मोदी राज में भी महंगाई डायन बनी हुई है!

अजय कुमार, लखनऊ
2014 के लोकसभा चुनाव समय बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने तत्कालीन यूपीए की मनमोहन सरकार के खिलाफ मंहगाई को बड़ा मुद्दा बनाया था। चुनाव प्रचार के दौरान सबसे पहले हिमाचल प्रदेश की रैली में महंगाई का मुद्दा छेड़कर मोदी ने आम जनता की नब्ज टटोली थी। मंहगाई की मार झेल रही जनता को मोदी ने महंगाई के मोर्चे पर अच्छे दिन लाने का भरोसा दिलाया तो मतदाताओे ने मोदी की झोली वोटों से भर दी। आम चुनाव में दस वर्ष पुरानी यूपीए सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने में मंहगाई फैक्टर सबसे मोदी का सबसे कारगर ‘हथियार’ साबित हुआ था, लेकिन आज करीब साढ़े तीन वर्षो के बाद भी मंहगाई डायन ही बनी हुई है।

जिन सब्जियों का यह पीक सीज़न है, उनका भी दाम आसमान पर, जियो रजा हुक्मरानों… खूब लूटो!

Dayanand Pandey :  हरी मटर पचास रुपए किलो, टमाटर चालीस रुपए किलो, गोभी तीस रुपए पीस, पत्ता गोभी बीस रुपए, पालक चालीस रुपए किलो, बथुआ चालीस रुपए किलो, चना साग अस्सी रुपए किलो। इन सब्जियों का यह पीक सीज़न है। फिर लहसुन दो सौ रुपए किलो। फल और दाल तेल तो अय्यासी थी ही, अब लौकी, पालक आदि भी खाना अय्यासी हो गई है। जियो रजा हुक्मरानों! ख़ूब जियो और ख़ूब लूटो! दूधो नहाओ, पूतो फलो! यहां तो किसी संयुक्त परिवार में रोज के शाम के नाश्ते में मटर की घुघरी और भोजन में निमोना नोहर हो गया है। हम लखनऊ में रहते हैं। यहीं का भाव बता रहे हैं। अब कोई मुफ़्त में ही खा रहा है या कम भाव में, तो खाए। अपनी बला से। हमें क्या?