बनारस के वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर खुले आसमान के नीचे मौत का कर रहे हैं इंतजार…

क्या पता कब मारेगी
कहां से मारेगी
कि जिदंगी से डरता हूं
मौत का क्या, वो तो
बस एक रोज मारेगी

कभी धर्मयुग जैसे प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़े रहे बुर्जुग पत्रकार गोपाल ठाकुर को जिदंगी रोज मार रही है, फिर भी जिंदा हैं… सिर पर छत फिलहाल नहीं है…. जो अपने थे, वक्त के बदलते रौ में वो अपने नहीं रहे… बेबसी, बेकारी हालात के शिकार गोपाल जी का नया ठिकाना फिलहाल रविन्द्रपुरी स्थित बाबा कीनाराम आश्रम का चबूतरा है, जहां लेट कर आसमान को निहारते हाथों को ऐसे ही हिलाकर शायद अपने गुजरे वक्त का हिसाब-किताब करते मिले… लेकिन इतने बुरे वक्त में भी उनके चेहरे पर शिकन नहीं दिखी…

मिले तो उसी अंदाज में हंस दिये जैसे कुछ हुआ ही नहीं है… कुछ पूछने से पहले ही खुद ही बोल उठे… सब ठीक है यार… पर छलछलाती आखें और चेहरे के अन्दर का चेहरा जैसे सारे राज खोल कर चुगली कर गया- ‘सब एक नजर फेर कर बढ़ गये हैं आगे, मैं वक्त के शोकेस में चुपचाप खड़ा हूं।’

गोपाल ठाकुर को मैं तब से जानता हूं जब वो बनारस में ही पिल्ग्रिम्स पब्लिशिंग से जुड़ कर हिन्दी पुस्तकों का सम्पादन किया करते थे… दिल के साफ पर स्वभाव के अक्खड़ गोपाल जी का पत्रकारिता से पुराना रिश्ता रहा है… तब बम्बई और अब की मुंबई में वो 1976 से लेकर 1984 तक धर्मयुग जैसे प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़े रहे… बाद में बनारस लौटे तो दैनिक जागरण, आज, सन्मार्ग जैसे कई अखबारों से जुड़कर उन्होंने पत्रकारिता ही की… बाद में पिल्ग्रिम्स पब्लिशिंग से लम्बे समय तक जुड़े रहे…

सुनने में आया था कि वहां भी उनकी भारत सरकार के किसी सेवानृवित अधिकारी के लिखे किताब की प्रूफ रीडिंग को लेकर विवाद हो गया था, जैसा की होता रहा है… प्रभावशाली सेवानिवृत अधिकारी ने मालिक पर दबाव बना उनको माफी मांगने के लिए मजबूर किया तो अधिकारी की ऐसी-तैसी कर नौकरी को लात मारकर सड़क पर खड़े हो गये… बाद में जब भी मिले तो इस बात का जिक्र उन्होंने कभी मुझ जैसे उनसे उम्र में काफी छोटे लोगो से नहीं किया… जब भी मिले तो पत्रकारिता के वैचारिक पहलुओं पर ही बातें की…

अस्सी से लेकर सोनारपुरा के कई चाय की अड़िया उनके अड्डेबाजी के केन्द्र हुआ करती थी, जहां वो अपने हम उम्र दोस्तों, जानने-पहचानने वालों के साथ घंटों गुजारते थे… लेकिन न तो आज वो दोस्त कहीं नजर आ रहे हैं, न उन्हें जानने-पहचानने वाले… आज गोपाल जी खुले आकाश के नीचे तन्हा जिंदगी के अंत का इन्तजार कर रहे हैं… रोज एक धीमी मौत मर रहे हैं…. कह रहे हैं- ये देश हुआ बेगाना… वैसे भी नजरों से ओझल होते ही भुला देने की शानदार परम्परा हमारी रवायत रही है… हम डूबने वालों के साथ कभी खड़े नहीं होते ये जानते हुए कि हम में हर कोई एक रोज डूबती किश्ती में सवार होगा…

शराब की लत और उनकी बर्बादी के कई किस्से सुनने के बाद भी न जाने क्यों लगता है कि, ऐसे किसी को मरने के लिए छोड़ देना दरअसल कहीं न कहीं हमारे मृत होते जा रहे वजूद की तरफ ही उंगली उठाता है… मौजूदा हालात में साथ वालों की थोड़ी सी मदद, थोड़ा सा साथ और हौसला उन्हें इस हालात से बाहर लाकर जिदंगी से जोड़ सकता है… नहीं तो किसी रोज जिदंगी भर खबर लिखने वाला ये शख्स खबरों की इस दुनिया को छोड़ चलेगा और ये खबर कहीं नहीं लिखी जायेगी कि एक था गोपाल ठाकुर ….और कहना पड़ेगा ….. कोई किसी का नहीं है, झूठे नाते हैं, नातों का क्या।

बनारस से युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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