपनी सुस्ती के पूरे सबूत दे रही है। गारंटी एक साल की है और एक महीने रह गए हैं।

कंपनी शायद कोशिश कर रही है कि किसी तरह यह एक महीना निकल जाए। पिछली शिकायत का नंबर है – UP0011561101848 जो 04.11.2015 की है। कंपनी ने गारंटी के 365 में से 14 दिन निकाल दिए हैं। ईमेल से शिकायत कोई नहीं देखता ना फीडबैक भेजने पर जवाब आता है। फोन कभी मिलता है कभी नहीं – उठता तो बहुत ही कम है। औऱ यह समस्या सिर्फ उपभोक्ता सेवा के साथ नहीं कंपनी के मुख्यालय के फोन के साथ भी है। कौन कहता है – नाम का असर होता है। यहां तो पूरा मामला अराइज का उल्टा है। पिछले साल तक यह कंपनी अच्छा काम कर रही थी विज्ञापन भी आ रहे थे और सुना 800 करोड़ रुपए की कंपनी है और 800 की गारंटी पूरी करने में ये हाल।


मैंने पिछली बार लिखा था कि जिस कंपनी का नाम Arise India Limited है, उसके लक्षण चिर निद्रा में सोने वाले हैं। पर अब लग रहा है कंपनी होश में आ गई है और अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पा रही है। जैसा कि मैं लिख चुका हूं, पिछले साल मैंने कंपनी का एक गीजर चैम्पियन 25 लीटर खरीदा था। कुछ ही महीने उपयोग करने का बाद टपकने लगा। इस साल गीजर की जरूरत शुरू हुई तब से शिकायत करने की कोशिश करते हुए जब शिकायत दर्ज करा पाया तो मेकैनिक ने बताया कि टैंक बदलना पड़ेगा। मेरे पास खरीदने की रसीद थी, गारंटी कार्ड उस समय नहीं था। मेकैनिक फिर आने की कहकर गया और लापता रहा। दीवाली की छुट्टी के चक्कर में मैने फोन नहीं किया। फोन मिला तो बताया गया कि मैकेनिक ने कहा है कि मेरे पास गारंटी कार्ड नहीं है – इसलिए मामला खत्म।

कंपनी ने मुझे ना तो यह जानकारी देने और ना मुझसे कुछ पूछने की जरूरत समझी जबकि शिकायत करने पर मुझे एक कोड दिया गया था और शिकायत दूर हो जाने पर मुझे मेकैनिक को वह कोड बताना था। सुनने में यह व्यवस्था बहुत अच्छी लगी। पर है सिर्फ दिखावा। मैंने बताया कि मेरे पास गारंटी कार्ड है और मैंने कहा भी था कि ढूंढ़ने पर मिल जाएगा। पर मेकैनिक तो कंपनी के निर्देशों का पालन कर रहा था और चूंकि काम लंबा है इसलिए मुफ्त में करने से बचने की कोशिश चल रही है। मैंने 16 नवंबर 2015 को दुबारा शिकायत कराई जिसका नंबर UP00115611055779 था। कुछ नहीं हुआ। शिकायत अपने आप गायब। गीजर के उपयोग का समय निकला गया और अराइज नाम से उत्पाद बेचने वाली कंपनी अपनी सुस्ती के पूरे सबूत देती रही। गारंटी एक साल की है और शिकायत कराने के बाद काम होने में दो महीने लग गए। अभी हुआ इतना ही है कि ग्राहक शिकायत के इनके नंबर पर रोज बात हो जा रही है और रोज कल कह दिया जा रहा है।

पहली बार, 4 नवंबर 2015 को दर्ज कराई गई शिकायत का नंबर है – UP0011561101848 और भले ही कंपनी ने गारंटी कार्ड ना होने के बहाने इसे खत्म कर दिया लेकिन 23 नवंबर से दर्ज शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है, यह कंपनी के रिकार्ड में है। मैं पहले लिख चुका हूं कि ई-मेल से शिकायत कोई नहीं देखता ना फीडबैक भेजने पर जवाब आता है। फोन कभी मिलता है कभी नहीं – उठता तो बहुत ही कम है। औऱ यह समस्या सिर्फ उपभोक्ता सेवा के साथ नहीं कंपनी के मुख्यालय के फोन के साथ भी है। कौन कहता है – नाम का असर होता है। यहां तो पूरा मामला अराइज का उल्टा है। पिछले साल तक यह कंपनी अच्छा काम कर रही थी विज्ञापन भी आ रहे थे। और अब यह हाल।

असल में, गीजर का टैंक सबसे महत्त्वपूर्ण और महंगा, खराब होने वाला हिस्सा है। मेरे गीजर का टैंक ही खराब है। और इन्हें अच्छा या कुछ दिन चलने वाला टैंक नहीं मिल रहा है। लगता है, कंपनी मेरे लिए कोई अच्छा या खास टैंक ढूंढ़ रही है ताकि वो फिर खराब ना हो और मैं फिर फेसबुक अभियान ना छेड़ दूं। आपको बताऊं कि फेसबुक पर भी कंपनी का पेज है उसपर मेरा लिखा प्रकाशित नहीं हुआ (The page owner will review your post) यानी देखकर प्रकाशित किया जाएगा। उसके बाद मैंने सोचा था हर सप्ताह एक अखबार में शिकायत छपवा दूं। पहले में छपने के बाद दूसरे में नहीं छपा। जो बेचारा यह कॉलम देखता है उसने अपनी लाचारी बता दी। विज्ञापनों के दम पर चलने वाली कंपनियां आजकल ऐसे ही काम करती हैं। और हम मेक इन इंडिया और मेक फॉर इंडिया में लगे हैं। कंज्यूमर की चिन्ता न कंपनियों को है और न बगैर किसी सेवा के सर्विस टैक्स वसूलने वाली सरकार को।

वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने अनुवादक संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पीएसीएल वाले निर्मल सिंह भंगू के कई ठिकानों पर ईडी ने की छापेमारी

पीएसीएल और इसके प्रमोटर रहे निर्मल सिंह भंगू के खिलाफ शिकंजा कसता जा रहा है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने देश के कई शहरों में पीएसीएल के दफ्तरों पर छापे मारे। ईडी निवेशकों से गैरकानूनी तरीके से जुटाई गई करीब 60 हजार करोड़ रुपये की राशि के मामले में मनी लांड्रिंग के पहलू की जांच कर रहा है। यह राशि कई पोंजी स्कीमों के जरिये जुटाई गई।

ईडी के अधिकारियों ने बताया कि पर्ल और इसके निदेशकों व सहयोगियों के ठिकानों पर मनी लांड्रिंग रोकथाम कानून के तहत दिल्ली, मुंबई, मोहाली, चंडीगढ़ और जयपुर में छापे मारे गए हैं। सीबीआई की एफआईआर के आधार पर इस साल की शुरुआत में प्रवर्तन निदेशालय ने पीएसीएल के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया था। कंपनी के खिलाफ कई सरकारी एजेंसियां जांच में जुटी हुई हैं। पर्ल पर आरोप है कि इसने रीयल एस्टेट प्रोजेक्ट के नाम पर बिना पूंजी बाजार नियामक की मंजूरी लिए अनधिकृत रूप से सामूहिक निवेश योजनाएं यानी पोंजी स्कीमें चलाईं। इनके जरिये निवेशकों से कई सालों में तकरीबन 60 हजार करोड़ रुपये जुटाए गए।

देश की सबसे बड़ी गैरकानूनी धन उगाही स्कीम के चलते शिकंजे में फंसे पीएसीएल (पर्ल) के निदेशक निर्मल सिंह भंगू सेबी के खिलाफ सैट के शरण में पहुंच गए हैं। पूंजी बाजार नियामक सेबी ने 22 अगस्त 2014 को पीएसीएल और भंगू समेत कंपनी के सभी निदेशकों को निवेशकों सेवसूले गए लगभग 50 हजार करोड़ रुपये वापस करने का आदेश दिया था। अब यह रकम ब्याज समेत लगभग साठ हजार करोड़ रुपये पहुंच गई है।

इस बीच रामपुर से खबर है कि सिविल लाइंस क्षेत्र में डीएम आवास किनारे स्थित पर्ल बनाम पीएसीएल लिमिटेड के ऑफि‍स में मुरादाबाद के एजेंट्स ने जमकर हंगामा किया। इस दौरान मौका पाकर ऑफि‍स मैनेजमेंट और कर्मचारी वहां से खिसक लिए। पड़ोसी जिले मुरादाबाद से पहुंचे एजेंटों के मुताबिक, उन्हें कई दिन से पीएसीएल के ऑफि‍स में रुपयों के जमा होने की सूचना मिल रही थी, जिसके चलते शुक्रवार को एजेंट यूनियन ने ऑफि‍स पर छापा मारा। छापे के दौरान ऑफि‍स में बदस्तूर काम जारी मिला। साथ ही बैकडेट में कलेक्शन जमा किया जा रहा था।

एजेंट की बात पर अगर यकीन किया जाए तो सेबी और हाईकोर्ट ने पर्ल बनाम पीएसीएल को ग्राहकों का रुपया आगे जमा करने पर रोक लगा रखी है। यह रोक 22 अगस्त 2014 से जारी है। इसके बावजूद कंपनी बदस्तूर हाईकोर्ट और सेबी के आदेशों का उल्लंघन करते हुए ग्राहकों से रुपया जमा कर रही है। साथ ही पुराने जमा रुपयों के प्लान की मैच्योरिटी होने के बावजूद पिछले करीब एक साल से कोई भुगतान नहीं कर रही है।

सेबी ने वर्ष 2014 में तीन महीने में ग्राहकों का भुगतान करने के आदेश दिए थे। ऐसा नहीं होने पर ग्राहकों और अभिकर्ताओं में जबरदस्त नाराजगी है। इसी के चलते आज अभिकर्ताओं की यूनियन ने कंपनी के ऑफि‍स पहुंचकर सारी ट्रांसएक्शन बंद करवा दी। इस दौरान ऑफि‍स मैनेजमेंट और कर्मचारी मौका देखकर वहां से खिसक लिए। साथ ही आक्रोशित अभिकर्ताओं ने कंपनी ऑफि‍स में ही डेरा डाल लिया। अभिकर्ताओं ने टीडीएस काटने और आयकर विभाग को सूचना न देने का इल्जाम भी लगाया। कलेक्शन एजेंट्स का मानना है कि इस तरह पूरे यूपी और इंडि‍या में कंपनी ने हजारों करोड़ जनता का रुपया ठग लिया है और फ्रॉड जारी है। इसपर यूनियन ने पुलिस और जिला प्रशासन को सूचना देकर कार्रवाई और जांच की मांग की है।

इन्हें भी पढ़ें>

लाइव इंडिया का मालिक महेश मोतेवार चिटफंड घोटाले में गिरफ्तार


महेश मोतेवार दो दिन के रिमांड पर, 58 जगहों पर छापे, सतीश के सिंह भी नपेंगे


भंगू, भट्टाचार्या समेत पीएसीएल के नौ प्रमोटरों-डायरेक्टरों के खिलाफ फ्राड-चीटिंग का मुकदमा चलेगा


सेबी का आदेश- पीएसीएल नामक कंपनी के पास कोई मान्यता नहीं, जनता पैसा न लगाए


बिहार में पीएसीएल के चार ठिकानों पर छापेमारी, बैकडेट में जमा करा रहे थे पैसे


‘PACL’ की असलियत : परिपक्वता अवधि पूर्ण होने के बाद भी एजेंट का लाखों रुपये दाबे बैठी है कंपनी


49 हजार करोड़ रुपये के PACL Chitfund Scam में CBI ने अब तक किसी की गिरफ्तारी क्यों नहीं की : ममता बनर्जी


PACL कंपनी दिवालिया, निवेशकों का धावा, मालिक भंगू फरार, सीबीआई टीमें कर रही तलाश


पीएसीएल ने भारतीय तंत्र को दिखाया ठेंगा, पाबंदी के बावजूद जमकर उगाही जारी


पीएसीएल के निवेशक परेशान, भंगू ने सम्मन फेंका कूड़ेदान में, एजेंसियां लाचार


पीएसीएल और पर्ल ग्रुप की संपत्ति बेचकर निवेशकों का पैसा लौटाने के आदेश, पेड मीडिया ने इस बड़ी खबर पर साधी चुप्पी


पीएसीएल पर सेबी ने अब तक का सबसे बड़ा जुर्माना लगाया, देने होंगे 7269 करोड़ रुपये

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: