बिहार की कचहरियों में देवनागरी लिपि में हिन्दी प्रयोग के लिए ‘बिहार बंधु’ अखबार को हमेशा याद किया जाएगा

वह भी क्या समय रहा होगा जब कोर्ट-कचहरियों में हिन्दी में बहस करना गुनाह माना जाता था, उन वकीलों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। बोल-बाला था तो अंग्रेजी का। जज को ‘श्रीमान’ कहने वाले कम और ‘मी लार्ड’ कहने वाले अधिक। धोती-कुरता जैसे भारतीय परिधान धारण कर कोर्ट में उपस्थित होने वालों की संख्या कम और हाय-हल्लो कहने वाले पैंट, शर्ट, टाई और हैटधारियों की संख्या अधिक। ऐसी बात नहीं कि तब हिन्दी के प्रचार की गति मंद थी। दरअसल उस वक्त प्रचारक ही कम थे। नवजागरण और हिन्दी की यत्र-तत्र सर्वत्र मजबूती के साथ स्थापित करने का बीड़ा यदि किसी ने उठाया तो वह था बिहार का प्रथम हिन्दी पत्र ‘बिहार बन्धु’।

फोटो खींचने के लिए दस से बीस किमी तक साइकिल से ही जाते थे किशनजी

: शून्य से शिखर की यात्रा तय की कृष्ण मुरारी किशन ने : कृष्ण मुरारी किशन नहीं रहे। सुन कर अवाक रह गया। अभी दस दिन पहले ही उनसे मुलाकात हुई थी। उनके बढते पेट के आकार को लेकर हंसी मजाक का दौर भी चला। खाते पीते घर की निशानी है पेट, कह कर उन्होंने ठठाकर हंसने को मजबूर कर दिया था। कौन जानता था कि इतनी जल्दी हम लोगों से विदा ले लेंगे। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि सन 70 के दशक में हमने पत्रकारिता आरंभ की तो उन्होंने छायाकारिता। टूटही बिना ब्रेक की सायकिल उखड़ी सीट पर मोटा सा तकिया और कंधे पर झोला। शुरुआती यही पहचान थी किशनजी की।