अप्लीकेशन भेजा दैनिक जागरण को, पहुंची शशि शेखर के पास (किस्से अखबारों के : पार्ट पांच)

अखबारी दुनिया चरम विरोधाभासों की दुनिया है। ये विरोधाभास भी ऐसे हैं जिनमें कोई सामंजस्य या संतुलन आसानी से नहीं बनता। ये दुनिया ऐसी कतई नहीं है जिसे किसी सरलीकृत सूत्र से समझा जा सके। कोई भी बात कहने-बताने के लिए कई तरह के किंतु-परंतु का इस्तेमाल करना पड़ता है। किसी भी मीडियाकर्मी की पर्सनेलिटी में ऐसे दो चित्र होते हैं जो हमेशा एक-दूसरे से न केवल टकराते हैं, वरन उन्हें खारिज भी करते हैं।