लगता है ‘भास्कर’ के सम्पादक और प्रबंधक पाठकों को मूर्ख समझते हैं!

Krishna Kalpit : ‘भास्कर’ ख़ुद को सबसे विश्वसनीय और नम्बर 1 अख़बार बताता है। आज ‘भास्कर’ के जयपुर संस्करण में जाति-प्रथा के विरोध में एक ख़बर छपी है, जिसमें प्रदेश की सरकारी स्कूलों के रजिस्टर में छात्रों के लिये बने जाति के कॉलम का विरोध किया गया है और जाति-प्रथा को समाज और देश के लिये कलंक बताया गया है। ‘भास्कर’ के इसी अंक में श्री अग्रवाल समाज समिति, जयपुर द्वारा आयोजित श्री अग्रसेन जयंती महोत्सव का पूरे पेज का विज्ञापन छपा है।

यही नहीं इसी अख़बार में हर रविवार को जो मेट्रीमोनियल के क्लासिफाइड विज्ञापन छपते हैं, वे भी जाति आधारित होते हैं। और आजकल तो ख़बरें भी जाति-आधारित होती हैं। करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, गुर्जर, मीणा इत्यादि। यदि ‘भास्कर’ जाति-प्रथा का विरोधी है तो उसे ऐसे विज्ञापन और ऐसी ख़बरें छापना बन्द करना चाहिये। लेकिन लगता है ‘भास्कर’ के सम्पादक और प्रबंधक पाठकों को मूर्ख समझते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और कवि कृष्ण कल्पित की एफबी वॉल से.

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तभी सोनम गुप्ता प्रकट होती है…

Anil Kumar Yadav : पहली बार किसी ने दस रूपए के नोट पर लिखा होगा, सोनम गुप्ता बेवफा है, तब क्या घटित हुआ होगा? क्या नियति से आशिक, मिजाज से आविष्कारक कोई लड़का ठुकराया गया होगा, उसने डंक से तिलमिलाते हुए सोनम को बदनाम करने की गरज से उसे सरेबाजार ला दिया होगा. या वह सिर्फ फरियाद करना चाहता था, किसी और से कर लेना लेकिन इस सोनम से दिल न लगाना.

क्या पता सोनम को कुछ खबर ही न हो, वह सड़क की पटरी पर मुंह फाड़ कर गोलगप्पे खा रही हो, जिंदगी में तीसरी बार लिपिस्टिक लगाकर होठों को किसी गाने में सुने होंठों जैसा महसूस रही हो, अपनी भाभी के सैंडिलों में खुद को आजमा रही हो और तभी वह लड़के को ऐसी स्वप्न सुंदरी लगी हो जिसे कभी पाया नहीं जा सकता. लड़के ने चाहा हो कि उसे अभी के अभी दिल टूटने का दर्द हो, वह एक क्षण में वो जी ले जिसे जीने में प्रेमियों को पूरी जिंदगी लगती है, उसने किसी को तड़प कर बेवफा कहना चाहा हो और नतीजे में ऐसा हो गया हो. यह भी तो हो सकता है कि किसी चिबिल्ली लड़की ने ही अपनी सहेली सोनम से कट्टी करने के बाद उसे नोट पर उतार कर राहत पाई हो.

जो भी हुआ हो लेकिन वह वैसा ही आविष्कारक था या थी जैसा समुद्र से आती हवा को अपने सीने पर आंख बंद करके महसूस करने वाला वो मछुआरा या मुसाफिर रहा होगा जिसे पहली बार नाव में पाल लगाने का इल्हाम हुआ होगा. या वह आदमी जिसने इस खतरनाक और असुरक्षित दुनिया में बिल्कुल पहली बार अभय मुद्रा में कहा होगा, ईश्वर सर्वशक्तिमान है. उसने नोट के हजारों आंखों से होते हुए अनजान ठिकानों पर जाने में छिपी परिस्थितिजन्य ताकत को शायद महसूस किया होगा, वो भी ऐसे वक्त में जब हर नोट को बड़े गौर से देखा जा रहा है, उसके बारे में आपका नजरिया आपको देशभक्त, कालाधनप्रेमी या स्यूडोसेकुलर कुछ भी बना सकता है.

नोटबंदी के चौकन्ने समय में सोनम गुप्ता सारी दुनिया में पहुंच गई, उसके साथ वही हुआ जो सूक्तियों के साथ हुआ करता है. वे पढ़ने-सुनने वाले की स्मृति, पूर्वाग्रहों, वंचनाओं और कुंठाओं के साथ घुलमिल कर बिल्कुल अलग कल्पनातीत अर्थ पा जाती हैं. यह रहस्यमय प्रक्रिया है जिसके अंत में किसी स्कूल या रेलवे स्टेशन की दीवार पर लिखा “अच्छे नागरिक बनिए” जातिवाद के जहर के असर में झूमते समाज में जरा सा स्वाराघात बदल जाने से प्रेरित करने के बजाय कहीं और निशाना लगाने लगता है. सबसे लद्धड़ प्रतिक्रियाएं सरसों के तेल के झार की तासीर वाली नारीवादियों की तरफ से आईं जिन्होंने कहा, सोनू सिंह या संदीप रस्तोगी क्यों नहीं? उन्हें सोनम गुप्ता नाम की लड़कियों की हिफाजत की चिंता सताने लगी जिन्हें सिर्फ इसी एक कारण से छेड़ा जाने वाला था और यह भी कि हमेशा औरत ही बेवफा क्यों कही जाए. हमेशा घायल होने को आतुर इस ब्रांड के नारीवाद को अंजाम चाहे जो हो, “सपोज दैट” में भी मर्द से बराबरी चाहिए. जूते के हिसाब से पैर काटने की जिद के कारण वे अपनी सोनम को जरा भी नहीं पहचान पाईं.

इन दिनों देश में पाले बहुत साफ खिंच चुके हैं और एक बड़े गृहयुद्ध से पहले की छोटी झड़पों से आवेशित गर्जना और हुंकारें सुनाई दे रही हैं. एक तरफ आरएसएस की उग्र मुसलमान विरोधी विचारधारा और प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिपूजा की केमिस्ट्री से पैदा हुए भक्त हैं जो बैंकों के सामने लगी बदहवास कतारों में से छिटक कर गिरने वालों की बेजान देह समेत हर चीज को देशभक्ति और देशद्रोह के पलड़ों में तौल रहे हैं. दूसरी तरफ मामूली लोग हैं जिनके पास कुछ ऐसा भुरभुरा और मार्मिक है जिसे बचाने के लिए वे उलझना कल पर टाल देते हैं. भक्त सरकार के कामकाज को आंकने, फैसला लेने का अधिकार छीनकर अपना चश्मा पहना देना चाहते हैं जो इनकार करे गद्दार हो जाता है. हर नुक्कड़ पर दिखाई दे रहा है, अक्सर दोनों पक्षों के बीच एक तनावग्रस्त, असहनीय चुप्पी छा जाती है. तभी सोनम गुप्ता प्रकट होती है जो लगभग मर चुकी बातचीत को एक साझा हंसी से जिला देती है. सोनम गुप्ता उस युद्ध को टाल रही है. उसकी वेवफाई से अनायास भड़कने वाली जो हंसी है उसमें कोई रजामंदी और खुशी तो कतई नहीं है. सब अपने अपने कारणों से हंसते हैं.

कल्बे कबीर : हिन्द के निवासियों का कोई जवाब नहीं! देश में नासमझी से थोप दिये गये आर्थिक-आपातकाल से वे उतने परेशान नहीं है, जितने चिंतित वे सोनम गुप्ता की बेवफ़ाई से हैं। मैं इस मसले से किनारा करना चाहता था लेकिन आज मेरे मित्र और हिंदी के अनूठे गद्यकार Anil Kumar Yadav ने सोनम गुप्ता की बेवफ़ाई पर एक अद्भुत और मार्मिक पोस्ट लिखकर इसे एक गम्भीर मोड़ दे दिया। जब से सोनम गुप्ता बेवफ़ा हुई है तबसे मुझे हिंदी के अप्रतिम और अलक्षित कवि विष्णु खरे की एक कविता की याद आती रही जिसकी शुरुआत मेरी याददाश्त के आधार पर इस तरह होती है –

हिन्दुस्तान के हर क़स्बे शहर में
सोनी नाम की एक बदनाम औरत पाई जाती है!

यह लम्बी कविता है जिसका आनन्द पढ़ कर ही लिया जा सकता है । पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि एक जर्जर दस के नोट पर बेवफ़ा हुई सोनम गुप्ता विष्णु खरे की कविता की काव्य-नायिका सोनी ही है।

इसके साथ ही मुझे उर्दू के मशहूर शाइर बशीर बद्र का यह सस्ता शे’र भी याद आता रहा कि कुछ तो मज़बूरियां रहीं होंगी यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता ! मेरा मानना है कि इतना घटिया शे’र सुनकर सोनम गुप्ता को तो छोड़िये कोई भी बेवफ़ा हो सकता है।

सोनम गुप्ता बेवफ़ा प्रसंग का अंत अहमद फ़राज़ की एक ग़ज़ल से करना उचित होगा । इतनी उम्दा शाइरी सुनकर मुझे पूर्ण विश्वास है कि सोनम गुप्ता बेवफ़ा नहीं रहेगी और अपने पुराने ठिकाने पर लौट आयेगी। अहमद फ़राज़ फ़रमाते हैं –

इससे पहले कि बेवफ़ा हो जाँय
क्यूं न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाँय

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी क्या जाने क्या से क्या हो जाँय !

पुनश्च : मुझे लगता है सोनम गुप्ता देशवासियों का दिल नहीं तोड़ेगी और यथाशीघ्र बेवफ़ा से बावफ़ा हो जायेगी । बे को बा होने में कितनी देर लगती है । सर पर जो डंडा है उसे बगल में रखना है । बस।

लखनऊ के जाने माने पत्रकार अनिल यादव और दिल्ली के कवि कृष्ण कल्पित (फेसबुक नाम कल्बे कबीर) की एफबी वॉल से.

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