‘पीहू’ आपके विजुअल हैबिट को बदलती है… ये सिनेमा के पुराने आस्वाद से मुक्ति की तरह भी है : गीताश्री

Geeta Shree : पीहू पर कुछ लिखना बहुत आसान नहीं. पीहू को परदे पर देखना एक दहला देने वाला अविस्मरणीय अनुभव है जो आपको दहशत के साथ साथ गिल्ट से भरता जाता है. रोमन पोलिंस्की की बात याद आती है- सिनेमा आपका सबकुछ भुला देता है, जब आप थियेटर में बैठे हों.” Share on:कृपया हमें …

आजकल मैं “दी” संप्रदाय से आक्रांत हूं : गीता श्री

Geeta Shree : एक पोस्ट “दी” संप्रदाय के लिए…

पत्रकारिता में अपनी सीनियर को ” दी” का चलन नहीं. वो तो साहित्य में आकर देखा जाना. जिन्हें मै पहले ” जी” लगा कर संबोधित करती थी, उन्हें ” दी” कहने लगी. अच्छा लगा. फिर मुझे ” दी” कहने वाले आ गए, खोह से निकल के. जिन्हें जानती नहीं, पहचानती नहीं, वे भी दी दी की रट लगाए आ धमकीं. चलो, ये भी मंज़ूर.