आशुतोष जैसा एक मीडियॉकर पत्रकार और बौनी संवेदना का आदमी ही इतनी विद्रूप बातें बोल सकता है!

Vishwa Deepak : गजेन्द्र नामक ‘किसान’ की आत्महत्या के बारे में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष कहते हैं- ”यह अरविंद केजरीवाल की गलती है. उन्हें मंच से उतर जाना चाहिए था.उन्होंने गलती की. अगली बार मैं केजरीवाल को कहूंगा कि वो मंच से उतर पेड़ पर चढ़ें और लोगों को बचाएं.”

किसान की खुदकुशी और बाजारू मीडिया : कब तक जनता को भ्रमित करते रहोगे टीआरपीखोर चोट्टों….

(भड़ास के संपादक यशवंत सिंह)


उदात्त दिल दिमाग से सोचिए. इस एक किसान की खुदकुशी का मामला हो या हजारों किसानों के जान देने का… सिलसिला पुराना है… महाकरप्ट कांग्रेस से लेकर महापूंजीवादी भाजपा तक के हाथ खून से रंगे हैं…. अहंकारी केजरीवाल से लेकर बकबकिया कम्युनिस्ट तक इस खेल में शामिल हैं. कारपोरेट-करप्ट मीडिया से लेकर एलीट ब्यूरोक्रेशी और विकारों से ग्रस्त जुडिशिरी तक इस सिस्टमेटिक जनविरोधी किसानविरोधी खेल में खुले या छिपे तौर पर शामिल है… ताजा मामला दिल्ली में संसद के नजदीक जंतर मंतर पर केजरीवाल के सामने हुआ इसलिए सारी बंदूकें केजरीवाल की तरफ तनवा दी गई हैं क्योंकि इससे देश भर में किसानों को मरने देते रहने के लिए फौरी तौर पर जिम्मेदार महापूंजीवादी भाजपा, महाकारपोरेट परस्त मोदी और लुटेरी भाजपा-कांग्रेस समेत अन्य जातिवादी करप्ट क्षेत्रीय राज्य सरकारों के मुखियाओं के बच निकलने का सेफ पैसेज क्रिएट हो जाता है और भावुक जनता मीडिया के क्रिएट तमाशे में उलझ कर ‘आप’ ज्यादा दोषी या दिल्ली पुलिस ज्यादा दोषी के चक्कर में फंस कर रह जाती है.

ओम थानवी ने भी कह दिया- केजरीवाल अहंकारी

आशुतोष की किताब के आयोजन में केजरीवाल का अहंकार देखकर मैं दंग रह गया था। न राजदीप-शेखर गुप्ता के सवालों का जवाब उन्होंने जिम्मेदारी से दिया, न हॉल में बड़ी संख्या में मौजूद बुद्धिजीवियों का लिहाज किया। उनका कहना था – बस मैं जैसा हूँ, लोग इससे खुश हैं। भावार्थ यह निकलता था कि मैं बाकी सबको ठेंगे पर रखता हूँ। मीडिया की ओर साफ इशारा भी कर दिया था।

भड़ास के एडिटर यशवंत ने ‘आप’ से दिया इस्तीफा… केजरी को हिप्पोक्रेट, कुंठित और सामंती मानसिकता वाला शातिर शख्स करार दिया

(यशवंत सिंह)

: सवाल उठाने वालों को ‘आप’ से बर्खास्त कर केजरीवाल ने अपनी सच्ची शकल दिखा ही दी : अरविंद केजरीवाल की सच्ची शकल सामने आने से कम से कम मुझे बड़ा फायदा हुआ. अच्छी राजनीति को लेकर मन में जो थोड़े बहुत पाजिटिव विचार आए थे, वो खत्म हो गए. राजनीति में डेमोक्रेटिक नहीं हुआ जा सकता, ये समझ में आ गया. भारत जैसे देश में कहने को भले ही शासन की प्रणाली डेमोक्रेसी हो लेकिन यहां डेमोक्रेटिक व्यक्ति नहीं हुआ जा सकता और डेमोक्रेटिक व्यक्ति हुए बिना अच्छी सच्ची राजनीति हो ही नहीं सकती. केजरीवाल डेमोक्रेटिक था ही नहीं, यह साबित हो गया. इसलिए इससे अब किसी अच्छी सच्ची राजनीति की अपेक्षा नहीं की जा सकती.

‘आप’ से बाहर किए गए योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आनंद कुमार और अजित झा

वही हुआ जिसकी आशंका थी. तानाशाही दिखाते हुए सत्ता के नशे में चूर अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी से प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, आनंद कुमार और अजित झा को निकाल बाहर कर दिया है. इन सभी पर पार्टी विरोधी गतिविधियों और घोर अनुशासनहीनता का आरोप लगाया गया है. इसके पहले इन नेताओं को पार्टी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया था. इन नेताओं को पार्टी से निकाले जाने का फैसला लेने का नाटक राष्ट्रीय अनुशासन समिति ने किया. समिति का कहना है कि वह कारण बताओ नोटिस के लिए मिले जवाब से संतुष्ट नहीं है.

योगेंद्र यादव ने पूछा- स्वराज का मंत्र लेकर चली इस यात्रा का ‘स्व’ कहीं एक व्यक्ति तक सिमट कर तो नहीं रह जायेगा?

Yogendra Yadav : आज एक सवाल आपसे… अमूमन अपने लेख के जरिये मैं किसी सवाल का जवाब देने की कोशिश करता हूँ। लेकिन आज यह टेक छोड़ते हुए मैं ही आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ। देश बदलने की जो यात्रा आज से चार साल पहले शुरू हुई थी उसकी दिशा अब क्या हो? पिछले दिनों की घटनाओं ने अब इस सवाल को सार्वजनिक कर दिया है। जैसा मीडिया अक्सर करता है, इस सवाल को व्यक्तियों के चश्मे से देखा जा रहा है। देश के सामने पेश एक बड़ी दुविधा को तीन लोगो के झगड़े या अहम की लड़ाई के तौर पर पेश किया जा रहा है। ऊपर से स्टिंग का तड़का लगाकर परोसा जा रहा है। कोई चस्का ले रहा है, कोई छी-छी कर रहा है तो कोई चुपचाप अपने सपनों के टूटने पर रो रहा है। बड़ा सवाल सबकी नज़र से ओझल हो रहा है।

मोदी जी, आम आदमी के साथ इत्ता बड़ा “ब्लंडर” तो AAP वालों ने भी नही किया था जैसे आप कर रहे हो..

परम आदरणीय मोदी जी..

प्रणाम

ये आपको क्या हो गया है…

चुनाव के पहले और चुनाव के बाद आपकी स्थिति तो सस्ते अखबार में आने वाले
“शादी के पहले और शादी के बाद”
वाले विज्ञापन जैसी हो गयी है..

टैक्स चोर सुभाष चंद्रा पर केजरीवाल सरकार ने लगाया 33 करोड़ का जुर्माना

जी ग्रुप वालों की एक कंपन है सिटी केबल. इसने जमकर कर चोरी की है. इस कारण दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने इस कंपनी के मालिक सुभाष चन्द्रा को 15 दिन के भीतर 33.12 करोड़ रुपए का भुगतान करने का निर्देश दिया है. सिटी केबल कंपनी ने दो साल से मनोरंजन कर नहीं दिया है. सिटी केबल एनसीआर में डिजिटल केबल सेवा देती है.  एस्सेल ग्रुप की कंपनी सिटी केबल पर अप्रैल 2013 से मनोरंजन कर धोखाधड़ी में शामिल होने का खुलासा हुआ है. यह कंपनी सरकार को धोखा देकर गैर कानूनी ढंग से कर चोरी कर रही है. कंपनी ने उपभोक्ताओं से करों के नाम पर पैसा एकत्रित किया.

दिल्ली से बाहर निकलते ही केजरीवाल के मंत्री Gopal Rai ने लाल बत्ती लगी कार धारण कर ली

Yashwant Singh : केजरीवाल के एक मंत्री Gopal Rai लाल बत्ती लगी कार से अपने गांव गए थे. क्या बुरा है भाई. वीवीआईपी कल्चर सिर्फ दिल्ली में खत्म करने का वादा था. कोई यूपी बिहार का नाम थोड़े लिया था ‘आप’ ने. वैसे भी, जंगली प्रदेश यानि यूपी में लाल बत्ती लगी कार से नहीं जाएंगो तो अफसर लोग से लेकर नेता लोग अउर जनता लोग तक इनको मंत्री ही नहीं मानेंगे. इसलिए जैसा देस वैसा भेष. दूसरे, गोपाल जी को अपने गांव के लोगों को भी तो एक बार दिखाना था कि देखो, हम मंत्री बन गया हूं, लाल बत्ती वाला… पों पों पों पों…

केजरीवाल से आज फिर निराश हुए ओम थानवी

Om Thanvi : केजरीवाल को पहली बार किसी सभा में आमने-सामने सुना। आशुतोष की किताब का लोकार्पण था। राजदीप ने वे सारे मुद्दे कुरेदे जो जरूरी थे। जो सब भुला बैठे उन्हें अंत में भूपेंद्र चौबे और शेखर गुप्ता ने पूछ लिया। लेकिन केजरीवाल सबसे दाएं-बाएं ही हुए। सिर्फ साले-कमीने की भाषा के इस्तेमाल पर इतना कहा कि उन्हें ऐसा नहीं बोलना चाहिए था। पर इसमें कोई अफसोस का भाव जाहिर न था।

लूट प्रदेश कह लीजिए या आतंक प्रदेश, चहुंओर मातम का नाम है उत्तर प्रदेश…. (सुनें आडियो टेप)

Yashwant Singh : गजब है उत्तर प्रदेश. भ्रष्टाचार और अराजकता का चरम है इस सूबे में. मीडिया वाले सूबे के युवा मुखिया अखिलेश यादव का चरण दबाने में लगे हैं. ज्यादातर समाजवाद का कोरस गा रहे हैं. कुछ एक जो बोल सकते थे, वे चुप्पी साधे हैं. मीडिया मालिक यूपी सरकार के भारी भरकम विज्ञापन तले दबकर एहसानमंद हैं. इन मालिकों के नौकर किस्म के पत्रकार सरकार से अघोषित रूप से मिले कैश या आवास या दलाली या अन्य सुविधाओं के कारण सरकार के खुलेआम या छिपे प्रशंसक बने हुए हैं. ऐसे में सच्चाई सामने नहीं आ रही.

लव, सेक्स, धोखा और आप…. : ‘आप’ अब राजनीतिक दल नहीं, बल्कि गैंग है…

70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा में 67 विधायक अरविन्द केजरीवाल के हैं. ये सबको मालूम है. कमाल का बन्दा है ये केजरीवाल. क्या सहयोगी, क्या विरोधी. सबको ठिकाने लगा देता है. क्या अपने- क्या पराये. “जो हमसे टकराएगा-चूर चूर हो जाएगा” के मंत्र का निरंतर जाप करता हुआ ये शख़्स ज़ुबाँ से भाईचारे का पैगाम देता है, मगर, वैचारिक विरोधियों को चारे की तरह हलाल करने से बाज नहीं आता.

बनारस की लवंडई और ग़ाज़ीपुर की अक्‍खड़ई का मिलन!

Abhishek Srivastava : बनारस की लवंडई और ग़ाज़ीपुर की अक्‍खड़ई आपस में मिल जाए तो वही होता है जो आज आम आदमी पार्टी के साथ हुआ है। ग़ाज़ीपुर के निवासी और बीएचयू छात्रसंघ के कभी महामंत्री रह चुके छात्र नेता उमेश कुमार सिंह ने मौके पर जो लंगड़ी मारी है, वह कल होने वाली नेशनल काउंसिल की बैठक से पहले रात भर में ही खेल को बिगाड़ने की कुव्‍वत रखता है। उमेशजी की सोहबत में अरविंद केजरीवाल बनारस से चुनाव तो लड़ आए, लेकिन एक बात नहीं समझ पाए कि मुंह में पान घुला हो तो बनारसी आदमी अमृत को भी लात मार सकता है। अगर ग़ाज़ीपुर का हुआ तो खिसिया कर सामने वाले के मुंह पर थूक भी सकता है।

प्रेम से बोलिए, एंटी करप्शन मूवमेंट स्वाहा….

Dilip C Mandal : प्रेम से बोलिए, एंटी करप्शन मूवमेंट स्वाहा ….  अब ऊपर मोदी और नीचे केजरीवाल हैं और इस समय भारतीय जेलों में कौन कौन से भ्रष्टाचारी बंद हैं, आप बताएं. रॉबर्ट वाड्रा या शीला दीक्षित या कोई उद्योगपति या कोई बड़ा अफसर? कौन है जेल में? वहीं, मनमोहन ने राज चाहे जैसा चलाया, लेकिन उनके समय में जो करप्शन में जेल गए, उनमें कुछ नाम ये हैं:

केजरीवाल या आम आदमी पार्टी से वही लोग निराश हो रहे हैं जो बहुत ज्यादा उम्मीद पाले हुए थे

Sanjaya Kumar Singh : मुझे लग रहा है कि अरविन्द केजरीवाल या आम आदमी पार्टी से वही लोग निराश हो रहे हैं जो बहुत ज्यादा उम्मीद पाले हुए थे। जब अन्ना हजारे के साफ मना करने के बावजूद केजरीवाल ने राजनैतिक पार्टी बनाई – तभी साफ हो गया था कि अरविन्द केजरीवाल में वही कीड़े हैं जो नरेन्द्र मोदी या सोनिया गांधी में। पैकिंग अलग है। अन्ना के आंदोलन की सफलता और अपनी नई बनी छवि को कैश कराने की जल्दबाजी में अरविन्द इस्तीफा देकर बनारस गए और मुंह की खाकर लौटे। इस तरह अरविन्द ने बता दिया कि ना उन्हें राजनीतिक समझ है और ना धूर्तता (तभी कभी कोई स्टिंग कर ले रहा है और कभी कोई और)।

केजरीवाल : चेहरा या मुखौटा?

किसी को इंदिरा गांधी का सिडिंकेट से लड़कर मजबूत नेता के तौर पर उभरना याद आ रहा है तो किसी को प्रफुल्ल महंत का असम में सिमटना और फूकन को बाहर का रास्ता दिखा कर एक क्षेत्रीय पार्टी के तौर पर सिमट कर रह जाना याद आ रहा है। किसी को दिल्ली का चुनावी बदशाह दिल्ली में जीत का ठग लग रहा है तो कोई दिल्ली सल्तनत को अपनी बौद्दिकता से ठगकर गिराने की साजिश देख रहा है। कोई लोकतंत्र की हत्या करार दे रहा है तो कोई जनतंत्र पर हावी सत्ताधारी राजनीति को आईना दिखाने वाली राजनीति का पटाक्षेप देख रहा है। एकतरफा निर्णय सुनाने की ताकत किसी में नहीं है। कोई इतिहास के पन्नों को पलटकर निर्णय सुनाने से बचना चाह रहा है तो कोई अपनी जरुरतों को पूरा करने के लिये राजनीति के बदलते मिजाज को देखना चाह रहा है। लेकिन सीधे सीधे यह कोई नहीं कह रहा है कि आम आदमी पार्टी का प्रयोग तो राजनीतिक विचारधाराओं को तिलांजलि देकर पनपा है। जहां राजनेता तो हैं ही नहीं। जहा समाजवादी-वामपंथी या राइट-लेफ्ट की सोच है ही नहीं। जहां राजनीतिक धाराओं को दिशा देने की सोच है ही नहीं। जहां सामाजिक-आर्थिक अंतर्रविरोध को लेकर पूंजीवाद से लड़ने या आवारा पूंजी को संभालने की कोई थ्योरी है ही नहीं। यहा तो शुद्द रुप से अपना घर ठीक करने की सोच है।

केजरीवाल जी, अपने ये घड़ियाली आंसू बंद कीजिये…

Umesh Dwivedi : क्या जॉइंट कमिश्नर इनकम टैक्स की नौकरी बेहतर होती या मुख्यमंत्री की कुर्सी, पावर? केजरी बाबू अब हमें बार बार मत सुनाइए कि आप इनकम टैक्स की नौकरी छोड़ कर आये हैं …आपने कोई अहसान नहीं किया है ..हां यदि आप नौकरी छोड़ कर “मदर टेरेसा” जैसा कोई काम करते तो तब आपके उस कदम को सराहा जाता! आपने उससे बड़ा पद पाया है, ये आपकी महत्वकांक्षा थी, ना कि त्याग ! हर व्यक्ति अपने जीवन में ऊंचाई पर जाने के लिए जोखिम लेता है, वो आपने भी लिया तो कोई बड़ी बात नहीं की. ईसलिये अहसान की ये गठरी आप अपने मुख्यमंत्री आवास के अटाला घर में रख दें. कल आप राष्ट्रपति भवन में थे. क्या ज्वाइंट कमिश्नर रहते हुए आप जा पाते? नहीं, बिलकुल नहीं ….आपने नौकरी छोड़ कर उससे ज्यादा पाया है ..ईसलिये कृपया अपने ये घड़ियाली आंसू बंद कीजिये.

केजरीवाल पर संपादक ओम थानवी और नरेंद्र मोदी पर पत्रकार दयानंद पांडेय भड़के

Om Thanvi : लोकपाल को वह क्या नाम दिया था अरविन्द केजरीवाल ने? जी, जी – जोकपाल! और जोकपाल पैदा नहीं होते, अपने ही हाथों बना दिए जाते हैं। मुबारक बंधु, आपके सबसे बड़े अभियान की यह सबसे टुच्ची सफलता। अगर आपसी अविश्वास इतने भीतर मैल की तरह जम गया है तो मेल-जोल की कोई राह निकल आएगी यह सोचना मुझ जैसे सठियाते खैरख्वाहों की अब खुशफहमी भर रह गई है। ‘साले’, ‘कमीने’ और पिछवाड़े की ‘लात’ के पात्र पार्टी के संस्थापक लोग ही? प्रो आनंद कुमार तक? षड्यंत्र के आरोपों में सच्चाई कितनी है, मुझे नहीं पता – पर यह रवैया केजरीवाल को धैर्यहीन और आत्मकेंद्रित जाहिर करता है, कुछ कान का कच्चा भी।

कवि और नेता कुमार विश्वास पर ‘आप’ महिला कार्यकर्ता के साथ अनैतिक संबंध को लेकर सोशल मीडिया पर माहौल गरम

आम आदमी पार्टी नेता और कवि कुमार विश्वास पर पार्टी की एक महिला कार्यकर्ता से अनैतिक संबंध का आरोप लगा है. मामला लोकसभा चुनावों के दौरान का है लेकिन यह प्रकरण सोशल मीडिया में अब गरम हुआ है. #ExposingKumarVishwas ट्विटर पर टॉप ट्रेंडिंग टॉपिक है. आरोप है कि पिछले साल लोकसभा चुनाव के दौरान अमेठी में उन्‍होंने एक महिला कार्यकर्ता के साथ अनैतिक रिश्‍ते बनाए. एक अंग्रेजी अखबार में इस बारे में खबर छपने के बाद सोशल मीडिया पर यह मुद्दा चर्चा में आ गया. कुमार विश्वास ने इन आरोपों को खारिज किया है. उन्होंने ट्वीट किया है- ”BJP पालित मीडिया का एक हिस्सा और उसके नेट-नकटे भक्त 2 साल के दुष्प्रचार का तीन नंबरी फल दिल्ली में खाकर भी काम पर जुटे है. गजब.”

‘आप’ में लवंडई जारी है… : टीवी पर सबा नक़वी का शर्मनाक बचाव और पुण्य प्रसून का विश्वसनीय कटाक्ष…

Abhishek Srivastava : कोई पत्रकार जब पार्टी बन जाता है तो उसके चेहरे पर डिफेंस की बेचारगी झलकने लगती है। वहीं कभी पार्टी रहा पत्रकार जब अपने पुराने पाले को दूर से देख रहा होता है तो उसके चेहरे पर सच की रेखाएं उभरने लगती हैं। पहले का उदाहरण आज टाइम्‍स नाउ पर प्राइम टाइम पैनल में बैठी सबा नक़वी रहीं तो दूसरे का उदाहरण दस तक में पुण्‍य प्रसून वाजपेयी रहे। सबा ने अरविंद केजरीवाल का जैसे बचाव किया, वह बहुत शर्मनाक था जबकि प्रसून ने कुमार विश्‍वास के स्‍वराज पर दिए बयान को तीन बार दिखाकर पार्टी पर जो कटाक्ष किया, वह ज्‍यादा विश्‍वसनीय लगा। वैसे, दस तक के बैकग्राउंड में जो लिखा था वही पूरी कहानी बताने के लिए काफी था- ”क्रिकेट खत्‍म, खेल शुरू”।

केजरीवाल की असलियत और पूंजीवादी व्‍यवस्‍था का बलात्‍कारी चरित्र

Vimala Sakkarwal : दिल्‍ली सचिवालय पर प्रदर्शन के दौरान वहां जिस तरह लड़कियों को पीटा गया, वो काम इंसान नहीं कर सकते, सिर्फ जानवर ही कर सकते हैं। वहां महिला पुलिस तो थी, लेकिन पुरुष पुलिस ने जिस तरह टारगेट करके ल‍ड़कियों के सिरों पर डंडे मारे, उनके पेटों में डंडे घुसेड़े, उनके नीचे के हिस्‍से में ड़डे घुसेड़े, बहुत विमानवीय था। मेरे हाथों और पेट पर, … पड़ी नीलें इनकी बर्बरता बयान कर रही हैं।

केजरी और इसका गैंग इतने छोटे दिल दिमाग वाला होगा, मुझे उम्मीद नहीं थी

Yashwant Singh : प्राइम टाइम के दौरान जब एनडीटीवी पर कायदे की बहस ना चल रही हो तो मैं फोकस टीवी देखने लगता हूँ। संजीव श्रीवास्तव बेहद सहज और दिल में उतरने वाली एंकरिंग करते हैं। ज्ञान, भाषा और समझ का स्तर ठीकठाक होने के कारण संजीव बड़े प्यार से बहुत नयी नयी बातें निकालते और निकलवाते रहते हैं। साथ ही चीख चिल्लाहट और चीप एंकरिंग की जगह ताजगी भरी स्टाइल का विकल्प भी बाकी एंकर्स को अनजाने में बताते समझाते रहते हैं। 

केजरीवाल ने छात्रों, मजदूरों, शिक्षकों को पिटवाकर बहुत गलत काम किया है

Abhishek Srivastava : कल दिल्‍ली सचिवालय के बाहर छात्रों, मजदूरों और शिक्षकों को पिटवाकर, उन पर आपराधिक मुकदमे लगाकर और जेल में डालकर आपने बहुत गलत काम किया है Arvind Kejriwal… मैं आपको निजी तौर पर कायदे का आदमी समझता था। अब ये मत कहिएगा कि दिल्‍ली पुलिस केंद्र के पास है, आपके पास नहीं।

अबे चिरकुट आपियों, खुद को अब मोदी-भाजपा से अलग कैसे कहोगे…

Yashwant Singh : चोरकट केजरी और सिसोदिया का असली रूप आया सामने.. दिल्ली में पानी के दाम में 10 परसेंट वृद्धि। अबे चिरकुट आपियों, मोदी-भाजपा से खुद को अलग अब कैसे कहोगे। सत्ता पाकर तुम लोग भी आम जन विरोधी हो गए! अरे करना ही था तो चोर अफसरों के यहाँ छापे मरवाकर उनकी संपत्ति जब्त कराते और उस पैसे को बिजली पानी में लगाते। जल बोर्ड के करप्ट अफसरों और पानी माफिया की ही घेराबंदी कर देते तो इनके यहाँ से हजार करोड़ निकल आता। पर अमेरिकी फोर्ड फाउंडेशन के धन पर करियर बनाने वाले इन दोनों नेताओं से अमेरिकी माडल के पूंजीवाद से इतर काम करने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

चुनाव जीतने के बाद सामने आने लगी अहंकारी केजरीवाल की असलियत

Mukesh Kumar : अहंकारी कौन? केजरीवाल या प्रशांत-योगेंद्र?? मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद केजरीवाल ने कहा था कि राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव लड़ने का फ़ैसला अहंकार से प्रेरित था। फिर उन्होंने इस फ़ैसले को नकारते हुए इसके पैरोकारों को पीएसी से बाहर कर दिया। अब वे कह रहे हैं कि पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर अपना विस्तार करेगी। सवाल उठता है कौन अहंकारी है? कहीं ये केजरीवाल का अहंकार तो नहीं बोल रहा था कि मेरे होते हुए फ़ैसला करने वाले तुम तुच्छ लोग कौन होते हो? फैसला करने का हक मेरा और मेरे चमचों का है, किसी और का नहीं इसलिए अब का फ़ैसला सही है और अहंकार रहित है। इस पाखंड पर बलिहारी जाने का मन करता है।

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योगेंद्र और प्रशांत को निपटाने के लिए जी-जान से जुटे केजरी कैंप के नेता

  • ‘आप’ के अंदरखाने एक दूसरे को नीचा दिखाने की जबरदस्त राजनीति चल रही है
  • सत्ता पाते ही आम आदमी पार्टी का चरित्र खास राजनीतिक पार्टियों जैसा हो गया है
  • योगेंद्र और प्रशांत को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर निकालने के लिए लामबंदी

आम आदमी पार्टी के अंदरखाने जबरदस्त खेल चल रहा है. केजरीवाल के इशारे पर उनके भक्त नेता गण प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार बैठे हैं और इसी रणनीति के तहत चालें चल रहे हैं. पूरे मामले को समझने के लिए आपको अंदर के खेल को समझना होगा. टीवी व अखबारों पर जो दिख रहा है, जो छप रहा है, वह बता रहा है कि सब कुछ ठीक रास्ते पर जा रहा है. लेकिन अंदर की कहानी कुछ अलग है. आइए एक एक कर मामले को समझते हैं.

‘आप’ की हरकतें कहीं से भी उसे देश की दूसरी पार्टियों से अलग नहीं करती है

नई दिल्ली। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और मीडिया स्टडीज ग्रुप (एमएसजी) ने मंगलवार को संयुक्त तौर पर “चर्चाः विकल्प की राजनीति का भविष्य” विषय पर एक कार्यक्रम का आय़ोजन किया। चर्चा का संचालन करते हुए मीडिया स्टडीज ग्रुप के अध्यक्ष अनिल चमड़िया ने कहा कि आम आदमी हमेशा अपनी राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए एक नए और मजबूत, सुदृढ़ विकल्प की तलाश करता रहा है। इसी लिहाज से आम आदमी बनाम आम आदमी पार्टी की राजनीति को देखा जाना चाहिए। लेकिन ‘आप’ में प्रशांत भूषण औऱ योगेंद्र यादव को लेकर जो कुछ हो रहा है वह निराशाजनक है।

केजरीवाल सरकार भी बांटने लगी रेवड़ियां, संसदीय सचिव बनाकार 21 MLA को मंत्री पद का दर्ज़ा दिया

Mukesh Kumar :  दिल्ली की केजरीवाल सरकार भी रेवड़ियां बाँटने लगी है। इक्कीस विधायकों को संसदीय सचिव बनाकार मंत्री पद का दर्ज़ा दे दिया गया है। इतने संसदीय सचिव देश के किसी भी राज्य में नहीं हैं। बहुत से राज्यों में तो ये हैं ही नहीं। लगता है किसी असंतोष को दबाने के लिए ऐसा किया गया है, क्योंकि दिल्ली जैसे आधे-अधूरे और छोटे से राज्य में तीन-चार संसदीय सचिवों से काम चल सकता था, इसके लिए इस पैमाने पर रिश्वत ब़ॉटने की ज़रूरत नहीं पड़ती।