आईआईएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान हास्टल वार्डन के प्रशासनिक दायित्व से मुक्त

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन यानि आईआईएमसी में इन दिनों महानिदेशक केजी सुरेश के चमड़े का सिक्का चल रहा है. शिक्षकों से उनकी सीधी भिड़ंत है लेकिन सत्ता शह के बल पर वह लगातार अपनी मनमानी चलाते जा रहे हैं. ताजी सूचना के मुताबिक प्रोफेसर आनंद प्रधान को हॉस्टल वॉर्डन के प्रशासनिक कार्यों के दायित्व से मुक्त कर दिया गया है. चौदह वर्षों से आईआईएमसी से जुड़े और छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय आनंद प्रधान फिलवक्त बतौर एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं.

आनंद प्रधान ने सात शिक्षकों के साथ मिलकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव को पत्र भेजकर केजी सुरेश की मनमानी का जिक्र किया था जिससे सुरेश नाराज हो गए. प्रधान ने यह भी कहा था कि केजी सुरेश ने मीडिया में जो बयान दिया उससे उनका अपमान हुआ और प्रतिष्‍ठा को ठेस पहुंची. शिक्षकों ने पत्र में केजी सुरेश पर एक पक्षीय और अपारदर्शी प्रशासन चलाने का आरोप लगाया. उधर, केजी सुरेश ने सारे आरोपों का सिरे से खंडन किया.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

साक्षात्कार- के.जी. सुरेश (महानिदेशक, आईआईएमसी)

भारत के प्रमुख मीडिया प्रशिक्षण संस्थान आईआईएमसी के महानिदेशक के.जी. सुरेश से पत्रकारिता के वर्तमान स्वरूप व चुनौतियों पर खास बातचीत…

पत्रकारिता के वर्तमान स्वरूप को आप कैसे देखते है?
–भारत में पत्रकारिता मिशन के रूप में शुरू हुई थी। जिसका उद्देश्य देश की आजादी था। आजादी के बाद इसने आपना रूख कामर्शियलाइजेशन की ओर किया। अब इसमें कॉर्पोरेट जगत है, कामर्शियल भी है। विश्व की तमाम बड़ी कंपनियां आज इसमें निवेश कर रही है। मेरा मानना है कि आज के दौर में भारत की पत्रकारिता ऐसे चौराहे पर खड़ी है। जहां से इसे अपना रास्ता चुनना पड़ेगा। उसी रास्ते से इसका भविष्य तय होगा। 

उदंत मार्तण्ड से शुरू हुई पत्रकारिता में आज किस प्रकार के बदलाव देखने को मिलते है?
— समय के साथ समाचार पत्रों के लेखन शैली, ले-आउट आदि में बदलाव आना स्वाभाविक है। आज समाचार पत्रों के सामने टीवी और सोशल मीड़िया, इंटरनेट की चुनौती है। इसलिए बदलाव तो जरूरी है। हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि इन सभी बदलाव के साथ पत्रकारिता की नैतिकता में बदलाव नहीं आए।

पत्रकारिता के लिए कहा जाता है कि “तथ्य पवित्र होते है, भाव स्वतंत्र” पर आज भाव किसी न किसी के गुलाम होते नजर आ रहे है?
— हम जब पत्रकारिता सीख रहे थे, तब हमें बताया गया था कि खबरों के कॉलम में खबर और विचारों के पेज पर विचार होने चाहिए। इन्हें एक दूसरे में मिलाना नहीं है पर आज ऐसा नहीं है। समाचार पत्रों में समाचार और विचारों का मेल प्रस्तुत किया जा रहा है। पत्रकार जिस विचारधारा का विरोद्ध करता है, उसकी खबरों में भी वह विरोद्ध नजर आने लगा है। यह पत्रकारिता के लिए घातक है। इससे पत्रकारिता की विश्वसनियता पर सवाह खड़े होते है। पत्रकार इस बात को जितनी जल्दी मान लें और समझ जाए उनके लिए उतना आच्छा होगा।

टीवी पर बहसों ने समाचार पत्रों में खबरों को किस प्रकार प्रभावित करती है?
—- आज #tag पत्रकारिता का चलन चल रहा है। सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में इंद्राणी मुखर्जी ने किसे मारा, यह पूरे देश का मुद्दा नहीं हो सकता। मुंबई के कुछ अपार्टमेंट में रहने वालों को दिक्कत हो, यह टीवी के बहस का मुद्दा है पर समाचार पत्रों के लिए नहीं। इन पत्रकारों को समझना चाहिए कि जनता बेवकुफ नहीं है, देश में क्या हो यह पत्रकार तय नहीं करेंगे। जनता सब कुछ जानती है और समय आने पर आपना फैसला भी सुना देगी।

पत्रकारिता में आ रहे युवाओं से काम की तो उम्मीद की जाती है पर उन्हें वेतन उस स्तर का नहीं दिया जाता है? 
— पत्रकार हमेशा से शोषित वर्ग रहा है। सरकार ने वेज बोर्ड का गठन तो किया पर उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई। कुछ समाचार पत्रों को छोड़ सभी ने इसका पालन नहीं किया। पत्रकार का स्वतंत्र होना बहुत आवश्यक है। नौकरी खोने के डर से वह काम नहीं कर सकता। तलवार की धार पर उससे काम नहीं कराया जा सकता।

पत्रकार तो हमेशा से समाज में हो रहे शोषण के विरूद्ध आवाज उठाता है पर अपने खिलाफ शोषण का विरोद्ध नहीं कर पाता है?
—- कोई नई बात नहीं है, पहले भी पत्रकार दूसरों के लिए लड़ता रहा। खुद दुर्गत की जिंदगी जीता रहा है। यह बहुत शर्मनाक बात है, इसा होना नहीं चाहिए। अब समय आ गया है कि सरकार पत्रकारों के लिए मूलभूत सूविधाएं मुहैया कराए। पत्रकार आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुए बिना समाजिक सरोकार का काम नहीं कर सकता है।

पत्रकारिता के तेजी से नए-नए प्लेटफॉर्म सामने आ रहे है। ऐसे में किस प्लेटफॉर्म का भविष्य सुरक्षित है?
—- विश्व भर में इंटरनेट का तेजी से विकास हो रहा है। ऐसे कई समाचार पत्र है जिनके ऑनलाइन एडिसन शुरू हो गए है। लेकिन भारत में समाचार पत्र का एक अलग ही महत्व है। यहां समाचार पत्र लोगों की दिनचर्या से जुड़ा हुआ है। यहीं वजह है कि आज समाचार पत्रों के क्षेत्रिय संस्करण निकल रहें है। मैं एक हफ्ते विदेश रह कर आया हूं और सबसें ज्यादा जिस चीज की कमी मुझे नजर आई वह थी समाचार पत्र की।

हिन्दी समाचार पत्रों के नाम तो राष्ट्रीय संस्करण है पर महानगरों की खबरों को ही इसमें जगह मिलती है?
—- मैं, राष्ट्रीय मीड़िया को मानता ही नहीं। देश में दिल्ली का समाचार पत्र दिल्ली का मीड़िया है। उसकी सार्थकता भी वहीं है। समाचार पत्रों में खबरे पाठ्क की रूचि के अनुसार होती है। पाठ्क अपने आस-पास के इलाके की ही खबरों पर ज्यादा ध्यान देता है। वास्त में आदर्श स्थिति तो यह है कि खबरें पूरे देश की हो पर ऐसा होता नहीं। इसलिए यह दिल्ली, चेन्नई, मुंबई का मीड़िया है।

आपने देश-विदेश के कई सेमीनार में भाग लिया है। भारत और विदेश की मीडिया में किस प्रकार से भिन्नता है?
—- मुझे नहीं लगता कि भारत को किसी देश की नकल करनें की आवश्यकता है। हमारी समस्याएं, चुनौतियां और प्राथमिकता अलग है। पति आपनी पत्नी का पार्थिव शरीर लेकर 10 किमी पैदल चलता है। यह हमारे लिए खबर है पर उनके लिए नहीं। कई मायनों में वह हम से बेहतर है। हमारे यहां खबरों के बैकग्राउंड पर काम नहीं किया ज्यादा। जबकि उनकी प्राथमिकता यही है।

जब कोई पत्रकार खुलकर काम करना चाहता है तो उसे कई प्रकार के मुश्किलों का सामना करना पड़ता है?
—- जीवन में आदर्श और नैतिकता होनी चाहिए। वह आदर्श आपको मुश्किलों में शक्ति प्रदान करते है। व्यक्ति को जीवन भर उन आदर्शों को जीवित रखना पड़ता है। आज आप किसी कनिष्ठ पद पर हैं, कल जब किसी वरिष्ठ पद पर कार्यरत होंगे, तब आप आपने अनुसार कार्य कर सकेंगे। लेकिन तब तक आपको आदर्श जीवित रखने पड़ेंगे। ऐसा ना हो कि जब आपके पास मौका आए तब आप आदर्श बेच चुके हो। कुछ काम मजबूरी में करने होने है, इसलिए हम आपने आदर्श बेच दे यह गलत है।

इंटव्यूकर्ता अभिषेक मिश्रा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि के छात्र हैं. उन्होंने यह इंटरव्यू अपने कॉलेज प्रोजेक्ट के तौर पर लिया था. अभिषेके से संपर्क abhi.saurabh1994@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: