कॉरपोरेट हमले के खिलाफ एकजुट हुए लेखक, संस्‍कृतिकर्मी और पत्रकार

नई दिल्‍ली : नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में पिछले साल केंद्र की सत्‍ता में आयी एनडीए सरकार को साल भर पूरा होते-होते साहित्यिक-सांस्‍कृतिक क्षेत्र भी अब उसके विरोध में एकजुट होने लगा है। बीते रविवार इसकी एक ऐतिहासिक बानगी दिल्‍ली में देखने को मिली जब दस हिंदीभाषी राज्‍यों से आए लेखकों, संस्‍कृतिकर्मियों, कवियों और पत्रकारों ने एक स्‍वर में कॉरपोरेटीकरण व सांप्रदायिक फासीवाद की राजनीति के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद की और अपने-अपने इलाकों में भाजपा-आरएसएस द्वारा फैलायी जा रही अपसंस्‍कृति के खिलाफ मुहिम चलाने का संकल्‍प लिया। यहां स्थित इंडियन सोशल इंस्टिट्यूट में ”16 मई के बाद की बदली परिस्थिति और सांस्‍कृतिक चुनौतियां” विषय से तीन सत्रों की एक राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया जिसके मुख्‍य अतिथि बंबई से आए मकबूल फिल्‍मकार सागर सरहदी थे।  

दिल्‍ली जैसे निर्मम शहर में भी दस घंटे चली कविता 16 मई के बाद

दिल्ली : अभिषेक श्रीवास्तव लिखते हैं – ‘कविता : 16 मई के बाद’ का आयोजन कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। पहला तो इसलिए कि जितने लोगों ने फेसबुक ईवेन्‍ट पर आने की पुष्टि की थी तकरीबन उतने लोग एक मौके पर वास्‍तव में मौजूद थे। दस घंटे तक चले कार्यक्रम में तकरीबन शाम छह बजे तक 90 लोग मौजूद रहे, जो दिल्‍ली जैसे निर्मम शहर में मुश्किल होता है।