मजीठिया, मालिक, पत्रकार और एक मेढक की कहानी

(यह कहानी उन लोगों के लिए सबक है, जो मानते हैं कि अखबार मालिकों के शक्तिशाली तंत्र के चलते मजीठिया वेज बोर्ड के लिए लड़ी जा रही लड़ाई की सफलता नामुमकिन है। चारों ओर फैली भीतरी नकारात्मकता उनके हौसले तोड़ती है। इस कहानी को पढि़ए और अपने भीतर झांक कर सफलता का मार्ग ढूंढिए, क्योंकि हिम्मत करने वालो की कभी हार नहीं होती…)

सभी में होती है काबिलियत 

एक  सरोवर में बहुत सारे मेंढक रहते थे। सरोवर के बीचोबीच पुराना धातु का खंभा भी था, जिसे सरोवर बनवाने वाले राजा ने लगवाया था। उसकी सतह चिकनी थी। एक दिन मेंढकों के दिमाग में आया कि क्यों न एक रेस करवाई जाए। प्रतियोगियों को खंभे पर चढऩा होगा और जो पहले ऊपर पहुंच जाएगा, वही विजेता होगा।

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घने कोहरे और ठण्ड़ के चलते रज्जाक अभी रजाई में ही दुबका पड़ा था। मन ही मन अपनी आंखें मूंदे शायद यह सोच रहा था कि आज स्कूल न जाना पड़े और छुट्टी का कोई बहाना मिल जाये। मगर अम्मीजान के बनाए परांठों की महक आते ही तपाक से उठ खड़ा हुआ। अब कोई बहाना नहीं था..देर सबेर अपना बस्ता तैयार करता रज्जाक फिर भी न जाने कितने बहाने कर रहा होगा स्कूल न जाने के। कभी अब्बूजान के चक्कर लगाता तो कभी बहन नज़मा के इर्द गिर्द मिन्नतें करता रहा कि कैसे भी हो कोई बहाना मिल जाए उसे, आज तो अल्लाह से भी कई बार दुआ कर चुका था। अपने स्कूल के दिनों शायद हर कोई ऐसे ही नाटक करता है।