हिन्दी के दाँत खाने के कुछ, दिखाने के कुछ

हिंदी दिवस पर विशेष

जयराम शुक्ल

दिलचस्प संयोग है कि हिन्दी दिवस हर साल पितरपक्ष में आता है। हम लगे हाथ हिन्दी के पुरखों को याद करके उनका भी श्राद्ध और तर्पण कर लेते हैं। पिछले साल भोपाल में विश्व हिंदी सम्मेलन रचा गया था। सरकारी स्तर पर कई दिशा-निर्देश निकले,संकल्प व्यक्त किए गए। लगा मध्यप्रदेश देश में हिन्दी का ध्वजवाहक बनेगा, पर ढाँक के वही तीन पांत। सरकार हिन्दी को लेकर कितनी निष्ठावान है,यह जानना है तो जा के भोपाल का अटलबिहारी हिंदी विश्वविद्यालय की दशा देख आइए। विश्वविद्यालय की परिकल्पना यह थी कि विज्ञान,संचार से लेकर चिकित्सा और अभियंत्रिकी तक सभी विषय हिन्दी में पढ़ाएंगे। आज भी विश्वविद्यालय नामचार का है। सरकार को अपने नाक की चिंता न हो तो इसे कब का बंद कर चुकी होती। हाँ नरेन्द मोदी को इस बात के लिए साधुवाद दिया जाना चाहिए कि वे हिन्दी के लोकव्यापीकरण में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें विदेशों में भी हिंदी में सुनकर अच्छा लगता है। जब बहुत ही जरुरी होता है तभी वे अँग्रेजी में बोलते हैं।

हिंदी वाले आईएएस बनने का सपना अब छोड़ ही दें!

सफलता के हज़ार साथी होते हैं, किन्तु असफलता एकान्त में विलाप करती है। यूँ तो सफलता या असफलता का कोई निश्चित गणितीय सूत्र नहीं होता, किन्तु जब पता चले कि आपकी असफलता कहीं न कहीं पूर्व नियोजित है, तो वह स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक है। देश की सबसे बड़ी मानी जाने वाली आईएएस की परीक्षा को आयोजित करने वाली संस्था ‘संघ लोक सेवा आयोग’ आज घोर अपारदर्शिता और विभेदपूर्ण व्यवहार में लिप्त है।