जिसने ‘जनसंदेश’ की धज्जियां उड़ाईं, आज वही संपादक

सतना (मप्र) : जनसंदेश जब बाजार में आया तो उन दिनों सतना में ये कहा जाता था कि ये दिल्ली का अखबार हैं. उसके पीछे का कारण बताया जाता था कि पेपर के संपादक और पूरी टीम बाहर की है. 16 नंबर पेज को लेकर बवाल होता था. जिसे लोकल करने की मांग होती थी. जैसा वहां के पेपरों का 16 नंबर पेज लोकल था. जनसंदेश में काम करने वाले रिपोर्टर दिमाग कहीं और से लेते थे. पेपर को डुबाने की पूरी तैयारी थी . या मालिकों तक यह संदेश जाये कि बाहर की टीम बेकार है, काम नहीं कर पा रही है. 

जनसंदेश टाइम्स की छपाई मशीन का गिरा शटर, आनन-फानन में सहारा की मशीन में छपा 5 हजार कापी

वाराणसी से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समाचार पत्र जनसंदेश टाइम्स का इन दिनों उल्टी गिनती बड़ी तेजी से शुरू है। बंदी के कगार पहुंच चुके इस समाचार पत्र में पिछले दिनों रात नौ बजे उस वक्त हड़कंप मच गया, जब रोहनियां प्रिंटिंग प्रेस में पैसे के अभाव में कागज के रील की व्यवस्था नहीं हो सकी। आनन-फानन में दैनिक समाचार पत्र की सहारा से तालमेल कर प्रतियां छापी गयी। हालांकि इस समाचार पत्र के लिए यह कोई नया संकट नहीं है। रील के अभाव में हर दूसरे-तीसरे दिन प्रतियां नहीं छपती। बीते दिनों रात में कंपनी की मैनेजिंग कमेटी ने निर्णय लिया कि अब प्रिटिंग प्रेस, रोहनियां का शटर ही गिरा दिया जाए।