मई में मौसम ही नहीं, मीडिया का इतिहास भी तपता है

मई का मौसम ही नहीं, इतिहास भी तपता रहा है। मानो ये जमाने से सुलगता आ रहा है। इसके चार अध्याय-विशेष, जिनमें दो पत्रकारिता के। एक है आज तीन मई को ‘अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस। इसी महीने की 30 तारीख को हिंदी पत्रकारिता दिवस रहता है। बाकी दो में एक मई दिवस और 10 तारीख को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम दिवस। 1 मई 1886 को अमेरिका में काम के घंटे घटाने की मांग करते मजदूरों पर गोलीबारी के दुखद दिन को मई दिवस के रूप में याद किया जाता है। 

‘अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन, प्रेस की स्वतंत्रता पर बाहरी तत्वों के हमले से बचाव और प्रेस की सेवा करते हुए दिवंगत हुए संवाददाताओं को श्रद्धांजलि देने का दिन है। ‘अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ मनाने का निर्णय वर्ष 1991 में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के ‘जन सूचना विभाग’ ने मिलकर किया था। इससे पहले नामीबिया में विन्डंहॉक में हुए एक सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया था कि प्रेस की आज़ादी को मुख्य रूप से बहुवाद और जनसंचार की आज़ादी की जरूरत के रूप में देखा जाना चाहिए। तब से हर साल ‘3 मई’ को ‘अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

आज जबकि हिंदुस्तान के पत्रकार मजीठिया वेतनमान की लड़ाई लड़ रहे हों, ऐसे में इस दिन का महत्व और अधिक उल्लेखनीय हो जाता है। वह इसलिए कि, जब पत्रकार अपने घर में गुलामी के दिन बिता रहा हो, उसे घर मालिक ही मजदूर की तरह रपटाते हुए,उल्टे मजदूरी न देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों तक उल्लंघन कर रहे हों, फिर काहे की स्वतंत्रता। जब पत्रकार गुलाम हो तो प्रेस स्वतंत्र कैसे हो सकता है। 

मीडिया की आज़ादी का मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी राय कायम करने और सार्वजनिक तौर पर इसे जाहिर करने का अधिकार है। इसका उल्लेख मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के ‘अनुच्छेद 19’ में किया गया है। भारत में संविधान के अनुच्‍छेद 19 (1 ए) में “भाषण और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के अधिकार” का उल्‍लेख है, लेकिन उसमें शब्‍द ‘प्रेस’ का ज़िक्र नहीं है, किंतु उप-खंड (2) के अंतर्गत इस अधिकार पर पाबंदियां लगाई गई हैं। इसी क्रम में ‘भारतीय संसद’ द्वारा 2005 में पास किया गया ‘सूचना का अधिकार क़ानून’ भी गौरतलब हो जाता है। इस क़ानून में सरकारी सूचना के लिए नागरिक के अनुरोध का निश्चित समय के अंदर जवाब देना बहुत जरूरी है। संसद में 15 जून, 2005 को यह क़ानून पास कर दिया था, जो 13 अक्टूबर, 2005 से पूरी तरह लागू हो गया।

हिंदी पत्रकारिता दिवस 30 मई को मनाया जाता है। सन 1826 ई. में इसी दिन पंडित युगुल किशोर शुक्ल ने प्रथम हिन्दी समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन आरम्भ किया था। भारत में पत्रकारिता की शुरुआत पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने ही की थी। हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत बंगाल से हुई थी, जिसका श्रेय राजा राममोहन राय को दिया जाता है। आज हिंदी पत्रकारिता को कारपोरेट मीडिया ने जिस हालत में पहुंचा दिया है, जग जाहिर है। ‘उदन्त मार्तण्ड’ के लिए गोरे शासकों से जैसा लोहा लेना पड़ा था, उसे तो ये पतित कारपोरेट मीडिया याद भी नहीं करना चाहता है। 

इसी महीने पड़ने वाले प्रथम स्वाधीनता संग्राम दिवस को 1857 के भारतीय विद्रोह के रूप में जाना जाता है। 10 मई 1857 को ही ब्रितानी शासन के विरुद्ध पहला सशस्त्र विद्रोह हुआ था। यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जारी रहा। इस विद्रोह का आरंभ छावनी क्षेत्रों में छोटी झड़पों तथा आगजनी से हुआ था। बाद में उसने देशव्यापी आकार ले लिया था। इस विद्रोह का अन्त भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन की समाप्ति के साथ हुआ।

इस मई महीने में ही क्रांतिकारियों, साहित्यकारों, इतिहासकारों, कवियों, लेखकों की 18 जयंतियां पड़ती हैं और 17 स्मृति (निधन) दिवस।

इस माह के प्रमुख जयंती दिवस इस प्रकार हैं – 

5 मई 1929 – अब्दुल हमीद कैसर (भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारियों में से एक)।

7 मई 1861 – रबीन्द्रनाथ ठाकुर (नोबेल पुरस्कार प्राप्त बांग्ला कवि, कहानीकार, निबंधकार)।

7 मई 1889 – एन. एस. हार्डिकर (प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी)।

8 मई 1895 – गोपबन्धु चौधरी (उड़ीसा के प्रसिद्ध क्रांतिकारी तथा गाँधीवादी कार्यकर्ता)।

11 मई 1912 – सआदत हसन मंटो (कहानीकार, लेखक, पटकथा लेखक और पत्रकार)।

15 मई 1907 – महान क्रांतिकारी सुखदेव।

20 मई 1900 – सुमित्रानंदन पंत (प्रसिद्ध छायावादी कवि)

21 मई 1931 – शरद जोशी (प्रसिद्ध हिंदी व्यंग्यकार)।

22 मई 1774 – राजा राममोहन राय (अग्रणी धार्मिक-सामाजिक क्रांतिद्रष्टा)

23 मई 1923 – अन्नाराम सुदामा (प्रसिद्ध राजस्थानी साहित्यकार)।

27 मई 1894 – पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (ख्यातिप्राप्त आलोचक तथा निबन्धकार)।

27 मई 1928 – बिपिन चन्द्रा (प्रसिद्ध इतिहासकार)।

27 मई 1954 – हेमन्त जोशी (कवि-पत्रकार-प्राध्यापक)।  

24 मई 1896 – करतार सिंह सराभा (प्रसिद्ध क्रान्तिकारी)। 

25 मई 1831 – दाग़ देहलवी (प्रसिद्ध उर्दू शायर)।

29 मई 1906 – कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर (जाने-माने निबंधकार)।

31 मई 1725 – अहिल्याबाई होल्कर – (प्रसिद्ध वीरांगना)। 

31 मई 1843 – अण्णा साहेब किर्लोस्कर (मराठी रंगमंच के क्रांतिधर्मी नाटककार)।

इस माह में पड़ने वाले 17 स्मृति-दिवस (निधन) इस प्रकार हैं – 

2 मई 1985 -बनारसीदास चतुर्वेदी (प्रसिद्ध पत्रकार और साहित्यकार)। 

9 मई 1995 – कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर (हिन्दी के जाने-माने निबंधकार)।

10 मई 2002 – कैफ़ी आज़मी (फ़िल्म जगत के मशहूर उर्दू शायर)।

12 मई 1993 – शमशेर बहादुर सिंह (हिन्दी कवि)। 

13 मई 2001 – आर. के. नारायण (भारत के प्रसिद्ध अंग्रेज़ी लेखक)।

14 मई 1978 – प्रसिद्ध नाटककार जगदीशचन्द्र माथुर 

19 मई 1979 – हज़ारी प्रसाद द्विवेदी (प्रसिद्ध लेखक, उपन्यासकार)

20 मई 1932 – विपिन चन्द्र पाल (भारत में क्रान्तिकारी विचारों के जनक)

22 मई 1991 – श्रीपाद अमृत डांगे (भारत के प्रारम्भिक कम्युनिस्ट नेताओं में से एक)

23 मई 2010 – कानू सान्याल (नक्सली आंदोलन के जनक)। 

 23 मई 2011 – चन्द्रबली सिंह (प्रसिद्ध लेखक, आलोचक, अनुवादक)।

24 मई 2000 – मजरूह सुल्तानपुरी (प्रसिद्ध गीतकार) 

26 मई 1986 – श्रीकांत वर्मा (प्रसिद्ध कवि-कथाकार-समीक्षक)।

27 मई 1964 – जवाहरलाल नेहरू (भारत के प्रथम प्रधानमंत्री)।

28 मई 2005 – गोपाल प्रसाद व्यास (प्रसिद्ध कवि, लेखक)।

30 मई 2000 – रामविलास शर्मा (सुप्रसिद्ध आलोचक, निबंधकार एवं कवि)

31 मई 1988 – द्वारका प्रसाद मिश्रा (स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, साहित्यकार)।

जयप्रकाश त्रिपाठी 

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आईआईएमसी के लिए आखिरी डेट 8 मई

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन ने जर्नलिज्म की पढ़ाई के लिए हाल ही में आवेदन मंगवाए हैं। आईआईएमसी के विभिन्न पीजी डिप्लोमा कोर्सेज में आवेदन की अंतिम तिथि 8 मई 2015 निर्धारित की गई है। प्रिंट, टीवी, रेडियो समेत विभिन्न संचार माध्यमों से जुड़कर जर्नलिज्म करने या एड एजेंसीज, कॉरपोरेट कंपनियों व एनजीओज  से  जुड़कर एडवर्टाइजमेंट या पब्लिक रिलेशन के फील्ड में कॅरियर बनाने के इच्छुक लोगों अब इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन से पढ़ाई कर सकते हैं। 

गौरतलब है कि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास क यूनिकेशन भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का एक स्वायत्त संस्थान है, जो कि कम्यूनिकेशन से जुड़े प्रमुख कोर्सेज करवाता है। संस्थान के कोर्सेज के उपरांत स्टूडेंट्स को पीजी डिप्लोमा दिया जाता है, जिसे देशभर के प्रमुख मीडिया संस्थानों एवं कंपनियों में मान्यता प्राप्त है। संस्थान की शाखाएं- नई दिल्ली, ढेंकनाल (ओडिशा), अमरावती (महाराष्ट्र), आइजोल (मिजोरम), जम्मू  (जम्मू-कश्मीर) व कोट्टयम (केरल)।

आईआईएमसी में आवेदन करने वाले आवेदक एक से अधिक कोर्सेज के लिए आवेदन कर सकते हैं। हिंदी और इंग्लिश जर्नलिज्म का पेपर एक ही होता है इसलिए आप इनमें से किसी एक पेपर में ही बैठ सकते हैं। इसके अलावा आप अन्य किसी पेपर में भी बैठ सकते हैं। जितने कोर्सेज में आप आवेदन करना चाहते हैं, आपको उतने ही फॉर्म भरने होंगे और उतनी ही प्रवेश परीक्षाओं में बैठना होगा। इन कोर्सेज को सफलतापूर्व पूरा करने वाले स्टूडेंट्स के लिए आईआईएमसी में ही कैंपस प्लेसमेंट की सुविधा दी जाती है। इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिष्ठित कंपनियां संस्थान के कैंपस में आती हैं। आवेदन करने वाले लोगों को प्रवेश परीक्षा देनी होगी। प्रवेश परीक्षा का आयोजन 31 मई 2015 को विभिन्न शहरों में किया जाना है। उडिय़ा जर्नलिज्म में प्रवेश के लिए परीक्षा का आयोजन एक जून 2015 को सिर्फ भुवनेश्वर में किया जाएगा। लिखित परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले चयनित आवेदकों को इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा।

उडिय़ा जर्नलिज्म के अलावा सभी कोर्सेज के लिए इंटरव्यूज का आयोजन नई दिल्ली में किया जाएगा। उडिय़ा जर्नलिज्म के लिए इंटरव्यू ढेंकनाल ब्रांच में ही होगा। इसके बाद अंतिम चयन सूची बनाई जाएगी, जिसके आधार पर विभिन्न कोर्सेज में प्रवेश दिया जाएगा। एक से अधिक क ोर्स के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए आपको अलग-अलग फॉर्म भरने होंगे और अलग-अलग प्रवेश परीक्षा देनी होगी।

आईआईएमसी की प्रवेश परीक्षा 31 मई को होनी है। उडिय़ा जर्नलिज्म के लिए प्रवेश परीक्षा सिर्फ भुवनेश्वर में होगी और इसकी तिथि 1 जून रखी गई है। आईआईएमसी के इन कोर्सेज में आवेदन के फॉर्म ऑनलाइन भी प्राप्त किए जा सकते हैं और  ऑफलाइन भी। फॉर्म भरने के बाद इसे 1200 रुपए के डिमांड ड्राफ्ट के साथ संस्थान के पते पर भेज दें। एससी/एसटी/ओबीसी/ शावि आवेदकों के लिए आवेदन शुल्क 1100 रुपए है। 

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