भगवान स्वरूप कटियार के कविता संग्रह “अपने-अपने उपनिवेश” का लोकार्पण

करुणा, प्रेम को वापस लाते हैं भगवान स्वरूप कटियार, नरेश सक्सेना की अध्यक्षता में मायामृग और मदन कश्यप का काव्यपाठ

लखनऊ। प्रेम नफरत के विरुद्ध युद्ध है। भगवान स्वरूप कटियार अंधे प्रेम के नहीं आंख वाले प्रेम के कवि हैं। उनकी कविताओं के संदर्भ कविता के अन्दर नहीं बाहर है। उनकी कविताओं में जो प्रेम है वह निश्छल प्रेम है। यह मनुष्यता के प्रति प्रेम है। यहां जटिल मनोभावों की सरल अभिव्यक्ति है। जटिलताओं को सरल शब्दों में कहा गया है। जब कटियार जी कहते हैं कि दोस्ती से बड़ी विचारधारा नहीं होती तो वे उस विचारधारा को ही प्रतिष्ठित करते हैं जो बेहतर इंसानी दुनिया को बनाने की है। सबके अपने-अपने उपनिवेश हैं। हम जहां निवेश करते हैं, वहीं उपनिवेश बना लेते हैं। कटियार जी जैसा कवि बार-बार सचेत करता है। हमें देखना होगा कि हमारे भीतर तो कोई उपनिवेश नहीं खड़ा हो रहा है। अगर खड़ा हो रहा है तो उसे ढहाना होगा।