सलाखों के भय से ‘चंडीगढ़ इंडियन एक्सप्रेस’ ने मजीठिया आधा-अधूरा लागू किया, …लेकिन भास्कर कर्मियों का क्या होगा?

सबके दुख-सुख, विपदा-विपत्ति, परेशानी-मुसीबत, संकट-कष्ट, मुश्किल-दिक्कत, आपत्ति-आफत आदि-इत्यादि को अपनी कलम-लेखनी, कंप्यूटर के की-बोर्ड से स्टोरी-आर्टिकल, समाचार-खबर की आकृति में ढाल कर अखबारों, समाचार पत्रों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने की अनवरत मशक्कत-कसरत करने वाले मीडिया कर्मियों को अपने ही गुजारे के लिए मिलने वाली पगार अमृत समान हो गई है। हां जी, अमृत समान! मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लेकर अखबारों के कर्मचारियों और मालिकान के बीच चल रही लड़ाई शायद इसी पौराणिक कथा का दूसरा, पर परिवर्तित रूप लगती है।

लंबे और अथक संघर्ष के बाद कर्मचारियों के समक्ष मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियां प्रकट हुईं लेकिन उस पर अमल कराने, उसे हासिल करने के लिए कर्मचारियों को फिर सर्वोच्च अदालत की शरण में जाना पड़ा। ठीक है, गए। सर्वोच्च अदालत ने कर्मचारियों-कामगारों की पीड़ा को समझते हुए मालिकान को तत्काल आदेश दिया कि दो महीने में मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से कर्मचारियों को वेतन, बकाया और उससे जुड़े समस्त लाभ अदा करो और अपने किए का लेखा-जोखा अगली तारीख 2 जनवरी, 2015 को हमारे समक्ष प्रस्तुत करो। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश इंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ़, दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण के कर्मचारियों की अवमानना याचिकाओं पर बीते 13 अक्टूबर को दिया था। अपने को कानून-व्यवस्था, यहां तक कि भगवान से भी स्वयं को ऊपर समझने वाले अखबार मालिकों के होश इस आदेश ने उड़ा दिए क्यों कि इसका पालन नहीं करने का अर्थ है सलाखों के पीछे भेजे जाने की सजा।

इससे डरे इंडियन एक्सप्रेस के मालिक विवेक गोयनका ने आखिरकार मजीठिया लागू कर दिया है। क्यों कि दो महीने की अवधि 13 दिसंबर को समाप्त हो रही है और इसी अवधि में लागू करना है। चलिए, लागू तो कर दिया है, पर जिस तरह, जिस तरीके से लागू किया है उससे वेतन की स्थिति कहीं और बिगड़ गई है। इस वेज बोर्ड के सुझावों के मुताबिक वेतन-पगार कई गुना बढऩी चाहिए, लेकिन इंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ़ के इस वेज बोर्ड की परिधि में आने वाले 69 कर्मचारियों में से 38 का वेतन पहले से हजारों रुपए कम हो गया है, उनका वेतन माइनस में चला गया है। यही नहीं क्लासीफिकेशन के हिसाब से पहले यह अखबार क्लास 2 में था, जिसे अब क्लास में 3 में कर दिया है। इसके पीछे वही चिरपरिचित दलील कि अखबार की कमाई घट गई है और ऊपर मजीठिया की तलवार लटक गई है। जब कि सच तो यह है कि विवेक गोयनका की बेहद मोटी गर्दन और उससे भी कहीं मोटी खाल को मजाल क्या कि ये तलवार खरोंच भी लगा सके! फिर भी रोना वही का वही। हालांकि इन घडिय़ाली आंसुओं की हकीकत किसी से छिपी नहीं है।

इस वेज बोर्ड में कर्मचारियों को नियमित पदोन्नति देने, इन्क्रीमेंट देने का पूरा बंदोबस्त किया गया है, लेकिन एक्सप्रेस प्रबंधन की आंखों में यह चुभ रहा है। वह इस पर अमल से विमुख होती दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक चार समान किस्तों में एरियर का भुगतान करना है, पर विवेक गोयनका साहब का इस पर रत्ती भर भी ध्यान नहीं है। माननीय मजीठिया जी ने कर्मचारियों को उनकी योग्यता, काबिलियत के हिसाब से एश्योर्ड करिअॅर डेवलपमेंट का प्रावधान किया है। लेकिन स्व.रामनाथ गोयनका के महामहिम दत्तक पुत्र को यह प्रावधान निरर्थक, बेमतलब, बेकार लगता है। यही नहीं, प्रबंधन ने मजीठिया देने के एवज में कर्मचारियों को पहले से मिल रहीं अनेक या कहें कि वो तमाम भत्ते-सुविधाएं छीनने की तैयारी कर ली है, या कि छीन ली है जिसे कर्मचारियों ने लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया है। इन सुविधाओं-सहूलियतों में कई तो ऐसी हैं कि जिनके बगैर अखबार का काम हो ही नहीं सकता। खासकर इंडिसन एक्सप्रेस की जिसके लिए, जिसकी बिना पर एक अलग पहचान है, वह तो इन संबंधित सुविधाओं के छिन जाने के बाद एक्सप्रेस की छवि मटियामेट हो जाएगी। विवेक साहब का न जाने कैसा विवेक है कि इस सच को नहीं जान-समझ पा रहा है कि मात्र मशीनों-टेक्नोलॉजी से अखबार नहीं छपते-निकलते हैं। उसमें मानवीय श्रम, मस्तिष्क, ऊर्जा, ज्ञान, समझ, विवेक आदि की खपत होती है तब कहीं अपने पाठकों तक पहुंचता है। और तब लोग उसे लपक कर पढ़ते हैं और अपने मतलब-रुचि की पाठ्य सामग्री में गोता लगाते हैं।

चंडीगढ़ इंडियन एक्सप्रेस इंप्लाई यूनियन ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के क्रियान्वयन के लिए अपने साथियों के संग मिलकर बहुत मजबूत, अटल-अटूट लड़ाई लड़ी है। लेकिन मैनेजमेंट की नई बदमाशियों, करतूतों, शरारतों से नए सिरे से लडऩे की कटिबद्धता, तत्परता एक बार फिर अनिवार्य हो गई है। हालांकि प्रबंधन फूट डालो और अपना हित साधो की प्राचीन रीति, डगर पर चलने से पीछे नहीं हटेगी। ऐसे में कर्मचारियों का अपने बुनियादी हक के लिए फिर से मैदान में उतरना लाजिमी लगने लगा है।

… लेकिन दैनिक भास्कर कर्मियों का क्या होगा?
 अब यह गोपनीय नहीं रह गया है कि दैनिक भास्कर के महामहिम मालिकान भी अपने कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों से उपकृत करने जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार एक जनवरी 2015 से इन संस्तुतियों पर क्रियान्वयन की मंशा-नीयत उन्होंने जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार दो महीने की मियाद तो 13 दिसंबर को खत्म हो रही है। तो फिर जनवरी में अमल का ऐलान भास्कर के महानुभावों ने जो किया उसका अर्थ-निहितार्थ क्या है, क्या हो सकता है, इसे भास्कर का कोई भी कर्मचारी बता पाने, व्याख्यायित कर पाने में असमर्थ है। वैसे भी, खासकर चंडीगढ़ संस्करण के कर्मचारियों को मजीठिया से शुरू से कोई मतलब नहीं रहा है। यदि दबे-छिपे किसी को रहा भी है तो वह समझ ही नहीं पाया कि मजीठिया है क्या बला। क्यों कि यहां जिसको भी जो और जितनी पगार मिलती है, वह वेज बोर्ड के नियमों के अनुसार-अनुकूल नहीं होती है। बल्कि वह पहुंच-पहचान और सिफारिश के मुताबिक होती है। एक ही पद के व्यक्तियों-शख्सों का वेतन अलग-अलग होता है। यहां अनुभव, वरिष्ठता, कनिष्ठता, योग्यता आदि का कोई मतलब नहीं होता है। यहां का माहौल-कल्चर है मानव रूपी कर्मचारी को मशीन-यंत्र में तब्दील कर देना। बुदबुदाते रहो, पर खुल कर बोलना मना है। ऐसा करना गंभीर गुनाह के समान है। अफसरों को सर, सर कहते रहो। जो कहें सुनते-गुनते रहो।

बहरहाल मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने में उससे संबद्ध सभी नियमों-कानूनों को मानना-पालन करना होगा मालिकान को। ऐसे में इस वेज बोर्ड के मुताबिक कर्मचारियों को कितना वेतन मिलना चाहिए, इसकी जानकारी कर्मचारियों को भी होना अनिवार्य है। तभी तो वे वेतन वृद्धि-वेतन संशोधन, वेतन निर्धारण, उससे जुड़े दूसरे लाभों को अर्जित करने के तरीके-उपाय अपनाने में सक्षम होंगे कर्मचारी। लेकिन जितनी जानकारी उपलब्ध है, भास्कर के अधिकांश पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को पढ़ा ही नहीं है। सबसे अहम यह है कि भास्कर क्लासिफिकेशन के अनुसार किस क्लास में आता है, यह भी शायद ही किसी को पता हो। क्यों कि मैंने जितने लोगों से पूछा है किसी ने भी इस बारे में कुछ नहीं बताया। सबने कहा – हमें नहीं मालूम है। हां, भास्कर के नंबर वन होने की बात सभी सगर्व कहते हैं।

चलिए हमीं बता देते हैं। दैनिक भास्कर के 67 संस्करण प्रकाशित होते हैं। डीबी कार्प की मार्च 2014 तक की कुल सालाना आमदनी 1850 करोड़ रुपए से अधिक है। इस हिसाब से दैनिक भास्कर तो क्लास 1 में आता है क्योंकि इस श्रेणी में 1000 करोड़ रुपए या इससे अधिक के अखबार मजीठिया के अनुसार क्लास 1 में आते हैं। ऐसे में भास्कर के किसी उप संपादक या रिपोर्टर का मासिक वेतन 42-45 हजार रुपए से कम नहीं होना चाहिए। यह भी लागू होना है 11 नवंबर 2011 से। यानी इधर के वर्षों में इन्क्रीमेंट एवं अन्य लाभ भी जुड़ेंगे। साफ है कि इस हिसाब से काफी एरियर भी मिलना चाहिए। स्पष्ट है कि कर्मचारियों को अपना हिसाब किताब बहुत चुस्ती से बनाना होगा तभी भास्कर मैनेजमेंट से निपट पाएंगे।

इससे जुड़ा एक और बड़ा सवाल है कि मैनेजमेंट कितने कर्मचारियों को उपकृत करने के मूड है? कहीं ऐसा तो नहीं है चुनिंदा लोगों को मजीठिया का चॉकलेट थमा दिया जाए और बाकी लोग हमको भी- हमको भी कहते ही रह जाएं और मालिकान अंतत: तेज निगाहों से घूर कर उन्हें खामोश करा दें। 

इस संदर्भ में अब वह यूनियन भी याद हो आई है जिसे भास्कर मालिकान ने चंडीगढ़ संस्करण के शुरुआती काल में अपने खास खुशामदियों की अगुआई एक दैनिक भास्कर कर्मचारी यूनियन बनवा दी थी। जो कागजों में अभी भी है। वैसे वह सक्रिय ही कब थी कर्मचारियों के हित में। हां, मौजूदा परिस्थिति में उन यूनियन नेताओं को चुप्पी तोडक़र वाचाल हो जाना चाहिए, तभी उनके यूनियन नेता होने की सार्थकता उजागर-साबित होगी। अब भी खामोश रह गए तो यह अवसर फिर कभी नहीं पकड़ पाएंगे। हाथ रह जाएगी निराशा-पछतावा।

सूरमा रजनीश रोहिल्ला:
एक सूरमा है रजनीश रोहिल्ला, जिसने दैनिक भास्कर प्रबंधन की बदमाशियों के आगे नहीं झुका। उन्हें ‘मजीठिया नहीं चाहिए’ फार्म पर दस्तखत कराने के अनेक उपक्रम प्रबंधन की ओर से किए गए। पर उन्होंने साइन नहीं किए। इसी खफा मैनेजमेंट ने उनका तबादला कर दिया। लेकिन वे नहीं गए। आखिर में उन्होंने मजीठिया के लिए सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगा दी। उनकी फरियाद सुनी गई और मालिकों से साफ कह दिया गया- दो महीने में लागू करो। नहीं लागू करेंगे तो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के जुर्म में जाना होगा सलाखों के पीछे।

चंडीगढ़ से भूपेंद्र प्रतिबद्ध की रिपोर्ट. संपर्क: 09417556066

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मजीठिया वेज बोर्ड देने में महाराष्ट्र के दूसरे सबसे बड़े समाचार पत्र समूह ने गड़बड़ी-धोखाधड़ी की!

यशोभूमि (हिंदी), पुण्यनगरी (मराठी), मुंबई चौफेर (मराठी), आपलं वार्ताहर (मराठी), कर्नाटक मल्ला (कन्नड़) का प्रकाशन करने वाले तथा अपने आपको महाराष्ट्र का दूसरा सबसे बड़ा समाचार पत्र समूह बताने वाले संस्थान अंबिका ग्रुप ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशनुसार मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन गणना करते समय गड़बड़ी की है. कंपनी द्वारा वेज बोर्ड के मुद्दे पर उदासीनता दिखाने पर लंबे समय तक इंतजार करने के बाद पत्रकारों ने कामगार आयुक्त के यहां शिकायत दर्ज कराई थी और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार वेतन दिलवाने का आग्रह किया था। जिस पर आयुक्त ने अंबिका ग्रुप से इस बारे में जबाब मांगा था। अंबिका ग्रुप ने 30 अक्टूबर को कामगार आयुक्त के यहां पत्र देकर आश्वस्त किया था कि वह इसी माह से कोर्ट के निर्देशानुसार निर्धारित वेतन देने लगेंगे और एरियर का भी भुगतान इसी वर्ष कर देंगे।

परन्तु इस माह जब कंपनी ने वेतन दिया तो कर्मचारी ठगे रह गए। क्योंकि अधिकांश कर्मचारियों के इन हैंड वेतन में 200 से 600 रुपए तक ज्यादा आए थे, जबकि ग्रास सेलरी पूर्ववत थी। कर्मचारियों जब अपनी सेलरी स्लीप देखी तो इस राज से पर्दा हटा। दरसअसल कंपनी ने इस माह से डीए और बेसिक को अलग-अलग कर दिया है, जबकि पहले ये दोनों एक ही में जोड़कर दिखाए जाते थे। कंपनी की द्वारा बेसिक कम किए जाने से पीएफ के रूप में कटने वाली राशि भी कम हो गई है और इस तरह से कंपनी का पीएफ शेयर भी कम हो गया। परन्तु कंपनी ने सबसे बड़ी धोखाधड़ी बेसिक सेलरी एवं उसके अनुसार ग्रास सेलरी के निर्धारण में किया है। कंपनी ने अपने अधिकांश कर्मचारियों की बेसिक सेलरी 7000 या उसके आस-पास दिखाई है। इतना ही नहीं सेलरी कैलकुलेशन में इतनी गड़बड़ियां की गई है कि ज्यादा बेसिक वाले की ग्रास सेलरी कम बेसिक वाले से कम है।

वहीं वेतन निर्धारण में न्यूनतम वेतन के अलावा वेज बोर्ड के किसी भी नियम का पालन नहीं किया गया है। यहां बता दें कि वेज बोर्ड के अनुसार 7000 रुपये बेसिक सबसे छोटे पद पर कार्यरत पत्रकार की होनी चाहिए और वो भी उस कंपनी के लिए जिसका वार्षिक टर्न ओवर 1 करोड़ से कम हो। अंबिका ग्रुप द्वारा प्रतिदिन 10 लाख से ज्यादा प्रतियां बेचने वाली, प्रदेश भर में दर्जन भर प्रिंटिंग प्रेस की मालिकाना हक रखने वाली, प्रदेश की टाप की वितरण कंपनी का संचालन करने वाली तथा 1000 से भी ज्यादा कर्मचारियों की क्षमता वाली इस कंपनी का वार्षिक टर्न ओवर कम से कम कितना होगा,  इसकी कल्पना एक अनपढ़ व्यक्ति भी कर सकता है। लेकिन महाराष्ट्र के दूसरे सबसे बड़े समाचार पत्र समूह ने टर्नओवर एक करोड़ से भी कम होने का दावा किया है।  कंपनी के इस फरेब से गुस्साएं कर्मचारियों ने अपने हक के लिए एक बार फिर कामगार आयुक्त को पत्र लिखकर पारदर्शी तरीके से तथा वास्तविक टर्न ओवर के हिसाब से वेतन निर्धारण एवं भुगतान कराने की मांग की है।

शशिकांत सिंह की रिपोर्ट.

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मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी और डीए कैलकुलेशन के लिए इसे जरूर पढ़ें

भड़ास के पास मीडिया के दो साथियों ने आज दो अलग अलग मेल भेज कर ढेर सारे अखबार कर्मियों के लिए मजीठिया के हिसाब से एक्चुवल सेलरी और डीए गणना के काम को आसान कर दिया है. पहले नंबर वाला मेल नवभारत अखबार छत्तीसगढ़, रायपुर के कर्मचारियों की तरफ से भड़ास को प्रेषित है.

इस मेल के साथ मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से डीए केलकुलेशन के लिए गाइडेंस अटैच है. यह गाइडेंस लेटर केंद्रीय लेबर एंड एंप्लायमेंट मिनिस्ट्री ने भेजा है. सेकेंड मेल एक साथी रविंदर जी की तरफ से है. इस मेल में रविंदर जी का कहना है कि उन्होंने जो दस्तावेज अटैच किए हैं उसमें दिए गए फार्मूले के आधार पर मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से सेलरी का कैलकुलेशन किया जा सकता है. साथ ही उनका कहना है कि इससे डीए भी कैलकुलेट किया जा सकता है. दोनों मेल के साथ आए दस्तावेजों के क्रमशः नीचे दिया जा रहा है. एक-एक को ध्यान से पढ़ें और अपना दिमाग लगाएं. कुछ उलटा सीधा गलत सही लगे तो उसे किसी अन्य या फेक नेम से (ताकि पहचान उजागर न हो जिससे अखबार प्रबंधन चिन्हित न कर सके) कमेंट बाक्स में डालें ताकि उसका निराकरण मीडिया का कोई अन्य साथी कर सके. आप भी अगर कुछ भड़ास तक इस बारे में या किसी बारे में पहुंचाना बताना चाहते हैं तो bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया




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मजीठिया लागू होने के बाद इस मीडिया संस्थान के पत्रकारों का न्यूनतम वेतन 40 हजार हो गया है!

गुवाहाटी : 29 नवंबर को पूर्वोत्तर के दौरे पर आ रहे प्रधानमंत्री गुवाहाटी से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक असम ट्रिब्यून के स्वर्ण जयंति समारोह में भाग लेंगे। यह देश का एक मात्र ऐसा अखबार है जिसने अपने कर्मचारियों के लिए मजीठिया वेतन आयोग बिना देरी किए लागू कर दिया। मजीठिया लागू होने के बाद इस संस्थान के पत्रकारों का न्यूनतम वेतन 40 हजार हो गया है। जबकि इसी प्रदेश में दूसरे अखबारों के पत्रकारों की अधिकतम सैलरी आवश्यकताओं की पूर्ति के लायक भी नहीं है। अर्थात 90 फीसदी पत्रकारों का वेतन 6000 हजार से नीचे है। जो एक राजमिस्त्री और उसके मजदूर की दिहाड़ी से भी कम है।

लोगों का मानना है कि कार्यक्रम में प्रधानमंत्री का शिरकत करना न केवल अखबार के लिए गर्व  की बात है बल्कि प्रधानमंत्री के लिए भी सौभाग्य की बात है कि वे ऐसे अखबार के समारोह में जाएंगे जिसके कर्मचारियों की कोई शिकायत प्रबंधन से नहीं है। विश्व का यह पहला अखबार है जो अपने किसी एक कर्मचारी  को पिछले 75 साल में पेट पर लात मारा हो।  प्रबंधन अपने लिए महंगी गाड़ी और बंगला लेकर खुश नहीं होता बल्कि वह खुश होता है अपने कर्मचारियों के मुहं पर हंसी देख कर। कहा जाता है कि एक बार अखबार के मालिक को किसी ने कहा कि आप इतने प्रतिष्ठित अखबार का मालिक हो कर इस सड़ी गली कार से चलते हैं तो उन्होंने कहा कि मैं नई गाड़ी पर चढ़ कर खुश नहीं होता, मैं खुश होता हूं अपने कर्मचारियों को गाड़ी पर चढ़ते देख कर।

नीरज झा की रिपोर्ट.

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मजीठिया वेज बोर्ड देने से पहले नौकरी छोड़ने के लिए दबाव बना रहा नई दुनिया प्रबंधन!

श्रवण गर्ग के नई दुनिया से विदा होने के बाद पत्रकारों पर बिजनेस लाने के लिए दबाव दिया जाने लगा है. पिछले माह 17 सितंबर को जबलपुर मुख्यालय में ब्यूरो की मीटिंग की गई. मीटिंग में इंदौर से भी कुछ लोग आए थे. मीटिंग में पत्रकारों से कहा गया कि अब आपको न्यूज के साथ बिजनस और सर्कुलेशन भी देखना है. इसके बाद इसी माह 15 नंवबर को एक बार फिर मीटिंग का आयोजन जबलपुर कार्यालय में किया गया. इस मीटिंग में सभी ब्यूरो को अलग अलग बुलाकर डांट पिलाई गई. निकाले जाने की धमकी भी दी गई. मीटिंग के बाद से देखने में आ रहा है कि न सिर्फ बिजनेस बल्कि न्यूज में भी डेस्क प्रभारियों के रंग बदल गए हैं.

डेस्क का काम देखने वाले संजय तिवारी और अन्य लोग बेवजह फोन पर देर रात तक डांट पिलाते हैं. यदि ब्यूरो के लोग अपनी दिक्कतें जिनमें फर्नीचर, आफिस का रख-रखाव और कर्मचारियों की भारी कमी का रोना रोते हैं तो भी कोई सुनवाई नहीं होती. कहा जाता है कि काम तो करना ही पड़ेगा. लग रहा है कि जैसे जैसे मजीठिया देने के दिन पास आ रहे हैं, इस तरह के प्रेशर बनाकर जाब छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है.  पिछले साल एक पत्र भेजा गया था जिस पर सभी कर्मचारियों के हस्ताक्षर कराने का आदेश था. पत्र में लिखा था कि हमारा संस्थान हमें सही वेतनमान दे रहा है, हमें मजीठिया नहीं चाहिए. कुछ जगह से लोगों ने हस्ताक्षर कर भेज दिए लेकिन कई जगह से इसे नहीं भेजा गया. अब तो वीकली आफ भी नहीं दिया जा रहा है. कभी चुनाव का तो कभी कम संसाधन का बहाना बनाकर छुट्टी नहीं दी जा रही है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ दिए बिना रिटायर करने पर भास्कर वालों को नोटिस भेजा

आदरणीय यशवंतजी, मैं दैनि​क भास्कर सागर संस्करण में डिप्टी न्यूज एडिटर के पद पर पदस्थ हूं। मैंने मजीठिया वेज बोर्ड में तहत भास्कर प्रबंधन को एक नोटिस दिया है। अभी तक प्रबंधन ने इस पर ​कोई संज्ञान नहीं लिया है। मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ दिए बिना कंपनी ने 4 अक्टूबर को मेरा रिटायरमेंट तय कर दिया।

मैंने कंपनी से मजीठिया का लाभ दिए जाने के लिए की मांग की लेकिन कंपनी ने सुनवाई नहीं की। इसके बाद मैंने रिटायरमेंट के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। मैंने कंपनी के खिलाफ माननीय सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने का निर्णय लिया है। कृपया इस संबंध में उचित मार्गदर्शन दें ताकि मुझ ​सहित अन्य साथियों के साथ न्याय हो सके। कंपनी को दिए नोटिस की प्रति अटैच कर रहा हूं कृपया प्रकाशित कर कृतार्थ ​कीजिएगा।

मनमोहन श्रीवास्तव

डिप्टी न्यूज एडिटर
दैनिक भास्कर, सागर मप्र
09926002305

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सिर्फ 5000 रुपये में काम कर रहे हैं दैनिक जागरण, लखीमपुर के रिपोर्टर

दैनिक जागरण लखीमपुर ब्‍यूरो आफिस में इन दिनों संवाददाताओं / रिपोर्टरों का जमकर शोषण हो रहा है… बेहद कम पैसे में ये लोग काम करने पर मजबूर हैं.. प्रबंधन की तरफ से वेतनमान बढाने का झांसा काफी समय से दिया जा रहा है… बार वादा हर बार वादा ही साबित हो रहा है… बेरोजगारी के कारण रिपोर्टर चुपचाप मुंह बंद कर काम कर रहे हैं.. कोई आवाज नहीं उठाता क्योंकि इससे उन्हें जो कुछ मिल रहा है, वह भी मिलना बंद हो जाएगा…

आपको विश्वास नहीं होगा लेकिन ये सच है कि इतनी महंगाई के बावजूद दैनिक जागरण लखीमपुर में रिपोर्टर 5000 हजार रुपये में कार्य करने को विवश हैं… कई बार बात करने के बाद भी वेतन में इजाफा नहीं हो रहा है… उच्‍चाधिकारियों की मिली भगत से संवादाताओं का शोषण हो रहा है… लखीमपुर की टीम समेत अन्‍य पत्रकारों ने इसके विरोध में कार्य बहिष्‍कार करने की रणनीति बनाई है… महंगाई के वक्‍त जागरण को लखीमपुर के संवादाताओं का वेतन बढाना होगा… इसके लिये लड़ाई होगी… दैनिक जागरण जिले में अमर उजाला व हिंदुस्‍तान से लड़ रहा है जबकि दोनों संस्‍थानों में रिपोर्टर को 10 हजार रूपये वेतन दिया जा रहा है… ऐसे में जागरण प्रबंधन बेहद कम वेतन देकर कंपनी की नाक कटा रहा है…

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CM Okram Ibobi hums Majithia Wage Board tune

IMPHAL : The mandatory tripartite committee comprising of working journalists, publishers and Government representatives has already been formed and the State Government is fully committed to implement the Justice Majithia Wage Board in the State, said Chief Minister Okram Ibobi while speaking at the inaugural function of the three-day National executive meeting of the Indian Journalists Union (IJU) at the banquet hall of 1st Manipur Rifles today.

All Manipur Working Journalists’ Union (AMWJU) hosted the meeting for the first time in the State after the union got affiliation from IJU last year. Chief Minister Okram Ibobi, IJU President SN Sinha, Social Welfare Minister AK Mirabai, IJU General Secretary Devulanalli Amar and AMWJU President Wangkhemcha Shamjai attended the function as chief guest, president and guests of honour respectively.

In his speech, the Chief Minister said that the mandatory tripartite committee to implement the recommendations of Justice Majithia Wage Board has already been constituted and the State Government is fully committed to implement the recommendations in the State.

Saying that the committee would classify the journalists to develop a foolproof action plan for them, the Chief Minister said that formation of the committee has already been notified in the State Gazette. Congratulating AMWJU on getting affiliation from IJU and hosting a National executive meeting in the State, the Chief Minister said that IJU, which came into being in 1989, has now more than 23,000 members.

IJU members are well represented in various Central and State Government institutions like Press Information Bureau (PIB), Press Accreditation Committee and Press Council of India (PCI), which stand for safeguarding the freedom of press and protection of the rights of journalists. Thanking IJU for allowing the journalists of the State to be a part of the journalist fraternity of the country by giving affiliation to AMWJU, Okram Ibobi said that this consent would enhance the social and cultural integrity between Manipur and the rest of the country.

The Chief Minister said that the State Government has hiked the grant for journalists pension fund from Rs 2 lakh to Rs 5 lakh to facilitate proper implementation of the pension scheme. Despite weak financial position, the State Government has also given its nod to set up a Press Club Academy to train the aspiring journalists and raise the standard of journalism, he added.

Saying that the State Government has been extending assistance to journalists through their corpus fund at the time of emergency, Okram Ibobi also urged AMWJU to suggest to the Government if the union wishes to take up any other welfare schemes for the journalists. Ibobi added that he had also directed the authority concerned to study every available points which can be adopted by the Government regarding the welfare of journalists. He added that the State Government has also agreed in principle to establish a Press Housing Colony.

Contending that Manipur is a gateway to southeast Asian countries, Ibobi also urged the visiting journalists to witness the rich cultural heritage of the State at the ongoing Manipur Sangai Festival. He also expressed hope that Manipur would play a vital role in the successful enforcement of India’s Look East Policy.

Addressing the function, SN Sinha said that IJU is holding its National executive meeting in the North East region for the third time with Sikkim and Assam being the other States which had hosted the previous meetings. The IJU president said that 150 journalists from 20 different States are taking part in the meeting.

Highlighting various challenges being faced by the media in the State, Wangkhemcha Shamjai said that many journalists have died while many others have been injured in the line of duty. He added that AMWJU is putting in efforts to implement the recommendations of Justice Majithia Wage Board to enhance the working condition of journalists in the State.

साभार- The Sangai Express

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एक और मीडिया कंपनी ने मजीठिया वेज बोर्ड देने की लिखित घोषणा की

मुंबई से खबर है कि महाराष्ट्र के दूसरे सबसे बड़े समाचार पत्र समूह श्री अंबिका प्रिंटर्स एंड पब्लीकेशन ने श्रम आयुक्त कार्यालय के आदेश के बाद मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिश अपने यहां लागू करने की लिखित रूप से घोषणा की है. इस बाबत कंपनी ने श्रम आयुक्त को सूचना दी है.

इस कंपनी ने श्रम आयुक्त को लिखे पत्र में साफ तौर पर कहा है कि वह माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार माह अक्टूबर के वेतन में मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिश लागू कर रहा है. उसके बाद वह मार्च २०१५ में जो भी कर्मचारियों की देनदारी एरियर बकाया होगा, वह देगा. इस समाचार पत्र समूह द्वारा यशोभूमि, पुण्यनगरी, चौफेर, वार्ताहर और कर्नाटक मल्ला समाचार पत्र का प्रकाशन किया जाता है. 

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मजीठिया वेजबोर्ड चाहिए तो 24 नवंबर से शुरू होने वाले पोस्टकार्ड अभियान में जरूर हिस्सा लें

साथियों! मजीठिया की लड़ाई में आप का साथ मील का पत्थर साबित होगा। यशवंज सर के संदेश के बाद से मेरे पास कई प्रदेशों से नामी अखबारों के पत्रकारों के फोन आने का सिलसिला जारी है। कुछ पत्रकार ने मजीठिया की  लड़ाई के लिए सुझाव भी दे रहे हैं। साथियों, ‘मजीठिया संघर्ष 2014’ महत्वपूर्ण दौर में है। आइए मिलकर इस लड़ाई को लड़ें। आने वाले सोमवार यानी 24 नवंबर 2014 से पोस्ट कार्ड अभियान की शुरुआत की जा रही है। आप को सिर्फ  तीन पोस्ट कार्ड भेजने हैं। यह  पोस्ट कार्ड सुप्रीम कोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस, राष्टपति और  प्रधानमंत्री के नाम भेजने हैं।  पोस्ट कार्ड का मजनून इस प्रकार है….

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पोस्टकार्ड नंबर एक…

सम्माननीय,
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया,
सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश संख्या WRIT PETITION (CIVIL) NO. 246 OF 2011 एवं   CONMT.PET.(C) No. 401/2014 In W.P.(C) No. 246/2011, Cont.P.(C)No. 411 of 2014 in W.P.(C)NO.246 of 2011, Cont.P.(C)No. 450 of 2014 in W.P.(C)No. 264 of 2012 के क्रम में।

माननीय,
देश का पत्रकार वर्ग वर्षों से देश की सेवा कर रहा है लेकिन अखबार मालिक उनका शोषण कर रहे हैं। माननीय उच्चतम न्यायालय ने मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कर आदेश दिया कि सभी पत्रकार और गैर-पत्रकार जो मीडिया में काम कर रहे हैं, उन्हें मजीठिया बोर्ड का लाभ नवंबर 2011 से एरियर और अप्रैल 2014 से निर्धारित सैलरी के रूप में दिया जाए लेकिन अखबारों के मालिक अपनी हठधर्मिता और प्रभाव का इस्तेमाल कर इसे लागू नहीं कर रहे हैं।  अधिकांश अखबार मालिकों ने अपने कर्मचारियों  पर दबाव डालकर उनसे ‘मजीठिया लाभ की आवश्यकता नहीं’ होने वाले कागजों  पर हस्ताक्षर कराएं हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट में पेश करने की योजना है। इससे पत्रकार वर्ग परेशान है।  पत्रकार को डराया और धमकाया जा रहा है कि अगर वो मजीठिया कि मांग करेगा तो उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। कुछ पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लागू करने की मांग की तो उन्हें प्रताड़ित कर सजा देते हुए उनका ट्रांसफर किया जा रहा है।  हमें आप  पर पूरा भरोसा है कि आप हमें न्याय दिलाएंगे। जिन कंपनियों ने अपने कर्मचारियों  पर दबाव डालकर खाली कागज या ‘मजीठिया की आवश्यकता नहीं’ होने वाले कागजों  पर हस्ताक्षर कराएं हैं, उन्हें पूरी तरह खारिज कर हमें मजीठिया दिलाने की कृपा करें। जिन पत्रकारों के ट्रांसफर किए जा चुके हैं, उन्हें रद़द कराकर राहत प्रदान कराने की कृपा करें। जिन लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है उन्हें नौकरी पर रखने के आदेश देकर उनके परिवारों पर कृपा करें।  जिन अखबारों ने मजीठिया वेज बोर्ड को लागू नहीं किया, उन अखबारों के सरकारी विज्ञापनों पर रोक लगाने की कृपा करें।

इस पते पर भेजें…

माननीय चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया
सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली।

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पोस्टकार्ड नंबर दो

माननीय,
श्री प्रणव मुखर्जी
राष्ट्रपति, नई दिल्ली।
देश का पत्रकार वर्ग वर्षों से देश की सेवा कर रहा है लेकिन अखबार मालिक उनका शोषण कर रहे हैं। माननीय उच्चतम न्यायालय ने मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कर आदेश दिया कि सभी पत्रकार और गैर-पत्रकार जो मीडिया में काम कर रहे हैं, उन्हें मजीठिया बोर्ड का लाभ नवंबर 2011 से एरियर और अप्रैल 2014 से निर्धारित सैलरी के रूप में दिया जाए लेकिन अखबारों के मालिक अपनी हठधर्मिता और प्रभाव का इस्तेमाल कर इसे लागू नहीं कर रहे हैं।  अधिकांश अखबार मालिकों ने अपने कर्मचारियों  पर दबाव डालकर उनसे ‘मजीठिया लाभ की आवश्यकता नहीं’ होने वाले कागजों  पर हस्ताक्षर कराएं हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट में पेश करने की योजना है। इससे पत्रकार वर्ग परेशान है।  पत्रकार को डराया और धमकाया जा रहा है कि अगर वो मजीठिया कि मांग करेगा तो उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। कुछ पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लागू करने की मांग की तो उन्हें प्रताड़ित कर सजा देते हुए उनका ट्रांसफर किया जा रहा है।  हमें आप  पर पूरा भरोसा है कि आप हमें न्याय दिलाएंगे। जिन कंपनियों ने अपने कर्मचारियों  पर दबाव डालकर खाली कागज या ‘मजीठिया की आवश्यकता नहीं’ होने वाले कागजों  पर हस्ताक्षर कराएं हैं, उन्हें पूरी तरह खारिज कर हमें मजीठिया दिलाने की कृपा करें। जिन पत्रकारों के ट्रांसफर किए जा चुके हैं, उन्हें रद़द कराकर राहत प्रदान कराने की कृपा करें। जिन लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है उन्हें नौकरी पर रखने के आदेश देकर उनके परिवारों पर कृपा करें।  जिन अखबारों ने मजीठिया वेज बोर्ड को लागू नहीं किया, उन अखबारों के सरकारी विज्ञापनों पर रोक लगाने की कृपा करें।

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राष्ट्रपति
राष्ट्रपति सचिवालय
राष्ट्रपति भवन,
नई दिल्ली, 004 110.
फोन: 011-23015321
फैक्स: 011-23017290/011-23017824

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ट्विटर: https://twitter.com/rashtrapatibhvn

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पोस्टकार्ड नंबर तीन

माननीय,
श्री नरेन्द्र मोदीजी
प्रधानमंत्री, भारत सरकार
देश का पत्रकार वर्ग वर्षों से देश की सेवा कर रहा है लेकिन अखबार मालिक उनका शोषण कर रहे हैं। माननीय उच्चतम न्यायालय ने मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कर आदेश दिया कि सभी पत्रकार और गैर-पत्रकार जो मीडिया में काम कर रहे हैं, उन्हें मजीठिया बोर्ड का लाभ नवंबर 2011 से एरियर और अप्रैल 2014 से निर्धारित सैलरी के रूप में दिया जाए लेकिन अखबारों के मालिक अपनी हठधर्मिता और प्रभाव का इस्तेमाल कर इसे लागू नहीं कर रहे हैं।  अधिकांश अखबार मालिकों ने अपने कर्मचारियों  पर दबाव डालकर उनसे ‘मजीठिया लाभ की आवश्यकता नहीं’ होने वाले कागजों  पर हस्ताक्षर कराएं हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट में पेश करने की योजना है। इससे पत्रकार वर्ग परेशान है।  पत्रकार को डराया और धमकाया जा रहा है कि अगर वो मजीठिया कि मांग करेगा तो उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। कुछ पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लागू करने की मांग की तो उन्हें प्रताड़ित कर सजा देते हुए उनका ट्रांसफर किया जा रहा है।  हमें आप  पर पूरा भरोसा है कि आप हमें न्याय दिलाएंगे। जिन कंपनियों ने अपने कर्मचारियों  पर दबाव डालकर खाली कागज या ‘मजीठिया की आवश्यकता नहीं’ होने वाले कागजों  पर हस्ताक्षर कराएं हैं, उन्हें पूरी तरह खारिज कर हमें मजीठिया दिलाने  की कृपा करें। जिन पत्रकारों के ट्रांसफर किए जा चुके हैं, उन्हें रद़द कराकर राहत प्रदान कराने की कृपा करें। जिन लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है उन्हें नौकरी पर रखने के आदेश देकर उनके परिवारों पर कृपा करें।  जिन अखबारों ने मजीठिया वेज बोर्ड को लागू नहीं किया, उन अखबारों के सरकारी विज्ञापनों पर रोक लगाने की कृपा करें।

इस पते पर भेजें….
श्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री कार्यालय
साउथ ब्लॉक, रायसीना हिल
नई दिल्ली -110011
फोन: +91-11-23012312
फैक्स: +91-11-23019545, 23016857

यहां आनलाइन भी भेज दें…
फेसबुक: https://www.facebook.com/narendramodi

ट्विटर: https://twitter.com/narendramodi

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आप को करना क्या है

ये तीनों फार्मेट आप के क्षेत्र में जितने पत्रकार हैं, उनके तीन गुना पोस्टकार्डों  पर अलग-अलग  प्रिंट कराने हैं। इन्हें उनके हस्ताक्षर करा कर माननीय चीफ जस्टिस, माननीय राष्ट्रपति और माननीय प्रधानमंत्री के नाम प्रेषित करना है।

कदम तो बढ़ाना होगा

दोस्तो! हमें कदम तो बढ़ाना ही होगा। आप में से कोई भी अपनी जिम्मेदारी खुद तय कर ले। पोस्टकार्ड को प्रिंट करा लें और उन्हें पत्रकारों तक पहुंचाकर पोस्ट कराएं। मैंने एक कहानी सुनी है। एक राजा था। उसने नगर में एक तालाब बनवाया लेकिन उसमें पानी नहीं था। सलाह कर राजा ने प्रजा से अपील की कि रात के समय सभी लोग एक एक लोटा पानी इस तालाब में डालें। रात बीती,  सुबह आई तो तालाब खाली मिला। कारण था-उस नगर के सभी व्यक्तियों ने सोचा कि हमारे एक लोटा पानी से क्या होगा, यही सोचकर किसी ने भी पानी नहीं डाला। मित्रों मैं न तो राजा हूं। न ही आप प्रजा। लेकिन यह कहानी हम  सभी पत्रकार साथियों को एक बड़ा संदेश दे रही है। आप  किसी दूसरे के लिए इस महाक्रांति में योगदान देने से मत रुकना। दो जनवरी (सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का दिन) को इतिहास बनने जा रहा है। हो सकता है कुछ और समय भी लग जाए। आप चिंता मत करना।

मजीठिया हमारा हक है, यह हमें हर हाल में मिलेगा।

धन्यवाद!!
रजनीश रोहिल्ला
09950954588

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भड़ास के जरिए मैंने जिंदगी में पहली बार न्यू मीडिया / सोशल मीडिया की शक्ति का अनुभव किया

 

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भड़ास के जरिए मैंने जिंदगी में पहली बार न्यू मीडिया / सोशल मीडिया की शक्ति का अनुभव किया

जानिब ए मंजिल की ओर अकेला चला था मगर
लोग मिलते गए, कारवां बनता गया!!!

यशवंतजी की ओर से देशभर के पत्रकारों के नाम भड़ास पर पोस्ट हुआ संदेश न्याय की लड़ाई में उबाल ला चुका है। भड़ास के जरिए मैंने जिंदगी में पहली बार न्यू मीडिया / सोशल मीडिया की शक्ति का अनुभव किया। भड़ास की पूरी टीम को मेरा धन्यवाद! धन्यवाद देने का एक बड़ा कारण यह भी है कि मजीठिया के मामले में देश के पत्रकारों को एकजुट होने का मंच भी मिला है। भड़ास के यशवंतजी का मेरे को लेकर लेख आने के बाद मेरे पास पिछले दो दिनों से देशभर से बड़ी संख्या में पत्रकारों के फोन आ रहे हैं। अधिकांश पत्रकार मजीठिया की लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहते हैं।

मुझे लगता है कि यह समय पत्रकारों के जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट है। दूसरे शब्दों में आर-पार की लड़ाई है। पत्रकारों ने फोन कर मुझे न सिर्फ बधाई दी बल्कि मेरा हौसला भी बढ़ाया। मैं जानता हूं कि मेरी लड़ाई अरबों रुपए का कारोबार करने वाली कंपनी से है। यह लड़ाई मैं देशभर के पत्रकारों के दम पर ही लड़ सकता हूं। मुझसे  पत्रकारों ने पूछा कि हम तो सब अलग-थलग पड़े हैं, ऐसे में मजीठिया की लड़ाई कैसे लड़ी जा सकती है। मैंने इन साथियों को बताया कि अपने शहर में  पत्रकारों का छोटा-छोटा समूह बना लें और वकीलों से राय मशविरा कर सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए ड्राफ्ट तैयार करा लें।

मैंने ये भी सुना है कि कंपनियां मजीठिया से बचने के लिए बड़ी संख्या में पत्रकारों के ट्रांसफर की तैयारी कर रही हैं या कर चुकी हैं, ताकि अधिकांश पत्रकार नौकरी छोड़कर चले जाने के लिए मजबूर हो जाएं। कंपनियों की दूसरी रणनीति यह है कि वो अपने स्थाई कर्मचारियों से इस्तीफा लिखवाएंगी तथा कान्टेक्ट कर्मचारी के रूप  में नया अप्वाइंटमेंट देगी। साथियों! ये समय भारत के पत्रकारों के लिए सबसे दुर्भाग्य का समय होगा। वर्तमान में जब सुप्रीम कोर्ट हमारी ताकत बना हुआ, तो हमारा कमजोर रहना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। मालिकों व कर्मचारियों के बीच हर युग में संघर्ष होता आया है और सबसे सुखद बात यह है कि हर युग में कर्मचारी जीते हैं। आप भरोसा रखिए कि जब दुनिया में कोई भी परिवर्तन आता है तो उसके  पीछे परमात्मा की शक्ति और उसकी इच्छा होती है। मजीठिया भी उसी का एक पार्ट है। यह हमारे लिए बना है। हमारा हक है। …और इसे लेने के लिए हमें ठान लेनी चाहिए। जो लोग इस मुगालते में हैं कि न्याय मांगने व देने वालों को खरीद लेंगे, उनकी गलतफहमी दो जनवरी को सहारा समय के मालिक सुब्रत राय की तरह दूर हो जाएगी।

मजीठिया की लड़ाई में एक-एक पत्रकार उसी तरह महत्वपूर्ण है, जिस तरह देश के लिए एक-एक सैनिक है। दोस्तों! मैं ये कोई आर्टिकल नहीं लिख रहा हूं बल्कि जो अनुभव कर रहा हूं, वो आप को बता रहा हूं। अभी नहीं तो कभी नहीं। हम  पत्रकारों  पर आने वाली  पीढियां हंसेंगी। हमारी पीढियां कहेंगी कि हम सशक्त भारत के सबसे कमजोर वर्ग हैं। मजीठिया देश के एक-एक पत्रकार को मिले, इस बात की लड़ाई लड़ने के लिए मैं चैन की नींद नहीं सो रहा हूं। उसी तरह आप भी आज से संकल्प लीजिए कि मजीठिया की लड़ाई में जो संभव होगा, मदद करूंगा। अगर आपने अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ी तो ये बात मत भूलना कि आप अपने शोषण का रास्ता खुद बना रहे हैं। मैं आप से फिर से मुखातिब होउंगा, देश के तमाम उन पत्रकारों को धन्यवाद जिन्होंने भड़ास संपादक यशवंत जी के लेख के बाद मुझे फोन कर मेरा हौसला बढ़ाया।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरा मकसद है, ये तस्वीर बदलनी चाहिए

आप का
रजनीश रोहिल्ला
मोबाइन नंबर : 9950954588


मूल खबर….

दैनिक भास्कर को औकात दिखाने वाले सीनियर रिपोर्टर रजनीश रोहिल्ला को आप भी सलाम करिए

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दैनिक भास्कर को औकात दिखाने वाले सीनियर रिपोर्टर रजनीश रोहिल्ला को आप भी सलाम करिए

रजनीश रोहिल्ला


9950954588. ये मोबाइल नंबर रजनीश रोहिल्ला का है. अजमेर में हैं. यहीं से प्रकाशित दैनिक भास्कर अखबार में सीनियर रिपोर्टर हैं. इन्होंने भास्कर प्रबंधन की आंख में आंख डालकर कहा- ”मजीठिया दो”. न मिलना था सो न मिला. उल्टे ट्रांसफर और प्रताड़ना का दौर शुरू. तब फिर रजनीश रोहिल्ला ने भास्कर प्रबंधन की आंख में आंख डालकर कहा- ”तुझे तेरी औकात दिखाउंगा”. ठान लिया तो पूरी कायनात रजनीश रोहिल्ला के लक्ष्य को पाने-दिलाने में जुट गई.

अजमेर के इस सीनियर रिपोर्टर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. मजीठिया वेज बोर्ड न देने को लेकर कंटेंप्ट आफ कोर्ट. सुप्रीम कोर्ट ने कुबूल किया इसे. केस रजिस्टर किया. अब साले भास्कर वाले गिड़गिड़ा रहे हैं रजनीश रोहिल्ला के आगे.. ”…आ जाओ भाई… सेटल कर लो… पैसे ले लो.. सब कर लो पर आ जाओ.. बस याचिका वापस ले लो.. कह दो कि सब ठीक है…. ” टाइप की बातें कहते करते हुए.

रजनीश रोहिल्ला का कल मेरे पास फोन आया. बोले- यशवंत भाई, ये स्थिति है अब. मैंने कहा- मित्र, आप अब खुद अकेले नहीं है. देश भर के पत्रकारों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. पूरे प्रकरण वाकये पर लिखकर भेजिए. इसे प्रकाशित किया जाएगा ताकि भास्कर वालों का हरामजदगी और एक पत्रकार के साहस की कहानी सबके सामने रखी बताई जा सकी. रजनीश रोहिल्ला ने वादा निभाया और आज जब सुबह मैंने भड़ास का मेल चेक करना शुरू किया तो उनका ये आर्टकिल पड़ा मिला. पढ़िए, और कुछ न कर पाइए तो कम से कम फोन करके रजनीश रोहिल्ला को उनकी इस बहादुरी / मर्दानगी पर बधाई सराहना शाबाशी दे डालिए…

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


मेरी कंपनी के कई बड़े अधिकारी समझौते के लिए मेरे ऊपर अलग-अलग तरह का दबाव बना रहे हैं

नमस्कार

9 साल तक पत्रकारों के लंबे संघर्ष के बाद बने मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई निणार्यक दौर में है। हमारी कंपनियां हमें मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देना नहीं चाहती। हालांकि वे खुद शुद्ध व्यवसायिक लाभ कमा रही है। हमारे शोषण को जारी रखकर हमें आर्थिक रूप से कमजोर बनाए रखना चाहती हैं। कुछ मैनेजर टाइप के लोगों को जरूर अच्छा पैसा दिया जा रहा है। ये वो लोग हैं जो केवल मालिकों के हितों के बारे में ही सोचते हैं। हम पत्रकारों को तो बेचारा समझकर लालीपॉप देने का सिलसिला चला रखा है। लेकिन अब देश के सुप्रीम कोर्ट ने हमारे पक्ष में फैसला सुना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने हम पत्रकारों की परिभाषा और वेतन का स्ट्रक्चर भी बना दिया है। अब मालिक मनमाना रवैया नहीं अपना सकते हैं। इन मालिकों की हिमत देखिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी मानने के लिए तैयार नही है। उसे भी मजाक समझ रहे हैं।

मालिकों ने तुगलकी फरमान जारी कर अधिकांश पत्रकारों से दबाव डालकर  लिखवाया कि उन्हें मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ नहीं चाहिए। मालिकों की नजर में पत्रकार वर्ग असहाय, मजबूर और बेचारा है। मालिकों की सोच के अनुसार पत्रकारों ने उस काले आदेशों पर हस्ताक्षर कर दिए। जबकि एक स्वर में उस काले आदेश का विरोध किया जाना चाहिए था। पर, पत्रकार सोच रहे थे  कि नौकरी खतरे में पड़ जाएगी।  परिवार पर आर्थिक संकट आ जाएगा। लेकिन जरा सोचिए एक रणनीति बनाकर सारे  पत्रकार एक साथ मजठिया की मांग कर दें तो कंपनियां क्या बिगाड़ पाएगी। वो भी उस समय जब देश का सुप्रीम कोर्ट हमारे पीछे बैठा हो।

दोस्तों मैंने मालिकों द्वारा भेजे गए काले फरमान को मानने से मना कर दिया। मैंने लाख दबाव के बावजूद भी काले आदेश वाले कागज पर हस्ताक्षर नहीं किए। मुझे इसकी कीमत चुकानी पड़ी। मेरा ट्रांसफर महाराष्ट्र के जालना में मराठी भाषी अखबार में कर दिया लेकिन मैं बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ। कंपनी के मैनेजर सोच रहे थे कि मै उनके पैरों में पड़ूंगा गिड़गिड़ाउंगा। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

मैंने मजीठिया वेजेज को लागू करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में कंटेप्ट पीटीशन दायर की। मुझे उस समय बहुत खुशी हुई जब जानकारी मिली की कंटेप्ट पीटीशन को सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्टर कर लिया। यह मजीठिया की लड़ाई की पहली बड़ी जीत थी। मेरी पीटीशन का रजिस्टर नंबर 21773 है। दो महीने बाद मुझे केस नंबर 401 मिला। यह आप सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर देख सकते हैं। 13 अक्टूबर को दीपावली के समय सुप्रीम कोर्ट ने हम पत्रकारों को बड़ा तोहफा देते हुए देश के सभी मीडिया हाउस मालिकों को दो महीने में मजीठिया वेज बोर्ड की पालना रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं।

मित्रों, यह दो महीने 13 दिसंबर को पूरे होंगे। अगर इस दिनांक तक मालिक पालना रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर पाए तो उनके खिलाफ कंटेंप्ट की कार्रवाई शुरू होगी। लड़ाई महत्वपूर्ण दौर में पहुंच चुकी है। मैं इसका असर देख और महसूस कर पा रहा हूं। मेरी कंपनी के कई बड़े अधिकारी मुझसे संपर्क साध रहे हैं। समझौते के लिए मेरे ऊपर अलग-अलग तरह का दबाव बना रहे हैं। समझौता किस बात का, कैसा समझौता। मैने स्पष्ट कर दिया है कि मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कीजिए। मैं आगे की लड़ाई के लिए पूरी तरह तैयार हूं। मैं जानता हूं कि मालिक किसी भी हद तक जा सकते हैं। मेरी जिंदगी के साथ खिलवाड़ या फिर किसी भी तरह का नुकसान भी पहंचा सकते हैं लेकिन मैं सुपीम कोर्ट  और आप सब के भरोसे पर लड़ाई लड़ रहा हूं। इसलिए मझे कोई चिंता नहीं है। क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ मेरे अकेले की नहीं बल्कि सब पत्रकार भाइयों की है।

मित्रों मैं पिछले सात महीनों से बिना वेतन के चल रहा हूं। निश्चित रूप से मुझे कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। महीने में कई दिन मेरे कोर्ट में बीत रहे हैं। मजीठिया नहीं मिलने तक लड़ाई जारी रहेगी। मेर आप से अपील है इस संघर्ष में आप जैसा भी सहयोग कर सकते हैं। जरूर कीजिए। सुप्रीम कोर्ट हमारे साथ है। हमारी जीत निश्चित है।  मेरा निवेदन है कि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को इंटरनेट पर आप एक बार जरूर पढ़ें और ज्यादा से ज्यादा पत्रकार साथियों को इसकी जानकारी देकर उन्हें जागरूक बनाएं। सुप्रीम कोर्ट में अगली तारीख 2 जनवरी है।

आपका
रजनीश रोहिल्ला
9950954588
सीनियर रिपोर्टर
दैनिक भास्कर
अजमेर संस्करण

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कोर्ट में झुका भास्कर प्रबंधन, दिव्य भास्कर वालों को अगले माह से मजीठिया वेतनमान मिलने लगेगा

मजीठिया वेतन बोर्ड को लेकर गुजरात के पत्रकारों द्वारा लगाई गई याचिका का सार्थक परिणाम आया है। गौरतलब है कि गुजरात हाईकोर्ट में उक्त मामले की सोमवार 10 नवंबर को अंतिम सुनवाई थी लेकिन कोर्ट का फैसला आता कि उससे पहले ही डीबी कार्प के वकील ने अपनी गलती मानते हुए मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं के अनुसार सभी भुगतान करने की बात मान ली और केस बंद करने का आग्रह किया।

अब यह बात समझ से परे है कि अभी तक पेपर के नाम पर दम भरने वाले मालिक को अचानक क्या हुआ कि कोर्ट के फैसले से पहले ही अपना फैसला सुना दिया। इतना ही नहीं, डीबी कार्प की पहल से यह लग रहा था कि वह याचिकाकर्ता 10 पत्रकारों से याचिका कर उनकी सभी शर्त मानने को तैयार है। खैर इस पहल से पत्रकारों के लिए खुशखबरी की बात यह है कि गुजरात में काम करने वाले दिव्य भास्कर के कर्मचारियों को अगले माह से मजीठिया वेतनमान मिलने लगेगा। अब देखना होगा कि मजीठिया वेतनमान को लेकर हताश पत्रकार इस फैसले के बाद कितने आक्रामक होते हैं।

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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए भी वेज बोर्ड गठित करने की मांग

मुंबई : महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडवणीस से प्रिंट मीडिया की तर्ज पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी एक वेज बोर्ड के गठन की माँग की गई है। मुंबई मराठी पत्रकार संघ के उपाध्यक्ष एवं टीवी जर्नलिस्ट एसोसिएशन के सदस्य शशिकांत सांडभोर ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडवडीस से लिखित रूप से माँग की है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों का आर्थिक शोषण रोकने के लिए जिस तरह से प्रिंट मीडिया में मजीठिया वेज बोर्ड का गठन किया गया है। वैसे ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी एक “वेज बोर्ड” का गठन किया जाये। 

शशिकांत सांडभोर का कहना है कि महाराष्ट्र में कोली समाज के लिए भी एक बोर्ड है ऐसे ही कामगारों के लिए भी मथाड़ी बोर्ड का काम कर रहा है। ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों को मालिकों के आर्थिक शोषण से मुक्ति दिलाने के पूरे देश में एक बोर्ड का गठन करना नितांत आवश्यक है। देश में जिस तेजी से न्यूज चैनलों की बाढ़ आ रही है उसी तेजी से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों पर नौकरी के लिए खतरों के बादल मंडराते रहते हैं। जब से चिंट फंड कंपनियां चिट्ट-पट्ट करके मीडिया के बाज़ार में उतर गई हैं तब से पत्रकारों के जीवन में खतरे की घंटी बज चुकी है। चारो तरफ से पत्रकार अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। आज के इस अर्थ युग में पत्रकारों के ऊपर आर्थिक शोषण दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। सीनियर पत्रकारों तक को इंटर्नशिप जैसा व्यवहार किया जा रहा है।

चिट फंड कंपनियों के मालिक के मैनेजर टाइप संपादक एक-दो महीना तक तो फ्री में काम कराते हैं। आश्वासन की घूंटी पिलाते हैं कि अभी आपका लेटर बन रहा है। इन कंपनियों के पढ़े लिखे एच. आर की टीम और मधुर वाणी में महारात हासिल कर चुके संपादक के कहने पर पत्रकार काम करना शुरु कर देते हैं फिर चलता है पेपरबाजी का खेल। इस खेल को संपन्न होते होते दो तीन महीना गुजर जाता है। फिर जब वेतन मिलता है तो एक दो महीने की सैलरी काट कर बाकी की सैलरी देना शुरु कर दिया जाता है। यही तकनीकि है पढ़े लिखे लोगों के कम बजट में काम कराने का तरीका। इस तरीके पर पीएचडी प्राप्त व्यक्ति जहां कहीं भी देखो ब्रह्म ज्ञान उड़लेते हुए मिल जायेगा।  अतः मुख्यमंत्री से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों को आर्थिक आज़ादी एवं उनके संरक्षण के लिए वर्तमान हालात को देखते हुए एक “वेज बोर्ड” के गठन करने की मांग करना आवश्यक है। 

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Jurnos urge Jaitley for wage board for TV employees

Electronic Media Forum Assam (EMFA), while congratulating Arun Jaitley for being bestowed the responsibility of Information & Broadcasting ministry (under GoI), urges him for initiating a separate wage board for the employees of privately owned television channels of India. Prime Minister Narendra Modi on November 10 in New Delhi distributed the portfolios of his expanded Union cabinet, where Jaitley has been given the Information & Broadcasting (I&B) ministry in addition to Finance and Corporate Affairs.

“We expect new I&B minister to take up the issue of a separate wage board for the television employees in the line of Majithia Wage Board for journalist and non-journalist media employees of newspapers and news agencies for regular pay hike and other due benefits,” said a statement issued by EMFA.

The Supreme Court of India in a recent verdict asked the newspaper/news agency owners to implement the recommendations of Majithia Wage Board since November 2011 such that they can get structured and regular pay hikes till their retirements.

The umbrella body of all employees, including the journalists, engaged in Assam based private channels, pointed out that nearly 80 per cent television employees across the country are still performing their duties with pitiable salaries, unlimited working hours and without basic facilities recommended by the country’s labour laws.

“If a separate wage board for the television employees is not possible at this moment, they should be allowed to get the advantages of Majithia Wage Board as directed by the apex court of the country,” added the EMFA statement.

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नवभारत छत्तीसगढ़ कर रहा अपने कर्मचारियों के साथ छलावा

भले ही नवभारत छत्तीसगढ़ नियमित कर्मचारियों को मजीठिया वेतनमान देने का दावा करता हो लेकिन यह आधी सच्चाई है। दरअसल कर्मचारियों के साथ मजीठिया वेतनमान के नाम पर धोखाधड़ी की जा रही है। नवभारत छत्तीसगढ़ को नवभारत रायपुर प्रेस व रामगोपाल इन्वेस्टमेन्टर्स प्रा. लि. नामक कंपनी संचालित करती है जिसके मालिक समीर माहेश्वरी हैं। हालांकि कर्मचारियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने और उनका हर संभव सहयोग में नवभारत अव्वल नंबर का समाचार पत्र संस्थान है, अन्य समाचार पत्र संस्थानों को इससे सीख लेनी चाहिए। इसी कारण इसे लोग सरकारी प्रेस कहते हैं। लेकिन बनियावाद की दौड़ में अब नवभारत भी शामिल हो गया है और कर्मचारियों का हर संभव शोषण कर रहा है।

जुलाई 2013 से नवभारत रायपुर ने सभी नियमित कर्मचारियों को आधा-अधूरा मजीठिया वेतनमान देने लगा जिससे जिन कर्मचारियों का वेतन 15 हजार था वह बढ़कर 23 से 25 हजार हो गया लेकिन किसी कंपनी को मजीठिया वेतनमान ना देता देख उक्त संस्थान ने भी उल्टी गणित लगाते हुए उनका वेतन 12 से 13 हजार कर दिया। जिसका कारण मजीठिया वेतनमान की गलत गणना बताया गया। अब कर्मचारी हड़ताल किए तो लेबर कोर्ट से स्टे ला दिया। तब से कर्मचारी हड़ताल भी नहीं कर पाते, अरे जनबा जब तक घोषित तौर पर हड़ताल नहीं होती तब तक कोर्ट भी स्टे नहीं दे सकता। हां हड़ताल करने का और भी तरीका है कि दो-चार काॅपी छापे उसके बाद मषीन बंद काम बंद। हड़ताल भी नहीं काम भी नहीं।

नवभारत रायपुर का टर्न ओवर 20 करोड़ और बिलासपुर का 10 करोड़ है। रामगोपाल इन्वेस्टमेन्टर्स प्रा. लि. को भी मिला लिया जाए तो यह आंकड़ा 60 करोड़ रूपए से ऊपर जाता है। इस हिसाब से नवभारत प्रेस चतुर्थ श्रेणी का अखबार है लेकिन वेतन गणना अंतिम श्रेणी में भी नहीं की जा रही है। यदि नवभारत रायपुर कंपनी के हिसाब से भी गणना की जाए तो पांचवी श्रेणी का अखबार आता है जिसमें अंतिम बेसिक सैलरी 16400 रूपए है। फिर भी हम गणना आठवीं श्रेणी के अंतिम पे स्केल की करें तो-

बेसिक 10500 रूपए
वेरिएबल पे 2100 रूपए           बेसिक का 20 प्रतिशत (चार्ट अनुसार)
डीयरनेस एलांउस (डीए )        6825 रूपए         बेसिक का 65 प्रतिशत 
(1 जनवरी 2014 से जून 2014 की गणना)

जुलाई 2014 से दिसंबर 2014 तक का डीए 73 प्रतिषत
डीयरनेस एलांउस (डीए ) 7665 रूपए          

हाउस रेंट- 2520 रूपए       (बेसिक $ वेरियवल पे का 20 प्रतिशत)

मकान किराया एक्स शहर के लिए बेसिक का 30 प्रतिशत, वाई शहर के लिए 20 प्रतिशत और जेड श्रेणी के शहर के लिए 10 प्रतिशत निर्धारित है।
कौन सा शहर किस श्रेणी का है इसका निर्धारण मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसा में दिया हुआ है।

ट्रास्टपोर्ट एलाउंस 1260 रूपए     (बेसिक $ वेरियवल पे का 10 प्रतिशत)
ट्रास्टपोर्ट एलाउंस एक्स शहर के लिए बेसिक का 20 प्रतिषत, वाई शहर के लिए 10 प्रतिशत और जेड श्रेणी के शहर के लिए 5 प्रतिशत निर्धारित है।

मेडिकल एलांउस    500 रूपए
मेडिकल एलाउंस वर्ग 1 व 2 के अखबारों के लिए लिए 1000 और 3 व 4 श्रेणी के अखबारों के लिए 500 रूपए निर्धारित है।

नाइट एलाउंस     1500 रूपए   50 रूपए प्रतिदिन
वर्ग 1 व 2 के अखबारों के लिए लिए 100 रूपए प्रतिदिन और 3 व 4 श्रेणी के लिए 75 रूपए व अन्य श्रेणी के अखबारों में कार्यरत कर्मचारियों को 50 रूपए प्रतिदिन निर्धारित है।

कनवेन्स 1749 रूपए बेसिक का 16.66 प्रतिशत

इस तरह कुल न्यूनत वेतन 35459 रूपए हुआ। जो मजीठिया वेतन बोर्ड का न्यूनतम वेतनमान है। इसमें यदि 12.36 प्रतिषत पीएफ भी काटा जाए तो 4383 रूपए कटेगे तो भी वेतन 31076 रूपए बनेगा। लेकिन कर्मचारी गणना नहीं जानते इसलिए उन्हें मजीठिया के नाम पर उल्टा सीधा पढ़ाया जा रहा है।

एक कर्मचारी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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लेबर आफिसर ने अमर उजाला को नोटिस जारी किया

रविंद्र अग्रवाल मामले में लेबर आफिसर धर्मशाला ने अमर उजाला को नोटिस जारी किया है। मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर की गई शिकायत के बाद प्रबंधन ने रविंद्र का ट्रांसफर जम्मू कर दिया था। इसे प्रताड़ित किये जाने की कार्रवाई मानते हुए रविंद्र ने जम्मू ज्वाइन नहीं किया था। इसके बाद प्रबंधन ने उन्हें निपटाने की तैयारी कर ली थी, लेकिन बेज बोर्ड का मामला हाई कोर्ट में लगने के बाद प्रबंधन पीछे हट गया था।

हालांकि तबसे न तो ट्रांसफर रद्द किया गया और न ही कोई बात की गई। तीन महीने से वेतन भी रोक दिया गया है।  इसकी शिकायत लेबर कमिश्नर से की गई थी। विभाग के निर्देशानुसार प्रबंधन को मांग पत्र भेजा गया था,  लेकिन इसका कोई जवाब नहीं दिया गया। अब विभाग ने इस मामले को रिट्रेंचमेंट की कार्रवाई मानते हुए 31 अक्टूबर को सुनवाई की तारीख तय की है।

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द हिंदू अखबार के कर्मियों को इस साल दिवाली में बोनस नहीं मिलेगा

लाइव मिंट डाट काम में सुचि बंसल की एक स्टोरी छपी है. शीर्षक है ”No Diwali bonus for employees of The Hindu this year”  इसमें  विस्तार से बताया गया है कि किस तरह मजीठिया वेज बोर्ड के कारण द हिंदू अखबार को संचालित करने वाली कंपनी कस्तूरी एंड संस को 65 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ा है और इसी कारण वह इस दीवाली में बोनस दे पाने में असमर्थ है. कंपनी ने द हिंदू इंप्लाइज के लिए जारी एक नोट में विस्तार से बताया है कि वह बोनस दे पाने में क्यों असमर्थ है. लाइव मिंट डाट काम की पूरी रिपोर्ट नीचे प्रकाशित है…

No Diwali bonus for employees of The Hindu this year

As outgo on account of wage board arrears swells, Kasturi and Sons tells employees it can’t pay bonuses this year

Shuchi Bansal

New Delhi: The implementation of the recommendations of the Majithia committee raising salaries for so-called working journalists (a term under the relevant Indian laws) and other newspaper employees has pushed Kasturi and Sons Ltd, the Chennai-based publisher of The Hindu and The Hindu Business Line, into the red.

In a note to its employees dated 10 October, the company said it made a loss of Rs.65 crore in the financial year ending March.

The total outgo for Kasturi and Sons on account of the arrears payable to the employees since 2011 as well as the increase in salaries is expected to touch Rs.120 crore, according to The Hindu’s editor-in-chief and promoter N. Ravi.

“We may have seen marginal losses during years of economic downturn, but this is the first time that we have seen such a big loss,” added Ravi.

Owing to its losses, the company has not been able to pay Diwali bonus to its employees this year; the bonus is a tradition at The Hindu.

In a notice to its employees, the management said: “Employees on the rolls of Kasturi & Sons Limited are outside the ceiling prescribed under the Payment of Bonus Act. Hence there is no statutory obligation on the company to pay bonus. Employees are also aware that the company is going through the worst financial performance, having suffered a loss of Rs.65 crore for the financial year ending 31 March 2014. Consequently, the company is not in a position to extend any benevolence in these challenging times.”

It, however, promised to pay Rs.3,500 as ex gratia one time sum to the employees. Kasturi and Sons used to pay a Diwali bonus of between Rs.40,000 and Rs.45,000 in recent years.

This year, the loss at the company has already crossed Rs.50 crore, a person familiar with the matter said.
Mint couldn’t independently verify this.

The non-declaration of bonus hasn’t gone down well with employees.

Many are protesting the move by sporting black badges and some have threatened to go on a hunger strike on 17 October.

The company was under no statutory obligation to pay a bonus since all its employees earned upwards of Rs.10,000, Ravi explained. “What we used to give was a goodwill incentive. But now we are paying arrears at the same time,” he added, referring to the additional burden on employee costs imposed by the Majithia committee recommendations.

The recommendations of the Majithia Wage Board (headed by justice G.R. Majithia) were accepted by the government in 2011. The matter was challenged in court by a few newspaper organizations. In February this year, the Supreme Court dismissed the plea of newspaper managements seeking a review of its earlier judgement and directed them to implement the recommendations accepted by the Union government.

“We hold that the recommendations of the wage boards are valid in law, based on genuine and acceptable considerations and there is no valid ground for interference under Article 32 of the Constitution of India. Consequently, all the writ petitions are dismissed with no order as to costs,” the apex court said.

The petitioners included Bennett, Coleman and Co. Ltd, ABP Pvt. Ltd (publisher of Anandabazar Patrika) and the Indian Newspaper Society, among others. A bench headed by chief justice P. Sathasivam held that “the wages as revised/determined shall be payable from 11.11.2011 when the government of India notified the recommendations of the Majithia wage boards. All the arrears up to March 2014 shall be paid to all eligible persons in four equal instalments within a period of one year from today and continue to pay the revised wages from April 2014 onwards”.

Almost 90% of the employees at Kasturi and Sons fall under the purview of the wage board, leading to the outflow of money towards arrears and higher salaries. On average, the wage bills of newspaper companies implementing the Majithia wage board have gone up by 20% to 100%.

“Some employees will get as much as Rs.8 lakh in arrears which has to be paid in four instalments,” Ravi said. N. Ram and N. Murali, chairman and co-chairman respectively at Kasturi and Sons, did not respond to phone, calls, text messages or emails.

A 13 October letter by the company to employees said the first instalment would be paid on 15 October “despite KSL’s financial situation being the worst in our history.” A copy of the letter was seen by Mint.

A former senior employee of Kasturi and Sons said the company wasted the opportunity to move its employees from the wage board to the contract system on time.

Ravi Dhariwal, chief executive (publishing) at Bennett, Coleman and Co., said there could be more to the losses at Kasturi and Sons.

“Our outgo on account of Majithia would probably be higher than Hindu’s. What may be adding to Hindu’s problems could be the fact that we are progressing well in the South,” he said.

Bennett, Coleman and Co. publishes The Times of India from Chennai, which, according to Dhariwal, is eroding The Hindu’s market share and advertising revenue. The company, which publishes The Economic Times and The Times of India, competes with HT Media Ltd, publisher of Mint and Hindustan Times, in several markets.

http://www.livemint.com/Companies/dVoexLMXIvcJtKHEFtE2hP/No-Diwali-bonus-for-employees-of-The-Hindu-this-year.html

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मजीठिया वेतन बोर्ड : भूलकर भी लेबर आफिस के चक्कर में ना पड़ें क्योंकि लेबर आफिस अंत में कोर्ट ही जाता है

मजीठिया वेतन बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी संस्थानों की सूची मांगी है जो मजीठिया वेतन नहीं दे रहे है। ऐसे में अब पत्रकारों का दायित्व बनता है कि अंतिम समय में और सक्रिय होकर अपने हक की लड़ाई लड़े। वास्तविक स्थिति आज भी यह है कि कई वरिष्ठ पत्रकार यह नहीं जानते कि मजीठिया वेतन बोर्ड है क्या? लड़ाई किस बात को लेकर हो रही है, वेतन तो सभी को मिल रहे है। फिर उन्हें साफ शब्दों में समझाना पड़ता है कि मजीठिया वेतन बोर्ड मतलब कम से कम 30 हजार वेतन।

सुप्रीम कोर्ट उन संस्थानों की सूची मांगा है जो मजीठिया नहीं दे रहे है। ऐसे में केन्द्रीय श्रम मंत्रालय व राज्य सरकार के श्रम विभाग सामने यह धर्म संकट उत्पन्न होगा कि किन-किन संस्थानों की जांच करें, किनकी सूची दें। ऐसे में प्रेस संस्थानों से ही सूची मांगेगा, तो संस्थान चुनिंदे अपने 2-4 चम्मचों के नाम भेज देगा। ऐसे में आप जहां काम कर रहे है उस संस्थान की रिपोर्ट स्वयं सुप्रीम कोर्ट, केन्द्रीय श्रम मंत्रालय व राज्य श्रम मंत्रालय को भेजे। जिसमें संस्थान का नाम कितने कर्मचारी काम कर रहे है, किन्हें क्या वेतन मिल रहा है। संस्थान का वार्षिक कारोबार, पता आदि की जानकारी दें। हो सकें तो यह भी जानकारी दे कि वर्तमान में मजीठिया वेतनमान कितना होना चाहिए। उक्त जानकारी भरकर इसे रजिस्टर्ड डाक से उक्त संस्थानों को गुमनाम से भेज दें। जो ऐसा ना कर पाए तो कम से कम ई-मेल उक्त विभागों को कर दें। कोर्ट को भेजे पत्र में ऊपर पते के साथ केस नंबर भी दर्ज करें।

चूंकि जिन संस्थानों के नाम से अवमानना लगी है उन्हें मजीठिया देना मजबूरी है। ऐसे में संस्थान यह कर सकता है आधे-अधूरों को मजीठिया देकर मामला रफा-दफा कराने का प्रयास करे। या पत्रकारों की छंटनी करें, ऐसे में पत्रकार तैयार रहें। छंटनी क्यों कर रहे है, संस्थान को एक माह पहले बताना पड़ता है और पहले आओ, अंत में जाओ क्रम का पालन करना पड़ता है लेकिन संस्थान किसी को भी निकाल देता है। जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 15 के तहत किसी कर्मचारी को वेतन बोर्ड के कारण नहीं निकाला जा सकता। यदि 240 दिन की कर्मचारी कार्य अवधि पूर्ण कर लिया हो तो लेबर कोर्ट में औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 25 एफ के तहत परिवाद लग सकता है। जिसमें केस अवधि तक कोर्ट से कंपनसेशन की मांग की जाती है। मांग में केस अवधि तक पुनः नौकरी में रखने या गुजारा भत्ता देने की मांग की जाती है। लेकिन भूलकर भी लेबर आफिस के चक्कर में ना पड़ें। क्योंकि लेबर आफिस अंत में कोर्ट ही जाता है और संस्थान के प्रमुख से शिकायत के बदले राशि की मांग कर मामला रफा-दफा या ढीला करने का प्रयास करता है।

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Dainik Jagran is guilty of the contempt of the Apex Court

The Supreme Court of India has taken cognizance of the contempt petition filed by the Indian Federation of Working Journalists (IFWJ) on behalf of the employees against Shri Sanjay Gupta, the CEO of Jagran Prakashan Limited. The bench of Justices Ranjan Gogoi and Rohinton Fali Nariman directed the Management of Jagran Prakashan Limited on 13th October to comply with the order of the court for the implementations of the Majithia Wage Boards recommendations within two month, if the same has already not been done. 

Three employees of the Dainik Jagran, Avishek Raja, Ashok Kumar Rana and Sandeep Kumar Rai have said in their contempt petition that the Jagran management is guilty of willful and deliberate disobedience of the verdict of the Hon’ble Supreme Court.  The judgment of the Hon’ble Court was pronounced on 07th of February 2014 by the three-judge bench headed by the then Chief Justice P. Sathashivam consisting of Justice Ranjan Gogoi and Justice Shivakirti Singh.

It may be recalled that by dismissing all writ petitions of the top newspaper barons of the country, the Supreme Court had directed for the implementation of all recommendations without any change, with effect from 11.11.2011. Only some have implemented Wage Boards recommendations, many newspapers have not properly complied with. The biggest felony has, however, been committed by the Jagran Prakashan Limited, which claims to be highest read newspaper not only of India but also of the whole world in any language. This newspaper was also one of the petitioners, which impugned the Wage Boards recommendations before the Supreme Court.

Dainik Jagran has deep and pervasive readership in Uttar Pradesh, Uttarakhand, Himachal Pradesh, Punjab, Jammu & Kashmir, Haryana, Madhya Pradesh, Rajasthan, Bihar and Jharkhand. Jagran Prakashan Limited is the worst violators of labour laws and this time again; it has shown the temerity and the audacity by not even responding to the requests of employees to implement Majithia recommendations. What is even more shocking is that the management has taken the despicable recourse to harassing, victimizing and intimidating the employees.

After the pronouncement of the landmark judgment of the Hon’ble Apex Court, the management has brazenly removed dozens of employees, journalists and non-journalists included, and vindictively transferred many of them to insignificant places. The employees of Dainik Jargarna are living in the atmosphere of perpetual fear and terror. The counsel for the employees Parmanand Pandey, who is also the Secretary General of the ‘Indian Federation of Working Journalists’ (IFWJ) has stated with documentary evidence that the Dainik Jagran management is not paying even the fragment of salary and allowances to its employees, which has been recommended by the Wage Board.

According to latest balance sheet submitted by the newspaper to the Company Law Board (CLB) the annual turnover of the company is more than Rs. 1700/- crore and thus the Dainik Jagran newspaper falls in the category of the class I newspapers but the employees are deprived of even the minimum basic facilities and wages. The management of Dainik Jagran is known across the India for its notoriety, mischief and bloodsucking exploitative methodology against employees. This newspaper prominently claims on its masthead to be published from 35 centres from all over India but the number of regular employees does not go beyond four digits altogether. Most of the employees are appointed on the contract basis and they are paid abysmally low wages. Journalists are compelled to work much beyond the working hours than the prescribed under the Working Journalists Act, 1955.

The Apex Court will certainly take serious view of its contempt if Dainik Jagran management again fails to abide by the law of the land.

Written By:

Sribhagwan Bhardwaj

Office Secretary – IFWJ

Attached: Copy of the order of the Supreme Court

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गुजरात हाईकोर्ट ने दिया दिव्यभास्कर (डीबी कॉर्प) को तगड़ा झटका, भास्कर प्रबंधन के सभी कुतर्क अस्वीकार

मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन और एरियर देने के मामले में गुजरात हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति परेश उपाध्याय की पीठ ने डीबी कॉर्प (दैनिक भास्कर और दिव्य भास्कर की प्रकाशक कंपनी) के खिलाफ दिव्य भास्कर कर्मचारियों की याचिका को सही माना है। हाईकोर्ट ने बीते आठ तारीख को कर्मचारियों की ओर से दाखिल याचिका को खारिज करने को लेकर दिव्य भास्कर के प्रबंधन के सभी तर्कों को अस्वीकार कर दिया।

याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीमकोर्ट के आदेश के मुताबिक प्रबंधन तत्काल प्रभाव से वेतन और एरियर का भुगतान करे। इसके लिए पीठ गुजरात सरकार को भी इसे लागू कराने का आदेश दे। इसके साथ ही हाईकोर्ट प्रबंधन की ओर से इस मामले में किए गए कर्मचारियों के ट्रांसफर को अवैध घोषित करते हुए उसी स्थान पर पूर्ववत काम करते रहने का आदेश दे। हाईकोर्ट के आदेश की प्रति संलग्न है, नीचे के लिंक पर क्लिक करें…

GUJARAT HIGHCOURT ORDER

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मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अखबार मालिकों से साफ तौर पर कहा- comply within two months

: सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर से आदेश दिया- मजीठिया दो महीने में लागू करो : मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के मुताबिक वेतन पाने को लालायित, बेचैन, परेशान और कुछेक अखबार संस्थानों-प्रतिष्ठानों में संघर्षरत-प्रयासरत पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए अत्यंत उत्साहवर्द्धक खबर यह है कि 13 अक्टूबर 2014 को एक सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण के मालिकों, चेयरमैनों, मैनेजिंग डायरेक्टरों, सीईओज को स्पष्ट आदेश देते हुए कहा है कि दो महीने के अंदर वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करें। यह आदेश सर्वोच्च न्यायालय ने द इंडियन एक्सप्रेस इंप्लाई यूनियन चंडीगढ़ और दैनिक भास्कर एवं दैनिक जागरण कर्मचारियों की अवमानना याचिकाओं पर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई ने अपना फैसला सुनाते हुए तीनों समाचार पत्रों के प्रबंधन से साफ तौर पर कहा, comply within two months. कोर्ट की संबंधित बेंच में ये याचिकाएं सुनवाई के लिए बतौर आइटम नंबर 5,6,एवं 7 लगी थीं। द इंडियन एक्सप्रेस इंप्लाई यूनियन चंडीगढ़ के वकील कॉलिन गोंसाल्वेज ने कर्मचारियों का पक्ष अपने चिरपरिचित अनूठे-अनोखे अंदाज में प्रस्तुत किया। दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर के कर्मचारियों ने अपनी याचिकाएं इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट के महासचिव एवं सुप्रीम कोर्ट के वकील परमानंद पांडेय के माध्यम से दायर की हैं। इन याचिकाओं पर अगली सुनवाई 2 जनवरी 2015 को होगी।

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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश, दो माह के भीतर देना होगा मजीठिया वेतनमान

मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू ने करने संबंधी अवमानना के तीन मामलों की सुनवाई करते हुए माननीय सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्‍यायमूर्ति रोहिंगटन एफ नरिमन की खंडपीठ ने सोमवार को ऐतिहासिक आदेश दिया। जैसे ही तीनों मामले उनके समक्ष सुनवाई के लिए पेश किए गए। उन्‍होंने वरिष्‍ठ वकील श्री कोलिन गोंजाल्विस से इस संबंध में पूछा।

तीनों मामले एक ही जैसे थे और इससे पहले एक मामला इंडियन एक्‍सप्रेस का न्‍यायमूर्ति रंजन गोगोई के समक्ष आ चुका था। मामले की गंभीरता को देखते हुए कुछ देर तक दोनों न्‍यायमूर्तियों ने आपस में विचार किया और आदेश दिया कि दूसरी पार्टियां दो महीने के भीतर सुप्रीम कार्ट के फैसले का अनुपालन करें।

अगली सुनवाई की तारीख 2 जनवरी तय की गई है। सबसे पहले भास्‍कर इसके बाद दैनिक जागरण और तीसरे नंबर पर इंडियन एक्‍सप्रेस, चंडीगढ़ का केस था। कोर्ट नंबर दस में सुनवाई के दौरान भास्‍कर के कर्मचारियों की ओर से उनके वकील एचके चतुर्वेदी और दैनिक जागरण के कर्मचारियों की ओर से परमानंद पांडेय पेश हुए।

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सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया मालिकों से मजीठिया लागू करने को कहा, अन्यथा होगी कार्यवाही

मजीठिया के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा आदेश दिया है। 13 अक्टूबर को अवमानना याचिकाओं की सुनवायी करते हुए कोर्ट ने सभी मामलों को दो महीने के बाद लिस्ट करने का आदेश दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि यदि प्रतिवादियों भास्कर, जागरण और इंडियन एक्सप्रेस ने मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन नहीं किया है तो इस दो महीने की अवधि के दौरान अनुपालन सुनिशचित करें अन्यथा विधि अनुसार कार्यवाही की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट का आदेशः

ITEM NO.5 & 6 & 7                            COURT NO.10                  SECTION X

                                 S U P R E M E C O U R T O F       I N D I A
                                         RECORD OF PROCEEDINGS

     CONMT.PET.(C) No. 401/2014 In W.P.(C) No. 246/2011

     ABP PVT. LTD. & ANR.                                              Petitioner(s)

                                                   VERSUS

     UNION OF INDIA & ORS.                                             Respondent(s)
     (With office report)

     AND

     Cont.P.(C)No. 411 of 2014 in W.P.(C)NO.246 of 2011
     (With office report)

     AND

     Cont.P.(C)No. 450 of 2014 in W.P.(C)No. 264 of 2012
     (With office report)

     Date : 13/10/2014 These petitions were called on for hearing today.

     CORAM :
                           HON’BLE MR. JUSTICE RANJAN GOGOI
                           HON’BLE MR. JUSTICE ROHINTON FALI NARIMAN

     For Petitioner(s)                Mr. H. K. Chaturvedi,Adv.
                                      Ms. Anjali Chaturvedi,Adv.
                                      Ms. Ashish Saxena,Adv.

                                      Mr. Paramanand Pandey,Adv.
                                      Mr. Raj Kishor Choudhary,Adv.
                                      Mr. Utkarsh Pandey,Adv.

                                      Mr. P. George Giri,Adv.
     For Respondent(s)

                            UPON hearing the counsel the Court made the following
                                               O R D E R

                                 List all these matters after two months.
                                 During the aforesaid period the order of the
                         Court be complied by the respondents, if the same has not already been done.

 

Signature Not Verified

Digitally signed by     
Madhu Bala
Date: 2014.10.13
16:41:22 IST
Reason:

(MADHU BALA)                                 (ASHA SONI)
COURT MASTER                                 COURT MASTER

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