डा. आंबेडकर के मिशन से भटकने वाले दलित नेताओं का यही अंजाम होना है

Kanwal Bharti : जीतनराम मांझी ने दलित राजनीति को झकझोर कर रख दिया है. उन्होंने बहुत से अनसुलझे सवालों को भी सुलझा दिया है और लोकतंत्र में दलितों की हैसियत क्या है, इसका भी आईना दिखा दिया है. दलित आखिर जाएँ तो जाएँ कहाँ? किसी भी पार्टी में उनकी इज्जत नहीं है, सिर्फ उनका उपयोग है. यह लोकतंत्र, यह धर्मनिरपेक्षता और यह समाजवाद (जो सिर्फ हवाई है) दलितों के हितों की बलि पर ही तो जिन्दा है.