बिहार की कचहरियों में देवनागरी लिपि में हिन्दी प्रयोग के लिए ‘बिहार बंधु’ अखबार को हमेशा याद किया जाएगा

वह भी क्या समय रहा होगा जब कोर्ट-कचहरियों में हिन्दी में बहस करना गुनाह माना जाता था, उन वकीलों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। बोल-बाला था तो अंग्रेजी का। जज को ‘श्रीमान’ कहने वाले कम और ‘मी लार्ड’ कहने वाले अधिक। धोती-कुरता जैसे भारतीय परिधान धारण कर कोर्ट में उपस्थित होने वालों की संख्या कम और हाय-हल्लो कहने वाले पैंट, शर्ट, टाई और हैटधारियों की संख्या अधिक। ऐसी बात नहीं कि तब हिन्दी के प्रचार की गति मंद थी। दरअसल उस वक्त प्रचारक ही कम थे। नवजागरण और हिन्दी की यत्र-तत्र सर्वत्र मजबूती के साथ स्थापित करने का बीड़ा यदि किसी ने उठाया तो वह था बिहार का प्रथम हिन्दी पत्र ‘बिहार बन्धु’।

बिहार में ‘आज’ अखबार की दशा-दिशा : जाने कहां गए वो दिन…

बिहार में “आज” अखबार की स्थिति अच्छी नहीं है. चूँकि मैं इसके स्थापना काल से जुड़ा रहा हूँ इसलिए मुझे असह्य पीड़ा हो रही है. अगले एक दशक के भीतर यह अखबार अपने प्रकाशन के एक सौ  वर्ष पूरे करने जा रहा है. वाराणसी से प्रकाशित होने वाला “आज” का बिहार कार्यालय सन १९७७ में पटना के टीएन बनर्जी रोड में खुला और बयूरोचीफ़ बने श्री पारसनाथ सिंह. मैं पहले से ही आज का पटना में संवाददाता था. बिहार की राजधानी पटना से इसका प्रकाशन २८ दिसम्बर १९७९ को शुरू हुआ.