आजकल मैं “दी” संप्रदाय से आक्रांत हूं : गीता श्री

Geeta Shree : एक पोस्ट “दी” संप्रदाय के लिए…

पत्रकारिता में अपनी सीनियर को ” दी” का चलन नहीं. वो तो साहित्य में आकर देखा जाना. जिन्हें मै पहले ” जी” लगा कर संबोधित करती थी, उन्हें ” दी” कहने लगी. अच्छा लगा. फिर मुझे ” दी” कहने वाले आ गए, खोह से निकल के. जिन्हें जानती नहीं, पहचानती नहीं, वे भी दी दी की रट लगाए आ धमकीं. चलो, ये भी मंज़ूर.